Thursday, December 18, 2008

मुम्बई त्रासदी पर लंदन में हुई हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी

जिस दिमाग़ में धर्म या मज़हब रहता है वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं –काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

लंदन |13 दिसंबर 2008| कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित साझा हिन्दी-उर्दू कथागोष्ठी में मेहमानों को स्वागत करते हुए कॉलिन्डेल की काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, “मुंबई की त्रासदी के बाद हमें यह ज़रूरी लगा कि हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी करवा कर हम विश्व को संदेश दे सकते हैं कि साहित्य द्वारा दो देशों के नागरिकों में एक सहज वातावरण पैदा किया जा सकता है। मैं नहीं मानती कि आतंकवाद का कोई मज़हब होता है। दरअसल मैं तो कहूंगी जिस दिमाग़ में मज़हब या धर्म का वास होता है, वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं होता है।” इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनन्द कुमार जबकि अध्यक्ष थे प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल।
इस कथागोष्ठी में हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर ने अपनी महत्वपूर्ण कहानी पंगा का पाठ किया तो उर्दू का प्रतिनिधत्व किया नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां ने। इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में अन्य लोगों के अतिरिक्त शामिल हुए डा. अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीक़ी, हुमा प्राइस, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीक़ी, परिमल दयाल, रेहाना सिद्दीक़ी, डा. हमीदा, सीमा कुमार, केबीएल सक्सेना।
(सामने बैठे नजमा उसमान, ज़कीया ज़ुबैरी, दिव्या माथुर)
(खड़े हैं – तेजेन्द्र शर्मा, अचला शर्मा, प्रों.अमीन मुग़ल, सलीम अहमद ज़ुबैरी, परवेज़ आलम)


कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने सूचित किया कि यह कथा यू.के. की गोष्ठियों का दसवां साल है। दिव्या माथुर की कहानी पंगा के बारे में उन्होंने कहा कि यह सही मायने में हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय कहानी है। इस कहानी का विषय, निर्वाह, भाषा और बिम्ब सभी नयापन लिये हैं। कहानी का आधार लन्दन की कारों की नम्बर प्लेटें हैं। कहानी की मुख्यपात्रा एक अधेड़ सेवानिवृत भारतीय मूल की महिला है। तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि दिव्या ने इस कहानी में जो टेक्नीक अपनाई है उसमें कहानी सुनाने से हट कर वे कहानी दिखाती हैं।
आनंद कुमार, ज़कीया ज़ुबैरी, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीकी, परवेज़ आलम, परिमल दयाल, डा. हमीदा एवं ख़ुर्शीद सिद्दीकी आदि सभी एकमत थे कि कहानी चलती हुई कार की यात्रा के साथ साथ उन सभी सड़कों पर उन्हें साथ ले चलती है। पन्ना (कहानी की मुख्य पात्रा) की हर प्रतिक्रिया उन्हें सहज और सही लगती है।
डा. अचला शर्मा ने दिव्या को उनकी कहानी की भाषा, विट और विषय के चुनाव के लिये बधाई दी। अध्यक्ष प्रो. अमीन मुग़ल के अनुसार कहानी तीन स्तरों पर यात्रा करती है। पहले स्तर पर आती है कारों की नम्बर प्लेटें जिनकी कड़ियां एक कहानी बनाती चलती हैं। उसके बाद आती है पन्ना की कार की यात्रा। ये दोनों स्तर एक सीधी लाइन की तरह चलते हैं। फिर उन नम्बर प्लेटों से दिमाग़ में पैदा हुई भावनाएं, वो अपनी एक कहानी बनाती हैं। वो एक तरह सेतरंगों की तरह चलता है। मज़ेदार बात यह है कि उन तरंगों में भी एक छिपी हुई सरल रेखा चलती रहती है, जो कुछ पन्ना के साथ जो घटित होता है। उन्होंने दिव्या माथुर की कहानी को आधुनिक कहानी की एक अच्छी मिसाल बताया।
नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां के बारे में तेजेन्द्र शर्मा ने बताया कि यह कहानी किस्सागोई शैली की कहानी है जिसमें चरित्र के भीतर की यात्रा न दिखा कर लेखक सारा किस्सा ख़ुद अपने लफ़्जों में बयान करता है। नजमा की भाषा चुटीली थी और अदायगी प्रभावशाली।
उषा राजे सक्सेना, आनन्द कुमार, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीकी, सफ़िया सिद्दीकी, डा. हमीदा, को लगा कि कहानी में मज्जु मियां का चरित्र बहुत मज़ेदार है। कहानी की भाषा बहुत विट लिये है। ज़कीया ज़ुबैरी का कहना था कि पाकिस्तान से ब्रिटेन आये हर घर में मज्जु मियां जैसा एक न एक रिश्तेदार ज़रूर होता है।
वकील होने के नाते, हुमा प्राइस ने दोनों कहानियों को लीगल कोण से परखा। परिमल दयाल का कहना था कि पाठक को कहानी और अधिक प्रभावित कर सकती थी यदि मज्जु मियां के बारे में केवल बताया न जाता बल्कि उन्हें कुछ करते हुए दिखाया जाता। वहीं डा. अचला शर्मा को लगा कि कहानी जिस प्रभावशाली ढंग से शुरू हुई, उसे अंत तक निभाया नहीं जा सका। कहानी बहुत जल्दबाज़ी में ख़त्म कर दी गई। पाठक की प्यास बुझ नहीं पाई।
प्रो. अमीन मुग़ल ने नजमा उसमान की कहानी को और मज्जु मियां के चरित्र को मज़ेदार बताया और कहा कि नजमा जी ने अपने चरित्र के केवल एक पहलू को उजागर किया है। मज्जु मियां के चरित्र के दूसरे पहलू और अन्दरूनी भावनाओं का चित्रण नहीं किया गया। मगर कहानी मज़ेदार बन पाई है।
गोष्ठी में हिन्दी-उर्दू के रिश्तों, आधुनिक कहानी, प्रगतिशील कहानी आदि पर भी जम कर बहस हुई। अंत में तेजेन्द्र शर्मा ने नजमा उसमान एवं दिव्या माथुर को धन्यवाद देते हुए सभी मेहमानों की बारिश के मौसम में कथागोष्ठी में आने के लिये सराहना की।
मेहमानों ने जितना आनन्द कहानियों का उठाया उतना ही लुत्फ़ ज़कीया जी द्वारा सजाई गयी नाश्ते की मेज़ ने दिया। हिन्दी-उर्दु कहानी गोष्ठी के लिये त्यौहार के मौसम के अनुकूल मेज़ को क्रिसमिस के थीम से सजाया गया था। महमानों ने ज़कीया जी की मेज़बानी की खुले दिल से तारीफ़ की। कार्यक्रम के मेज़बान थे ज़कीया एवं सलीम ज़ुबैरी।

--सुरेन्द्र कुमार

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पाठक का कहना है :

संजीव सलिल का कहना है कि -

चंद बुद्धिजीवियों द्वारा यह कह देने से कि मजहब और दहशतगर्दी एक साथ नहीं रह सकते सचाई बदल नहीं जाती. यह सच है कि दोनों साथ हैं. यह भी सच है कि रचनाकार वक्तव्य देने के अलावा कुछ कर भी नहीं सकता. यहाँ तो कड़े शब्दों में भर्त्सना करने से भी परहेज है. क्यों? कहानी पर चर्चा में हिन्दयुग्म के पाठकों को मजा तब आता जब वे कहानी पढ़ पाते. एसे समाचारों के साथ मूल रचना भी रह सके तो बेहतर होगा. अपने-अपने देशों से दूर परदेश में समझदारी के साथ कुछ रचनात्मक काम करने के महत्त्व को कम नहीं आँका जा सकता. सभी को उनकी सक्रियता के लिए शुभकामनाएं.

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