Thursday, March 18, 2010

हिंदी नव वर्ष पर आनंदम् की काव्य गोष्ठी



दिनांक 16 मार्च की शाम MAX INSURNACE के सभागार में एक यादगार शाम बन गयी . शायरी के शिखर पर पहुँची यह शाम सभी के दिलों में मुहब्बत का पैगाम देती हँसते, रुलाते और कई सन्देश देते गुज़री . जहाँ एक ओर ग़ज़लों ने अपने रंग बिखेरे वहीं कविताएँ वाह-वाह बटोरती चली गयीं. इश्क दर्द गरीबी राजनीति तथा जज्बातों से भरी हर रचना कभी हंसा देती थी तो कभी गंभीर कर देती और कभी कुछ सोचने पर मजबूर कर देती

इस काव्य गोष्ठी की सदारत जाने माने वरिष्ठ कवि राज गोपाल सिंह जी ने की. आनंदम् के अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने उनका स्वागत एक भेट दे कर किया. संचालन किया कवयित्री ममता किरण ने . जिन कावियो ने शिरकत की उनके नाम है : मुनव्वर सरहदी, अनीस अहमद अनीस , मजाज़ अमरोही, जगदीश रावतानी , सुषमा भंडारी, वीरेंद्र कमर , नश्तर अमरोहवी, मनमोहन तालिब , रज़ी अमरोहवी , ममता अगरवाल , शशिकांत सदैव, प्रेम सहजवाला, शिव कुमार मिश्र , शोभना मित्तल , सतीश सागर, पुरषोत्तम वज्र , अहमद अली बर्की सत्यवान, लाल बिहारी लाल , तूलिका , जितेंदर परवाज़, सुमित्रा वरुण, श्याम सुंदर नूर, नाशाद देहलवी, इरफ़ान अहमद, स्वर्ण कुमार रेंगा. जो रचनाए पढ़ी गईं उनमे से कुछ यंहा प्रस्तुत हैं :

मनमोहन तालिब:
रख के सूरज जो सर पे चलते हैं
पांव धरती पर उनके जलते हैं
मंजिले मिलती हैं अमल ही से
बेअमल लोग हाथ मलते हैं

वीरेंद्र कमर :
कह रहे हो भूल जाना चाहिए
भूलने को इक ज़माना चाहिए
साकिया अब तो जनाबे शरीक को
ढल चुकी है शाम आना चाहिए

नश्तर अमरोहवी
बोली बेगम क्या करोगे तुम मेरे मरने के बाद
पागल हो जाऊँगा मैंने कह दिया कुछ सोच के
बोली यह वादा करो शादी नहीं कर लोगे तुम
मैं बोला क्या भरोसा कोई पागल क्या करे

MAMTA AGARWAL :
I AM HAPPY TODAY
I DON'T KNOW WHY
MIND WANTS TO KNOW THE REASON
HEART SAYS DO NOT TRY
JUST BE.....


मुनव्वर सरहदी
चरागों को झूठी तसल्ली न दीजिए
नसीब में इनके सवेरा नहीं


ममता किरण
बशर के बीच पहले भेद करते है सियासतदाँ
ज़रूरत फिर जताते हैं किसी कौमी तराने की

अनीस अहमद अनीस
अंदर अंदर भी होली रहती है
दिल की पिचकारी चलती रहती है

सतीश सागर
दुख के दिन देखने पड़े हैं हमको
व्यंग्य तक झेलने पड़े हैं हमको
अंधे लोगों के बीच जाकर
आईने बेचने पड़े हैं हमको

शोभना मित्तल
बड़ा को-ऑपरेटिव भगवान है, फिर कैसा व्यवधान
कर लो पाप जी भर भैया, प्रायश्चित का है प्रावधान




मासूम गाजयाबदी
हाँ माना पहुचना तुझ तक बहुत मुश्किल है कातिल का
मगर जब रास्ता देंगे तेरी ही पासबां होंगे

सुषमा भंडारी
दह जाऊ तो आग हूँ बह जाऊं तो नीर
ढह जाऊं तो रेत हूँ सह जाऊं तो पीर

मजाज़ अमरोही
उनके जलवे वादिये कश्मीर से कुछ कम नहीं
में हूँ राँझा कि तरह वो हीर से कम नहीं

अहमद अली बर्की
आदी हूँ जिंदगी के नशेबो फराजा का
तामीर कर रहा हू वही घर जो जल गया



डॉ रज़ी अमरोही
एसी कहाँ दुनिया में तकदीर हमारी
बीवी वही प्यारी है जो अल्हा को प्यारी

शशिकांत सदैव
आटे में नौन कम था सो ऑसू मिला लिया
आंच का बहाना बनाकर आंसू छुपा लिया

राज गोपाल सिंह जी ने आनंदम की लगातार हो रही कामयाब और ख़ूबसूरत गोष्ठियों की प्रशंसा करते हुए इन्हें इसी खलूस और कौमी एकता के जज्बे के साथ कायम रखने की सलाह दी. अंत में जगदीश रावतानी जी ने सब का आभार प्रकट करते हुए कहा कि आप लोग यह मुहब्बत बरकरार रखते हुए आनंदम की गोष्ठियों में यू ही आते रहें और अपनी रचनाओं से माहौल में सच्चाई, इश्क़ और सद्भावना के रंग बिखेरते रहें.

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2 पाठकों का कहना है :

murtaza का कहना है कि -

aapki mehfil bari achchi lagi zindagi ki yeh ghari achchi lagi sikander amrohvi

gautam का कहना है कि -

Though not fortunate enough to be a part of the Goshti but can imagine the grand occasion filled with its mesmerising and thoughtful vibrations touching both heads and hearts. Wish u all success in the times to come. May the messages of love, brotherhood harmony and humanity cross all barriers to reach everywhere.
- Gautam Sapra

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