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Tuesday, November 22, 2011

महिला लेखन हेतु पंचम साहित्य गरिमा पुरस्कार के लिए प्रविष्ठियां आमंत्रित

'साहित्य गरिमा पुरस्कार' दक्षिण प्रान्तों के महिला लेखन को प्रोत्साहित एवं प्रतिष्ठित करने का एक व्यापक चिंतन है। इस पुरस्कार का शुभारंभ y2k में हुआ| साहित्य की विधाओं पर महिला लेखन को यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया। इस पुरस्कार के लिए ग्यारह हजार रूपए की धनराशि, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न दिया जाता है।
प्रथम साहित्य पुरस्कार-2000, वरिष्ठ कथाकार श्रीमती पवित्र अग्रवाल को उनके कहानी संग्रह `पहला कदम' पर दिया गया। द्वितीय साहित्य गरिमा पुरस्कार- 2003 , हैदराबाद की सशक्त हस्ताक्षर स्व.डा. प्रतिभा गर्ग को उनके काव्य संग्रह `सुधा कृति' पर प्रदान किया गया। तृतीय साहित्य गरिमा पुरस्कार-2007, वरिष्ठ लेखिका डा. गुणमाला सोमाणी को उनके ललित निबंध की पुस्तक `ललित निबंध माला' पर प्रदान किया गया। चतुर्थ साहित्य गरिमा पुरस्कार-2009 , वरिष्ठ कवयित्री डा. रमा द्विवेदी को उनके काव्य संग्रह `दे दो आकाश' पर प्रदान किया गया। पंचम साहित्य गरिमा पुरस्कार- 2010, दक्षिण प्रांतो की (आन्ध्र प्रदेश), कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडू एवम केरल) की लेखिकाओ द्वारा रचित कहानी/लघु कथा विधा पर दिया जाएगा। वर्ष 2006 से 2010 के बीच प्रकाशित कहानी संग्रह /लघु कथा संग्रह पर दिया जाएगा। आमंत्रित विधा की पुस्तक की चार प्रतियाँ, जीवन वृत्त, एवं नवीनतम चार छायाचित्र भेजना अनिवार्य होगा। प्रविष्ठियाँ भेजने की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2011 होगी।
अतिरिक्त जानकारी हेतु संस्था की संस्थापक एवम अध्यक्ष डा. अहिल्या मिश्र एवम संस्था की महासचिव डा. रमा द्विवेदी से संपर्क कर सकते हैँ ।

सम्पर्क सूत्र :
93 /सी ,राज सदन, वेंगलराव नगर, हैदराबद-500038 (आ. प्र.)
दूरभाष : 040-23703708 .फैक्स : 040- 23713249
डा. अहिल्या मिश्र : मो. 09849742803
डा. रमा द्विवेदी : मो. 09849021742

प्रस्तुति : डा. रमा द्विवेदी

Wednesday, December 29, 2010

रमा द्विवेदी को चतुर्थ साहित्य गरिमा पुरस्कार



साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति एवं कादम्बिनी क्लब, हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक २५ दिसंबर २०१० को नरेंद्र भवन में चतुर्थ गरिमा पुरस्कार समारोह-२००९ एवं पुष्पक -१६ का लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आई. पी. ई. उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के निदेशक प्रो. राम कुमार मिश्र, स्वतंत्र वार्ता के संपादक डा. राधेश्याम शुक्ल ( अध्यक्ष ) समाज सेवी राम गोपाल गोयनका, आर्य प्रतिनिधि सभा आंध्र प्रदेश के प्रधान विथ्थल राव, भाग्य नगर कावड़ सेवा संघ के अध्यक्ष माँगी राम तायल, प्रो. शुभदा वांजपे ने बतौर विशेष अतिथि भाग लिया। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा एवं संस्थापक अध्यक्ष डा. अहिल्या मिश्र मंचासीन थे। सुधा गंगोली की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम आरंभ हुआ। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन के बाद डा. अहिल्या मिश्र ने कहा कि महिला लेखिकाओं को साहित्य लेखन में दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ने में संबल प्रदान करना ही उनका उद्देश्य रहा है। डा. मदन देवी पोकरना ने अतिथियों का परिचय दिया। प्रथम साहित्य गरिमा पुरस्कार ग्रहीता पवित्रा अग्रवाल ने संस्था का परिचय व विवरण प्रस्तुत किया। कार्यकारी कार्यदर्शी डा. सीता मिश्र ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया तत्पश्चात नगर की विख्यात कवयित्री डा. रमा द्विवेदी का अथितियो द्वारा ग्यारह हजार रूपए की राशि, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र, शाल एवं स्मृति चिह्न प्रदान कर चतुर्थ गरिमा पुरस्कार से सम्मानित किया। इस आयोजन में पुष्पक-१६ का लोकार्पण अतिथियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। महिला कालेज की विभागाध्यक्ष प्रो. शुभदा वांजपे ने पुष्पक का परिचय देते हुए कहा कि यह स्तरीय एवं संग्रहनीय पत्रिका है।



पुरस्कार ग्रहीता डा. रमा द्विवेदी ने अपने भावपूर्ण वक्तव्य में कहा कि उन्हें सम्मान मिला है तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ गई है। किसी महिला द्वारा महिलाओं के लिए पुरस्कार की स्थापना दुर्लभ कार्य है। महत्व नींव का होता है, बीज का होता है, बाद में तो लोग जुड़ जाते है। इस पुरस्कार में पांडुलिपि पर भी विचार होता है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने महिला रचनाकारो को संबोधित करते हुए कहा कि महिलाए अपने लेखन के प्रति उदासीन न हो, निरंतर लिखें, संवेदनपूर्ण लिखें लेकिन पुरस्कार की ही कामना से न लिखें। डा. राम कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि अर्थ का अपना महत्व है और साहित्य रचयिता को भी अर्थ का आधार मिलना चाहिए उन्होंने ने आगे कहा कि उन्नत समाज के निर्माणार्थ आर्थिक क्षेत्र और साहित्यिक क्षेत्र का समागम नितांत आवश्यक है। डा. राधेश्याम शुक्ल ने अपनी अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि स्त्री चाहे किसी भी क्षेत्र हो वह भारतीय परम्परा में पूजनीय रही है। महिलाएं लेखन के क्षेत्र में और अधिक सक्रियता से आगे आ रही है। उन्होंने कहा स्रुजनशीलता महिलाओं का प्राकृतिक गुण है। उन्होंने कहा कि लेखकों का मनोबल बढाने के लिए समाज के समर्थ वर्ग को तन-मन-धन से सहयोग देना चाहिए ताकि लेखन की दशा एवं दिशा अधिक बेहतर हो सके। सभी सम्मानीय अतिथियों ने अपने-अपने विचार रखे। इस पुरस्कार के प्रायोजक वीरेन्द्र मुथा ने आगे भी सहयोग देने का आश्वासन दिया। लक्ष्मी नारायण अग्रवाल व सरिता सुराना ने संचालन किया जबकि मीना मुथा ने धन्यवाद दिया। इस अवसर पर नरेंद्र राय, वेणुगोपाल भटटड, वीर प्रकाश लाहोटी सावन, बिंदु जी महाराज, तेजराज जैन, सुषमा बैद, शान्ति अग्रवाल, आ.सी.शर्मा, प्रो. एम रामलू, एन जगननाथम्, अलका चौधरी, विजय लक्ष्मी काबरा, अंजू बैद, डा. गोरखनाथ तिवारी, मुनीन्द्र मिश्र, भगवान दास जोपट, नीरज त्रिपाठी, भंवर लाल उपाध्याय, सुनीता मुथा, उमा सोनी, सावरी कर, डा. हेमराज मीना, डा. कारन उटवाल, वी. वरलक्ष्मी, सुरेश जैन, डॉ. एस.एल. द्विवेदी, एस.एन. राव, संपत मुरारका, राजकुमार गुप्ता आदि उपस्थित थे।



प्रस्तुति: डा. सीता मिश्र- कार्यकारी कार्यदर्शी

Tuesday, July 20, 2010

डॉ॰ रमा द्विवेदी कृत 'रेत का समंदर' का विमोचन सम्पन्न



अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन, भोपाल का 22वाँ राष्ट्रीय अधिवेशन 10/7/2010-11/7/2010 भोपाल के अरेरा कालोनी स्थित चित्रांश महाविद्यालय के परिसर में संपन्न हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पं. श्री लक्ष्मीकान्त शर्मा, मंत्री, संस्कृति, जनसंपर्क, उच्चशिक्षा एवं खनिज संसाधन, मध्य प्रदेश, मंचासीन हुए। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री सतीश चतुर्वेदी ने अध्यक्षता की। राष्ट्रीय महासचिव पं. सुरेश नीरव, कर्नल विपिन चतुर्वेदी, प्रो. यासमीन सुलताना नक़वी (ओसाका वि.वि.,जापान), डा. मधु चतुर्वेदी ने उद्गाटन सत्र में भाग लिया और अपने विचार व्यक्त किए। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सभी का स्वागत किया। पं. लक्ष्मी कान्त शर्मा के कर कमलों से संस्था द्वारा प्रदत्त विविध सम्मानों से प्रान्त-प्रान्तान्तर से आए साहित्यकारों का सम्मान किया गया। तत्पश्चात मंत्री जी के द्वारा विविध विधाओं की पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।
इसी क्रम में हैदराबाद की वरिष्ठ कवयित्री डॉ.रमा द्विवेदी के काव्य संग्रह ‘रेत का समन्दर’ का विमोचन माननीय मंत्री श्री पं. लक्ष्मी कान्त शर्मा के कर कमलों द्वारा किया गया। डॉ. अहिल्या मिश्र ने कवयित्री डॉ. रमा द्विवेदी के काव्य संग्रह की जानकारी दी और अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित की। पं. लक्ष्मी कान्त शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा -‘साहित्यकार प्रणम्य होते हैं। साहित्य लेखन के माध्यम से जनजागृति एवं समाज निर्माण की महती भूमिका निभाते हैं। द्वितीय सत्र में बहु भाषा कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आए अनेक कवियों ने काव्य पाठ किया, जिसमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं- डॉ. यासमीन सुलताना नक़वी, डॉ. राजश्री रावत, जगदीश श्रीवास्तव, जगदीश किंजल्क, डा. संध्या भराडे, रमा कान्त पूनम, पं. सुरेश नीरव, डॉ. मधु चतुर्वेदी, श्याम बिहारी सक्सेना, डॉ. प्रेमलता नीलम, उषा रानी, राजेश टैगोर, क्रान्ति चतुर्वेदी, डॉ. सरोज ललवानी, डा. शशि नायक, डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. रमा द्विवेदी, कृति चतुर्वेदी, रजनी कान्त राजन, रिचा अनुरागी, देवकी नंदन शुक्ल, तपन बंद्यौपाध्याय, अंजना अनिल, यतींद्र राही, वीरेन्द्र सिंह, राम स्वरूप शाह, बनवारी लाल वर्मा, मधु सक्सेना, वैभव कोतवाल, डॉ. एन.एम मूर्ति, अश्विनी वर्मा इत्यादि ने भाग लिया ।



11/7/2010 के प्रात: प्रथम सत्र राष्ट्रीय महिला साहित्यकार सम्मेलन के नाम रहा और इस अवसर पर मंचासीन हुईं डॉ. सरोज ललवानी (अध्यक्ष), डॉ. यासमीन सुलताना नक़वी, डॉ. अहिल्या मिश्र एवं डॉ. मधु चतुर्वेदी विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया। डॉ. अहिल्या मिश्र ने अपने उद्बोधन में सभ्यता, संस्कृति एवं भाषात्मक संकट से आगाह करते हुए इससे निपटने हेतु साहित्यकारों को एक जुट होकर आगे बढ़ने का आह्वान किया। इस सत्र में महिलाओं की समस्याओं पर चर्चा की गई एवं कवयित्री सम्मेलन में डॉ. रमा द्विवेदी, डॉ. प्रेमलता नीलम, डॉ. राजश्री रावत, डॉ. मधु चतुर्वेदी, डॉ. शशि नायक, डॉ. शीला तिवारी, डॉ. रिचा अनुरागी, डॉ. कमला सक्सेना, आदि ने गीत-ग़ज़ल कविताओं के माध्यम से अपना संदेश प्रेषित किया। अपरान्ह सत्र में राष्ट्रीय परिसंवाद में ‘भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और समन्वय, आंग्ल भाषा का बढ़ता प्रभाव' लेखकों की समस्याओं पर चर्चा संपन्न हुई। इस सत्र के मुख्य अतिथि श्री बाबूलाल जैन, अध्यक्ष निर्धन वर्ग कल्याण आयोग, म. प्र. विशिष्ट अतिथि श्री आशीष उपाध्याय, आई ए. एस., आयुक्त उच्च शिक्षा, म.प्र. थे। सायं समापन समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. संतोष चौबे, कुलपति, सी.वी. रमन विश्वविद्यालय, रायपुर रहे। अधिवेशन के अन्त में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ और कृति चतुर्वेदी के आभार से कार्यक्रम समाप्त हुआ ।

प्रस्तुति: डा.रमा द्विवेदी

Saturday, May 15, 2010

राष्ट्रीय अनुवाद मिशन और राष्ट्र को चुनौतियाँ विषयक संगोष्ठी



राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के गठन से अनुवाद के क्षेत्र का विस्तार किसा प्रकार किया जाए जिससे अंतरराष्ट्रीय साहित्य भारतीय जन-जन तक पहुँच सके, इस बात को ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली सांध्यकालीन हिन्दी संस्थान द्वारा भारतीय विद्या भवन, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली में डॉ. नगेन्द्र स्मृति साहित्यिक संगोष्ठी तथा संस्थान द्वार संचालित अनुवाद पाठ्यक्रम में उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए प्रमाणपत्र वितरण समारोह का आयोजन किया गया।

प्रारंभ में सुविख्यात भाषाविज्ञानी, संस्थान के निदेशक और हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने बीज भाषण दिया। प्रो. गोस्वामी ने अपने वक्तव्य में बताया कि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की स्थापना प्रधानमंत्री की प्ररेणा से और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रयास से सन् 2006 में हुई थी। इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान आधारित साहित्य को अनुवाद द्वारा जन-जन तक पहुँचाना है। उच्च स्तरीय कोश, थिसारिस आदि अनुवाद उपकरणों और कंप्यूटर साफ़्टवेयरों का उत्पादन करना है। अनुवाद की गुणवत्ता की वृद्धि के लिए लघु अवधीय नवीकरण पाठ्यक्रम तथा शोध परियोजनाओं से अनुवाद संबंधी शिक्षा प्रदान करनी है। इसी संदर्भ में प्रो. गोस्वामी ने ये प्रश्न उठाए कि क्या उच्च शिक्षा के सत्तर मुख्य कार्यक्षेत्रों के साहित्य का उच्च स्तरीय अनुवाद समय पर हो पाएगा। यदि है तो क्या-क्या मानदंड अपनाए गए हैं? भारतीय और विश्व की क्लासिकल कृत्तियों के अनुवाद का चयन किन आधारों पर किया जाएगा? इसमें पुनरावृत्ति की आशंका तो नहीं होगी। अनुवाद मिशन द्वारा निर्धारित 73 करोड़ 90 लाख रुपए का बजट समय पर खर्च हो पाएगा और हुआ भी तो, कितना कार्य होगा और वह कितना लाभकारी, उपयोगी तथा शीघ्र हो पाएगा? क्या इसके लिए कोई रोडमैप बनाया गया है? अनुसृजन की दृष्टि से क्या यह अनुवाद मूल पाठ लग पाएगा। मशीनी अनुवाद कब तक विकसित हो पाएँगे और उनके कार्य में कितनी गुणवत्ता होगी। प्रो. गोस्वामी ने इस प्रकार के प्रश्न उठा कर अनुवाद मिशन की कार्य प्रणाली पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रगत संगणन विकास केन्द्र (सी-डैक) नोएडा के निदेशक और कंप्यूटर वैज्ञानिक श्री वी.एन. शुक्ल ने बताया कि अंग्रेज़ी-हिन्दी मशीनी अनुवाद का विकास पूरा हो चुका है और अंग्रेज़ी-पंजाबी, अंग्रेज़ी-बंगाली, अंग्रेज़ी-उर्दू, अंग्रेज़ी-मलयालम मशीनी अनुवाद का विकास अब चल रहा है। इसके साथ भारतीय भाषाओं के परस्पर अनुवाद और मुख्यतः हिन्दी से भारतीय भाषाओं के मशीनी अनुवाद विकसित किए जा रहे हैं। इनमें अधिकतर पर्यटन, स्वास्थ्य, प्रशासन संबंधी अनुवाद हो रहे है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मशीन आधारित अनुवाद के विकास के लिए प्रयासरत है। इस अनुवाद के मानव अनुवाद की अपेक्षा अत्यंत शीघ्र होने की संभावना है।

साहित्य अकादमी के उपसचिव और ‘समकालीन साहित्य’ पत्रिका के संपादक श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के अतिरिक्त कई ऐसी गैर-अनुसूचित भाषाएँ और बोलियाँ हैं, जिनका साहित्य काफ़ी स्तरीय है। इस पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि इन भाषाओं में रचित साहित्य और लोक साहित्य की उपेक्षा क्यों की जा रही है।

संगोष्ठी की अध्यक्ष सुश्री सुरेंद्र सैनी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अनुवाद की उपयोगिता और सार्थकता पर अपने विचार प्रकट करते हुए यह आशा व्यक्त प्रकट की कि अनुवाद मिशन से अनुवाद के क्षेत्र में काफ़ी वृद्धि होगी। इसके बाद संस्थान द्वारा संचालित स्नातकोत्तर अनुवाद पाठ्यक्रम के छात्रों को अध्यक्ष महोदया द्वारा प्रमाणपत्र और पुरस्कार वितरित किए गए। संस्थान के सचिव डॉ. जय नारायण कौशिक ने संस्थान का परिचय देते हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया। अनुवाद पाठ्यक्रम के संयोजक डॉ. पूरनचंद टंड़न ने संगोष्ठी और वितरण समारोह का संचालन करते हुए सभी अतिथियों का धन्यवाद किया। डॉ. धर्मपाल आर्य (पूर्व कुलपति, गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार) श्री ओम प्रकाश अरोड़ा (वरिष्ठ पत्रकार), प्रो. ठाकुर दास (वरिष्ठ भाषाविद्), डॉ. हरीश कुमार सेठी (इग्नु), डॉ. शिव कुमार शर्मा (दिल्ली वि.वि.) आदि विद्वानों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।


डॉ. रमा द्विवेदी