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Saturday, July 4, 2009

‘अनाद्यसूक्‍त उद्भ्रांत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ कृति है!’ -प्रो. नामवर सिंह

02 जुलाई, नई दिल्ली

"उद्भ्रांत की गीत की साधना घूम-फिर कर बार-बार प्रकट होती है। उन्होंने गीत से शुरू किया था। उनके छंदों की लय से यही पता चलता है। उनमें गहरा समकालीन बोध है मगर वे छंदों की लय अपनी मुक्त छंद की कविताओं में भी ले आए।’ ‘अनाद्यसूक्त’ उनकी अब तक की सर्वोत्तम कृति है जहाँ उन्होंने शब्दों के मितव्यय से बड़ी बात कहने का सफल प्रयोग किया है।’ उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि ‘उद्भ्रांत जी अब साठ साल के हो गए हैं और इस कार्यक्रम को उनकी षष्ठिपूर्ति समारोह के रूप में मैं देखता हूँ और उन्हें शतायु होने की शुभकामनाएं देता हूँ। अब उन्हें दूसरों की किताबों का विमोचन करना चाहिए।’

उन्होंने कहा कि ‘‘रवीन्द्रनाथ भी एक महाकाव्य लिखना चाहते थे लेकिन एक गीत में वे कहते हैं कि यह अब संभव नहीं है क्योंकि सरस्वती के नर्तन से उसके पांवों की गति लगातार उस सुगठन को तोड़ रही है जो महाकाव्य की रचना का आधार होता है। हिन्दी में भी महाकाव्य की रचना पीछे छूट गई। उद्भ्रांत ने महाकाव्य लिखने का प्रयास किया है। यह हिन्दी में पहली बार हो रहा है कि एक कवि रामायण काल की दर्जनों स्त्रियों की कहानी को एक सूत्र में बांध रहा है। उद्भ्रांत ने अनेक स्त्री पात्रों के माध्यम से समकालीन प्रश्नों और जीवन यथार्थ पर जो बात कही है वह एकदम नई बात है। इससे पहले कभी यह बात किसी अन्य की सोच में नहीं आई। उद्भ्रांत ने लोक में विद्यमान स्मृतियों का भी यहाँ अतिक्रमण किया है। शबरी का प्रसंग ऐसा ही प्रसंग है। शबरी बेर खाने बढ़ा राम का हाथ, मन में आये इस भाव के चलते, पकड़ लेती है कि कहीं वे खट्टे हों! और इस तरह की अनेक नई उद्‍भावनाएँ 'त्रेता' में हमें मिलती है। इन्होंने 'त्रेता'की भूमिका में और काव्य में भी यह लिखा है कि त्रेता दरअसल कलि है और कलि ही त्रेता है।

उक्त विचार शिखर आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की दो पुस्तकों ‘त्रेता’ और ‘अनाद्यसूक्तः’ तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. आनंद प्रकाश दीक्षित द्वारा लिखित आलोचना ग्रंथ ‘त्रेता: एक अन्तर्यात्रा’ के लोकार्पण के अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में व्यक्त किया। नामवर सिंह ने जोड़ा कि हिन्दी-साहित्य के पुस्तक-लोकार्पण के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि एक कृति का लोकार्पण हो रहा है और उसी के साथ हिन्दी के एक बड़े आचार्य की आलोचना कृति का विमोचन हो रहा है।

इस अवसर पर सम्पन्न हुई विचार-गोष्ठी ‘मिथक के अनाद्य से उठता समकालीन’ में पटना से पधारे जाने-माने प्रगतिशील आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि मिथकों का इस्तेमाल प्रायः यथार्थ को समझने के लिए किया जाता रहा है, परंतु उद्भ्रांत ने ‘त्रेता’ के माध्यम से इसे समकालीन को समझने का माध्यम बनाया है। समकालीन की एक परम्परा होती है जो नीचे से ऊपर की ओर जाती है अर्थात् वह समाज के व्यापक समूह को उसके बहाने समझने की कोशिश करती है लेकिन जो लोग इसे चक्रीय मानते रहे हैं वे प्रायः इनका गैर राजनीतिक इस्तेमाल करते रहे हैं। उद्भ्रांत जिस प्रकार ‘त्रेता’ की स्त्रियों को अपने महाकाव्य में प्रतिष्ठित करते हैं, वह एक नई बात है। उन्होंने उन मिथकों को काफी हद तक तोड़ा है जो अपने आसपास के चरित्रों को निगल जाते हैं।

डॉ. बली सिंह ने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त ने उर्मिला के बहाने ‘साकेत’ में स्त्री के गहरे अंतर्द्वंद्व को एक ऊँचाई प्रदान की। उसके बाद से महाकाव्य की रचना फिर कभी संभव नहीं हुई। उद्भ्रांत का ‘त्रेता’ पढ़ते हुए उसकी याद आना स्वाभाविक है। उन्होंने अंजना बक्शी की ‘माँ’ पर लिखी कविताओं में व्यक्त प्रश्नवाचकता के बहाने उद्भ्रांत द्वारा उठाए गए चरित्रों से उभरते प्रश्नों को रेखांकित किया।

दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी एवं साहित्य मर्मज्ञ धीरंजन मालवे ने उद्भ्रांत को बधाई देते हुए उनके काव्य ‘अनाद्यसूक्‍त’ को अद्भुत और बिग बैंग की उपाधि दी।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए सुरेश शर्मा ने विजयदेव नारायण साही द्वारा 1958 में की गई महाकाव्य के अंत की घोषणा की याद की। उन्होंने कहा कि उद्भ्रांत ने उस टूटी हुई कड़ी को फिर से जोड़ दिया है।

इस मौके पर वयोवृद्ध आलोचक डॉ॰ आनन्द प्रकाश दीक्षित द्वारा प्रेषित की गई चिट्ठी तथा ‘अनाद्यसूक्त’ पर पीयूष दइया की टिप्पणी का भी पाठ हुआ। डॉ. दीक्षित ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जिस तरह कविता कभी खत्म नहीं होती, उसी तरह आलोचना-चाहे वह कितनी भी समर्थ हो-कभी अंतिम वाक्य नहीं होती। मैंने ‘त्रेता’ को महाकाव्य अवश्य कहा है लेकिन उद्भ्रांत को महाकवि नहीं कहा है। हमारे लिए यह प्रश्न अनिवार्य है कि महाकाव्य का रचयिता कवि अधिकार-सिद्धरूप में महाकवि मान लिया जा सकता है या कि उस पद के लिए किन्हीं और मूल्यों का संधान करना होगा। पीयूष दईया का मानना था कि यह एक कठिन व दुर्निवार काव्य-कृति है। प्रारम्भ में उद्भ्रांत ने ‘त्रेता’ और ‘अनाद्यसूक्त के कुछ काव्यांशों का अत्यंत प्रभावशाली पाठ किया।

धन्यवाद ज्ञापन नेशनल पब्लिशिंग हाऊस के श्री कमल जैन ने किया।

प्रस्तुति-
रामजी यादव
द्वारा श्रीमती कृपा गौतम
एच-81, पालिका आवास,
सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली - 110023

Sunday, May 24, 2009

बिना कल के आज की कल्पना बेमानी है- प्रो. नित्यानंद तिवारी

23 मई, नई दिल्ली।

‘‘पुराने का अध्ययन और विश्लेषण मुझे आज को समझने की अन्तर्दृष्टि देता है। जो लोग पुराने को काबू में करके केवल आज ही आज पर जोर दे रहे हैं वे नहीं जानते कि बिना कल के आज की कल्पना ही नहीं की जा सकती।’’

उक्त विचार सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित विचार-गोष्ठी और वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत की पुस्तकों के विमोचन के मौके पर व्यक्त किए। प्रो. तिवारी ने उद्भ्रांत जी की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि ‘उनकी कविताएं हमारे दौर की चुनौतियों और द्वंद्वों को रेखांकित करती हैं। ये अभिधा की बहुत बड़ी ताकत है। उद्भ्रांत को कविताओं में ब्यौरों की अधिकता और परिणामवादी प्रवृत्ति से बचना चाहिए और कविता की वास्तविक ताकत के लिए प्रक्रिया तक ही सीमित रहना चाहिए।’

इस अवसर पर उद्भ्रांत की पुस्तकों-‘सदी का महाराग’ का लोकार्पण प्रो. तिवारी ने किया। यह रेवती रमण द्वारा सम्पादित उद्भ्रांत की बीसवीं सदी की कविताओं का संचयन है। उद्भ्रांत के नए कविता संग्रह ‘हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय’ का विमोचन प्रो. नामवर सिंह द्वारा, उद्भ्रांत द्वारा सम्पादित लघु पत्रिका आंदोलन और युवा की भूमिका का विमोचन राजेन्द्र यादव द्वारा तथा शीतल शेटे द्वारा लिखित ‘राम की शक्तिपूजा एवं रुद्रावतार’ का विमोचन पंकज बिष्ट द्वारा किया गया। इस मौके पर रामप्रसाद शर्मा ‘महर्षि’ द्वारा लिखित पुस्तक ‘ग़ज़ल और ग़ज़ल की तकनीक’ का भी विमोचन संयुक्त रूप से किया गया। उल्लेखनीय है कि इन दोनों पुस्तकों का विमोचन क्रमशः श्री खगेंद्र ठाकुर और श्रीमती विमलेश्वरी सहाय द्वारा किया जाना था लेकिन कतिपय कारणों से वे आयोजन में न आ सके।

विमोचन समारोह के बाद आयोजित विचार-गोष्ठी ‘लघु के राग और विचार की आधी सदी’ पर बोलते हुए हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार एवं हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि ‘आज लघु पत्रिका को सीधे-सीधे चिह्नित करना बेहद कठिन है क्योंकि लघुपत्रिकाओं की स्पष्ट व्याख्या कहीं देखने को नहीं मिलती। शायद इसे अंग्रेजी के 'लिटिल मैगज़ीन' से लिया गया माना जाता है। फिर भी मौटे तौर पर हिन्दी में भी इनकी शुरूआत अंग्रेजी की तरह सत्ता और संस्थान के विचार के विरोध में व्यक्तिगत प्रयासों से हुईं। अब तो हिन्दी लघु पत्रिकाओं की संख्या साढे़ चार सौ से भी अधिक है और बहुत स्वस्थ हालत में प्रकाशित हो रही हैं। पहले कागज के जुगाड़ में बहुत सारा समय लगता था और इसे ही एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था। तब संपादक झोला लटकाए रचना और साधन का सहयोग पाने के लिए घूमा करता था जबकि आज पत्रिकाओं के कागज की गुणवत्ता ही ऐसी है कि मैं हंस के कवर के लिए भी ऐसा कागज नहीं लगा पाता। समय के साथ सारी पत्रिकाएं दलित और स्त्री-विमर्श को तरज़ीह दे रही हैं वरना उनके पिछड़ जाने का खतरा है। ‘हंस’ भी एक लघु पत्रिका है जिसने समकालीन मुद्दों को उठाया।’

‘समयांतर’ के सम्पादक और वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट ने कहा कि ‘‘लघु पत्रिका हमेशा सत्ता के खिलाफ़ आवाज़ उठाती है। जिस पत्रिका में यह शक्ति नहीं होती वह लघु पत्रिका की श्रेणी में नहीं आ सकती।’’

बली सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि घरानों या संस्थानों से नहीं, पत्रिका का चरित्र सम्पादकों के सरोकारों से तय होता है। उन्होंने ‘युवा’ की सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करते हुए उद्भ्रांत की भूमिका की सराहना की। उन्होंने शीतल शेटे की आलोचना-पुस्तक ‘राम की शक्तिपूजा एवं रुद्रावतार’ की चर्चा करते हुए कहा कि यह बेहद पठनीय पुस्तक है और इस दौर में मिथकीय कविता की वापसी का संकेत करती है।’’

हेमंत जोशी ने इस अवसर पर सवाल उठाया कि ‘‘इस बीच पुराने समय की याद करने का चलन जोर पकड़ रहा है। क्या यह इस बात का संकेत है कि अब उतने तीव्र और समकालीनताधर्मी आंदोलन नहीं हैं?’’

दूरदर्शन में अधिकारी श्री धीरंजन मालवे ने उद्भ्रांत की कविता ‘रुद्रावतार’ की प्रशंसा करते हुए कहा कि ‘‘यह कविता समकालीन दौर का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। हम अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों को महान मान लेते हैं लेकिन मौजूदा रचनाकर्मी की महत्ता को स्वीकारने में संकोच करते हैं।’’

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की कविताओं के बहाने कवि की चर्चा में कहा कि ‘‘वे अपनी बेबाकी में रिश्ता निभाने की औपचारिकता का हमेशा अतिक्रमण करते रहे हैं। उन्होंने आज के दौर की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में ‘समयांतर’ की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उसे साहित्य समाज के पहरेदार की संज्ञा दी।’’

इससे पहले कवि उद्भ्रांत ने स्पष्ट किया कि ‘‘उनकी कविताओं की व्यंजना की शक्ति की लगातार अनदेखी की जाती रही है। उन्होंने आज की आलोचना के पूर्वाग्रहों के प्रति घोर असहमति जाहिर की।’’

दूरदर्शन की समाचार वाचिका श्रीमती मंजरी जोशी ने उद्भ्रांत जी की तीन कविताओं ‘हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय’, ‘स्वाहा’ और ‘कविता के विरुद्ध’ का पाठ किया।

कार्यक्रम का संचालन पत्रकार और लेखक सुरेश शर्मा ने किया।

प्रस्तुतिः
रामजी यादव
द्वारा श्रीमती कृपा गौतम
एच-81, पालिका आवास,
सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली - 110023