Friday, November 28, 2008

माया गोविन्द के आवास पर कृष्ण कुमार का सम्मान



बर्मिंघम (यू.के.) से पधारे प्रतिष्ठित कवि एवं हिन्दी सेवी डॉ. कृष्ण कुमार के मुम्बई आगमन पर कवयित्री माया गोविन्द के आवास पर जीवंती संस्था की ओर से उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया| डॉ. कृष्ण कुमार का परिचय कराते हुए कवि-संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि कवि और लेखक होने के साथ ही डॉ. कृष्ण कुमार 'गीतांजलि बहुभाषीय साहित्यिक समुदाय' के ज़रिए पिछले 12 सालों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार और भाषायी समन्वय के अभियान में पूर्णरूप से समर्पित हैं| अपने सम्मान के उत्तर में डॉ. कृष्ण कुमार ने कहा कि वक़्त की चुनौतियों को देखते हुए आज यह ज़रूरी हो गया है कि हम अपनी मातृभाषा को जीवित माँ समझें और अपनी भाषाओं के सम्मान में ज़रा भी शर्म न महसूस करें| कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध रंगकर्मी नादिरा बब्बर, प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखिका डॉ. अचला नागर, कवि डॉ. बोधिसत्व, कथाकार अलका अग्रवाल और गायिका डॉ. रश्मि चौकसे जैसे कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे| इस अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार नंदलाल पाठक ने की| पाठक जी ने चुनिंदा शेर सुनाए-

मैं यूं तो डाल से टूटा हुआ सूखा सा पत्ता हूं
मुझे सर पे उठाए फिर रही हैं आंधियां कितनी

हमने ही सपने बोए थे तब तुम आज फ़सल तक पहुंचे
आँसू बहुत बहाए हमने तब तुम गंगाजल तक पहुंचे



काव्य-पाठ करते कार्यक्रम-संचालक देवमणि पाण्डेय, साथ में नंदलाल पाठक और डॉ॰ कृष्ण कुमार

माया गोविंद ने ब्रजभाषा के कुछ छंद तथा एक ग़ज़ल सुनाई-

सूनी आँखों में जलीं देखीं बत्तियां हमने
जैसे घाटी में छुपी देखीं बस्तियां हमने
अब भटकते हैं हम सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय क्यूं बेच दीं सावन की बदलियां हमने


डॉ. कृष्ण कुमार ने सामयिक कविता पढ़ी-

परबतों से पत्थरों को काटकर लाना सरल
पत्थरों को काटकर मूरत बनाना भी सरल
किन्तु इनमें प्राण का लाना नहीं आसान है
चेतना को बेच अब सोया हुआ इंसान है



माया गोविंद जी को अपनी काव्य-पुस्तक 'बस एक नज़्म और' भेंट करते हुए ओ॰एन॰जी॰सी॰ के राजभाषा प्रमुख दिनेश थपलियाल, साथ में डॉ॰ कृष्ण कुमार

संचालक देवमणि पाण्डेय ने ग़ज़ल सुनाई-

इस जहां में प्यार महके ज़िंदगी बाक़ी रहे
ये दुआ मांगो दिलों में रोशनी बाक़ी रहे
आदमी पूरा हुआ तो देवता हो जाएगा
ये ज़रूरी है कि उसमें कुछ कमी बाक़ी रहे


नवभारत टाइम्स से जुड़े पत्रकार कैलाश सेंगर ने भी ग़ज़ल सुनाई-

गूंगी चीखें, बांझ भूख और उस बेबस सन्नाटे में
हमने अपनी ग़ज़लें खोजीं चूल्हे, चौके, आटे में


इनके अलावा गोष्ठी में कवितापाठ करने वाले मुम्बई महानगर के प्रमुख रचनाकार थे- डॉ. सुषमासेन गुप्ता, देवी नागरानी, कविता गुप्ता, रेखा रोशनी, राम गोविन्द, दिनेश थपलियाल, दीपक खेर, और अनंत श्रीमाली | 'जीवंती' के अध्यक्ष वेद रतन ने आभार व्यक्त किया |


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पाठक का कहना है :

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

राजीवजी से मुम्बई में हुए कार्यक्रम में मै मिला था |

सुनकर दुःख हुया | इस्वर उनकी आत्मा को शान्ति दें |

-- अवनीश तिवारी

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