Thursday, December 18, 2008

आनंदम की दिसम्बर गोष्ठी संपन्न



'आनंदम' संस्था संगीत व साहित्य की एक सुपरिचित संस्था है जो प्रतिमाह दूसरे रविवार को एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करती है.  दिनांक 14 दिसम्बर को 'आनंदम' के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पर इस माह की गोष्ठी का आयोजन हुआ. गोष्ठी में रविन्द्र शर्मा रवि, जगदीश रावतानी, नमिता राकेश, अनुराधा शर्मा, पराग अगरवाल , मनमोहन शर्मा 'तालिब', प्रेमचंद सहजवाला, साक्षात् भसीन, नागेन्द्र पाठक, फखरुद्दीन अशरफ, जीतेन्द्र प्रीतम आदि कवियों ने हिस्सा लिया. गोष्ठी की पहली ग़ज़ल युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने पढ़ी.  अनुराधा उर्दू शायरी  में एक नया परन्तु सशक्त नाम है, उनके दो शेर प्रस्तुत हैं:

सरेआम  शम्मा  से सवाल  मत  कर 
परवाने  का  जीना मुहाल  मत कर
आंखों  की मुंडेरों  से फिसलते  हुए कहे
माज़ी  का इतना  भी ख़याल  मत कर


पराग अगरवाल की इन पंक्तियों ने प्रभावित कर दिया:

आगाज़ हुआ हैं जबसे तामीर-ए-आशियाने का
तब से इन हवाओ को नाराज़ देख रहा हूँ
या देख रहे हो समंदर में गौर से 
मैं इसका मुसलसल रियाज़ देख रहा हूँ



सुपरिचित कवयित्री नमिता राकेश की कुछ पंक्तियों वातावरण को चटपटा बना दिया:

अपनी क्या तकदीर जनाब/ हवा में जैसे तीर जनाब/ कुछ गजलें कुछ गीत फकत/ है अपनी जागीर जनाब

पर इस पूरे माहौल पर प्रख्यात कवि  रविन्द्र शर्मा 'रवि' अपनी सशक्त गज़लों के साथ छा गए.  पिछले दशक में देश में एक ज़हरीला साम्प्रदायिक वातावरण पनपा. रविन्द्र शर्मा 'रवि' का यह शेर उन सभी सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक दो टूक सलाह है.

किसी भी कौम को बदनाम कर देना नहीं अच्छा,
यहाँ पर भी बुरे होंगे, वहां पर भी भले होंगे.


इसी ग़ज़ल के कुछ और नायाब शेर:

जो औरों के बनाए रास्तों पर ही चले होंगे
समंदर में नहीं वो लोग साहिल पर पले होंगे
ये माना रोशनी की है बहुत शोहरत ज़माने में 
मगर शातिर अंधेरे तो चरागों के तले होंगे.


'आनंदम' संस्थापक जगदीश रावतानी ने भी हिंदू-मुस्लिम विषय को अपने ढंग से उठाया:

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे 
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है.


प्रख्यात कवि बलदेव वंशी ने अंत में बेहद प्रेरणादायक कविताओं से वातावरण की गरिमा बढ़ा दी. अंत में जगदीश  रावतानी द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद् प्रस्ताव से गोष्ठी संपन्न हुई.

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2 पाठकों का कहना है :

तपन शर्मा का कहना है कि -

ये शे’र पसंद आया:
जो औरों के बनाए रास्तों पर ही चले होंगे
समंदर में नहीं वो लोग साहिल पर पले होंगे..

संजीव सलिल का कहना है कि -

जो कौमें चाहती हैं याद इज्ज़त से करी जायें.
उन्हें फिरकापरस्ती छोड़
सबको चाहना होगा.

नहीं बस एक मजहब सच्चा
और न बाकी हैं झूठे.
सभी को हक है जिंदा रहने का यह मानना होगा.

कोई मजहब बदलवाओ
नहीं अल्लाह कहता है.
सभी मजहब हैं सच्चे
सत्य यह पहचानना होगा.

कसम कश्मीर की हमको,
न भूलें कारगिल को हम.
वतन मजहब से पहले है,
ये सच स्वीकारना होगा.

'सलिल' इकतरफा भाई-चारे से
मसले न हल होते,
जो दहशत कर रहे पैदा
उन्हें बढ़ मारना होगा.

संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

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