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Wednesday, February 17, 2010

आनंदम् की फाल्गुनी शाम



मंगलवार दिनांक 16 फरवरी 2010 की शाम मैक्स इंश्योरेंस कंपनी के कनॉट प्लेस स्थित सभागार में आनंदम् की 19वीं काव्य गोष्ठी अपने विविध रंगों के साथ संपन्न हुई जिसकी अध्यक्षता परिचय साहित्य परिषद की अध्यक्ष श्रीमती उर्मिल स्त्यभूषण ने की। उर्मिल जी ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आनंदम् को ऐसी उत्कृष्ट गोष्ठी आयोजित करने के लिए बधाई देते हुए कहा कि यदि मैं आज यहाँ न आती तो इतने अच्छे-अच्छे शायरों व कवियों को सुनने से वंचित रह जाती। उन्होंने कहा कि यह संयोग ही है कि यह गोष्ठी फागुन मास में हो रही है और मेरा जन्म भी फागुन मास में ही हुआ है, शायद इसीलिए मेरी रचनाओं में भी अनेंक रंग मिलते हैं। जो बात मैं कविता गीत या ग़ज़ल में नहीं कह पाती वह कहानी, लेख या नाटक के माध्यम से कह देती हूँ। इसके बाद उन्होंने अपनी कुछ चुनिंदा रचनाएँ पेश कीं।

गोष्ठी में निम्न लिखित कवियों व शायरों ने शिरकत की-
सर्वश्री लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, मुनव्वर सरहदी, अनीस अहमद ख़ान अनीस, मासूम ग़ाज़ियाबादी, पीके स्वामी, श्याम सुन्दर नन्दा नूर, डॉ. उपेन्द्र दत्त, भूपेन्द्र कुमार, शैलेश सक्सैना, ज़र्फ़ देहलवी, नश्तर अमरोहवी, जय प्रकाश शर्मा विवध, मजाज़ अमरोहवी, पंडित प्रेम बरेलवी, विवेक मिश्र, डॉ. ज़फर मुरादाबादी, प्रेमचंद सहजवाला, वीरेन्द्र क़मर, फ़ख़रुद्दीन अशरफ, मजाज़ अमरोहवी, डॉ. अहमद अली बर्क़ी आज़मी, श्रीमती शारदा कपूर, चित्रलेखा डोगरा एवं शोभना मित्तल

हमेशा की तरह गोष्ठी का सहज व सरस संचालन श्रीमती ममता किरण ने किया।

गोष्ठी में गीत, ग़ज़ल एवं छन्दमुक्त सभी तरह की भावपूर्ण रचनाएँ सुनने को मिलीं। पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें-

डॉ. उपेन्द्र दत्त-
राहे इंसानियत भी क्या ख़ूब है, तड़पती बेबसी और ज़िन्दगी मजबूर है
बेमुरव्वत ज़माने का कैसा ये दस्तूर है, मासूम चेहरों पर मायूसी, कातिलों पर नूर है

ज़र्फ देहलवी-
मुहब्बत है तो ग़म के इमकान होंगे
बहुत सी मुश्किलों के सामान होंगे

डॉ. ज़फ़र मुरादाबादी-
न दे वो ज़ख़्म मगर थोड़ा इज़्तेराब तो दे
जमूद-ए- अस्र को तहरीक-ए-इंक़लाब तो दे

अनीस अहमद खान अनीस-
आदर्श राम का कहाँ अपने वतन में है
लगता है मुझको राम मिरा अब भी वन में है

विवेक मिश्र-
मेघ तुम बहरे हुए.........
रूठे हुए हो पाहुने से

मासूम ग़ाज़ियाबादी-
किसी बेबस की ख़ातिर तेरी आँखों में नमी होना
इसी होने को कहते हैं ख़याले आगही होना

श्यामसुन्दर नन्दा नूर-
यूँ तो सिलते हैं हज़ारों ही बशर मिलने को
कह किसी को कहाँ मिलती है तबीयत अपनी

शोभना मित्तल-
शायद गुलाब का मन मुझसे नहीं मिलता
इसीलिए वो मेरे आँगन में नहीं खिलता

पंडित प्रेम बरेलवी-
आप दिल का चैन हैं, दिल की चुभन भी आप हैं
आप ही हैं गुलबदन, शोलाबदन भी आप हैं

शैलेश सक्सैना-
उसके चेहरे पर जब चमक आती है
धूप भी किनारे पर सरक जाती है



फखरुद्दीन अशरफ-
दुआ के साथ फ़क़त आँसुओं के कुछ क़तरे
ग़रीब बाप था बेटी को और क्या देता

भूपेन्द्र कुमार-
हम सभ्य और सुसंस्कृत लोग,
कभी धधका देते हैं अग्नि किसी नवोढ़ा पर सौम्यता से
कभी कर देते हैं धर्म पथ रक्तमय निर्भीकता से
कभी कर देते हैं नगर भर अग्निमय नीति से.....

शिव कुमार मिश्र मोहन-
पर देखिए न सब कुछ बाँटते हैं
भाषा, जाति, धर्म, कर्म
लेकिन अफसोस, दुख-पीड़ा नहीं बाँट पाते हैं

जगदीश रावतानी-
न दुनिया न दौलत दुआ चाहता हूँ
मैं दोस्तों की उल्फत सदा चाहता हूँ
ज़रूरत नहीं मन्दिरों मस्जिदों की
मैं इन्सान में ही ख़ुदा चाहता हूँ

पी. के. स्वामी-
यहाँ के हुस्नवालों की गजब की दिलनवाज़ी है
वो ज़ालिम रूठ कर भी जाने जाँ मालूम होते हैं

नश्तर अमरोहवी-
गुन पड़ोसी के गाती रही रात भर
एहलया बड़बड़ाती रही रात भर
न कोई गुफ्तगू न कोई जुस्तजू
सिर्फ गुटका चबाती रही रात भर

मुनव्वर सरहदी-
अब किसी भी महफिल में बैठो, या बोतल है या साक़ी है
कुछ बूढ़े रह गए मन्दर में बस यही करैक्टर बाक़ी है

अंत में आनंदम् की ओर से श्री जगदीश रावतानी ने सब के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि आशा है हमेशा आप सब का प्यार इसी तरह मिलता रहेगा।