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Monday, June 20, 2011

‘‘उद्भ्रांत का कवि-कर्म प्रतिभा का विस्फोट’’-नामवर सिंह

नयी दिल्ली। ‘‘कवि उद्भ्रांत की एक साथ तीन नयी काव्य-कृतियों का लोकार्पण अद्भुत ही नहीं ऐतिहासिक भी है। इतनी कविताओं का लिखना उनकी प्रतिभा का विस्फोट तो है ही, साथ ही इनमें रचनाकार की सर्जनात्मक ऊर्जा की भी दाद देनी होगी।’’ ये बातें मूर्द्धन्य आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की तीन काव्य-कृतियों ‘अस्ति’ (कविता संग्रह), ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) एवं ‘राधामाधव’ (प्रबंध काव्य) के लोकार्पण के अवसर पर शुक्रवार दिनांक 17 जून, 2011 को हिन्दी भवन, दिल्ली में आयोजित ‘समय, समाज, मिथक: उद्भ्रांत का कवि-कर्म’ विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कहीं।

नामवर जी ने उद्भ्रांत के पूरे रचनात्मक जीवन पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि उनकी ‘सूअर’ शीर्षक कविता नागार्जुन की मादा सूअर पर लिखी कविता के बाद उसी विषय पर ऐसी कविता लिखने के उनके साहस को प्रदर्शित करती है जिसके लिये वे बधाई पात्र हैं। उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा की दाद देनी होगी। हिन्दी भाषा में पांच सौ पृष्ठों के पहले वृहद्काय कविता संग्रह ‘अस्ति’ का लोकार्पण करते हुए उन्होंने कहा कि कवि अपने शब्दों के द्वारा इसी दुनिया में एक समानान्तर दुनिया रचता है, जो विधाता द्वारा रची दुनिया से अलग होकर भी संवेदना से भरपूर होती है। मिथकों को माध्यम बनाकर उन्होंने जो रचनाएं की हैं, वे भी उनकी समकालीन दृष्टि के साथ उनकी बहुमुखी उर्वर प्रतिभा को प्रदर्शित करती हैं।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र ने ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) का लोर्कापण करते हुए कहा कि इसमें कवि ने महाभारत का एक तरह से पुनर्पाठ आधुनिक संदर्भ में बेहद गंभीरता के साथ किया है। युधिष्ठिर को केन्द्र में रखकर जिस तरह से उनको और उनके माध्यम से महाभारत के दूसरे महत्त्वपूर्ण चरित्रों को वे प्रश्नों के घेरे में लाये हैं, वह अद्भुत है और इससे युधिष्ठिर औरअन्य मिथकीय चरित्रों के दूसरे पहलुओं के बारे में जानने का भी हमें मौक़ा मिलता है। महाकवि प्रसाद की ‘कामायनी’ से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वह महाकाव्य नहीं है, लेकिन महत् काव्य ज़रूर है। ‘अभिनव पांडव’ को कवि ने महाकाव्य कहा है और अपनी भूमिका ‘बीजाक्षर’ में इस सम्बंध में बहस की है और अपने तर्क दिये हैं, लेकिन मैं इसे विचार काव्य कहूँगा जो महत् काव्य भी है और मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में हिन्दी के बौद्धिक समाज में यह व्यापक विचारोत्तेजना पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि ‘राधामाधव’ काव्य बहुत ही मनोयोग से लिखा गया काव्य है, जिस पर बिना गहराई के साथ अध्ययन किए जल्दबाजी में टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी रचनाएं समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। अपनी पचास वर्ष से अधिक समय की रचना-यात्रा में उनके द्वारा पचास-साठ से अधिक पुस्तकें लिखना सुखद आश्चर्य का विषय है।

वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने ‘राधामाधव’ का लोकार्पण करते और कवि की अनेक रचनाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है और लिखने की शैली भी अलग है। मिथकों को लेकर उन्होंने कई रचनाएं की हैं जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे हिन्दी के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उनका रचनात्मक आवेग बहुत तीव्र है और उनके पास अक्षय भंडार है। पूतना के माध्यम से आदिवासी स्त्राी जीवन का चरित्रा-चित्राण अनोखा है। कवि ने अपने सम्पूर्ण काव्य-सृजन को समकालीन बनाने की हर संभव कोशिश की है जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सत्यप्रकाश मिश्र, राममूर्ति त्रिपाठी और रमाकांत रथ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों ने उनकी इस विशिष्टता को रेखांकित भी किया है। कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि बिना राधा के आख्यान को रचे राधाभाव को रचना ‘राधामाधव’ का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसमें स्त्राी विमर्श भी है जिससे कवि की अलग पहचान बनती है। इनके समूचे साहित्य में मूल पंूजी आख्यान है और आख्यान को साधना बहुत बड़ी बात है।



आलोचक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि विवेच्य संग्रह ‘अस्ति’ में इतनी तरह की और इतने विषयों की कविताएं हैं जो पूरी दुनिया को समेटती हैं। उद्भ्रांत जी की कविताओं में पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों और संसार के समस्त प्राणियों की संवेदना को महसूस किया जा सकता है। संग्रह की अनेक कविताएं अद्भुत हैं। साहित्यकार धीरंजन मालवे ने कविता संग्रह ‘अस्ति’ पर केन्द्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि कवि ने कविता की हर विधा को सम्पूर्ण बनाने में अपनी भूमिका निभाई है और उनकी कृतियों से यह साफतौर पर ज़ाहिर होता है कि उद्भ्रांत नारी-सशक्तीकरण के प्रबल पक्षधर हैं। इसके साथ ही उन्होंने दलित चेतना के साथ अनेक विषयों पर बेहतरीन कविताएं लिखीं हैं।

संगोष्ठी का बीज-वक्तव्य देते हुए जनवादी लेखक संघ की दिल्ली इकाई के सचिव प्रखर आलोचक डॉ. बली सिंह ने कहा कि आज के दौर में इतने तरह के काव्यरूपों में काव्य रचना बेहद मुश्किल है, लेकिन उद्भ्रांत जी इसे संभव कर रहे हैं। उनकी कविताएं विचारों से परिपूर्ण हैं। यहाँ सांस्कृतिक मसले बहुत आये हैं और पहले की अपेक्षा उनकी कविताओं में स्मृतियों की भूमिका बढ़ी है। ‘राधामाधव’ स्मृतियों का विलक्षण काव्य है। ‘अभिनव पांडव’ में स्त्रिायों के प्रति बराबरी के दर्जे के लिये कई सवाल उठाये गये हैं जो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस उत्तर आधुनिक समय में आई उद्भ्रांत की मिथकाधारित और विचारपूर्ण समकालीन कविताओं को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया।

प्रारम्भ में, कवि उद्‍भ्रांत ने तीनों लोकार्पित कृतियों की चुनिंदा कविताओं और काव्यांशों का प्रभावशाली पाठ करने के पूर्व ‘अस्ति (कविता-संग्रह)’ जिसे उन्होंने ‘कविता और जीवन के प्रति आस्थावान’ अपने सुधी और परम विश्वसनीय पाठक-मित्र के निमित्त ‘समर्पित किया है- की प्रथम प्रति बड़ी संख्या में उपस्थित सुधी श्रोताओं में से एक वरिष्ठ कवि श्री शिवमंगल सिद्धांतकर को तथा ‘राधा-माधव’- जिसे उन्होंने पत्नि और तीनों बेटियों के नाम समर्पित किया है- की प्रथम प्रति श्रीमती उषा उद्‍भ्रांत को भेंट की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए दूरदर्शन महानिदेशालय के सहायक केन्द्र निदेशक श्री पी.एन. सिंह द्वारा कवि के सम्बंध में दी गई इन दो महत्त्वपूर्ण सूचनाओं ने सभागार में मंच पर उपस्थित विद्वानों और सुधी श्रोताओं को हर्षित कर दिया कि वर्ष 2008 में ‘पूर्वग्रह’ (त्रौमासिक) में प्रकाशित उनकी जिस महत्त्वूपर्ण लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ के पुस्तकाकार संस्करण को लोकार्पित करते हुए नामवर जी ने उसे उस समय तक की उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति घोषित किया था-को वर्ष 2008 के ‘अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा हुई है। इसके अलावा उडीसा से पद्मश्री श्रीनिवास उद्गाता जी-जिन्होंने रमाकांत रथ के ‘सरस्वती सम्मान’ से अलंकृत काव्य ‘श्रीराधा’ का उड़िया से हिन्दी में तथा धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ का हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद किया था-ने कवि को सूचित किया है कि वे आज लोकार्पित ‘राधामाधव’ का भी हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद कर रहे हैं जो बहुत जल्द उड़िया पाठक-समुदाय के समक्ष आयेगा। धन्यवाद-ज्ञापन हिन्दी भवन के प्रबंधक श्री सपन भट्टाचार्य ने किया।

प्रस्तुतकर्ता
तेजभान
ए-131, जहांगीरपुरी,
नई दिल्ली-110033
मोबाईल: 9968423949

Friday, June 17, 2011

उद्‍भ्रांत की 3 पुस्तकों के लोकार्पण-कार्यक्रम का निमंत्रण

नेशनल पब्लिशिंग हाउस और हिन्दी अकादमी के संयुक्त तत्वाधान में
वरिष्ठ कवि उद्‍भ्रांत की 3 पुस्तकों
(अस्ति- कविता संग्रह, अभिनव पांडव- महाकाव्य,
राधा-माधव- प्रबंध काव्य)
का लोकार्पण एवं
‘समय समाज, मिथकः उद्‍भ्रांत का कविकर्म’
विषय पर विचार-गोष्ठी।

अध्यक्ष तथा मुख्य अतिथिः डॉ. नामवर सिंह
मुख्य वक्ता: डॉ. शिवपूजन मिश्र
विशिष्ट वक्ता: डॉ. नित्यानंद तिवारी
वक्ता: डॉ. बलि सिंह
डॉ. संजीव कुमार
डॉ. लीलाधर मंडलोई
डॉ. धीरंजन मालवे

दिनांकः 17 जून 2011
समयः 5‍ः30 बजे से
स्थानः संगोष्ठी कक्ष, तृतीय तल, हिन्दी अकादमी, विष्णु दिगंबर मार्ग, नई दिल्ली-01


आप सादर आमंत्रित हैं।

Saturday, October 2, 2010

बीसवीं सदी हाशिए के लोगों की शताब्दी हैं- वी एन राय

2 अक्टूबर । वर्धा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी के चार महान कवियों की जन्मशती वर्ष के अवसर पर उनकी रचनाओं पर चर्चा के बहाने बीसवीं शताब्दी के अर्थ को समझने के लिए देश भर से बड़े साहित्यकारों को आमंत्रित कर सेमिनार का आयोजन किया है। गांधी जयन्ती के दिन प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम का उद्‌घाटन प्रसिद्ध समालोचक नामवर सिंह द्वारा किया गया। यह रिपोर्ट लिखते समय नामवर जी का उद्‍घाटन भाषण चल रहा था। वे नागार्जुन की चर्चा करते हुए उनका दोहा सुना रहे थे।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूँठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक
-----------------------------(नागार्जुन)

इससे पहले कुलपति वी.एन.राय ने अपने विषय प्रवर्तन भाषण में बीसवीं सदी को हाशिए के लोगों की शताब्दी बताया। स्त्रियों, दलितों और गुलाम देश के नागरिकों को मनुष्य के रूप में जीने का हक मिला। जन्मशती के चार कवि हैं- 1-सच्चिदानन्द हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ 2-शमशेर, 3- केदारनाथ अग्रवाल, 4-नागार्जुन ।

निर्मला जैन-
(12:05 अपराह्न)

प्रख्यात आलोचक निर्मला जैन ने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया। समय की छाप हर एक रचना पर पड़ती है। इन चारों कवियों में बहुत मूल्य चिंता दिखती है।

शमशेर को कवियों का कवि क्यों कहा जाता है? इसकी व्याख्या जरूर होनी चाहिए।

“बात बोलेगी हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही” लेकिन शमशेर ने कविता के अलावा भी बहुत कुछ कहा है।

रिपोर्ट- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी (दोपहर 12‍ः10 बजे तक की कवरिंग)

Thursday, September 30, 2010

पाखी का वार्षिक महोत्‍सव 18 सितंबर को संपंन



वाराणसीः काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के कला संकाय के प्रेक्षागृह में 18 सितंबर को साहित्‍यिक मासिक पत्रिका ‘पाखी' का वार्षिक महोत्‍सव मनाया गया। इस अवसर पर जे.सी. जोशी स्‍मृति साहित्‍य सम्‍मान समारोह के साथ-साथ परंपरा और सृजनात्‍मकता विषय पर एक संगोष्‍ठी आयोजित की गयी। संगोष्‍ठी के मुख्‍य वक्‍ता श्री काशीनाथ सिंह, श्री रेवा प्रसाद द्विवेदी, श्री बलराज पाण्‍डे, श्री कमलेशदत्त त्रिपाठी, श्री श्रद्धानंद तथा श्री गोपेश्‍वर सिंह है। जे.सी. जोशी स्‍मृति साहित्‍य सम्‍मान के तहत दिया जाने वाला शब्‍द-साधक शिखर सम्‍मान हिन्‍दी साहित्‍य के शीर्ष आलोचक श्री नामवर सिंह को दिया गया। इसके अतिरिक्‍त तीन अन्‍य सम्‍मान भी दिये गये। जिसमें शब्‍द-साधना जनप्रिय सम्‍मान कथाकार रणेन्‍द्र को पिछले वर्ष प्रकाशित उनके उपन्‍यास ‘ग्‍लोबल गाँव के देवता' के लिए दिया गया। युवा रचनाकार सम्‍मान के अंतगर्त शब्‍द-साधना युवा सम्‍मान कविता के लिए निशांत को उनकी कविता ‘मैं में हम-हम में मैं' के लिए तथा शब्‍द-साधना युवा सम्‍मान कहानी के लिए दिलीप कुमार को उनकी कहानी ‘सड़क जाम' के लिए दिया गया। शब्‍द-साधना युवा सम्‍मान ‘कविता' की जूरी में श्री भागवत रावत, श्री ज्ञानेन्‍द्रपति और श्री विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी थे। शब्‍द-साधना युवा सम्‍मान ‘कहानी' की जूरी में श्री संजीव, श्री शिवमूर्ति और श्री हिमांशु जोशी थे। जूरी द्वारा चयनित प्रथम तीन कविताएँ और कहानियाँ ‘पाखी' के सितंबर अंक में प्रकाशित की गई थी।



शब्‍द-साधक शिखर सम्‍मान की सम्‍मान राशि 51 हजार, शब्‍द-साधना जनप्रिय सम्‍मान की राशि 21 हजार तथा शब्‍द-साधना युवा सम्‍मान की राशि ग्‍यारह हजार रुपये हैं। इस मौके पर ‘पाखी' के श्री नामवर सिंह पर केंद्रित अंक का लोकार्पण भी किया गया। इस कार्यक्रम की अध्‍यक्षता काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ. डी पी सिंह ने की। कार्यक्रम के स्‍वागताध्‍यक्ष हिन्‍दी विभाग के विभागाध्‍यक्ष राधेश्‍याम दुबे जी थे। धन्यवाद ज्ञापन पाखी संपादक प्रेम भारद्वाज जी ने किया।

संपादक
प्रेम भारद्वाज

Tuesday, August 31, 2010

नामवर सिंह को शब्द-साधक शिखर सम्मान

दिल्ली: जे.सी. जोशी स्मृति सम्मान के तहत दिया जाने वाला शब्द-साधक शिखर सम्मान हिन्दी साहित्य के शीर्ष आलोचक श्री नामवर सिंह को देने का निर्णय हुआ है। श्री सिंह को यह सम्मान उनके गृह क्षेत्र वाराणसी में आगामी 18 सितंबर को ‘पाखी’ के वार्षिक महोत्सव में दिया जाएगा। इस मौके पर ‘पाखी’ के श्री नामवर सिंह पर केन्द्रित अंक का लोकार्पण भी होना है। यह सूचना ‘पाखी’ के संपादक श्री अपूर्व जोशी ने दी।

श्री नामवर सिंह से पहले यह सम्मान स्व. विष्णु प्रभाकर, श्री श्रीलाल शुक्ल को दिया जा चुका है। इस वर्ष का शब्द-साधना जनप्रिय सम्मान कथाकर रणेन्द्र को पिछले वर्ष प्रकाशित उनके उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ के लिए देने का निर्णय हुआ है। इसी तरह शब्द-साधना युवा सम्मान कविता के लिए निशांत को उनकी कविता ‘मैं में हम-हम में मैं’ के लिए तथा शब्द-साधना युवा सम्मान कहानी के लिए दिलीप कुमार को उनकी कहानी ‘सड़क जाम’ के लिए देना तय हुआ है। ये तीनों सम्मान भी 18 सितंबर को वाराणसी में दिए जाएंगे। शब्द-साधना युवा सम्मान ‘कविता’ की जूरी में श्री भागवत रावत, श्री ज्ञानेन्द्रपति और श्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी थे। शब्द-साधना युवा सम्मान ‘कहानी’ की जूरी में श्री संजीव, श्री शिवमूर्ति और श्री हिमांशु जोशी थे। जूरी द्वारा चयनित प्रथम तीन कविताएँ और कहानियाँ ‘पाखी’ के सितंबर अंक में प्रकाशित की जा रही है।

शब्द-साधक शिखर सम्मान की राशि 51 हजार, शब्द-साधना जनप्रिय सम्मान की राशि 21 हजार तथा शब्द-साधना युवा सम्मान की राशि ग्यारह हजार रुपये है।

समाचार स्रोत- संपादक
अपूर्व जोशी

Friday, February 26, 2010

वर्ष 2010 का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार सीहोर के पंकज सुबीर को

सीहोर। वर्ष 2010 के लिये भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है । इस वर्ष के लिये ये पुरस्कार रूप से सीहोर के पंकज सुबीर को उनके उपन्यास 'ये वो सहर तो नहीं' के लिये दिया जा रहा है ।

सीहोर के युवा कहानीकार को पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिये इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है । भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें डॉ. गंगा प्रसाद विमल, शीर्ष कथाकार नया ज्ञानोदय के संपादक तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । देश भर ये प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था । भारतीय ज्ञानपीठ ने इस नवलेखन के देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिये इकसठ हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान किये जाने का निर्णय लिया था । तथा चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित करके का भी फैसला लिया गया था । गत दिवस चयन समिति की बैठक में वर्ष 2010 के ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिये सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर तथा दिल्ली के कथाकार कुणाल सिंह को संयुक्त रूप से ये पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया गया । चयन समिति के अध्यक्ष डॉ. नामवर सिंह ने स्वयं फोन कर समिति के निर्णय की जानकारी पंकज सुबीर को दी । भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा शीघ्र ही नई दिल्ली में एक भव्य आयोजन में ये पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । दोनों संयुक्त विजेताओं को पुरस्कार की राशि का आधा आधा प्रदान किया जायेगा । उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी पंकज सुबीर का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रकाशित होकर आया था, जो साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित रहा था । मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर की पचास से भी अधिक कहानियां देश भर की साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । पेशे से स्वतंत्र पत्रकार पंकज सुबीर अपनी विशिष्ट शैली तथा शिल्प के लिये जाने जाते हैं । युवा पीढी क़े नये कथाकारों में अपनी व्यंग्य निहित भाषा से वे अपनी अलग ही पहचान बन चुके हैं । उनको जिस उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिये ये पुरस्कार दिया जा रहा है उसमें उन्होंने 1857 से लेकर 2008 तक की कथा को व्यंग्य निहित भाषा में समेटा है । निर्णायकों के अनुसार इस उपन्यास में व्यंग्य का जो भाव है वह राग दरबारी की याद दिला देता है । इस उपन्यास में दो समानांतर कथाओं को समेटने की कोशिश की गई है।

Wednesday, October 14, 2009

दिनेश कुमार शुक्ल को ललमुनिया की दुनिया के लिए वर्ष 2008 का केदार सम्मान


((विवरण-पत्र को पूरा देखने के लिए उपर्युक्त चित्र पर क्लिक करें))

प्रगतिशील हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिया जानेवाला " केदार सम्मान" ( 2008 ) 22-23 अगस्त 2009 को इलाहाबाद में संपन्न भव्य कार्यक्रम में समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संकलन "ललमुनिया की दुनिया" के लिए, प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के हाथों प्रदान किया गया।

"केदार व्याख्यानमाला" में सम्बोधित करते हुए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने केदार जी के व्यक्तित्व पर बोलते हुए कहा कि केदार नैसर्गिक सौन्दर्य के विश्वजनीय कवि हैं। "जवान होकर गुलाब / गा रहा है फाग" जैसी संश्लिष्ट बिम्ब की कविता हिन्दी, अंग्रेज़ी में कहीं नहीं। एन्द्रिकता केदार की कविता का बड़ा गुण है। कविता की दुनिया में केदार ने एक नई नैतिकता की नींव रखी। केदार, मनुष्य और प्रकृति जहाँ संयुक्त रूप से मिलते हैं, वहाँ के कवि हैं। नदी ,पहाड़ आदि के बहाने, अपनी धरती के बहाने, केदार दबी हुई जनता की बात बोलते हैं। अपने व्याख्यान में डॉ.नामवर सिंह ने केदार की अनेक कविताओं का उल्लेख किया। इस व्याख्यानमाला के सत्र का संचालन महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय विस्तार केन्द्र (इलाहाबाद) के निदेशक सन्तोष भदौरिया ने क्षेत्रीय परिसर के सत्यप्रकाश मिश्र सभागार में किया। इस अवसर पर वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय विशेष रूप से उपस्थित रहे। उपस्थितों में मार्कण्डेय सिंह, दिनेश कुमार शुक्ल, प्रो. फ़ातमी, अजीत पुष्कल, अनुपम आनन्द, रामजी राय, प्रणय कृष्ण, नरेन्द्र पुण्डरीक, श्रीप्रकाश मिश्र, जयप्रकाश धूमकेतु, प्रकाश त्रिपाठी, नीलम राय, सूर्यनारायण सिंह, मुश्ताक अली, विनोद कुमार शुक्ल, महेन्द्रपाल जैन, हरिश्चन्द्र पाण्डेय, विभूति मिश्र, चन्द्रपाल कश्यप, लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी आदि के नाम उल्लेनीय हैं।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में समकालीन हिन्दी कविता का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण सम्मान "केदार सम्मान-2008" समकालीन हिन्दी कविता के चर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संग्रह "ललमुनिया की दुनिया" के लिए प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह एवम् कुलपति बी.एन.राय के हाथों प्रदान किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में अतिथियों का स्वागत सुधीर कुमार सिंह द्वारा किया गया। दिनेशकुमार शुक्ल की कविताओं पर बोलते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ इस भूमंडलीय समय पर एक बहुत बड़ा हस्तक्षेप करती हैं। इनका यह हस्तक्षेप भाव और सम्वेदना के स्तर पर सीमित न रह कर विचार के स्तर पर पहुँच कर पाठक को झकझोरता है। इस अवसर पर सम्मानित कवि दिनेश कुमार ने अपने वक्तव्य में बाँदा में कवि केदारनाथ अग्रवाल के अपने सान्निध्य के दिनों का स्मरण किया, बाँदा की धरती को याद किया, नदी, पहाड़, खेती और किसानों को याद किया।

इस अवसर पर रामजी राय ने अपने वक्तव्य में कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल बड़े कवि हैं, इनकी कविताएँ बाज़ारवाद से उत्पन्न त्रासदियों के विरुद्ध हर कहीं खड़ी दिखाई देती हैं। विषय के वैविध्य के साथ शिल्प के स्तर पर भी इनकी कविताएँ चमत्कृत करती हैं।

अवसर पर अपने वक्तव्य में डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि दिनेश कुमार शुक्ल वास्तव में समकालीन हिन्दी कविता के बड़े कवि हैं। बाज़ारवाद के महासमुद्र में फँसी डूबती दुनिया के लिए गहन अंधेरे में प्रकाश स्तम्भ की तरह हैं। दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ केदार जी की परम्परा की कविताएँ हैं। वाकई वह इस सम्मान के सही अधिकारी ठहरते हैं।

कार्यक्रम के अन्त में दिनेश कुमार शुक्ल ने अपनी कविताओं का बहुत प्रभावी पाठ किया, जिसे सुनकर श्रोताओं को निराला और शिवमंगल सिंह सुमन के प्रभावी अद्भुत काव्यपाठों की स्मृति हो आई।

"केदार सम्मान" - सत्र का संचालन ‘बहुवचन’ के सह सम्पादक प्रकाश त्रिपाठी ने और धन्यवाद ज्ञापन विशेष कर्तव्य अधिकारी राकेश ने किया।

--नरेन्द्र पुण्डरीक,
सचिव,
केदार शोधपीठ न्यास

Monday, August 24, 2009

गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्बारा यादगार कार्यक्रम

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला


(भाषण देतीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित)
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महात्मा गाँधी मानव सभ्यता के लिए युग पुरुष थे. 'हिंदी अकादमी' द्वारा नव-प्रकाशित गाँधी की दो विश्वप्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' और 'सत्य के प्रयोग' पर एक यादगार कार्यक्रम दि. 18 अगस्त 2009 को दिल्ली के 'त्रिवेणी सभागार (मंडी हाउस)' में आयोजित हुआ जिसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा दोनों पुस्तकों के विमोचन के बाद अलग अलग सत्रों में इन पुस्तकों पर चर्चा हुई. गाँधी सन् 1892 में किसी मुवक्किल का मुकद्दमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए तो फिर पूरे दो दशक तक वहां के भारतवासियों की समस्याओं पर संघर्ष किया जिस ने उन्हें महात्मा बना दिया. महात्मा गाँधी की शख्सियत को यदि हम केवल स्वाधीनता संघर्ष तक सीमित रखेंगे, तो उनके व्यक्तित्व के कई अनमोल आयामों को जानने से हम वंचित रह जाएंगे. गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में ही 'हड़ताल' व 'सत्याग्रह' का आविष्कार किया. वहीं जीवन की पहली गिरफ्तारी भी हुई और सन् 1909 में जब सत्याग्रह के दौरान ही वे ब्रिटिश सरकार से बातचीत करने लन्दन गए तो लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में एक बेहद विवादस्पद पुस्तक भी लिखी, जिस का नाम था 'हिंद स्वराज'. इस पुस्तक ने विश्व के सभी विचारकों की चेतनाओं को झकझोर कर रख दिया. गाँधी इस पुस्तक में ब्रिटिश तथा पूरी पश्चिमी सभ्यता को नकार कर उसे चुनौती देते हैं कि ब्रिटिश की सभ्यता केवल मशीन पर टिकी हुई है, जो केवल शोषण की प्रतीक है. गाँधी ब्रिटिश के हर वैज्ञानिक चिह्न यथा रेलगाड़ी व उद्योग पर प्रश्न चिह्न लगा कर इस पवित्र देश की ऋषियों मुनियों की परंपरा को स्थापित करते हैं. गाँधी तो यहाँ तक कहते हैं कि यह रेलगाड़ी क्या है? इस से दुष्टता फैलती है. एक जगह के बुरे लोग दूसरी जगह जाते हैं. पूरी पुस्तक एक 'पाठक' और 'संपादक' के बीच हो रहे वार्तालाप के रूप में गुजराती में लिखी गई थी जिस का उनके सचिव महादेवन देसाई, जिसे वे अपना पांचवां पुत्र मानते थे, ने अनुवाद किया था. देश और विश्व के प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न पर अपनी जिज्ञासा 'पाठक' के रूप में प्रस्तुत करने वाले गाँधी के ही एक बर्मा स्थित मित्र प्राणजीवन मेहता हैं. जब 'पाठक' के रूप में प्राणजीवन मेहता पूछते हैं कि रेलगाड़ी से तो एक स्टेशन के साधू भी दूसरे स्टेशन जा सकते हैं, तब गाँधी कहते हैं कि अच्छा आदमी जानता है, कि अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है. बुरी बात तेज़ी से फ़ैल सकती है. जब 'हिंद स्वराज' छपी तो अधिकांश लोग बौखला भी गए. यहाँ तक कि गाँधी के राजनैतिक गुरु, गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधी से कहा कि यही पुस्तक आप कुछ वर्ष बाद पढ़ियेगा. तब आप को लगेगा कि यह पुस्तक किसी मूर्ख व्यक्ति ने लिखी है. इस पुस्तक को यदि हम सतही दृष्टि से देखेंगे तो सहज ही लगेगा कि पुस्तक सचमुच बहुत अव्यवहारिक है, क्यों कि गाँधी तो इस में डॉक्टर और वकील के पेशों तक को नकारते हैं. पर गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' को यदि हम मूर्त रूप से ही देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. पर पुस्तक अपनी आत्मा के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता के बेहद कड़वे सत्यों से साक्षात्कार करवाती है. आज हवाई जहाज़ है तो विश्व भर के आतंकवादी एक देश से दूसरे देश बेखौफ आते जाते हैं, जब कि अध्यात्मिक शक्तियों का तो अकाल ही है, वे एक देश से दूसरे देश जाएं तो क्योंकर!..

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आगमन पर उन का हार्दिक स्वागत हुआ व हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने स्वागत भाषण किया. मंच पर शीला दीक्षित के साथ प्रसिद्ध पत्रकार प्रभास जोशी भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व प्रभास जोशी की उपस्थिति में अकादमी सचिव रविन्द्र श्रीवास्तव ने 'हिंद स्वराज' के सभ्यता सम्बन्धी कई अंश पढ़ कर सुनाए. अशोक चक्रधर के भाषण के पश्चात 'हिंद स्वराज' व गाँधी द्वारा 1925 में रचित 'मेरे सत्य प्रयोग' पुस्तकों का विमोचन हुआ. गाँधी सत्य व अहिंसा के ईशदूत थे. 'सत्य के प्रयोग' उन की आत्मकथा है जिस में बचपन में स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान 'kettle' शब्द के स्पेलिंग न आने पर अध्यापक द्वारा इशारे से दिए गए दूसरे विद्यार्थी की नक़ल करने के आदेश की अवमानना व किशोरावस्था में सिगरेट पीने या वेश्यागमन से ले कर उस समय तक की सभी झलकियाँ हैं, जब गाँधी असहयोग आंदोलन पार कर के अपनी आयु के 55 वर्ष भी पार कर चुके थे.

शीला दीक्षित ने अकादमी को इन पुस्तकों के प्रकाशन पर बधाई देते हुए कहा कि 'हिंद स्वराज' पुस्तक की रचना को अब पूरे 100 साल हो जाएंगे. इस अवसर पर उन्होंने आशा व्यक्त की कि 'हिंद स्वराज' को कम से कम दिल्ली के सभी स्कूलों में पहुंचना चाहिए. इस पर सभागार में ख़ुशी के मारे तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. गाँधी के सादगी भरे जीवन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सादगी भरा जीवन एक प्रकार से बहुत मंहगा पड़ता है. उस में सब से ज्यादा ज़रुरत बहुत कड़े अनुशासन की होती है. गाँधी के आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि जब 'नमक सत्याग्रह' में उन्होंने एक मुट्ठी भर नमक अपने हाथ में ले कर ब्रिटिश की सत्ता को चुनौती दी तो पूरा विश्व दहल गया...

अनेक व्यस्तताओं व किसी अन्य सम्मलेन में उपस्थित होने की अनिवार्यता के कारण शीला दीक्षित अपने भाषण के तुंरत बाद प्रस्थान कर गई और इस विमोचन सत्र की बागडोर प्रभास जोशी ने संभाली. प्रभास जोशी ने अपने भाषण में कहा कि गाँधी बेहद परिश्रमी व्यक्ति थे. जब लिखते लिखते उन का दायाँ हाथ थक जाता था, तब वे बाएँ हाथ से लिखते थे. उन्होंने सभागार में उपस्थित 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' निदेशिका वर्षा दास की ओर संकेत कर के कहा कि उन्होंने वर्षा जी से कह कर गाँधी जी द्वारा उल्टे हाथ (बाएँ) से लिखते समय का एक चित्र बनवाया था. स्पष्ट है कि गाँधी किसी भी परिस्थिति में अपना काम रुकने नहीं देते थे. प्रभास जोशी ने बताया कि गाँधी ने 'हिंद स्वराज' दि. 13 नवम्बर 1909 से ले कर 22 नवम्बर 1909 तक (केवल 10 दिन में ही) 'किल्दोनन' जहाज़ में लिख डाली.

विमोचन सत्र के बाद 'हिंदी अकादमी' की तरफ से स्वादिष्ट भोजन का आयोजन जिस के बाद दूसरे सत्र में 'हिंद स्वराज' पर चर्चा हुई. इस सत्र की अध्यक्षता जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. मुशीरुल हसन ने की तथा इस में वर्षा दास, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, प्रो. अशुम गुप्ता व श्री राजीव वोहरा ने भाग लिया. प्रो. मुशीरुल हसन ने 'हिंद स्वराज' की आज के इस दौर में प्रासंगिकता पर अप्रत्यक्ष में सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक की पढ़ने की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त नहीं होती. जैसे मार्क्सवाद या साम्यवाद आज पूरी दुनिया से यदि समाप्त हो गया है तो भी 'Manifesto of Communism' या कार्ल मार्क्स खुद भी क्या अप्रासंगिक हो गए? इसलिए आज 'हिंद स्वराज' को एक manifesto की तरह पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश की गुलामी में ही गाँधी हुए, टैगोर हुए और ब्रिटिश की गुलामी के बावजूद देश में (जनता के लिए महापुरुषों के) 'उपदेश' की कमी नहीं थी. वर्षा दास ने कहा कि 'स्वराज' शब्द का उपयोग सब से पहले दादा भाई नौरोजी ने किया था. इसके बाद जब तिलक ने 'स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा दिया तो 'स्वराज' शब्द को व्यापक अर्थ मिला. गाँधी ने 'स्वराज' शब्द को एक गुणात्मक रूप दिया. वर्षा दास ने कहा कि 'हिंद स्वराज' हमारे लिए एक मूल्यवान धरोहर है. 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' प्रतिवर्ष गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को गाँधी सम्बंधित चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित करता रहा है. गुजरती में क्यों कि उन्होंने 'हिंद स्वराज' बार बार पढ़ी है, अतः उनके मन में यह कल्पना है कि इस पुस्तक में गाँधी द्वारा कही हुई बातों पर वे चित्र बनवाएं और गाँधी जन्मदिवस पर उन्हें प्रर्दशित करें. 'हिंद स्वराज' से गाँधी के ही किसी संवाद का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी यह मानते थे कि 'स्वराज' का अर्थ 'स्व' का राज नहीं है, वरन् 'स्व' पर राज है. (स्पष्ट है कि इस प्रकार के गूढ़तम अर्थों के कारण ही कई विद्वान गाँधी की शिक्षाओं की तुलना 'श्रीमद भगवद गीता' व वेदों की शिक्षाओं से करते हैं).

इस सत्र के बाद फिर चाय का अंतराल और तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्य समालोचक नामवर सिंह ने की. इस सत्र में अजित कुमार, प्रो. आनंद कुमार और रामचंद्र राही ने भाग लिया. प्रो. अजित कुमार ने अपनी एक सशक्त कविता प्रस्तुत की जिस की व्यंग्य पंक्तियों ने सब पर बेहद तीखा प्रभाव छोड़ा. कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं:

गठजोड़/ होते हैं जिस तरह/ खिचड़ी के चार यार/ दही पापड़ घी आचार/ कुछ कुछ उसी तरह/ गाँधी ने अपनी आँधी से अपनी छड़ी, लाठी, चप्पल/ और लंगोटी भी बांधी/ इस अनोखे गठजोड़ को कभी न कभी बिखरना तो था ही...
...हर साल/अक्तूबर के दूसरे दिन/ मीठी मधुर लोरी सुना कर/ उसकी नींद /हम गहरी बनाते हैं/ ताकि उठ कर कहीं अपनी ऐनक न मांग ले...


अजित कुमार ने 'सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा' की समानता वेदों पुराणों से की. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान का 'जन मन को प्रतिध्वनित करने वाला' एक बेहद प्यारा लोकगीत भी सुनाया:

'काहे पे आवें वीर जवाहर, काहे पे गाँधी महाराज?
काहे पे आवे भारत माता, काहे पे आवे सुराज?


इस का उत्तर था:

घोड़े पे आवें वीर जवाहर, पैदल गाँधी महाराज,
हाथी पे आवे भारत माता, डोली पे आवे सुराज.


नामवर सिंह ने अपने विस्तृत अध्यक्षीय भाषण में गाँधी द्वारा बताया गया धर्म और राजनीती का समीकरण स्पष्ट किया. आज धर्म टुच्ची राजनीति का साधन बन गया है, इसलिए अधिकांश विद्वान राजनीति और धर्म को विलग रखने की शिक्षा देते हैं. पर गाँधी धर्म के सही परिप्रेक्ष्य में कहते हैं -

'जो मनुष्य कहता है कि धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह धर्म को नहीं जानता.'

स्पष्ट है कि गाँधी द्वारा उपयुक्त 'धर्म' शब्द 'मानवीयता' शब्द का पर्यायवाची है.
अंत में अशोक चक्रधर ने अध्यक्ष नामवर सिंह व सभागार को विश्वास दिलाया कि हिंदी अकादमी आज के आधुनिक उपकरण इन्टरनेट का पूर्ण सदुपयोग कर के विद्यार्थियों के ई -मेल एकत्रित करेगी और उन से संपर्क स्थापित कर के गाँधी की पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा देगी.

त्रिवेणी सभागार में बिताया लगभग पूरा दिन उपस्थित विचारशील लोगों के लिए 'गाँधी दिवस' सा था. तीसरे सत्र के बाद फिर जलपान और फिर दिन भर के कार्यक्रम की संपन्नता बेहद मधुर तरीके से हुई. शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध हस्ती मीता पंडित की मधुर स्वरलहरियों से सभागार भर उठा. गाँधी के सर्वाधिक प्रिय भजन:

वैष्णव जन ते तेणे कहिये
जो पीर पराई जाने रे


और

पायो री मैं तो राम रतन धन पायो...

और

रघुपति राघव रजा राम,
पतित पावन सीता राम,
ईश्वर अल्ला तेरे नाम
सब को सन्मति दे भगवन ...

Saturday, July 4, 2009

‘अनाद्यसूक्‍त उद्भ्रांत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ कृति है!’ -प्रो. नामवर सिंह

02 जुलाई, नई दिल्ली

"उद्भ्रांत की गीत की साधना घूम-फिर कर बार-बार प्रकट होती है। उन्होंने गीत से शुरू किया था। उनके छंदों की लय से यही पता चलता है। उनमें गहरा समकालीन बोध है मगर वे छंदों की लय अपनी मुक्त छंद की कविताओं में भी ले आए।’ ‘अनाद्यसूक्त’ उनकी अब तक की सर्वोत्तम कृति है जहाँ उन्होंने शब्दों के मितव्यय से बड़ी बात कहने का सफल प्रयोग किया है।’ उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि ‘उद्भ्रांत जी अब साठ साल के हो गए हैं और इस कार्यक्रम को उनकी षष्ठिपूर्ति समारोह के रूप में मैं देखता हूँ और उन्हें शतायु होने की शुभकामनाएं देता हूँ। अब उन्हें दूसरों की किताबों का विमोचन करना चाहिए।’

उन्होंने कहा कि ‘‘रवीन्द्रनाथ भी एक महाकाव्य लिखना चाहते थे लेकिन एक गीत में वे कहते हैं कि यह अब संभव नहीं है क्योंकि सरस्वती के नर्तन से उसके पांवों की गति लगातार उस सुगठन को तोड़ रही है जो महाकाव्य की रचना का आधार होता है। हिन्दी में भी महाकाव्य की रचना पीछे छूट गई। उद्भ्रांत ने महाकाव्य लिखने का प्रयास किया है। यह हिन्दी में पहली बार हो रहा है कि एक कवि रामायण काल की दर्जनों स्त्रियों की कहानी को एक सूत्र में बांध रहा है। उद्भ्रांत ने अनेक स्त्री पात्रों के माध्यम से समकालीन प्रश्नों और जीवन यथार्थ पर जो बात कही है वह एकदम नई बात है। इससे पहले कभी यह बात किसी अन्य की सोच में नहीं आई। उद्भ्रांत ने लोक में विद्यमान स्मृतियों का भी यहाँ अतिक्रमण किया है। शबरी का प्रसंग ऐसा ही प्रसंग है। शबरी बेर खाने बढ़ा राम का हाथ, मन में आये इस भाव के चलते, पकड़ लेती है कि कहीं वे खट्टे हों! और इस तरह की अनेक नई उद्‍भावनाएँ 'त्रेता' में हमें मिलती है। इन्होंने 'त्रेता'की भूमिका में और काव्य में भी यह लिखा है कि त्रेता दरअसल कलि है और कलि ही त्रेता है।

उक्त विचार शिखर आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की दो पुस्तकों ‘त्रेता’ और ‘अनाद्यसूक्तः’ तथा हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. आनंद प्रकाश दीक्षित द्वारा लिखित आलोचना ग्रंथ ‘त्रेता: एक अन्तर्यात्रा’ के लोकार्पण के अवसर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान में व्यक्त किया। नामवर सिंह ने जोड़ा कि हिन्दी-साहित्य के पुस्तक-लोकार्पण के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि एक कृति का लोकार्पण हो रहा है और उसी के साथ हिन्दी के एक बड़े आचार्य की आलोचना कृति का विमोचन हो रहा है।

इस अवसर पर सम्पन्न हुई विचार-गोष्ठी ‘मिथक के अनाद्य से उठता समकालीन’ में पटना से पधारे जाने-माने प्रगतिशील आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि मिथकों का इस्तेमाल प्रायः यथार्थ को समझने के लिए किया जाता रहा है, परंतु उद्भ्रांत ने ‘त्रेता’ के माध्यम से इसे समकालीन को समझने का माध्यम बनाया है। समकालीन की एक परम्परा होती है जो नीचे से ऊपर की ओर जाती है अर्थात् वह समाज के व्यापक समूह को उसके बहाने समझने की कोशिश करती है लेकिन जो लोग इसे चक्रीय मानते रहे हैं वे प्रायः इनका गैर राजनीतिक इस्तेमाल करते रहे हैं। उद्भ्रांत जिस प्रकार ‘त्रेता’ की स्त्रियों को अपने महाकाव्य में प्रतिष्ठित करते हैं, वह एक नई बात है। उन्होंने उन मिथकों को काफी हद तक तोड़ा है जो अपने आसपास के चरित्रों को निगल जाते हैं।

डॉ. बली सिंह ने कहा कि मैथिलीशरण गुप्त ने उर्मिला के बहाने ‘साकेत’ में स्त्री के गहरे अंतर्द्वंद्व को एक ऊँचाई प्रदान की। उसके बाद से महाकाव्य की रचना फिर कभी संभव नहीं हुई। उद्भ्रांत का ‘त्रेता’ पढ़ते हुए उसकी याद आना स्वाभाविक है। उन्होंने अंजना बक्शी की ‘माँ’ पर लिखी कविताओं में व्यक्त प्रश्नवाचकता के बहाने उद्भ्रांत द्वारा उठाए गए चरित्रों से उभरते प्रश्नों को रेखांकित किया।

दूरदर्शन के वरिष्ठ अधिकारी एवं साहित्य मर्मज्ञ धीरंजन मालवे ने उद्भ्रांत को बधाई देते हुए उनके काव्य ‘अनाद्यसूक्‍त’ को अद्भुत और बिग बैंग की उपाधि दी।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए सुरेश शर्मा ने विजयदेव नारायण साही द्वारा 1958 में की गई महाकाव्य के अंत की घोषणा की याद की। उन्होंने कहा कि उद्भ्रांत ने उस टूटी हुई कड़ी को फिर से जोड़ दिया है।

इस मौके पर वयोवृद्ध आलोचक डॉ॰ आनन्द प्रकाश दीक्षित द्वारा प्रेषित की गई चिट्ठी तथा ‘अनाद्यसूक्त’ पर पीयूष दइया की टिप्पणी का भी पाठ हुआ। डॉ. दीक्षित ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जिस तरह कविता कभी खत्म नहीं होती, उसी तरह आलोचना-चाहे वह कितनी भी समर्थ हो-कभी अंतिम वाक्य नहीं होती। मैंने ‘त्रेता’ को महाकाव्य अवश्य कहा है लेकिन उद्भ्रांत को महाकवि नहीं कहा है। हमारे लिए यह प्रश्न अनिवार्य है कि महाकाव्य का रचयिता कवि अधिकार-सिद्धरूप में महाकवि मान लिया जा सकता है या कि उस पद के लिए किन्हीं और मूल्यों का संधान करना होगा। पीयूष दईया का मानना था कि यह एक कठिन व दुर्निवार काव्य-कृति है। प्रारम्भ में उद्भ्रांत ने ‘त्रेता’ और ‘अनाद्यसूक्त के कुछ काव्यांशों का अत्यंत प्रभावशाली पाठ किया।

धन्यवाद ज्ञापन नेशनल पब्लिशिंग हाऊस के श्री कमल जैन ने किया।

प्रस्तुति-
रामजी यादव
द्वारा श्रीमती कृपा गौतम
एच-81, पालिका आवास,
सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली - 110023

Friday, June 26, 2009

आलोक श्रीवास्तव को दुष्यंत कुमार पुरस्कार

मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने इस बार अपना प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार पुरस्कार' युवा ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव को देने की घोषणा की है। आलोक को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के लिए दिया जाएगा। साल 2007 में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह के लिए आलोक श्रीवास्तव को मिलने वाला यह तीसरा प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार है। इससे पहले उन्हें राजस्थान के 'डॉ. भगवतीशरण चतुर्वेदी पुरस्कार' और प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के हाथों मुंबई में प्रतिष्ठित 'हेमंत स्मृति कविता सम्मान' से नवाज़ा जा चुका है। हाल ही में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने अपने नए एलबम 'इंतेहा' में आलोक की ग़ज़ल को अपनी आवाज़ दी है। प्रख्यात शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्‍गल भी अपने चर्चित एलबन 'कोशिश' में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्मों के साथ आलोक के गीतों को स्वर दे चुकी हैं। पेशे से टीवी पत्रकार आलोक, मूलत: विदिशा (म.प्र.) के हैं और इन दिनों दिल्ली में न्यूज़ चैनल 'आजतक' से जुड़े हैं।

Sunday, May 24, 2009

बिना कल के आज की कल्पना बेमानी है- प्रो. नित्यानंद तिवारी

23 मई, नई दिल्ली।

‘‘पुराने का अध्ययन और विश्लेषण मुझे आज को समझने की अन्तर्दृष्टि देता है। जो लोग पुराने को काबू में करके केवल आज ही आज पर जोर दे रहे हैं वे नहीं जानते कि बिना कल के आज की कल्पना ही नहीं की जा सकती।’’

उक्त विचार सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित विचार-गोष्ठी और वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत की पुस्तकों के विमोचन के मौके पर व्यक्त किए। प्रो. तिवारी ने उद्भ्रांत जी की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि ‘उनकी कविताएं हमारे दौर की चुनौतियों और द्वंद्वों को रेखांकित करती हैं। ये अभिधा की बहुत बड़ी ताकत है। उद्भ्रांत को कविताओं में ब्यौरों की अधिकता और परिणामवादी प्रवृत्ति से बचना चाहिए और कविता की वास्तविक ताकत के लिए प्रक्रिया तक ही सीमित रहना चाहिए।’

इस अवसर पर उद्भ्रांत की पुस्तकों-‘सदी का महाराग’ का लोकार्पण प्रो. तिवारी ने किया। यह रेवती रमण द्वारा सम्पादित उद्भ्रांत की बीसवीं सदी की कविताओं का संचयन है। उद्भ्रांत के नए कविता संग्रह ‘हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय’ का विमोचन प्रो. नामवर सिंह द्वारा, उद्भ्रांत द्वारा सम्पादित लघु पत्रिका आंदोलन और युवा की भूमिका का विमोचन राजेन्द्र यादव द्वारा तथा शीतल शेटे द्वारा लिखित ‘राम की शक्तिपूजा एवं रुद्रावतार’ का विमोचन पंकज बिष्ट द्वारा किया गया। इस मौके पर रामप्रसाद शर्मा ‘महर्षि’ द्वारा लिखित पुस्तक ‘ग़ज़ल और ग़ज़ल की तकनीक’ का भी विमोचन संयुक्त रूप से किया गया। उल्लेखनीय है कि इन दोनों पुस्तकों का विमोचन क्रमशः श्री खगेंद्र ठाकुर और श्रीमती विमलेश्वरी सहाय द्वारा किया जाना था लेकिन कतिपय कारणों से वे आयोजन में न आ सके।

विमोचन समारोह के बाद आयोजित विचार-गोष्ठी ‘लघु के राग और विचार की आधी सदी’ पर बोलते हुए हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार एवं हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव ने कहा कि ‘आज लघु पत्रिका को सीधे-सीधे चिह्नित करना बेहद कठिन है क्योंकि लघुपत्रिकाओं की स्पष्ट व्याख्या कहीं देखने को नहीं मिलती। शायद इसे अंग्रेजी के 'लिटिल मैगज़ीन' से लिया गया माना जाता है। फिर भी मौटे तौर पर हिन्दी में भी इनकी शुरूआत अंग्रेजी की तरह सत्ता और संस्थान के विचार के विरोध में व्यक्तिगत प्रयासों से हुईं। अब तो हिन्दी लघु पत्रिकाओं की संख्या साढे़ चार सौ से भी अधिक है और बहुत स्वस्थ हालत में प्रकाशित हो रही हैं। पहले कागज के जुगाड़ में बहुत सारा समय लगता था और इसे ही एक बड़ी उपलब्धि माना जाता था। तब संपादक झोला लटकाए रचना और साधन का सहयोग पाने के लिए घूमा करता था जबकि आज पत्रिकाओं के कागज की गुणवत्ता ही ऐसी है कि मैं हंस के कवर के लिए भी ऐसा कागज नहीं लगा पाता। समय के साथ सारी पत्रिकाएं दलित और स्त्री-विमर्श को तरज़ीह दे रही हैं वरना उनके पिछड़ जाने का खतरा है। ‘हंस’ भी एक लघु पत्रिका है जिसने समकालीन मुद्दों को उठाया।’

‘समयांतर’ के सम्पादक और वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट ने कहा कि ‘‘लघु पत्रिका हमेशा सत्ता के खिलाफ़ आवाज़ उठाती है। जिस पत्रिका में यह शक्ति नहीं होती वह लघु पत्रिका की श्रेणी में नहीं आ सकती।’’

बली सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि घरानों या संस्थानों से नहीं, पत्रिका का चरित्र सम्पादकों के सरोकारों से तय होता है। उन्होंने ‘युवा’ की सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करते हुए उद्भ्रांत की भूमिका की सराहना की। उन्होंने शीतल शेटे की आलोचना-पुस्तक ‘राम की शक्तिपूजा एवं रुद्रावतार’ की चर्चा करते हुए कहा कि यह बेहद पठनीय पुस्तक है और इस दौर में मिथकीय कविता की वापसी का संकेत करती है।’’

हेमंत जोशी ने इस अवसर पर सवाल उठाया कि ‘‘इस बीच पुराने समय की याद करने का चलन जोर पकड़ रहा है। क्या यह इस बात का संकेत है कि अब उतने तीव्र और समकालीनताधर्मी आंदोलन नहीं हैं?’’

दूरदर्शन में अधिकारी श्री धीरंजन मालवे ने उद्भ्रांत की कविता ‘रुद्रावतार’ की प्रशंसा करते हुए कहा कि ‘‘यह कविता समकालीन दौर का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। हम अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों को महान मान लेते हैं लेकिन मौजूदा रचनाकर्मी की महत्ता को स्वीकारने में संकोच करते हैं।’’

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. नामवर सिंह ने उद्भ्रांत की कविताओं के बहाने कवि की चर्चा में कहा कि ‘‘वे अपनी बेबाकी में रिश्ता निभाने की औपचारिकता का हमेशा अतिक्रमण करते रहे हैं। उन्होंने आज के दौर की महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में ‘समयांतर’ की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उसे साहित्य समाज के पहरेदार की संज्ञा दी।’’

इससे पहले कवि उद्भ्रांत ने स्पष्ट किया कि ‘‘उनकी कविताओं की व्यंजना की शक्ति की लगातार अनदेखी की जाती रही है। उन्होंने आज की आलोचना के पूर्वाग्रहों के प्रति घोर असहमति जाहिर की।’’

दूरदर्शन की समाचार वाचिका श्रीमती मंजरी जोशी ने उद्भ्रांत जी की तीन कविताओं ‘हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय’, ‘स्वाहा’ और ‘कविता के विरुद्ध’ का पाठ किया।

कार्यक्रम का संचालन पत्रकार और लेखक सुरेश शर्मा ने किया।

प्रस्तुतिः
रामजी यादव
द्वारा श्रीमती कृपा गौतम
एच-81, पालिका आवास,
सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली - 110023

Thursday, May 21, 2009

हिन्दी साहित्य के शिखरनाम कल करेंगे कई पुस्तकों का विमोचन

जवाहर पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली

आपको सादर आमंत्रित करते हैं

अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तकों के लोकार्पण एवं विचार-गोष्ठी में
सक्रिय सहभागिता के लिए।


लोकार्पण एवं विचार-गोष्ठी

उद्भ्रांत के नये कविता-संग्रह ‘हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय’ का प्रो. नामवर सिंह द्वारा;
उद्भ्रांत द्वारा सम्पादित ‘लघु पत्रिका आंदोलन और युवा की भूमिका’ का श्री राजेन्द्र यादव द्वारा;
डॉ. रेवतीरमण द्वारा सम्पादित उद्भ्रांत की बीसवीं शताब्दी की कविताओं के संचयन
‘सदी का महाराग’ का प्रो. नित्यानंद तिवारी द्वारा;
श्री रामप्रसाद शर्मा ‘महर्षि’ की पुस्तक ‘ग़ज़ल और ग़ज़ल की तकनीक’ का श्रीमती बिमलेश्वरी सहाय द्वारा; और
सुश्री शीतल शेटे द्वारा लिखित ‘राम की शक्तिपूजा और रुद्रावतार’ का डॉ. खगेन्द्र ठाकुर द्वारा।

विचार-गोष्ठी का विषय होगा ‘लघु के राग और विचार की आधी सदी’।

अध्यक्षताः प्रो. नामवर सिंह, श्री राजेन्द्र यादव, प्रो. नित्यानंद तिवारी
मुख्य वक्ताः डॉ. खगेन्द्र ठाकुर
सान्निध्यः मुख्य अतिथि श्रीमती बिमलेश्वरी सहाय
विषय प्रवर्तनः डॉ. हेमंत जोशी
संचालनः सुरेश शर्मा

विचार-विमर्श में प्रमुख भागीदारी होगी सर्वश्री डॉ. हेतु भारद्वाज, प्रो. जानकी प्रसाद शर्मा, प्रो. रेवतीरमण, डॉ. बली सिंह, धीरंजन मालवे और आपकी।

स्थानः सभागार, गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली
दिन एवं तिथिः शुक्रवार, 22 मई, 2009
समयः सायं 5:30 बजे (चाय एवं नाश्ता)
सायं 6:00 बजे से 8:00 बजे (संगोष्ठी)


कृपया अवश्य पधारें। हम आपके स्वागत में प्रतीक्षारत हैं।

रवि मजुमदार
फोन:
(011) 26962973, 26962507, 9868103841

Monday, April 6, 2009

दिल्ली में हुआ तेजेन्द्र शर्मा पर केन्द्रित पुस्तक 'वक़्त के आइने में' का विमोचन



लंदन के चर्चित हिन्दी कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा पर प्रकाशित अभिनंदन-ग्रंथ 'वक़्त के आइने में' का लोकार्पण नई दिल्ली के राजेन्द्र भवन सभागार में हुआ। पुस्तक का विमोचन वरिष्ठ आलोचक प्रो॰ नामवर सिंह, वरिष्ठ कहानीकार कृष्णा सोबती और हंस के संपादक राजेन्द्र यादव ने किया। इस अभिनंदन-ग्रंथ के संपादक हरि भटनागर हैं जो एक वरिष्ठ कथाकार हैं और चर्चित साहित्यिक पत्रिका रचना-समय के संपादक भी हैं। इस पुस्तक में देश-विदेश के कथा आलोचकों तथा कहानीप्रेमियों की तेजेन्द्र की कहानियों पर रायों को संकलित किया गया है। अपने सम्पादकीय वक्तव्य में हरि भटनागर ने कहा कि जब वे इंडिया टुडे के लिए पिछले साठ सालों में प्रकाशित श्रेष्ठ २५ कहानियों का संकलन कर रहे थे तो उन्होंने तेजेन्द्र की एक कहानी 'कब्र का मुनाफ़ा' को भी इसमें ज़गह दी थी। यह जानने के बाद उनको कई धमकी भरे खत और फोन आए। उन्हें बहुत अफसोस था कि ज्यादातर पाठक-लेखक नाम से कहानियाँ पढ़ते हैं और उसपर अपनी राय बनाते हैं।

आधारवक्तव्य देते हुए युवा कहानीकार और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्राध्यापक अजय नावरिया ने कहा कि तेजेन्द्र की कहानियाँ समय की उपज हैं जो भारत के बाहर भारतीयों की ज़िदगियों को देखने का अवसर देती हैं। तेजेन्द्र की कहानियों और उनके व्यक्तित्व के कई आयाम हैं, जिन्हें इस पुस्तक में सुसंकलित किया गया है। उन्हें यह ग्रंथ बहुत ज़रूरी लगता है।

कार्यक्रम के संचालक अजीत राय ने बताया कि वे २ साल पहले तक तेजेन्द्र शर्मा को कथाकार नहीं मानते थे। वे उन्हें विश्व हिन्दू परिषद का समर्थक और कट्टर हिन्दूवादी मानते थे। जब वे लंदन गए तो तेजेन्द्र ने उन्हें कुछ कहानियाँ पढ़ने को दी, लेकिन उन्होंने उसे कूड़े में फेंक दिया। लेकिन जब पढ़ा तो पढ़ते चले गए, उनके सामने एक नई दुनिया खुल गई।

कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि प्रो॰ नामवर सिंह ने तेजेन्द्र को एक समर्थ कथाकार बताया और यह उम्मीद व्यक्त की कि वे भविष्य में और भी प्रौढ़ कहानियाँ लिखेंगे। हरि भटनागर ने कहा कि वे आने वाले समय में अन्य साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी इस तरह के संकलन के प्रकाशन की योजना बना रहे हैं।

नूर ज़हीर ने इस ग्रंथ में संकलित सुधा ओम धींगरा का तेजेन्द्र के नाम पत्र पढ़कर सभी दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। राजेन्द्र यादव ने भी इस कार्यक्रम तथा इस अभिनंदन-ग्रंथ का स्वागत किया। उन्होंने प्रवासी रचनाकार से यह सवाल भी पूछा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारत में लगातार उपजी तनाव की स्थिति के लिए क्या उनका सोने की ईंटें भेजना जिम्मेदार नहीं है। प्रवासी साहित्यकारों को अपनी लेखनी को कभी इस गुत्थी को सुलझाने में भी इस्तेमाल करना चाहिए।

कृष्णा सोबती ने तेजेन्द्र को एक कुशल कहानीकार बताया और कुछ-एक कहानियों के दृश्य तथा वक्तव्य पढ़कर सुनाए। उनकी एक कहानी 'टेलीफोन लाइन' को उन्होंने 'पहले हाथ का माल' यानी भोगी गई कहानी बताया और कहा कि लेखन-पाठन के इतने लम्बे तजुर्बे के बावज़ूद उन्हें यह बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि यह कहानी यहाँ खत्म होगी।

कार्यक्रम में कहानीकार कन्हैयालाल नंदन, लीलाधर मंडलोई, मुम्बई से सूरज प्रकाश, मधु अरोरा, जमशेदपुर से विजया शर्मा, भोपाल से आशा सिंह, हंगरी की हिन्दी विद्वान मारिया, सुभाष नीरव इत्यादि साहित्यकार उपस्थित थे।

Thursday, March 26, 2009

'वक़्त के आइने में' के विमोचन में आप सभी आमंत्रित हैं

रचना समय के संपादक हरि भटनागर ने ब्रिटेन के हिन्दी लेखक तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक आलोचनात्मक ग्रन्थ संपादित किया है। इस ग्रन्थ में राजेन्द्र यादव, परमानन्द श्रीवास्तव, असग़र वजाहत, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, ज़कीया ज़ुबैरी, ज्ञान चतुर्वेदी, पुष्पा भारती, सूर्यबाला, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रेम जनमेजय, सूरज प्रकाश, शम्भु गुप्त, अजय नावरिया के साथ साथ ब्रिटेन, कनाडा, अमरीका एवं यू.ए.ई. के लेखकों आलोचकों के लेख शामिल हैं।

तेजेन्द्र शर्मा - वक़्त के आइने में का विमोचन राजेन्द्र प्रसाद भवन सभागार, 210 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग (आई.टी.ओ. के निकट), नई दिल्ली-110002 में 4 अप्रैल 2009 की शाम 5.30 बजे कृष्णा सोबती, डा. नामवर सिंह एवं राजेन्द्र यादव के हाथों सम्पन्न होगा।

कृपया नोट कर लें -

दिनांकः 4 अप्रैल 2009
स्थानः राजेन्द्र प्रसाद भवन सभागार,
210 दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, (आई.टी.ओ. के निकट)
नई दिल्ली - 110002
जलपानः शाम 5.30 बजे
विमोचनः शाम 6.15 बजे


आप सब मित्रों सहित कार्यक्रम में निमंत्रित हैं।