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Friday, November 5, 2010

ग़ज़ल गायक-जोड़ी राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती कला सम्मान


(बाएं से दाएं) समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला, कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल, ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता, संस्थाध्यक्ष कवयित्री माया गोविंद प्रतिष्ठित कथाकार-आयकर आयुक्त आर.के.पालीवाल और गुरु अरविंदजी।

शनिवार को भवंस कल्चर सेंटर अंधेरी में जाने माने ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता को जीवंती फाउंडेशन, मुंबई की ओर से जीवंती कला सम्मान से विभूषित किया गया। वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल,प्रतिष्ठित कथाकार-आयकर आयुक्त आर.के.पालीवाल, समाजसेवी विनोद टिबड़ेवाला और संस्थाध्यक्ष माया गोविंद ने उन्हें यह सम्मान भेंट किया। कवि देवमणि पाण्डेय ने राजेंद्र मेहता से उनके फ़न और शख़्सियत के बारे में चर्चा की। अरविंद गुरु ने आशीर्वाद दिया। शायर राम गोविंद ‘अतहर’ने स्वागत किया। अरविंद राही ने संचालन और अनंत श्रीमाली ने आभार व्यक्त किया। राजेंद्र मेहता ने अपनी ग़ज़लों की अदायगी से श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। श्रोताओं की माँग पर उन्होंने अपना लोकप्रिय नग़मा भी पेश किया-

जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए
तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना

श्रोताओं से उनका परिचय कराते हुए कवि देवमणि पाण्डेय ने बताया कि 1967 में ‘सुरसिंगार संसद’ के प्रोग्राम में राजेंद्र और नीना ने एक साथ मिलकर ग़ज़ल गाई। और ग़ज़ल के मंच की पहली जोड़ी के रूप में सामने आए। मेल और फीमेल को एक साथ ग़ज़ल गाते देखकर संगीत प्रेमी हैरत में पड़ गए थे। मगर इस तरह ग़ज़ल गायिकी में एक नया ट्रेंड कायम हो चुका था। दो साल बाद जब चित्रा और जगजीत सिंह साथ-साथ मंच पर आए तो इस ट्रेंड को पसंद करने वालों की तादाद बुलंदी पर पहुँच चुकी थी।

कवि देवमणि पाण्डेय ने बताया कि सन 1947 में अगस्त माह के आख़िरी दिनों में आज़ादी की खुशियां बंटवारे की कोख़ से जन्मे दंगों की ट्रेजडी में तब्दील हो गईं। जलते मकानों, उजड़ी दुकानों और सड़क पर पानी की तरह बहते इंसानी ख़ून के ख़ौफ़नाक मंज़र के बीच सिर्फ़ एक संदूक लेकर बालक राजेंद्र मेहता का परिवार मुहाजिर के रूप में मुसीबतों का दरिया पार करते हिंदुस्तान की सरहद में दाख़िल हुआ था। उस संदूक में एक हारमोनियम था। कई शहरों की ख़ाक छानने के बाद आख़िरकार वो बच्चा उस हारमोनियम के साथ आर्ट और फ़न की नगरी मुंबई पहुंचा। मुंबई ने उसे और उसने मुंबई को अपना लिया। आज उस बच्चे को लोग ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र मेहता के नाम से जानते हैं।

अपने सम्मान के उत्तर में राजेंद्र मेहता ने कहा कि संगीत के मंच पर उनकी जोड़ी को 44 साल हो चुके हैं। अपने अब तक के सफ़र से हम बेहद ख़ुश है। ऊपरवाले ने हमें इतना कुछ दिया जिसके हम बिलकुल हक़दार नहीं थे।

कवि देवमणि पाण्डेय ने बताया कि राजेंद्र मेहता के बाबा लाहौर के बाइज़्ज़त ज़मींदार थे। पिता की अच्छी-ख़ासी चाय की कंपनी थी। सरकार की तरफ़ से नाना ने पहली जंगे-अज़ीम में और मामा ने दूसरी जंगे-अज़ीम में हिस्सा लिया था। मगर राजेंद्र मेहता को लखनऊ में ख़ुद को गुरबत से बचाने के लिए एक होटल में पर्ची काटने की नौकरी करनी पड़ी। उस समय वे नवीं जमात के तालिबे-इल्म थे। पढ़ाई के साथ नौकरी का यह सिलसिला बारहवीं जमात तक चला। इंटरमीडिएट पास करने पर उन्हें ‘बांबे म्युचुअल इश्योरेंस कंपनी’ में नौकरी मिल गई। 1957 में उन्होंने बीए पास कर लिया। राजेंद्र मेहता की मां को गाने का शौक़ था। बचपन में ही उन्होंने मां से गाना सीखना शुरु कर दिया था। लखनऊ में पुरुषोत्तमदास जलोटा के गुरुभाई भूषण मेहता उनके पड़ोसी थे। उनको सुनकर फिर से गाने के शौक़ ने सिर उठाया। बाक्स में रखा हुआ हारमोनियम बाहर निकल आया। राजेंद्र मेहता ने उर्दू की भी पढ़ाई की। शायर मजाज़ लखनवी और गायिका बेग़म अख़्तर की भी सोहबतें मिलीं। 1960 में उनका तबादला मुंबई हो गया।


(बाएं से दाएं) ग़ज़ल सिंगर राजेंद्र-नीना मेहता ग़ज़ल पेश करते हुए साथ में हैं श्रीधर चारी (तबला), कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय और सुनीलकांत गुप्ता (बाँसुरी)

मुंबई आने से पहले ही राजेंद्र मेहता आकाशवाणी कलाकार बन चुके थे। लखनऊ यूनीवर्सिटी के संगीत मुक़ाबले का ख़िताब जीत चुके थे। कुंदनलाल सहगल की याद में मुम्बई में हुए संगीत मुक़ाबले में राजेंद्र मेहता ने अव्वल मुक़ाम हासिल किया। मरहूम पी.एम.मोरारजी देसाई के हाथों वे ‘मिस्टर गोल्डन वायस ऑफ इंडिया’ अवार्ड से नवाज़े गए। मार्च 1962 में ‘सुर सिंगार संसद’ ने सुगम संगीत को पहली बार अपने प्रोग्राम में शामिल किया। उसमें गाने से पहचान और पुख़्ता हुई। मशहूर संगीत कंपनी एचएमवी ने ‘स्टार्स आफ टुमारो’ के तहत 1963 में राजेंद्र मेहता का पहला रिकार्ड जारी किया। 1965 में जगजीत सिंह से दोस्ती हुई। 1968 में दोनों ने मिलकर करीब बीस शायरों की ग़ज़लें चुनकर ‘ग़ालिब से गुलज़ार तक’ लाजवाब प्रोग्राम पेश किया। इस मौक़े पर उस्ताद अमीर खां, जयदेव, ख़य्याम और सज्जाद हुसैन जैसे कई नामी कलाकर बतौर मेहमान तशरीफ़ लाए थे। इस नए तजुर्बे ने संगीत जगत में धूम मचा दी।

राजेंद्र मेहता को शोहरत और दौलत की भूक कभी नहीं रही। वे हमेशा मध्यम रफ़्तार से चले। उनके चुनिंदा अलबम आए और मंच पर भी उनके चुनिंदा प्रोग्राम हुए। ग़ज़लों को पेश करने के अपने बेमिसाल अंदाज़ से उन्होंने अपना एक ख़ास तबक़ा तैयार किया। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की सतरंगी धनक के साथ ही समाज और सियासत के काले धब्बे भी नज़र आते हैं। मरहूम शायर प्रेमबार बर्टनी के मुहब्बत भरे एक नग़मे को दिल को छू लेने वाले अंदाज़ में पेश करके राजेंद्र और नीना मेहता ने हमेशा के लिए ग़ज़लप्रेमियों के दिलों पर अपना नाम लिख दिया -जब आंचल रात का लहराए और सारा आलम सो जाए तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना।

Friday, November 28, 2008

माया गोविन्द के आवास पर कृष्ण कुमार का सम्मान



बर्मिंघम (यू.के.) से पधारे प्रतिष्ठित कवि एवं हिन्दी सेवी डॉ. कृष्ण कुमार के मुम्बई आगमन पर कवयित्री माया गोविन्द के आवास पर जीवंती संस्था की ओर से उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया| डॉ. कृष्ण कुमार का परिचय कराते हुए कवि-संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि कवि और लेखक होने के साथ ही डॉ. कृष्ण कुमार 'गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय' के ज़रिए पिछले 12 सालों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार और भाषायी समन्वय के अभियान में पूर्णरूप से समर्पित हैं| अपने सम्मान के उत्तर में डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि वक़्त की चुनौतियों को देखते हुए आज यह ज़रूरी हो गया है कि हम अपनी मातृभाषा को जीवित माँ समझें और अपनी भाषाओं के सम्मान में ज़रा भी शर्म न महसूस करें| कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी नादिरा बब्बर, प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखिका डॉ. अचला नागर, कवि डॉ. बोधिसत्व, कथाकार अलका अग्रवाल और गायिका डॉ. रश्मि चौकसे जैसे कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे| इस अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार नंदलाल पाठक ने की| पाठक जी ने चुनिंदा शेर सुनाए-

मैं यूं तो डाल से टूटा हुआ सूखा सा पत्ता हूं
मुझे सर पे उठाए फिर रही हैं आंधियां कितनी

हमने ही सपने बोए थे तब तुम आज फ़सल तक पहुंचे
आँसू बहुत बहाए हमने तब तुम गंगाजल तक पहुंचे



काव्य-पाठ करते कार्यक्रम-संचालक देवमणि पाण्डेय, साथ में नंदलाल पाठक और डॉ॰ कृष्ण कुमार

माया गोविंद ने ब्रजभाषा के कुछ छंद तथा एक ग़ज़ल सुनाई-

सूनी आँखों में जलीं देखीं बत्तियां हमने
जैसे घाटी में छुपी देखीं बस्तियां हमने
अब भटकते हैं हम सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय क्यूं बेच दीं सावन की बदलियां हमने


डॉ. कृष्ण कुमार ने सामयिक कविता पढ़ी-

परबतों से पत्थरों को काटकर लाना सरल
पत्थरों को काटकर मूरत बनाना भी सरल
किन्तु इनमें प्राण का लाना नहीं आसान है
चेतना को बेच अब सोया हुआ इंसान है



माया गोविंद जी को अपनी काव्य-पुस्तक 'बस एक नज़्म और' भेंट करते हुए ओ॰एन॰जी॰सी॰ के राजभाषा प्रमुख दिनेश थपलियाल, साथ में डॉ॰ कृष्ण कुमार

संचालक देवमणि पाण्डेय ने ग़ज़ल सुनाई-

इस जहां में प्यार महके ज़िंदगी बाक़ी रहे
ये दुआ मांगो दिलों में रोशनी बाक़ी रहे
आदमी पूरा हुआ तो देवता हो जाएगा
ये ज़रूरी है कि उसमें कुछ कमी बाक़ी रहे


नवभारत टाइम्स से जुड़े पत्रकार कैलाश सेंगर ने भी ग़ज़ल सुनाई-

गूंगी चीखें, बांझ भूख और उस बेबस सन्नाटे में
हमने अपनी ग़ज़लें खोजीं चूल्हे, चौके, आटे में


इनके अलावा गोष्ठी में कवितापाठ करने वाले मुम्बई महानगर के प्रमुख रचनाकार थे- डॉ. सुषमासेन गुप्ता, देवी नागरानी, कविता गुप्ता, रेखा रोशनी, राम गोविन्द, दिनेश थपलियाल, दीपक खेर, और अनंत श्रीमाली | 'जीवंती' के अध्यक्ष वेद रतन ने आभार व्यक्त किया |