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Sunday, July 3, 2011

बाजारवाद और साहित्य पर संगोष्ठी संपन्न हुई

श्रीडूंगरगढ़. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के स्वर्ण जयंती वर्ष के अंतर्गत आयोजन श्रृंखला में 'बाजारवाद और समकालीन साहित्य' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता युवा आलोचक और बनास के सम्पादक पल्लव ने विषय पर दो व्याख्यान दिए. दिल्ली के हिन्दू कालेज में अध्यापन कर रहे पल्लव ने अपने पहले व्याख्यान में बाज़ार,बाजारवाद ,भूमंडलीकरण और पूंजीवाद की विस्तार से चर्चा करते हुए इनके अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि साहित्य अपने स्वभाव से ही व्यवस्था का विरोधी होता है और आधुनिक हिन्दी साहित्य का विकास उपनिवेशवाद और पूंजीवाद से लड़ते हुए हुआ है. प्रेमचंद के प्रसिद्द लेख 'महाजनी सभ्यता' का उल्लेख करते हुए उन्होंने समकालीन कथा साहित्य में बाजारवाद से प्रतिरोध के उदाहरण दिए. रघुनन्दन त्रिवेदी की कहानी'गुड्डू बाबू की सेल', महेश कटारे की 'इकाई,दहाई...',अरुण कुमार असफल की'पांच का सिक्का',उमाशंकर चौधरी की 'अयोध्या बाबू सनक गए हैं' तथा गीत चतुर्वेदी की 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' की विशेष चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य जरूरत और लालसा के अंतर की बारीकियां समझाकर पाठक को विवेकवान बनाता है. पल्लव ने कहा कि एकल ध्रुवीय विश्व व्यस्था और संचार क्रान्ति ने बाजारवाद को बहुत बढ़ावा दिया है,जिससे मनुष्यता के लिए नए संकट उपस्थित हो गए हैं.

अपने दूसरे व्याख्यान में पल्लव ने उपन्यासों के सन्दर्भ में बाजारवाद की चर्चा में कहा कि उपन्यास एक बड़ी रचनाशीलता है जो प्रतिसंसार की रचना करने में समर्थ है. हिदी के लिए यह विधा अपेक्षाकृत नयी होने पर भी बाजारवाद के प्रसंग में इसने कुछ बेहद शक्तिशाली रचनाएं दी हैं. उन्होंने काशीनाथ सिंह के चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' को इस सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया. उन्होंने कहा कि यह उपन्यास भारतीय संस्कृति पर बाजारवाद के हमले और इससे प्रतिरोध कर रहे सामान्य लोगों के जीवन का सुन्दर चित्रण करता है. उपन्यास के एक रोचक प्रसंग का पाठ कर उन्होंने बताया कि साम्प्रदायिकता किस तरह बाजारवादी व्यवस्था की सहयोगी हो जाती है और जातिवाद, राजनीति उसकी अनुचर,यह उपन्यास सब बताता है. वस्तु मोह के कारण संबंधों में हो रहे विचलन को दर्शाने के लिए कथाकार स्वयंप्रकाश के उपन्यास 'ईंधन' को यादगार बताते हुए कहा कि इस कृति में लेखक ने भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ साथ अपने पात्रों का जीवन चित्रित किया है,जो ना केवल इसे विश्वसनीयता देता है अपितु उदारीकरण के कारण आ रहे नकारात्मक मूल्यों की पड़ताल भी करता है. ममता कालिया के 'दौड़' और प्रदीप सौरभ के 'मुन्नी मोबाइल' को भी पल्लव ने इस प्रसंग में उल्लेखनीय बताया.
इससे पहले कवि-आलोचक चेतन स्वामी ने विषय प्रवर्तन किया तथा मुख्य अथिति चुरू से आये साहित्यकार डॉ. भंवर सिंह सामोर ने लोक के सन्दर्भ में उक्त विषय की चर्चा की.
अध्यक्षता कर रहे सुविख्यात कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि बाजारवाद ने जीवन में भय की ऐसी नयी उद्भावना की है जिसके कारण कोई भी निश्चिन्त नहीं है. तिवाड़ी ने कहा कि समकालीन रचनाशीलता ने प्रतिगामी विचारों से सदैव संघर्ष किया है जिसका उदाहरण कहानियों व कविताओं में बहुधा मिलता है. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने समिति के स्वर्ण जयंती वर्ष के आयोजनों की जानकारी दी. संयोजन कर रहे कवि सत्यदीप ने आभार व्यक्त किया. आयोजन में नगर के साहित्य प्रेमियों व युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की.

Thursday, December 24, 2009

मीडिया की भाषा आँख खोलने वाली होनी चाहिएः व्यास

मीडिया और भाषा पर परिसंवाद

उदयपुर ।

मीडिया की भाषा आँख खोलने वाली होनी चाहिए जिसे हमारे मनीषियों ने पश्यन्ती कहा है। ऐसी भाषा जो जन सामान्य की अभिरुचि को सुसंस्कृत करे और उन्हें सजग बनाए। सुपरिचित कवि-आलोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने ’मीडिया और भाषा’ विषयक परिसंवाद में उक्त विचार व्यक्त किए। जनार्दराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन केन्द्र द्वारा आयोजित इस परिसंवाद में डॉ. व्यास ने कहा कि मीडिया की शब्द रचना के केन्द्र में संवेदना होनी चाहिए क्यों कि संवेदना का मूल मानवीय करूणा है। उन्होंने मीडिया और साहित्य की बढ़ती दूरी को चिन्ताजनक बताते हुए कहा कि भूलना नहीं चाहिए कि प्रेमचन्द, माखनलाल चतुर्वेदी और रघुवीर सहाय ने मीडिया की भाषा को साहित्य के संस्कार दिये हैं। अजमेर विजय सिंह पथिक श्रमजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य और कवि डॉ. अनन्त भटनागर ने कहा कि मीडिया में भाषा के स्तर पर हुए स्खलन ने हमारी सामाजिक चेतना को प्रभावित किया है। उन्होंने कुछ चर्चित विज्ञापनों की भाषा का उल्लेख कर स्पष्ट किया कि बाजार की शक्तियां भाषा को संवेदनहीन बना ग्लेमर से जोड़ती है। डॉ. भटनागर ने कहा कि सचेत पाठक वर्ग हस्तक्षेप कर भाषा के दुरूपयोग को रोक सकता है। प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों के अवदान को रेखांकित कर उन्होंने बताया कि हिन्दी में लोक का मुहावरा अपनाकर मीडिया की भाषा को व्यापक जन सरोकारों से जोड़ा जा सकता है। परिसंवाद में राजस्थान विद्यापीठ के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया ने नयी प्रौद्योगिकी के कारण मीडिया में आए बदलावों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी निरपेक्ष नहीं होती, वह अपने साथ अपनी संस्कृति को लाती है जो मीडिया की भाषा और मुहावरे को भी बदलने का काम करती है। प्रो. चण्डालिया ने भाषा और संवाद के सम्बन्धों की ऐतिहासिक सन्दर्भ में व्याख्या कर बताया कि संवाद का चरित्र भाषा को निर्धारित करता है। इससे पहले मीडिया अध्ययन केन्द्र के समन्वयक डॉ. पल्लव ने परिसंवाद की प्रस्तावना रखते हुए कहा कि मीडिया के चरित्र को समझने के लिए भाषा की संरचना और प्रयोग का विश्लेषण बेहद आवश्यक है। केन्द्र के अध्यापक आशीष चाष्टा ने केन्द्र की गतिविधियों की जानकारी दी एवं अतिथियों का स्वागत किया। परिसंवाद में केन्द्र के विद्यार्थियों मनोज कुमार, निखिल चिश्रोड़ा ने विषय-विशेषज्ञों से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया। आयोजन में डॉ. मलय पानेरी, डॉ. मुकेश शर्मा, डॉ. योगेश मीणा, एकलव्य नन्दवाना सहित विद्यार्थी, शोध छात्र और अध्यापक उपस्थित थे। अन्त में केन्द्र की छात्रा मंजु जैन ने आभार प्रदर्शित किया।

प्रस्तुति- डॉ॰ पल्लव

Sunday, December 13, 2009

अखबार से सहकार का भाव: शैलेय



उदयपुर। 10 नवम्बर सूचनाएं संवेदनाओं को पोषित करती हैं और रक्त शिराओं की भांति सामाजिक हृदय के स्पंदन को गतिशील रखती है। यदि आज का मीडिया विज्ञापन के दबाव में अपनी देह को विखंडित कर रहा है तो यह पत्रकारिता के समक्ष बड़ा जोखिम है। सुपरिचित कवि-कथाकार शैलेय ने उदयपुर के माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के नवगठित मीडिया अध्ययन केन्द्र में ’पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार’ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि अखबार आदमी का सबसे बड़ा दोस्त है जो सहकार का भाव पैदा करता है। यह हमें सजग-सतर्क बनाते हुए देश-काल-परिस्थिति का सही मूल्यांकन करने की शक्ति भी देता है। उन्होंने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी को वह संस्कार किये जाने की जरूरत है जिससे वह सामाजिक सरोकारों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सके। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (मान्य विश्वविद्यालय) द्वारा आयोजित पंचायत राज स्वर्ण जयन्ती समारोह के अन्तर्गत आयोजित इस व्याख्यान के मुख्य अतिथि वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, उदयपुर केन्द्र निदेशक प्रो. अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि बाजार वाद और भूमण्डलीकरण के बीच से ही भूखमरी, रोजगार और सूचनाओं की बहसों ने जन्म लिया है। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि यह ऐसा समय है जब श्वेत-श्याम में चीजों का विभाजन पूर्णतः बेमानी हो गया है और परिदृश्य धुंधला गया है। उन्होने हालिया घटनाओं का उल्लेख कर बताया कि जब हमारी सहिष्णुताएं खतरे में हैं तब मीडिया को वह विवेकपूर्ण संस्कार देना होगा जो मनुष्यता के लिए आवश्यक है। प्रो. चतुर्वेदी ने मीडिया पाठ्यक्रमों को तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ समकालीन देश व समाज के अध्ययन से भी जोड़ने की आवश्यकता प्रतिपादित की। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार और ’प्रत्यूष’ के सम्पादक विष्णु शर्मा ’हितैषी’ ने पत्रकारों की युवा पीढ़ी का आह्वान किय की वह अपनी सामाजिक प्रतिबद्वता को चिन्हित करे ताकि पत्रकारिता के सरोकारों की सचमुच व्यापक प्रतिष्ठा सम्भव हो। हितैषी ने कहा कि विकृतियों के लिये केवल मीडिया को दोष देना अनुचित होगा क्योंकि बदलाव के लिये सबकी जिम्मेदारी साझी है। उन्होने उदाहरण देकर बताया कि बाजार के दबावों के बीच भी अपने सामाजिक सरोकारों को मीडिया ने चुनौती की तरह निभाया है। मानविकी संकाय अध्यक्ष प्रो. श्रीनिवासन अय्यर ने कहा कि क्षरण के विरूद्व अक्षर धर्म को अपनी भूमिका फिर से रेखांकित करनी होगी जिसे पत्रकारिता, शिक्षा और साहित्य की त्रिवेणी बनाती है। इससे पहले महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एन. के. पण्ड्या ने अतिथियों का स्वागत किया और मीडिया अध्ययन केन्द्र के समन्वयक डॉ. पल्लव ने विश्वविद्यालय के चांसलर प्रो. भवानी शंकर गर्ग के संदेश का वाचन किया।

अध्यक्षीय उद्‍बोधन में जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (मान्य विश्वविद्यालय) की कुलपति प्रो. दिव्य प्रभा नागर ने कहा कि सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता ने ही राजस्थान विद्यापीठ जैसी संस्थाओं को जन्म दिया है। उन्होने विश्वविद्यालय द्वारा मीडिया अध्ययन केन्द्र के प्रारम्भ को गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यहा होने वाला अध्ययन अध्यापन पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों को प्रगाढ़ करेगा। प्रो. नागर ने मीडिया के समक्ष अभावग्रस्त दुनिया की जरूरतों को उजागर करने की चुनौती बतायी। समारोह में प्रो. नागर ने केन्द्र द्वारा प्रकाशित परिचय पुस्तिका का विमोचन भी किया। संचालन केन्द्र की छात्रा मुक्ता व्यास ने किया। लोक शिक्षण प्रतिष्ठान के निदेशक सुशील कुमार ने आभार व्यक्त किया। समारोह में आकाशवाणी के निदेशक डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली, बुनियादी शिक्षा के सम्पादक के. आर. शर्मा, डॉ. लक्ष्मी नारायण नन्दवाना, प्रो. सुरेन्द्र भाणावत, प्रो. पी. आर. व्यास सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, पत्रकार और विद्यार्थी उपस्थित थे।


प्रेषक- डॉ. पल्लव