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Thursday, June 30, 2011

इन्दु शर्मा कथा सम्मान समारोह एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान समारोह सम्पन्न हुए

(लंदन) - ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में हिन्दी लेखक विकास कुमार झा को उनके कथा उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ के लिये ‘सतरहवां अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने लेस्टर निवासी ब्रिटिश हिन्दी लेखिका श्रीमती नीना पॉल को बारहवां पद्मानंद साहित्य सम्मान भी प्रदान किया। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने सम्मान समारोह की मेज़बानी की।
उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी ने विकास कुमार झा एवं नीना पॉल को बधाई देते हुए कहा, “हिन्दी अब आहिस्ता- आहिस्ता विश्व भाषा का रूप ग्रहण कर रही है। बाज़ार को इस बात की ख़बर लग चुकी है कि यदि भारत में पांव जमाने हैं तो हिन्दी का ज्ञान ज़रूरी है। मुझे बताया गया है कि ब्रिटेन में निजी स्तर पर और संस्थागत स्तर पर हिन्दी के शिक्षण का काम चल रहा है और विदेशी भी बोलचाल की हिन्दी सीखने का प्रयास कर रहे हैं। यहां के विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई हो रही है। भारतीय उच्चायोग का प्रयास रहेगा कि हिन्दी स्कूली स्तर पर ब्रिटेन में अपनी वापसी दर्ज कर सके।”

(बाएं से तेजेन्द्र शर्मा, आसिफ़ इब्राहिम, लॉर्ड किंग, ज़किया ज़ुबैरी, विकास कुमार झा, महामहिम नलिन सूरी, विरेन्द्र शर्मा, नीना पॉल, मधु अरोड़ा।)

उन्होंने कथा यू.के. को 17वें सम्मान समारोह के लिये बधाई देते हुए कहा, “कथा यू.के. को यह सम्मान शुरू किये 17 वर्ष हो गये हैं। किसी भी सम्मान की प्रतिष्ठा में उसकी निरंतरता और पारदर्शिता महत्वपूर्ण होती है। इस कसौटी पर भी कथा यूके सम्मान खरे उतरते हैं। मैं तेजेन्द्र शर्मा और उनकी पूरी टीम को इस अवसर पर बधाई देना चाहूंगा और उन्हें यह आश्वासन देना चाहूंगा कि हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों के लिये उन्हें उच्चायोग का सहयोग हमेशा ही मिलता रहेगा। ”
सम्मान ग्रहण करते हुए विकास कुमार झा ने कहा, “एक कवि या लेखक आत्मा के कॉफ़ी हाउस का परिचारक ही होता है। आत्मा के अदृश्य कॉफ़ी हाउस का मैं एक अनुशासित वेटर (परिचारक) हूं और अगला आदेश लेने के लिये प्रतीक्षा में हूं। ” अपने उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “मैकलुस्कीगंज’’ मेरे लिये जागी आंखों का सपना है। मेरे लिये यह मेरे बचपन के दोस्त की तरह है जिसके संग नीम दोपहरियों में आम, अमरूद, जामुन के पेड़ों पर चढ़ने का सुखद रोमांच मैंने साझा किया है। ”
ब्रिटिश संसद के ऊपरी सदन के सदस्य लॉर्ड किंग का कहना था कि, “मैं इस कार्यक्रम को देख कर इतना अभिभूत हूं कि मुझे लगता है कि युवा पीढ़ी तक तो हमें हिन्दी ले जाना ही है, अब मेरी पीढ़ी के लोगों को भी हिन्दी पढ़ना और लिखना सीख लेना चाहिये।‘’ उन्होंने हिन्दी और पंजाबी भाषा को रोमन लिपि में लिखने पर चिंता जताई।
काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी ने विकास कुमार झा के उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हिन्दी में शोध करके लिखने की परम्परा विकसित नहीं हो पाई है। विकास कुमार झा ने गहरा शोध करने के बाद मैकलुस्कीेगंज को लिखा है। शायद यह उपन्यास इस परम्परा को स्थापित करने में सफल हो पाए। सन् 1911 में ब्रिटिश सरकार ने एंग्लो-इंडियन रेस को मान्यता दी थी और आज 2011 में यानि कि ठीक सौ साल बाद हम यहां ब्रिटिश संसद में भारत के एकमात्र एंग्लो-इंडियन गांव मैकलुस्कीगंज के जीवन पर आधारित उपन्यास को सम्मानित कर रहे हैं। ”
साउथहॉल से लेबर पार्टी के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने कहा कि “ब्रिटेन में कथा यू.के. द्वारा चलाई गई मुहिम से हिन्दी को ब्रिटेन में पांव जमाने में सहायता मिलेगी। जिस प्रकार ब्रिटेन में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य को यहां ब्रिटिश संसद में सम्मानित किया जाता है, उससे हमारे स्थानीय लेखकों का उत्साह बढ़ेगा और भारतीय पाठकों को ब्रिटेन में रचे जा रहे साहित्य को आंकने का अवसर मिलेगा।”
कथा यू.के. के महासचिव कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने मैकलुस्कीगंज एवं तलाश उपन्यासों की चयन प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि ब्रिटेन की युवा पीढ़ी को हिन्दी भाषा की ओर आकर्षित करने के लिये वे शैलेन्द्र और साहिर लुधियानवी जैसे फ़िल्मी साहित्यकारों पर बनाए गये अपने पॉवर पॉइन्ट प्रेज़ेन्टेशन को लेकर ब्रिटेन के भिन्न भिन्न शहरों में लेकर जाएंगे। उन्होंने चिन्ता जताई कि भारत में भी युवा पीढ़ी हिन्दी साहित्य से दूर होती दिखाई दे रही है।
कथा यू.के. के नव-निर्वाचित अध्यक्ष श्री कैलाश बुधवार ने कहा कि उन्हें ब्रिटेन में हिन्दी के भविष्य की इतनी चिंता नहीं जितनी कि भारत की युवा पीढ़ी को लेकर है। उनका मानना था कि यह सम्मान भाषा का सम्मान है। भाषा एक दीये की तरह है और कथा यूके यह दीया ब्रिटेन में जलाए हुए है। इस दीये की रौशनी ब्रिटेन की संसद के माध्यम से पूरी दुनियां में फैलेगी।
भारतीय उच्चायोग की श्रीमती पद्मजा ने कहा, “मैकलुस्कीगंज अद्भुत भाषा में लिखा एक ऐसा आंचलिक उपन्यास है जो कि वैश्विक उपन्यास की अनुभूति देता है। उपन्यास का मुख्य मुद्दा एंग्लो-इंडियन समाज का दर्द है, मगर उपन्यास उससे कहीं ऊंचा उठकर पूरे विश्व के दर्द को प्रस्तुत करता है। मैकलुस्कीगंज जन्म से एक उपन्यास है और कर्म से एक शोध ग्रन्थ। इस उपन्यास में झारखण्ड की जनजातियों के बारे में भी विस्तार से लिखा गया है। ”


नीना पॉल के उपन्यास तलाश पर अपना लेख पढ़ते हुए नॉटिंघम की कवियत्री जय वर्मा ने कहा कि, “तलाश के पात्रों में प्रेम जीवन का अहम् हिस्सा है। जीवन के संघर्ष को एक चुनौती समझ कर वे एक कदम आगे चलते हैं और दो कदम पीछे हटते प्रतीत होते हैं। ऐसा महसूस होता है कि हर पात्र को किसी न किसी की निरंतर तलाश है। प्यार को एक बंदिश न मानकर त्याग और क़ुर्बानी की झलक इनमें दिखायी पड़ती है। ”
नीना पॉल ने कथा यू.के. के निर्णायक मण्डल को धन्यवाद देते हुए कहा, “कि उपन्यास मेरे नज़रों में कल्पना, जज़्बात और भावनाओं का संगम है। कभी कभी लेखनी का दिल भी इतना भावुक हो उठता है कि लिखने को मजबूर कर देता है। शायद यही कारण है कि मेरी कहानियों को भावनापूर्ण कहा जाता है। बिना भावनाओं के क़लम चलती भी तो नहीं है। ”
नीना पॉल का मानपत्र मुंबई से पधारीं मधु अरोड़ा ने पढ़ा तो विकास कुमार झा का मानपत्र पढ़ा दीप्ति शर्मा ने। संचालन तेजेन्द्र शर्मा ने किया। इस अवसर पर विशेष रूप से प्रकाशित किये गये प्रवासी संसार के कहानी विशेषांक (अतिथि संपादक – तेजेन्द्र शर्मा) की प्रतियां संपादक राकेश पाण्डे ने मंचासीन प्रमुख अतिथियों की दीं।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त श्रीमती सूरी, श्री आसिफ़ इब्राहिम (मंत्री समन्वय), राकेश शर्मा (उप-सचिव हिन्दी), आनंद कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), गौरीशंकर (उप-निदेशक नेहरू सेन्टर), मॉस्को से लुडमिला खोखलोवा और बॉरिस ज़ाख़ारीन, भारत से परमानंद पांचाल, कृष्ण दत्त पालीवाल, केशरी नाथ त्रिपाठी, दाऊजी गुप्त, ओंकारेश्वर पाण्डेय, राकेश पाण्डेय (संपादक – प्रवासी संसार), गगन शर्मा, रूही सिंह, डा. फ़रीदा, डा. भारद्वाज, पूर्व पद्मानंद साहित्य सम्मान विजेता मोहन राणा, उषा राजे सक्सेना, दिव्या माथुर, काउंसलर के.सी. मोहन, श्याम नारायण पाण्डेय, शिखा वार्षणेय, अरुणा अजितसरिया, प्रो.अमीन मुग़ल, सरोज श्रीवास्तव, राकेश दुबे, पद्मेश गुप्त, इंदर स्याल एवं सोहन राही आदि ने भाग लिया।

Monday, June 27, 2011

आम आदमी की पीड़ा का कवि - शैलेन्द्र


(बाएं से मोनिका मोहता, विरेन्द्र शर्मा – एम.पी., कैलाश बुधवार, ज़किया ज़ुबैरी, आनंद कुमार तेजेन्द्र शर्मा।)
(लंदन – 18 जून, 2011), शैलेन्द्र एक नई दुनिया का सपना देखते हैं। उन्हें अपने वर्तमान से शिकायतें ज़रूर हैं मगर अंग्रेज़ी के कवि शैली की तरह वे भी सोचते हैं कि इक नया ज़माना ज़रूर आएगा। फ़िल्म बूट पॉलिश में शैलेन्द्र लिखते हैं “आने वाली दुनियां में सबके सर पर ताज होगा / ना भूखों की भीड़ होगी ना दुःखों का राज होगा / बदलेगा ज़माना ये सितारों पे लिखा है।”और यह सब वे बच्चों के मुंह से कहलवाते हैं - बूट पॉलिश करके पेट पालने वाले बच्चे जिन्हें “भीख में जो मोती मिले, वो भी हम ना लेंगे / ज़िन्दगी के आंसुओं की माला पहनेंगे।” यह कहना था प्रसिद्ध कथाकार एवं कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा का। वे नेहरू सेंटर, लंदन, एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम आम आदमी की पीड़ा का कवि - शैलेन्द्र में अपनी बात कह रहे थे।


अपनी बात कहते तेजेन्द्र शर्मा

तेजेन्द्र शर्मा का मानना है कि शैलेन्द्र क्योंकि एक प्रगतिशील कवि थे, उन्होंने फ़िल्मों में भी अपनी भावनाओं को फ़िल्मों के चरित्रों, परिस्थितियों, और अपने गीतों के माध्यम से प्रेषित किया। वे इस मामले में भाग्यशाली भी थे कि उन्हें राज कपूर, शंकर जयकिशन, हसरत जयपुरी, ख़्वाजा अहमद अब्बास और मुकेश जैसी टीम मिली। अब्बास की कहानी और थीम, राज कपूर का निर्देशन और अभिनय और शंकर जयकिशन के संगीत के माध्यम से शैलेन्द्र गंभीर से गंभीर मसले पर भी सरल शब्दों में गहरी बात कह जाते थे।
जिस देश में गंगा बहती है फ़िल्म के एक गीत में शैलेन्द्र गीतकार की परिभाषा देते हैं, “काम नये नित गीत बनाना / गीत बना के जहां को सुनाना / कोई ना मिले तो अकेले में गाना।” तो वहीं पतिता में यह भी बता देते हैं कि “हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं / जब हद से गुज़र जाती है ख़ुशी, आंसू भी निकलते आते हैं।”
तेजेन्द्र ने बात को आगे बढ़ाते हुए बताया कि कथाकार भीष्म साहनी का मानना था कि शैलेन्द्र के हिन्दी फ़िल्मों के जुड़ने से फ़िल्मी गीत समृद्ध होंगे और उनमें साहित्य का पुट जुड़ जाएगा। वहीं गुलज़ार का कहना है, “बिना शक़ शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का आज तक का सबसे बड़ा लिरिसिस्ट कहा जा सकता है। उनके गीतों को खुरच कर देखें तो आपको सतह के नीचे दबे नए अर्थ प्राप्त होंगे. उनके एक ही गीत में न जाने कितने गहरे अर्थ छिपे होते हैं।”
शैलेन्द्र को मिले सम्मानों के बारे में तेजेन्द्र शर्मा ने कहा, “हालांकि शैलेन्द्र ने अपना बेहतरीन काम आर.के. प्रोडक्शन्स के लिये किया, मगर उन्हें कभी उन गीतों के लिये सम्मान नहीं मिला। उन्हें तीन फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिले यह मेरा दीवानापन है (यहूदी), सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी (अनाड़ी), मैं गाऊं तुम सो जाओ (ब्रह्मचारी)। उनका कहना था कि इससे ज़ाहिर होता है कि उस ज़माने में गीत लेखकों की गुणवत्ता कितनी ऊंचे स्तर की रही होगी। शायद उसे भारतीय फ़िल्मी गीत लेखन का सुनहरा युग कहा जा सकता है जब शैलेन्द्र, साहिर, शकील, कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेन्द्र कृष्ण, जांनिसार अख़्तर, राजा मेंहदी अली ख़ान, भरत व्यास, नरेन्द्र शर्मा, पण्डित प्रदीप, और हसरत जयपुरी जैसे लोग हिन्दी फ़िल्मों के लिये गीत लिख रहे थे। उस समय की प्रतिस्पर्धा सकारात्मक थी, जलन से भरपूर नहीं। हर गीतकार दूसरे से बेहतर लिखने का प्रयास करता था।
तेजेन्द्र शर्मा के अनुसार शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन और राज कपूर की महानतम उपलब्धि श्री 420 है। इसके गीतों की विविधता और आम आदमी के दर्द की समझ शैलेन्द्र के बोलों के माध्यम से हमारी शिराओं में दौड़ने लगती है। “छोटे से घर में ग़रीब का बेटा / मैं भी हूं मां के नसीब का बेटा / रंजो ग़म बचपन के साथी / आंधियों में जले दीपक बाती / भूख ने है बड़े प्यार से पाला।” इस फ़िल्म में मुड़ मुड़ के ना देख, प्यार हुआ इक़रार हुआ, मेरा जूता है जापानी जैसे गीत एक अनूठी उपलब्धि हैं।
बचपन में ही अपनी मां को एक हादसे में खो चुके शैलेन्द्र पूरी तरह से नास्तिक थे। मगर फ़िल्मों के लिये वे “भय भंजना वन्दना सुन हमारी” (बसन्त बहार), “ना मैं धन चाहूं, ना रतन चाहूं” (काला बाज़ार), “कहां जा रहा है तू ऐ जाने वाले” (सीमा), जागो मोहन प्यारे (जागते रहो) जैसे भजन भी लिख सकते थे। उनका लिखा हुआ राखी का गीत आज भी हर रक्षाबंधन पर सुनाई देता है, “भैया मेरे, राखी के बंधन को निभाना।”
शैलेन्द्र ने अपना अधिकतर काम शंकर जयकिशन के लिये किया। मगर सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी, रौशन और सी. रामचन्द्र के लिये भी गीत लिखे। शैलेन्द्र के लेखन में वर्तमान जीवन के प्रति आक्रोश अवश्य है मगर मायूसी नहीं। विद्रोह है, क्रांति है, हालात को समझने की कूवत है मगर निराशा नहीं है – वे कहते हैं तूं ज़िन्दा है तू ज़िन्दगी की जीत पे यक़ीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर ।
अपने एक घन्टे तीस मिनट लम्बे पॉवर पॉइण्ट प्रेज़ेन्टेशन में तेजेन्द्र शर्मा ने जिस देश में गंगा बहती है, अनाड़ी, पतिता, संगम, श्री 420, जंगली, बूट पॉलिश, गाईड, काला बाज़ार, छोटी बहन, जागते रहो, छोटी छोटी बातें, आदि फ़िल्मों के गीत स्क्रीन पर दिखाए।
कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यूके के फ़ाउण्डर ट्रस्टी सिने स्टार नवीन निश्चल को श्रद्धांजलि दी गई। नवीन निश्चल का हाल ही में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। उनकी फ़िल्म बुड्ढा मिल गया का गीत “रात कली इक ख़्वाब में आई.. ” उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप दिखाया गया। मंच पर श्री कैलाश बुधवार का कथा यू.के. के नये अध्यक्ष के रूप में स्वागत किया गया। धन्यवाद ज्ञापन नेहरू सेंटर की निदेशिका मोनिका मोहता ने दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विरेन्द्र शर्मा एवं काउंसलर ज़किया ज़ुबैरी के अतिरिक्त श्री आनंद कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), श्री जितेन्द्र कुमार (भारतीय उच्चायोग), गौरी शंकर (उप-निदेशक, नेहरू सेंटर), कैलाश बुधवार, उषा राजे सक्सेना, के.बी.एल. सक्सेना, असमा सूत्तरवाला, रुकैया गोकल, अब्बास गोकल, वेद मोहला, अरुणा अजितसरिया, उर्मिला भारद्वाज, आलमआरा, निखिल गौर, दीप्ति शर्मा आदि शामिल थे।

Saturday, April 16, 2011

इस वर्ष का इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान घोषित

कथा (यू. के.) के महा-सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2011 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान पत्रकार कथाकार श्री विकास कुमार झा को उनके (राजकमल प्रकाशन से 2010) में प्रकाशित उपन्यास मैकलुस्कीगंज पर देने का निर्णय लिया गया है। यह उपन्यास दुनियां के एक अकेले एंगलो-इंडियन ग्राम की महागाथा है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने-जाने का हवाई यात्रा का टिकट एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री विकास कुमार झा को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 27 जून 2011 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा। सम्माुन समारोह में भारत और विदेशों में रचे जा रहे साहित्या पर गंभीर चिंतन भी किया जायेगा।
इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा, भगवान दास मोरवाल एवं हृषिकेश सुलभ को प्रदान किया जा चुका है।

7 अक्टूबर 1963 को जन्मे विकास कुमार झा ने सोशियॉलोजी में एम.ए. की डिग्री हासिल की है। वे रविवार, आउटलुक, एवं माया जैसी पत्रिकाओं के संपादन विभाग से जुड़े रहे। आजकल वे राष्ट्रीय प्रसंग पत्रिका के संपादक के रूप में कार्यरत हैं। वे हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखते रहे हैं। सम्मानित उपन्यास के अतिरिक्त उनका कविता संग्रह इस बारिश में, उपन्यास भोग, निबन्ध संग्रह – परिचय पत्र एवं स्वतंत्र भारत का राजनीतिक इतिहास – सत्ता के सूत्रधार प्रकाशित हो चुके हैं। वे टेलिविज़न पर ऐंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं।

इस कार्यक्रम के दौरान भारत एवं विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के बीच के रिश्तों पर गंभीर चर्चा होगी।
वर्ष 2011 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान इस बार लेस्टर निवासी कथाकार एवं ग़ज़लकार नीना पॉल को उनके उपन्यास तलाश (अयन प्रकाशन) के लिये दिया जा रहा है। अम्बाला (भारत) में जन्मी नीना पॉल ने एम.ए., बी.एड. की डिग्रियों के अतिरिक्त संगीत की भी बाक़ायदा शिक्षा ली है। सम्मानित उपन्यास के अतिरिक्त उनके पांच ग़ज़ल संग्रह कसक, नयामत, अंजुमन, चश्म-ए-ख़्वादीदा, मुलाक़ातों का सफ़र और एक उपन्यास रिहाई प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी ग़ज़लों का एक ऑडियो सी.डी. कसक के नाम से भी जारी हो चुका है।
इससे पूर्व ब्रिटेन के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, दिव्या माथुर, नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा. अचला शर्मा, उषा राजे सक्से्ना, गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव, उषा वर्मा, मोहन राणा, महेन्द्र दवेसर एवं कादम्बरी मेहरा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया।

Wednesday, October 6, 2010

लंदन की एक शाम तीन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के नाम


बाएँ से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डॉ. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवयित्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने 3 अक्टूबर 2005 (यानी कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डॉ. केसरी नाथ त्रिपाठी, डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।


निखिल के साथ कैलाश जी

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

-दीप्ति शर्मा

Friday, August 27, 2010

शिक्षाविद् वेद मोहला (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों का लंदन में लोकार्पण


(बाएं से बैठे हुएः श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला (एम.बी.ई.), डा. अरुणा अजितसरिया (एम.बी.ई.)। खड़े हुए – उषा राजे सक्सेना, तेजेन्द्र शर्मा, माइकल वार्ड एवं आनंद कुमार)

कथा यू.के. एवं एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स ने 23 अगस्त 2010 की शाम 6:30 बजे वरिष्ठ शिक्षाविद् वेद मित्र मोहला, (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों आई जी सी एस ई हिन्दी एवं इक्कीसवीं सदी का बाल साहित्य का लोकार्पण समारोह लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित किया। पुस्तकों का लोकार्पण श्री कैलाश बुधवार (भूतपूर्व अध्यक्ष बीबीसी हिन्दी विभाग) एवं ब्रिटेन में हिन्दी परीक्षक डा. अरुणा अजितसरिया के हाथों सम्पन्न हुआ।
यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा श्रीमती उषा राजे सक्सेना ने वेद जी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से श्रोताओं का परिचय करवाया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार तीस वर्षों से भी अधिक समय से वेद जी अपना समय और पैसा ख़र्च करके ब्रिटेन के बच्चों को हिन्दी पढ़ा रहे हैं। उन्होंने मोहला जी की प्रकाशित कृतियों एवं उनको मिले अलग अलग सम्मानों की भी चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए कथाकार तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव, कथा यूके) ने कहा कि एक सिविल इंजीनियर की तरह कैलाश जी ने ब्रिटेन में हिन्दी भाषा सिखाने की नींव रखी है। पैंतीस साल से बिना किसी लाभ की आशा के हिन्दी के भवन को सुदृढ़ बना रहे हैं और साथ ही साथ भारत और ब्रिटेन के बीच एक भाषाई पुल का निर्माण भी कर रहे हैं।



श्री कैलाश बुधवार ने वेद मोहला जी को एक ऐसा मातृभाषा प्रेमी बताया जिसने विदेशी कंक्रीट के जंगल में एकलव्य की तरह हिन्दी की अराधना की है और एक सिविल इन्जीनियर होने के कारण हिन्दी पढ़ाने वाले पंडितनुमा अंगोछे वाली छवि को बदला।
श्रीमती अरुणा अजितसरिया के अनुसार इस पुस्तक में आई जी सी एस ई के पाठ्यक्रम के साथ- साथ मारिशस एवं सिंगापुर के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में निर्धारित 'अनुवाद' तथा 'शब्दों के समुचित प्रयोग' के पाठ भी सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक के अंतिम भाग में हिंदी का लघु शब्‍दकोष, जिसमें लगभग 2400 शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी होगा। इसके अतिरिक्त प्रश्नपत्रों का नियोजन परीक्षा के लिए अपेक्षित जानकारी की तैयारी करने में सहायक होगा। इस प्रकार से इस एक पुस्तक में उन्हें परीक्षा की तैयारी करने की समस्त सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। अपने प्रस्तुत रूप में यह पुस्तक अहिंदी- भाषी विद्यार्थियों को हिंदी सीखने में सहायक होगी।
दि फ़ार पैवेलियन (वेस्टेण्ड नाटक) के लेखक, निर्माता एवं निर्देशक माइकल वार्ड ने अपने हिन्दी प्रेम के बारे में साफ़ हिन्दी में बोलते हुए कहा, "मैं एक लेखक और प्रोड्यूसर हूं और मुझे इतनी ख़ुशी है कि मुझे भारतीय फ़िल्मकारों की अगली पीढ़ी के साथ काम करने को मिल रहा है। ये नये फ़िल्म निर्माता युवा पीढ़ी के हैं, उनमें टेलेण्ट है और ये ज़्यादा से ज़्यादा अपना समय फ़िल्म निर्माण एवं कहानी दिखाने एवं स्क्रीनप्ले की कला को समझने में मेहनत लगा रहे हैं।"


(बाएं से श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला एमबीई, श्रीमती मोहला, डा. अरुणा अजितसरिया, एमबीई)।

श्री कैलाश बुधवार द्वारा लिये गये साक्षात्कार के दौरान वेद मोहला जी ने कहा, "मैं 1979 में एक सामाजिक कार्यक्रम में सपरिवार गया। मेरे पांच वर्षीय पुत्र ने एक महिला रेणुका बहादुर के पूछने पर बताया कि वह हिन्दी बोल तो सकता है, परन्तु लिख-पढ़ नहीं सकता। उन्होंने आगे पूछा कि क्या लिखना-पढ़ना भी चाहोगे, तो बच्चे ने उत्साहपूर्वक कहा: 'हां, अवश्य, यदि मेरे पिताजी आज्ञा दें।' आज्ञा लेने जब रेणुका बहादुर मेरे पास आईं, तो न जाने क्यों मेरे मुंह से निकल गया, "हिन्दी सिखाने के लिए इसे साथ लाना तो क्या, मैं स्वयं भी पढ़ाने के लिए आ सकता हूं।" उस वाक्य ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल डाली। न केवल तब हिन्दी विद्यालय की नींव पड़ी, बल्कि तब से जीवन का प्रत्येक रविवार हिन्दी अध्यापन के लिए समर्पित हो गया और मैं एक अध्यापक बन गया। "
वेद मोहला जी के दो विद्यार्थियों ने चिल्ड्रन्स लिटरेचर इन दि टवैण्टी फ़र्स्ट सेंचुरी पुस्तक के अंशपाठ किये।

कार्यक्रम में वेद मोहला जी के छात्र एवं चाहने वालों के साथ साथ भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, डा. श्याम मनोहर पांडेय, डा. गौतम सचदेव, सोहन राही, दिव्या माथुर, डा. पद्मेश गुप्त, इंदर स्याल, के.बी.एल. सक्सेना, मंजी पटेल वेखारिया, गुरप्रीत कौर, यादव चन्द्र शर्मा आदि उपस्थित थे।

Sunday, July 25, 2010

हिंदी और उर्दू और नज़दीक आयीं


(बाएं से मोनिका मोहता, हरि भटनागर, ज़कीया ज़ुबैरी, आसिफ़ इब्राहिम, तेजन्द्र शर्मा)

२१ जुलाई २०१० । लंदन
“ये बहुत सुकून देने वाली बात है कि कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स मिल कर यहां यूके में हिंदी और उर्दू के बीच भाषाई पुल बनाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं लेकिन हमें इस बात को भी देखना होगा कि हमारा आज का पाठक इन कहानियों की विषय-वस्‍तु कथानक और लोकेल से जुड़ सके और कहानियों से जुड़ाव महसूस कर सके।” उक्‍त विचार कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स द्वारा प्रकाशित ब्रिटेन की उर्दू क़लम का नेहरू सेटर, लंदन में 21 जुलाई 2010 की शाम लोकार्पण करते हुए हुए भारतीय उच्‍चायोग में मंत्री (समन्‍वय) श्री आसिफ़ इब्राहिम ने व्‍यक्‍त किये।

हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा एवं ज़कीया ज़ुबैरी द्वारा संपादित ब्रिटेन की उर्दू क़लम में ब्रिटेन में बसे 8 उर्दू कहानीकारों की 16 कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक की लम्बी भूमिका कथाकार-पत्रकार एवं कथा यूके की उपाध्यक्षा अचला शर्मा ने लिखी है। इस मौक़े पर प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल ने अपनी बात कहते हुए कहा कि बेशक नेचर के हिसाब से हिंदी और उर्दू बहुत नज़दीकी भाषाएं हैं और दोनों भाषाओं के बीच आदान प्रदान की लम्‍बी परम्‍परा है, कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स की इस बात के लिए तारीफ़ की जानी चाहिये कि वे अपने सीमित साधनों से इतने महत्‍वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे हैं।
इस अवसर पर भारत से विशेष रूप से पधारे कहानीकार-संपादक-प्रकाशक हरि भटनागर ने अपने लम्बे लिखित लेख द्वारा श्रोताओं का परिचय कहानियों से करवाया। उनके अनुसार संकलन की कहानियां ग़म की कथा को रो पीट कर, चिल्ला चोट कर के नहीं बल्कि बहुत ही ख़ामोश ढंग से व्यक्त करती हैं। कि कथा का कलात्मक वैभव कहीं भी क्षतिग्रस्त नहीं होता और सबसे बड़ी बात यह कि उस निज़ाम का चेहरा बेनक़ाब होता है जो भेदभाव की राजनीति कर के लोगों में फूट डालता है और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।
कथा यूके के महासचिव, कथाकार ओर किताब के संपादक द्वय में से एक तेजेन्‍द्र शर्मा का कहना था कि हमें पहले समस्या को स्वीकार करना होगा। अब समय आ गया है कि हम मान लें कि हिन्दी और उर्दू दो भाषाएं हैं और हमें उनके बीच की दूरी को पाटना है। उन्होंने इस किताब और इस तरह की दूसरी किताबें प्रकाशित किये जाने की ज़रूरत की बात कही और बताया कि उनकी कोशिश रहेगी कि कहानी के अलावा, कविता, ग़ज़ल और इतर साहित्‍य का भी दोनों भाषाओं में अनुवाद कराते रहें।
नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता ने इस अवसर पर नेहरू सेंटर और कथा यूके के लम्‍बे समय चले आ रहे सार्थक रिश्‍तों की बात कही और उम्‍मीद की कि ये सिलसिला आगे भी चलता रहेग।
भारत से पधारे पत्रकार अजित राय ने कहा कि इस पुस्तक का प्रकाशित होना एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि पहली बार ब्रिटेन के आठ उर्दू लेखकों की कहानियां हिन्दी में एक साथ छपी हैं। हिन्दी और उर्दू एक भाषा नहीं हैं। हम आज़ादी के बाद से ही इनके एक होने का भ्रम पाले रहे और दूरियां बढ़ती गईं।
एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स की अध्‍यक्ष ज़कीया जुबैरी ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार मानते हुए कहा मेरा सपना है कि हिन्दी और उर्दू की गंगा जमुनी तहज़ीब, शब्दों की मिठास, अपनापन, ख़ुलूस सब हमारे साहित्य और ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाएं। हमारे रिश्ते राजनीति से संचालित न हों। हमारे रिश्ते साहित्य, कला और एक दूसरे पर विश्वास से पैदा हों। यह न तो पहला प्रयास है और न ही आख़री । हम इस मुहिम को जारी रखेंगे। हिन्दी उर्दू कहानियों की निशस्तें रखी जाएंगी, और अगला संकलन शायद उन कहानियों का हो जो कि उन नशिस्तों में पढ़ी जाएं।
इसी अवसर पर कथाकार सूरज प्रकाश (भारतीय प्रतिनिधि कथा यूके) की नवीनतम कृति दाढ़ी में तिनका का अनूठा विमोचन भी हुआ जब एक युवा पाठिका हेमा कंसारा ने मंच पर आकर उनकी कृति का लोकार्पण किया। सूरज प्रकाश ने अपने लम्बे लेखकीय सन्नाटे के बारे में बात करते हुए लेखक की न लिख पाने की छटपटाहट का विस्तार से ज़िक्र किया। सूरज प्रकाश पिछले बारह वर्षों से कथा यूके से जुड़े हैं।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त उर्दू कहानीकार जितेन्द्र बिल्लु, सफ़िया सिद्दीक़ि, मोहसिना जीलानी, बानो अरशद एवं फ़हीम अख़्तर, फ़िल्मकार यावर अब्बास, भूतपूर्व बीबीसी हिन्दी अध्यक्ष कैलाश बुधवार, हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, कादम्बरी मेहरा एवं महेन्द्र दवेसर, कवि निखिल कौशिक, शिक्षाविद वेद मोहला, नाटककार इस्माइल चुनारा, अयूब औलिया, हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार, भारत से आए फ़िल्म आलोचक विनोद भारद्वाज, लदंन और आसपास के शहरों के हिंदी और उर्दू के रचनाकार बड़ी संख्‍या में मौजूद थे।

- कथा यूके प्रतिनिधि

Tuesday, April 20, 2010

हृषिकेश सुलभ को मिलेगा साल 2010 का कथा (यूके) सम्मान

इस साल के इंदु शर्मा कथा सम्मान और पद्मानंद साहित्य सम्मान की घोषणा

कथा (यू के) के महा सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2010 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कहानीकार और रंगकर्मी हृषीकेश सुलभ को राजकमल प्रकाशन से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह वसंत के हत्यारे पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने-जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री हृषीकेश सुलभ को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 08 जुलाई 2010 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा। सम्‍मान समारोह में भारत और विदेशों में रचे जा रहे साहित्‍य पर गंभीर चिंतन भी किया जायेगा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा और भगवान दास मोरवाल को प्रदान किया जा चुका है।

15 फ़रवरी 1955 को बिहार के छपरा में जनमे कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ की विगत तीन दशकों से कथा-लेखन, नाट्‌य-लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ सांस्कृतिक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। आपके तीन कहानी संग्रह बँधा है काल, वधस्थल से छलाँग और पत्थरकट - एक जिल्द में तूती की आवाज़ के नाम से प्रकाशित।

आपको अब तक कथा लेखन के लिए बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, नाट्‌यलेखन और नाट्‌यालोचना के लिए डा. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, और रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान मिल चुके हैं।

इस कार्यक्रम के दौरान भारत एवं विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के बीच के रिश्तों पर गंभीर चर्चा होगी।

वर्ष 2010 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान इस बार संयुक्‍त रूप से श्री महेन्‍द्र दवेसर दीपक को मेधा बुक्‍स, दिल्‍ली से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह अपनी अपनी आग के लिए और श्रीमती कादम्‍बरी मेहरा को सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह पथ के फूल के लिए दिया जा रहा है। दिल्‍ली में 1929 में जन्‍मे श्री महेन्‍द्र दवेसर ‘दीपक’ के इससे पहले दो कहानी संग्रह पहले कहा होता और बुझे दीये की आरती प्रकाशित हो चुके हैं। दिल्ली में ही जन्‍मी श्रीमती कादम्‍बरी मेहरा अंग्रेज़ी में एम.ए. हैं और उन्‍हें वेबज़ीन एक्सेलनेट द्वारा साहित्य सम्मान मिल चुका है। इससे पहले उनका एक कहानी संग्रह कुछ जग की प्रकाशित हो चुका है।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना,गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव, उषा वर्मा और मोहन राणा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।


सूरज प्रकाश

Wednesday, September 30, 2009

अनुराधा ऋषि के व्यक्तित्व की सकारात्मकता उनकी चित्रकारी में भी मौजूद है- ज़कीया ज़ुबैरी


वक्तव्य देतीं काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

30 सितम्बर 2009 । लंदन

“मुझे इस बात का गर्व है कि अनुराधा ऋषि ने अपनी पेंटिंग्ज़ की आज की प्रदर्शनी को नाम दिया है प्रकृति में शांति और इसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित किया है। आभार मैं नेहरू सेंटर और मोनिका जी का भी मानती हूं कि उन्होंन मुझे आज की शाम यहां शामिल होने के लिये बुलाया। अनुराधा के लिये प्रकृति एक सुकूनदेह ताक़त है। वह अपनी चित्रकारी में नीले और हरे रंग का इस्तेमाल करती हैं जो कि ठण्डे रंग हैं। साथ ही वे पीले रंग से जो ओवरटोन भर कर उसमें एक तेज पैदा करती हैं वह क़ाबिले तारीफ़ है। अनुराधा मृत्यु में भी जीवन खोज लेती हैं। उनके ठूंठ वृक्ष भी मृत्यु की तरह डराते नहीं बल्कि नृत्य करते दिखाई देते हैं। अनुराधा के व्यक्तित्व की जीवंतता उनकी सभी पेंटिंग्ज़ में बख़ूबी दिखाई देती है।” यह कहना था कॉलिंडेल क्षेत्र की लेबर पार्टी काउंसलर श्रीमती ज़कीया ज़ुबैरी का। वह लंदन के नेहरू सेंटर में आयोजित शाम की प्रमुख अतिथि थीं। इस प्रदर्शनी को शीर्षक दिया गया है ‘नेचर इन पीस - ए ट्रिब्यूट टु महात्मा ’ जो कि 2 अक्टूबर तक जारी रहेगी।


दीप प्रज्वलित करतीं नेहरू केन्द्र की निदेशक मोनिका मोहता

नेहरू केन्द्र की निदेशक मोनिका मोहता ने चित्रकार अनुराधा ऋषि, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव - कथा यूके), एवं श्री के.बी. एल सक्सेना को पारंपरिक दीप प्रज्वल्लन के लिये आमंत्रित किया। उन्होंने अनुराधा जी का परिचय देते हुए कहा, इस प्रदर्शनी में चित्रकार ने अपनी हाल ही में बनाई 25 पेंटिंग्ज़ प्रदर्शित की हैं जो कि सभी एक्रिलिक में बनाई गई हैं और जिन सभी के केन्द्र में प्रकृति है। यह पेंटिंग्ज़ जम्मु एवं कश्मीर के ख़ूबसूरत एवं सुखद माहौल का चित्रण करती हैं। अनुराधा जी ने यह प्रदर्शनी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित की है।

तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव कथा यूके) ने प्रदर्शनी पर टिप्पणी करते हुए कहा, “अनुराधा ऋषि की पेंटिंग्ज़ में प्रकृति मां की गोद की सी गर्माहट का अहसास देती है। यह प्रकृति शांत और सुखदाई है। यहां प्रकृति का रौद्र तांडव देखने को नहीं मिलता। मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है। मनुष्य द्वारा निर्मित प्रत्येक वस्तु प्रकृति को नुक़्सान पहुंचाती है। प्रकृति सृजन करती है और मनुष्य विनाश। महात्मा गान्धी को भी मनुष्य द्वारा निर्मित हथियार ने ही मार गिराया था। अनुराधा ने अपनी पेंटिंग्ज़ में प्रकृति की भव्यता न दिखा कर उनमें एक अपनेपन की उष्मा भर दी है।”


दर्शकगण

अपने संक्षिप्त धन्यवाद ज्ञापन में अनुराधा ऋषि ने अपने पति ऋषि, आई.सी.सी.आर, नेहरू केन्द्र, मोनिका मोहता, ज़कीया ज़ुबैरी, और तमाम उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होंने कि इस प्रदर्शनी के आयोजन में उनकी सहायता की।
अनुराधा ऋषि पंडित संसार चंद बाड़ू की पुत्री हैं जो कि जम्मु के डोगरा कला संग्रहालय के संस्थापक थे। वे पहाड़ी चित्रकला के महान चित्रकार थे। संयोगवश उनका जन्मदिन भी महात्मा गांधी ही की तरह 2 अक्टूबर को होता है।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर लाशारी, जे.एस मल्होत्रा (एन.आर.आई. वर्ल्ड मीडिया नेटवर्क), आर.एस मोखा (उपाध्यक्ष - एस.ई.सी.ए.), मधुप मोहता, दिव्या माथुर, एच.एस. राव (पी.टी.आई), अयूब ऑलिया (अल्ला रख्खा फ़ाउण्डेशन), एवं शाज़िया शामिल थे।

रिपोर्ट- दीप्ति कुमार

Tuesday, September 8, 2009

"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. राजनीतिक नाटक नहीं है” – असग़र वजाहत



लंदन।
"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. नाटक…. राजनीतिक नाटक नहीं है। हां यह संभव है कि विभाजन की पृष्ठभूमि होने के कारण राजनीति की अण्डरटोन सुनाई दे जाती हों। किन्तु कहीं भी राजनीति इस नाटक का मुख्य स्वर नहीं है।" यह कहना था हिन्दी के प्रख्यात नाटक लेखक डा. असग़र वजाहत का जब वे कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित नाटक की बीसवीं वर्षगांठ पर लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे।

डा. वजाहत ने आगे कहा कि “यह नाटक दिखाता है कि आम आदमी, जिसका प्रतिनिधित्व नासिर काज़मी, मौलवी साहब या मिर्ज़ा साहब करते हैं, ठीक ठाक और अच्छा भला है। समस्या है राजनीतिज्ञों की या फिर उस तबके की जो कि साम्प्रदायिक्ता को अपना मज़हब मानती है। बुरे लोग कम हैं मगर शक्तिशाली हैं।“ इस नाटक का आयोजन अमरीका, आस्ट्रेलिया और भारत के बहुत से शहरों में किया जा रहा है।

मुख्य अतिथि श्री विरेन्द्र शर्मा (एम.पी.) ने कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स को धन्यवाद दिया कि उन जैसे राजनीतिज्ञ को इतने महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा दिया। उन्होंने असग़र वजाहत को बधाई देते हुए कहा कि यह नाटक भाईचारे, आपसी प्यार, धार्मिक सहनशीलता का संदेश देता है। आम आदमी सांप्रदायिक नहीं होता। छोटे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू मुस्लिम मिलजुल कर रहते हैं। हिन्दू वो नहीं जो मस्जिद तोड़े और न ही वो मुसलमान है जो मंदिर तोड़े। विरेन्द्र शर्मा ने नाटक के वीडियो क्लिप एवं पाठ की बहुत सराहना की।

नाटक के इतिहास को समेटने वाली पुस्तक - २ डिकेड्स ऑफ़ ए प्ले (वाणी प्रकाशान) का लोकार्पण करते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, "असग़र वजाहत ने जिस लाहौर नहीं वेख्या .... को सिर्फ़ मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि दोनों समुदायों की सोच को समझने का प्रयास किया है। नाटक हमें यह बताता है की दोनों समुदायों के बीच ऐसा क्या हुआ जिस से सास्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास, भाईचारा सब ख़तम हो गए थे। लेखक ने यह दिखाया है की समाज विरोधी तत्व किस तरह से मज़हब का फायदा उठाते हैं। पात्रों का चित्रण तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृति की मानवीय स्तर पर तुलना बहुत संवेदनशील है।"


बाएं से (बैठे हुए) – अचला शर्मा, असग़र वजाहत, विरेन्द्र शर्मा, ज़कीया ज़ुबैरी, रवि शर्मा। खड़े हुएः अजित राय, के.सी. मोहन, शमील चौहान, बदी-उ-ज़मां, तेजेन्द्र शर्मा। चित्रः दीप्ति कुमार।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए इसे मंच के लिये त्रासदी बताया कि मूल हिन्दी नाटकों की हमेशा से कमी महसूस की गई है। ऐसे में किसी हिन्दी नाटक के बीस वर्षों में भिन्न भारतीय भाषाओं में बारह सौ से भी अधिक शो होना नाटक की महानता का जीता जागता सबूत है। असग़र वजाहत ने इस नाटक में केवल विभाजन की त्रासदी का चित्रण ही नहीं किया है। उन्होंने इस समस्या को आर्थिक, सामाजिक एवं साम्प्रदायिकता के स्तर पर प्रस्तुत किया है। एक लेखक के तौर पर जिस लाहौर नहीं वेख्या... असग़र वजाहत के साहित्यि की सर्वोच्च उपलब्धि है। भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत नमूना।

नाटक पर गंभीर चर्चा करते हुए प्रोफ़ेसर मुग़ल अमीन ने कहा, “जिस लाहौर नहीं वेख्या.... की सादग़ी के पीछे यह सबक़ छिपा हुआ है कि सरवाइवल की जिस जंग में इन्सान पैदा होता है, उसका तकाज़ा है कि ख़ुद ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी है कि दूसरों को ज़िन्दा रखा जाए। ये सबक़ मेरा भी और तेरा भी।"

अचला शर्मा ने नाटक के एक दृश्य को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। नाटक के इस ड्रामाई पाठ में रवि शर्मा (पहलवान), बदी-उ-ज़मां (अलीम) एवं तेजेन्द्र शर्मा (नासिर काज़मी) ने भाग लिया। अचला शर्मा का कहना था, "किसी रचना या किसी पुस्तक का सही मूल्यांकन शायद दस-बीस बरस बाद ही किया जा सकता है क्योंकि कालजयी रचना की पहचान समय, संदर्भ और परिस्थियाँ बदल जाने के बाद ही होती है। असग़र वजाहत का नाटक- जिस लाहौर नइ देख्या- की प्रासिंकगता मेरी नज़र में, मज़हब को लेकर फैली भ्रांतियों और आम आदमी के मन में व्याप्त विभ्रम पर वह बहस है जो आज भी उतनी ही अहम है जितनी विभाजन के समय या बीस वर्ष पहले रही। बहस आज भी जारी है, भले ही संदर्भ, परिदृश्य और पात्र बदल गए हैं।"

शमील चौहान ने अपनी गहरी आवाज़ में नाटक में इस्तेमाल की गई नासिर काज़मी की एक ग़ज़ल गा कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पत्रकार अजित राय ने कार्यक्रम के दौरान असग़र वजाहत से बातचीत की।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त भारत से मनोज श्रीवास्तव (कवि - भोपाल), प्रीता वाजपेयी (कवियत्री - लखनऊ), आनन्द कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), आई.एस. चुनारा, ललित मोहन जोशी, विजय राणा, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, के.सी. मोहन (पंजाबी), के.बी.एल. सक्सेना, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, डा. हबीब ज़ुबैरी, मंजी पटेल वेखारिया, उर्मिला भारद्वाज, अनुज अग्रवाल (प्रकाशक) आदि मौजूद थे।

प्रस्तुति : दीप्ति कुमार

Tuesday, July 14, 2009

उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल को 15वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान

कथा यू.के. सम्मान समारोह में भगवानदास मोरवाल और मोहन राणा सम्मानित

10 जुलाई 2009 । लंदन

(बैठे हुए बाएं से मोहन राणा, ज़कीया ज़ुबैरी, टोनी मैकनल्टी, मधु अरोड़ा, श्रीमती मोहन राणा। खड़े हुएः आनंद कुमार, तेजेन्द्र शर्मा, विभाकर बख़्शी, के.सी. मोहन, रवि शर्मा, इंदिरा, अजित राय)

ब्रिटेन के सांसद और पूर्व आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नल्टी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आयोजित एक गरिमामय समारोह में हिन्दी के सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल को उनकी अनुपस्थिति में 15वां अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। किसी कारणवश मोरवाल पुरस्कार लेने लंदन नहीं आ सके। यह सम्मान मोरवाल के नवीनतम उपन्यास ‘रेत’ (राजकमल प्रकाशन) के लिये दिया गया। उनकी ओर से यह सम्मान उनके मित्र और दिल्ली के सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय ने प्राप्त किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिये स्थापित ‘पद्मानंद सम्मान’ ब्रिटिश हिन्दी कवि मोहन राणा को उनके ताज़ा कविता संग्रह ‘धूप के अन्धेरे में’ (सूर्यासत्र प्रकाशन) के लिये प्रदान किया। इस सम्मान का यह दसवां साल है।

टोनी मैक्नल्टी ने लंदन एवं ब्रिटेन के अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आए एशियाई लेखकों और ब्रिटिश साहित्य प्रेमियों को संबोधित करते हुए कहा कि भाषा संगीत की तरह होती है। यदि आप किसी दूसरे की भाषा समझते हैं तो आप ज़िन्दगी की लय को समझ सकते हैं। दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं। भाषा में आप सपने रच सकते हैं। इस तरह भाषा के माध्यम से आप मनुष्यता तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने हिन्दी में अपना भाषण शुरू करते हुए कहा की भाषाओं के माध्यम से हम सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि आपकी पहचान होती है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में बसे एशियाई समुदाय के बीच भाषा और साहित्य के माध्यम से संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

हाउस ऑफ़ लॉर्डस में भारतीय मूल के सांसद लॉर्ड तरसेम किंग ने कहा कि ब्रिटेन जैसे देश में सारी भाषाएं एक दूसरे की पूरक हैं। अंग्रेज़ी जानना हिन्दी का विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. भाषा और साहित्य के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं के बीच समन्वय का काम कर रही है।

लेबर पार्टी की काउंसलर और कथा यू.के. की सहयोगी संस्था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष ज़कीया ज़ुबैरी ने भगवानदास मोरवाल के पुरस्कृत उपन्यास ‘रेत’ का परिचय देते हुए कहा कि लेखक ने काफ़ी शोध के बाद एक ऐसी कथा पेश की है जिसका समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना चाहिये। इस उपन्यास में कंजर जाति की स्त्रियों के जीवन संघर्ष का ऐसा प्रमाणिक चित्रण है कि पाठक चकित रह जाता है।

लंदन में नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका कपिल मोहता ने कहा कि कथा यू.के. को अब ब्रिटेन के साथ साथ युरोप, अमरीका और अन्य देशों में भी अपनी गतिविधियों की नेटवर्किंग करनी चाहिये। भारतीय उच्चायोग में मंत्री समन्वय आसिफ़ इब्राहिम ने कहा कि भाषा एवं संस्कृति के बिना जीवन अधूरा है। इसे बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये। उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार ने कथा यू.के. के प्रयासों की सराहना करते हुए विदेशों में हिन्दी के नाम पर हो रही गतिविधियों में गंभीरता और गुणवत्ता लाने की वक़ालत की।



कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने 15 वर्षों की कथा-यात्रा को याद करते हुए कहा कि मुंबई से शुरू हो कर हम ब्रिटेन की संसद तक पहुंचे हैं। अब हम अपनी गतिविधियों को नया विस्तार देना चाहते हैं। कथा यू.के. आने वाले दिनों में विदेशों में और भारत में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। इससे विश्व स्तर पर हो रहे निजि प्रयासों की नई नेटवर्किंग सामने आएगी।

इस अवसर पर मोहन राणा ने सम्मान स्वीकार करते हुए अपनी नई कविताओं का पाठ किया। पुरस्कृत उपन्यास रेत उपन्यास पर सुशील सिद्धार्थ एवं मोहन राणा के काव्य संकलन धूप के अन्धेरे में पर गोबिन्द प्रसाद के आलेखों का पाठ किया गया। इंदु शर्मा की पुत्री दीप्ति कुमार ने भगवानदास मोरवाल और ललित मोहन जोशी ने मोहन राणा का परिचय दिया। मधु अरोड़ा (मुंबई) ने कथा यू.के. 15 वर्षों की यात्रा का विवरण दिया। सरस्वती वंदना जटानील बैनरजी ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन किया सनराइज़ रेडियो के लोकप्रिय कलाकार रवि शर्मा ने।

कथा यू.के. के इस आयोजन में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती एवं अंग्रेज़ी भाषा के लेखक बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूर्व पद्मानंद सम्मान विजेता डा. गौतम सचदेव, दिव्या माथुर एवं गोविन्द शर्मा के अतिरिक्त समारोह की गरिमा बढ़ाने के लिये मौजूद थे सर्वश्री मधुप मोहता, प्रो. अमीन मुग़ल, प्रो. जगदीश दवे, बलवन्त जानी (भारत), के.सी. मोहन (प्रलेस - पंजाबी), डा. इतेश सचदेव (सोआस विश्विद्यालय), कैलाश बुधवार, डा. नज़रूल इस्लाम, अचला शर्मा, वेद मोहला, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार एवं इन्द्र स्याल, इलाहबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर नारायण सक्सेना, अनुज अग्रवाल (सूर्यास्त्र प्रकाशन), डा. हबीब ज़ुबैरी, महेन्द्र दवेसर, जय वर्मा, डा. महीपाल वर्मा, विभाकर बख़्शी एवं रमेश पटेल।


प्रस्तुति- दीप्ति कुमार (संयोजक– कथा यू.के. सम्मान समिति)

Monday, June 15, 2009

तेजेन्द्र शर्मा और ज़ाकिया ज़ुबैरी ने इंदु शर्मा की याद में की एक लम्बी पद-यात्रा



लंदन
जाने माने कथाकार एवं कथा यू.के. के संस्थापक तेजेन्द्र शर्मा, उनकी पुत्री दीप्ति एवं कॉलिण्डेल क्षेत्र की लेबर पार्टी काउंसलर एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की मुखिया श्रीमती ज़कीया ज़ुबैरी ने स्वर्गीय इन्दु शर्मा की स्मृति में एक 10 किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर पूरी की। इस वॉक का आयोजन एक कैंसर चैरिटी कैंसर-किन ने किया था जो कि हैम्पस्टेड इलाक़े के रॉयल फ़्री हस्पताल से जुड़ी है।

पैदल चलते हुए ज़कीया जी, दीप्ति एवं तेजेन्द्र ने यह दूरी 2 घंटे और 10 मिनट में पूरी की और कैंसर चैरिटी के लिये 500.00 पाउण्ड इकट्ठे किये। कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के पदाधिकारी कैंसर से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ज़कीया जी हर साल ऐसे आयोजनों में अपनी मित्र अदीबा, अपनी बड़ी बहन और इंदु जी की याद में भाग लेती हैं।







Sunday, May 31, 2009

युवा संस्कृति संसद की गोष्ठी


बीते 16 मई को दिल्ली में कथा यू.के. के सौजन्य से युवा संस्कृति संसद की पहली गोष्ठी हुई, जिसमें युवा लेखकों, कवियों, फिल्म समीक्षकों ने अपनी सक्रिय भागीदारी दी।

समारोह की शुरुआत में युवा कथाकार और कला-समीक्षक अभिषेक कश्यप ने संस्कृति संसद के उद्देश्य के बारे में बात करते हुए कहा—'हमारा मकसद प्रतिभाशाली युवाओं का एक ऐसा समूह तैयार करना है जो साहित्य के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य, थियेटर और सिनेमा सरीखे कला-माध्यमों में गहरी रुचि रखता हो।

इसके पश्चात दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र मिहिर ने फिल्मकार दिवाकर बैनर्जी की चर्चित फिल्म 'खोसला का घोंसला पर बोलते हुए कहा—'इस फिल्म में इंडिया गेट, कुतुब मीनार सरीखे दिल्ली के लोकेल नजर नहीं आते, फिर भी यह फिल्म दिल्ली के बारे में है। इस फिल्म में दिल्ली खुद एक किरदार है। यह फिल्म दिल्ली के उच्च मध्य वर्ग (संसाधनों पर जिसका कब्जा है) व निम्र मध्य वर्ग के बीच वर्ग-संघर्ष और निम्र मध्य वर्ग के भीतर वर्गांतरण की ललक को भी दर्शाता है। चंद्रप्रकाश तिवारी ने समकालीन सांगीतिक परिदृश्य में ध्रुपद गायन के उभार पर चर्चा की।

इससे पहले आकांक्षा पारे ने अपनी कहानी 'प्रश्न' और शिखा गुप्ता व अभिषेक सिंह ने अपनी कविताओं का पाठ किया। गोष्ठी में उपस्थित चर्चित कला-समीक्षा अजित राय ने कहा कि ऐसी गोष्ठियां युवा रचनाकर्मियों की सृजनात्मकता को बढ़ावा देगी और उन्हें साहित्य व कला-माध्यमों पर निरंतर नए ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।

प्रस्तुति- नुपुर शर्मा और पूनम अग्रवाल

Monday, May 11, 2009

भगवानदास मोरवाल को कथा (यू. के.) तथा मोहनराणा को पद्मानंद सम्मान

पन्द्रहवाँ कथा यू.के. सम्मान हाउस ऑफ़ कामन्स में

कथा (यू के) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2009 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान उपन्‍यासकार भगवान दास मोरवाल को राजकमल प्रकाशन से 2008 में प्रकाशित उपन्यास रेत पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री मोरवाल को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 09 जुलाई 2009 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी एवं नासिरा शर्मा को प्रदान किया जा चुका है।

23 जनवरी 1960 को नगीना, मेवात में जन्मे भगवान दास मोरवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की। उन्हें पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। मोरवाल के अन्य प्रकाशित उपन्यास हैं काला पहाड़ (1999) एवं बाबल तेरा देस में (2004)। इसके अलावा उनके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दिल्ली हिन्दी अकादमी के सम्मानों के अतिरिक्त मोरवाल को बहुत से अन्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएं उभर कर सामने आती हैं। उनके पात्र हिन्दू-मुस्लिम सभ्यता के गंगा जमुनी किरदार होते हैं। कंजरों की जीवन शैली पर आधारित उपन्यास रेत को लेकर उन्हें मेवात में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

वर्ष 2009 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान मोहन राणा को उनके कविता संग्रह धूप के अन्धेरे में (2008 – सूर्यास्त्र प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। मोहन राणा का जन्म 1964 में दिल्ली में हुआ. वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक हैं, आजकल ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। उनके 6 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। भारत में साहित्य की मुख्यधारा के आलोचक उन्हें हिन्दी का महत्वपूर्ण लेखक मानते हैं। कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार - हिंदी कविता की नई पीढ़ी में मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है, क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, दिव्या माथुर, नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना,गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव और उषा वर्मा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।



सूरज प्रकाश : भारत में कथा यूके के प्रतिनिधि, email: kathaakar@gmail.com mob: 9860094402
74-A, Palmerston Road, Harrow & Wealdstone (Middx.) HA3 7RW
E-mail: kathauk@gmail.com website: www.kathauk.connect.to Mobile: 07868 738 403

Thursday, December 18, 2008

मुम्बई त्रासदी पर लंदन में हुई हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी

जिस दिमाग़ में धर्म या मज़हब रहता है वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं –काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

लंदन |13 दिसंबर 2008| कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित साझा हिन्दी-उर्दू कथागोष्ठी में मेहमानों को स्वागत करते हुए कॉलिन्डेल की काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, “मुंबई की त्रासदी के बाद हमें यह ज़रूरी लगा कि हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी करवा कर हम विश्व को संदेश दे सकते हैं कि साहित्य द्वारा दो देशों के नागरिकों में एक सहज वातावरण पैदा किया जा सकता है। मैं नहीं मानती कि आतंकवाद का कोई मज़हब होता है। दरअसल मैं तो कहूंगी जिस दिमाग़ में मज़हब या धर्म का वास होता है, वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं होता है।” इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनन्द कुमार जबकि अध्यक्ष थे प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल।
इस कथागोष्ठी में हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर ने अपनी महत्वपूर्ण कहानी पंगा का पाठ किया तो उर्दू का प्रतिनिधत्व किया नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां ने। इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में अन्य लोगों के अतिरिक्त शामिल हुए डा. अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीक़ी, हुमा प्राइस, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीक़ी, परिमल दयाल, रेहाना सिद्दीक़ी, डा. हमीदा, सीमा कुमार, केबीएल सक्सेना।
(सामने बैठे नजमा उसमान, ज़कीया ज़ुबैरी, दिव्या माथुर)
(खड़े हैं – तेजेन्द्र शर्मा, अचला शर्मा, प्रों.अमीन मुग़ल, सलीम अहमद ज़ुबैरी, परवेज़ आलम)


कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने सूचित किया कि यह कथा यू.के. की गोष्ठियों का दसवां साल है। दिव्या माथुर की कहानी पंगा के बारे में उन्होंने कहा कि यह सही मायने में हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय कहानी है। इस कहानी का विषय, निर्वाह, भाषा और बिम्ब सभी नयापन लिये हैं। कहानी का आधार लन्दन की कारों की नम्बर प्लेटें हैं। कहानी की मुख्यपात्रा एक अधेड़ सेवानिवृत भारतीय मूल की महिला है। तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि दिव्या ने इस कहानी में जो टेक्नीक अपनाई है उसमें कहानी सुनाने से हट कर वे कहानी दिखाती हैं।
आनंद कुमार, ज़कीया ज़ुबैरी, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीकी, परवेज़ आलम, परिमल दयाल, डा. हमीदा एवं ख़ुर्शीद सिद्दीकी आदि सभी एकमत थे कि कहानी चलती हुई कार की यात्रा के साथ साथ उन सभी सड़कों पर उन्हें साथ ले चलती है। पन्ना (कहानी की मुख्य पात्रा) की हर प्रतिक्रिया उन्हें सहज और सही लगती है।
डा. अचला शर्मा ने दिव्या को उनकी कहानी की भाषा, विट और विषय के चुनाव के लिये बधाई दी। अध्यक्ष प्रो. अमीन मुग़ल के अनुसार कहानी तीन स्तरों पर यात्रा करती है। पहले स्तर पर आती है कारों की नम्बर प्लेटें जिनकी कड़ियां एक कहानी बनाती चलती हैं। उसके बाद आती है पन्ना की कार की यात्रा। ये दोनों स्तर एक सीधी लाइन की तरह चलते हैं। फिर उन नम्बर प्लेटों से दिमाग़ में पैदा हुई भावनाएं, वो अपनी एक कहानी बनाती हैं। वो एक तरह सेतरंगों की तरह चलता है। मज़ेदार बात यह है कि उन तरंगों में भी एक छिपी हुई सरल रेखा चलती रहती है, जो कुछ पन्ना के साथ जो घटित होता है। उन्होंने दिव्या माथुर की कहानी को आधुनिक कहानी की एक अच्छी मिसाल बताया।
नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां के बारे में तेजेन्द्र शर्मा ने बताया कि यह कहानी किस्सागोई शैली की कहानी है जिसमें चरित्र के भीतर की यात्रा न दिखा कर लेखक सारा किस्सा ख़ुद अपने लफ़्जों में बयान करता है। नजमा की भाषा चुटीली थी और अदायगी प्रभावशाली।
उषा राजे सक्सेना, आनन्द कुमार, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीकी, सफ़िया सिद्दीकी, डा. हमीदा, को लगा कि कहानी में मज्जु मियां का चरित्र बहुत मज़ेदार है। कहानी की भाषा बहुत विट लिये है। ज़कीया ज़ुबैरी का कहना था कि पाकिस्तान से ब्रिटेन आये हर घर में मज्जु मियां जैसा एक न एक रिश्तेदार ज़रूर होता है।
वकील होने के नाते, हुमा प्राइस ने दोनों कहानियों को लीगल कोण से परखा। परिमल दयाल का कहना था कि पाठक को कहानी और अधिक प्रभावित कर सकती थी यदि मज्जु मियां के बारे में केवल बताया न जाता बल्कि उन्हें कुछ करते हुए दिखाया जाता। वहीं डा. अचला शर्मा को लगा कि कहानी जिस प्रभावशाली ढंग से शुरू हुई, उसे अंत तक निभाया नहीं जा सका। कहानी बहुत जल्दबाज़ी में ख़त्म कर दी गई। पाठक की प्यास बुझ नहीं पाई।
प्रो. अमीन मुग़ल ने नजमा उसमान की कहानी को और मज्जु मियां के चरित्र को मज़ेदार बताया और कहा कि नजमा जी ने अपने चरित्र के केवल एक पहलू को उजागर किया है। मज्जु मियां के चरित्र के दूसरे पहलू और अन्दरूनी भावनाओं का चित्रण नहीं किया गया। मगर कहानी मज़ेदार बन पाई है।
गोष्ठी में हिन्दी-उर्दू के रिश्तों, आधुनिक कहानी, प्रगतिशील कहानी आदि पर भी जम कर बहस हुई। अंत में तेजेन्द्र शर्मा ने नजमा उसमान एवं दिव्या माथुर को धन्यवाद देते हुए सभी मेहमानों की बारिश के मौसम में कथागोष्ठी में आने के लिये सराहना की।
मेहमानों ने जितना आनन्द कहानियों का उठाया उतना ही लुत्फ़ ज़कीया जी द्वारा सजाई गयी नाश्ते की मेज़ ने दिया। हिन्दी-उर्दु कहानी गोष्ठी के लिये त्यौहार के मौसम के अनुकूल मेज़ को क्रिसमिस के थीम से सजाया गया था। महमानों ने ज़कीया जी की मेज़बानी की खुले दिल से तारीफ़ की। कार्यक्रम के मेज़बान थे ज़कीया एवं सलीम ज़ुबैरी।

--सुरेन्द्र कुमार