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Sunday, July 3, 2011

बाजारवाद और साहित्य पर संगोष्ठी संपन्न हुई

श्रीडूंगरगढ़. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के स्वर्ण जयंती वर्ष के अंतर्गत आयोजन श्रृंखला में 'बाजारवाद और समकालीन साहित्य' विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता युवा आलोचक और बनास के सम्पादक पल्लव ने विषय पर दो व्याख्यान दिए. दिल्ली के हिन्दू कालेज में अध्यापन कर रहे पल्लव ने अपने पहले व्याख्यान में बाज़ार,बाजारवाद ,भूमंडलीकरण और पूंजीवाद की विस्तार से चर्चा करते हुए इनके अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि साहित्य अपने स्वभाव से ही व्यवस्था का विरोधी होता है और आधुनिक हिन्दी साहित्य का विकास उपनिवेशवाद और पूंजीवाद से लड़ते हुए हुआ है. प्रेमचंद के प्रसिद्द लेख 'महाजनी सभ्यता' का उल्लेख करते हुए उन्होंने समकालीन कथा साहित्य में बाजारवाद से प्रतिरोध के उदाहरण दिए. रघुनन्दन त्रिवेदी की कहानी'गुड्डू बाबू की सेल', महेश कटारे की 'इकाई,दहाई...',अरुण कुमार असफल की'पांच का सिक्का',उमाशंकर चौधरी की 'अयोध्या बाबू सनक गए हैं' तथा गीत चतुर्वेदी की 'सावंत आंटी की लड़कियाँ' की विशेष चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्य जरूरत और लालसा के अंतर की बारीकियां समझाकर पाठक को विवेकवान बनाता है. पल्लव ने कहा कि एकल ध्रुवीय विश्व व्यस्था और संचार क्रान्ति ने बाजारवाद को बहुत बढ़ावा दिया है,जिससे मनुष्यता के लिए नए संकट उपस्थित हो गए हैं.

अपने दूसरे व्याख्यान में पल्लव ने उपन्यासों के सन्दर्भ में बाजारवाद की चर्चा में कहा कि उपन्यास एक बड़ी रचनाशीलता है जो प्रतिसंसार की रचना करने में समर्थ है. हिदी के लिए यह विधा अपेक्षाकृत नयी होने पर भी बाजारवाद के प्रसंग में इसने कुछ बेहद शक्तिशाली रचनाएं दी हैं. उन्होंने काशीनाथ सिंह के चर्चित उपन्यास 'काशी का अस्सी' को इस सम्बन्ध में सबसे महत्त्वपूर्ण कृति बताया. उन्होंने कहा कि यह उपन्यास भारतीय संस्कृति पर बाजारवाद के हमले और इससे प्रतिरोध कर रहे सामान्य लोगों के जीवन का सुन्दर चित्रण करता है. उपन्यास के एक रोचक प्रसंग का पाठ कर उन्होंने बताया कि साम्प्रदायिकता किस तरह बाजारवादी व्यवस्था की सहयोगी हो जाती है और जातिवाद, राजनीति उसकी अनुचर,यह उपन्यास सब बताता है. वस्तु मोह के कारण संबंधों में हो रहे विचलन को दर्शाने के लिए कथाकार स्वयंप्रकाश के उपन्यास 'ईंधन' को यादगार बताते हुए कहा कि इस कृति में लेखक ने भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ साथ अपने पात्रों का जीवन चित्रित किया है,जो ना केवल इसे विश्वसनीयता देता है अपितु उदारीकरण के कारण आ रहे नकारात्मक मूल्यों की पड़ताल भी करता है. ममता कालिया के 'दौड़' और प्रदीप सौरभ के 'मुन्नी मोबाइल' को भी पल्लव ने इस प्रसंग में उल्लेखनीय बताया.
इससे पहले कवि-आलोचक चेतन स्वामी ने विषय प्रवर्तन किया तथा मुख्य अथिति चुरू से आये साहित्यकार डॉ. भंवर सिंह सामोर ने लोक के सन्दर्भ में उक्त विषय की चर्चा की.
अध्यक्षता कर रहे सुविख्यात कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि बाजारवाद ने जीवन में भय की ऐसी नयी उद्भावना की है जिसके कारण कोई भी निश्चिन्त नहीं है. तिवाड़ी ने कहा कि समकालीन रचनाशीलता ने प्रतिगामी विचारों से सदैव संघर्ष किया है जिसका उदाहरण कहानियों व कविताओं में बहुधा मिलता है. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने समिति के स्वर्ण जयंती वर्ष के आयोजनों की जानकारी दी. संयोजन कर रहे कवि सत्यदीप ने आभार व्यक्त किया. आयोजन में नगर के साहित्य प्रेमियों व युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की.

Sunday, August 8, 2010

आम आदमी तक पहुंची प्रेमचंद की कथा परंपरा

प्रेमचंद जयंती समारोह-2010



जयपुर
राजस्‍थान प्रगतिशील लेखक संघ और जवाहर कला केंद्र की पहल पर इस बार जयपुर में प्रेमचंद की कहानी परंपरा को ‘कथा दर्शन’ और ‘कथा सरिता’ कार्यक्रमों के माध्‍यम से आम लोगों तक ले जाने की कामयाब कोशिश हुई, जिसे व्‍यापक लोगों ने सराहा। 31 जुलाई और 01 अगस्‍त, 2010 को आयोजित दो दिवसीय प्रेमचंद जयंती समारोह में फिल्‍म प्रदर्शन और कहानी पाठ के सत्र रखे गए थे। समारोह की शुरुआत शनिवार 31 जुलाई, 2010 की शाम प्रेमचंद की कहानियों पर गुलजार के निर्देशन में दूरदर्शन द्वारा निर्मित फिल्‍मों के प्रदर्शन से हुई।
फिल्‍म प्रदर्शन से पूर्व प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने अतिथियों का स्‍वागत करते हुए कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में व्‍याप्‍त सामाजिक संदेशों को और उनकी कहानी परंपरा को आम जनता तक ले जाने की एक रचनात्‍मक कोशिश है यह दो दिवसीय समारोह। इसमें एक तरु जहां प्रेमचंद की कहानियों पर बनी फिल्‍मों के माध्‍यम से प्रेमचंद के सरोकारों को आमजन तक ले जाने का प्रयास है, वहीं प्रेमचंद की कथा परंपरा में राजस्‍थान के दस युवा कहानीकारों को एक साथ प्रस्‍तुत कर हम प्रदेश की युवतम रचनाशीलता को राजधानी के मंच पर ला रहे हैं। इसके बाद प्रेमचंद की ‘नमक का दारोगा’, ‘ज्‍योति’ और ‘हज्‍ज-ए-अकबर’ फिल्‍में दिखाई गईं। ‘नमक का दारोगा’ तो चर्चित कहानी है, लेकिन प्रेमचंद की आम छवि से हटकर है ‘ज्‍योति’ की कहानी। एक ग्रामीण विधवा किसान स्‍त्री के इकलौते बेटे और ग्रामीण युवती की मासूम प्रेमकथा में मानवीय और पारिवारिक रिश्‍तों का प्रेम कई स्‍तरों पर दर्शकों को विभोर कर देता है। इसी प्रकार ‘हज्‍ज-ए-अकबर’ में एक मुस्लिम बालक और उसकी आया के बीच अपार प्रेम को बहुत संवेदनशीलता के साथ रूपायित किया गया है। खचाखच भरे सभागार में दर्शकों ने तीनों फिल्‍मों का भरपूर आनंद लिया और तालियां बजाईं।
रविवार 01 अगस्‍त, 2010 की सुबह 10.30 बजे ‘कथा सरिता’ का आगाज हुआ। वरिष्‍ठ कथाकार जितेंद्र भाटिया, वरिष्‍ठ रंगकर्मी एस.एन. पुरोहित और वयोवृद्ध विज्ञान लेखक हरिश्‍चंद्र भारतीय द्वारा प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस अवसर पर प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने स्‍वागत करते हुए कहा कि प्रेमचंद की 130वीं जयंती के मौके पर प्रदेश के दस युवा कथाकारों को एक मंच पर लाने की यह कोशिश रचनाकार और आम आदमी के बीच संवाद की पहल है, जहां लेखक सीधे पाठक से रूबरू होगा और कथा के आस्‍वाद की पुरानी परंपरा पुनर्जीवित होगी। य‍ह प्रेमचंद की परंपरा में समकालीन रचनाशीलता को कई आयामों से देखने की रचनात्‍मक कोशिश है। उन्‍होंने कहा कि दोनों सत्रों में जितेंद्र भाटिया और नंद भारद्वाज अध्‍यक्षता के साथ संयोजन भी करेंगे। इसके पश्‍चात वरिष्‍ठ रंगकर्मी एस.एन. पुरोहित ने प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ का अत्‍यंत प्रभावशाली ढंग से पाठ किया तो उपस्थित श्रोताओं ने उनकी तालियां बजाकर प्रशंसा की।
इसके पश्‍चात पहले सत्र का आरंभ करते हुए जितेंद्र भाटिया ने कहा कि समूचे भारतीय साहित्‍य में प्रेमचंद की परंपरा में उनके समकालीन रचनाकारों में उनके जितना बड़ा कहानीकार कोई नहीं है, उपन्‍यासकार और कवि जरूर हो सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि प्रेमचंद के बाद कहानी में बहुत विकास हुआ है, लेकिन सरोकार आज भी प्रेमचंद के समय के ही हैं। यही कारण है कि कहानी आज भी हमारे समय और समाज की धड़कन है, जिसे आज के कथाकार सार्थक कर रहे हैं। इसके बाद कहानी पाठ में सबसे पहले राम कुमार सिंह ने ‘शराबी उर्फ तुझे हम वली समझते’ कहानी का पाठ किया। एक साधारण मनुष्‍य की जिजीविषा और सामाजिक ताने-बाने में उसकी व्‍यथा कथा में रामकुमार ने यह बताने की कोशिश की कि सच्‍चे और भले लोग जिंदगी के हर मोड़ पर ठगे जाते हैं और उनके अंतर्तम में ठुकी हुई कीलों का रहस्‍य बाकी लोग कभी नहीं जान पाते। कहानी पाठ की शृंखला में प्रदेश के युवतम कथाकार राजपाल सिंह शेखावत ने ‘नुगरे’ कहानी का पाठ किया तो आजादी के बाद विगत छह दशकों में कैसे सांप्रदायिक विचारों ने जगह बनाई है, इसका एक गांव की कहानी के माध्‍यम से पता चला। कहन में सामान्‍य और बड़ी बात को भी साधारण ढंग से कहने के कौशल से कहानी ने चमत्‍कारिक प्रभाव पैदा किया।



उर्दू अफसानानिगार आदिल रज़ा मंसूरी ने अपनी कहानी ‘गंदी औरत’ में फुटपाथ पर रहने वाली एक स्‍त्री के माध्‍यम से समाज के सफेदपोश लोगों की गंदगी को बेनकाब करने का प्रयास किया। सुप्रसिद्व युवा कहानीकार अरुण कुमार असफल ने अपनी कहानी ‘क ख ग’ का पाठ करते हुए बताया कि सामान्‍य अनपढ़ लोगों में शिक्षित लोगों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा व्‍यावहारिक ज्ञान होता है जो उन्‍हें बिना किसी नारे के सशक्‍त बनाता है और दूसरों को राह दिखाता है। मनीषा कुलश्रोष्‍ठ की अनुपस्थिति में सुपरिचित कलाकार सीमा विजय ने उनकी कहानी ‘स्‍वांग’ का प्रभावी पाठ किया। स्‍वांग रखने की प्राचीन लोक कला पर आधारित बुजुर्ग लोक कलाकार गफूरिया की इस मार्मिक कथा ने सबको द्रवित कर दिया। अध्‍यक्षता करते हुए जितेंद्र भाटिया ने पढ़ी गई कहानियों की चर्चा करते हुए समकालीन रचनाशीलता को रेखांकित करते हुए कहा कि इधर लिखी जा रही कहानियों ने हिंदी कहानी के भविष्‍य को लेकर बहुत आशाएं जगाईं हैं। सत्र के समापन में उन्‍होंने अपनी नई कहानी ‘ख्‍वाब एक दीवाने का’ का पाठ किया। भविष्‍य केंद्रित इस विज्ञान कथा में समूची प़थ्‍वी को लेकर व्‍याप्‍त चिंताओं से पाठकों को रूबरू कराया गया।

‘कथा सरिता’ के दूसरे सत्र का आरंभ वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंद भारद्वाज की अध्‍यक्षता में युवा कहानीकार दिनेश चारण के कहानी पाठ से हुआ। उन्‍होंने अपनी कहानी ‘पागी’ के मार्फत यह बताने का प्रयास किया कि नई पीढ़ी के रचनाकार अपनी जड़ों की कितनी गहराई से पड़ताल करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ग्रामीण परिवेश में पांवों के निशान खोजने वाले व्‍यक्ति और उसकी खोई हुई प्रेमिका की अद्भुत प्रेमकथा ने सबको रोमांचित कर दिया। इसके बाद लक्ष्‍मी शर्मा ने ‘मोक्ष’ कहानी का पाठ किया। एक साधारण अनपढ़ ग्रामीण स्‍त्री की दारुण संघर्ष गाथा ने सबकी आंखें नम कर दीं। युवा कवि कथाकार दुष्‍यंत ने ‘उल्‍टी वाकी धार’ कहानी में दो शहरी प्रेमियों के बीच तनाव और अंतर्द्वंद्व को बहुत खूबसूरती से रचते हुए युवती के नैतिक साहस को रेखांकित किया। चर्चित कथाकार चरण सिंह पथिक ने डांग क्षेत्र में होने वाली पदयात्राओं की प्रतियोगिता के बहाने ग्रामीण समाज की कड़वी सच्‍चाइयों से ‘यात्रा’ कहानी के माध्‍यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। अध्‍यक्षता करते हुए नंद भारद्वाज ने कहा कि आज पढ़ी गई कहानियों से राजस्‍थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है कि वह कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। अपने परिवेश की गहरी समझ और प्रेमचंद के सरोकारों से लैस यह पीढ़ी निश्चित रूप से आगे जाएगी और प्रदेश की जनभावनाओं को अपनी रचनाओं में अभिव्‍यक्‍त करेगी। इसके बाद समापन में सीमा विजय ने प्रेमचंद की मार्मिक कहानी ‘बूढ़ी काकी’ का अत्‍यंत प्रभावशाली ढंग से पाठ किया तो श्रोताओं ने भरपूर तालियां बजाकर उनका स्‍वागत किया। अंत में प्रलेस के उपाध्‍यक्ष फारुक आफरीदी ने जवाहर कला केंद्र, दूरदर्शन, सहभागी रचनाकारों और समारोह में सहयोग करने वाले सभी साहित्‍य प्रेमी मित्रों और श्रोता-दर्शकों का आभार जताया।

प्रस्‍तुति : फारुक आफरीदी

Thursday, February 11, 2010

यूँ अनावरित हुए 'काव्यनाद' और 'सुनो कहानी'


आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 20 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वें विश्व पुस्तक मेले में हिन्द-युग्म ने कई तरीके से धूम मचाई। किसी इंटरनेटीय समूह का प्रकाशन में एक साथ पाँच पुस्तकों के साथ प्रवेश हो या फिर साहित्य और संगीत के मेल का अभिनव प्रयोग, ये हिन्द-युग्म के ऐसे अध्याय बने जिनको पढ़कर हिन्दी की इंटरनेटीय उपस्थिति की गंभीरता का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

विश्व पुस्तक मेला की शुरूआत 30 जनवरी 2010 को हुई। 31 जनवरी को हिन्द-युग्म ने तीन पुस्तकों के लोकार्पण का कार्यक्रम आयोजित किया (इन पुस्तकों में से 'शब्दों का रिश्ता' हिन्द-युग्म के अपने प्रकाशन की पुस्तक थी)।

1 फरवरी 2010 को नई दिल्ली के प्रगति मैदान के सभागार-2 में हिन्द-युग्म ने अपना 'आवाज़ महोत्सव' मनाया जिसमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिनिधि कविताओं के संगीतबद्ध एल्बम ‘काव्यनाद’और प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' का विमोचन हुआ। जहाँ 'सुनो कहानी' का विमोचन महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया, वहीं काव्यनाद का विमोचन वरिष्ठ कवि और ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक बाजपेयी ने किया। इस कार्यक्रम में संगीत विशेषज्ञ और 'संगीत-संकल्प' पत्रिका के संपादक डॉ॰ मुकेश गर्ग दोनों एल्बमों पर टिप्पणी करने के लिए उपस्थित थे। संचालन प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।


'काव्यनाद' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

कार्यक्रम की शुरूआत में हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता दीप जगदीप ने आवाज़ की गतिविधियों का संक्षिप्त परिचय उपस्थित श्रोताओं को दिया। आवाज़ की गतिविधियों से रूबरू होकर बहुत से दर्शकों को सुखद आश्चर्य हुआ कि सजीव सारथी के निर्देशन में हिन्द-युग्म का आवाज़ मंच ढेरों विविधताओं को समेटे है।

इसके बाद वर्ष 2009 के संगीत-आयोजन के सरताज गीत और लोकप्रिय गीत पुरस्कारों का वितरण हुआ। इसके तहत पुणे के संगीतकार-गायक रफीक शेख को रु 6000 का नगद इनाम (सरताज गीत के लिए) और केरल के निखिल-चार्ल्स-मिथिला की टीम को रु 4000 का नगद इनाम (लोकप्रिय गीत के लिए) दिया गया। जहाँ लोकप्रिय गीत के पुरस्कार का चेक लेने के लिए निखिल अपने पिता और अपनी बहन निखिला के साथ इस कार्यक्रम में उपस्थित होने केरल से पधारे थे , वहीं रफ़ीक शेख़ का चेक रफीक की ओर से हिन्द-युग्म के कवि मनीष वंदेमातरम् ने लिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी के एसोशिएट प्रोफेसर डॉ॰ मुकेश गर्ग ने बहुत सधी हुई भाषा में साहित्य और संगीत के अंतर्संबंध पर अपनी रखी। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में रेडियो पर सुगम संगीत (लाइट म्यूजिक) की शुरूआत फिल्मी गीतों की प्रतिक्रिया के तौर पर हुई थी। उस जमाने के साहित्य, कला और संगीत के कर्णधार ये मानते थे कि फिल्मी संगीत घटिया म्यूजिक है और उन्होंने फिल्मी गीतों का रेडियो पर प्रसारण बंद करवा दिया। लेकिन लोकतंत्र में लोक की पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए 5-7 साल के अंदर ही विविध भारती चैनल शुरू करना पड़ा। मज़े की बात ये है कि सौंदर्य और अभिरुचि समय के साथ इस तरह बदलती है कि कई बार उनपर विचार करने से ताज्जुब होता है। 50 और 60 के दशक के फिल्मी गाने आजके लोगों के लिए श्रेष्ठता के मानदंड बने हुए हैं, जबकि उस समय के विशेषज्ञ उसे घटिया मानते थे। सुगम-संगीत बहुत लोकप्रिय नहीं हुआ, जबकि इसमें गंभीर साहित्य को संगीत के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।

डॉ॰ मुकेश गर्ग ने निराला की गीतिका और रवीन्द्र नाथ टैगोर के रवीन्द्र संगीत के माध्यम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि गेयता किसी शब्द के अंदर ही होती है। नवभारत टाइम्स, जनसत्ता को आप भले ही गा दें, लेकिन इससे नवभारत टाइम्स गेय नहीं हो जायेगा। हमारे भक्तिकालीन जितने भी कवि हुए, उन सबकी रचनाएँ तब से लेकर अब तक गायी जाती हैं। संगीत को साड़ी की तरह नहीं लपेटा जा सकता। बहुत कम ऐसा हो पाता है कि कोई बहुत बढ़िया रचना को कोई संगीतकार उसी साहित्यिक गंभीरता और संवेदनात्मक स्तर के साथ गा ले। कर्ण का कवच-कुंडल को बाहर से पहनाना अलग बात है और कर्ण के शरीर पर उसे देखना एक अलग बात है। भक्तिकालीन गीतों की खासियत यह थी कि उनकी रचना प्रक्रिया में ही संगीत घुसा हुआ था। गाते-गाते रचा गया। इसी वजह से भक्तिकालीन सारी रचनाएँ लोकभाषा में होती थीं। यहीं पर शब्दों के गोल होने की बात उठती है। लोक किसी शब्द को घिस-घिसकर गोल बना देता है। लोकभाषा अक्सर गोल होती है। कृष्ण संस्कृत का शब्द है, कान्हा उसे सॉफ्ट बनाने की कोशिश है, कन्हाई थोड़ा और गोल बनाने की कोशिश और कन्हैया पूरी तरह से गोल हो चुका शब्द है। कोई शब्द 4-5 पीढ़ियों के यात्रा के बाद गेय होता है। इसीलिए संस्कृत कभी गेय भाषा नहीं रही। वह स्वरों के साथ पाठ की भाषा रही। शास्त्रीय संगीत के लिए ब्रजभाषा सबसे उपयुक्त भाषा है।

'काव्यनाद' पर टिप्पणी करते हुए मुकेश गर्ग ने कहा सबसे पहले मैं इस बाद के लिए हिन्द-युग्म को साधुवाद देना चाहूँगा कि इसने उन कविताओं को संगीतबद्ध करने की कोशिश की है जिन्हें गाना बहुत मुश्किल है, उसकी वजह यह है कि ये सभी कविताएँ संस्कृष्ठनिष्ठ शब्दों वाले हैं, उन्हें संगीतबद्ध करना तो मुश्किल नहीं है, लेकिन ऐसा बनाना कि लोग इसे गायें, बहुत मुश्किल है। सभी कविताओं के मुझे वो संस्करण पसंद आये जो बिना ताल के गाये गये हैं, लेकिन मुझे कुहू गुप्ता का पाश्चात्य शैली में गाया गया एक गीत 'जो तुम आ जाते एक बार' बहुत पसंद आया। इस गीत के बीच में नाटकीय ढंग से बोला गया डायलाग भी बहुत पसंद आया। मुझे यदि 'काव्यनाद' से कोई एक गीत चुनना हो तो यही गीत चुनूँगा। मैं चाहता हूँ कि इस तरह के प्रयास ज़ारी रहे।


'सुनो कहानी' का लोकार्पण करते विभूति नारायण राय, अशोक बाजपेयी और डॉ॰ मुकेश गर्ग

प्रेमचंद की कहानियों के एल्बम 'सुनो कहानी' पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति और प्रसिद्ध कथाकार विभूति नारायण राय ने कहा कि हमारे समय में यथार्थ कितनी तेजी से बदल रहा है यह देखना हो तो आज से पहले जब कहा जाता था कि 'मसि-कागद छुयो नहीं॰॰॰॰' को अब ऐसे कहा जा सकता है कि यदि आपने माउस-कीबोर्ड नहीं छुआ तो आज के समय के साथ कदमताल नहीं कर सकते। उन्होंने प्रेमचंद के डिजीटल रूप की प्रसंशा की और कहा कि यदि हिन्द-युग्म चाहे तो हमारा विश्वविद्यालय हिन्द-युग्म के साथ मिलकर इस तरह के प्रयासों में भागीदार हो सकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट हिन्दीसमय डॉट कॉम पर जल्द ही 1 लाख साहित्यिक पृष्ठों के अपलोडिंग की बात की और कहा कि हिन्द-युग्म या अन्य कोई वेबसाइट जब चाहे तब उनकी वेबसाइट से आवश्यक जानकारियाँ ले सकता है और हिन्दी के बड़े समुदाय तक हिन्दी साहित्य की बातें पहुँचा सकता है।

अंत में कार्यक्रम के संचालक प्रमोद कुमार तिवारी ने कार्यक्रम के अध्यक्ष, ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि अशोक बाजपेयी को माइक पर आमंत्रित किया। अशोक बाजपेयी ने कहा कि पहले यह बात समझने वाली है कि इससे क्या साहित्य और संगीत की लोक-पहुँच पर कोई फर्क पड़ता है। भारत में 19वीं सदी तक कविता, संगीत और रंगमंच साथ-साथ थे, लेकिन जब पश्चिम प्रेरित आधुनिकता का हस्तक्षेप हुआ तब ये तीनों चीजें अलग-अलग हो गईं। कई बार इनके बीच की खाई पाटने की कोशिश हुई है और मैं इस प्रयास का भी स्वागत करता हूँ।

उन्होंने आगे कहा कि कविता में संगीत खुद होता है, कवि या कोई काव्य-मर्मज्ञ उसे जब पढ़ता है या गाता है तो संगीत के साथ ही गाता है। इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है कि कविता गाने से क्या उसके नये अर्थ खुलते हैं।

अंत में गायक संगीतकार निखिल, कृष्णा पंडित और निखिला ने आवाज़ का उद्‍‌घोष गीत 'आवाज़ के रसिया हैं हम'प्रस्तुत किया जिसे इन्होंने कार्यक्रम शुरू होने से कुछ समय पहले ही तैयार किया था। धन्यवाद ज्ञापन आवाज़ के संपादक सजीव सारथी ने किया।

कार्यक्रम में 'काव्यनाद' के संकल्पनाकर्ता आदित्य प्रकाश और इस प्रोजेक्ट के सहयोगी ज्ञान प्रकाश सिंह को भी उपस्थित होना था, लेकिन किन्हीं अपरिहार्य कारणों से सम्मिलित न हो सके। कार्यक्रम में आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्‍घोषक प्रदीप शर्मा, वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार, पुस्तक वार्ता के संपादक भारत भारद्वाज, लंदन से पधारे मोहन अग्रवाल के अलावा सैकड़ों गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

अन्य झलकियाँ-


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


दर्शक-दीर्घा


डॉ॰ मुकेश गर्ग


विभूति नारायण राय



अशोक बाजपेयी



आवाज़ का परिचय देते दीप जगदीप



दीप जगदीप, संचालक और अतिथि


मंच



'काव्यनाद' का अनावरण करते अशोक बाजपेयी



'लोकप्रिय गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते निखिल



रफीक़ शेख़ की ओर से 'सरताज गीत' पुरस्कार का चेक मुख्य अतिथि के हाथों ग्रहण करते मनीष वंदेमातरम्



'आवाज़ के रसिया हैं हम' गीत पेश करते निखिला, निखिल और कृष्णा पंडित


धन्यवाद ज्ञापित करते आवाज़ के संपादक सजीव सारथी


बाएँ से दाएँ- सखी सिंह, मनीष वंदेमातरम्, शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी, मोहन अग्रवाल, दीप जगदीप और महुआ


फुरसत के पलों में- निखिला, निखिल, कृष्णा पंडित और सजीव सारथी



शैलेश भारतवासी, प्रमोद कुमार तिवारी और मोहन अग्रवाल