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Tuesday, November 22, 2011

`पुष्पक,' 'नन्हें फ़रिश्ते' का विमोचन और दीपावली स्नेह मिलन संपन्न


कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद के तत्वावधान में वशीरबाग स्थित प्रेस क्लब में ६ नवम्बर २०११ शायं ६ बजे `पुष्पक'-१८,`नन्हें फ़रिश्ते 'व दीपावली स्नेह मिलन समारोह आयोजित किया गया।
इस समारोह में प्रो.ऋषभ देव (अध्यक्ष ) स्वतंत्र वार्ता के संपादक डा. राधेश्याम शुक्ल (लोकार्पण कर्ता ) बी.एस. वर्मा (मुख्य अतिथि ) रावुल्पाटी सीताराम राव (गौरवनीय अतिथि ) एवं प्रभु (सम्माननीय अतिथि ) एवं डा. अहिल्या मिश्र (क्लब की संयोजिका ) मंचासीन हुए | अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन व शुभ्रा महंतो की सरस्वती वन्दना के साथ कार्यक्रम का आरंभ हुआ |
डा. अहिल्या मिश्र ने क्लब का परिचय देते हुए कहा कि विगत १७ वर्षो से क्लब अपनी निरंतरता के लिए जाना जाता रहा है |तत्पश्चात अतिथियों का स्वागत क्लब के सदस्यों द्वारा किया गया | क्लब का परिचय मीना मुथा ने `पुष्पक'-१८ का परिचय डा. जी. नीरजा ने जी. परमेश्वर की अनुवादित कृति `नन्हें फ़रिश्ते' कहानी संग्रह का परिचय लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने दिया | डा. रमा द्विवेदी ने `पुष्पक' प्रकाशन की समस्याओं पर प्रकाश डाला | तत्पश्चात डा. शुक्ल व मंचासीन अतिथियों द्वारा `पुष्पक'-१८ व `नन्हें फ़रिश्ते ' का लोकार्पण किया गया| डा. शुक्ल ने अपने उदबोधन में कहा कि यह सुखद संयोग है कि इन पुस्तकों का लोकार्पण दीपावली पर्व पर हो रहा है | क्लब इसी प्रकार सजगता से आगे बढ़ता रहे | जी.परमेश्वर ने कहा कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच पुल का कार्य करता है | अन्य अतिथियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए |
प्रो. ऋशभ देव शर्मा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा -दो पुस्तकें अपने आपमें दो दीपावलियाँ हैं | पुष्पक हर अंक में प्रौढ़ता प्राप्त कर रहा है | नन्हें फ़रिश्ते की अधिकाँश कहानियां दिल को छूती हैं | अनुवाद का कार्य तलवार की धार पर चलने के समान है | जी. परमेश्वर सफल अनुवादक हैं तथा बधाई के पात्र हैं | डा. मदन देवी पोकरना और भगवानदास

जोपट ने दीप पर्व की शुभकामनाएं प्रेषित कीं | ज्योतिनारायण ने धन्यवाद ज्ञापित किया | सरिता सुराना ने का संचालन किया |
इसा अवसर पर प्रो. टी .मोहन सिंह, प्रो. सत्यनारायण, तेजराज जैन ,विनीता शर्मा , भंवर लाल उपाध्याय ,दयानाथ झा,पवित्रा अग्रवाल ,शान्ति अग्रवाल ,उमा सोनी ,डा. देवेन्द्र शर्मा ,सुरेश गुगलिया ,वीर प्रकाश लाहोटी ,गौतम दीवाना,सावारीकर,सत्यनारायण काकडा ,दुर्गादत्त पांडे ,वी. वनजा ,वी. कृष्णा राव , गुरुदयाल अग्रवाल ,डा. एम्.रंगैया,कुञ्ज बिहारी गुप्ता एवं जी.जगदीश्वर आदि उपस्थित थे |
प्रस्तुति - डा. रमा द्विवेदी

महिला लेखन हेतु पंचम साहित्य गरिमा पुरस्कार के लिए प्रविष्ठियां आमंत्रित

'साहित्य गरिमा पुरस्कार' दक्षिण प्रान्तों के महिला लेखन को प्रोत्साहित एवं प्रतिष्ठित करने का एक व्यापक चिंतन है। इस पुरस्कार का शुभारंभ y2k में हुआ| साहित्य की विधाओं पर महिला लेखन को यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया। इस पुरस्कार के लिए ग्यारह हजार रूपए की धनराशि, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न दिया जाता है।
प्रथम साहित्य पुरस्कार-2000, वरिष्ठ कथाकार श्रीमती पवित्र अग्रवाल को उनके कहानी संग्रह `पहला कदम' पर दिया गया। द्वितीय साहित्य गरिमा पुरस्कार- 2003 , हैदराबाद की सशक्त हस्ताक्षर स्व.डा. प्रतिभा गर्ग को उनके काव्य संग्रह `सुधा कृति' पर प्रदान किया गया। तृतीय साहित्य गरिमा पुरस्कार-2007, वरिष्ठ लेखिका डा. गुणमाला सोमाणी को उनके ललित निबंध की पुस्तक `ललित निबंध माला' पर प्रदान किया गया। चतुर्थ साहित्य गरिमा पुरस्कार-2009 , वरिष्ठ कवयित्री डा. रमा द्विवेदी को उनके काव्य संग्रह `दे दो आकाश' पर प्रदान किया गया। पंचम साहित्य गरिमा पुरस्कार- 2010, दक्षिण प्रांतो की (आन्ध्र प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडू एवम केरल) की लेखिकाओ द्वारा रचित कहानी/लघु कथा विधा पर दिया जाएगा। वर्ष 2006 से 2010 के बीच प्रकाशित कहानी संग्रह /लघु कथा संग्रह पर दिया जाएगा। आमंत्रित विधा की पुस्तक की चार प्रतियाँ, जीवन वृत्त, एवं नवीनतम चार छायाचित्र भेजना अनिवार्य होगा। प्रविष्ठियाँ भेजने की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2011 होगी।
अतिरिक्त जानकारी हेतु संस्था की संस्थापक एवम अध्यक्ष डा. अहिल्या मिश्र एवम संस्था की महासचिव डा. रमा द्विवेदी से संपर्क कर सकते हैँ ।

सम्पर्क सूत्र :
93 /सी ,राज सदन, वेंगलराव नगर, हैदराबद-500038 (आ. प्र.)
दूरभाष : 040-23703708 .फैक्स : 040- 23713249
डा. अहिल्या मिश्र : मो. 09849742803
डा. रमा द्विवेदी : मो. 09849021742

प्रस्तुति : डा. रमा द्विवेदी

Wednesday, December 29, 2010

रमा द्विवेदी को चतुर्थ साहित्य गरिमा पुरस्कार



साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति एवं कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक २५ दिसंबर २०१० को नरेंद्र भवन में चतुर्थ गरिमा पुरस्कार समारोह-२००९ एवं पुष्पक -१६ का लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आई. पी. ई. उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के निदेशक प्रो. राम कुमार मिश्र, स्वतंत्र वार्ता के संपादक डा. राधेश्याम शुक्ल ( अध्यक्ष ) समाज सेवी राम गोपाल गोयनका, आर्य प्रतिनिधि सभा आंध्र प्रदेश के प्रधान विथ्थल राव, भाग्य नगर कावड़ सेवा संघ के अध्यक्ष माँगी राम तायल, प्रो. शुभदा वांजपे ने बतौर विशेष अतिथि भाग लिया। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा एवं संस्थापक अध्यक्ष डा. अहिल्या मिश्र मंचासीन थे। सुधा गंगोली की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम आरंभ हुआ। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन के बाद डा. अहिल्या मिश्र ने कहा कि महिला लेखिकाओं को साहित्य लेखन में दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ने में संबल प्रदान करना ही उनका उद्देश्य रहा है। डा. मदन देवी पोकरना ने अतिथियों का परिचय दिया। प्रथम साहित्य गरिमा पुरस्कार ग्रहीता पवित्रा अग्रवाल ने संस्था का परिचय व विवरण प्रस्तुत किया। कार्यकारी कार्यदर्शी डा. सीता मिश्र ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया तत्पश्चात नगर की विख्यात कवयित्री डा. रमा द्विवेदी का अथितियो द्वारा ग्यारह हजार रूपए की राशि, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर चतुर्थ गरिमा पुरस्कार से सम्मानित किया। इस आयोजन में पुष्पक-१६ का लोकार्पण अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। महिला कालेज की विभागाध्यक्ष प्रो. शुभदा वांजपे ने पुष्पक का परिचय देते हुए कहा कि यह स्तरीय एवं संग्रहनीय पत्रिका है।



पुरस्कार ग्रहीता डा. रमा द्विवेदी ने अपने भावपूर्ण वक्तव्य में कहा कि उन्हें सम्मान मिला है तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ गई है। किसी महिला द्वारा महिलाओं के लिए पुरस्कार की स्थापना दुर्लभ कार्य है। महत्व नींव का होता है, बीज का होता है, बाद में तो लोग जुड़ जाते है। इस पुरस्कार में पांडुलिपि पर भी विचार होता है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने महिला रचनाकारो को संबोधित करते हुए कहा कि महिलाए अपने लेखन के प्रति उदासीन न हो, निरंतर लिखें, संवेदनपूर्ण लिखें लेकिन पुरस्कार की ही कामना से न लिखें। डा. राम कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि अर्थ का अपना महत्व है और साहित्य रचयिता को भी अर्थ का आधार मिलना चाहिए उन्होंने ने आगे कहा कि उन्नत समाज के निर्माणार्थ आर्थिक क्षेत्र और साहित्यिक क्षेत्र का समागम नितांत आवश्यक है। डा. राधेश्याम शुक्ल ने अपनी अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि स्त्री चाहे किसी भी क्षेत्र हो वह भारतीय परम्परा में पूजनीय रही है। महिलाएं लेखन के क्षेत्र में और अधिक सक्रियता से आगे आ रही है। उन्होंने कहा स्रुजनशीलता महिलाओं का प्राकृतिक गुण है। उन्होंने कहा कि लेखकों का मनोबल बढाने के लिए समाज के समर्थ वर्ग को तन-मन-धन से सहयोग देना चाहिए ताकि लेखन की दशा एवं दिशा अधिक बेहतर हो सके। सभी सम्मानीय अतिथियों ने अपने-अपने विचार रखे। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा ने आगे भी सहयोग देने का आश्वासन दिया। लक्ष्मी नारायण अग्रवाल व सरिता सुराना ने संचालन किया जबकि मीना मुथा ने धन्यवाद दिया। इस अवसर पर नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भटटड, वीर प्रकाश लाहोटी सावन, बिंदु जी महाराज, तेजराज जैन, सुषमा बैद, शान्ति अग्रवाल, आ.सी.शर्मा, प्रो. एम रामलू, एन जगननाथम्, अलका चौधरी, विजय लक्ष्मी काबरा, अंजू बैद, डा. गोरखनाथ तिवारी, मुनीन्द्र मिश्र, भगवान दास जोपट, नीरज त्रिपाठी, भंवर लाल उपाध्याय, सुनीता मुथा, उमा सोनी, सावरी कर, डा. हेमराज मीना, डा. कारन उटवाल, वी. वरलक्ष्मी, सुरेश जैन, डॉ. एस.एल. द्विवेदी, एस.एन. राव, संपत मुरारका, राजकुमार गुप्ता आदि उपस्थित थे।



प्रस्तुति: डा. सीता मिश्र- कार्यकारी कार्यदर्शी

Saturday, October 23, 2010

डॉ. पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु को वर्ष 2010 का वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार



हैदराबाद । 17 अक्टूबर, 2010
प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा के 94वें जयंती समारोह के अवसर पर श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा वर्ष 2010 के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। जयंती एवं पुरस्कार समारोह यहाँ रवींद्र भारती में प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ तेलुगु पत्रकार पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

स्मरणीय है कि ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष तेलुगु साहित्य, हिंदी साहित्य और अभिनय जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस-दस हजार रुपये के तीन नकद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं। इस वर्ष तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार 83 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार महामहोपाध्याय डॉ. पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु को प्रदान किया गया, जिन्होंने तेलुगु तथा संस्कृत साहित्य को अपनी मौलिक तथा अनूदित रचनाओं से सुसंपन्न किया है । हिंदी साहित्य के लिए इस वर्ष ‘राष्ट्र नायक’ पत्रिका के संपादक 75 वर्षीय डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी को हैदराबाद में हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के उन्नयन के लिए दिया गया। इसी प्रकार प्रसिद्ध तेलुगु रंगकर्मी 75 वर्षीय डॉ. मोदलि नागभूषण शर्मा को अभिनय जगत में योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया। इसके अतिरिक्त न्यास की ओर से विभिन्न छात्र-छात्राओं को 'प्रतिभा पुरस्कार' और ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी वितरित किए गए।

आरंभ में मुख्य अतिथि पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने मट्टपर्ति वीरांजनेयुलु द्वारा चित्रित वेमूरि आंजनेय शर्मा के विशाल तैलचित्र को लोकार्पित किया। इस अवसर पर संबोधित करते हुए पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने कहा कि वेमूरि आंजनेय शर्मा ने अपना पूरा जीवन हिंदी की सेवा और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय के कार्य के लिए समर्पित कर दिया, अतः वे सही अर्थों में दक्षिण और उत्तर के सामाजिक-सांस्कृतिक सेतु के निर्माता थे। डॉ. पोत्तूरि ने आंजनेय शर्मा जी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता और सामासिक संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का स्मरण करते हुए उन्हें नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय और आदर्श बताया।

पुरस्कृत विद्वानों को समर्पित किए गए प्रशस्ति पत्रों का वाचन विद्यानाथ शास्त्री, कृष्णमूर्ति और ज्योत्स्ना कुमारी ने किया। समारोह का संचालन डॉ. पेरिशेट्टी श्रीनिवास राव ने किया।

प्रस्तुति- ऋषभ देव शर्मा

Monday, September 27, 2010

ऋषभ देव शर्मा को आंध्र प्रदेश हिन्दी अकादमी का पुरस्कार प्राप्त



आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद [आंध्र प्रदेश] ने हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर अकादमी भवन में हिंदी उत्सव का आयोजन किया और अच्छी धूमधाम से २०१० के हिंदी पुरस्कार सम्मानित हिंदीसेवियों तथा साहित्यकारों को समर्पित किए. एक लाख रुपए का पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार अष्टावधान विधा को लोकप्रिय बनाने के उपलक्ष्य में डॉ. चेबोलु शेषगिरि राव को प्रदान किया गया. तेलुगुभाषी उत्तम हिंदी अनुवादक और युवा लेखक के रूप में इस वर्ष क्रमशः वाई सी पी वेंकट रेड्डी और डॉ.सत्य लता को सम्मानित किय गया. डॉ. किशोरी लाल व्यास को दक्षिण भारतीय भाषेतर हिंदी लेखक पुरस्कार प्राप्त हुआ तथा विगत दो दशक से दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा के उपलक्ष्य में डॉ.ऋषभ देव शर्मा को बतौर हिंदीभाषी लेखक पुरस्कृत किया गया. इन चारों श्रेणियों में पुरस्कृत प्रत्येक लेखक को पच्चीस हज़ार रुपए तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया.

पुरस्कृत लेखकों ने ये सभी पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शीर्षस्थ साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. सी.नारायण रेड्डी के करकमलों से अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ.यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद , आंध्र प्रदेश के भारी सिंचाई मंत्री पोन्नाला लक्ष्मय्या तथा माध्यमिक शिक्षा मंत्री माणिक्य वरप्रसाद राव के सान्निध्य में ग्रहण किए.

इस अवसर पर बधाई देते हुए डॉ. सी नारायण रेड्डी ने साहित्यकारों का आह्वान किया कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देशविदेश के हिंदी पाठकों के समक्ष प्रभावी रूप में प्रस्तुत करें. डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद ने भी ध्यान दिलाया कि अकादमी का उद्देश्य केवल हिंदी को प्रोत्साहित करना भर नहीं बल्कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के प्रदेय से शेष भारत और विश्व को परिचित कराना है.



सम्मान के क्रम में सबसे पहले डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने पुष्पगुच्छ दिया.

और फिर प्रशस्तिपत्र, स्मृतिचिह्न एवं सम्मानराशि प्रदान की गई.

सम्मान ग्रहण करते हुए कवि-समीक्षक ऋषभ देव शर्मा .

भारी वर्षा के बावजूद इस आयोजन में भारी संख्या में हिंदीप्रेमी उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए.

डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने अपनी हिंदी ग़ज़ल भी सुनाई -'बादल का दिल पिघल गया तो सावन बनाता है.'

सरकारी आयोजन था.सो, मीडिया वाले भी कतारबद्ध थे.अगले दिन हिंदी, तेलुगु और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में तो छपा ही, चैनलों पर भी दिखाया गया.

आंध्र के हिंदीपरिवार की एकसूत्रता औ आत्मीयता पूरे आयोजन में दृष्टिगोचर हुई.

इस बहाने कुछ क्षण मिलजुलकर हँसने-मुस्कराने के भी मिले

Wednesday, August 4, 2010

पवित्रा अग्रवाल का कहानी संग्रह लोकार्पित



हैदराबाद । 3 अगस्त 2010

कादम्बिनी क्लब [हैदराबाद] के तत्वावधान में नगर की प्रतिष्ठित लेखिका पवित्रा अग्रवाल के द्वितीय कहानी संग्रह "उजाले दूर नहीं' का लोकार्पण 31जुलाई को राजस्थानी स्नातक भवन में संपन्न हुआ।मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्वलन किया। शुभ्रा महन्तो ने सरस्वती वंदना की। डा. अहिल्या मिश्रा ने अतिथियों का परिचय देते हुए पवित्रा से अपने 30 वर्ष पुराने रिश्तों का जिक्र किया और कहा कि उनकी कहानियों में पात्रों का चयन सरल, सहज है।लेखिका मुखौटे नहीं पहनती, वह मितभाषी है ,पवित्रा का व्यक्तित्व कहानियों में झलकता है। "उजाले दूर नहीं '' का लोकार्पण स्वतंत्र वार्ता के संपादक डा. राधेश्याम शुक्ल ने किया।क्लब और शुभचिन्तकों की तरफ से शाल व पुष्प गुच्छों से लेखिका को सम्मानित किया गया।


मुख्य वक्ता डा. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित कृति की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए कहा कि वे पवित्रा के माध्यम से कहानियों को नहीं बल्कि कहानियों के माध्यम से पवित्रा अग्रवाल को जानते हैं।उन्होंने कहा कि '' इस कहानी संकलन का शीर्षक पर्याप्त व्यंजनापूर्ण और प्रतीकात्मक है तथा लेखिका "पहला कदम' से इस विकास तक पहुंची हैं कि" "उजाले दूर नहीं' हैं।कहानियां दर्शाती हैं कि लेखिका बेहद ईमानदार हैं और कहानियों में कहीं भी नारेबाजी नहीं है। वह स्त्री या पुरूष दोनो में से किसी एक को सदा खल पात्र के रूप में नहीं देखतीं ,उन्हें स्त्रीवादी बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। मैं उन्हें मानव संबंधों की सहज,सौम्य कान्तासम्मित कहानीकार मानता हूँ ।'''

डा.राधेश्याम शुक्ल ने बधाई देते हुए कहा कि पवित्रा नाम के अनुकूल रचना में भी पवित्रता का निर्वाह करती हैं, उनमें कहीं आडंबर नहीं है।कस्बाई जिन्दगी की अनुभूति,आर्य समाज के संस्कार उनके साथ हैं।

विशेष अतिथि तेलुगु भाषा के विख्यात कवि डा0 एन गोपी ने कहा कि लेखक जो भी लिखता है वह दिल से ईमानदारी से आना चाहिए,लेखिका अपने अनुभवों के प्रति ईमानदार है,उन्होंने हितोपदेश देने का प्रयास नहीं किया है।वे स्वभाव से कोमल हैं।उन्होंने पवित्रा की कहानियों की तुलना तेलुगु भाषा की कथानिका से करते हुए कहा कि पवित्रा की कहानियों में जो मध्यम वर्ग है,वह दुर्भाग्य से धीरे धीरे विलुप्त होता जा रहा है। ''

कहानी विशेषज्ञ डा0 एम० वेंकटेश्वर ने कहा""कि पवित्रा का नाम अखिल भारतीय स्तर पर शामिल हो चुका है ।उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री पुरुष संबंधों में संतुलन को गंभीरता से चित्रित किया है।आज जब कि लोग विश्लेषण डाल डाल कर कहानियों को क्लिष्ट बना रहे हैं, वहॉ पवित्रा अग्रवाल की कहानियां सरल और आडम्बररहित हैं।'' उन्होंने कहा कि लक्ष्मी नारायण अग्रवाल परोक्ष रूप में पवित्रा जी के साहित्यिक योगदान में बधाई के पात्र हैं।

अध्यक्ष' पद से बोलते हुए डा0 रामसिंह""उदयन'' ने कहा""बहुत से कहानीकार विश्लेषण पर विश्लेषण करते जाते है,उससे कहानियां बोझिल हो जाती हैं। पवित्रा की कहानियाँ इस से बच गई हैं।उन में मूल्यों की स्थापना का प्रयास है,जो इन्हें सार्थक साहित्य बनाता है। वे मौलिक कहानीकार हैं।''

कार्यक्रम का संचालन लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने किया। सरिता सुराणा जैन ने उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद किया। शिखा अग्रवाल जूही, डा.रमा द्विवेदी,रामगोपाल गोयनका,वेणुगोपाल भट्टड़,ज्योति नारायण,गुरुदयाल अग्रवाल,भंवर लाल उपाध्याय,राम कृष्ण पांडे,डा.श्री निवास राव,प्रो.बी. सत्य नारायण,दुली चंद शशि,विनीता शर्मा, देवेन्द्र शर्मा,नरेन्द्र राय,शांति अग्रवाल,रत्न माला साबू,संपत देवी मुरारका,अमरनाथ मिश्र,सुरेश जैन,तेजराज जैन,सुरेश गंगाखेड़कर,मघु भटनागर,एलिजाबेथ कुरियन मोना,वीर प्रकाश लाहोटी सावन ,डा0 मदन देवी पोकरणा, सुषमा बैद,सरिता सुराणा जैन,उमा सोनी,सूरज प्रसाद सोनी,शोभा देशपांडे,पुष्पा वर्मा,रूबी मिश्रा,शीला सोंथलिया,रामास्वामी अय्यर कविराम,गौतम दीवाना,कन्हैयालाल अग्रवाल,डा0 बी0 बालाजी,लीला बजाज,डा0 एन अरूणा, शीला,तनिष्क आदि साहित्यकारों ,साहित्य प्रमियों ने उपस्थित होकर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।

[प्रस्तुति - डा.अहिल्या मिश्र, संयोजिका, कादम्बिनी क्लब,हैदराबाद]

Thursday, May 6, 2010

''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान संपन्न



हैदराबाद । 6 मई, 2010
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के राजभाषा प्रभाग के तत्वावधान में आयकर निदेशालय के अंतर्गत देश भर में कार्यरत हिंदी अनुवादकों के लिए 'आयकर शिखर' में आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय सेमिनार के दूसरे दिन विशेष वक्ता के रूप में पधारे प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने ''ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में हिंदी की भूमिका'' पर व्याख्यान दिया।

अतिथि व्याख्याता ऋषभ देव शर्मा ने विस्तार से यह स्पष्ट किया कि ग्लोबलाइज्ड अर्थव्यवस्था में भारत केवल दुनिया भर के माल की खपत के लिए मंडी ही न रहकर उत्पादक और विक्रेता के रूप में भी उभर रहा है। उन्होंने वैश्विक कारोबार,सूचना प्रौद्योगिकी और बाज़ार की दृष्टि से हिंदी की आवश्यकता और क्षमता के बारे में बताते हुए आगे यह भी कहा कि कंप्यूटर और मोबाइल का जितना प्रसार होगा तथा आर्थिक विकास जितनी जल्दी गाँवों को लक्षित करेगा , हिन्दी सहित सभी स्थानीय भाषाओं के लिए उतना ही अनुकूल माहौल बनेगा क्योंकि गाँवों तक व्यवसाय इन्हीं भाषाओं के माध्यम से प्रसारित हो सकता है।

आरम्भ में आयकर निदेशालय के राजभाषा अधिकारी आर के शुक्ल ने प्रो.शर्मा का परिचय देते हुए स्वागत किया। सुश्री साहू के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ चर्चा संपन्न हुई।

Tuesday, April 27, 2010

‘उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ पर हैदराबाद में संगोष्ठी



हैदराबाद । 25 अप्रैल 2010
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग में नवगठित साहित्य संस्कृति मंच और स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद के तत्वावधान में ‘उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने कहा कि उत्तरआधुनिकता आधुनिकता की प्रतिक्रिया में आरंभ हुई और उससे बहुत आगे बढ़ गई तथा इसकी अवधारणा विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य और भाषा सभी के साथ गुंथी हुई है। उन्होंने कहा कि दर्शन की मूल चिंता सदा यही रही है कि सत्य क्या है। इस सत्य का साक्षात्कार करने का प्रयास ही मनुष्यता वैदिक युग से लेकर उत्तर आधुनिक युग तक करती रही है। डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने इस संबंध में चिंता जताई कि साहित्य और सृजन के मूल्यांकन को रेखांकित करने के लिए हम भारतीय परंपरा की ओर नहीं देख रहे हैं। उन्होंने विस्तार से पश्चिमी और भारतीय दर्शन और काव्यशास्त्र की परंपरा की तुलना की।

बीज व्याख्यान शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर के प्रो. अर्जुन चव्हाण ने दिया। उन्होंने कहा कि उत्तरआधुनिकता अनेक प्रवृत्तियों का पुंज है जिसमें एक ओर अतियथार्थवाद है तो दूसरी ओर यह चिंतन कि जो समूह कल तक हाशिए पर थे वे आज केंद्र में आ रहे हैं। प्रो. चव्हाण ने अनेक उदाहरण देकर यह प्रतिपादित किया कि उत्तरआधुनिक विचारचिंतन का वैध और अवैध से कोई लेनादेना नहीं है। उन्होंने इसे बना हुआ चिंतन नहीं बल्कि बनता हुआ चिंतन बताया और कहा कि यह पश्चिम की दादागिरी का चिंतन है जिसमें ध्वंसात्मकता का प्रमुख स्थान है।

संस्थान के कुलसचिव प्रमुख हिंदी भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने उत्तरआधुनिकता की व्याख्या संरचनावाद और विरचनावाद के संदर्भ में करते हुए विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ को इस प्रवृत्ति का प्रतिनिधि उपन्यास बताया। उन्होंने ब्लूमफील्ड, सस्यूर और चॉम्स्की की चर्चा करते हुए कहा कि साहित्यिक पाठ के भीतर एक ऐसी संरचना होती है जो उस पाठ के अंदर ले जाती है तथा उत्तरआधुनिक विमर्श की सार्थकता इन पाठों की पाठक के नजरिये से व्याख्या करने में निहित है।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के आचार्य डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी ने उत्तरआधुनिकता के इतिहास पर प्रकाश डाला और जोर देकर कहा कि आज आवश्यकता यह है कि तमाम उत्तरआधुनिक विमर्श को संस्कृत की दार्शनिक और काव्यशास्त्रीय चिंतनधारा के बरक्स परखा जाए। उन्होंने माँग की कि हिंदी के साहित्यचिंतक अपनी देशीय जमीन अर्थात् संस्कृत काव्यशास्त्र के आधार पर आधुनिक युग के नए साहित्यिक मापदंड तैयार करें।

आरंभ में डॉ. बी. बालाजी ने सरस्वती वंदना की। संगोष्ठी संयोजक डॉ. मृत्युंजय सिंह ने संगोष्ठी के विषय की पृष्ठभूमि के बारे में बताते हुए यह सवाल उठाया कि आलोचना और विमर्श किस तरह अलग हैं तथा उत्तरआधुनिकता का आधुनिकता से क्या रिश्ता है। उन्होंने यह भी जिज्ञासा प्रकट की कि उत्तरआधुनिक दृष्टि से शोध का मॉडल क्या होना चाहिए। आंध्र सभा के विशेष अधिकारी एस.के. हळेमनी ने अतिथियों का स्वागत किया।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने की। अपने संबोधन में उन्होंने याद दिलाया कि उत्तर आधुनिकता की शुरुआत वास्तुकला से हुई जिसका बाद में चित्रकला, संगीत, साहित्य और अन्य ज्ञानक्षेत्रों में प्रचलन हुआ। उन्होंने आदिवासी विमर्श का उल्लेख करते हुए कहा कि विकास के नाम पर जन-जातियों को उनकी जड़ों से काटना ध्वंसात्मक है जो आदिवासी विमर्श का प्रस्थानबिंदु है। इस सत्र में डॉ. बलविंदर कौर ने ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और पहचान का संकट’, डॉ. घनश्याम ने ‘उत्तरआधुनिक साहित्य में आदिवासी जीवन’, डॉ. करण सिंह ऊटवाल ने ‘नाटक, रंगमंच और उत्तरआधुनिकता’ और ‘डॉ. विष्णु भगवान शर्मा ने ‘उत्तरआधुनिक भाषा संकट और राजभाषा हिंदी’ विषय पर शोधपरक आलेख प्रस्तुत किए। संचालन डॉ. जी. नीरजा ने किया।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. टी. मोहन सिंह ने उत्तरआधुनिक विमर्श की विसंगतियों पर ध्यान दिलाया और कहा कि यदि बुद्धिजीवियों को वास्तव में दलितों और आदिवासियों से थोड़ा भी प्रेम है तो उन्हें वातानुकूलित कमरों से निकलकर इस देश के गाँवों में जाकर कुछ काम करना चाहिए - सिर्फ विमर्श करते रहने से कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इस सत्र में डॉ. भीमसिंह ने ‘उत्तरआधुनिक साहित्य में दलित संदर्भ’ विषय पर शोध पत्र पढ़ा जबकि डॉ. पी. श्रीनिवास राव ने अपने आलेख में ‘स्त्री लेखन में उत्तरआधुनिकता’ का विवेचन किया। डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल के आलेख ‘साहित्यभाषा का उत्तरआधुनिक संदर्भ’ की प्रस्तुति के अलावा चर्चा सत्र में डॉ. बी. बालाजी, चंदन कुमारी, सुशीला , प्रतिभा कुमारी, मोनिका देवी, अनुराधा जैन, राजकमला और मोहम्मद कुतुबुद्दीन आदि शोधार्थियों ने विचारोत्तेजक टिप्पणियों से कार्यक्रम को गति प्रदान की। इस सत्र का संचालन डॉ. बलविंदर कौर ने किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि उत्तरआधुनिकता कोई ऐसी चीज नहीं है जिससे आतंकित हुआ जाए क्योंकि यह एक शाश्वत सत्य है कि सारे विमर्श , कोई भी वर्ग या कोई गतिशील समाज स्थिर नहीं रह सकता, लेकिन उसके टुकड़े भी उतने ही किए जा सकते हैं जितने की कि वह अनुमति देगा। इसलिए यह सोचना कि उत्तर आधुनिक विमर्श हमारी संस्कृति को तोड़ देगा, भ्रांति के अलावा कुछ और नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि यदि साहित्य, समाज, मीडिया, कला या फिल्मों में कुछ ऐसा प्रस्तुत किया जा रहा है जो गलत है तो उस पर भी विमर्श होना चाहिए। इस सत्र में डॉ. राधे श्याम शुक्ल और चवाकुल नरसिंह मूर्ति ने टिप्पणी करते हुए संगोष्ठी को विचारोत्तेजक और सार्थक बताया।

समाकलन करते हुए भी प्रो. अर्जुन चव्हाण ने कहा कि किसी भी विमर्श की तरह उत्तरआधुनिकता में भी न तो सब कुछ अच्छा है न सब कुछ खराब इसलिए हमें भारतीय संदर्भ को ध्यान में रखते हुए उसकी स्वीकार्य बातों को ग्रहण करना चाहिए। समापन सत्र का संचालन डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव ने किया गया।

धन्यवाद ज्ञापित करते हुए डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने निकट भविष्य में ‘उत्तर संरचनावाद’ पर केंद्रित संगोष्ठी का प्रस्ताव रखा। आरंभ में डॉ. शर्मा ने संस्थान के समकुलपति से और देशविदेश के विद्वानों तथा साहित्यकारों से ई-मेल के माध्यम से प्राप्त संदेशों का भी वाचन किया.

राष्ट्रीय संगोष्ठी में हैदराबाद के विभिन्न विश्वविद्यालयों के अध्यापक और छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। साथ ही नगरद्वय के साहित्यप्रेमियों, कवियों, पत्रकारों और हिंदीसेवियों ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया जिनमें डॉ. टी.के.एन. पिल्लै, डॉ. सुरेश दत्त अवस्थी, डॉ. विजयराघव रेड्डी, डॉ. रेखा शर्मा, डॉ. कांचन जतकर, डॉ. पी. माणिक्यांबा, डॉ. प्रवीणा राज, डॉ. टी.जे. रेखारानी, डॉ. मंजूषा श्रीवास्तव, डॉ. अर्चना झा, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. जे.वी. कुलकर्णी, डॉ. तात्याराव सूर्यवंशी, डॉ. मिथिलेश सागर, डॉ. देवेंद्र शर्मा, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. सत्यनारायण, डॉ. किशोरी लाल व्यास, डॉ. पी.आर. घनाते, डॉ. श्यामराव राठौड़, डॉ. प्रभाकर त्रिपाठी, डॉ. शक्ति कुमार द्विवेदी, डॉ. एम. आंजनेयुलु, डॉ. हेमराज मीणा, नरेंद्र राय, द्वारका प्रसाद मायछ, चित्रसेन राणा, एस. सुजाता, ज्योति नारायण, अशोक तिवारी, गुरुदयाल अग्रवाल, भगवान दास जोपट, विजय पाटिल, शशि नारायण स्वाधीन, डी.सी. प्रक्षाले, ए.जी. श्रीराम, भगवंत गौडर, ज्योत्स्ना कुमारी, के. नागेश्वर राव, रामकुमार, श्रीधर, श्रीनिवास सोमाणी, आशा देवी सोमाणी, सुनील सूद और विनीता शर्मा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

Wednesday, March 18, 2009

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में एकदिवसीय शिविर और संगोष्ठी संपन्न

हिंदी में स्थानीयता के साथ वैश्विक होने की विचित्र क्षमता है - डॉ. गंगा प्रसाद विमल

कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग की बाधाएँ अतीत की बात - डॉ. कविता वाचक्नवी


हैदराबाद, 18 मार्च, 2009



दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के 12 वें राष्ट्रभाषा विशारद पदवीदान समारोह के उपलक्ष्य में एकदिवसीय ‘हिंदी प्रचारक शिविर’ का आयोजन केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली की अनुदान योजना के अंतर्गत किया गया। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के संगोष्ठी कक्ष में आयोजित हिंदी शिविर का उद्घाटन केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक डॉ. के. विजयकुमार ने किया। डॉ. विजयकुमार ने उद्घाटन भाषण में इस बात पर बल दिया कि परिवर्तित परिस्थितियों में हिंदी को आर्थिक लाभ की भाषा के रूप में प्रचारित करने की आवश्यकता है। इसके लिए उन्होंने विविध व्यावसायिक क्षेत्रों में हिंदी में कंप्यूटर के अनुप्रयोग की संभावनाओं को खोजने की जरूरत बताई।

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार और केंद्रीय हिंदी निदेशालय के पूर्व निदेशक डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने कहा कि वर्तमान समय में विश्वभर में भाषाओं का रूप बाज़ार द्वारा प्रभावित है। इस परिदृश्य में हिंदी का भविष्य स्थानीय होते हुए वैश्विक होने की उसकी क्षमता के कारण उज्ज्वल है। हिंदी की विचित्र वैश्विक क्षमता की चर्चा करते हुए डॉ. विमल ने जहाँ एक ओर यह ध्यान दिलाया कि हमारे आदिवासी लोकगीतों में ऐसे उत्पादों का विवरण है जिनका वैश्विक स्तर पर व्यापक प्रसार किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर बताया कि हिंदी केवल भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया के सारे देशों में भ्रमण करने में संपर्क भाषा का काम कर रही है क्योंकि इसमें बोलचाल का स्वामित्व है तथा संस्कृति और राजनय के क्षेत्रों में भी हिंदी की क्षमता अद्वितीय है।

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के कुलसचिव तथा प्रमुख भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने अपने व्याख्यान में हिंदी आंदोलन के हवाले से कहा कि हिंदी को कथित हिंदीतर क्षेत्रों से उठनेवाले आंदोलनों से ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली है। उन्होंने सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप भाषा परिवर्तनों की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं की यह शक्ति है कि वे लोक संस्कार को कभी नहीं छोड़तीं। वे इस बात से संतुष्ट दिखाई दिए कि हिंदी तथा भारतीय भाषाओं ने बाज़ार के स्तर पर अंग्रेज़ी को चुनौती दे दी है। उन्होंने बलपूर्वक कहा कि हिंदी के विविध पाठ्यक्रमों को बदलकर प्रयोजनमूलक और रोजगारपरक बनाने की ज़रूरत है। उन्होंने कंप्यूटर को हिंदी के विकास से जोड़े जाने की वकालत करते हुए कहा कि सब प्रकार का ज्ञान-विज्ञान कंप्यूटर पर हिंदी के माध्यम से उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। ऐसी सामग्री के तीव्रगति से मशीनी अनुवाद की संभावना का उल्लेख करते हुए प्रो. सिंह ने यह भी जोड़ा कि मानक भाषा प्रयोग के कारण जहाँ साहित्येतर अनुवाद में कंप्यूटर अधिक सटीकता से कार्य कर सकता है वहीं साहित्यिक अनुवाद में शैली भेद के कारण अभी काफ़ी कठिनाइयों का समाधान करना शेष है।

दो सत्रों में आयोजित ‘हिंदी प्रचारक शिविर’ के प्रथम सत्र में ‘डेली हिंदी मिलाप’ के पत्रकार डॉ. रामजी सिंह ‘उदयन’ ने ‘हिंदी प्रचार की नई चुनौतियाँ’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती तो हमारी पीढ़ी की निष्क्रियता की है। हिंदी के अनेक बोलीगत तथा क्षेत्रीय रूपों की चर्चा करते हुए डॉ. उदयन ने कहा कि ये सब हिंदी की विविध शैलियाँ हैं और इन सभी को खुले मन से स्वीकृति देना आवश्यक है क्योंकि हिंदी जैसी प्रसारशील भाषा को किसी भी प्रकार की कट्टरता से परहेज करना चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा से विश्वभाषा के स्तर तक ले जाने के लिए उन्होंने भाषाई स्वाभिमान को जगाने की जरूरत बताते हुए कहा कि हमारी जीवन शैली में जो द्वैत आ गया है, हमें उससे मुक्त होना होगा तथा चिंतन और व्यवहार की वास्तविक भाषा के रूप में मातृभाषाओं को सम्मानित करना होगा।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ हिंदी सेवी और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के उपाध्यक्ष कडारु मल्लय्या ने याद दिलाया कि दक्षिण में हिंदी का प्रचार स्वतंत्रता आंदोलन के एक अंग के रूप में आरंभ हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि स्वतंत्र भारत में हिंदी आंदोलन का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा से लेकर राजकाज, कोर्ट-कचहरी और विभिन्न व्यवसायों तक हिंदी को प्रतिष्ठित करना बन गया है जो निश्चय ही अंग्रेज़ी-मानसिकता के प्रभुत्ववाले इस बहुभाषी देश में अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। कडारु मल्लय्या ने यह भी कहा कि जब तक सरकारी सहायता के साथ-साथ आम जनता का सहयोग नहीं मिलता तब तक हिंदी प्रचार का कार्य पूरा नहीं हो सकता। वरिष्ठ हिंदी प्रचारक चवाकुल नरसिंह मूर्ति और वेंकट रामाराव ने भी स्कूली स्तर पर हिंदी की उपेक्षा को चिंताजनक बताया।

दूसरे सत्र में ‘कंप्यूटर पर हिंदीः दशा और दिशा’ विषय पर व्याख्यान देते हुए ‘विश्वम्भरा’ की महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी ने कहा कि हिंदी को रोजगारपरक स्वरूप देने में कंप्यूटर बहुत बड़ा वरदान सिद्ध हो सकता है। सारी ज्ञान शाखाओं को भारतीय भाषाओं में कंप्यूटरीकृत करने की चुनौती का उल्लेख करते हुए डॉ. वाचक्नवी ने बताया कि इंटरनेट पर हिंदी में शब्दकोश, पारिभाषिक कोश, मुहावरा कोश, कविता कोश और गद्य कोश की उपलब्धता ने कंप्यूटर पर हिंदी में काम करना आसान कर दिया है। उन्होंने कहा कि हिंदी में ‘सर्च-इंजन’ आ जाने से यह साफ हो गया है कि कंप्यूटर पर काम करने के लिए अंग्रेज़ी जानना अनिवार्य नहीं है। हिंदी के अनेक ‘फांट’ होने से पैदा हुई अराजकता को अतीत की बात बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘यूनिकोड’ और ‘फांट परिवर्तकों’ की निःशुल्क उपलब्धता ने हिंदी में सामग्री लिखने, प्रेषित करने, प्राप्त करने और पढ़ने को अत्यंत सुविधाजनक बना दिया है तथा इन्हें न जाननेवाले ही दुरूहता का प्रलाप करते हैं। डॉ. कविता ने कंप्यूटर पर प्रस्तुतीकरण द्वारा हिंदी प्रचारकों को विभिन्न हिंदी ‘साइटों’ से भी परिचित कराया। साथ ही लिप्यंतरण और वर्तनी संशोधन की विधि भी प्रायोगिक रूप में समझाई।

इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, आंध्र के अध्यक्ष कोम्मा शिवशंकर रेड्डी ने कहा कि 21 वीं शताब्दी में हिंदी प्रचार के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। अतः इस क्षेत्र में कंप्यूटर की उपयोगिता का पूरा दोहन किया जाना चाहिए। उन्होंने हिंदी प्रचारकों के लिए ऐसे प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने की जरूरत बताई जिनमें वे हिंदी व्याकरण, हिंदी उच्चारण, वर्तनी और साहित्य शिक्षण के लिए कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख सके। इसी प्रकार कोषाध्यक्ष एम. रघुपति ने हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण में पावर पाइंट पद्धति की व्यापक उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद के मुख्य प्रबंधक (राजभाषा) डॉ. विष्णु भगवान शर्मा ने कहा कि बहुभाषिकता भारत का एक सामाजिक यथार्थ है और यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि भाषा विभिन्न समाजों और संस्कृतियों को जोड़ने का काम करती है। हिंदी शताब्दियों से इसे सेतुधर्म का निर्वाह करती आई है और आज भी वह भारत की सामासिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कंप्यूटर को एक ऐसा वाहन बताया जिस पर आरूढ़ होकर हिंदी भारतीयता को आधुनिक विश्व में सफलतापूर्वक प्रसारित कर सकती है। इसके लिए उन्होंने ‘शब्द संसाधन’ और ‘डाटा संसाधन’ दोनों स्तरों पर व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता बताई।

आरंभ में प्रचारक महाविद्यालय की छात्राओं प्रशांति, रेशमा, उर्मिला, नसरीन और सारिका ने मंगलाचरण किया। शिविर निदेशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने विषय प्रवर्तन और समाहार की जिम्मेदारी संभाली। सत्रों का संचालन डॉ. बलविंदर कौर और डॉ. जी. नीरजा ने किया। परिचर्चा में डॉ. वीणा कश्यप, आर.एल. दलाया, ए.जी. श्रीराम, डॉ. शिखा निगम, जुबेर अहमद, जानी बाषा, डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. पी. श्रीनिवास राव, संतराम यादव, शंकर सिंह ठाकुर, राधाकृष्णन, टी. रमादेवी, उमाराणी तथा डॉ. शक्तिकुमार द्विवेदी के अतिरिक्त बी.एड. और प्रचारक महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। राष्ट्रगान के साथ शिविर संपन्न हुआ।