
अपने दूसरे व्याख्यान में पल्लव ने उपन्यासों के सन्दर्भ में बाजारवाद की चर्चा में कहा कि उपन्यास एक बड़ी रचनाशीलता है जो प्रतिसंसार की रचना करने में समर्थ है. हिदी के लिए यह विधा अपेक्षाकृत नयी होने पर भी बाजारवाद के प्रसंग में इसने कुछ बेहद शक्तिशाली रचनाएं दी हैं. उन्होंने काशीनाथ सिंह के चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' को इस सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया. उन्होंने कहा कि यह उपन्यास भारतीय संस्कृति पर बाजारवाद के हमले और इससे प्रतिरोध कर रहे सामान्य लोगों के जीवन का सुन्दर चित्रण करता है. उपन्यास के एक रोचक प्रसंग का पाठ कर उन्होंने बताया कि साम्प्रदायिकता किस तरह बाजारवादी व्यवस्था की सहयोगी हो जाती है और जातिवाद, राजनीति उसकी अनुचर,यह उपन्यास सब बताता है. वस्तु मोह के कारण संबंधों में हो रहे विचलन को दर्शाने के लिए कथाकार स्वयंप्रकाश के उपन्यास 'ईंधन' को यादगार बताते हुए कहा कि इस कृति में लेखक ने भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ साथ अपने पात्रों का जीवन चित्रित किया है,जो ना केवल इसे विश्वसनीयता देता है अपितु उदारीकरण के कारण आ रहे नकारात्मक मूल्यों की पड़ताल भी करता है. ममता कालिया के 'दौड़' और प्रदीप सौरभ के 'मुन्नी मोबाइल' को भी पल्लव ने इस प्रसंग में उल्लेखनीय बताया.
इससे पहले कवि-आलोचक चेतन स्वामी ने विषय प्रवर्तन किया तथा मुख्य अथिति चुरू से आये साहित्यकार डॉ. भंवर सिंह सामोर ने लोक के सन्दर्भ में उक्त विषय की चर्चा की.
अध्यक्षता कर रहे सुविख्यात कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि बाजारवाद ने जीवन में भय की ऐसी नयी उद्भावना की है जिसके कारण कोई भी निश्चिन्त नहीं है. तिवाड़ी ने कहा कि समकालीन रचनाशीलता ने प्रतिगामी विचारों से सदैव संघर्ष किया है जिसका उदाहरण कहानियों व कविताओं में बहुधा मिलता है. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने समिति के स्वर्ण जयंती वर्ष के आयोजनों की जानकारी दी. संयोजन कर रहे कवि सत्यदीप ने आभार व्यक्त किया. आयोजन में नगर के साहित्य प्रेमियों व युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की.






