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Friday, November 5, 2010

सैम हिग्गिनबॉटम इन्स्टीट्यूट का दीक्षान्त समारोह सम्पन्न

लोक सभा अध्यक्षा ने किया दूसरी हरित क्रान्ति का आवाहन

शियाट्स द्वारा नया कृषि विज्ञान केन्द्र खोलने की योजना: डा. आर.बी. लाल


कुलाधिपति डॉ. मनी जैकब लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को डोक्टरेट की उपाधि से सम्मानित करते हुए

शताब्दी समारोह के अन्तर्गत सैम हिग्गिनबॉटम इन्स्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, टेक्नोलॉजी एण्ड साइंसेस (पूर्व नामः एलाहाबाद एग्रीकल्चर डीम्ड यूनिवर्सिटी) का छठा दीक्षान्त समारोह दिनांक ३ नवंबर, २०१० को सम्पन्न हुआ। समारोह की मुख्य अतिथि श्रीमती मीरा कुमार जी, माननीया अध्यक्षा, लोक सभा, भारत सरकार थीं। समारोह में विशिष्ट अतिथि के तौर पर वुँवर रेवती रमण सिंह, सांसद, इलाहाबाद, डा. सैयद इरॉडॉस्ट, अध्यक्ष एशियान इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बैंकाक, डा. अरविन्द कुमार, उपमहानिदेशक, आईसीएआर, डा. जनक पाण्डेय, कुलपति, बिहार सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी, डा. पी.वी.जगमोहन, मण्डलायुक्त इलाहाबाद, प्रो. विलास एम. सलोखे, कुलपति काजीरंगा कृषि विश्वविद्यालय, जोरहट आसाम तथा अशोक वाजपेयी थे।

कार्यक्रम की शुरुआत बिशप इसीडोर फर्नानडीज ने प्रार्थना से की जिसके बाद कुलाधिपति डा. मनी जैकब ने विश्वविद्यालय के छठे दीक्षान्त समारोह की घोषणा की। कुलसचिव प्रो.(डा.) ए.के.ए. लॉरेन्स ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया तथा विश्वविद्यालय की उपलब्धियों को बताया। कुलपति प्रो.(डा.) राजेन्द्र बी. लाल ने विश्वविद्यालय के सौ वर्षों की सफलतम यात्रा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कृषकों की उन्नति हेतु प्रसार निदेशालय के अनतर्गत एक कृषि विज्ञान केन्द्र तथा कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से तकनीकी प्रशिक्षण तथा निदेशालय बीज एवं प्रक्षेत्र द्वारा उत्तम किस्म के बीज, किसानों को मुहैया कराये जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने ५३.६ एकड़ भूमि इलाहाबाद जनपद में जमीन क्रय कर ली है जिस पर नया कृषि विज्ञान केन्द्र शीघ्र ही खोलने की योजना है ताकि इलाहाबाद के अधिक से अधिक किसानों मदद मिल सके। इलाहाबाद के मण्डलायुक्त डा. पी.वी. जगनमोहन ने समारोह में ग्रीन स्कूल मिशन नामक योजना का आवरण मुख्य अतिथि श्रीमती मीरा कुमार जी से कराया तथा कहा कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्लोबल वार्मिंग से निपटना है। इसके अन्तर्गत समस्त स्कूलों में, प्राइमरी, जूनियर आदि के क्लास २ से ५, तथा क्लास ६ से८ के बच्चों को विद्यालय प्रांगण में एक पेड़ लगाकर उसकी देख-रेख करें ताकि बच्चों के रोने-धोने की आवाज के अलावा कोयल के गाने की आवाज भी सुनायी पड़े तथा सम्पूर्ण वातावरण हरा-भरा रह सके।

आईसीएआर के उपमहानिदेशक डा. अरविन्द कुमार ने कहा कि देश की अधिकतर आबादी ग्रामीण है जोकि आज भी पिछड़ी है। उनके विकास के लिए वैज्ञानिकों से आवाहन है कि राष्ट्रीय कृषि शिक्षा योजना द्वारा उनके विकास के लिए कार्य करें तथा मौसम परिवर्तन के खेती पर पड़ने वाले असर को नियंत्रित करने के लिए नई तकनीक विकसित करें ताकि गरीबों को भर-पेट भोजन मिल सके। उन्होंने कहा कि शियाट्स सदैव आईसीएआर के मानक पर खरा उतरा है और मेरी अपील है कि संस्थान को और अधिक वित्तीय सरकारी सहायता प्रदान की जाये ताकि कृषि विकास उच्च गति हो सके।


मुख्य अतिथि मीरा कुमार एक विद्यार्थी को स्वर्ण पदक देती हुईं

मुख्य अतिथि मीरा कुमार जी ने अपने दीक्षान्त भाषण में कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और इलाहाबाद का जीविकोपार्जन भी मुख्यत: कृषि और उससे जुड़े क्रियाकलापों पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र के विकास में सैम हिग्गिनबॉटम इन्स्टीट्यूट ने पिछले १०० वर्षों से महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संस्थान ने वैज्ञानिकों, प्रसार अधिकारियों, गांव-साथी योजना से कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय नवीनताएं लाकर, गरीबों और वंचितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान की दिशा में अमूल्य योगदान किया है, जिसकी मैं सराहना करती हूँ। उन्होंने नेहरू जी के शब्दों को बताते हुए कहा कि ‘‘कार्य में देर की जा सकती है किन्तु कृषि में नहीं।’’ उन्होंने चिन्ता जताई कि कृषि योग्य भूमि, सिंचित भूमि और कृषि विषयक ज्ञान के रहते भी ६० प्रतिशत जनसंख्या का विकास-प्रक्रिया में मात्र १९ प्रतिशत का ही योगदान है, फलत: सकल घरेलू उत्पाद में उसका जितना अंशदान होना चाहिए था, उतना सम्भव नहीं हुआ। उन्होंने कम वर्षा, बाढ़, ग्लोबल वार्मिंग, अकाल, उच्च तापमान आदि के द्वारा फसल के नष्ट होने एवं किसानों के बढ़ते ऋण पर चिन्ता जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने पिता स्व. बाबू जगजीवन राम से प्रेरणा मिलती है जिन्होंने कृषि को गम्भीरता से लेते हुए अनाज का उत्पादन बढ़ाने, नई टेक्नोलॉजी तैयार करने एवं किसानों तक पहुंचाने, देश के हर जिले में कृषि विज्ञान केन्द्र की स्थापना का कार्य किया जिससे देश में हरित क्रान्ति का अभ्युदय हुआ। उन्होंने नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों और किसानों से आग्रह किया कि वे पूरी शक्ति से इस लक्ष्य को पूरा करने में जुट जाएं। अन्त में उन्होंने दूसरी हरित क्रान्ति का आवाहन करते हुए अपने दीक्षान्त सम्बोधन को विराम दिया।
श्रीमती मीरा कुमार ने छोटे और सीमान्त तथा भूमिहीन किसानों, खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार के अतिरिक्त अवसर मुहैया कराने पर जोर दिया ताकि उनकी क्रय-शक्ति बढ़े और भोजन के लाले न पड़ें। उन्होंने तेजी से बढ़ती आबादी के लिए अनाजों की उपज द्विगुणित करने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने बताया कि भारत सरकार का सपना है कि कृषि उपज को दुगुना किया जाये जिसके लिए किसानों एवं खेतिहर मजदूरों की बेहतरी पर ध्यान देना होगा ‘‘जो खेत को जोते बोए वो खेत का मालिक होए’’ नारा देते हुए उन्होंने कहा कि इसे क्रान्ति की तरह लागू करना होगा।


इलाहाबाद के कमिश्नर मीरा कुमार को एक नया प्रोजेक्ट सौंपते हुए

मुख्य अतिथि ने कुलपति प्रो.(डा.) राजेन्द्र बी. लाल के कृषि क्षेत्र में किये गये अति विशिष्ट कार्यों को देखते हुए उपहार देकर सम्मानित किया। मुख्य अतिथि ने समारोह में प्रति कुलपति प्रो.(डा.) एस.बी. लाल द्वारा तैयार किये गये विश्वविद्यालय की शोध स्मारिका का अनावरण किया एवं उनका उत्साहवर्धन किया। कुलपति ने भी श्रीमती मीरा कुमार, डा. पी.वी. जगनमोहन, मण्डलायुक्त इलाहाबाद तथा पी.जे. सुधाकर, महानिदेशक, दूरदर्शन को मानद उपाधि देकर सम्मानित किया।

समारोह के दौरान सर्वश्रेष्ठ ६० छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक तथा २० को रजत पदक द्वारा सम्मानित किया गया। बेस्ट टीचर अवार्ड डा. जगदीश प्रसाद, डीन, एनीमल अस्बेन्डरी एण्ड वेटनरी साइंस को दिया गया। साथ ही २८ छात्र-छात्राओं को मानद उपाधि, ५४३ को परास्नातक तथा १३९१ को स्नातक की डिग्री प्रदान की गयी।

Friday, December 11, 2009

कैलाश गौतम स्मृति समारोह में कुमार विश्वास का काव्यपाठ


काव्यपाठ करते डॉ॰ कुमार विश्वास
इलाहाबाद।

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है।।
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है।
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है।।



इन पंक्तियों से काव्यजगत और कविसम्मेलनी मंचों पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर लोकप्रियता के नये रिकार्ड कायम करने वाले युवा कवि और गीतकार डॉ. कुमार विश्वास ने जब खचाखच भरे एकेडेमी सभागार में माइक सम्हाला तो वातावरण मिश्रित भावों से भर उठा था। एक तरफ़ स्व.कैलाश गौतम की पुण्य तिथि के अवसर पर सहज ही उतर आयी उदासी का भाव सबके मन में बैठा हुआ था तो दूसरी ओर कैलाश जी की लिखी कविताओं के अनेक उद्धरण पूर्व वक्ताओं से सुनकर सभी श्रोता उनके विलक्षण कवित्व से आह्लादित भी थे।

कुमार विश्वास ने गौतम जी को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक सच्चे और साहसी कवि थे। समाज की विडम्बनाओं को जिस हिम्मत और ताकत से व्यक्त करते थे वैसा बिरले लोगों में ही मिलता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कैलाश जी काव्यजगत में हमेशा अण्डरएस्टिमेटेड रहे।

अपनी कविताओं में उन्होंने आदमी की आम संवेदनाओं के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। उनकी रूमानी कविताओं ने विशेषकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने अपने अनेक प्रसिद्ध मुक्तक सुनाकार खूब तालियाँ बटोरी।

1.
बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेडे सह नही पाया
हवाऒं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नही पायी कभी मै कह नही पाया

2.
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है
एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन

3.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ


4.
पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या
जो दिल हारा हुआ हो उस पर फिर अधिकार करना क्या
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कश्मकश मे है
हो गर मालूम गहराई तो दरिया पार करना क्या


5.
समन्दर पीर का अन्दर है लेकिन रो नही सकता
ये आँसू प्यार का मोती है इसको खो नही सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नही पाया वो तेरा हो नही सकता



उन्होंने अपनी चुटीली व्यंग्योक्तियों से मीडिया और चैनलों पर प्रहार किया और कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि कैलाश गौतम एक बड़े कवि हैं क्योंकि वे जिम्मेदारियों के बोध के कवि हैं। उन्होंने ग्लोबल विलेज की बात करते हुए कहा कि भारत में उपनिषदों में ग्लोबल विलेज की बात ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में बहुत पहले ही कही गयी है। उन्होंने अपने वक्तव्यों के माध्यम से समाज में फैली विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने देशभक्ति के जज्बे को प्रदर्शित करते हुए गीत पढ़ा-

शौहरत न अता करना मौला, दौलत न अता करना मौला।
बस इतना अता कना चाहें, जन्नत न अता करना मौला।।
शम्ए वतन की लौ पर, जब कुर्बान पतंगा हो।
होठो पर गंगा हो हाथों पर तिरंगा हो।


उन्होंने अपनी लम्बी कविता ‘पगली लड़की’ के कुछ अंश भी सुनाए जो बहुत सराहे गये।

अमावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है।


इससे पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ माता सरस्वती एवं स्व० श्री कैलाश गौतम जी के चित्रों पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ श्री रामकेवल जी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ० शिव गोपाल मिश्र, डॉ० कुमार विश्वास ने किया। इस अवसर पर सुधांशु उपाध्याय, प्रदीप कुमार, यश मालवीय एवं कैलाश गौतम जी के मित्र एवं सहयोगियों ने कैलाश गौतम जी के चित्र पर पुष्प अर्पित करके भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

एकेडेमी के सचिव राम केवल जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि स्व० कैलाश गौतम जी की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम एक बहुत ही छोटा सा प्रयास है जिसके माध्यम से गौतम जी को स्मरण किया जा रहा है। एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने शाल भेंट कर आमंत्रित कवि डा० कुमार विश्वास का स्वागत किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिलाधिकारी श्री संजय प्रसाद (आई०ए०एस०) ने कहा कि स्व० श्री कैलाश गौतम जी को मंच के माध्यम से मैं श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। हमारे समाज में जो साम्प्रदायिक जहर है उनके प्रति कवि की संवेदना मात्र रचना नहीं है। कवि की वाणी में लेखनी में हर वर्ग के लिए कोई सन्देश होता है। रचनाएं शक्ति प्रदान करती है। आदमी दुविधा में हो तो वह सही मार्ग प्रदर्शित करती है। इस शहर ने बड़े नामचीन कवियों, साहित्यकारों को जन्म दिया है। यहां के चप्पे-चप्पे में इतिहास है। सही मायने में गौतम जी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उनके बताये मार्ग पर चलने का प्रयास करें। हर नागरिक की एक जिम्मेदारी होती है, उसे निभाये तो सपनों के भारत को साकार कर सकता है।

इस अवसर पर शहर के प्रतिष्ठत और लोकप्रिय गीतकार यश मालवीय ने स्व० कैलाश गौतम को याद करते हुए कहा कि मैं कैलाश गौतम जी के जाने के पश्चात उनको लिखी हुई एक चिट्ठी सुनाता हूं। इस चिट्ठी में मालवीय जी ने कैलाश गौतम की स्मृतियों को मार्मिक ढंग से याद करते हुए कहा कि "तुम गंगा के देवव्रत थे, तुम यमुना के बंधु जैसे थे, तुममें संस्कृतियों का संगम लहराता था। तुम झूंसी से अरैल, अरैल से किले तक शरद की धूप और चांदनी आत्मा में उतरने देते थे, कहते थे- "याद तुम्हारी मेरे संग वैसे ही रहती है, जैसे कोई नदी किले से सटके बहती है।" साथ ही यश मालवीय जी ने गौतम जी की स्मृति में एक कविता भी प्रस्तुत की।

माध्यमिक शिक्षा परिषद के अपर सचिव श्री प्रदीप कुमार जी ने कहा कि मैं गाजीपुर में था जब समाचार पत्रों में पढ़ा कि कैलाश गौतम जी नहीं रहे। सुनते ही उनकी कविता अमौसा का मेला आंखों के सामने आ गयी ऐसा लगा मानो अमौसा के मेले में सब खो गया। कैलाश गौतम देह से शहर में रहे पर मन गांव में था। कैलाश गौतम के काव्य में ग्रामीण जीवन की विसंगतियां आंखों के समक्ष आ जाती थीं वह निश्चित रूप से अतुलनीय थे।


उपस्थित श्रोतागण

श्लेष गौतम ने अपने पिता श्री कैलाश गौतम को गीतात्मक शब्दों में श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनके गीत के बोल थे -
सूरज डूबा चांद छिपा, तारे भी टूट गये।
नेह का बन्धन बना रहा पर देह के छूट गये

उनके दूसरे गीत के बोल थे
हुआ न कोई न होई होगा पिता तुम्हारे बाद,
पल पल तुमको याद कर रहा आज इलाहाबाद।।


कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ० शिवगोपाल मिश्र ने कहा कि मैं कैलाश गौतम को बहुत पहले से जानता हूं। मैं उनकी ग्रामीण पृष्ठभूमि की कविताओं को पसन्द करता हूं। जो कवि जनता के बीच से आयेगा उसे शासन-प्रशासन से डर नहीं लगेगा। हमारे नये कवि कई विधाओं में काम कर रहे हैं। आज सभागार की भीड़ को देखकर प्रसन्नता हो रही कि लोग कवि गोष्ठियों में शामिल हो रहे हैं और नये लोगों को सम्मानित कर रहे हैं।


कार्यक्रम का संचालन इमरान प्रतापगढ़ी ने कैलाश गौतम से जुड़ी भावविभोर कर देने वाली यादों को स्मरण करते हुए किया। वह बीच-बीच में कैलाश गौतम से जुड़े संस्मरणों से गौतम जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए एक कविता प्रस्तुत की-

सूनी सूनी दीवारे सूना सूना ये घर है,
है उदास तारीखें और चुप कलेण्डर है।
मैंने खुद से जब पूंछा क्यों उदास मंजर है
तो दिल ये चीख कर बोला, आज नौ दिसम्बर है।


कार्यक्रम के अन्त में एकेडेमी के कोषाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

Wednesday, October 14, 2009

दिनेश कुमार शुक्ल को ललमुनिया की दुनिया के लिए वर्ष 2008 का केदार सम्मान


((विवरण-पत्र को पूरा देखने के लिए उपर्युक्त चित्र पर क्लिक करें))

प्रगतिशील हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिया जानेवाला " केदार सम्मान" ( 2008 ) 22-23 अगस्त 2009 को इलाहाबाद में संपन्न भव्य कार्यक्रम में समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संकलन "ललमुनिया की दुनिया" के लिए, प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के हाथों प्रदान किया गया।

"केदार व्याख्यानमाला" में सम्बोधित करते हुए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने केदार जी के व्यक्तित्व पर बोलते हुए कहा कि केदार नैसर्गिक सौन्दर्य के विश्वजनीय कवि हैं। "जवान होकर गुलाब / गा रहा है फाग" जैसी संश्लिष्ट बिम्ब की कविता हिन्दी, अंग्रेज़ी में कहीं नहीं। एन्द्रिकता केदार की कविता का बड़ा गुण है। कविता की दुनिया में केदार ने एक नई नैतिकता की नींव रखी। केदार, मनुष्य और प्रकृति जहाँ संयुक्त रूप से मिलते हैं, वहाँ के कवि हैं। नदी ,पहाड़ आदि के बहाने, अपनी धरती के बहाने, केदार दबी हुई जनता की बात बोलते हैं। अपने व्याख्यान में डॉ.नामवर सिंह ने केदार की अनेक कविताओं का उल्लेख किया। इस व्याख्यानमाला के सत्र का संचालन महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय विस्तार केन्द्र (इलाहाबाद) के निदेशक सन्तोष भदौरिया ने क्षेत्रीय परिसर के सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में किया। इस अवसर पर वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय विशेष रूप से उपस्थित रहे। उपस्थितों में मार्कण्डेय सिंह, दिनेश कुमार शुक्ल, प्रो. फ़ातमी, अजीत पुष्कल, अनुपम आनन्द, रामजी राय, प्रणय कृष्ण, नरेन्द्र पुण्डरीक, श्रीप्रकाश मिश्र, जयप्रकाश धूमकेतु, प्रकाश त्रिपाठी, नीलम राय, सूर्यनारायण सिंह, मुश्ताक अली, विनोद कुमार शुक्ल, महेन्द्रपाल जैन, हरिश्चन्द्र पाण्डेय, विभूति मिश्र, चन्द्रपाल कश्यप, लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी आदि के नाम उल्लेनीय हैं।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में समकालीन हिन्दी कविता का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण सम्मान "केदार सम्मान-2008" समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संग्रह "ललमुनिया की दुनिया" के लिए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह एवम् कुलपति बी.एन.राय के हाथों प्रदान किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत सुधीर कुमार सिंह द्वारा किया गया। दिनेशकुमार शुक्ल की कविताओं पर बोलते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ इस भूमंडलीय समय पर एक बहुत बड़ा हस्तक्षेप करती हैं। इनका यह हस्तक्षेप भाव और सम्वेदना के स्तर पर सीमित न रह कर विचार के स्तर पर पहुँच कर पाठक को झकझोरता है। इस अवसर पर सम्मानित कवि दिनेश कुमार ने अपने वक्तव्य में बाँदा में कवि केदारनाथ अग्रवाल के अपने सान्निध्य के दिनों का स्मरण किया, बाँदा की धरती को याद किया, नदी, पहाड़, खेती और किसानों को याद किया।

इस अवसर पर रामजी राय ने अपने वक्तव्य में कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल बड़े कवि हैं, इनकी कविताएँ बाज़ारवाद से उत्पन्न त्रासदियों के विरुद्ध हर कहीं खड़ी दिखाई देती हैं। विषय के वैविध्य के साथ शिल्प के स्तर पर भी इनकी कविताएँ चमत्कृत करती हैं।

अवसर पर अपने वक्तव्य में डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल वास्तव में समकालीन हिन्दी कविता के बड़े कवि हैं। बाज़ारवाद के महासमुद्र में फँसी डूबती दुनिया के लिए गहन अंधेरे में प्रकाश स्तम्भ की तरह हैं। दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ केदार जी की परम्परा की कविताएँ हैं। वाकई वह इस सम्मान के सही अधिकारी ठहरते हैं।

कार्यक्रम के अन्त में दिनेश कुमार शुक्ल ने अपनी कविताओं का बहुत प्रभावी पाठ किया, जिसे सुनकर श्रोताओं को निराला और शिवमंगल सिंह सुमन के प्रभावी अद्भुत काव्यपाठों की स्मृति हो आई।

"केदार सम्मान" - सत्र का संचालन ‘बहुवचन’ के सह सम्पादक प्रकाश त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश ने किया।

--नरेन्द्र पुण्डरीक,
सचिव,
केदार शोधपीठ न्यास

Thursday, September 24, 2009

आज की मुद्राएँ धर्मनिरपेक्ष हैं- प्रो.सीताराम दूबे

इलाहाबाद, 20 सितम्बर। मुद्रा एक ऐसी चीज है जो किसी भी देश की प्राचीन संस्कृति व परम्परा की द्योतक होती है लेकिन आज की मुद्रा धर्मनिरपेक्ष है। ये बातें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के प्रो सीताराम दूबे ने आज सायं इलाहाबाद संग्रहालय में आयोजित ‘मुद्राओं का सांस्कृतिक पक्ष’ विषयक संगोष्ठी में कही।

प्रो॰. दुबे ने कहा कि ऋग्वैदिक काल में मुद्रा के जगह वस्तु-विनिमय का प्रचलन था जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान कर काम चलाते थे। सिक्कों का प्रचलन उत्तरवैदिक काल से शुरु होता है। भारत में सर्वप्रथम सिक्कों का प्रचलन यवन शासकों ने किया। इनसे मिलकर हिन्दी यूनानी ने स्वर्ण सिक्कों को प्रचलन में लाया। उन्होंने कहा कि शक, हूण, मौर्य आदि शासकों के शासन काल में मुद्रा पर उस शासक के राज्य की संस्कृति, परम्परा, मूर्तियों की आकृति, चिह्न, परिधान, आदि सिक्के पर बने होते थे। उन्होंने कहा कि गुप्त काल के प्रचलित सिक्कों में समुन्द्रगुप्त को वीणा वादन करते हुए दिखाया गया जिससे पता चलता है कि वह संगीत प्रेमी था। लेकिन आज चलन में जो मुद्रा है उसे देश की संस्कृति व परम्परा से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के सिक्कों का प्रचलन मुगल काल तक रहा।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. जयनारायण पाण्डेय, इविवि तथा संचालन डा. प्रभाकर पाण्डेय ने किया। इस मौके पर डा. एस. के. शर्मा सहित अन्य बुद्धिजीवि लोग उपस्थित थे।

रिपोर्ट- संदीप कुमार श्रीवास्तव

Sunday, September 20, 2009

वैश्वीकरण के कारण कला बनी बाजार की वस्तु - प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण

इलाहाबाद, 19 सितम्बर। वैश्वीकरण व बाजारवाद के कारण चित्रकला आज बाजार की वस्तु बन गयी। चित्रों को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। शब्दों व चित्रों को एक साथ बांधकर प्रो. रामचन्द्र शुक्ल ने एक अनोखा काम किया है। ये बातें टोक्यो यूनीवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज के प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला भवन में आयोजित सरस्वती स्मृति सम्मान एवं वार्षिक समारोह में प्रो. रामचन्द्र शुक्ल के अतः प्रज्ञात्मक चित्रो की प्रदर्शनी के उद्‍घाटन के बाद कही।

प्रो. ऋतुपर्ण ने कहा कि कला का कोई भी क्षण ऐसा नहीं होता जो जीवन में घटित न हो। प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर कला होती है। बस आवश्यकता है उसे पहचानने व साधने की। उन्होंने कहा कि कला आनन्द की वस्तु है न कि बेचने की लेकिन आज के कलाकारों ने अपने कृतिरुपी चित्रकला को अपने जीवका का साधन मात्र बना दिया है। उन्होंने कहा कि भारत ही एक ऐसा देश जहां के कलाकारों ने पहाड़ियों एवं गुफाओं में भी अपने कलाकृतियों की एक अनूठी छटा बिखेरी है। लेकिन आज के कलाकारों को लगता है कि कला पश्चिमी देशों की देन है जो उनकी गलतफहमी है।

इस मौके पर प्रो. रामचन्द्र शुक्ल ने कहा कि साहित्य का मतलब सिर्फ कविता, कहानी व उपन्यास की रचना करना ही नही है बल्कि चित्रकला भी उसी का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि कला लोककलाओं की चीज है इसलिए हमने सबसे पहले लोककलाओं का अध्ययन किया और उसके मूल तत्व को लेकर अपने अतः प्रज्ञात्मक चित्रों में समाहित किया। उन्होंने अपनी कृति अतः प्रज्ञात्मक शैली के बारे में कहा कि इस शैली का विदेशों से कोई लेना देना नहीं है।

प्रो. रामचन्द्र शुक्ल के 85 वर्ष के होने पर उनके द्वारा निर्मित कुल 85 कलाकृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। इस मौके पर उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘आधुनिक चित्रकला व पश्चिमी आधुनिक चित्रकार’’का लोकापर्ण हुआ तथा उन्हें सरस्वती स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।

रिपोर्ट- संदीप कुमार श्रीवास्तव

Monday, February 9, 2009

हिन्दुस्तानी एकेडेमी का साहित्यकार सम्मान समारोह आयोजित

कविता वाचक्नवी की शोधकृति का लोकार्पण संपन्न

इलाहाबाद, 4 फ़रवरी 2009 । (प्रेस विज्ञप्ति)।
"साहित्य से दिन-ब-दिन लोग विमुख होते जा रहे हैं। अध्यापक व छात्र, दोनों में लेखनी से लगाव कम हो रहा है। नए-नए शोधकार्यों के लिए सहित्य जगत् में व्याप्त यह स्थिति अत्यन्त चिन्ताजनक है।" उक्त विचार उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मन्त्री डॉ. राकेश धर त्रिपाठी ने हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा आयोजित सम्मान व लोकार्पण समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। उत्तर प्रदेश भाषा विभाग द्वारा संचालित हिन्दी व उर्दू भाषा के संवर्धन हेतु सन् 1927 में स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी की श्रेष्ठ पुस्तकों के प्रकाशन की शृंखला में इस अवसर पर अन्य पुस्तकों के साथ एकेडेमी द्वारा प्रकाशित डॊ. कविता वाचक्नवी की शोधकृति "समाज-भाषा विज्ञान: रंग-शब्दावली: निराला-काव्य" को लोकार्पित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि यह पुस्तक अत्यन्त चुनौतीपूर्ण विषय पर केन्द्रित तथा शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक है। इस अवसर पर एकेडेमी के सचिव डॉ. सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय द्वारा सम्पादित 'सूर्य विमर्श' तथा एकेडेमी द्वारा वर्ष १९३३ ई. में प्रकाशित की गयी पुस्तक 'भारतीय चित्रकला' का द्वितीय संस्करण (पुनर्मुद्रण) भी लोकार्पित किया गया। किन्तु जिस पुस्तक ने एकेडेमी के प्रकाशन इतिहास में एक मील का पत्थर बनकर सबको अचम्भित कर दिया है वह है डॉ. कविता वाचक्नवी द्वारा एक शोध-प्रबन्ध के रूप में अत्यन्त परिश्रम से तैयार की गयी कृति "समाज-भाषाविज्ञान : रंग-शब्दावली : निराला-काव्य"। इस सामग्री को पुस्तक का आकार देने के सम्बन्ध में एक माह पूर्व तक किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। स्वयं लेखिका के मन में भी ऐसा विचार नहीं आया था। लेकिन एकेडेमी के सचिव ने संयोगवश इस प्रकार की दुर्लभ और अद्‌भुत सामग्री देखते ही इसके पुस्तक के रूप में प्रकाशन का प्रस्ताव रखा जिसे सकुचाते हुए ही सही इस विदुषी लेखिका द्वारा स्वीकार करना पड़ा। कदाचित्‌ संकोच इसलिए था कि दोनो का एक-दूसरे से परिचय मुश्किल से दस-पन्द्रह मिनट पहले ही हुआ था। यह नितान्त औपचारिक मुलाकात अचानक एक मिशन में बदल गयी और देखते ही देखते मात्र पन्द्रह दिनों के भीतर न सिर्फ़ बेहद आकर्षक रूप-रंग में पुस्तक का मुद्रण करा लिया गया अपितु एक गरिमापूर्ण समारोह में इसका लोकार्पण भी कर दिया गया। रंग शब्दों को लेकर हिन्दी में अपनी तरह का यह पहला शोधकार्य है। इसके साथ ही साथ महाप्राण निराला के कालजयी काव्य का रंगशब्दों के आलोक में किया गया समाज-भाषावैज्ञानिक अध्ययन भावी शोधार्थियों के लिए एक नया क्षितिज खोलता है। निश्चय ही यह पुस्तक हिदी साहित्य के अध्येताओं के लिए नयी विचारभूमि उपलब्ध कराएगी।

इस समारोह में एकेडेमी की ओर से हिन्दी, संस्कृत एवम उर्दू के दस लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों प्रो. चण्डिकाप्रसाद शुक्ल, डॉ. मोहन अवस्थी, प्रो. मृदुला त्रिपाठी, डॉ. विभुराम मिश्र, डॉ. किशोरी लाल, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर को सम्मानित भी किया गया। यद्यपि इनमें से डॉ. दूधनाथ सिंह, डॉ. राजलक्ष्मी वर्मा, डॉ. अली अहमद फ़ातमी और श्री एम.ए.कदीर अलग-अलग व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, तथापि सभागार में उपस्थित विशाल विद्वत्‌ समाज के बीच छः विद्वानों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए शाल, नारियल व सरस्वती की अष्टधातु की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किए गए। एकेडेमी द्वारा अन्य अनुपस्थित विद्वानों के निवास स्थान पर जाकर उन्हें सम्मान-भेंट व प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर दिया जाएगा।

सम्मान स्वीकार करते हुए अपने आभार प्रदर्शन में डॉ. कविता वाचक्नवी ने कहा कि इस लिप्सापूर्ण समय में कृति की गुणवता के आधार पर प्रकाशन का निर्णय लेना और रचनाकार को सम्मानित करना हिन्दुस्तानी एकेडेमी की समृद्ध परम्परा का प्रमाण है, जिसके लिए संस्था व गुणग्राही पदाधिकारी निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं।

आरम्भ में हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव डॉ. एस. के. पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि वे स्वयं संस्कृत के विद्वान हैं, उनके कार्यकाल में एकेडेमी का सारस्वत कायाकल्प हो गया है। इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त ने सरस्वती दीप प्रज्वलित किया और सौदामिनी संस्कृत विद्यालय के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण प्रस्तुत किया। एकेडेमी के ही अधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने खचाखच भरे सभागार में उपस्थित गण्यमान्य साहित्यप्रेमियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।*

- सचिव,
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
इलाहाबाद