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Sunday, October 24, 2010

समाचार पत्रों की बिक्री संख्या पर भी स्टिंग ऑपरेशन होना चाहिये– आलोक मेहता



“समाचार पत्रों की इन्फ़लेटिड बिक्री संख्या की जांच होनी चाहिये। सरकारी विज्ञापन पाने के लिये समाच्रार पत्र बिक्री संख्या कहीं बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली जैसे शहर में टेम्पो प्रिटिंग प्रेस से अख़बार ले कर चलता है और शाहदरा के किसी गोदाम में डम्प कर देता है।” यह कहना था वरिष्ठ पत्रकार एवं नई दुनियां के सम्पादक पद्मश्री आलोक मेहता का। आलोक मेहता इन दिनों लंदन यात्रा पर हैं और कल शाम वे लंदन के नेहरू केन्द्र में पत्रकारों और साहित्यकारों को सम्बोधित कर रहे थे। इस गोष्ठी का आयोजन कथा यूके एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने मिल कर किया था।

कथा यूके के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने आलोक मेहता का परिचय करवाते हुए उनकी महत्वपूर्ण कृति पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा के हवाले से भारत में हाल ही में हुई घटनाओं पर भारतीय मीडिया की भूमिका पर आलोक मेहता से टिप्पणी करने को कहा – जिनमें रामजन्म बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्च न्यायालय का फ़ैसला; कॉमनवेल्थ खेल; आतंकवाद आदि शामिल हैं।

आलोक मेहता का मानना है कि यदि हम बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के समय की पत्रकारिता की आज की पत्रकारिता से तुलना करें तो हम पाएंगे कि मीडिया ने ख़ासे सयंम का परिचय दिया है। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों को भी हमने अपने साथ जोड़ा है और तय किया गया है कि सेसेनलिज़म से बचा जाए। सरकार को खासा डर था कि इस निर्णय के बाद दंगों की आग से फैल सकती है। मीडिया ने पुराने मस्जिद टूटने के चित्रों का इस्तेमाल नहीं किया। और कुल मिला कर समाचार कवरेज परिपक्व रहा।


लंदन के नेहरू केन्द्र में गोष्ठी के बाद बैठे हुए बाएं से दाएं – डा. अचला शर्मा (उपाध्यक्ष कथा यू.के.), कैलाश बुधवार, डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, पद्मश्री आलोक मेहता, मोनका मोहता, तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव कथा यू.के.)। खड़े हुए बाएं से दाएं – डा. हिलाल फ़रीद, दिव्या माथुर, परवेज़ आलम, डा. मधुप मोहता, शिखा वार्षणेय़। - चित्रः विजय राणा।

आलोक मेहता ने स्वीकार किया कि कॉमनवेल्थ खेलों के कवरेज में कुछ अति अवश्य हुई, मगर यह ज़रूरी भी थी। यह ठीक है कि खेलों और भारत की छवि विश्व में कुछ हद तक धूमिल हुई, मगर इसी वजह से सरकारी मशीनरी हरक़त में आई और अंततः खेल सही ढंग से संपन्न हो पाए। उन्होंने बताया कि जब वे नई दुनियां में खेलों की तैयारी के बारे में समाचार प्रकाशित करते थे तो राजनीतिज्ञ सवाल भी करते थे कि उनके विरुद्ध क्यों समाचार प्रकाशित किए जा रहे हैं। दरअसल सरकार की हालत ऐसी है जैसे इन्सान एंटिबॉयटिक से इम्यून हो जाता है ठीक वैसे ही सरकार भी आलोचना से इम्यून हो चुकी है।

वरिष्ठ पत्रकार विजय राणा का मत था कि डी.ए.वी.पी. के माध्यम से सरकार सरकार समाचार पत्रों को विज्ञापन दे कर अपने विरुद्ध लिखने से रोकने में सफल हो जाती है। हिन्दुस्तान टाइम्स एवं टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे दैत्यों को तो करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं। क्या ये विज्ञापन भी भ्रष्टाचार नहीं फैलाते।

मधुप मोहता का सवाल था कि सत्तर हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर कॉमनवेल्थ खेल करवाए जा सकते हैं तो केवल सौ करोड़ का ख़र्चा कर के हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा क्यों नहीं बनवाया जा रहा। इस पर आलोक मेहता का कहना था कि इसमे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यदि सरकार 10 बड़े व्यापारी घरानों से पैसा इकट्ठा करने को कहे तो सौ करोड़ रुपये महीने भर में इकट्ठे हो सकते हैं। शिवकांत को समस्या इस बात में दिखाई देती है कि प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को कैसे मनाया जाए कि वे व्यापारी घरानों को इस विषय में संपर्क करें।

कथा यूके की उपाध्यक्ष डा. अचला शर्मा की चिन्ता थी कि मह्तवाकांक्षा की भाषा अंग्रेज़ी बन गई है। जब तक हिन्दी तरक्की और बेहतरी से नहीं जुड़ेगी उसे उसका सही दर्जा नहीं मिल पाएगा।

डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि भाषा में दिनमान के ज़माने से आजतक ख़ासा परिवर्तन आ गया है। अब प्रिन्ट मीडिया की भाषा आम इन्सान की भाषा हो गई है। आलोक मेहता ने कहा कि हमें सतर्कता बरतनी होगी। हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्द आने से हिन्दी अधिक समृद्ध होगी मगर यह हमें सावधानी से करना होगा। जो नये शब्द हैं उन्हें हिन्दी में ज़रूर शामिल किया जाए, जैसे कि मेट्रो के लिये नया शब्द गढ़ने की ज़रूरत नहीं। मगर हिन्दी के प्रचलित शब्दों को हटा कर उनके स्थान पर अंग्रेज़ी के शब्द न थोपे जाएं।

नेहरू सेन्टर की निदेशक मोनिका मोहता ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। एक सार्थक शाम पूरी होने का अहसास सबके मन में था।

Saturday, October 16, 2010

डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी में मुशायरा




(बाएं से फ़रज़ाना ख़ान, श्री अख़्तर, बासित कानपुरी, तेजेन्द्र शर्मा, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, अक़ील दानिश, मारग्रेट जे, श्रीमती इफ़्फ़त ख़ान, श्री अहसन ख़ान)

ब्रिटेन के शहर डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी ने हाल ही में एक मुशायरे का आयोजन किया जिसमें लंदन के उर्दू शायरों अक़ील दानिश एवं बासित कानपुरी; हिन्दी और उर्दू की शायरा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, हिन्दी के शायर/कवि तेजेन्द्र शर्मा एवं नॉटिंघम की शायरा फ़रज़ाना ख़ान ने श्रोताओं को अपनी रचनाओं का रसास्वादन करवाया।
मुशायरे के संयोजक श्री अहसन ख़ान ने सभी शायरों का स्वागत किया। उनका मानना है कि बेशक मुशायरा मूलतः उर्दू शायरी को लेकर है मगर शायरों में मौजूद हिन्दी के कवि तेजन्द्र शर्मा और श्रोताओं में मौजूद मुसलमान, सिख, हिन्दू और ईसाई इस बात का सबूत है कि साहित्य का कोई मज़हब नहीं होता। भाषा किसी मज़हब से जुड़ी नहीं है।
पीयर-ट्री लायब्रेरी की लाइब्रेरियन मारग्रेट जे ने प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि, हमारी लायब्रेरी के लिये यह गर्व का विषय है कि यहां एक बहुभाषीय मुशायरा आयोजित किया जा रहा है। मार ग्रेट ने आगे कहा कि उन्हें उर्दू या हिन्दी भाषा समझ नहीं आती मगर यह सच है कि साहित्य भाषाओं की दीवारें तोड़ कर अपनी बात श्रोता को समझा देता है।
फ़रज़ाना ख़ान ने संचालक का पद संभालते हुए प्रत्येक शायर का परिचय दिया और एक एक कर उन्हें अपनी रचना सुनाने का आमंत्रण दिया।
वरिष्ठ शायर अक़ील दानिश ने पहले मां के सम्मान में अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी -
"बच्चे बद भी हों तो सीने से लगा लेती है
मां के अंदाज़ में अंदाज़-ए-ख़ुदा मिलता है।"
फिर वे नॉस्टेलजिक हो कर अपने वतन को याद करते हुए कह उठे –
बेवतन हम हैं मगर यादे वतन आती है
इस अंधेरे में भी सूरज की किरण आती है।

(अक़ील दानिश अपनी ग़ज़ल सुनाते हुए)

बासित कानपुरी ने अपने मधुर स्वर में तरन्नुम से अपने रचनाएं पेश कीं। वे पहले तो शमां की लौ लगने और रात भर जलने की बात कहते रहे -
मालूम नहीं शम्मां की लौ किससे लगी है
शब भर दिले सोज़ां की तरह वो भी जली है।
और फिर दिल में शमा जला बैठे -
उनके आने की आस में बासित
दिल में शम्में जलाए बैठे हैं।
तेजेन्द्र शर्मा ने बात को नया मोड़ देते हुए नॉस्टेलजिया से बाहर आने की बात की और श्रोताओं से कहा कि हम लोग ब्रिटेन में ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आकर बसे हैं मगर इसे आजतक अपना मुल्क़ नहीं मान पाए। इसलिये ब्रिटेन हमें कहता है -
जो तुम न मानों मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है
यहां जो आ गया इक बार वो हमारा है।
उनका अगला शेर रिश्तों और दोस्ती की गहरी पड़ताल करता दिखा -
जग सोच रहा था कि है वो मेरा तलबगार
मैं जानता हूं उसने ही बरबाद किया है।
काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने अपनी दो नज़्मों का पाठ किया। पहली नज़्म में उन्होंने कांटेदार झाड़िंयों का बिम्ब इस्तेमाल करते हुए उनके ज़िन्दगी पर छा जाने की बात कही। तो वहीं दूसरी नज़्म में पाकिस्तान में हाल ही में आए सैलाब की तस्वीर खींच कर श्रोताओं की आंखों को नम कर दिया –
वो ख़ूंख़ार कांटों भरी झाड़ियां सब
मुंडेरों पे फैली दरख़्तों से लिपटीं
कि फूलों को ताक़त से अपनी कुचलतीं
हवाओं की लहरों में चीख़ें समोती
खड़ी हैं कतारें बनाए हुए अब
न जाने क्यों चुपचाप ख़ामोश हैं सब।

Wednesday, October 6, 2010

लंदन की एक शाम तीन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के नाम


बाएँ से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डॉ. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवयित्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने 3 अक्टूबर 2005 (यानी कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डॉ. केसरी नाथ त्रिपाठी, डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।


निखिल के साथ कैलाश जी

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

-दीप्ति शर्मा

Saturday, September 18, 2010

इस वर्ष का ‘अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान’ लक्ष्मी शंकर बाजपेयी को


बाएं से दाएं : मोनिका कपिल मोहता, डा सत्येन्द्र श्रीवास्तवा, केशरीनाथ त्रिपाठी, इंडिया रस्सेल, डा लक्ष्मीशंकर बाजपेई, डा पदमेश गुप्त, तेजेन्द्र शर्मा, बैरोनेस श्रीला फ़्लैदर एवं दिव्या माथुर

हिंदी गीत गज़ल व कविता के सशक्त हस्ताक्षर लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने हाल ही में अपनी काव्य-यात्रा में एक और महत्वपूर्ण मील पत्थर तय किया. अनेकों पुरस्कारों सम्मानों से सम्मानित बाजपेयी, कविता द्वारा समाज की सच्चाइयों को बेबाक और दो टूक तरीके से कहने के लिये जग-प्रसिद्ध हैं. इस वर्ष उन्हें लंदन स्थित साहित्यिक संस्था ‘वातायन’ जो कि ‘नेहरु केंद्र, लंदन’ तथा ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ (Indian Council of Cupltural Relations) के सहयोग से यू.के में साहित्यिक गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध है, का ‘अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान’ प्रदान किया गया. श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी पिछले दिनों यू.के के दौरे पर थे तथा वहाँ के कई स्थानों यथा ‘भारतीय उच्चायोग’ लंदन, वूलवरहम्पटन, नेहरु केन्द्र लंदन, साल्वे, कार्डिफ, लीसेस्टर, बिरमिंघम लिवेर्पूल आदि में उनकी कविता की धूम मची रही.

दि. 31 अगस्त 2010 को लंदन के नेहरु केंद्र में ‘अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान’ समारोह में अंग्रेज़ी व हिंदी साहित्य की कई मूर्धन्य हस्तियाँ उपस्थित थी तथा बाजपेयी के प्रसिद्ध गीत ‘पूछा था रात मैंने ये पागल चकोर से, पैगाम कोई आया है चंदा की ओर से’ पर आधारित एक आकर्षक नृत्य का आयोजन भी हुआ. वहाँ के प्रसिद्ध संगीतकार जटानिल बैनर्जी ने बाजपेयी की कविताओं पर आधारित मनमोहक संगीत रचनाएँ प्रस्तुत की. ब्रिटिश कवयित्री इण्डिया रुस्सेल ने बाजपेयी की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किये. सभागार में उपस्थित सभी गणमान्य हस्तियों यथा मोनिका कपिल मोहता (निदेशक, नेहरु केंद्र), डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव (पूर्व वरिष्ठ व्याख्याता केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी), केशरीनाथ त्रिपाठी, इंडिया रस्सेल, डा पदमेश गुप्त (अध्यक्ष हिंदी समिति), तेजेन्द्र शर्मा, बैरोनेस श्रीला फ़्लैदर एवं दिव्या माथुर ने बाजपेयी की रचनाओं की भरपूर सराहना की.

‘बेज़ुबान’, ‘दर्द’, ‘खशबू तो बचा ली जाए’ जैसी सशक्त काव्य पुस्तकों के रचेता श्री बाजपेयी को अपनी अनुभव-धनी साहित्यिक यात्रा के दौरान ‘संसदीय हिंदी परिषद’ व ‘परिचय साहित्य परिषद’ के ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’, हिंदी अकादमी का ‘बाल साहित्य सम्मान’ तथा ‘उद्भव शिखर सम्मान’ आदि जैसे अनेक सम्मानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. यह पूछे जाने पर कि किसी साहित्यकार के जीवन में पुरस्कारों सम्मानों की क्या महत्ता है, स्वाभाव से मृदुभाषी और प्रतिपल चिंतनमग्न से दिखते श्री बाजपेयी का कथन है कि पुरस्कार व सम्मान उन के लिये अधिकाधिक प्रेरणा व गतिशीलता का स्रोत हैं जिन से वे अपना अधिकाधिक समय रचनात्मकता को दे पाते हैं. श्री बाजपेयी मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं जिन की कविताओं में पारिवारिक मूल्यों से भी बहुत सुन्दर रूप से साक्षात्कार होते हैं, यथा उन की एक गज़ल का एक शेर:
बहुत दिन बाद आ कर कह गया फिर जल्दी आता हूँ,
पता माँ बाप को भी है वो कितनी जल्दी आता है.

निश्छल से निश्छल शब्दों में बार बार अपने रोज़गार हेतु आते जाते बच्चों के प्रति माँ बाप की इस तड़पन को केवल बाजपेयी की संवेदनशील कलम ही व्यक्त कर सकती है. 10 जनवरी 1955 को कानपुर के निकट सुज्गावन गांव में जन्मे लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने शिक्षा तो एम.एस.सी (भौतिक विज्ञान) में प्राप्त की पर मन कवि का पाया. वर्तमान में वे आकाशवाणी दिल्ली के स्टेशन निदेशक हैं तथा उन के साहित्यिक शख्सियत के धनी होने के कारण आकाशवाणी कार्यक्रमों में भी उनकी देखरेख में काफी सार्थक परिवर्तन पाए गए हैं.

समारोह में पद्मेश गुप्त (अध्यक्ष हिंदी समिति ), मोनिका मोहता जी (निदेशक नेहरु केंद्र ), उषा राजे सक्स्सेना (उप- संपादक , एवं अध्यक्ष -अंतर्राष्ट्रीय प्रचार समिति ),दिव्या माथुर (सह अध्यक्ष "पुरवाई" ),डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव (पूर्व वरिष्ठ व्याख्याता केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ) सहित हिंदी समिति के अन्य गणमान्य सदस्य उपस्थित थे. कार्यक्रम की शुरुआत ...पद्मेश गुप्त ने की, फिर कमान संभाली मोनिका मोहता जी ने और आने वाले दिनों में होने वाले आयोजनों से परिचित कराया.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Friday, August 27, 2010

शिक्षाविद् वेद मोहला (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों का लंदन में लोकार्पण


(बाएं से बैठे हुएः श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला (एम.बी.ई.), डा. अरुणा अजितसरिया (एम.बी.ई.)। खड़े हुए – उषा राजे सक्सेना, तेजेन्द्र शर्मा, माइकल वार्ड एवं आनंद कुमार)

कथा यू.के. एवं एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स ने 23 अगस्त 2010 की शाम 6:30 बजे वरिष्ठ शिक्षाविद् वेद मित्र मोहला, (एम.बी.ई.) की दो पुस्तकों आई जी सी एस ई हिन्दी एवं इक्कीसवीं सदी का बाल साहित्य का लोकार्पण समारोह लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित किया। पुस्तकों का लोकार्पण श्री कैलाश बुधवार (भूतपूर्व अध्यक्ष बीबीसी हिन्दी विभाग) एवं ब्रिटेन में हिन्दी परीक्षक डा. अरुणा अजितसरिया के हाथों सम्पन्न हुआ।
यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्षा श्रीमती उषा राजे सक्सेना ने वेद जी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं से श्रोताओं का परिचय करवाया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार तीस वर्षों से भी अधिक समय से वेद जी अपना समय और पैसा ख़र्च करके ब्रिटेन के बच्चों को हिन्दी पढ़ा रहे हैं। उन्होंने मोहला जी की प्रकाशित कृतियों एवं उनको मिले अलग अलग सम्मानों की भी चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए कथाकार तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव, कथा यूके) ने कहा कि एक सिविल इंजीनियर की तरह कैलाश जी ने ब्रिटेन में हिन्दी भाषा सिखाने की नींव रखी है। पैंतीस साल से बिना किसी लाभ की आशा के हिन्दी के भवन को सुदृढ़ बना रहे हैं और साथ ही साथ भारत और ब्रिटेन के बीच एक भाषाई पुल का निर्माण भी कर रहे हैं।



श्री कैलाश बुधवार ने वेद मोहला जी को एक ऐसा मातृभाषा प्रेमी बताया जिसने विदेशी कंक्रीट के जंगल में एकलव्य की तरह हिन्दी की अराधना की है और एक सिविल इन्जीनियर होने के कारण हिन्दी पढ़ाने वाले पंडितनुमा अंगोछे वाली छवि को बदला।
श्रीमती अरुणा अजितसरिया के अनुसार इस पुस्तक में आई जी सी एस ई के पाठ्यक्रम के साथ- साथ मारिशस एवं सिंगापुर के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में निर्धारित 'अनुवाद' तथा 'शब्दों के समुचित प्रयोग' के पाठ भी सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक के अंतिम भाग में हिंदी का लघु शब्‍दकोष, जिसमें लगभग 2400 शब्दों के अर्थ दिए गए हैं, विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी होगा। इसके अतिरिक्त प्रश्नपत्रों का नियोजन परीक्षा के लिए अपेक्षित जानकारी की तैयारी करने में सहायक होगा। इस प्रकार से इस एक पुस्तक में उन्हें परीक्षा की तैयारी करने की समस्त सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। अपने प्रस्तुत रूप में यह पुस्तक अहिंदी- भाषी विद्यार्थियों को हिंदी सीखने में सहायक होगी।
दि फ़ार पैवेलियन (वेस्टेण्ड नाटक) के लेखक, निर्माता एवं निर्देशक माइकल वार्ड ने अपने हिन्दी प्रेम के बारे में साफ़ हिन्दी में बोलते हुए कहा, "मैं एक लेखक और प्रोड्यूसर हूं और मुझे इतनी ख़ुशी है कि मुझे भारतीय फ़िल्मकारों की अगली पीढ़ी के साथ काम करने को मिल रहा है। ये नये फ़िल्म निर्माता युवा पीढ़ी के हैं, उनमें टेलेण्ट है और ये ज़्यादा से ज़्यादा अपना समय फ़िल्म निर्माण एवं कहानी दिखाने एवं स्क्रीनप्ले की कला को समझने में मेहनत लगा रहे हैं।"


(बाएं से श्री कैलाश बुधवार, श्री वेद मोहला एमबीई, श्रीमती मोहला, डा. अरुणा अजितसरिया, एमबीई)।

श्री कैलाश बुधवार द्वारा लिये गये साक्षात्कार के दौरान वेद मोहला जी ने कहा, "मैं 1979 में एक सामाजिक कार्यक्रम में सपरिवार गया। मेरे पांच वर्षीय पुत्र ने एक महिला रेणुका बहादुर के पूछने पर बताया कि वह हिन्दी बोल तो सकता है, परन्तु लिख-पढ़ नहीं सकता। उन्होंने आगे पूछा कि क्या लिखना-पढ़ना भी चाहोगे, तो बच्चे ने उत्साहपूर्वक कहा: 'हां, अवश्य, यदि मेरे पिताजी आज्ञा दें।' आज्ञा लेने जब रेणुका बहादुर मेरे पास आईं, तो न जाने क्यों मेरे मुंह से निकल गया, "हिन्दी सिखाने के लिए इसे साथ लाना तो क्या, मैं स्वयं भी पढ़ाने के लिए आ सकता हूं।" उस वाक्य ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल डाली। न केवल तब हिन्दी विद्यालय की नींव पड़ी, बल्कि तब से जीवन का प्रत्येक रविवार हिन्दी अध्यापन के लिए समर्पित हो गया और मैं एक अध्यापक बन गया। "
वेद मोहला जी के दो विद्यार्थियों ने चिल्ड्रन्स लिटरेचर इन दि टवैण्टी फ़र्स्ट सेंचुरी पुस्तक के अंशपाठ किये।

कार्यक्रम में वेद मोहला जी के छात्र एवं चाहने वालों के साथ साथ भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, डा. श्याम मनोहर पांडेय, डा. गौतम सचदेव, सोहन राही, दिव्या माथुर, डा. पद्मेश गुप्त, इंदर स्याल, के.बी.एल. सक्सेना, मंजी पटेल वेखारिया, गुरप्रीत कौर, यादव चन्द्र शर्मा आदि उपस्थित थे।

Thursday, August 26, 2010

लन्दन में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस समारोह कैसे संपन्न हुआ



इस बार फिर सोचने लगी थी कि १५ अगस्त के दिन हर साल की तरह यहाँ लन्दन में फिर चुपचाप पब्लिक के जाने बिना अपना भारतीय तिरंगा इंडिया हाउस में फहरा दिया जायेगा..जहाँ भारतीय दूतावास है...लेकिन क्या पता था कि इस साल यह कार्यक्रम कुछ फरक तरह से मनाया जायेगा...बस यूँ कहिये कि हमने जरा सी जिज्ञासा दिखाकर पूछताछ की तो पता चला कि यहाँ लन्दन में इस बार इतने सालों के बाद पहली बार हमारे भारतीय स्वतंत्रता दिवस को हाई कमिश्नर की तरफ से धूमधाम से मनाने का आयोजन रखा गया है...बस फिर क्या था हमने भी सोचा की क्यों नहीं वहाँ पहुँच कर स्वतंत्रता के इस पावन दिवस को मनाने का आनंद लिया जाये..और ११ बजे से चालू होने वाले कार्यक्रम के लिए हम लोग घर से निकल पड़े सुबह ९ बजे ही...क्योंकि लन्दन में रहते हुये भी एरिया पर निर्भर करता है की कहाँ रह रहे हैं..उसी हिसाब से समय लगता है गंतव्य स्थान तक पहुँचने में...तो हम लोग ११ से पहले ही पहुँच गये '' इंडियन जिमखाना क्लब '' नाम की जगह...जहाँ ये उत्सव मनाया जाना था. वहाँ बाहर सड़क बुरी तरह ट्रैफिक से भरी थी और तमाम पुलिस तैनात थी सुरक्षा के लिये..तमाम लोग लन्दन से बाहर के शहरों से भी आ रहे थे...गेट के अन्दर पहुँच कर सबने नजरें दौड़ायीं और भीड़ में खड़े होने के लिये अपना स्थान चुना..और इंतजार करने लगे कमिश्नर साहेब का..इंतज़ार करते हुये ११ बज गये फिर सवा ११ हुये..इस तरह इंतज़ार करते समय गुजरता गया और उनका कहीं पता नहीं..आप ही सोचिये कि कमिश्नर साहेब भारतीय होने के नाते लेट तो होंगे ही...जैसे कि हमारे यहाँ हर चीज़ का रिवाज़ है...भारत में ट्रेन आती है तो लेट या पहुँचती है तो लेट, शादी-ब्याह में दूल्हा की बारात पहुँचती है तो लेट, कोई भाषण देने जाता है तो लेट...प्रोफेसर आते हैं क्लास रूम में तो वो लेट..खैर, किसी तरह वह निश्चित समय के आध घंटा बाद अपनी तशरीफ़ लाये और बिल्डिंग की छत पर पहुँचे और फिर लोग बाग फोटो की खींचा-खाँची में लग गये...हम साँस साधे उस पल का इंतजार करने लगे कि कब झंडा ऊँचा हो..उन्होंने फिर देर लगायी...कुछ गप-शप की कुछ VIP लोगों से हाथ मिलाते हुये और उसके बाद राम-राम करके झंडा ऊँचा करने का समारोह संपन्न किया..और फिर किसी महिला ने स्पीच दी..उन्हीं समस्याओं पर जिनके बारे में हम, आप सभी जानते हैं कि हमारे भारत को पराधीनता से मुक्त होने बाद भी क्यों उन भयानक परिस्थितियों और समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है जो हमें स्वतंत्र होने का आभास नहीं दिलाते और संभवतया हम भारतवासी इसके बारे में क्या कर सकते हैं कि देश की दशा सुधर सके...आदि-आदि....और स्पीच के तुरंत बाद पार्क में लगे हुये पंडाल में और उसके बाहर भी खाने के जो तमाम स्टाल थे उनके चारों तरफ भीड़ से जगह भरने लगी...जहाँ शुद्ध शाकाहारी खाने का इंतजाम किया गया था..भारत के उत्तर, दक्षिण, गुजरात और पंजाब के तरह- तरह के स्वाद के खाने व मिठाइयाँ थीं साथ में चाय का इंतजाम और मिनरल वाटर की हजारों बोतलें और साफ्ट ड्रिंक जैसे कि कोका कोला और फ्रूट जूस के पैकेट सब कुछ फ्री में..ये सारा कुछ इंतजाम लन्दन के तमाम भारतीय रेस्टोरेंट के मालिकों की तरफ से स्वतंत्रता दिवस के सम्मान में फ्री किया गया. खाने की इतने चीजें थीं कि दो-चार चीजों को खाकर ही पेट भर जाये..लेकिन कुछ लोग जानते हुये भी कि सब नहीं खा पायेंगे फिर भी प्लेटों में सब भर लेते हैं और बाद को खाना जमीन पर फेंकते हैं या इधर-उधर चुपचाप रख देते हैं...और देखने पर सोचना पड़ता है की दुनिया में तमाम लोग इस खाने के लिये तरस रहे होंगे..तो यहाँ भी वही नजारा देखने को मिला. अच्छा हुआ कि वहाँ कोई पान का स्टाल नहीं था वर्ना लोग इधर-उधर पुचुर-पुचुर थूकते..भारतीय जहाँ भी जाते हैं अपनी आदतें तो साथ में ही ले जाते हैं ना. हाँ तो, खाना भी चल रहा था..और उधर दूर पर स्टेज पर भंगड़ा नाच-गाना शुरू हो गया..बताना जरूरी है कि यू. के. में भंगड़ा डांस और गाना बहुत पापुलर है...हम भी फटाफट पहुँचे देखने स्टेज के पास. देखा की सब की सब कुर्सियाँ पहले से ही जब्त हो चुकी हैं..पंडाल में भी कुछ लोग एक कुर्सी पर बैठ कर अपने पैर पसारे चार कुर्सियों को घेर कर बैठे हुये थे पूछने पर पता लगा कि उनके साथ के कुछ लोग बाहर बैठे स्टेज का शो देख रहे हैं तो उनके लिये सुरक्षित रख छोड़ी हैं..कहने का मतलब कि बाहर भी वह कुर्सियों पर बैठे हैं और अन्दर वाली कुर्सियों को किसी की निगरानी में छोड़ गये हैं..आप लोग मतलब समझ गये होंगे की हमारे देश की ये एक और आदत है...एक सीट की वजाय चार घेर लेते हैं चाहें दूसरे व्यक्ति को खड़े रहना पड़े...चलिये छोडिये भी हम सभी वाकिफ हैं इन बातों से...फिर हम जमीन पर आराम से पसर गये और थोड़ी ही देर में मौका देखते ही किसी के उठने पर उस चेयर पर जाकर जम गये...तो बात हो रही थी मनोरंजन की...तो स्टेज पर के मनोरंजन में प्रमुखता भंगड़ा दिखाया गया साथ में भरत नाट्यम और दूसरी प्रकार के डांस भी...यहाँ नीसडन में स्वामी नारायण मंदिर के शिष्यों ने बहुत सुन्दर गाना गाकर तिरंगे को हाथ में लेकर डांस किया..तमाम सिंगर्स ने देशभक्ति के गाने गये..जो दिल की गहराइयों में उतर गये और वहाँ का पूरा माहौल झूम उठा...तमाम बच्चे व बड़े लोग उठकर नाचने और गाने लगे गाने सुनकर...कितने लोग अपनी राष्ट्रीय तिरंगे की डिजाइन के कपडे पहने घूम रहे थे..छोटे बच्चे तिरंगे पकडे हुये थे..और फोटो खिंचवा रहे थे..सारे बातावरण में उल्लास और उत्साह था..कुछ लोगों को पुरूस्कार बितरण किये गये जिनमें भारत से आई हुई एक क्रिकेट टीम भी थी उसमें वो लोग थे जिन्हें ढंग से दिखाई नहीं देता..उस टीम ने इंग्लैण्ड को तीन बार मैच में हराया तो उन्हें उस सम्मान में कमिश्नर नलिन सूरी जी ने टीम के हर व्यक्ति को अलग-अलग गिफ्ट के बैग दिये...उसके बाद भी गाने वगैरा चलते रहे और फिर करीब चार बजे कार्यक्रम का समापन हुआ.
एक बात बताना भूले ही जा रही थी...कि भारत पर मुफ्त में तमाम लिटरेचर भी बैग में भर कर ले जाने को दिया जा रहा था...मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि जगहों की जानकारी के बारे में..उसके अलावा और भी बहुत कुछ..सभी लोगों को डिजाइनर पैक में पेड़े की मिठाई भी पकड़ाई जा रही +थी...इस तरह सारा दिन फ्री का मनोरंजन हुआ...उसके बाद घर की रास्ता पकड़ी...

ये मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुये हैं उनकी जरा याद करो क़ुरबानी.

नेहरु जी की आँखों में इस गाने को सुनकर आँसू आ गये थे..है ना..? जय हिंद !















-शन्नो अग्रवाल

Sunday, July 25, 2010

हिंदी और उर्दू और नज़दीक आयीं


(बाएं से मोनिका मोहता, हरि भटनागर, ज़कीया ज़ुबैरी, आसिफ़ इब्राहिम, तेजन्द्र शर्मा)

२१ जुलाई २०१० । लंदन
“ये बहुत सुकून देने वाली बात है कि कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स मिल कर यहां यूके में हिंदी और उर्दू के बीच भाषाई पुल बनाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं लेकिन हमें इस बात को भी देखना होगा कि हमारा आज का पाठक इन कहानियों की विषय-वस्‍तु कथानक और लोकेल से जुड़ सके और कहानियों से जुड़ाव महसूस कर सके।” उक्‍त विचार कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स द्वारा प्रकाशित ब्रिटेन की उर्दू क़लम का नेहरू सेटर, लंदन में 21 जुलाई 2010 की शाम लोकार्पण करते हुए हुए भारतीय उच्‍चायोग में मंत्री (समन्‍वय) श्री आसिफ़ इब्राहिम ने व्‍यक्‍त किये।

हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा एवं ज़कीया ज़ुबैरी द्वारा संपादित ब्रिटेन की उर्दू क़लम में ब्रिटेन में बसे 8 उर्दू कहानीकारों की 16 कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक की लम्बी भूमिका कथाकार-पत्रकार एवं कथा यूके की उपाध्यक्षा अचला शर्मा ने लिखी है। इस मौक़े पर प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल ने अपनी बात कहते हुए कहा कि बेशक नेचर के हिसाब से हिंदी और उर्दू बहुत नज़दीकी भाषाएं हैं और दोनों भाषाओं के बीच आदान प्रदान की लम्‍बी परम्‍परा है, कथा यूके और एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स की इस बात के लिए तारीफ़ की जानी चाहिये कि वे अपने सीमित साधनों से इतने महत्‍वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे हैं।
इस अवसर पर भारत से विशेष रूप से पधारे कहानीकार-संपादक-प्रकाशक हरि भटनागर ने अपने लम्बे लिखित लेख द्वारा श्रोताओं का परिचय कहानियों से करवाया। उनके अनुसार संकलन की कहानियां ग़म की कथा को रो पीट कर, चिल्ला चोट कर के नहीं बल्कि बहुत ही ख़ामोश ढंग से व्यक्त करती हैं। कि कथा का कलात्मक वैभव कहीं भी क्षतिग्रस्त नहीं होता और सबसे बड़ी बात यह कि उस निज़ाम का चेहरा बेनक़ाब होता है जो भेदभाव की राजनीति कर के लोगों में फूट डालता है और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।
कथा यूके के महासचिव, कथाकार ओर किताब के संपादक द्वय में से एक तेजेन्‍द्र शर्मा का कहना था कि हमें पहले समस्या को स्वीकार करना होगा। अब समय आ गया है कि हम मान लें कि हिन्दी और उर्दू दो भाषाएं हैं और हमें उनके बीच की दूरी को पाटना है। उन्होंने इस किताब और इस तरह की दूसरी किताबें प्रकाशित किये जाने की ज़रूरत की बात कही और बताया कि उनकी कोशिश रहेगी कि कहानी के अलावा, कविता, ग़ज़ल और इतर साहित्‍य का भी दोनों भाषाओं में अनुवाद कराते रहें।
नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता ने इस अवसर पर नेहरू सेंटर और कथा यूके के लम्‍बे समय चले आ रहे सार्थक रिश्‍तों की बात कही और उम्‍मीद की कि ये सिलसिला आगे भी चलता रहेग।
भारत से पधारे पत्रकार अजित राय ने कहा कि इस पुस्तक का प्रकाशित होना एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि पहली बार ब्रिटेन के आठ उर्दू लेखकों की कहानियां हिन्दी में एक साथ छपी हैं। हिन्दी और उर्दू एक भाषा नहीं हैं। हम आज़ादी के बाद से ही इनके एक होने का भ्रम पाले रहे और दूरियां बढ़ती गईं।
एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स की अध्‍यक्ष ज़कीया जुबैरी ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार मानते हुए कहा मेरा सपना है कि हिन्दी और उर्दू की गंगा जमुनी तहज़ीब, शब्दों की मिठास, अपनापन, ख़ुलूस सब हमारे साहित्य और ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाएं। हमारे रिश्ते राजनीति से संचालित न हों। हमारे रिश्ते साहित्य, कला और एक दूसरे पर विश्वास से पैदा हों। यह न तो पहला प्रयास है और न ही आख़री । हम इस मुहिम को जारी रखेंगे। हिन्दी उर्दू कहानियों की निशस्तें रखी जाएंगी, और अगला संकलन शायद उन कहानियों का हो जो कि उन नशिस्तों में पढ़ी जाएं।
इसी अवसर पर कथाकार सूरज प्रकाश (भारतीय प्रतिनिधि कथा यूके) की नवीनतम कृति दाढ़ी में तिनका का अनूठा विमोचन भी हुआ जब एक युवा पाठिका हेमा कंसारा ने मंच पर आकर उनकी कृति का लोकार्पण किया। सूरज प्रकाश ने अपने लम्बे लेखकीय सन्नाटे के बारे में बात करते हुए लेखक की न लिख पाने की छटपटाहट का विस्तार से ज़िक्र किया। सूरज प्रकाश पिछले बारह वर्षों से कथा यूके से जुड़े हैं।
कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त उर्दू कहानीकार जितेन्द्र बिल्लु, सफ़िया सिद्दीक़ि, मोहसिना जीलानी, बानो अरशद एवं फ़हीम अख़्तर, फ़िल्मकार यावर अब्बास, भूतपूर्व बीबीसी हिन्दी अध्यक्ष कैलाश बुधवार, हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, कादम्बरी मेहरा एवं महेन्द्र दवेसर, कवि निखिल कौशिक, शिक्षाविद वेद मोहला, नाटककार इस्माइल चुनारा, अयूब औलिया, हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार, भारत से आए फ़िल्म आलोचक विनोद भारद्वाज, लदंन और आसपास के शहरों के हिंदी और उर्दू के रचनाकार बड़ी संख्‍या में मौजूद थे।

- कथा यूके प्रतिनिधि

Sunday, April 11, 2010

अराधना के गीतों ने हिन्दी सिनेमा संगीत को नई राह दिखाई: तेजेन्द्र शर्मा



“अराधना में पहली बार राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज़ का इस्तेमाल करके सचिन देव बर्मन ने हिन्दी सिनेमा के संगीत को एक नई राह दिखाई। इस फ़िल्म के बाद एक नहीं दो दो सुपर स्टारों ने जन्म लिया – राजेश खन्ना ने एक्टर के तौर पर और किशोर कुमार ने गायक के तौर पर।” यह कहना था कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजन्द्र शर्मा का। मौक़ा था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स, लंदन एवं कथा यू.के. द्वारा नेहरू सेन्टर, लदन में आयोजित कार्यक्रम सचिन देव बर्मन – यादों के साये में।
अपने पौने दो घन्टे के पॉवर पाइण्ट प्रेज़ेन्टेशन में तेजेन्द्र शर्मा ने सचिन देव बर्मन द्वारा संगीत बद्ध गीतों के विडियो भी दिखाए जिनमें मेरा सुन्दर सपना बीत गया (भाई भाई), ठण्डी हवाएं लहरा के गाएं (नौजवान), जलते हैं जिसके लिये... (सुजाता), ओ रे मांझी... (बंदिनी), तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले (सज़ा), सर जो तेरा चकराए (प्यासा), इक लड़की भीगी भागी सी (चलती का नाम गाड़ी), इक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), कांटों से खींच कर ये आंचल (गाईड), होंठों में ऐसी बात (ज्वैल थीफ़), मेरे सपनों की रानी (अराधना)।
तेजेन्द्र शर्मा ने दिल की रानी (1947) का गीत ऐ दुनियां के रहने वालो बोलो कहां गया वो चोर दिखा कर दर्शकों को चकित कर दिया जब उन्होंने राज कपूर को अपनी ही आवाज़ में सचिन देव बर्मन के संगीत में झूम झूम कर गाते हुए देखा।
बर्मिंघम के जाने माने गायक डा. अजय त्रिपाठी ने मंच पर आकर जाने वो कैसे लोग थे जिनके (प्यासा) और बड़ी सूनी सूनी है.. (मिली) के गीत कैरिओकी संगीत पर गा कर दर्शकों का मन जीत लिया।
अपने शोधपूर्ण संचालन में तेजेन्द्र शर्मा ने दर्शकों को बहुत सी ऐसी जानकारी दी कि दर्शक विस्मित हुए बिना नहीं रह पाए। राहुल देव बर्मन द्वारा बचपन में बनाई गई दो धुनों का सचिन देव बर्मन का फ़ंटूश एवं प्यासा फ़िल्मों में इस्तेमाल; ऑल इंडिया रेडियो के प्रख्यात बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष द्वारा अपनी धुन जीना है इस जहान में तो मुस्कुराइये की चोरी का बर्मन दादा पर आरोप; सचिन देव बर्मन द्वारा फ़िल्मों में कैबरे गीतों की शुरूआत; साहिर लुधियानवी, शैलेन्द्र, कैफ़ी आज़मी और मजरू सुल्तानपुरी जैसे साहित्यिक शायरों एवं गीतकारों की रचनाओं का अपनी फ़िल्मों के लिये इस्तेमाल जैसी बहुत सी जानकारी तेजेन्द्र शर्मा के अनूठे संचालन से श्रोताओं को मिली।
नेहरू सेन्टर के उप-निर्देशक श्री राजेश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का परिचय दिया। एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के उपाध्यक्ष श्री शमील चौहान ने श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा, “बंगाल के रवीन्द्र संगीत की मिठास, शास्त्रीय संगीत की गहराई और मॉडर्न संगीत की थाप मिल कर सचिन देव बर्मन का संगीत बनाते हैं।”
कार्यक्रम में लंदन, बर्मिंघम, वूलवरहैम्पटन एवं मैन्चैस्टर शहरों के संगीत प्रेमियों ने भाग लिया जिनमें डा. मधुप मोहता, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, प्रो. मुग़ल अमीन, प्रो. श्याम मनोहर पाण्डे, डा. बोस, बीबीसी हिन्दी की पूर्व अध्यक्ष डा. अचला शर्मा, दिव्या माथुर, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, कथाकार महेन्द्र दवेसर, नाटककार इस्माइल चुनारा, रक्षा संघानी, पत्रकार मंजी पटेल वेखारिया आदि शामिल थे।

रिपोर्टः दीप्ति शर्मा

Friday, March 19, 2010

लंदन में 'फैसले' की धूम



लंदन के नेहरू केंद्र के सभागार में 18 मार्च को भारी हुजूम उमड़ा। मौका था मशहूर लेखिका और फिल्म निर्माता-निर्देशक रमा पांडे की किताब फैसले के लोकार्पण का। भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर बने टीवी सीरियल पर आधारित रमा पांडे की इस किताब में उन महिलाओं की जिंदगी पूरी शिद्दत से झांकती है। इस किताब का लोकार्पण लेबर पार्टी की कौंसिलर जाकिया जुबैरी ने किया। इस मौके पर फैसले की कुछ कहानियों की सीडी और डीवीडी भी लांच की गई। इस मौके पर जाकिया जुबैरी ने कहा कि इस किताब का हर पन्ना मैंने चाट लिया है। इसका हर एपिसोड मुझे भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी का आईना जैसा लगता है। जुबैरी ये कहने से भी नहीं चूकीं कि सियासत एपिसोड में वे खुद को भी कही ना कहीं पाती हैं।
टेलीविजन और रेडियो की चर्चित शख्सियत रमा पांडे ने अपने आसपास बिखरे किरदारों पर 26 एपिसोड का सीरियल बनाया है। फैसले में उन्हीं कहानियों को संकलित किया गया है। इस समारोह में आकर्षण का केंद्र रहीं अफगानी लेखिका सोफिया। अफगानिस्तान से आईं सोफिया ने कहा कि इस किताब के हर हर्फ का अनुवाद किया जाना जरूरी है। ताकि यह बात उन महिलाओं तक भी पहुंचे, जिनके लिए ये सीरियल बनाया गया है।
बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़ी मशहूर लेखिका अचला शर्मा ने इस लोकार्पण समारोह का संचालन किया। इस मौके पर नेहरू सेंटर के हॉल को जयपुरी दुपट्टे से खासतौर पर सजाया गया था। दरअसल जयपुरी दुपट्टे बनाने वाले रंगरेजों की कहानी इस सीरियल के सुलताना एपिसोड में दिखाया गया है। इस कार्यक्रम में जाने - माने अंग्रेजी उपन्यासकार लारेंस नारफोक और बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार समेत कई हस्तियां शामिल हुईं।



प्रस्तुति- अनीता शर्मा

Tuesday, September 8, 2009

"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. राजनीतिक नाटक नहीं है” – असग़र वजाहत



लंदन।
"जिस लाहौर नहीं वेख्या…. नाटक…. राजनीतिक नाटक नहीं है। हां यह संभव है कि विभाजन की पृष्ठभूमि होने के कारण राजनीति की अण्डरटोन सुनाई दे जाती हों। किन्तु कहीं भी राजनीति इस नाटक का मुख्य स्वर नहीं है।" यह कहना था हिन्दी के प्रख्यात नाटक लेखक डा. असग़र वजाहत का जब वे कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित नाटक की बीसवीं वर्षगांठ पर लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे।

डा. वजाहत ने आगे कहा कि “यह नाटक दिखाता है कि आम आदमी, जिसका प्रतिनिधित्व नासिर काज़मी, मौलवी साहब या मिर्ज़ा साहब करते हैं, ठीक ठाक और अच्छा भला है। समस्या है राजनीतिज्ञों की या फिर उस तबके की जो कि साम्प्रदायिक्ता को अपना मज़हब मानती है। बुरे लोग कम हैं मगर शक्तिशाली हैं।“ इस नाटक का आयोजन अमरीका, आस्ट्रेलिया और भारत के बहुत से शहरों में किया जा रहा है।

मुख्य अतिथि श्री विरेन्द्र शर्मा (एम.पी.) ने कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स को धन्यवाद दिया कि उन जैसे राजनीतिज्ञ को इतने महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा दिया। उन्होंने असग़र वजाहत को बधाई देते हुए कहा कि यह नाटक भाईचारे, आपसी प्यार, धार्मिक सहनशीलता का संदेश देता है। आम आदमी सांप्रदायिक नहीं होता। छोटे क्षेत्रों में आज भी हिन्दू मुस्लिम मिलजुल कर रहते हैं। हिन्दू वो नहीं जो मस्जिद तोड़े और न ही वो मुसलमान है जो मंदिर तोड़े। विरेन्द्र शर्मा ने नाटक के वीडियो क्लिप एवं पाठ की बहुत सराहना की।

नाटक के इतिहास को समेटने वाली पुस्तक - २ डिकेड्स ऑफ़ ए प्ले (वाणी प्रकाशान) का लोकार्पण करते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, "असग़र वजाहत ने जिस लाहौर नहीं वेख्या .... को सिर्फ़ मानवीय त्रासदी तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि दोनों समुदायों की सोच को समझने का प्रयास किया है। नाटक हमें यह बताता है की दोनों समुदायों के बीच ऐसा क्या हुआ जिस से सास्कृतिक एकता, मोहल्लेदारी, प्रेम, विश्वास, भाईचारा सब ख़तम हो गए थे। लेखक ने यह दिखाया है की समाज विरोधी तत्व किस तरह से मज़हब का फायदा उठाते हैं। पात्रों का चित्रण तार्किक है तथा नाटक में पंजाब और लखनऊ की संस्कृति की मानवीय स्तर पर तुलना बहुत संवेदनशील है।"


बाएं से (बैठे हुए) – अचला शर्मा, असग़र वजाहत, विरेन्द्र शर्मा, ज़कीया ज़ुबैरी, रवि शर्मा। खड़े हुएः अजित राय, के.सी. मोहन, शमील चौहान, बदी-उ-ज़मां, तेजेन्द्र शर्मा। चित्रः दीप्ति कुमार।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए इसे मंच के लिये त्रासदी बताया कि मूल हिन्दी नाटकों की हमेशा से कमी महसूस की गई है। ऐसे में किसी हिन्दी नाटक के बीस वर्षों में भिन्न भारतीय भाषाओं में बारह सौ से भी अधिक शो होना नाटक की महानता का जीता जागता सबूत है। असग़र वजाहत ने इस नाटक में केवल विभाजन की त्रासदी का चित्रण ही नहीं किया है। उन्होंने इस समस्या को आर्थिक, सामाजिक एवं साम्प्रदायिकता के स्तर पर प्रस्तुत किया है। एक लेखक के तौर पर जिस लाहौर नहीं वेख्या... असग़र वजाहत के साहित्यि की सर्वोच्च उपलब्धि है। भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत नमूना।

नाटक पर गंभीर चर्चा करते हुए प्रोफ़ेसर मुग़ल अमीन ने कहा, “जिस लाहौर नहीं वेख्या.... की सादग़ी के पीछे यह सबक़ छिपा हुआ है कि सरवाइवल की जिस जंग में इन्सान पैदा होता है, उसका तकाज़ा है कि ख़ुद ज़िन्दा रहने के लिये ज़रूरी है कि दूसरों को ज़िन्दा रखा जाए। ये सबक़ मेरा भी और तेरा भी।"

अचला शर्मा ने नाटक के एक दृश्य को श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया। नाटक के इस ड्रामाई पाठ में रवि शर्मा (पहलवान), बदी-उ-ज़मां (अलीम) एवं तेजेन्द्र शर्मा (नासिर काज़मी) ने भाग लिया। अचला शर्मा का कहना था, "किसी रचना या किसी पुस्तक का सही मूल्यांकन शायद दस-बीस बरस बाद ही किया जा सकता है क्योंकि कालजयी रचना की पहचान समय, संदर्भ और परिस्थियाँ बदल जाने के बाद ही होती है। असग़र वजाहत का नाटक- जिस लाहौर नइ देख्या- की प्रासिंकगता मेरी नज़र में, मज़हब को लेकर फैली भ्रांतियों और आम आदमी के मन में व्याप्त विभ्रम पर वह बहस है जो आज भी उतनी ही अहम है जितनी विभाजन के समय या बीस वर्ष पहले रही। बहस आज भी जारी है, भले ही संदर्भ, परिदृश्य और पात्र बदल गए हैं।"

शमील चौहान ने अपनी गहरी आवाज़ में नाटक में इस्तेमाल की गई नासिर काज़मी की एक ग़ज़ल गा कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पत्रकार अजित राय ने कार्यक्रम के दौरान असग़र वजाहत से बातचीत की।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त भारत से मनोज श्रीवास्तव (कवि - भोपाल), प्रीता वाजपेयी (कवियत्री - लखनऊ), आनन्द कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), आई.एस. चुनारा, ललित मोहन जोशी, विजय राणा, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, के.सी. मोहन (पंजाबी), के.बी.एल. सक्सेना, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, डा. हबीब ज़ुबैरी, मंजी पटेल वेखारिया, उर्मिला भारद्वाज, अनुज अग्रवाल (प्रकाशक) आदि मौजूद थे।

प्रस्तुति : दीप्ति कुमार

Sunday, August 23, 2009

लंदन में कुछ यूँ याद की गईं बी आर चोपड़ा की फिल्में

बी.आर. चोपड़ा अपने समय से आगे के फ़िल्मकार थेः तेजेन्द्र शर्मा


'रेशमी सलवार कुर्ता जाली का' गीत पर नृत्य करतीं त्रिनिदाद की बहनें कृष्णा एवं कैमिलिता

बी.आर. चोपड़ा अपने समय से बहुत आगे की फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक थे। उन्होंने हमेशा सामाजिक सच्चाइयों से जुड़ी फ़िल्मों का निर्माण किया; आम आदमी की समस्याओं को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया मगर मनोरंजन का दामन नहीं छोड़ा। उनकी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि उन्हें विषयों की तलाश में मदद करती थी। नया दौर (1957) संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कही जा सकती है। मनुष्य बनाम मशीन जैसे ज्वलंत विषय को बी.आर.चोपड़ा ने बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है और उस पर ओ.पी.नैय्यर का पंजाबियत लिया सुरीला संगीत जैसे विषय को नये अर्थ दे रहा हो।” यह शब्द थे तेजेन्द्र शर्मा – महासचिव कथा यूके – के। आयोजन था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा लन्दन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक रंगारंग कार्यक्रम जिसमें हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा के महत्वपूर्ण निर्माता निर्देशक बी.आर.चोपड़ा की उपलब्धियों का लेखा जोखा श्रोताओं के सामने रखा गया।


दर्शकों को संबोधित करतीं नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता

नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता ने कार्यक्रम की शुरूआत में श्रोताओं का स्वागत करते हुए एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी एवं तेजेन्द्र शर्मा को कार्यक्रम के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने श्रोताओं को बताया कि तेजन्द्र शर्मा नेहरू केन्द्र से लम्बे समय से जुड़े हैं और बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के इस कार्यक्रम का आनंद सभी दर्शक उठा पाएंगे। उन्होंने सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों को यक़ीन दिलाया कि भविष्य में नेहरू सेंटर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन नियमित रूप से करेगा। हमें इन कार्यक्रमों में भारत की अन्य भाषाओं की फ़िल्मों पर भी कार्यक्रम आयोजित करने होंगे।

तेजेन्द्र शर्मा ने बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म वक़्त (1965) के कुछ दृश्य भी दिखाए जिनमें राजकुमार (राजा) और रहमान (चिनाय सेठ) की टक्कर दिखाई गई। दर्शकों की करतल धव्नि से साफ़ पता चलता था कि राजकुमार की संवाद अदायग़ी आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय है। तेजेन्द्र ने 1957 में बनी नया दौर के पीछे की कहानी भी दर्शकों को सुनाई। कैसे मधुबाला फ़िल्म की नायिका थीं और कैसे उनके पिता अताउल्ला ख़ान को यह बात मंज़ूर नहीं थी कि उनकी बेटी दिलीप कुमार के साथ आउटडोर शूटिंग पर जाए। कैसे वैजयन्ती माला फ़िल्म की हिरोइन बनी और कितना लंबा कोर्ट केस चला।

इसके अलावा तेजेन्द्र शर्मा ने अफ़साना, एक ही रास्ता, साधना, धूल का फूल, धर्मपुत्र, कानून, गुमराह, वक़्त, हमराज़, इन्साफ़ का तराज़ू और निक़ाह जैसी फ़िल्मों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी की।


'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों' गीत गाते जटानील बैनर्जी

तेजेन्द्र शर्मा का मानना है कि बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्मों की गुणवत्ता बढ़ाने में साहिर लुधियानवी की शायरी का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी असामयिक मृत्यु तक साहिर ने बी.आर. चोपड़ा की सभी फ़िल्मों के लिये गीत लिखे। संगीत कर बदलते रहे मगर साहिर लुधियानवी बी.आर. फ़िल्मस के स्थायी स्तम्भ बने रहे। एन. दत्ता एवं रवि ने साहिर के गीतों को अमर बनाने में उल्लेखनीय भूमिका अदा की। कार्यक्रम में तेजेन्द्र शर्मा ने तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, मांग के साथ तुम्हारा, यह देश है वीर जवानों का, ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बीं, आज की रात नहीं शिक़वे शिक़ायत के लिये, नीले गगन के तले जैसे गीतों को भी दिखाया।

बहुत सी फ़िल्मों से जुड़ी कहानियों एवं गप्पों का ज़िक्र भी तेजेन्द्र शर्मा ने किया। कार्यक्रम के बारे में एक सार्थक टिप्पणी क्लासिकल ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार ने की, “मैं जब इस कार्यक्रम में आया था तो बी.आर. चोपड़ा मेरे लिये केवल एक नाम था। मुझे लगता है कि यह कार्यक्रम देखने के बाद मैं उनके बारे में बात कर सकता हूं।”

इंसाफ़ का तराज़ू का विश्लेषण तेजेन्द्र ने विस्तार से किया। उन्होंने समयाभाव के कारण दर्शकों से क्षमा मांगी कि उन्हें कार्यक्रम को थोड़ा छोटा करना पड़ा। बाक़ी का मसाला दर्शकों को फिर किसी दूसरे कार्यक्रम में दिखाया जा सकता है। कार्यक्रम में एक नया रंग भरने के लिये युवा गायक (रॉयल कॉलेज और म्यूज़िक) जटानील बैनर्जी ने फ़िल्म गुमराह की साहिर लिखित नज़म गा कर सुनाई – चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। गिटार पर उनका साथ दिया निखिल ने। त्रिनिदाद की बहनों कृष्णा एवं कैमिलिता ने रेशमी शलवार कुर्ता जाली का पर मज़ेदार नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। शायद बी.आर चोपड़ा की सोच के अनुसार कार्यक्रम में मनोरंजन का पुट डाला गया था।

कार्यक्रम की समाप्ति में महाभारत का वो अंश दिखाया गया जिस में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं यदा यदा ही धर्मस्य ग्लनिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य स्वात्मानं सृजाम्यहम, परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे। उपस्थित दर्शक समूह एकमत से कह उठे कि इस कार्यक्रम से इस से बढ़िया समाप्ति हो ही नहीं सकती थी।


समूह-चित्र-1


समूह-चित्र-2

प्रस्तुति- दीप्ति कुमार

Tuesday, August 18, 2009

प्रवास में पहली कहानी का लंदन में लोकार्पण



कथा यू.के. ने लंदन के नेहरू केन्द्र में उषा वर्मा एवं चित्रा कुमार द्वारा संपादित ब्रिटेन की हिन्दी-उर्दू की महिला कथाकारों द्वारा लिखी गई पहली कहानी के संग्रह प्रवास में पहली कहानी का लोकार्पण समारोह आयोजित किया। समारोह की अध्यक्षता बीबीसी हिन्दी सेवा रेडियो की पूर्व-अध्यक्ष अचला शर्मा ने की जबकि संचालन का भार संभाला भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने।

बर्मिंघम से पधारी विदुषी डा. वन्दना मुकेश शर्मा ने कहानी संग्रह पर एक लम्बा लिखित लेख पढ़ा। उनके अनुसार, “विश्व के हिन्दी साहित्य में यह संग्रह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पहली कहानी पहली संतान की तरह प्रिय होती है। ... विदेश की धरती पर जब इन कथाकरों को जीने के लिए भौतिक दैहिक और मानसिक संघर्षों से गुज़रना पड़ा होगा तब उनके भीतर अपने न अनुभवों को शब्दांकित करने की छटपटाहट से जन्मी होगी उनकी पहली कहानी।”

कहानी संग्रह की संपादिका उषा वर्मा ने आने वाली पीढ़ी को सम्बोधित करते हुए कहा, “यदि मैं तुम्दारी पीढ़ी में इन किताबों के माध्यम से जीवित रहूं तो यही मेरी मुक्ति है।” अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने घोषणा की, “बाहरी प्रयोजन न होने पर भी हम लिखेंगे। लिखना अपने अंदर से बाहर आना होता है। लेखन हमारी संपूर्णता का सवाल है। इट इज़ अ क्वैश्चन ऑफ़ माई होल बीइंग। कोई भी कला ङमारे भीतर के आलोक को बाहर लाती है।” हिन्दी और उर्दू कहानियों की तुलना करते हुए उनका मत था, “...ऐसा मेरा ख़याल है कि उर्दू कहानियों में इंटेलेक्चुअल टफ़नेस हिन्दी कहानियों से अधिक है जब कि हिन्दी कहानियों में सांस्कृतिक विवेक गहराई से स्पष्ट हुआ है।”

काउंसलर ग्रेवाल की सोच थी, “हमें इन कहानियों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करवाना चाहिये। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि इन पुस्तकों को किसी भी तरह यहां के पुस्तकालयों में पहुंचाया जाए।”

भारत से पधारे प्रो. अब्दुल सत्तार दलवी (मुम्बई) ने इस पूरे प्रोजेक्ट की बहुत तारीफ़ की और कहा कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को भी बढ़ावा मिलेगा और इस तरह के अन्य संकलन भी निकलने चाहियें।

समारोह में कीर्ति चौधरी की कहानी का पाठ बर्मिंघम निवासी कृति यू.के. की अध्यक्ष तितिक्षा शाह ने किया।

अध्यक्ष पद से बोलते हुए अचला शर्मा ने इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के लिये संपादक द्विय एवं कथा यूके को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार के संकलन साहित्य को एक अलग दृष्टि से देखने में सहायक होते हैं।

कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के संकलन विदेश में बसे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। हिन्दी और उर्दू के बीच जो दूरियां लिपि की वजह से बढ़ती जा रही हैं, अनुवाद उसे कम करने का एक महत्वपूर्ण औज़ार है। उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि जल्दी ही एक और कहानी संकलन का विमोचन नेहरू केन्द्र में होगा जिसमें ब्रिटेन के उर्दू कहानीकारों की कहानियों हिन्दी साहित्यजगत के सामने अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत की जाएंगी। उन्होंने इस आयोजन के लिये नेहरू केन्द्र को विशेष रूप से धन्यवाद किया।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, डा. कृष्ण कुमार (बर्मिंघम), डा. महेन्द्र वर्मा (यॉर्क), कैलाश बुधवार, गौतम सचदेव, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, नरेश भारतीय, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, स्वर्ण तलवाड़, रमा जोशी, सफ़िया सिद्दीक़ि, बानो अरशद, पद्मेश गुप्त, डा. श्याम मनोहर पाण्डे, चांद शर्मा, हमीदा मोइन रिज़वी (हैदराबाद, भारत), डा. ख़ूबचन्दानी (पुणे), डा. वशीमी शर्मा, डा. मुज़फ्फ़र शमीरी, डा सुरेश अवस्थी, डा जयकिशन, डा. फ़ातिमा परवीन, मोहम्मद क़ासिम दलवी भी उपस्थित थे।

- नूपुर अहूजा

Monday, June 15, 2009

तेजेन्द्र शर्मा और ज़ाकिया ज़ुबैरी ने इंदु शर्मा की याद में की एक लम्बी पद-यात्रा



लंदन
जाने माने कथाकार एवं कथा यू.के. के संस्थापक तेजेन्द्र शर्मा, उनकी पुत्री दीप्ति एवं कॉलिण्डेल क्षेत्र की लेबर पार्टी काउंसलर एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की मुखिया श्रीमती ज़कीया ज़ुबैरी ने स्वर्गीय इन्दु शर्मा की स्मृति में एक 10 किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर पूरी की। इस वॉक का आयोजन एक कैंसर चैरिटी कैंसर-किन ने किया था जो कि हैम्पस्टेड इलाक़े के रॉयल फ़्री हस्पताल से जुड़ी है।

पैदल चलते हुए ज़कीया जी, दीप्ति एवं तेजेन्द्र ने यह दूरी 2 घंटे और 10 मिनट में पूरी की और कैंसर चैरिटी के लिये 500.00 पाउण्ड इकट्ठे किये। कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के पदाधिकारी कैंसर से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ज़कीया जी हर साल ऐसे आयोजनों में अपनी मित्र अदीबा, अपनी बड़ी बहन और इंदु जी की याद में भाग लेती हैं।







Monday, May 11, 2009

भगवानदास मोरवाल को कथा (यू. के.) तथा मोहनराणा को पद्मानंद सम्मान

पन्द्रहवाँ कथा यू.के. सम्मान हाउस ऑफ़ कामन्स में

कथा (यू के) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2009 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान उपन्‍यासकार भगवान दास मोरवाल को राजकमल प्रकाशन से 2008 में प्रकाशित उपन्यास रेत पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री मोरवाल को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 09 जुलाई 2009 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी एवं नासिरा शर्मा को प्रदान किया जा चुका है।

23 जनवरी 1960 को नगीना, मेवात में जन्मे भगवान दास मोरवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की। उन्हें पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। मोरवाल के अन्य प्रकाशित उपन्यास हैं काला पहाड़ (1999) एवं बाबल तेरा देस में (2004)। इसके अलावा उनके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दिल्ली हिन्दी अकादमी के सम्मानों के अतिरिक्त मोरवाल को बहुत से अन्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएं उभर कर सामने आती हैं। उनके पात्र हिन्दू-मुस्लिम सभ्यता के गंगा जमुनी किरदार होते हैं। कंजरों की जीवन शैली पर आधारित उपन्यास रेत को लेकर उन्हें मेवात में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

वर्ष 2009 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान मोहन राणा को उनके कविता संग्रह धूप के अन्धेरे में (2008 – सूर्यास्त्र प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। मोहन राणा का जन्म 1964 में दिल्ली में हुआ. वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक हैं, आजकल ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। उनके 6 कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। भारत में साहित्य की मुख्यधारा के आलोचक उन्हें हिन्दी का महत्वपूर्ण लेखक मानते हैं। कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार - हिंदी कविता की नई पीढ़ी में मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है, क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, दिव्या माथुर, नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना,गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव और उषा वर्मा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।



सूरज प्रकाश : भारत में कथा यूके के प्रतिनिधि, email: kathaakar@gmail.com mob: 9860094402
74-A, Palmerston Road, Harrow & Wealdstone (Middx.) HA3 7RW
E-mail: kathauk@gmail.com website: www.kathauk.connect.to Mobile: 07868 738 403

Thursday, December 18, 2008

मुम्बई त्रासदी पर लंदन में हुई हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी

जिस दिमाग़ में धर्म या मज़हब रहता है वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं –काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी

लंदन |13 दिसंबर 2008| कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स द्वारा आयोजित साझा हिन्दी-उर्दू कथागोष्ठी में मेहमानों को स्वागत करते हुए कॉलिन्डेल की काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, “मुंबई की त्रासदी के बाद हमें यह ज़रूरी लगा कि हिन्दी-उर्दू की एक मिली जुली कथा-गोष्ठी करवा कर हम विश्व को संदेश दे सकते हैं कि साहित्य द्वारा दो देशों के नागरिकों में एक सहज वातावरण पैदा किया जा सकता है। मैं नहीं मानती कि आतंकवाद का कोई मज़हब होता है। दरअसल मैं तो कहूंगी जिस दिमाग़ में मज़हब या धर्म का वास होता है, वहां दहश्तग़र्दी के लिये कोई स्थान नहीं होता है।” इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनन्द कुमार जबकि अध्यक्ष थे प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल।
इस कथागोष्ठी में हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर ने अपनी महत्वपूर्ण कहानी पंगा का पाठ किया तो उर्दू का प्रतिनिधत्व किया नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां ने। इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में अन्य लोगों के अतिरिक्त शामिल हुए डा. अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीक़ी, हुमा प्राइस, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीक़ी, परिमल दयाल, रेहाना सिद्दीक़ी, डा. हमीदा, सीमा कुमार, केबीएल सक्सेना।
(सामने बैठे नजमा उसमान, ज़कीया ज़ुबैरी, दिव्या माथुर)
(खड़े हैं – तेजेन्द्र शर्मा, अचला शर्मा, प्रों.अमीन मुग़ल, सलीम अहमद ज़ुबैरी, परवेज़ आलम)


कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने सूचित किया कि यह कथा यू.के. की गोष्ठियों का दसवां साल है। दिव्या माथुर की कहानी पंगा के बारे में उन्होंने कहा कि यह सही मायने में हिन्दी की अंतर्राष्ट्रीय कहानी है। इस कहानी का विषय, निर्वाह, भाषा और बिम्ब सभी नयापन लिये हैं। कहानी का आधार लन्दन की कारों की नम्बर प्लेटें हैं। कहानी की मुख्यपात्रा एक अधेड़ सेवानिवृत भारतीय मूल की महिला है। तेजेन्द्र शर्मा ने आगे कहा कि दिव्या ने इस कहानी में जो टेक्नीक अपनाई है उसमें कहानी सुनाने से हट कर वे कहानी दिखाती हैं।
आनंद कुमार, ज़कीया ज़ुबैरी, उषा राजे सक्सेना, सफ़िया सिद्दीकी, परवेज़ आलम, परिमल दयाल, डा. हमीदा एवं ख़ुर्शीद सिद्दीकी आदि सभी एकमत थे कि कहानी चलती हुई कार की यात्रा के साथ साथ उन सभी सड़कों पर उन्हें साथ ले चलती है। पन्ना (कहानी की मुख्य पात्रा) की हर प्रतिक्रिया उन्हें सहज और सही लगती है।
डा. अचला शर्मा ने दिव्या को उनकी कहानी की भाषा, विट और विषय के चुनाव के लिये बधाई दी। अध्यक्ष प्रो. अमीन मुग़ल के अनुसार कहानी तीन स्तरों पर यात्रा करती है। पहले स्तर पर आती है कारों की नम्बर प्लेटें जिनकी कड़ियां एक कहानी बनाती चलती हैं। उसके बाद आती है पन्ना की कार की यात्रा। ये दोनों स्तर एक सीधी लाइन की तरह चलते हैं। फिर उन नम्बर प्लेटों से दिमाग़ में पैदा हुई भावनाएं, वो अपनी एक कहानी बनाती हैं। वो एक तरह सेतरंगों की तरह चलता है। मज़ेदार बात यह है कि उन तरंगों में भी एक छिपी हुई सरल रेखा चलती रहती है, जो कुछ पन्ना के साथ जो घटित होता है। उन्होंने दिव्या माथुर की कहानी को आधुनिक कहानी की एक अच्छी मिसाल बताया।
नजमा उसमान की कहानी मज्जु मियां के बारे में तेजेन्द्र शर्मा ने बताया कि यह कहानी किस्सागोई शैली की कहानी है जिसमें चरित्र के भीतर की यात्रा न दिखा कर लेखक सारा किस्सा ख़ुद अपने लफ़्जों में बयान करता है। नजमा की भाषा चुटीली थी और अदायगी प्रभावशाली।
उषा राजे सक्सेना, आनन्द कुमार, परवेज़ आलम, ख़ुर्शीद सिद्दीकी, सफ़िया सिद्दीकी, डा. हमीदा, को लगा कि कहानी में मज्जु मियां का चरित्र बहुत मज़ेदार है। कहानी की भाषा बहुत विट लिये है। ज़कीया ज़ुबैरी का कहना था कि पाकिस्तान से ब्रिटेन आये हर घर में मज्जु मियां जैसा एक न एक रिश्तेदार ज़रूर होता है।
वकील होने के नाते, हुमा प्राइस ने दोनों कहानियों को लीगल कोण से परखा। परिमल दयाल का कहना था कि पाठक को कहानी और अधिक प्रभावित कर सकती थी यदि मज्जु मियां के बारे में केवल बताया न जाता बल्कि उन्हें कुछ करते हुए दिखाया जाता। वहीं डा. अचला शर्मा को लगा कि कहानी जिस प्रभावशाली ढंग से शुरू हुई, उसे अंत तक निभाया नहीं जा सका। कहानी बहुत जल्दबाज़ी में ख़त्म कर दी गई। पाठक की प्यास बुझ नहीं पाई।
प्रो. अमीन मुग़ल ने नजमा उसमान की कहानी को और मज्जु मियां के चरित्र को मज़ेदार बताया और कहा कि नजमा जी ने अपने चरित्र के केवल एक पहलू को उजागर किया है। मज्जु मियां के चरित्र के दूसरे पहलू और अन्दरूनी भावनाओं का चित्रण नहीं किया गया। मगर कहानी मज़ेदार बन पाई है।
गोष्ठी में हिन्दी-उर्दू के रिश्तों, आधुनिक कहानी, प्रगतिशील कहानी आदि पर भी जम कर बहस हुई। अंत में तेजेन्द्र शर्मा ने नजमा उसमान एवं दिव्या माथुर को धन्यवाद देते हुए सभी मेहमानों की बारिश के मौसम में कथागोष्ठी में आने के लिये सराहना की।
मेहमानों ने जितना आनन्द कहानियों का उठाया उतना ही लुत्फ़ ज़कीया जी द्वारा सजाई गयी नाश्ते की मेज़ ने दिया। हिन्दी-उर्दु कहानी गोष्ठी के लिये त्यौहार के मौसम के अनुकूल मेज़ को क्रिसमिस के थीम से सजाया गया था। महमानों ने ज़कीया जी की मेज़बानी की खुले दिल से तारीफ़ की। कार्यक्रम के मेज़बान थे ज़कीया एवं सलीम ज़ुबैरी।

--सुरेन्द्र कुमार