Thursday, August 26, 2010

लन्दन में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस समारोह कैसे संपन्न हुआ



इस बार फिर सोचने लगी थी कि १५ अगस्त के दिन हर साल की तरह यहाँ लन्दन में फिर चुपचाप पब्लिक के जाने बिना अपना भारतीय तिरंगा इंडिया हाउस में फहरा दिया जायेगा..जहाँ भारतीय दूतावास है...लेकिन क्या पता था कि इस साल यह कार्यक्रम कुछ फरक तरह से मनाया जायेगा...बस यूँ कहिये कि हमने जरा सी जिज्ञासा दिखाकर पूछताछ की तो पता चला कि यहाँ लन्दन में इस बार इतने सालों के बाद पहली बार हमारे भारतीय स्वतंत्रता दिवस को हाई कमिश्नर की तरफ से धूमधाम से मनाने का आयोजन रखा गया है...बस फिर क्या था हमने भी सोचा की क्यों नहीं वहाँ पहुँच कर स्वतंत्रता के इस पावन दिवस को मनाने का आनंद लिया जाये..और ११ बजे से चालू होने वाले कार्यक्रम के लिए हम लोग घर से निकल पड़े सुबह ९ बजे ही...क्योंकि लन्दन में रहते हुये भी एरिया पर निर्भर करता है की कहाँ रह रहे हैं..उसी हिसाब से समय लगता है गंतव्य स्थान तक पहुँचने में...तो हम लोग ११ से पहले ही पहुँच गये '' इंडियन जिमखाना क्लब '' नाम की जगह...जहाँ ये उत्सव मनाया जाना था. वहाँ बाहर सड़क बुरी तरह ट्रैफिक से भरी थी और तमाम पुलिस तैनात थी सुरक्षा के लिये..तमाम लोग लन्दन से बाहर के शहरों से भी आ रहे थे...गेट के अन्दर पहुँच कर सबने नजरें दौड़ायीं और भीड़ में खड़े होने के लिये अपना स्थान चुना..और इंतजार करने लगे कमिश्नर साहेब का..इंतज़ार करते हुये ११ बज गये फिर सवा ११ हुये..इस तरह इंतज़ार करते समय गुजरता गया और उनका कहीं पता नहीं..आप ही सोचिये कि कमिश्नर साहेब भारतीय होने के नाते लेट तो होंगे ही...जैसे कि हमारे यहाँ हर चीज़ का रिवाज़ है...भारत में ट्रेन आती है तो लेट या पहुँचती है तो लेट, शादी-ब्याह में दूल्हा की बारात पहुँचती है तो लेट, कोई भाषण देने जाता है तो लेट...प्रोफेसर आते हैं क्लास रूम में तो वो लेट..खैर, किसी तरह वह निश्चित समय के आध घंटा बाद अपनी तशरीफ़ लाये और बिल्डिंग की छत पर पहुँचे और फिर लोग बाग फोटो की खींचा-खाँची में लग गये...हम साँस साधे उस पल का इंतजार करने लगे कि कब झंडा ऊँचा हो..उन्होंने फिर देर लगायी...कुछ गप-शप की कुछ VIP लोगों से हाथ मिलाते हुये और उसके बाद राम-राम करके झंडा ऊँचा करने का समारोह संपन्न किया..और फिर किसी महिला ने स्पीच दी..उन्हीं समस्याओं पर जिनके बारे में हम, आप सभी जानते हैं कि हमारे भारत को पराधीनता से मुक्त होने बाद भी क्यों उन भयानक परिस्थितियों और समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है जो हमें स्वतंत्र होने का आभास नहीं दिलाते और संभवतया हम भारतवासी इसके बारे में क्या कर सकते हैं कि देश की दशा सुधर सके...आदि-आदि....और स्पीच के तुरंत बाद पार्क में लगे हुये पंडाल में और उसके बाहर भी खाने के जो तमाम स्टाल थे उनके चारों तरफ भीड़ से जगह भरने लगी...जहाँ शुद्ध शाकाहारी खाने का इंतजाम किया गया था..भारत के उत्तर, दक्षिण, गुजरात और पंजाब के तरह- तरह के स्वाद के खाने व मिठाइयाँ थीं साथ में चाय का इंतजाम और मिनरल वाटर की हजारों बोतलें और साफ्ट ड्रिंक जैसे कि कोका कोला और फ्रूट जूस के पैकेट सब कुछ फ्री में..ये सारा कुछ इंतजाम लन्दन के तमाम भारतीय रेस्टोरेंट के मालिकों की तरफ से स्वतंत्रता दिवस के सम्मान में फ्री किया गया. खाने की इतने चीजें थीं कि दो-चार चीजों को खाकर ही पेट भर जाये..लेकिन कुछ लोग जानते हुये भी कि सब नहीं खा पायेंगे फिर भी प्लेटों में सब भर लेते हैं और बाद को खाना जमीन पर फेंकते हैं या इधर-उधर चुपचाप रख देते हैं...और देखने पर सोचना पड़ता है की दुनिया में तमाम लोग इस खाने के लिये तरस रहे होंगे..तो यहाँ भी वही नजारा देखने को मिला. अच्छा हुआ कि वहाँ कोई पान का स्टाल नहीं था वर्ना लोग इधर-उधर पुचुर-पुचुर थूकते..भारतीय जहाँ भी जाते हैं अपनी आदतें तो साथ में ही ले जाते हैं ना. हाँ तो, खाना भी चल रहा था..और उधर दूर पर स्टेज पर भंगड़ा नाच-गाना शुरू हो गया..बताना जरूरी है कि यू. के. में भंगड़ा डांस और गाना बहुत पापुलर है...हम भी फटाफट पहुँचे देखने स्टेज के पास. देखा की सब की सब कुर्सियाँ पहले से ही जब्त हो चुकी हैं..पंडाल में भी कुछ लोग एक कुर्सी पर बैठ कर अपने पैर पसारे चार कुर्सियों को घेर कर बैठे हुये थे पूछने पर पता लगा कि उनके साथ के कुछ लोग बाहर बैठे स्टेज का शो देख रहे हैं तो उनके लिये सुरक्षित रख छोड़ी हैं..कहने का मतलब कि बाहर भी वह कुर्सियों पर बैठे हैं और अन्दर वाली कुर्सियों को किसी की निगरानी में छोड़ गये हैं..आप लोग मतलब समझ गये होंगे की हमारे देश की ये एक और आदत है...एक सीट की वजाय चार घेर लेते हैं चाहें दूसरे व्यक्ति को खड़े रहना पड़े...चलिये छोडिये भी हम सभी वाकिफ हैं इन बातों से...फिर हम जमीन पर आराम से पसर गये और थोड़ी ही देर में मौका देखते ही किसी के उठने पर उस चेयर पर जाकर जम गये...तो बात हो रही थी मनोरंजन की...तो स्टेज पर के मनोरंजन में प्रमुखता भंगड़ा दिखाया गया साथ में भरत नाट्यम और दूसरी प्रकार के डांस भी...यहाँ नीसडन में स्वामी नारायण मंदिर के शिष्यों ने बहुत सुन्दर गाना गाकर तिरंगे को हाथ में लेकर डांस किया..तमाम सिंगर्स ने देशभक्ति के गाने गये..जो दिल की गहराइयों में उतर गये और वहाँ का पूरा माहौल झूम उठा...तमाम बच्चे व बड़े लोग उठकर नाचने और गाने लगे गाने सुनकर...कितने लोग अपनी राष्ट्रीय तिरंगे की डिजाइन के कपडे पहने घूम रहे थे..छोटे बच्चे तिरंगे पकडे हुये थे..और फोटो खिंचवा रहे थे..सारे बातावरण में उल्लास और उत्साह था..कुछ लोगों को पुरूस्कार बितरण किये गये जिनमें भारत से आई हुई एक क्रिकेट टीम भी थी उसमें वो लोग थे जिन्हें ढंग से दिखाई नहीं देता..उस टीम ने इंग्लैण्ड को तीन बार मैच में हराया तो उन्हें उस सम्मान में कमिश्नर नलिन सूरी जी ने टीम के हर व्यक्ति को अलग-अलग गिफ्ट के बैग दिये...उसके बाद भी गाने वगैरा चलते रहे और फिर करीब चार बजे कार्यक्रम का समापन हुआ.
एक बात बताना भूले ही जा रही थी...कि भारत पर मुफ्त में तमाम लिटरेचर भी बैग में भर कर ले जाने को दिया जा रहा था...मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि जगहों की जानकारी के बारे में..उसके अलावा और भी बहुत कुछ..सभी लोगों को डिजाइनर पैक में पेड़े की मिठाई भी पकड़ाई जा रही +थी...इस तरह सारा दिन फ्री का मनोरंजन हुआ...उसके बाद घर की रास्ता पकड़ी...

ये मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुये हैं उनकी जरा याद करो क़ुरबानी.

नेहरु जी की आँखों में इस गाने को सुनकर आँसू आ गये थे..है ना..? जय हिंद !















-शन्नो अग्रवाल

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

6 पाठकों का कहना है :

हमारीवाणी.कॉम का कहना है कि -

क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत किया है?
अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.
हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

shanno का कहना है कि -

हमारीबाणी.कॉम जी,

आपका बहुत आभार और धन्यबाद...

डॉ महेश सिन्हा का कहना है कि -

उस एक बूंद आँसू की बहुत कीमत चुकाई इस देश ने।
जय हिन्द

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

वाह!..क्या सीन है!....आप को इस समारोह में जा कर भारत में होने का अहसास जरुर हुआ होगा!...वैसे यह अच्छा हुआ कि स्वतंत्रता दिवस मनाया तो गया!....जय हिन्द!

shanno का कहना है कि -

अरुणा जी,

हाँ, बहुत अच्छा लगा था..बिलकुल भारत में हुये किसी समारोह की तरह. एक नया अनुभव था यहाँ पर स्वतंत्रता दिवस को देखने का. वैसे तो भारतीय स्टाइल के मेले भी कई सालों से गर्मी के मौसम में लगते हैं खूब कई जगहों में..उनमें अंग्रेज भी जाकर खूब आनंद लेते हैं..लेकिन ये समारोह अपने में एक बिशेषता लिये हुये था..क्योंकि ये दिन भारत का स्वतंत्रता दिवस था इसलिये.फोटो तो और भी बहुत ली हुई हैं. धन्यबाद.

जय हिंद !

shanno का कहना है कि -

महेश जी,

आलेख पढ़कर अपनी अभिव्यक्ति देने का बहुत धन्यबाद.

जय हिंद !

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)