Wednesday, December 29, 2010

रमा द्विवेदी को चतुर्थ साहित्य गरिमा पुरस्कार



साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति एवं कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक २५ दिसंबर २०१० को नरेंद्र भवन में चतुर्थ गरिमा पुरस्कार समारोह-२००९ एवं पुष्पक -१६ का लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आई. पी. ई. उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के निदेशक प्रो. राम कुमार मिश्र, स्वतंत्र वार्ता के संपादक डा. राधेश्याम शुक्ल ( अध्यक्ष ) समाज सेवी राम गोपाल गोयनका, आर्य प्रतिनिधि सभा आंध्र प्रदेश के प्रधान विथ्थल राव, भाग्य नगर कावड़ सेवा संघ के अध्यक्ष माँगी राम तायल, प्रो. शुभदा वांजपे ने बतौर विशेष अतिथि भाग लिया। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा एवं संस्थापक अध्यक्ष डा. अहिल्या मिश्र मंचासीन थे। सुधा गंगोली की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम आरंभ हुआ। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन के बाद डा. अहिल्या मिश्र ने कहा कि महिला लेखिकाओं को साहित्य लेखन में दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ने में संबल प्रदान करना ही उनका उद्देश्य रहा है। डा. मदन देवी पोकरना ने अतिथियों का परिचय दिया। प्रथम साहित्य गरिमा पुरस्कार ग्रहीता पवित्रा अग्रवाल ने संस्था का परिचय व विवरण प्रस्तुत किया। कार्यकारी कार्यदर्शी डा. सीता मिश्र ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया तत्पश्चात नगर की विख्यात कवयित्री डा. रमा द्विवेदी का अथितियो द्वारा ग्यारह हजार रूपए की राशि, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर चतुर्थ गरिमा पुरस्कार से सम्मानित किया। इस आयोजन में पुष्पक-१६ का लोकार्पण अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। महिला कालेज की विभागाध्यक्ष प्रो. शुभदा वांजपे ने पुष्पक का परिचय देते हुए कहा कि यह स्तरीय एवं संग्रहनीय पत्रिका है।



पुरस्कार ग्रहीता डा. रमा द्विवेदी ने अपने भावपूर्ण वक्तव्य में कहा कि उन्हें सम्मान मिला है तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ गई है। किसी महिला द्वारा महिलाओं के लिए पुरस्कार की स्थापना दुर्लभ कार्य है। महत्व नींव का होता है, बीज का होता है, बाद में तो लोग जुड़ जाते है। इस पुरस्कार में पांडुलिपि पर भी विचार होता है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने महिला रचनाकारो को संबोधित करते हुए कहा कि महिलाए अपने लेखन के प्रति उदासीन न हो, निरंतर लिखें, संवेदनपूर्ण लिखें लेकिन पुरस्कार की ही कामना से न लिखें। डा. राम कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि अर्थ का अपना महत्व है और साहित्य रचयिता को भी अर्थ का आधार मिलना चाहिए उन्होंने ने आगे कहा कि उन्नत समाज के निर्माणार्थ आर्थिक क्षेत्र और साहित्यिक क्षेत्र का समागम नितांत आवश्यक है। डा. राधेश्याम शुक्ल ने अपनी अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि स्त्री चाहे किसी भी क्षेत्र हो वह भारतीय परम्परा में पूजनीय रही है। महिलाएं लेखन के क्षेत्र में और अधिक सक्रियता से आगे आ रही है। उन्होंने कहा स्रुजनशीलता महिलाओं का प्राकृतिक गुण है। उन्होंने कहा कि लेखकों का मनोबल बढाने के लिए समाज के समर्थ वर्ग को तन-मन-धन से सहयोग देना चाहिए ताकि लेखन की दशा एवं दिशा अधिक बेहतर हो सके। सभी सम्मानीय अतिथियों ने अपने-अपने विचार रखे। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा ने आगे भी सहयोग देने का आश्वासन दिया। लक्ष्मी नारायण अग्रवाल व सरिता सुराना ने संचालन किया जबकि मीना मुथा ने धन्यवाद दिया। इस अवसर पर नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भटटड, वीर प्रकाश लाहोटी सावन, बिंदु जी महाराज, तेजराज जैन, सुषमा बैद, शान्ति अग्रवाल, आ.सी.शर्मा, प्रो. एम रामलू, एन जगननाथम्, अलका चौधरी, विजय लक्ष्मी काबरा, अंजू बैद, डा. गोरखनाथ तिवारी, मुनीन्द्र मिश्र, भगवान दास जोपट, नीरज त्रिपाठी, भंवर लाल उपाध्याय, सुनीता मुथा, उमा सोनी, सावरी कर, डा. हेमराज मीना, डा. कारन उटवाल, वी. वरलक्ष्मी, सुरेश जैन, डॉ. एस.एल. द्विवेदी, एस.एन. राव, संपत मुरारका, राजकुमार गुप्ता आदि उपस्थित थे।



प्रस्तुति: डा. सीता मिश्र- कार्यकारी कार्यदर्शी

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3 पाठकों का कहना है :

shanno का कहना है कि -

इस चतुर्थ गरिमा पुरूस्कार के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा. रमा जी को बहुत-बहुत बधाई व शुभ कामनायें.

Rama का कहना है कि -

बहुत-बहुत हार्दिक आभार शन्नो जी । आपको व आपके परिवार के लिए नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ ...

Rama का कहना है कि -

बहुत-बहुत हार्दिक आभार शन्नो जी । आपको व आपके परिवार के लिए नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ ...

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