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Thursday, August 26, 2010

लन्दन में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस समारोह कैसे संपन्न हुआ



इस बार फिर सोचने लगी थी कि १५ अगस्त के दिन हर साल की तरह यहाँ लन्दन में फिर चुपचाप पब्लिक के जाने बिना अपना भारतीय तिरंगा इंडिया हाउस में फहरा दिया जायेगा..जहाँ भारतीय दूतावास है...लेकिन क्या पता था कि इस साल यह कार्यक्रम कुछ फरक तरह से मनाया जायेगा...बस यूँ कहिये कि हमने जरा सी जिज्ञासा दिखाकर पूछताछ की तो पता चला कि यहाँ लन्दन में इस बार इतने सालों के बाद पहली बार हमारे भारतीय स्वतंत्रता दिवस को हाई कमिश्नर की तरफ से धूमधाम से मनाने का आयोजन रखा गया है...बस फिर क्या था हमने भी सोचा की क्यों नहीं वहाँ पहुँच कर स्वतंत्रता के इस पावन दिवस को मनाने का आनंद लिया जाये..और ११ बजे से चालू होने वाले कार्यक्रम के लिए हम लोग घर से निकल पड़े सुबह ९ बजे ही...क्योंकि लन्दन में रहते हुये भी एरिया पर निर्भर करता है की कहाँ रह रहे हैं..उसी हिसाब से समय लगता है गंतव्य स्थान तक पहुँचने में...तो हम लोग ११ से पहले ही पहुँच गये '' इंडियन जिमखाना क्लब '' नाम की जगह...जहाँ ये उत्सव मनाया जाना था. वहाँ बाहर सड़क बुरी तरह ट्रैफिक से भरी थी और तमाम पुलिस तैनात थी सुरक्षा के लिये..तमाम लोग लन्दन से बाहर के शहरों से भी आ रहे थे...गेट के अन्दर पहुँच कर सबने नजरें दौड़ायीं और भीड़ में खड़े होने के लिये अपना स्थान चुना..और इंतजार करने लगे कमिश्नर साहेब का..इंतज़ार करते हुये ११ बज गये फिर सवा ११ हुये..इस तरह इंतज़ार करते समय गुजरता गया और उनका कहीं पता नहीं..आप ही सोचिये कि कमिश्नर साहेब भारतीय होने के नाते लेट तो होंगे ही...जैसे कि हमारे यहाँ हर चीज़ का रिवाज़ है...भारत में ट्रेन आती है तो लेट या पहुँचती है तो लेट, शादी-ब्याह में दूल्हा की बारात पहुँचती है तो लेट, कोई भाषण देने जाता है तो लेट...प्रोफेसर आते हैं क्लास रूम में तो वो लेट..खैर, किसी तरह वह निश्चित समय के आध घंटा बाद अपनी तशरीफ़ लाये और बिल्डिंग की छत पर पहुँचे और फिर लोग बाग फोटो की खींचा-खाँची में लग गये...हम साँस साधे उस पल का इंतजार करने लगे कि कब झंडा ऊँचा हो..उन्होंने फिर देर लगायी...कुछ गप-शप की कुछ VIP लोगों से हाथ मिलाते हुये और उसके बाद राम-राम करके झंडा ऊँचा करने का समारोह संपन्न किया..और फिर किसी महिला ने स्पीच दी..उन्हीं समस्याओं पर जिनके बारे में हम, आप सभी जानते हैं कि हमारे भारत को पराधीनता से मुक्त होने बाद भी क्यों उन भयानक परिस्थितियों और समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है जो हमें स्वतंत्र होने का आभास नहीं दिलाते और संभवतया हम भारतवासी इसके बारे में क्या कर सकते हैं कि देश की दशा सुधर सके...आदि-आदि....और स्पीच के तुरंत बाद पार्क में लगे हुये पंडाल में और उसके बाहर भी खाने के जो तमाम स्टाल थे उनके चारों तरफ भीड़ से जगह भरने लगी...जहाँ शुद्ध शाकाहारी खाने का इंतजाम किया गया था..भारत के उत्तर, दक्षिण, गुजरात और पंजाब के तरह- तरह के स्वाद के खाने व मिठाइयाँ थीं साथ में चाय का इंतजाम और मिनरल वाटर की हजारों बोतलें और साफ्ट ड्रिंक जैसे कि कोका कोला और फ्रूट जूस के पैकेट सब कुछ फ्री में..ये सारा कुछ इंतजाम लन्दन के तमाम भारतीय रेस्टोरेंट के मालिकों की तरफ से स्वतंत्रता दिवस के सम्मान में फ्री किया गया. खाने की इतने चीजें थीं कि दो-चार चीजों को खाकर ही पेट भर जाये..लेकिन कुछ लोग जानते हुये भी कि सब नहीं खा पायेंगे फिर भी प्लेटों में सब भर लेते हैं और बाद को खाना जमीन पर फेंकते हैं या इधर-उधर चुपचाप रख देते हैं...और देखने पर सोचना पड़ता है की दुनिया में तमाम लोग इस खाने के लिये तरस रहे होंगे..तो यहाँ भी वही नजारा देखने को मिला. अच्छा हुआ कि वहाँ कोई पान का स्टाल नहीं था वर्ना लोग इधर-उधर पुचुर-पुचुर थूकते..भारतीय जहाँ भी जाते हैं अपनी आदतें तो साथ में ही ले जाते हैं ना. हाँ तो, खाना भी चल रहा था..और उधर दूर पर स्टेज पर भंगड़ा नाच-गाना शुरू हो गया..बताना जरूरी है कि यू. के. में भंगड़ा डांस और गाना बहुत पापुलर है...हम भी फटाफट पहुँचे देखने स्टेज के पास. देखा की सब की सब कुर्सियाँ पहले से ही जब्त हो चुकी हैं..पंडाल में भी कुछ लोग एक कुर्सी पर बैठ कर अपने पैर पसारे चार कुर्सियों को घेर कर बैठे हुये थे पूछने पर पता लगा कि उनके साथ के कुछ लोग बाहर बैठे स्टेज का शो देख रहे हैं तो उनके लिये सुरक्षित रख छोड़ी हैं..कहने का मतलब कि बाहर भी वह कुर्सियों पर बैठे हैं और अन्दर वाली कुर्सियों को किसी की निगरानी में छोड़ गये हैं..आप लोग मतलब समझ गये होंगे की हमारे देश की ये एक और आदत है...एक सीट की वजाय चार घेर लेते हैं चाहें दूसरे व्यक्ति को खड़े रहना पड़े...चलिये छोडिये भी हम सभी वाकिफ हैं इन बातों से...फिर हम जमीन पर आराम से पसर गये और थोड़ी ही देर में मौका देखते ही किसी के उठने पर उस चेयर पर जाकर जम गये...तो बात हो रही थी मनोरंजन की...तो स्टेज पर के मनोरंजन में प्रमुखता भंगड़ा दिखाया गया साथ में भरत नाट्यम और दूसरी प्रकार के डांस भी...यहाँ नीसडन में स्वामी नारायण मंदिर के शिष्यों ने बहुत सुन्दर गाना गाकर तिरंगे को हाथ में लेकर डांस किया..तमाम सिंगर्स ने देशभक्ति के गाने गये..जो दिल की गहराइयों में उतर गये और वहाँ का पूरा माहौल झूम उठा...तमाम बच्चे व बड़े लोग उठकर नाचने और गाने लगे गाने सुनकर...कितने लोग अपनी राष्ट्रीय तिरंगे की डिजाइन के कपडे पहने घूम रहे थे..छोटे बच्चे तिरंगे पकडे हुये थे..और फोटो खिंचवा रहे थे..सारे बातावरण में उल्लास और उत्साह था..कुछ लोगों को पुरूस्कार बितरण किये गये जिनमें भारत से आई हुई एक क्रिकेट टीम भी थी उसमें वो लोग थे जिन्हें ढंग से दिखाई नहीं देता..उस टीम ने इंग्लैण्ड को तीन बार मैच में हराया तो उन्हें उस सम्मान में कमिश्नर नलिन सूरी जी ने टीम के हर व्यक्ति को अलग-अलग गिफ्ट के बैग दिये...उसके बाद भी गाने वगैरा चलते रहे और फिर करीब चार बजे कार्यक्रम का समापन हुआ.
एक बात बताना भूले ही जा रही थी...कि भारत पर मुफ्त में तमाम लिटरेचर भी बैग में भर कर ले जाने को दिया जा रहा था...मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि जगहों की जानकारी के बारे में..उसके अलावा और भी बहुत कुछ..सभी लोगों को डिजाइनर पैक में पेड़े की मिठाई भी पकड़ाई जा रही +थी...इस तरह सारा दिन फ्री का मनोरंजन हुआ...उसके बाद घर की रास्ता पकड़ी...

ये मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी
जो शहीद हुये हैं उनकी जरा याद करो क़ुरबानी.

नेहरु जी की आँखों में इस गाने को सुनकर आँसू आ गये थे..है ना..? जय हिंद !















-शन्नो अग्रवाल

Friday, January 15, 2010

मॉरीशस में विश्व हिन्दी दिवस 2010 समारोह

मॉरीशस की हिन्दी कविता के द्वार पर नई पीढ़ी की दस्तक

अनेक प्रतिष्ठित स्थानीय रचनाकारों का अब तक यही रोना रहा है कि युवा पीढ़ी हिन्दी लेखन के प्रति उदासीनता ली हुई है. अब तक की पाई जाने वाली रचनाओं का सृजन जाने-माने साहित्यिकों के द्वारा ही सम्पन्न हुआ है. परंतु कुछ दिनों से मॉरीशस की हिन्दी कविता की अविरल धारा को प्रवाहित करने में जुड़ गया है यह ‘उदासीन’ कवि-समुदाय. इस समुदाय में कविता-लेखन के प्रति चेतना तो बहुत पहले से ही जाग चुकी थी, अनेक युवा कवि व्यक्तिगत रूप से इस अथाह समुद्र में अपनी बूँद को अर्पित करते गए (बहुत कम recognition पाए हुए या कभी कभी बिना recognition के) मगर इस बार एक बहुत बड़े मंच ने इनका स्वागत किया. एक ऐसे मंच जिसकी तलाश यह पीढ़ी न जाने कब से करती आ रही थी.
मंच प्रदान किया हिन्दी दिवस 2010 के अवसर ने.

इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र के सभागार में, रविवार 10 जनवरी 2010 को, विश्व हिन्दी सचिवालय, शिक्षा, संस्कृति एवं मानव संसाधन मन्त्रालय, भारतीय उच्चायोग, इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र तथा हिन्दी संगठन के मिले-जुले सहयोग से विश्व हिन्दी दिवस 2010 मनाया गया जिसमें मुख्य अतिथि हंगरी के भारोपीय शिक्षा विभाग से आई हुई डॉ. मारिया नेज्यैशी थी. इस उपल्क्ष्य पर विश्व हिन्दी सचिवालय की एक रचना (एक विश्व हिन्दी पत्रिका) का भी लोकार्पण गणराज्य के राष्ट्रपति माननीय सर अनिरुद्ध जगन्नाथ जी के कर-कमलों द्वारा हुआ. इस अवसर पर भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर पर कविता-प्रतियोगिता के विजेताओं को भी सम्मानित किया गया. सम्मान उन सभी नवोदित कवियों का वास्तव में रहा जिनको अपनी कलात्मकता प्रेषित करने का एक मंच प्राप्त हुआ.
इस कविता प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर आए श्री गुलशन सुखलाल जिनकी कविता का शीर्षक ‘प्रगति’ रहा. अपनी कविता को हॉल से भरे श्रोताओं को सुनाते हुए गुलशन जी ने सभी लोगों को मुग्ध कर दिया. उन्हें अपनी रचना के ज़रिये अपने अतीत में ले गए और साथ ही साथ वर्तमान विकसित समाज/देश पर पुन: ग़ौर करने को विवश किया. 15,000 रु/- की धन-राशि पाने वाली गुलशन सुखलाल जी की कविता इस प्रकार है –

“प्रगति”

गाँव में
अब नहीं वे पेड़
जिनकी छाँव में
चितलपाटी बिछाए
कोमल ठण्डे पत्थर का तकिया बनाकर
गरमियों की दोपहर में आदमी
समुद्र में
बढ़ते ज्वार-भाटे से उठने वाली हवा की
गन्ध में
बेहोश
और वक्त बेवक्त बाँकने
वाले मुर्गों
जाने-अंजाने पर भोंकने वाले कुत्तों
किसी रसोईघर
में
ए.एम. रेडियो पर बजते
‘आप की पसन्द’ के जिंगल
और
फेरीवालों क...ी पैंक-पैंकू
के अलसाए सुरों की लोरी सुनता
दो पल ओठोंग जाए।

अब तो पेड़ों का हर झुर्मुट
अड्डा बना ताश का
जिसके आस-पास
घास काटने से डरती चाचियाँ
कि कहीं दोस्तों में हुई लड़ाई में
टूटी बोतलों के टुकड़े
पैरों में न चुभ जाएँ ।

अब नहीं खेले जाते वे फुटबॉल-मैच
जहाँ पिताजी के साथ साईकल पर
आस-पड़ोस के चार-पाँच बच्चे सवार
हो पहुँचते
जहाँ हर
गेंद के साथ दिल उछलता
जहाँ उबले
चने और ‘पिकसीदू’
‘कालामिन्दास’
और ‘सिपेक’ के लिए
इकट्ठा
किए पैसे खर्च किए जाते
जब हर जीत
पर
गाँव भर
में
जुलूस
निकाले जाते

अब तो
नुक्कड़ पर ही खेले जाते हैं मैच
और इनाम
होते हैं
शराब की
बोतलें

अब...
मुहल्ले के आर-पार जाने वाली
सड़क के दोनों छोह जैसे
शराबख़ाने के दो द्वार बने हों
जिनसे प्रवेश करने के बाद
गाँव की ही महिलाओं की
नज़रें झुक जाती हैं
तेज़ चलने लगते
और वे अपने-आप को
सभी कोणों से झाँकती
‘अपने’ लोगों की बेशर्म आँखों के नुकीले भालों को
अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग भेदती हुई पाकर
मैला मेहसूस करती हैं

अब नहीं जाता कोई
पड़ोस में
चीनी, दाल, नमक की
कभी न वापस होने वाली
उधारी माँगने
टिन की डिबिया लिए हुए
‘बूयों’ के लिए माढ़ माँगने
मुरूंग के पत्ते सुरुकने
लटपट सब्ज़ी के लिए
करीपत्ता माँगने

अब घर-घर के फ्रिज में
फ़्रोज़न रखा होता है सब कुछ
भाजी, करीपत्ता, टमाटर की ‘प्यूरी’,
ठण्डे,
सम्बन्धों की तरह...
अब गाँव में...

- गुलशन सुखलाल

द्वितीय स्थान पर राधा माथुर की कविता ‘बेकार की बहस’ रही जिनको भारतीय उच्चायोग द्वारा 10, 000 रुपये की धन-राशि प्राप्त हुई.
तृतीय स्थान पर कल्पना लालजी की कविता ‘बाबुल का आंगन’ जिन्हें 8,000 रु/- की धन-राशि प्राप्त हुई.
तीन सांत्वना पुरस्कार रखे गए जिनको प्रत्येक 5,000 रु/- की धन-राशि प्राप्त हुई जिनमें धनराज शम्भू, विनय गुदारी, और एक भारतीय भाई साहब की कविताएँ रहीं.
ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस कविता-लेखन प्रतियोगिता में करीब बीस कविताओं का चयन किया गया था. उन कवियों ने 19 दिसम्बर 2009 को अपनी कविताओं को जूरी सदस्यों - भानुमति नागदान, सूर्यदेव सिबोरत तथा रामदेव धुरन्धर जी – के समक्ष पढ़ा था.
एक और विशेष बात, अनेक नए कवि भी सामने आए, उसी तथाकथित ‘उदासीन युवा-पीढ़ी’ से जिनमें कुछ नाम ऐसे हैं जो निकट भविष्य में ही मॉरीशस के हिन्दी-साहित्य के आधार-स्तम्भ को अधिक पुष्ट करने में अपनी महत्वपूर्ण योगदान निभाएँगे. ये नाम हैं – अंजलि हजगैबी, अर्विन्दसिंह नेकितसिंग, वशिष्ठ झम्मन, सहलील तोपासी, जीष्णु होरीशरण, रीतेश मोहाबीर आदि.
इन्दिरा गाँधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द के छात्रों के द्वारा संगीत के कुछ मनोरम प्रस्तुतीकरण भी हुए.
हंगरी की डॉ. मारिया नेज्यैशी ने अपने भाषण में हिन्दी के प्रति अपने विचार व्यक्त किये. हंगरी में हिन्दी की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि विदेश में बसे हिन्दी के शिक्षकों को विश्व हिन्दी सचिवालय की तरफ से प्रशिक्षण सम्बन्धी सहयोग की प्राप्ति होनी चाहिए.
गणराज्य के राष्ट्रपति ने अपना भाषण हिन्दी में दिया. इसके अलावा, भारतीय उच्चायुक्त, महामहिम श्री मधुसुदन गणपति ने मॉरीशस में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए व्यक्तिगत तथा संस्थागत प्रयासों की प्रशंसा की.
पूरे कार्यक्रम का संचालन भारतीय उच्चायोग के द्वितीय सचिव एवं शिक्षा अधिकारी तथा वरिष्ठ दलित साहित्य के रचनाकार एवं आलोचक, डॉ. जयप्रकाश कर्दम जी ने किया.

Saturday, January 9, 2010

बीजिंग के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में चित्र कला प्रदर्शनी का आयोजन

(चित्रों को बड़ा करके देखने लिए निम्नलिखित चित्रों पर बारी-बारी क्लिक करें)

भारतीय राजदूतावास के सांस्कृतिक केंद्र पर श्रीमती अंजुला शर्मा के रंगचित्रों की एक भव्य कला प्रदर्शनी आयोजित की गयी.प्रदर्शनी का उद्घाटन चीन में भारत के राजदूत महामहिम डॉ एस.जयशंकर ने किया.प्रदर्शनी में भारतीय राजदूतावास के सदस्यों के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीय जगत के जानेमाने विशिष्ट राजनयिक एवं बीजिंग में भारतीय समुदाय के सदस्य उपस्थित थे.सभी विशिष्ट अभ्यागत अतिथियों ने अंजुला शर्मा के कलाकृतियों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की.अपने उद्घाटन भाषण में महामहिम राजदूत महोदय ने कहा कि अंजुला शर्मा की पेंटिंग कलाकृति में भारतीय सांस्कृतिक विम्बों के मूर्तीकरण के साथ साथ भारतीय पारंपरिक अभिप्रायों को भी रेखांकित किया गया है.राजस्थानी परम्परा के निर्वाह के साथ साथ लोक तत्त्व का चित्रांकन अंजुला शर्मा के चित्रों की विशेषता है. उन्होंने इस बात पर बल दिया कि चीन में आयोजित यह प्रदर्शनी मात्र औपचारिक प्रदर्शनी नहीं है बल्कि यह सेतु के रूप में भारत-चीन के बीच सांस्कृतिक अभिप्रायों का आदान-प्रदान है.


अंजुला शर्मा ने भारतीय परम्परा को अपनी कला में जिया है.उन्होंने तैलरंगों का प्रयोग जिस रूप में किया है वह दर्शनीय है.उनके तूलिकाघात में अजीब सी गति दिखायी देती है.घात दर घात तूलिका स्वयं आगे बढ़ती गयी है और एक रास्ता बनाती गयी है.कहीं कहीं बोल्ड पैच तो कहीं कहीं खुरदुरेपन की झलक काफी आकर्षक दिखायी देती है.जब वे कैनवास पर होती हैं या रंग रोगन करती हैं तो स्पष्ट दीखता है कि मस्तिष्क और हाथ का तारतम्य कितना सधा हुआ है. रंग के कई शेड्स आते हैं जो स्थिति-दर स्थिति उनकी कलाकृतियों के भावार्थ तो बताते ही हैं,आधुनिक कला-कोष को भी समृद्ध भी करते हैं.राजदूतावास की कला-दीर्घा में प्रदर्शित अधिकांश कलाकृतियाँ राजस्थानी आदिवासी स्त्रियों के आदिम वेश-भूषा,आभूषण एवं उनके सांस्कृतिक अभिप्रायों के साथ प्रदर्शित हैं जोप्रभावशाली यथार्थ विम्बों का सृजन करती हैं.कलादीर्घा में कुल ४० कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गयी हैं.इनमें सिल्क पर पोस्टल कलर,वाटर कलर एवं तैल-चित्र उल्लेखनीय हैं.स्थानीय चीनी दर्शकों एवं कलाकारों ने राजस्थानी 'मंडाना' शैली को काफी पसंद किया.

इन रंगों की भाषा को पढ़ाते हुए अंजुला शर्मा ने अनेक ऐसे रंगों का प्रयोग किया है जो काल के परिप्रेक्ष्य में क्षण और पल को परिभाषित करते हैं.ज्यादातर कलाकृतियों में उद्दीप्त रंगों का प्रयोग हुआ है.रचना,सृजन और चिंतन इन कलाकृतियों के मूल में है और यही अंजुला शर्मा की विशेषता है.

प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर महामहिम राजदूत डा.एस.जयशंकर के अतिरिक्त दूतावास के उपमुख्य श्री जय दीप मजूमदार,श्री एन. आर.सिंह.श्री बी. के. सिंह,श्री वी.पी.चौहान,डॉ.देवेन्द्र शुक्ल एवं भारतीय पर्यटन केंद्र के निदेशक श्री शोएब अहमद तथा अन्य विशिष्ट राजनयिक उपस्थित थे.

कार्यक्रम का संयोजन और संचालन श्रीमती जसमिंदर कस्तूरिया ने किया.

प्रस्तुति- डॉ. देवेन्द्र शुक्ल
भारतीय दूतावास, बीजिंग, चीन

Thursday, October 8, 2009

सूरीनाम स्थित भारतीय राजदूतावास में आईटेक दिवस



आईटेक (इंडियन टैकनिकल इकनॉमिक कॉपरेशन) भारत सरकार की एक ऐसी योजना है जिसके अंतर्गत 158 देशों के शिक्षार्थियों को भारत के 48 सरकारी, अर्धसरकारी संस्थानों में 200 से अधिक अल्पकालीन पाठ्यक्रमों के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। प्रत्येक वर्ष इन चुने हुए देशों के लिए सीटें निर्धारित की जाती हैं और संबंधित देश का शिक्षा मंत्रालय अभ्यर्थियों का चयन करके भारतीय राजदूतावास के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण के लिए भारत भेजता है।

सूरीनाम से भी हर वर्ष अभ्यर्थियों को प्रशिक्षण के लिए भारत भेजा जाता है। और इन्हीं प्रशिक्षणार्थियों के लिए हर वर्ष 15 सितंबर को आईटेक दिवस का आयोजन किया जाता है जिसमें प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके सभी व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाता है और हाल ही में प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थियों के अनुभव सुने जाते हैं।

इस वर्ष आईटेक दिवस का आयोजन 25 सितंबर 2009 को भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के सभागार में किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि थे शिक्षा मंत्रालय के निदेशक श्री सोतोसोनोयो। भारत के राजदूत श्रीमान कँवलजीत सिंह सोढ़ी की उपस्थिति में अताशे श्रीमती भावना सक्सैना ने सभी अतिथियों का भावभीना स्वागत किया और श्रीगणेश का आह्वान करते हुए गणेश स्तुति के पश्चात एक पॉवर प्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से आईटेक गतिविधियों पर प्रकाश डाला। हाल ही में प्रशिक्षण प्राप्त पाँच अभ्यर्थियों ने अपने अनुभव सुनाए और भारत सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया। श्री सोतोसोनोयो ने कहा कि सूरीनामवासियों के लिए यह बहुत अच्छा अवसर है और उन्हें इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। इस अवसर पर एक साँस्कृतिक कार्यक्रम भी आय़ोजित किया गया।

अंत में राजदूत महोदय ने सभी से आग्रह किया कि वे अपने ज्ञान का लाभ उठाकर अपने देश को लाभान्वित करें।







Friday, September 25, 2009

भारतीय दूतावास द्वारा चीन के 7 हिन्दी विद्वान सम्मानित

चीन में हिन्दी दिवस समारोह



22 सितंबर 2009 । बीजिंग

दिनांक 21-09-2009 भारतीय दूतावास के सांस्कृतिककेद्र के तत्वावधान में हिन्दी दिवस कार्यक्रम का आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर भारतीय दूतावास के मिशन के उपमुख्य (Minister and Deputy Chief of Mission) जयदीप मजूमदार ने चीन के सात वरिष्ठ हिन्दी विद्वानों को सम्मानित किया। इन विद्वानों में पेकिंग विश्वविद्यालय एवं चायना रेडियो इंटरनेशनल के वरिष्ठ हिंदी सेवी एवं पत्रकार साम्मिलित हैं:










1. Pro. LIU AN WU (1930)
प्रोफ़ेसर लियोऊ आनवू (1930)

हिन्दी के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान/पुस्तक-प्रकाशन
पूर्व प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग, हिन्दी साहित्य का इतिहास(आयु 85 वर्ष)
पेकिंग विश्वविद्यालय (चीनी भाषा में)
2. Pro. YIN HONG YUAN (1925)
प्रोफ़ेसर यिन होंयुवान (1925)

पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी विभाग हिन्दी व्याकरण (आयु 80 वर्ष)
पेकिंग विश्वविद्यालय (चीनी भाषा में)
3. Pro. JIN DING HAN (1930)
प्रोफ़ेसर चिन तिंग हान (1930)

पूर्व प्रोफ़ेसर हिन्दी विभाग राम चरित मानस का चीनी भाषा में अनुवाद
पेकिंग विश्वविद्यालय
4. Pro. JIANG JING KUI
प्रोफ़ेसर च्यांग चिंगख्वेइ

Vice Director of Centre for India Studies
Chairman of Department of South-Asians Studies
Vice President of China Association of Less Commonly Taught Foreign Languages
प्रोफ़ेसर हिन्दी विभाग
1)चीन में पेकिंग विश्वविद्यालय के अतिरिक्त अन्यविश्वविद्यालयों में हिन्दी का विशेष प्रचार-प्रसार
2)प्रकाशन
क. हिन्दी का नाटक साहित्य
ख. जयशंकर प्रसाद के “आंसू” काव्य का अध्ययन
ग. जयशंकर प्रसद की कहानियाँ
3)विशेष पुरस्कार – 2007 में न्यूयोर्क में आयोजित आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में पूर्व विदेश राज्यमंत्री श्री आनन्द शर्मा द्वारा विशेष हिन्दी सम्मान एवं प्रमाण पत्र
5. प्रो. वांग चिनफ़ड. (Wang Jinfeng) C.R.I.(China Radio International)
6. प्रो. छड. श्वेपिन (Chen Xuebin) C.R.I.(China Radio International)
7. प्रो. चाओ युह्वा (Zhao Yuhua) C.R.I.(China Radio International)




चायना रेडियो इंटरनेशनल के इन वरिष्ठ विद्वानों ने चालीस वर्षों से अधिक हिन्दी की सेवा की है। चीन और भारत मैत्री को आगे बढ़ाने के लिए अथक परिश्रम किया है। इन्हें हिन्दी भाषी श्रोताओं में सर्वाधिक लोकप्रियता मिली है। हिन्दी उद्‍घोषिका के रूप में सुश्री चाओ युह्वा अत्यधिक लोक प्रिय हैं।

इस अवसर पर एक हिन्दी निबंध प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में पेकिंग विश्वविद्यालय, बेजिंग फोरंन स्टडीज़ विश्वविद्यालय एवं चायना रेडियो इंटरनेशनल के निम्नलिखित छात्रों एवं पत्रकारों ने भाग लियाः

चीनी प्रतिभागी

प्रथम

थांग य्वानक्वेइ (सपना)

चाइना रेडियो इंटरनेशनल

द्वितीय

ली मिन (विवेक)

पेकिंग विश्वविद्यालय

तृतीय

कुमारी रोशनी

सांत्वना

ह्वा लीयू (सिद्धार्थ)

पेकिंग विश्वविद्यालय

चंद्रिमा

चाइना रेडियो इंटरनेशनल


भारतीय प्रतिभागी

प्रथम

हेमा कृपलानी

द्वितीय

हेमा मिश्रा

सांत्वना

आरुणि मिश्रा




आयोजन के मुख्य अतिथि एवं भारतीय दूतावास के मिशन के उपमुख्य (Minister and Deputy Chief of Mission) जयदीप मजूमदार ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिंदी भारत की केवल राजभाषा या राष्ट्रभाषा ही नहीं है, यह भारत के हृदय की भाषा है। यह सांस्कृतिक समन्वय और मानसिक आजादी की भाषा है। अन्तरराष्ट्रीय जगत में हिन्दी के लोकप्रियता बढ़ रही है। विशेष रूप से चीन में हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन की विशिष्ट परंपरा है। हिन्दी दिवस पर चीनी विद्वानों का यह सम्मान चीन और भारत के प्राचीन सम्बंधों के सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। चीन के हिन्दी प्रेमियों की आज इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति हिन्दी की लोकप्रियता और आप के हिन्दी एवं भारत प्रेम का प्रमाण है।

पेकिंग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अतिथि प्रोफेसर डॉ॰ देवेन्द्र शुक्ल ने कहा कि आज हिन्दी का राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संदर्भ दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। आज हिन्दी विश्व भाषा का रूप धारण कर रही है। भारतीय दूतावास का यह आयोजन हिन्दी के लिए एक शुभसंकेत है। हिन्दी भारत और विश्व की संस्कृति के संवाद का मंच बने। तभी हम विश्व हिन्दी का विश्व मन रच सकेंगे।

चायना रेडियो इंटरनेशनल के सलाहकार एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार प्रो. वांग चिनफ़ङ ने कहा कि हिन्दी हमें विश्वबंधुत्व और प्रेम का संदेश देती है। हिन्दी उस सुगंध की तरह है जो विश्व के सामान्य जन को संबोधित है। चीन के लोगों को उस में प्रेम और आत्मीयता का अनुभव होता है।



हिन्दी दिवस कार्यक्रम का कुशल संयोजन एवं संचालन सांस्कृतिक सचिव चिन्मय नायक ने किया उन्होंने कहा कि यह हिन्दी दिवस केवल एक कार्यक्रम मात्र नहीं है, बल्कि यह हिन्दी के मंच पर चीन और भारत के मिलन का सौहार्द-प्रतीक भी है।

Tuesday, September 22, 2009

भारत से 16000 किमी दूर मनाया गया हिन्दी पखवाडा़



सूरीनाम में हिंदी पखवाड़ा

सूरीनाम स्थित भारत के राजदूतावास में 1-09-09 से 14-09-09 तक बड़े हर्षोल्लास के साथ हिंदी पखवाड़ा मनाया गया। इस दौरान सूरीनाम के चार जिलों निकेरी, कौमवेना, सरमक्का व पारामारीबो में हिंदी सुलेख और भाषण प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं। 1-09-09 को राजदूतावास व भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में एक परिपत्र जारी किया गया जिसमें सभी भारतीय अधिकारियों व कर्मचारियों को हिंदी में काम करने का अनुदेश दिया गया।

वीज़ा, पासपोर्ट लेने आने वाले व्यक्तियों के लिए भी नोटिस बोर्ड पर सूचना लगाई गई- यदि आप हिंदी में बात करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी। इसका काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा और अधिकांश आगंतुको ने हिंदी में बात की।

14 सितंबर 2009 को सायंकाल 7.30 बजे भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के सभागार में समापन समारोह में एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया और प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार वितरित किए गए। गोष्ठी में चर्चा के विषय थे-

साहित्य मानव जीवन का दर्पण
सूरीनाम में रचित साहित्य
हिंदी और सरनामी- परिचय व संबंध
हिंदी और सरनामी- वर्तमान स्थिति (स्थानीय संदर्भ)
साहित्यकारों के समक्ष कठिनाइयाँ- स्थानीय संदर्भ


इन विषयों पर सूरीनाम के जाने-माने विद्वान नारायणदत्त गंगाराम पांडेय, पं. हरिदेव सहतू, हिंदी छात्रा कृष्णा भिखारी और दो युवा हिंदी कर्मियों धीरज कंधई व निशा झाखरी ने अपने विचार व्यक्त किए।

भारत के राजदूतावास की अताशे (हिंदी व संस्कृति) भावना सक्सैना ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि भारत से 16,000 कि.मी दूर हिंदी का यह उत्सव हिंदी कर्मियों को नमन करने और हिंदी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए है। उन्होंने सूरीनामवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी भाषा के साथ-साथ देवनागरी लिपि को भी अपनाएँ क्योंकि लिपि में भाषा के प्राण हैं।

सूरीनाम में भारत के राजदूत, कँवलजीत सिंह सोढी ने भारत की सर्वशिक्षा प्रणाली का उल्लेख करते हुए हर हिंदी जानने वाले से एक और व्यक्ति को हिंदी सिखाने का आग्रह किया।

इस कार्यक्रम में लगभग 200 हिंदी कार्यकर्ताओं व हिंदी प्रेमियों ने उपस्थित होकर आयोजन को सफल बनाया।