नामवर जी ने उद्भ्रांत के पूरे रचनात्मक जीवन पर प्रकाश ड़ालते हुए कहा कि उनकी ‘सूअर’ शीर्षक कविता नागार्जुन की मादा सूअर पर लिखी कविता के बाद उसी विषय पर ऐसी कविता लिखने के उनके साहस को प्रदर्शित करती है जिसके लिये वे बधाई पात्र हैं। उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा की दाद देनी होगी। हिन्दी भाषा में पांच सौ पृष्ठों के पहले वृहद्काय कविता संग्रह ‘अस्ति’ का लोकार्पण करते हुए उन्होंने कहा कि कवि अपने शब्दों के द्वारा इसी दुनिया में एक समानान्तर दुनिया रचता है, जो विधाता द्वारा रची दुनिया से अलग होकर भी संवेदना से भरपूर होती है। मिथकों को माध्यम बनाकर उन्होंने जो रचनाएं की हैं, वे भी उनकी समकालीन दृष्टि के साथ उनकी बहुमुखी उर्वर प्रतिभा को प्रदर्शित करती हैं।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ आलोचक डॉ. शिवकुमार मिश्र ने ‘अभिनव पांडव’ (महाकाव्य) का लोर्कापण करते हुए कहा कि इसमें कवि ने महाभारत का एक तरह से पुनर्पाठ आधुनिक संदर्भ में बेहद गंभीरता के साथ किया है। युधिष्ठिर को केन्द्र में रखकर जिस तरह से उनको और उनके माध्यम से महाभारत के दूसरे महत्त्वपूर्ण चरित्रों को वे प्रश्नों के घेरे में लाये हैं, वह अद्भुत है और इससे युधिष्ठिर औरअन्य मिथकीय चरित्रों के दूसरे पहलुओं के बारे में जानने का भी हमें मौक़ा मिलता है। महाकवि प्रसाद की ‘कामायनी’ से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वह महाकाव्य नहीं है, लेकिन महत् काव्य ज़रूर है। ‘अभिनव पांडव’ को कवि ने महाकाव्य कहा है और अपनी भूमिका ‘बीजाक्षर’ में इस सम्बंध में बहस की है और अपने तर्क दिये हैं, लेकिन मैं इसे विचार काव्य कहूँगा जो महत् काव्य भी है और मेरा विश्वास है कि आने वाले समय में हिन्दी के बौद्धिक समाज में यह व्यापक विचारोत्तेजना पैदा करेगा। उन्होंने कहा कि ‘राधामाधव’ काव्य बहुत ही मनोयोग से लिखा गया काव्य है, जिस पर बिना गहराई के साथ अध्ययन किए जल्दबाजी में टिप्पणी नहीं की जा सकती। इनकी रचनाएं समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। अपनी पचास वर्ष से अधिक समय की रचना-यात्रा में उनके द्वारा पचास-साठ से अधिक पुस्तकें लिखना सुखद आश्चर्य का विषय है।
वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानंद तिवारी ने ‘राधामाधव’ का लोकार्पण करते और कवि की अनेक रचनाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है और लिखने की शैली भी अलग है। मिथकों को लेकर उन्होंने कई रचनाएं की हैं जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें संदेह नहीं कि वे हिन्दी के सुप्रतिष्ठित कवि हैं। उनका रचनात्मक आवेग बहुत तीव्र है और उनके पास अक्षय भंडार है। पूतना के माध्यम से आदिवासी स्त्राी जीवन का चरित्रा-चित्राण अनोखा है। कवि ने अपने सम्पूर्ण काव्य-सृजन को समकालीन बनाने की हर संभव कोशिश की है जिसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सत्यप्रकाश मिश्र, राममूर्ति त्रिपाठी और रमाकांत रथ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों ने उनकी इस विशिष्टता को रेखांकित भी किया है। कवि लीलाधर मंडलोई ने कहा कि बिना राधा के आख्यान को रचे राधाभाव को रचना ‘राधामाधव’ का महत्त्वपूर्ण तत्व है। इसमें स्त्राी विमर्श भी है जिससे कवि की अलग पहचान बनती है। इनके समूचे साहित्य में मूल पंूजी आख्यान है और आख्यान को साधना बहुत बड़ी बात है।
आलोचक डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि विवेच्य संग्रह ‘अस्ति’ में इतनी तरह की और इतने विषयों की कविताएं हैं जो पूरी दुनिया को समेटती हैं। उद्भ्रांत जी की कविताओं में पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों और संसार के समस्त प्राणियों की संवेदना को महसूस किया जा सकता है। संग्रह की अनेक कविताएं अद्भुत हैं। साहित्यकार धीरंजन मालवे ने कविता संग्रह ‘अस्ति’ पर केन्द्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि कवि ने कविता की हर विधा को सम्पूर्ण बनाने में अपनी भूमिका निभाई है और उनकी कृतियों से यह साफतौर पर ज़ाहिर होता है कि उद्भ्रांत नारी-सशक्तीकरण के प्रबल पक्षधर हैं। इसके साथ ही उन्होंने दलित चेतना के साथ अनेक विषयों पर बेहतरीन कविताएं लिखीं हैं।
संगोष्ठी का बीज-वक्तव्य देते हुए जनवादी लेखक संघ की दिल्ली इकाई के सचिव प्रखर आलोचक डॉ. बली सिंह ने कहा कि आज के दौर में इतने तरह के काव्यरूपों में काव्य रचना बेहद मुश्किल है, लेकिन उद्भ्रांत जी इसे संभव कर रहे हैं। उनकी कविताएं विचारों से परिपूर्ण हैं। यहाँ सांस्कृतिक मसले बहुत आये हैं और पहले की अपेक्षा उनकी कविताओं में स्मृतियों की भूमिका बढ़ी है। ‘राधामाधव’ स्मृतियों का विलक्षण काव्य है। ‘अभिनव पांडव’ में स्त्रिायों के प्रति बराबरी के दर्जे के लिये कई सवाल उठाये गये हैं जो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने इस उत्तर आधुनिक समय में आई उद्भ्रांत की मिथकाधारित और विचारपूर्ण समकालीन कविताओं को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया।
प्रारम्भ में, कवि उद्भ्रांत ने तीनों लोकार्पित कृतियों की चुनिंदा कविताओं और काव्यांशों का प्रभावशाली पाठ करने के पूर्व ‘अस्ति (कविता-संग्रह)’ जिसे उन्होंने ‘कविता और जीवन के प्रति आस्थावान’ अपने सुधी और परम विश्वसनीय पाठक-मित्र के निमित्त ‘समर्पित किया है- की प्रथम प्रति बड़ी संख्या में उपस्थित सुधी श्रोताओं में से एक वरिष्ठ कवि श्री शिवमंगल सिद्धांतकर को तथा ‘राधा-माधव’- जिसे उन्होंने पत्नि और तीनों बेटियों के नाम समर्पित किया है- की प्रथम प्रति श्रीमती उषा उद्भ्रांत को भेंट की। कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए दूरदर्शन महानिदेशालय के सहायक केन्द्र निदेशक श्री पी.एन. सिंह द्वारा कवि के सम्बंध में दी गई इन दो महत्त्वपूर्ण सूचनाओं ने सभागार में मंच पर उपस्थित विद्वानों और सुधी श्रोताओं को हर्षित कर दिया कि वर्ष 2008 में ‘पूर्वग्रह’ (त्रौमासिक) में प्रकाशित उनकी जिस महत्त्वूपर्ण लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ के पुस्तकाकार संस्करण को लोकार्पित करते हुए नामवर जी ने उसे उस समय तक की उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति घोषित किया था-को वर्ष 2008 के ‘अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा हुई है। इसके अलावा उडीसा से पद्मश्री श्रीनिवास उद्गाता जी-जिन्होंने रमाकांत रथ के ‘सरस्वती सम्मान’ से अलंकृत काव्य ‘श्रीराधा’ का उड़िया से हिन्दी में तथा धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ का हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद किया था-ने कवि को सूचित किया है कि वे आज लोकार्पित ‘राधामाधव’ का भी हिन्दी से उड़िया में काव्यानुवाद कर रहे हैं जो बहुत जल्द उड़िया पाठक-समुदाय के समक्ष आयेगा। धन्यवाद-ज्ञापन हिन्दी भवन के प्रबंधक श्री सपन भट्टाचार्य ने किया।
प्रस्तुतकर्ता
तेजभान
ए-131, जहांगीरपुरी,
नई दिल्ली-110033
मोबाईल: 9968423949







दिल्ली: जे.सी. जोशी स्मृति सम्मान के तहत दिया जाने वाला शब्द-साधक शिखर सम्मान हिन्दी साहित्य के शीर्ष आलोचक श्री नामवर सिंह को देने का निर्णय हुआ है। श्री सिंह को यह सम्मान उनके गृह क्षेत्र वाराणसी में आगामी 18 सितंबर को ‘पाखी’ के वार्षिक महोत्सव में दिया जाएगा। इस मौके पर ‘पाखी’ के श्री नामवर सिंह पर केन्द्रित अंक का लोकार्पण भी होना है। यह सूचना ‘पाखी’ के संपादक श्री अपूर्व जोशी ने दी।
सीहोर के युवा कहानीकार को पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिये इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है । भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें डॉ. गंगा प्रसाद विमल, शीर्ष कथाकार नया ज्ञानोदय के संपादक तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । देश भर ये प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था । भारतीय ज्ञानपीठ ने इस नवलेखन के देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिये इकसठ हजार रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान किये जाने का निर्णय लिया था । तथा चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित करके का भी फैसला लिया गया था । गत दिवस चयन समिति की बैठक में वर्ष 2010 के ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिये सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर तथा दिल्ली के कथाकार कुणाल सिंह को संयुक्त रूप से ये पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया गया । चयन समिति के अध्यक्ष डॉ. नामवर सिंह ने स्वयं फोन कर समिति के निर्णय की जानकारी पंकज सुबीर को दी । भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा शीघ्र ही नई दिल्ली में एक भव्य आयोजन में ये पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । दोनों संयुक्त विजेताओं को पुरस्कार की राशि का आधा आधा प्रदान किया जायेगा । उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी पंकज सुबीर का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रकाशित होकर आया था, जो साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित रहा था । मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर की पचास से भी अधिक कहानियां देश भर की साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । पेशे से स्वतंत्र पत्रकार पंकज सुबीर अपनी विशिष्ट शैली तथा शिल्प के लिये जाने जाते हैं । युवा पीढी क़े नये कथाकारों में अपनी व्यंग्य निहित भाषा से वे अपनी अलग ही पहचान बन चुके हैं । उनको जिस उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिये ये पुरस्कार दिया जा रहा है उसमें उन्होंने 1857 से लेकर 2008 तक की कथा को व्यंग्य निहित भाषा में समेटा है । निर्णायकों के अनुसार इस उपन्यास में व्यंग्य का जो भाव है वह राग दरबारी की याद दिला देता है । इस उपन्यास में दो समानांतर कथाओं को समेटने की कोशिश की गई है।

महात्मा गाँधी मानव सभ्यता के लिए युग पुरुष थे. 'हिंदी अकादमी' द्वारा नव-प्रकाशित गाँधी की दो विश्वप्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' और 'सत्य के प्रयोग' पर एक यादगार कार्यक्रम दि. 18 अगस्त 2009 को दिल्ली के 'त्रिवेणी सभागार (मंडी हाउस)' में आयोजित हुआ जिसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा दोनों पुस्तकों के विमोचन के बाद अलग अलग सत्रों में इन पुस्तकों पर चर्चा हुई. गाँधी सन् 1892 में किसी मुवक्किल का मुकद्दमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए तो फिर पूरे दो दशक तक वहां के भारतवासियों की समस्याओं पर संघर्ष किया जिस ने उन्हें महात्मा बना दिया. महात्मा गाँधी की शख्सियत को यदि हम केवल स्वाधीनता संघर्ष तक सीमित रखेंगे, तो उनके व्यक्तित्व के कई अनमोल आयामों को जानने से हम वंचित रह जाएंगे. गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में ही 'हड़ताल' व 'सत्याग्रह' का आविष्कार किया. वहीं जीवन की पहली गिरफ्तारी भी हुई और सन् 1909 में जब सत्याग्रह के दौरान ही वे ब्रिटिश सरकार से बातचीत करने लन्दन गए तो लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में एक बेहद विवादस्पद पुस्तक भी लिखी, जिस का नाम था 'हिंद स्वराज'. इस पुस्तक ने विश्व के सभी विचारकों की चेतनाओं को झकझोर कर रख दिया. गाँधी इस पुस्तक में ब्रिटिश तथा पूरी पश्चिमी सभ्यता को नकार कर उसे चुनौती देते हैं कि ब्रिटिश की सभ्यता केवल मशीन पर टिकी हुई है, जो केवल शोषण की प्रतीक है. गाँधी ब्रिटिश के हर वैज्ञानिक चिह्न यथा रेलगाड़ी व उद्योग पर प्रश्न चिह्न लगा कर इस पवित्र देश की ऋषियों मुनियों की परंपरा को स्थापित करते हैं. गाँधी तो यहाँ तक कहते हैं कि यह रेलगाड़ी क्या है? इस से दुष्टता फैलती है. एक जगह के बुरे लोग दूसरी जगह जाते हैं. पूरी पुस्तक एक 'पाठक' और 'संपादक' के बीच हो रहे वार्तालाप के रूप में गुजराती में लिखी गई थी जिस का उनके सचिव महादेवन देसाई, जिसे वे अपना पांचवां पुत्र मानते थे, ने अनुवाद किया था. देश और विश्व के प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न पर अपनी जिज्ञासा 'पाठक' के रूप में प्रस्तुत करने वाले गाँधी के ही एक बर्मा स्थित मित्र प्राणजीवन मेहता हैं. जब 'पाठक' के रूप में प्राणजीवन मेहता पूछते हैं कि रेलगाड़ी से तो एक स्टेशन के साधू भी दूसरे स्टेशन जा सकते हैं, तब गाँधी कहते हैं कि अच्छा आदमी जानता है, कि अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है. बुरी बात तेज़ी से फ़ैल सकती है. जब 'हिंद स्वराज' छपी तो अधिकांश लोग बौखला भी गए. यहाँ तक कि गाँधी के राजनैतिक गुरु, गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधी से कहा कि यही पुस्तक आप कुछ वर्ष बाद पढ़ियेगा. तब आप को लगेगा कि यह पुस्तक किसी मूर्ख व्यक्ति ने लिखी है. इस पुस्तक को यदि हम सतही दृष्टि से देखेंगे तो सहज ही लगेगा कि पुस्तक सचमुच बहुत अव्यवहारिक है, क्यों कि गाँधी तो इस में डॉक्टर और वकील के पेशों तक को नकारते हैं. पर गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' को यदि हम मूर्त रूप से ही देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. पर पुस्तक अपनी आत्मा के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता के बेहद कड़वे सत्यों से साक्षात्कार करवाती है. आज हवाई जहाज़ है तो विश्व भर के आतंकवादी एक देश से दूसरे देश बेखौफ आते जाते हैं, जब कि अध्यात्मिक शक्तियों का तो अकाल ही है, वे एक देश से दूसरे देश जाएं तो क्योंकर!..
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आगमन पर उन का हार्दिक स्वागत हुआ व हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने स्वागत भाषण किया. मंच पर शीला दीक्षित के साथ प्रसिद्ध पत्रकार प्रभास जोशी भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व प्रभास जोशी की उपस्थिति में अकादमी सचिव रविन्द्र श्रीवास्तव ने 'हिंद स्वराज' के सभ्यता सम्बन्धी कई अंश पढ़ कर सुनाए. अशोक चक्रधर के भाषण के पश्चात 'हिंद स्वराज' व गाँधी द्वारा 1925 में रचित 'मेरे सत्य प्रयोग' पुस्तकों का विमोचन हुआ. गाँधी सत्य व अहिंसा के ईशदूत थे. 'सत्य के प्रयोग' उन की आत्मकथा है जिस में बचपन में स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान 'kettle' शब्द के स्पेलिंग न आने पर अध्यापक द्वारा इशारे से दिए गए दूसरे विद्यार्थी की नक़ल करने के आदेश की अवमानना व किशोरावस्था में सिगरेट पीने या वेश्यागमन से ले कर उस समय तक की सभी झलकियाँ हैं, जब गाँधी असहयोग आंदोलन पार कर के अपनी आयु के 55 वर्ष भी पार कर चुके थे.
विमोचन सत्र के बाद 'हिंदी अकादमी' की तरफ से स्वादिष्ट भोजन का आयोजन जिस के बाद दूसरे सत्र में 'हिंद स्वराज' पर चर्चा हुई. इस सत्र की अध्यक्षता जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. मुशीरुल हसन ने की तथा इस में वर्षा दास, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, प्रो. अशुम गुप्ता व श्री राजीव वोहरा ने भाग लिया. प्रो. मुशीरुल हसन ने 'हिंद स्वराज' की आज के इस दौर में प्रासंगिकता पर अप्रत्यक्ष में सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक की पढ़ने की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त नहीं होती. जैसे मार्क्सवाद या साम्यवाद आज पूरी दुनिया से यदि समाप्त हो गया है तो भी 'Manifesto of Communism' या कार्ल मार्क्स खुद भी क्या अप्रासंगिक हो गए? इसलिए आज 'हिंद स्वराज' को एक manifesto की तरह पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश की गुलामी में ही गाँधी हुए, टैगोर हुए और ब्रिटिश की गुलामी के बावजूद देश में (जनता के लिए महापुरुषों के) 'उपदेश' की कमी नहीं थी. वर्षा दास ने कहा कि 'स्वराज' शब्द का उपयोग सब से पहले दादा भाई नौरोजी ने किया था. इसके बाद जब तिलक ने 'स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा दिया तो 'स्वराज' शब्द को व्यापक अर्थ मिला. गाँधी ने 'स्वराज' शब्द को एक गुणात्मक रूप दिया. वर्षा दास ने कहा कि 'हिंद स्वराज' हमारे लिए एक मूल्यवान धरोहर है. 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' प्रतिवर्ष गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को गाँधी सम्बंधित चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित करता रहा है. गुजरती में क्यों कि उन्होंने 'हिंद स्वराज' बार बार पढ़ी है, अतः उनके मन में यह कल्पना है कि इस पुस्तक में गाँधी द्वारा कही हुई बातों पर वे चित्र बनवाएं और गाँधी जन्मदिवस पर उन्हें प्रर्दशित करें. 'हिंद स्वराज' से गाँधी के ही किसी संवाद का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी यह मानते थे कि 'स्वराज' का अर्थ 'स्व' का राज नहीं है, वरन् 'स्व' पर राज है. (स्पष्ट है कि इस प्रकार के गूढ़तम अर्थों के कारण ही कई विद्वान गाँधी की शिक्षाओं की तुलना 'श्रीमद भगवद गीता' व वेदों की शिक्षाओं से करते हैं).
अजित कुमार ने 'सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा' की समानता वेदों पुराणों से की. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान का 'जन मन को प्रतिध्वनित करने वाला' एक बेहद प्यारा लोकगीत भी सुनाया:
मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने इस बार अपना प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार पुरस्कार' युवा ग़ज़लकार आलोक श्रीवास्तव को देने की घोषणा की है। आलोक को यह पुरस्कार उनके बहुचर्चित ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के लिए दिया जाएगा। साल 2007 में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह के लिए आलोक श्रीवास्तव को मिलने वाला यह तीसरा प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार है। इससे पहले उन्हें राजस्थान के 'डॉ. भगवतीशरण चतुर्वेदी पुरस्कार' और प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह के हाथों मुंबई में प्रतिष्ठित 

