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Saturday, September 24, 2011

'युवा रचनाधर्मिता - हिंदी कहानी' पर एक विचारोत्तेजक सभा का आमंत्रण


निमंत्रण 
'अंजना - एक विचार मंच'
द्वारा
'युवा रचनाधर्मिता - हिंदी कहानी'पर एक विचारोत्तेजक सभा
(आज के युवा कथाकार की हिंदी कहानी पर एक महत्वपूर्ण चर्चा )
मुख्य अतिथि - मैत्रेयी पुष्पा,
विशिष्ट अतिथि - कमल कुमार, 
प्रेम भारद्वाज, मनीषा कुलश्रेष्ठ, अनुज व दिनेश कुमार विशिष्ट वक्ता होंगे.


इस सभा में कुछ युवा साहित्यकारों को 'डॉ अंजना सहजवाला साहित्य सम्मान' भी दिया जाएगा. 


सभा के अंत में उपस्थित श्रोता विषय से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण मुद्दा उठा सकेंगे.
कार्यक्रम दि. 24 सितम्बर 2011, समय - सायं 5 बजे से
स्थान - हिंदी भवन, विष्णु दिगंबर मार्ग, दिल्ली (निकट तिलक ब्रिज)


इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में आप अवश्य उपस्थित हों.

Friday, July 1, 2011

रंग महोत्सव 2011 30 जून से 3 जुलाई के मध्य आयोजित होगा

30 जून 2011 से 3 जुलाई 2011 के बीच 'द फिल्म एंड थिएटर सोसाइटी' नई दिल्ली के लोधी रोड में 'रंग महोत्सव' का आयोजन कर रही है। यह रंगमंच का बहुत बड़ा आयोजन है जिसमें 7 अलग-अलग कार्यक्रम निर्धारित है। कार्यक्रम का पूरा विवरण सोसाइटी की आधिकारिक वेबसाइट पर देखें।

आप इस महोत्सव के कार्यक्रमों के टिकटों की ऑनलाइन खरीद-फरोस्त भी कर सकते हैं। इसके लिए लॉगिन करें- http://www.buzzintown.com/delhi/event--rang-festival-indian-arts/id--422119.html

कार्यक्रम के फेसबुक पेज़ से जुड़ें।

hindyugm.com इस महोत्सव का ऑनलाइन मीडिया पार्टनर है।

कुछ खास तथा प्रसिद्ध नाटकों की झलकी यहाँ प्रस्तुत है।

प्रस्तुति: अर्जुन का बेटा



तिथि: ०२ जुलाई, २०११
समय: सायं ०७ बजे
स्थान: अलायेंज फ्रंकाईस, लोधी रोड, दिल्ली
टिकट: रूपए ३००, २०० एवं १००
लेखन एवं निर्देशन: अतुल सत्य कौशिक
अर्जुन का बेटा... यह नाम अपने आप में रोमांच की अनुभूति कराने वाला है..अभिमन्यु, एक लव्य, घटोत्कच महाभारत इतिहास के कुछ ऐसे पात्र हैं जिन्होंने इतिहास के अधिक पन्ने तो नहीं खर्च करवाए, परन्तु युगों युगों तक के लिए युवाओं के लिए प्रेरणा एवं रोमांच का स्त्रोत छोड़ गए.. कहने वाले कहते हैं की इस संसार में दो ही कहानियाँ हैं. रामायण और महाभारत. हम सभी कहीं न कहीं इन्हीं दो कहानियों के पात्र हैं... और विभिन्न मंचों और माध्यमों के द्वारा सुनायी जाने वाली कहानियां भी कहीं न कहीं इन्हीं दो महकथाओं से निकलती या इनसे मिलाती जुलती हैं..फिर मन में विचार आता है अगर ऐसा हो तो फिर कहने के लिए नया क्या है.. सब तो कहा जा चुका होगा अब तक.. मगर ऐसा नहीं हैं.. इन दो महागाथाओं में कुछ पात्र कहीं दबे या छुपे रह गए और उन्हीं में से एक है अर्जुन का बेटा.. अभिमन्यु..



द्रोणाचार्य गुरु द्वारा रचाए गए चक्रव्यूह में वीर अभिमन्यु मारा गया है और महाराज युधिस्ठिर भागे भागे पितामह भीष्म के पास आये हैं यह पुचने की अब अर्जुन के आने पर उसको क्या उत्तर देंगे.. क्या कहेंगे जब वो अपने पुत्र के बारे में पूछेगा.. वो पितामह को बताते हैं किस वीरता से अभिमयु लड़ा... और किस वीरता से वो लड़ाई में मरा गया... दूसरी ओर सोलह साल के अभिमन्यु की चौदह साल की पत्नी उत्तरा धरमराज युधिस्तिर ये पूछना चाहती है की अभिमन्यु आज रण से लौट के आएगा या नहीं.. पितामह अर्जुन तक ये सन्देश भिजवाते हैं की अब समय है की उठ कर प्रतिशोध लिया जाए.. और अवकाश के समय में गीता पर वाद विवाद किया जाए.. अंत में माधव ये बताते हैं की चक्रव्यूह में सिर्फ अभिमन्यु ही नहीं फंसा रह गया, अपितु हर मानुष्य चक्रव्यूह में फंसा है और फंसा रहेगा क्यूंकि चक्रव्यूह से बाहर आते ही तो जीवन मुक्ति मिल जाएगी..

दिल्ली में होना वाला रंग मंच सुविधा-प्रधान बन कर रह गया है.. परन्तु इसके विपरीत अर्जुन का बेटा चुनौती की स्वीकारता है.. यह नाटक कविता शैली में खेला गया है और इस में युध्ध के दृश्यों का मंचन रौंगटे खड़े कर देने वाला है.. इस में मुख्य भूमिका निभा रहे सत्येंदर मलिक जो की पंजाब युनिवेर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ़ थियेटर से रंग विद्या की पढाई भी कर रहे हैं कहते हैं "इस तरह का कोई प्रयोग अंतिम बार धरमवीर भारती जी के अँधा युग में देखा गया था.. यह नाटक वापस वही लहर लेकर आएगा".. आशा है यह नाटक दिल्ली के दर्शकों को एक बार फिर याद दिलाएगा की भारतीय साहित्य कितना सशक्त है कैसे एक अच्छी लेखनी और सटीक निर्देशन किसी भी तरह के नाटक को लोकप्रिय बना कर प्रस्तुत कर सकती है..



प्रस्तुति : कूबड़ और काकी

तिथि : ०३ जुलाई, २०११
समय : सायं ०७ बजे
स्थान : अलायेंज फ्रंकाईस, लोदिही रोड, दिल्ली
टिकट : रूपए ३००, २०० एवं १००
लेखन एवं निर्देशन : अतुल सत्य कौशिक
भारतीय साहित्य की कल्पना एक ऐसे वृक्ष के रूप में की जा सकती है जिस ने उपन्यास, नाटक, कविता, महाकाव्य इत्यादि के रूप में अपनी शाखाएं चहुँ ओर फैला रखी हैं. लघु कथाएँ भी इसी वृक्ष एक शाखा हैं जिनकी पहुँच यदि बाकी शाखाओं से अधिक नहीं तो उन से कम भी नहीं है. इस वृक्ष को अपनी कृतियों से सींचने और लघु कथाओं की शाखा को और अधिक विस्तृत करने में मुंशी प्रेमचंद औ धरमवीर भारती का योगदान सदा ही उल्लेखनीय रहेगा. ये दोनों ही लेखक सदा ही ऐसे लघु कथाएँ लिखने में सफल रहे जिनमे पाठक को अपने जीवन से जुड़े प्रश्न भी दिखे और कहीं न कहीं उन के अर्थ भी मिले. फिल्म्स एंड थिएटर सोसायटी ने इन दो महान लेखको की दो लघु कथाओं को एक साथ एक ही मंच पर प्रस्तुत कर एक नए नाटक, कूबर और काकी का सृजन करने का उल्लेखनीय कार्य किया है.

भारत सदा से ही गाँवों का देश रहा है और फिल्म्स एंड थियेटर सोसायटी का यह नाटक "कूबड़ और काकी" भी गाँवों में बस रहे उस भारत के दर्शन करवाता है. यधपि नाटक की कथावस्तु दो पत्रों, बूढी काकी और गुलकी, के इर्द गिर्द घुमती है परन्तु यह नाटक भिन्न भिन्न प्रकार के, अनेको रंग लिए कई पत्र लाकर खड़ा कर देता है जिन में हमें समाज का वह रूप देखने को मिलता है जो सदा से ही ऐसा है. यह नाटक एक ओर तो उस बूढी काकी की कहानी सुनाता है जिस के जीवन में जिह्वा स्वाद के अतिरिक्त कोई और स्वाद नहीं बचा था तो दूसरी ओर उस कुबड़ी गुलकी की कहानी भी सुनाता है जिसके पति ने लात मर कर उसको घर से बहार निकाल दिया और वह अपने गाँव में दरिद्रता पूर्ण जीवन जी रही है. इन दो प्रमुख पत्रों के इर्द गिर्द यह नाटक चतुर रूपा, सदा चिल्लाने वाली घेघा बुआ, साबुन बेचने वाली और समाज से सदा लड़ने को आतुर सत्ती, कोढ़ी मिरवा, समाज सेविका बहन जी, नीच भूप्देव जैसे कई अन्य पात्रों से भी मिलवाता है. दिल्ली के रंगमंच में अपना सिक्का जमा चुके पारुल सचदेवा, नेहा पण्डे, अंकुर आहूजा और आशिमा प्रकाश सरीखे कलाकार अपने अदभुत अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है.

इस नाटक में गाया बजाया गया लोक संगीत किसी भी सभागार में पूर्ण रूप से ग्रामीण वातावरण पैदा कर देता है. नाटक के लेखक और निर्देशक अतुल सत्य कौशिक द्वारा लिखे गए और ब्रम्ह्नाद द्वारा गए और बजाये गए गीत अत्यंत कर्णप्रिय हैं. इसके साथ ही यह नाटक लोक नृत्य की कुछ मोहक झलकियाँ दिखाता भी है.

Thursday, June 23, 2011

निमंत्रणः विष्णु प्रभाकर स्मृति नमन



निमंत्रण
(विष्णु प्रभाकर स्मृति नमन)
परिचय साहित्य परिषद
रशियन कल्चरल सेंटर के सम्मिलित तत्वावधान में
दि. 23 जून 2011 को विष्णु प्रभाकर के 100 वें जन्म-दिवस के उपलक्ष में ‘विष्णु प्रभाकर स्मृति नमन’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. आप सभी इस कार्यक्रम में सादर आमंत्रित हैं.
गोष्ठी अध्यक्ष : डॉ. महीप सिंह.
मुख्य अतिथि : डॉ. बलदेव वंशी
विशिष्ट सान्निध्य : श्री पंकज बिष्ट
विशिष्ट वक्ता : डॉ. धर्मवीर व डॉ. अर्चना त्रिपाठी
स्थान : 24 फिरोज़शाह रोड, नई दिल्ली
दि. 23 जून 2011  -  समय : सायं 5.30 बजे.
निवेदक : उर्मिल सत्यभूषण
अध्यक्ष : परिचय साहित्य परिषद
फोन: 9910402779 (उर्मिल सत्यभूषण)
011-23329100 (रशियन कल्चरल सेंटर).

Monday, June 20, 2011

‘‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म प्रतिभा का विस्फोट’’-नामवर सिंह

नयी दिल्ली। ‘‘कवि उद्भ्रांत की एक साथ तीन नयी काव्य-कृतियों का लोकार्पण अद्भुत ही नहीं ऐतिहासिक भी है। इतनी कविताओं का लिखना उनकी प्रतिभा का विस्फोट तो है ही, साथ ही इनमें रचनाकार की सर्जनात्मक ऊर्जा की भी दाद देनी होगी।’’ ये बातें मूर्द्धन्य आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की तीन काव्य-कृतियों ‘अस्ति’ (कविता संग्रह), ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) एवं ‘राधामाधव’ (प्रबंध काव्य) के लोकार्पण के अवसर पर शुक्रवार दिनांक 17 जून, 2011 को हिन्दी भवन, दिल्ली में आयोजित ‘समय, समाज, मिथक: उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहीं।

नामवर जी ने उद्भ्रांत के पूरे रचनात्मक जीवन पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि उनकी ‘सूअर’ शीर्षक कविता नागार्जुन की मादा सूअर पर लिखी कविता के बाद उसी विषय पर ऐसी कविता लिखने के उनके साहस को प्रदर्शित करती है जिसके लिये वे बधाई पात्र हैं। उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा की दाद देनी होगी। हिन्दी भाषा में पांच सौ पृष्ठों के पहले वृहद्काय कविता संग्रह ‘अस्ति’ का लोकार्पण करते हुए उन्होंने कहा कि कवि अपने शब्दों के द्वारा इसी दुनिया में एक समानान्तर दुनिया रचता है, जो विधाता द्वारा रची दुनिया से अलग होकर भी संवेदना से भरपूर होती है। मिथकों को माध्यम बनाकर उन्होंने जो रचनाएं की हैं, वे भी उनकी समकालीन दृष्टि के साथ उनकी बहुमुखी उर्वर प्रतिभा को प्रदर्शित करती हैं।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र ने ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) का लोर्कापण करते हुए कहा कि इसमें कवि ने महाभारत का एक तरह से पुनर्पाठ आधुनिक संदर्भ में बेहद गंभीरता के साथ किया है। युधिष्ठिर को केन्द्र में रखकर जिस तरह से उनको और उनके माध्यम से महाभारत के दूसरे महत्त्वपूर्ण चरित्रों को वे प्रश्नों के घेरे में लाये हैं, वह अद्भुत है और इससे युधिष्ठिर औरअन्य मिथकीय चरित्रों के दूसरे पहलुओं के बारे में जानने का भी हमें मौक़ा मिलता है। महाकवि प्रसाद की ‘कामायनी’ से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वह महाकाव्य नहीं है, लेकिन महत् काव्य ज़रूर है। ‘अभिनव पांडव’ को कवि ने महाकाव्य कहा है और अपनी भूमिका ‘बीजाक्षर’ में इस सम्बंध में बहस की है और अपने तर्क दिये हैं, लेकिन मैं इसे विचार काव्य कहूँगा जो महत् काव्य भी है और मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में हिन्दी के बौद्धिक समाज में यह व्यापक विचारोत्तेजना पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि ‘राधामाधव’ काव्य बहुत ही मनोयोग से लिखा गया काव्य है, जिस पर बिना गहराई के साथ अध्ययन किए जल्दबाजी में टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी रचनाएं समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। अपनी पचास वर्ष से अधिक समय की रचना-यात्रा में उनके द्वारा पचास-साठ से अधिक पुस्तकें लिखना सुखद आश्चर्य का विषय है।

वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने ‘राधामाधव’ का लोकार्पण करते और कवि की अनेक रचनाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है और लिखने की शैली भी अलग है। मिथकों को लेकर उन्होंने कई रचनाएं की हैं जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे हिन्दी के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उनका रचनात्मक आवेग बहुत तीव्र है और उनके पास अक्षय भंडार है। पूतना के माध्यम से आदिवासी स्त्राी जीवन का चरित्रा-चित्राण अनोखा है। कवि ने अपने सम्पूर्ण काव्य-सृजन को समकालीन बनाने की हर संभव कोशिश की है जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सत्यप्रकाश मिश्र, राममूर्ति त्रिपाठी और रमाकांत रथ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों ने उनकी इस विशिष्टता को रेखांकित भी किया है। कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि बिना राधा के आख्यान को रचे राधाभाव को रचना ‘राधामाधव’ का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसमें स्त्राी विमर्श भी है जिससे कवि की अलग पहचान बनती है। इनके समूचे साहित्य में मूल पंूजी आख्यान है और आख्यान को साधना बहुत बड़ी बात है।



आलोचक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि विवेच्य संग्रह ‘अस्ति’ में इतनी तरह की और इतने विषयों की कविताएं हैं जो पूरी दुनिया को समेटती हैं। उद्भ्रांत जी की कविताओं में पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों और संसार के समस्त प्राणियों की संवेदना को महसूस किया जा सकता है। संग्रह की अनेक कविताएं अद्भुत हैं। साहित्यकार धीरंजन मालवे ने कविता संग्रह ‘अस्ति’ पर केन्द्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि कवि ने कविता की हर विधा को सम्पूर्ण बनाने में अपनी भूमिका निभाई है और उनकी कृतियों से यह साफतौर पर ज़ाहिर होता है कि उद्भ्रांत नारी-सशक्तीकरण के प्रबल पक्षधर हैं। इसके साथ ही उन्होंने दलित चेतना के साथ अनेक विषयों पर बेहतरीन कविताएं लिखीं हैं।

संगोष्ठी का बीज-वक्तव्य देते हुए जनवादी लेखक संघ की दिल्ली इकाई के सचिव प्रखर आलोचक डॉ. बली सिंह ने कहा कि आज के दौर में इतने तरह के काव्यरूपों में काव्य रचना बेहद मुश्किल है, लेकिन उद्भ्रांत जी इसे संभव कर रहे हैं। उनकी कविताएं विचारों से परिपूर्ण हैं। यहाँ सांस्कृतिक मसले बहुत आये हैं और पहले की अपेक्षा उनकी कविताओं में स्मृतियों की भूमिका बढ़ी है। ‘राधामाधव’ स्मृतियों का विलक्षण काव्य है। ‘अभिनव पांडव’ में स्त्रिायों के प्रति बराबरी के दर्जे के लिये कई सवाल उठाये गये हैं जो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस उत्तर आधुनिक समय में आई उद्भ्रांत की मिथकाधारित और विचारपूर्ण समकालीन कविताओं को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया।

प्रारम्भ में, कवि उद्‍भ्रांत ने तीनों लोकार्पित कृतियों की चुनिंदा कविताओं और काव्यांशों का प्रभावशाली पाठ करने के पूर्व ‘अस्ति (कविता-संग्रह)’ जिसे उन्होंने ‘कविता और जीवन के प्रति आस्थावान’ अपने सुधी और परम विश्वसनीय पाठक-मित्र के निमित्त ‘समर्पित किया है- की प्रथम प्रति बड़ी संख्या में उपस्थित सुधी श्रोताओं में से एक वरिष्ठ कवि श्री शिवमंगल सिद्धांतकर को तथा ‘राधा-माधव’- जिसे उन्होंने पत्नि और तीनों बेटियों के नाम समर्पित किया है- की प्रथम प्रति श्रीमती उषा उद्‍भ्रांत को भेंट की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए दूरदर्शन महानिदेशालय के सहायक केन्द्र निदेशक श्री पी.एन. सिंह द्वारा कवि के सम्बंध में दी गई इन दो महत्त्वपूर्ण सूचनाओं ने सभागार में मंच पर उपस्थित विद्वानों और सुधी श्रोताओं को हर्षित कर दिया कि वर्ष 2008 में ‘पूर्वग्रह’ (त्रौमासिक) में प्रकाशित उनकी जिस महत्त्वूपर्ण लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ के पुस्तकाकार संस्करण को लोकार्पित करते हुए नामवर जी ने उसे उस समय तक की उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति घोषित किया था-को वर्ष 2008 के ‘अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा हुई है। इसके अलावा उडीसा से पद्मश्री श्रीनिवास उद्गाता जी-जिन्होंने रमाकांत रथ के ‘सरस्वती सम्मान’ से अलंकृत काव्य ‘श्रीराधा’ का उड़िया से हिन्दी में तथा धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ का हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद किया था-ने कवि को सूचित किया है कि वे आज लोकार्पित ‘राधामाधव’ का भी हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद कर रहे हैं जो बहुत जल्द उड़िया पाठक-समुदाय के समक्ष आयेगा। धन्यवाद-ज्ञापन हिन्दी भवन के प्रबंधक श्री सपन भट्टाचार्य ने किया।

प्रस्तुतकर्ता
तेजभान
ए-131, जहांगीरपुरी,
नई दिल्ली-110033
मोबाईल: 9968423949

Friday, June 17, 2011

उद्‍भ्रांत की 3 पुस्तकों के लोकार्पण-कार्यक्रम का निमंत्रण

नेशनल पब्लिशिंग हाउस और हिन्दी अकादमी के संयुक्त तत्वाधान में
वरिष्ठ कवि उद्‍भ्रांत की 3 पुस्तकों
(अस्ति- कविता संग्रह, अभिनव पांडव- महाकाव्य,
राधा-माधव- प्रबंध काव्य)
का लोकार्पण एवं
‘समय समाज, मिथकः उद्‍भ्रांत का कविकर्म’
विषय पर विचार-गोष्ठी।

अध्यक्ष तथा मुख्य अतिथिः डॉ. नामवर सिंह
मुख्य वक्ता: डॉ. शिवपूजन मिश्र
विशिष्ट वक्ता: डॉ. नित्यानंद तिवारी
वक्ता: डॉ. बलि सिंह
डॉ. संजीव कुमार
डॉ. लीलाधर मंडलोई
डॉ. धीरंजन मालवे

दिनांकः 17 जून 2011
समयः 5‍ः30 बजे से
स्थानः संगोष्ठी कक्ष, तृतीय तल, हिन्दी अकादमी, विष्णु दिगंबर मार्ग, नई दिल्ली-01


आप सादर आमंत्रित हैं।

Tuesday, June 14, 2011

Friday, April 29, 2011

'सिनेमा और दलित' विषय पर आयोजित विशेष कार्यक्रम का निमंत्रण

मित्रो,

डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 120वीं जयंती, अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष को एक साथ मनाया जा रहा है। आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

दिन और समयः 1 मई 2011, शाम ठीक 6 बजे से
स्थानः अक्षरा थिएटर
बाबा खड़ग सिंह मार्ग, गेट नं 5 के आगे, राम मनोहर लोहिया अस्पताल
गोल डाक खाना के पास
नई दिल्ली-110001

कार्यक्रम- सिनेमा और दलित
वक्ता- सुधा अरोड़ा
डॉ. आनंद प्रकाश
सुजाता पारमिता
रामजी यादव

धन्यवाद ज्ञापन- आस्था आर एस

फिल्म प्रदर्शन- बवंडर
वी शैल रिजेक्ट (डॉ. जगमोहन मुंधरा द्वारा निर्देशित हिन्दी फीचर फिल्म)
रामजी यादव द्वारा निर्मित-निर्देशित वृत्तचित्र

निवेदक-
सुजाता पारमिता
विजडम ट्री

डॉ॰ आनंद प्रकाश, रामजी यादव
पीपुल्स विजन

Tuesday, April 26, 2011

डायलॉग गोष्ठी का आमंत्रण


डायलॉग गोष्ठी का आमंत्रण पत्र

Friday, April 15, 2011

कॉलेज ऑफ़ स्टडीज में दो दिवयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न



‘जो बीत जाता है उसके पुर्नावलोकन की बाते उठती है और जब हम इनपर चर्चा करते हैं तो नई बातें सामने आती हैं। आवश्यक्ता है इस निरंतर पुर्नावलोकन की। कविता की प्रासंगिकता को समय पाठक और अभिरुचि की दृष्टि से परखा जाना चाहिए। और जब हम अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके रचनाकर्म को देख रहें तो बहुत आवश्यक हो जाता है कि पहले से ही कठघरे में बांधकर देखने की छवि को तोड़कर पढ़ा जाए।’ यह उद्गार कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज ,दिल्ली विश्वविद्यालय, द्वारा ‘कविता की प्रासंगिकता: संदर्भ अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल’ विषय पर कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से आयोजित, दो दिवयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते समय प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने कहे । उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने उपन्यास तथा कथा को नयी दिशा दी, छायावाद को उखाड़ा तथा नागार्जुन और केदार ने राजनीति को काव्य का विषय बनाया। शमशेर संवेदना,आत्मसंवाद और आवेग के कवि हैं तथा उनकी राजनीतिक कविताएं स्थूल और सपाट हैं। इन चारों कवियों में से अज्ञेय एकमात्र ऐसे कवि हैं जिन्होने शरणार्थी समस्या पर कविताएं लिखीं। नागार्जुन की राजनीतिक कविताएं गहरी तकलीफ की कविताएं हैं। आलोचकों ने केदार जी को मात्र राजनीतिक कवि कहकर सीमित किया है और उनका अवमूल्यन किया है।’ प्रो0 निर्मला जेन ने केदारनाथ अग्रवाल की अनेक प्रेम कविताओं को उद्धृत भी किया।

अपने अध्यक्षीय भाषण में अशोक वाजपेयी ने कहा-इन चारों कवियों ने यथार्थ और वैकल्पिक यथार्थ की कल्पना की। ये चारों कवि गहरी प्रश्नवाचकता के कवि हैं। इन्होने स्वयं की कविता पर संदेह किया है। जन्म-शताब्दी पर इन चारों को याद करना एक जैविक घटना है। इन चारों कवियों में सौंदर्यबोध, संघर्षबोध है । शब्द की विपुलता से ही जीवन की विपुलता का बोध होता है जो अज्ञेय में सर्वाधिक है। अज्ञेय हिंदी के अंतिम प्रकृतिपरक बौद्धिक कवि हैं। शब्द की विपुलता से ही जीवन की विपुलता का बोध होता है और यह अज्ञेय में सर्वाधिक है। नागार्जुन का शिल्प अभिधात्मक है। वे सामान्य जीवन के कवि हैं। नागार्जुन को पश्चिमी सभ्यता के क्रिटीक के रूप में पढ़ा जा सकता है। चारों कवि बंधे-बंधाए उत्तरों को अस्वीकार करते हैं। इन चारों कवियों में शिल्प की अपार विविधता है जबकि आज की अधिकांश कविता अखबारी है।

विशिष्ट अतिथि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा - इन कवियों की राजनतिक समझ को स्वातंत्र्य प्रेम की नज़र से भी देखा जाए क्योंकि ये चारो कवि स्वाधीनता काल के कवि हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन कवियों ने राजनीतिपरक रचनाएं की हैं उन्होंने प्रेम पर भी खूब लिखा है। केदार और नागार्जुन को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आज ग्लोबल बाजारवाद के चक्कर में ग्लोबल संवेदना को केंद्र में रखकर लिखा जा रहा है। अज्ञेय की निजता एक ऐतिहासिक जरूरत थी।’
प्राचार्य डॉ0 इंद्रजीत ने अतिथियों का स्वागत एवं धन्यवाद किया और संगोष्ठी को ऐतिहासिक बताते हुए कहा - आज जिस संगोष्ठी का उद्घाटन होने जा रहा है, वह आप सबकी उपस्थिति से एक ऐतिहासिक अवसर बन गया है। अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर बहादुर सिंह का यह शताब्दी वर्ष है। इस वर्ष पूरे भारत में अनेक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं । आज का कार्यक्रम उसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी कहा जा सकता है। उद्घाटन सत्र के आरंभ में संगोष्ठी के संयोजक डॉ0 प्रेम जनमेजय ने प्रस्तावित विषय के संबंध में विस्तार से बताया एवं आज के समय में जब कविता अन्य विधाओं के संदर्भ में छूटती जा रही है, ऐसे में अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदार की कविता हमारे आज के समय को क्या संबल देती है।

उद्घाटन सत्र में प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्लः विचार विश्लेषण एवं जीवन’ का लोकार्पण भी किया गया।

संगोष्ठी का पहला सत्र केदारनाथ अग्रवाल पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ0 नित्यानंद तिवारी ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 खगेंद्र ठाकुर। इस सत्र में डॉ0 बली सिंह, डॉ0 द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र एवं डॉ0 विनय विश्वास ने अपने आलेख पढ़ें। डॉ0 नित्यानंद तिवारी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा- हम इस पूंजीवादी सभ्यता में अनुकूलित हो जाना चाहते हैं या अपनी मानवीय भूमिका निभाना चाहते हैं, यह निर्णय हमें ही करना है। रामविलास शर्मा ने केदार को कामचेतना के आंचलिक कवि कहा है जिसमें उन्होंने स्थानीय तस्वीर पैदा कर दी है। चारों कवियों के पास मनुष्य के रूप हैं चाहे अलग-अलग रूप में हों। आज के युग में मनुष्य सूचनाओं का मात्रा यंत्र हो गया है।’ तिवारी जी ने केदार की दो कविताओं ‘न घटा जो यहां कभी पहले’ और ‘अब’ कविताओं के संदर्भ में कहा कि केदार जी के यहां सही मनुष्य की उपस्थिति है। मुख्य अतिथि खगेंद्र ठाकुर ने कहा - आज के युग में पूंजीवाद को मनुष्य की मनुष्य के रूप में जरूरत नहीं है, उसकी जरूरत है तो खरीददार के रूप में। राजनीति सिर्फ पार्टीबाजी में नहीं अन्य चीजों में भी देखी जा सकती है। केदार की फुटकल कविताओं में मनुष्य के संघर्षों का जो रूप है वह महामानव का रूप दिखाता है। केदार के यहों प्रकृति की अनेक ऐसी कविताएं हैं जो छायावाद से भी अच्छी हैं। आज का समाज यदि हमंे अच्छा नहीं लगता है तो केदार प्रासंगिक कवि हैं। डॉ0 बलीसिंह ने कहा- केदार व्यक्ति को महत्व देते हैं, उसकी आईडेंटीटी को महत्व देते हैं। केदार ने न केवल नदी में सौंदर्य देखा अपितु नाले में भी सौंदर्य देखा और उसे काव्य का विषय बनाया।’ डॉ0 द्वारिकाप्रसाद चारुमित्रा ने कहा - अज्ञेय को छोड़कर सभी कवि जनपद के कवि के परिचायक लेते हैं। नागार्जुन और केदार में विद्यापति की प्रेरणा बोलती है और उनकी कविताओं में सास्कृतिक आवाज बोलती है। केदार की कविता की कविता मानव की कविता है। उनकी कविता अमानवीय संसार में इंसानियत की खोज की कविता है।’ डॉ0 विनय विश्वास ने कहा - अशोक वाजपेयी ने जो कहा कि अज्ञेय प्रकृति के अंतिम कवि है, इससे मैं सहमत नहीं। केदार की कविताएं प्रकृति के हर रंग को उकेरती हैं। केदार की कविताओं में ‘ध्ूप’ पर लिखा बहुत कुछ मिलता है।’ विनय विश्वास ने केदार की अनेक प्रकृतिपरक कविताओं को प्रस्तुत किया। सत्र का संचालन डॉ0 रत्नावली कौशिक ने किया।

संगोष्ठी का दूसरा सत्र नागार्जुन पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता प्रो0 गोपश्वर सिंह ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 विजय बहादुर सिंह। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो0 गोपेश्वर सिंह ने कहा- नागार्जुन मुक्तिकामी कवि हैं। वे बड़े रेंज के कवि हैं। इनकी काव्य विशाल भूमि है तथा इनमें छंदों और काव्य रूपों की बहुलता है। प्रश्नाकुलता यदि आध्ुनिकता का लक्षण है तो नागार्जुन आधुनिकता के कवि हैं। मनुष्य की मानवीयता में विश्वास ही आधुनिकता की सर्वोत्तम कसौटी है। नागार्जुन भावुकता के नहीं आवेग के कवि हैं। नागार्जुन काव्य की बारिकियों के लिए हलकान रहने वाले कवि नहीं हैं। अज्ञेय नागर रुचि के कवि है तो नगार्जुन बोली के कवि हैं। दिनकर और बच्चन के बाद नागार्जुन ऐसे कवि हैं जिनको आनंद से पढ़ा जा सकता है। ‘नई कविता’ के महल में सेंध लगाने वाली कविता नागार्जुन की है।’ मुख्य अतिथि डॉ0 विजय बहादुर सिंह ने कहा - कविता की प्रासंगिकता समाज में मनुष्य के बचे रहने की प्रासंगिकता है। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए कविता लिखना और चर्चित होने के लिए कविता लिखना दो अलग- अलग बातें हैं। बहुत लोग लिखना जानते हैं पर नहीं जानते कि लिखना क्या है। साहित्य को कला समझने वाले नागार्जुन की कविता को समझ नहीं सकते हैं। प्रेमचंद, नागार्जुन खेतिहर समाज के रचनाकार हैं। नागार्जुन जनता के पक्ष में उसी की भाषा में लिखने वाले कवि हैं। नागार्जुन और निराला समान संवेदना के कवि है। डॉ0 अनामिका ने ‘नागार्जुन के काव्य में स्त्री-पक्ष’ पर बोलते हुए कहा -नागार्जुन ने अपने साक्षात्कारों में कम-से- कम पांच वर्ष के लिए अपने स्त्री बन जाने की इच्छा का जिक्र किया है। बाबा स्त्रियों के दोस्त बन गए थे और उनकी रसोईघर में उनका आना जाना था। नागार्जुन ने प्रतिबद्ध कविताएं लिखीं।राधेश्याम तिवारी ने कहा- नागार्जुन ने ज्ञानात्मक संवेदना वाली कविता का महत्व बताया, न कि ज्ञान से लिखी कविताओं का। नागार्जुन की कविताओं में बौद्धिकता का आतंक नहीं है। जो बौद्धिक कविताएं लिखते हैं वे अपने समय से तो कटते ही हैं, बाद के समय से भी कट जाते हैं। बचे रहेंगे शब्द और बची रहेगी संवेदनाए।’ डॉ0 बागेश्री चक्रधर ने नागार्जुन को बौद्ध धर्म से मिली प्रेरणा की चर्चा करते हुए कहा - नागार्जुन पर सिद्धों-नाथों जैसी जीवन-प्रणाली का प्रभाव था। उन्होंने विचारधाराओं से अनुभव तक की यात्रा की।’ बागेश्री चक्रध्र ने बाबा नागार्जुन से जुड़े अनेक रोचक संस्मरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबा मानते थे कि पेट से बड़ा कोई आंदोलनकारी नही होता और बाबा दूसरी विचारधारा के लोगों से भी संवाद करते थे। डॉ0 हरीश नवल ने नागार्जुन से जुड़े अनेक रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा- वे सही अर्थों में जनकवि थे। उनके साथ गुजरे हुए मेरे और मेरे दादा जी के क्षण मेरे लिए अविस्मरणीय हैं। इस सत्रा का संचालन डॉ0 वीनू भल्ला ने किया ।

संगोष्ठी का तीसरा सत्र अज्ञेय पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता श्री ओम थानवी ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ0 कृष्णदत्त पालीवाल । अपने अध्यक्षीय भाषण में ओम थानवी नेकहा- अज्ञेय एक बड़े कवि थे जिनका मूल्यांकन करते समय अक्सर उनके व्यक्तित्व से जुड़े हुए संदर्भों को आधर बना लिया जाता है। प्रेम जनमेजय ने सही सवाल उठाया है कि रचनाकार के व्यक्तित्व को क्या साहित्यकार के रचनाकर्म की कसौटी माना जाए। अब अज्ञेय पर सी आई ए का एजेंट होने से लेकर उनके दंभी व्यक्तित्व को लेकर अनेक आरोप लगाए जाते है। इस आधर पर क्या अज्ञेय के साहित्य को खारिज कर दिया जाए। आप जितनी देर शेक्सपीयर की रचना को पढ़ते हैं उतनी देर शेक्सपीयर के रचना संसार में खो जाते हैं, न कि उनके व्यक्तिगत जीवन में खोते हैं। साहित्य की आलोचना करने का अपना ये ‘व्यक्तिवादी ’ दृष्टिकोण हम न जाने कब बदलेंगे?’ मुख्य अतिथि डॉ0 कृष्णदत्त पालीवाल ने कहा - अज्ञेय की अब तक सही आलोचना नहीं हुई है। नददुलारे वाजपेयी ने जो आक्षेप लगाए वे तर्क की विकृति कहे जाएंगे। डॉ0 नगेंद्र ने रस सिद्धांत के आधर पर आलोचन की जो कि विडंबनापूर्ण था। रामविलास शर्मा ने अज्ञेय की कविता को जड़ाउफ, कड़ाउफ आदि बताया जो कि निराधर था। नामवर सिंह ने अज्ञेय को व्यक्तिवादी और कलावादी कहा, ‘कविता के प्रतिमान’ के द्वारा अज्ञेय की नाक पर घूसंा जड़ा। अज्ञेय को टी एस इ।लियट, डी एच लॉरेंस आदि से तुलना करने वाले झूठे हैं। अज्ञेय की तुलना यदि किसी से हो सकती है तो वे हैं प्रसाद। हिंदी आलोचना ने अज्ञेय के साथ न्याय नहीं किया है। अज्ञेय पर नए ढंग से सोचा जाना चाहिए।’ डॉ0 प्रेम जनमेजय ने अज्ञेय की व्यंग्य चेतना पर बोलते हुए कहा- नागार्जुन, केदार और अज्ञेय पर हुई बातचीत में हम देख रहे हैं कि व्यक्तित्व को कवियों के रचनाकर्म की कसौटी माना जा रहा है। क्या रचनाकार के व्यक्तित्व को उसकी कसौटी माना जा सकता है? अज्ञेय विसंगतियों पर प्रखर प्रहार करने वाले रचनाकार हैं। आधुनिक व्यंग्य का चेहरा अज्ञेय के व्यक्तित्व जैसा-- सौम्य,धीर -गंभीर और स्मित हास्य वाला होना चाहिए जिसमें हंसी आए तो अनावश्यक न लगे।’ रमेश मेहता ने अज्ञेय पर बनी डाक्यूमेंटरी का प्रदर्शन करते हुए कहा -अज्ञेय मौन के कवि थे। वे बहुत ही व्यवस्थित व्यक्तित्व के स्वामी थे। पर जिस दंभ की उनके संबंध् में चर्चा होती है, वह मुझे उनमें कभी नहीं मिला।1983 में जम्मू में युवा कवियों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था कि जिसे छंद का ज्ञान होगा वही तो मुक्त छंद की कविता लिख पाएगा। डॉ0 अवनिजेश अवस्थी ने कहा- अज्ञेय के संबंध् में अध्ूरी आलोचनाएं की जा रही हैं। अज्ञेय को आजतक एक ही चश्मे से देखा गया है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य को ऐतिहासिक योगदान दिया है। डॉ0 अर्चना वर्मा ने ‘अज्ञेय के भाषिक रहस्यवाद’ पर अपना आलेख पढ़ा। डॉ0 वीनू भल्ला ने अज्ञेय से जुड़े संस्मरण के साथ-साथ अज्ञेय के साहित्यिक अवदान की भी चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन विनय विश्वास ने किया।

संगोष्ठी का चौथ सत्र शमशेर बहादुर सिंह पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ0 हरिमोहन शर्मा ने की । सत्र के अध्यक्ष डॉ0 हरिमोहन शर्मा ने कहा - शमशेर में एक जैनुअन आदमी बनने की चाहत थी। आलोचक किसी रचनाकार को एक कठघरे में बांधकर सरल मार्ग अपना लेते हैं। इससे कवि की विचारधरा जानकर उसी फ्रेम में कवि के काव्य-कर्म की व्याख्या कर ली जाती है। शमशेर ने न केवल कविता की भाषा सीखी अपितु अपने मामा से रंगों की भाषा भी सीखी। वे खूब पढ़ने वाले रचनाकार थे जो साहित्य के माध््यम से जीवन की लय को स्वयं में जब्त कर लिया करते थे।’ डॉ0 हरिमोहन ने शमशेर की ‘बैल’ कविता के माध्यम से उनके का्रपफट और विचार को व्याख्यायित किया। डॉ0 दिविक रमेश ने कहा- शमशेर प्रेम के पीछे पड़ने वाले नही, उसपर रीझने वाले कवि हैं। शमशेर जनता के हित में काम करने वाले कवि हैं। शमशेर का क्रापफट सबसे अलग है। डॉ0 अजय नावरिया ने कहा - शमशेर काल से होड़ की शक्ति रखते हैं, जबकि सुविधसंपन्न लोग कतरा कर निकल जाते है। शमशेर ने कहा था कि मुझे अमेरिका का स्टेच्यू ऑपफ लिबर्टी भी उतना ही प्यारा है जितना रूस का लालतारा। यानि शमशेर आजादी को स्पेस देते हैं। कला का संघर्ष समाज के संघर्ष से अलग की चीज नहीं हो सकता है। शमशेर और नागार्जुन, दोनो ने, बात को हथियाद माना है।’ भारत भारद्वाज ने कहा- शमशेर का साहित्यिक व्यक्तित्व एक कवि का है पर उन्होने ‘चांद का मुह टेढ़ा’ है की भूमिका के रूप में जो गद्य लिख है वह अद्भुत है। शमशेर की काव्य-पंक्तियां अपने समय में ही मुहावरा बन गई थंी। अज्ञेय ही नहीं शमशेर की कविता में भी सन्नाटा और मौन है। डॉ0 हेमंत कुकरेती ने कहा - आज प्रेम कामकाजी कुटीर उद्योग बन गया है जिसमें निजीपन नहीं रह गया है किंतु शमशेर में यह निजीपन मिलता है। उनके यहां प्रेम निरा शरीरिक नहीं है।’
अंत में प्रेम जनमेजय ने चारों सत्रों में चर्चित मुद्दों की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा प्रचार्य डॉ0 इंदजीत ने सभी का आभार व्यक्त किया।


प्रस्तुति: शशिभूषण
114 ई, ब्रह्मपुत्र छात्रावास, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।

Thursday, April 14, 2011

अंजना के प्रथम आयोजन का निमंत्रण


निमंत्रण

डॉ. अंजना सहजवाला
की स्मृति में स्थापित नवीन संस्था
'अंजना: एक विचार मंच'
के प्रथम समारोह में
आप सदर आमंत्रित हैं.
(यह संस्था समय समय पर महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए समाज के विशिष्ट विद्वानों के व्याख्यान आयोजित करेगी).

दि. 15 अप्रैल 2011
'गाँधी शांति प्रतिष्ठान' दीन दयाल उपाध्याय मार्ग,दिल्ली सायं 5 से 0830 तक
के इस प्रथम समारोह में व्याख्यान का विषय होगा:

क्या आज़ादी के बाद से अब तक दलित की शक्ति बढ़ी है? वर्तमान परिदृश्य में दलित की स्थिति क्या है?

मुख्य अतिथि : रमणिका गुप्ता

विशिष्ट वक्ता : डॉ. अभय दुबे, डॉ. धीरूभाई शेठ, श्री कमल किशोर कठेरिया व श्रीमती अनीता भारती.

कृपया इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी उपस्थिति अवश्य दें.

निवेदक : प्रेमचंद सहजवाला

Wednesday, April 13, 2011

डॉ. हैनिमन का जन्म दिवस समारोह संपन्न



नई दिल्ली: होम्योपैथी की खोज करने वाले डॉ सैमुएल फेडरिक हैनिमन का २५६ वा जन्म दिवस भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी पर कार्यरत संस्था सिम्पैथी ने अपने मुख्यालय ओमनगर,बदरपुर में दिल्ली रत्न लाल बिहारी लाल द्वारा दीप प्रज्वाल्लन के साथ मनाया. इस अवसर पर सिम्पैथी के निदेशक डॉ. आर. कान्त ने डॉ हैनिमन को याद करते हुए उनके द्वारा होम्योपैथी के लिए किये गए त्याग और समर्पण के बारे में विस्तृत रूप से बताया. डी.आई.एच पी.पी.एस के निदेशक डॉ.के. के. तिवारी ने विश्व में चर्चित हो रही होम्योपैथी की सफलता पर ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा की यह डॉ. हैनीमन की एक अच्छी सोंच का परिणाम है. डॉ अख्तर हुसैन अंसारी ने उनके जीवन और संघर्ष के बारे में लोगों को बताया और कहा की होम्योपैथी ही एक ऐसी पद्धति है जो बिना कुप्रभाव डाले अपना असर दिखाने में सक्षम है. इस अवसर पर राकेश कनौजी, के. पी. सिंह.लाल कला मंच की अध्यक्ष सोनू गुप्ता,मनोज गुप्ता सहित कई गणमान्य व्यक्ती उपस्थित थे.

Monday, April 11, 2011

लिखावट ने आयोजित किया कैम्पस में काव्यपाठ



कविता और विचार के मंच लिखावट तथा भारती परिषद्, हिंदी विभाग, मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के संयुक्त आयोजन में मिरांडा हाउस में हुई काव्य गोष्ठी का 8-4-11 को सफल आयोजन हिंदी के वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी की अध्यक्षता में
कविता पाठ या कविता पर संगोष्ठी रखना एक गंभीर जबावदेही और जटिल संयोजन है। मेरे प्रिय कवि रघुवीर सहाय ने भी तो यही कहा था---‘कविता जीने का उद्देश्य बता नहीं देती, वह स्वंय उद्देश्य बन जाती है।’ इस दौर में सर्वत्र पसरी निर्मम चुप्पी को तोड़ेने की कोशिश कर रही है ‘लिखावट’। 8 अप्रैल 2011 की दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज के इस कविता पाठ में मौजूद रहने का मुझे भी सौभाग्य मिला। इनमें लगभग सभी प्रतिभागी कवियों को मैं अलग-अलग मंच पर सुन चुकी हूं। इब्बार रब्बी जी को मंचीय सभी सम्मोहक मंत्र आते हैं। तभी तो उनकी अति सहज शैली पूरे सभागार से संलाप करती है, जो कि अद्भुत है। मंगलेश डबराल को सुनना सचमुच सुखद एहसास था। उनकी कविताएं प्राय: प्रतिरोध की भाषा अपनाती है। स्वाभिमान से फूटती हैं और मानवीयता और मानवता को स्थापित करने के लिए अंतिम सांस तक लड़ती हैं। अर्चना वर्मा जी की कहानियां और कविताएं सदैव मुझे प्रेरणा देती रही हैं। खुद उनके मुख से उनकी कविता सुनकर उन कविताओं में नए मायने भी मिले। ठीक इसी तरह मिथिलेश श्रीवास्तव जी की कविताओं में मुझे एक प्रतिबद्धता और जिजीविषा दिखाई देती है। हर वह छोटी बड़ी चीज जो समय और समाज के सुर ताल लय में खटकती है मिथिलेश जी उसी पर बखूबी कलम चलाते हैं। मुकेश मानस जी की प्राय: सभी कविताएं शोषितों प्रवंचितों और बेजुवानों की आवाज़ बनती हैं। रजनी अनुरागी मेरी आत्मीया हैं। उनकी कविता समय और समाज के प्रति अपनी जिस जबावदेही तो तलाशती हैं उसे पाने में वे बहुत हद तक सफल भी हुई हैं। कुल मिलाकर इस सफल आयोजन के लिए ‘लिखावट’ के तत्वाधान में मिरांडा हाउस के हिंदी विभाग को मेरा कोटि-कोटि साधुवाद।

डॉ सुधा उपाध्याय
sudhaupadhyaya@gmail.com
mobile-9971816506
हुआ। कार्यक्रम में आये इब्बार रब्बी, अर्चना वर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, मुकेश मानस, रजनी अनुरागी, और मंगलेश डबराल जैसे कवियों नें अपनी कविताओं के साथ वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम का संचालन चंदा सागर नें किया। कार्यक्रम की शुरुवात रजनी अनुरागी की कविता “कविता से हुई जिसने काफी तालियाँ बटोरी इसके बाद रजनी अनुरागी नें औरत, नेपथ्य, मजदूरों की बस्ती, जन ज्वार और दिल्ली मेट्रो आदि कवितायें सुनायीं। रजनी जी के बाद आये कवि मुकेश मानस नें गंभीरता को कम करते हुए कुछ व्यंगात्मक रचनाएँ सुनाई जिसमें “बजाओ ताली” प्रमुख रही, इसके अलावा उन्होंनें नें भेड़ीये, भेडियाधसान, हत्यारा और बेटी का आगमन जैसी कुछ कवितायें उल्लेखनीय कवितायें सुनाई।


वरिष्ठ कवियित्री अर्चना वर्मा नें सिर्फ अपनी उपस्थिति भर से माहौल को गर्म कर दिया था उसके बाद उनकी सुनाई कविताओं आसमान पर ताला और मल्लिका शेरावत के नाम जैसी कविताओं नें गोष्ठी को और ऊँचाई प्रदान की। मिथिलेश श्रीवास्तव की हर कविता नें श्रोताओं के मन पर गहरी छाप छोड़ी एक तरफ “एक जैसे घर” नें समाज में उपस्थित विसंगतियों की पड़ताल की तो दूसरी “कबूतर जैसे हम” नें आम आदमी के मजबूर होने की बात कही साथ ही उन्होंनें “शिविर एक दिन खाली हो गया” जैसी कविता सुनाई जिसनें हर श्रोता को निस्तब्ध कर दिया। मंगलेश डबराल नें छुपम–छुपाई और छुओ जैसी कविताओं के माध्यम से हृदय के सबसे नर्म कोनों को छू लिया और भूमंडलीकरण तथा टोर्च जैसी कविता के माध्यम से बदलते हुए समाज की तरफ इशारा किया। कार्यक्रम के अंत में इब्बार रब्बी नें घना में पक्षी विहार, अरहर की डाल और मधुमेह जैसी कविताओं से श्रोताओं का न सिर्फ मनोरंजन किया बल्कि उन्हें सन्देश भी दिए इसके अलावा उन्होंनें दुर्गा सप्तशती, जब चली रेल, कटोरी में वसंत, और अंतिम कविता जैसी कवितायें सुनाई। रजनी जी द्वारा धन्यवादयापन करने के साथ ही कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न हो गया।

Wednesday, April 6, 2011

मिरांड हाउस में काव्यगोष्ठी, आप भी ज़रूर आएँ



लिखावट

(कविता और विचार का मंच)

मित्रो,
कविता और विचार का मंच लिखावट
और
भारती परिषद्, हिंदी विभाग, मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
के संयुक्त आयोजन में

कैम्पस में कविता

आमंत्रित कवि
इब्बार रब्बी, अर्चना वर्मा, मिथिलेश श्रीवास्तव, मुकेश मानस, रजनी अनुरागी, और मंगलेश डबराल

अध्यक्षता
इब्बार रब्बी

संचालन : चंदा सागर (संपर्क: 9871442565)

दिनांक: शुक्रवार, 8 अप्रैल, 2011
समय : 11:30 दिन से
स्थान : सेमिनार रूम, मिरांडा हाउस

आपका स्वागत है|

सादर
लिखावट / भारती परिषद्, हिंदी विभाग, मिरांडा हाउस
मिथिलेश श्रीवास्तव (संपर्क: 9868628602)

Thursday, January 27, 2011

जनवरी 2011 की 'डॉयलॉग' गोष्ठी का आमंत्रण

आगामी 29 जनवरी 2011 की शाम 5 बजे से "अकेदमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर" के 'म्यूजियम हॉल' में 'डॉयलॉग' (काव्यगोष्ठी) में आप सादर आमंत्रित हैं। काव्यसंध्या का यह कार्यक्रम महीने के आखिरी शनिवार को पिछले छत्तीस वर्षों से आयोजित हो रहा है। जनवरी माह के 'डॉयलॉग' में हिन्द-युग्म के कवियों को काव्यपाठ करने के लिए आमंत्रित किया गया है।

कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार है-

यह कार्यक्रम प्रसिद्ध कवि शमशेर बहादुर सिंह को समर्पित है। इनकी चुनी हुई कविताओं का पाठ कवि कृष्ण कल्पित करेंगे।

आमंत्रित कवि-

अवनीश गौतम, निखिल आनंद गिरि, मनु बेतखल्लुस, मुकुल उपाध्याय, सजीव सारथी, मनुज मेहता, प्रमोद कुमार तिवारी, आकांक्षा पारे और श्याम सुशील।

प्रसिद्ध कवि कुबेर दत्त कवियों के काव्यपाठ पर अपने विचार देंगे।

कार्यक्रम का संयोजन मिथिलेश श्रीवास्तव करेंगे।

दिन व समयः शनिवार, 29 जनवरी 2011, शाम 5 बजे।
स्थानः Academy of Fine Arts And Literature, 4/6 SIRI Fort Institutional Area, New Delhi-49

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें- मिथिलेश श्रीवास्तव, संयोजक, डॉयलॉग, मो. 9868628602, ईमेल- mithil_shri1@yahoo.co.in

कार्यक्रम में ज़रूर पधारें।

Wednesday, January 19, 2011

गणतंत्र-दिवसः आकाशवाणी का सर्वभाषा कवि सम्मेलन

आकाशवाणी महानिदेशालय, के तत्वावधान में गणतंत्र दिवस पर प्रतिवर्ष आयोजित होनेवाला सर्वभाषा कवि सम्मेलन इस वर्ष 18 जनवरी,2011 की संध्या 5.00 बजे वाराणसी केन्द्र द्वारा कबीर चौराहा स्थित मुरारीलाल मेहता प्रेक्षाग्रह में आयोजित किया गया। जिसमें संविधान स्वीकृत बाइस भाषाओं के प्रतिनिधि कवियों ने काव्य पाठ किया। जिसका साथ-ही-साथ हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया गया। कवि सम्मेलन का प्रारंभ संस्कृत के कवि ह्षदेव माधव के रचनापाठ से हुआ जिसका अनुवाद पाठ नीलंप त्रिपाठी ने प्रस्तुत किया। गोहाटी से आईं बोडो कवयित्री स्वर्णप्रभा सैनरी की कविता का अनुवाद दिल्ली से पहुंचे पंडित सुरेश नीरव ने प्रस्तुत किया। अन्य भाषयिक रचनाकारों में मणिकुंतला भट्टाचार्य (असमिया),श्रीनिवास उदगाता (उड़िया), सैयद अली नियाज (उर्दू), डीके रवीन्द्र कुमार(कन्नड़),यूसुफ शेख (कोंकणी),बालकृष्ण संन्यासी (कश्मीरी), अनिल जोशी गुजराती, जितेन्द्र ऊधमपुरी (डोगरी), भारती वासंतन (तमिल),के. शिवारेड्डी (तेलुगु), कमल रेगमी (नेपाली), एस.एस. नूर(पंजाबी), अनुराधा महापात्र (बांग्ला),मुराथिन वरकन्या (मणिपुरी),आलकोड लीलकृश्ण (कन्नड़), श्रीदत्ता हलसगीकर (मराठी), रवीन्द्रनाथ ठाकुर (मैथिली),आसन वासवानी (सिंधी)खेरवाल स्टीन (संथाली), के अतिरिक्त हिंदी कवि विष्णु नागर तथा विनय उपाध्याय ने काविता पाठ किया। संचालन वाराणसी के प्रतिष्ठित गीतकार श्रीकृष्ण तिवारी ने किया। इस अवसर पर आकाशवाणी के महानिदेशक गुलाब सिंह, अतिरिक्त महानिदेशक अलका पाठक तथा दिल्ली केन्द्र के निदेशक लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, कार्यक्रम अधिकारी ललिता चतुर्वेदी तथा साइनाखान भी मौजूद थीं।

Friday, December 31, 2010

मनोज तिवारी को भोजपुरी रतन सम्मान



नई दिल्ली: भोजपुरी गायक व सिने सुपर स्टार मनोज तिवारी को पूर्वांचल एक्सप्रेस और भोजपुरी संसार पत्रिका समूह ने भोजपुरी रतन सम्मान से सम्मानित किया। यह सम्मान उन्हें भोजपुरी सिनेमा, संगीत और फिल्म के माध्यम से विश्व स्तर पर भोजपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार करने हेतु दिया गया। कुछ माह पूर्व पूर्वांचल एक्सप्रेस ने भोजपुरी रतन के चुनाव के लिए एक सर्वे कराया था, जिसमें २५ भोजपुरी रतन व भोजपुरिया विभूति का चुनाव किया गया। उसमें मनोज तिवारी के लिए सबसे ज्यादा लोगो ने अपनी सहमति जताई थी। मनोज तिवारी को यह सम्मान पूर्वांचल एक्सप्रेस व भोजपुरी संसार के कुलदीप श्रीवास्तव, मीडिया क्लब ऑफ़ इंडिया के आनंद प्रकाश और जाने माने भोजपुरी साहित्यकार मनोज भावुक ने संयुक्त रूप से प्रदान किया।

मनोज तिवारी के बिग बॉस से निकलने के बाद भी पूर्वांचल ने भोजपुरिया प्रदेश में एक सर्वे कराया था जिसमें लोगों से यह पूछा गया था कि आप किसको सबसे ज्यादा पसंद करते हैं - सलमान खान या मनोज तिवारी। तो इस में भी मनोज तिवारी ने बाजी मार ली और वह सलमान खान पर बीस साबित हुए।

इसी सर्वे में यह भी पूछा गया था कि क्या मनोज तिवारी बिग बॉस के घर के अंदर भोजपुरी का प्रचार-प्रसार किये तो कुछ लोग मायूस भी थे कि उन्होंने वहाँ पर बहुत कम भोजपुरी बोली या भोजपुरी गाना कम गाया। पर अधिकतर लोगों का यही कहना था कि मनोज तिवारी ने बिग बॉस के अंदर जो छठ पूजा की वह एक तरह से भोजपुरी का हीं प्रचार-प्रसार है। और बिग बॉस के घर में छठ पूजा करना भोजपुरी भाषियों के लिए एक ऐतिहासिक घटना ही थी। सर्वे में अधिकतर लोगों का यह भी कहना था कि मनोज तिवारी को वोट कम नहीं मिले थे। उनको एक साजिश के तहत निकाला गया था। इस बात को लेकर भोजपुरिया समाज में बहुत रोष है।

महेश दर्पण ‘पुश्किन के देस में’



‘रूस के बारे में अभी तक जो संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त हिंदी में प्रकाशित हुए थे, वे सभी उन लेखकों ने लिखे थे जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले यानी सोवियत काल में रूस गए थे. सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने हाल ही में रूस की यात्रा करने के बाद इसी बदले हुए ज़माने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है’ यह परिचय है ‘सामयिक प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित महेश दर्पण की सद्यप्रकाशित यात्रा वृत्तान्त पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ का जो रूसी साहित्यकार ल्युद्मीला ख्खलोवा द्वारा इसी पुस्तक के फ्लैप पर दिया हुआ है.
महेश दर्पण हिंदी साहित्य जगत व पत्रकारिता के एक जाने माने हस्ताक्षर हैं जिन्होंने ‘अपने हाथ’ ‘चेहरे’ ‘मिट्टी की औलाद’ ‘वर्त्तमान में भविष्य’ ‘जाल’ ‘इक्कीस कहानियां’ ‘एक चिड़िया की उड़ान’ आदि जैसे सशक्त कहानी संग्रह हिंदी साहित्य को दिये हैं तथा अनेक सम्मानों यथा ‘पुश्किन सम्मान’, ‘साहित्यकार सम्मान’, हिंदी अकादमी का ‘कृति सम्मान’ व ‘पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ आदि से सम्मानित हुए हैं.
दि. 15 दिसंबर 2010 को उर्मिल सत्यभूषण द्वारा संचालित ‘परिचय साहित्य परिषद’ के तत्वावधान में नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘राशियन कल्चरल सेंटर’ में महेश दर्पण की पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ पर एक बेहद सारगर्भित व विचारोत्तेजक गोष्ठी हुई जिस की अध्यक्षता राजेंद्र यादव ने की तथा प्रसिद्ध कवि विष्णु चन्द्र शर्मा, चित्रा मुद्गल व रमेश उपाध्याय इस संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे.
प्रारंभ में ‘राशियन कल्चलर सेंटर’ की येलेना शटापकिना ने पुष्प भेंट किये तथा ‘परिचय साहित्य परिषद’ की ओर से प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने मंच पर उपस्थित विशिष्ट गण को पुस्तकों के रूप में शब्द-पुष्प भेंट किये.
गोष्ठी में विषय प्रवर्तन स्वयं ‘परिचय साहित्य परिषद’ की अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने किया और कहा कि इस पुस्तक में रूसी समाज का ऐसा जीवंत चित्रण है कि एक एक दृश्य आँखों के सामने घूमता सा नज़र आता है. ‘परिचय साहित्य परिषद’ की हर संगोष्ठी में ‘राशियन सेंटर’ की ओर से किसी न किसी प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार का जीवन वृत्त स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जाता है. उर्मिल सत्यभूषण ने कहा कि आज ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक की चर्चा उसी शृंखला की एक कड़ी जैसी है.
येलेना ने अंग्रेज़ी में भाषण करते हुए एक भारतीय द्वारा रूसी समाज पर लिखी गई एक और पुस्तक पर प्रसन्नता प्रकट की तथा यह भी कहा कि पुस्तक पठनीय है व उसमें रूसी पाठकों के लिये भी कई नई जानकारियाँ हैं.
महेश दर्पण ने संक्षिप्त भाषण अपनी पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि पुश्किन का देस केवल रूस ही नहीं है, वरन पुश्किन का देस भारत भी हो सकता है. उन्होंने रूसी साहित्यकारों की उन कई प्रदर्शनियों का ज़िक्र किया जो रूस में उन्हें देखने को मिली.
वरिष्ठ कवि कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने महेश दर्पण की कहानियों में पारिवारिक संवेदना के संरक्षण की बात की. उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के साथ रूस की तस्वीर बदली और महेश ने अपनी पुस्तक में बदलाव से पहले और बाद के रूस की अच्छी तुलना की है. उन्होंने भी महेश द्वारा वर्णित प्रदर्शनियों व रूसी समाज की झलकियों में चल्चित्रात्मकता का गुण होने की बात कही.
चित्रा मुद्गल ने कहा कि महेश दर्पण की यह पुस्तक एक उपन्यास सी लगती है और उन्होंने टूटते हुए रूसी समाज के जीवन में बहुत गहरे पैठ कर यह पुस्तक लिखी है. रूस के शहरों व गांवों का उन्हें बेहद प्रामाणिक विवरण इस पुस्तक में मिला तथा उन्होंने पुस्तक की पठनीयता की भी प्रशंसा की.



सभागार में एक सशक्त पुस्तक पर इतनी गंभीर चर्चा सुनते हुए हिंदी के कई जाने माने हस्ताक्षर यथा केवल गोस्वामी, हरिपाल त्यागी, सुरेश उनियाल, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, वीरेंद्र सक्सेना प्रेम जनमेजय आदि भी उपस्थित थे. रमेश उपाध्याय ने भी अपने भाषण में इस पुस्तक के औपन्यासिक प्रारूप होने की बात कही और कहा कि इस प्रकार मानो एक नई विधा का जन्म हुआ है. उन्होंने कहा कि ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक केवल उन्हें नहीं वरन उनके समस्त परिवार को बहुत अच्छी लगी.
अपने अध्यक्षीय भाषण में राजेंद्र यादव एक ‘नॉस्टाल्’ज्या सा महसूस करते हुए साठ वर्ष पहले के काल में पहुँच गए जब उन्होंने आगरा में चेखव को पढ़ना शुरू किया था. उन्होंने कलकत्ता की ‘नैशनल लाइब्रेरी’ में भी चेखव को खूब खंगाला. वैसे अपने समय में ही राजेंद्र यादव ने अपने किसी आत्याकथ्य में यह कहा था कि वे स्वयं को चेखव के अधिक निकट पाते हैं. उन्होंने काफी वर्ष पहले रूस पर लिखी हुई प्रभाकर द्विवेदी की पुस्तक ‘पार उतर कहं जइहोँ’ का सन्दर्भ दे कर कहा कि उस पुस्तक की तरह ‘पुश्किन के देस में’ भी एक लंबे अरसे तक उनकी स्मृति में रहेगी.
वैसे देखा जाए तो हिंदी साहित्य के कई कालजयी हस्ताक्षर रूसी साहित्य से प्रभावित रहे, यह बात स्वयं अपने आप में सर्वविदित है. जब भारत ब्रिटिश जैसी उपनिवेशवादी शक्ति के अधीन था तब भारत के स्वाधीनता संघर्ष से जुड़े कई नेताओं यथा नेहरु, सुभाषचंद्र बोस व भगत सिंह पर रूस के समाजवाद की बहुत गहरी छाप रही. भगत सिंह की जीवनी देखी जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि उन्हें मृत्युदंड न मिलता तो भारतीय समाज को एक और लेनिन मिल जाता. साहित्य में भी प्रेमचंद और मैक्सिम गोर्की के व्यक्र्तित्वो कृतित्वों की परस्पर समानता सर्वविदित है. प्रेमचंद ने स्वयं अपनी सोच व साहित्य पर गोर्की के प्रभाव की बात कही थी. नई कहानी के दौर में भी मोहन राकेश राजेन्द्र यादव जैसे सशक्त हस्ताक्षर चेखव से पूर्णतः प्रभावित थे. रूस अब भले ही पहले जैसा रूस नहीं रह गया है और न ही भारत ही पहले सा समाजवादी रहा है, बाज़ार के दबाव में भारत के रूप में भी आमूलचूल परिवर्वन लगातार आ रहे हैं. पर इस के बावजूद भारतीय और रूसी समाज में अब भी कुछ ऐसा बचा है जो उन्हें अपने प्रारंभिक समय से जोड़ता है. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी पुस्तकें उसी समाज के एक एक्स-रे सी लगती हैं जो बदला तो तेज़ी से है पर अपनी कोख को शायद भूल नहीं पाया है व जिसमें अभी भी उस समय के कई अच्छी बुरे अवशेष बचे हैं. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी अन्य कई रचनाओं की आवश्यकता है जो इस विषय को गंभीर शोध की तरह लें और भारत के अमरीका से नैकट्य व रूस से धीमी धीमी बढ़ती दूरी पर अपने चिंतन की प्रचुर रौशनी डालें.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Wednesday, December 1, 2010

जब कूँची में बही गंगा



विगत दिनों भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के आजाद भवन स्थित कला दीर्घा में आस्ट्रीया की सुविख्यात कलाकर्मी उत्त ऐश्बेचर की कला्कृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन भारत और अन्य देश के बौ्द्धिक आदान-प्रदान के अंतर्गत किया गया। उन्होंने अपने चित्रों का विषय दिया था पवित्र गंगा। उनके चित्रों की विशेषता शोख रंगों की उफनती गंगा का आभास दे रही थीं। परस्पर विरोधी रंग इस प्रकार अपनी उपस्थित का आभास करा रहे थे मानों रंग स्वयं मस्तिष्क में चित्रों का रूपायन कर अपनी अमूर्तता को पारिभाषित कर रहे हों।
उत्त ऐशबेचर आस्ट्रीया की ख्याति प्राप्त चित्रकार हैं। अबतक उन्होंने देश-विदेश में अपने चित्रों की नौ अकल चित्र प्रदर्शनी, नौ समूह चित्र प्रदर्शनियों और तीन निजी संग्रह प्रदर्शनी का आयोजन कर चुकी हैं।

आस्ट्रीया के अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स से 1987-88 में दीक्षित होने के उपरांत उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और इस क्षेत्र में सफलता उनके कदम चूम रही है, 1958 में आस्ट्रीया के विल्लाच नामक स्थान पर जन्मी यह महान चित्रकार आजकल पेरिस में रह रही हैं। उनका ईमेल संपर्क है— uteaschbacher@yahoo.fr

प्रस्तुति- शमशेर अहमद खान, 2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054
Ahmedkhan.shamsher@gmail.com

Friday, November 5, 2010

समन्वय श्री सम्मान से ढेरों विद्वान सम्मानित



30 अक्टूबर । नई दिल्ली
विगत दिनों समन्वय श्री संस्था ने सम्मान समारोह का आयोजन किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. श्याम सिंह शशि और विशिष्ट अतिथि डॉ. एस. एस.शर्मा थे। डॉ. शर्मा ने देश की वर्तमान दशा और दिशा पर अपनी टिप्पणी व्यक्त करते हुए संस्था की स्थापना और उद्देश्य पर विचार व्यक्त किया और कहा कि सामाजिक कल्याण में जुटी इस संस्था में जो लोग उपस्थित हुए हैं, वास्तव में वे समाज के हितार्थ सोचने और कुछ कर सकने वाले लोग हैं। लोगों का रुझान अब सस्ते मनोरंजन वाले स्थलों पर अधिक हो गया है। आज भ्रष्टाचार का चहुं ओर बोलबाला है। मीडिया भी वहीं जाता है जहां उसे पैकेज मिलने की पूरी उम्मीद होती है। ऐसे में हमें समाज के कर्तव्य परायाण लोगों को तलाशना होगा और इसी की पूर्ति यह संस्था कर रही है। मैं इस संस्था के अध्यक्ष रामगोपाल शर्मा और समाज सेवी का आभारी हूं जो बड़ी मेहनत और लगन से इस दिशा में सेवा रत हैं।



डॉ. श्याम सिंह शशि ने सम्मानित जनों को बधाई देते हुए। इस संस्था को इस बात की बधाई दी कि संस्था ने जिन लोगों को सम्मानित किया है, वास्तव में इसके हकदार हैं। उन्होंने वर्तमान देश की सामाजिक व्यवस्था पर न केवल अप्नी बेबाक टिप्पणी दी बल्किब मीडिया की दुर्दशा की ओर भी संकेत किया।



संस्था द्वारा सम्मानित जन थे- सर्वश्री/श्रीमती डॉ. कविता शर्मा, डॉ. ओ. पी. मौर्य, डॉ. दिविक रमेश, शमशेर अहमद खान, डॉ. धीरज बहल, डॉ. इंद्रराज, रामफल त्यागी, के.पी.सरीन, सुनील दत्त वत्स, तपन कुमार बरुआ, मंगल सिंह आजाद, गौतम कार और डॉ. अनुभा मित्तल। डॉ. विश्वनाथ सिंह ने इस संस्था के उद्देश्यों और श्री ए.के.बरुआ ने धन्यवाद व्यक्त दिया।