Wednesday, November 25, 2009

26-11 पर भुवेन्द्र त्यागी की दो पुस्तकों 'दहशत के साठ घंटे' और 'आंखों देखी' का मुम्बई में लोकार्पण

राम प्रधान कमेटी ने 26/ 11 के हमलों की अधूरी जांच की: वाई पी सिंह


भुवेन्द्र त्यागी, वाई. पी. सिंह, आभा सिंह, विश्वनाथ सचदेव, शचीन्द्र त्रिपाठी

26 नवम्बर, 2008 के आतंकी हमले के बाद जिस राम प्रधान कमेटी का गठन किया गया था, उसने बुलेट प्रूफ जैकेट मामले में कोई जांच नहीं की। मुम्बई पुलिस का एक आला अफसर शहीद होता है और उसके शरीर से गोली लगी बुलेटप्रूफ जैकेट उतार ली जाती है। इसकी जांच करने के लिए एक कमेटी गठित होती है और वह मामले को दरकिनार कर देती है। सरकारें हमेशा से लोगों को झांसा देती हैं। जिस राज्य के पुलिस महानिदेशक को हाईकोर्ट गैर-कानूनी तरीके से पद पर बने रहने के आरोप में पदच्युत करती है, उस राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की क्या चर्चा करें?

ये ज्वलंत मुद्दे उठाये पूर्व आईपीएस अफसर वाई. पी. सिंह ने। वे मुम्बई के के. सी. कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के ऑडिटोरियम में 'नवभारत टाइम्स’ के मुख्य उपसंपादक भुवेन्द्र त्यागी की दो पुस्तकों 'दहशत के साठ घंटे' और 'आंखों देखी' के विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। ये दोनों किताबें 26-11 पर ही लिखी गयी हैं।


इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इंडियन पोस्टल सर्विस की वरिष्ठ अधिकारी और लीड इंडिया कांटेस्ट की फाइनलिस्ट आभा सिंह ने कहा कि साठ घंटे तक चले आतंक के इस कृत्य के पीछे व्यवस्था में कहीं न कहीं अव्यवस्था छिपी है। उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि ताकतवर सरकारी तंत्र ऐसे हालात में इतना असहाय क्यों नजर आता है।

लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए 'नवभारत टाइम्स' के संपादक शचीन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारों को आम होते हुए भी खास बनना पड़ता है। उन्हें जरूरत होती है आम आदमी से एक कदम आगे बढ़कर सोचने की। समारोह के अध्यक्ष 'नवनीत' के संपादक वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने नवोदित पत्रकारों का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि'आंखों देखी' में तो 15 पत्रकारों का काम है, कौन जाने अभी 15 हजार पत्रकार इस तरह का काम कर रहे होंगे। उन्होंने कहा कि हाल के चुनाव में मीडिया ने रिपोर्टिंग की बहुत घृणित मिसाल पेश की है, लेकिन इस किताब में 15 पत्रकारों के 26-11 के ओजस्वी अनुभव पढ़कर लगता है कि पत्रकारिता का भविष्य आशाजनक है।


समारोह का संचालन वरिष्ठ गजलकार और फिल्म गीतकार देवमणि पांडेय ने किया। समारोह में ‘ आंखों देखी’ किताब में शामिल हिन्दी, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 15 पत्रकारों में से अधिकांश पत्रकार उपस्थित थे । ख़तरों से खेलने वाले इन पत्रकारों का स्वागत प्रशिक्षार्थी पत्रकार जितेंद्र दीक्षित और आकांक्षा सिंह ने किया ।

सौम्य प्रकाशन की निदेशक रीना त्यागी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सौम्य प्रकाशन मीडियाकारों की पुस्तकें ही प्रकाशित करेगा। जिन मीडियाकारों के पास अच्छे विषयों पर स्क्रिप्ट है, वे अपना परिचय और स्क्रिप्ट की सिनॉप्सिस ई-मेल से भेज सकते हैं-

saumyaprk@gmail.com

दहशत के 60 घंटे

इस किताब में भुवेन्द्र त्यागी ने 26-11 के आतंकी हमले की पूरी दास्तान 14 अध्यायों सबसे बड़ा हमला, सीएसटी और कामा पर कहर, दो टैक्सियों के धमाके, ताज की त्रासदी, ट्राइडेंट की टीस, नरीमन हाउस के जख्म, आंखों में आंसू और सीने में गम, फिर गर्व से सिर उठाया, गौरवशाली अतीत, शौर्य को सलाम, जो शहीद हुए, कहर का सफर, कहां हुई चूक तथा बाद में जो हुआ में कही है। इसमें 29 अगस्त, 2009 तक का घटनाक्रम है।

आंखों देखी

इस किताब में हिन्दी, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के 15 पत्रकारों के 26-11 के कवरेज की आंखों देखी है। प्रस्तावना संजय सिंह (रेजिडेंड एडिटर न्यूज एक्स) ने लिखी है। जिन 15 पत्रकारों के अनुभवों को भुवेन्द्र त्यागी ने संपादित किया है, वे हैं-
मृत्युंजर बोस व प्रशांत सावंत (सकाल टाइम्स), रेशमा शिवडेकर (महाराष्ट्र टाइम्स), सुनील मेहरोत्रा (नवभारत टाइम्स), श्रीराम वेर्णेकर व उमा कदम (टाइम्स ऑफ इंडिया), जयप्रकाश सिंह व ललित छाजेड (आईबीएन 7), सचिन चौधरी (इंडिया टीवी), सरोजिनी श्रीहर्ष (सहारा समय), सुबोध मिश्रा (स्टार न्यूज), विवेक कुमार भट्ट व राजू इनामदार (आज तक) और विद्या मिश्रा (हैडलाइंस टुडे)।

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3 पाठकों का कहना है :

श्याम सखा 'श्याम' का कहना है कि -

इस पर तो कुछ नहीं कहना मुझे

Sumita का कहना है कि -

भुवेन्द्र त्यागी जी को २६/११ पर लिखी पुस्तक के लिए बहुत-बहुत बधाई! यह पुस्तक हमारे जांबाज शहीदों के लिए एक सच्ची श्रधांजली है। आज पूरे एक वर्ष हो गये हैं अब तक कसाब को फ़ांसी नही हो पाई। पुलिस अफ़सर हेमन्त करकरे की बुलेट प्रूफ़ जैकेट का लापता होना भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। अब आतंकवाद को हम नहीं सहेंगे। हमारे शहीदों को नमन करते हुए उनको मेरी श्र्द्धांजली।
हौंसले हैं अभी बुलंद अब भी जिंदा हैं। कट गये पर तो क्या दुनिया वालों फ़िर भी उड्ने की जिद में हर कोई परिंदा है।
चुकाई हमने जो कीमत है चुप रहने की। बात अब और नहीं अपने बस में रहने की।
वीर हूं हिंद का बाशिंदा हूं। मरके भी मेरी लौ सुलगती रहे।
बच्चे-बच्चे में अब तो जिंदा हूं...

Manju Gupta का कहना है कि -

लेखक भुवेन्द्र त्यागी जी को पुस्तकों
के लोकापर्ण के लिए हार्दिक बधाई .जिन्होंने आतंकियों की ख़ूनी
गोलियों का सच ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया .

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