Showing posts with label In Memory of. Show all posts
Showing posts with label In Memory of. Show all posts

Sunday, August 23, 2009

लंदन में कुछ यूँ याद की गईं बी आर चोपड़ा की फिल्में

बी.आर. चोपड़ा अपने समय से आगे के फ़िल्मकार थेः तेजेन्द्र शर्मा


'रेशमी सलवार कुर्ता जाली का' गीत पर नृत्य करतीं त्रिनिदाद की बहनें कृष्णा एवं कैमिलिता

बी.आर. चोपड़ा अपने समय से बहुत आगे की फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक थे। उन्होंने हमेशा सामाजिक सच्चाइयों से जुड़ी फ़िल्मों का निर्माण किया; आम आदमी की समस्याओं को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया मगर मनोरंजन का दामन नहीं छोड़ा। उनकी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि उन्हें विषयों की तलाश में मदद करती थी। नया दौर (1957) संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कही जा सकती है। मनुष्य बनाम मशीन जैसे ज्वलंत विषय को बी.आर.चोपड़ा ने बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है और उस पर ओ.पी.नैय्यर का पंजाबियत लिया सुरीला संगीत जैसे विषय को नये अर्थ दे रहा हो।” यह शब्द थे तेजेन्द्र शर्मा – महासचिव कथा यूके – के। आयोजन था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा लन्दन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक रंगारंग कार्यक्रम जिसमें हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा के महत्वपूर्ण निर्माता निर्देशक बी.आर.चोपड़ा की उपलब्धियों का लेखा जोखा श्रोताओं के सामने रखा गया।


दर्शकों को संबोधित करतीं नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता

नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता ने कार्यक्रम की शुरूआत में श्रोताओं का स्वागत करते हुए एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी एवं तेजेन्द्र शर्मा को कार्यक्रम के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने श्रोताओं को बताया कि तेजन्द्र शर्मा नेहरू केन्द्र से लम्बे समय से जुड़े हैं और बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्मों के इस कार्यक्रम का आनंद सभी दर्शक उठा पाएंगे। उन्होंने सभागार में उपस्थित सभी दर्शकों को यक़ीन दिलाया कि भविष्य में नेहरू सेंटर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन नियमित रूप से करेगा। हमें इन कार्यक्रमों में भारत की अन्य भाषाओं की फ़िल्मों पर भी कार्यक्रम आयोजित करने होंगे।

तेजेन्द्र शर्मा ने बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म वक़्त (1965) के कुछ दृश्य भी दिखाए जिनमें राजकुमार (राजा) और रहमान (चिनाय सेठ) की टक्कर दिखाई गई। दर्शकों की करतल धव्नि से साफ़ पता चलता था कि राजकुमार की संवाद अदायग़ी आज भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय है। तेजेन्द्र ने 1957 में बनी नया दौर के पीछे की कहानी भी दर्शकों को सुनाई। कैसे मधुबाला फ़िल्म की नायिका थीं और कैसे उनके पिता अताउल्ला ख़ान को यह बात मंज़ूर नहीं थी कि उनकी बेटी दिलीप कुमार के साथ आउटडोर शूटिंग पर जाए। कैसे वैजयन्ती माला फ़िल्म की हिरोइन बनी और कितना लंबा कोर्ट केस चला।

इसके अलावा तेजेन्द्र शर्मा ने अफ़साना, एक ही रास्ता, साधना, धूल का फूल, धर्मपुत्र, कानून, गुमराह, वक़्त, हमराज़, इन्साफ़ का तराज़ू और निक़ाह जैसी फ़िल्मों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां भी की।


'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों' गीत गाते जटानील बैनर्जी

तेजेन्द्र शर्मा का मानना है कि बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्मों की गुणवत्ता बढ़ाने में साहिर लुधियानवी की शायरी का महत्वपूर्ण योगदान है। अपनी असामयिक मृत्यु तक साहिर ने बी.आर. चोपड़ा की सभी फ़िल्मों के लिये गीत लिखे। संगीत कर बदलते रहे मगर साहिर लुधियानवी बी.आर. फ़िल्मस के स्थायी स्तम्भ बने रहे। एन. दत्ता एवं रवि ने साहिर के गीतों को अमर बनाने में उल्लेखनीय भूमिका अदा की। कार्यक्रम में तेजेन्द्र शर्मा ने तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, मांग के साथ तुम्हारा, यह देश है वीर जवानों का, ऐ मेरी ज़ोहरा ज़बीं, आज की रात नहीं शिक़वे शिक़ायत के लिये, नीले गगन के तले जैसे गीतों को भी दिखाया।

बहुत सी फ़िल्मों से जुड़ी कहानियों एवं गप्पों का ज़िक्र भी तेजेन्द्र शर्मा ने किया। कार्यक्रम के बारे में एक सार्थक टिप्पणी क्लासिकल ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार ने की, “मैं जब इस कार्यक्रम में आया था तो बी.आर. चोपड़ा मेरे लिये केवल एक नाम था। मुझे लगता है कि यह कार्यक्रम देखने के बाद मैं उनके बारे में बात कर सकता हूं।”

इंसाफ़ का तराज़ू का विश्लेषण तेजेन्द्र ने विस्तार से किया। उन्होंने समयाभाव के कारण दर्शकों से क्षमा मांगी कि उन्हें कार्यक्रम को थोड़ा छोटा करना पड़ा। बाक़ी का मसाला दर्शकों को फिर किसी दूसरे कार्यक्रम में दिखाया जा सकता है। कार्यक्रम में एक नया रंग भरने के लिये युवा गायक (रॉयल कॉलेज और म्यूज़िक) जटानील बैनर्जी ने फ़िल्म गुमराह की साहिर लिखित नज़म गा कर सुनाई – चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। गिटार पर उनका साथ दिया निखिल ने। त्रिनिदाद की बहनों कृष्णा एवं कैमिलिता ने रेशमी शलवार कुर्ता जाली का पर मज़ेदार नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। शायद बी.आर चोपड़ा की सोच के अनुसार कार्यक्रम में मनोरंजन का पुट डाला गया था।

कार्यक्रम की समाप्ति में महाभारत का वो अंश दिखाया गया जिस में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं यदा यदा ही धर्मस्य ग्लनिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य स्वात्मानं सृजाम्यहम, परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे। उपस्थित दर्शक समूह एकमत से कह उठे कि इस कार्यक्रम से इस से बढ़िया समाप्ति हो ही नहीं सकती थी।


समूह-चित्र-1


समूह-चित्र-2

प्रस्तुति- दीप्ति कुमार

Tuesday, March 3, 2009

'कृष्णा' संस्था द्वारा योग्यता के आधार पर विद्यार्थियों की सहायता

छात्रवृत्ति देते जगदीश रावतानी व प्रेमचंद सहजवाला
हिन्दी कवि कथाकार प्रेमचंद सहजवाला ने सन 2006 में गरीब विद्यार्थियों की सहायता हेतु एक गैर-सरकारी संस्था बनाई थी - कृष्णा , The Rising Son's and Daughter's Organisation. यह संस्था प्रतिवर्ष कुछ योग्य विद्यार्थियों को उन की आर्थिक स्थिति के आधार पर सहायता देती है. फिलहाल इस के पास दो स्कीमें हैं: एक तो वर्ष भर के लिए 1000 रु. की एक-मुश्त सहायता और दूसरी Adoption Scheme जिस में कुछ विद्यार्थियों का प्रतिमाह शिक्षा व्यय वहन किया जाता है. दिनांक 24 फरवरी 2009 को 'कृष्णा' संस्था ने दिल्ली में न्यू राजेंद्र नगर स्थित डी आई खान भ्रातृ सभा सीनियर सेकंडरी स्कूल' के ग्यारह विद्यार्थियों को एक एक हज़ार रूपए की एक-मुश्त सहायता प्रदान की. यह कार्यक्रम इस बार प्रसिद्ध शिक्षाविद स्व. डॉ. अंजना सहजवाला की स्मृति में किया गया, जिन का निधन दि. 19 जनवरी 2009 को हुआ था. डॉ. अंजना सहजवाला शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली की एक जानी मानी शख्सियत थी, जो मानव स्थली स्कूल से कई वर्ष तक जुड़ी रही. पिछले दस वर्षों से वे स्कूल की वसंत कुंज शाखा 'भटनागर इंटरनेशनल स्कूल' की प्रिंसिपल रही. स्कूल के पास सन 58 में स्थापना के समय केवल सोलह विद्यार्थी थे पर समय के साथ इस के पास दस से भी अधिक शाखाएं हो गई तथा कई हज़ार विद्यार्थी. स्कूल की प्रगति में व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण शख्सियत होने के नाते डॉ. अंजना का अथक परिश्रम भी शामिल था. डॉ. अंजना कई शिक्षा समितियों की अध्यक्ष भी रही तथा शिक्षा क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त किए, जिन में नेशनल प्रेस इंडिया द्वारा सन '92 में दिया गया राष्ट्रीय पुरस्कार, डॉ. राधाकृष्णन स्मृति राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान (2001) तथा World Environmental Education Development 2005 के अवार्ड प्रमुख थे. कार्यक्रम में इस वार्षिक छात्रवृत्ति के लिए 9 वीं से 12 वीं तक के विद्यार्थियों का चयन प्रिंसिपल मनमोहन कौर के सहयोग से किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्द साहित्यकार व दूरदर्शन के कई धारावाहिकों के निदेशक पटकथा -लेखक व 'आनंदम संगीत विद्यालय' के प्रिंसिपल जगदीश रावतानी ने की. कृष्णा के अध्यक्ष प्रेमचंद सहजवाला इस स्कूल में ही सन 57 से 61 तक पढ़े, इस लिए उन्होंने अपने स्कूली जीवन की कई खट्टी-मीठी यादें सुनाई, जिन में सब से रोचक उन के क्रिकेट सीखने के अनुभव थे. इस के बाद दिल्ली के 'हेमनानी पब्लिक स्कूल' की प्रिंसिपल श्रीमती माधुरी कनल ने डॉ. अंजना सहजवाला की शक्सियत पर रोशनी डालते हुए कहा कि वे कई देशों में अपने विद्यार्थियों के साथ गई तथा जिस से भी मिलती वह सहज ही उन्हें अपनी दीदी मान लेता. इस प्रकार वे इंटरनेशनल दीदी बन गई. प्रेमचंद सहजवाला पहले ही अपनी इस बड़ी दीदी के विषय में अपने भाषण में कह चुके थे कि जैसे शरत चन्द्र की प्रसिद्द कहानी बड़ी दीदी एक कल्प वृक्ष की तरह थी, जिस की छांव में जिसे जो चाहिए मिल जाता था, वैसे ही उन की बड़ी दीदी भी थी, जिस ने परिवार और समाज सेवा के उद्देश्य से स्वयं विवाह नहीं किया तथा एक तपस्विनी की तरह जीवन भर तपस्या में जुटी रही.

अंजना सहजवाला के बारे में अपना वक्तव्य देती माधुरी कनल
श्री रावतानी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि देश के कई महापुरुषों को जीवन में आर्थिक कठिनाइयां देखनी पड़ी थी. पर हर विद्यार्थी को चाहिए कि वह एक सपना देखे, प्रगति का सपना, कुछ बनने का सपना. उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री का उदहारण भी दिया कि जब वे स्कूल में थे तो एक नदी पार कर के स्कूल में पढने आना होता था. पर उनके पास नाव में जाने-आने के पैसे नहीं होते थे. इस लिए वे अपना बसता सर पर रख कर पैदल ही नदी के इस पार से उस पार तक जाते थे और अपनी मेहनत और लगन से एक दिन वे देश के प्रधान-मंत्री पद तक पहुँच गए. स्कूल की प्रिंसिपल मनमोहन कौर ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि स्कूल के एक पूर्व विद्यार्थी इतने वर्षों बाद आज अपने ही प्रिय स्कूल के विद्यार्थियों से मिलने आए हैं और उन की हिम्मत बढ़ाने के लिए स्कूल के अच्छे विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियां देने आए हैं. उन्होंने कहा कि कृष्णा के अध्यक्ष प्रेमचंद सहजवाला ने यहाँ पढने वाले दिनों में आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया था और एक गरीब विद्यार्थी के रूप में एक सपना देखा था कि वे कभी ऐसी एक संस्था बनाएंगे. स्कूल की एक अध्यापिका ने अंत में अध्यक्ष जगदीश रावतानी तथा सहजवाला का धन्यवाद् करते हुए अपने विद्यार्थियों को परिश्रम तथा लगन की प्रेरणा दी.

-तरुण