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Thursday, April 14, 2011

अंजना के प्रथम आयोजन का निमंत्रण


निमंत्रण

डॉ. अंजना सहजवाला
की स्मृति में स्थापित नवीन संस्था
'अंजना: एक विचार मंच'
के प्रथम समारोह में
आप सदर आमंत्रित हैं.
(यह संस्था समय समय पर महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए समाज के विशिष्ट विद्वानों के व्याख्यान आयोजित करेगी).

दि. 15 अप्रैल 2011
'गाँधी शांति प्रतिष्ठान' दीन दयाल उपाध्याय मार्ग,दिल्ली सायं 5 से 0830 तक
के इस प्रथम समारोह में व्याख्यान का विषय होगा:

क्या आज़ादी के बाद से अब तक दलित की शक्ति बढ़ी है? वर्तमान परिदृश्य में दलित की स्थिति क्या है?

मुख्य अतिथि : रमणिका गुप्ता

विशिष्ट वक्ता : डॉ. अभय दुबे, डॉ. धीरूभाई शेठ, श्री कमल किशोर कठेरिया व श्रीमती अनीता भारती.

कृपया इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी उपस्थिति अवश्य दें.

निवेदक : प्रेमचंद सहजवाला

Friday, December 31, 2010

महेश दर्पण ‘पुश्किन के देस में’



‘रूस के बारे में अभी तक जो संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त हिंदी में प्रकाशित हुए थे, वे सभी उन लेखकों ने लिखे थे जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले यानी सोवियत काल में रूस गए थे. सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने हाल ही में रूस की यात्रा करने के बाद इसी बदले हुए ज़माने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है’ यह परिचय है ‘सामयिक प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित महेश दर्पण की सद्यप्रकाशित यात्रा वृत्तान्त पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ का जो रूसी साहित्यकार ल्युद्मीला ख्खलोवा द्वारा इसी पुस्तक के फ्लैप पर दिया हुआ है.
महेश दर्पण हिंदी साहित्य जगत व पत्रकारिता के एक जाने माने हस्ताक्षर हैं जिन्होंने ‘अपने हाथ’ ‘चेहरे’ ‘मिट्टी की औलाद’ ‘वर्त्तमान में भविष्य’ ‘जाल’ ‘इक्कीस कहानियां’ ‘एक चिड़िया की उड़ान’ आदि जैसे सशक्त कहानी संग्रह हिंदी साहित्य को दिये हैं तथा अनेक सम्मानों यथा ‘पुश्किन सम्मान’, ‘साहित्यकार सम्मान’, हिंदी अकादमी का ‘कृति सम्मान’ व ‘पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ आदि से सम्मानित हुए हैं.
दि. 15 दिसंबर 2010 को उर्मिल सत्यभूषण द्वारा संचालित ‘परिचय साहित्य परिषद’ के तत्वावधान में नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘राशियन कल्चरल सेंटर’ में महेश दर्पण की पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ पर एक बेहद सारगर्भित व विचारोत्तेजक गोष्ठी हुई जिस की अध्यक्षता राजेंद्र यादव ने की तथा प्रसिद्ध कवि विष्णु चन्द्र शर्मा, चित्रा मुद्गल व रमेश उपाध्याय इस संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे.
प्रारंभ में ‘राशियन कल्चलर सेंटर’ की येलेना शटापकिना ने पुष्प भेंट किये तथा ‘परिचय साहित्य परिषद’ की ओर से प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने मंच पर उपस्थित विशिष्ट गण को पुस्तकों के रूप में शब्द-पुष्प भेंट किये.
गोष्ठी में विषय प्रवर्तन स्वयं ‘परिचय साहित्य परिषद’ की अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने किया और कहा कि इस पुस्तक में रूसी समाज का ऐसा जीवंत चित्रण है कि एक एक दृश्य आँखों के सामने घूमता सा नज़र आता है. ‘परिचय साहित्य परिषद’ की हर संगोष्ठी में ‘राशियन सेंटर’ की ओर से किसी न किसी प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार का जीवन वृत्त स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जाता है. उर्मिल सत्यभूषण ने कहा कि आज ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक की चर्चा उसी शृंखला की एक कड़ी जैसी है.
येलेना ने अंग्रेज़ी में भाषण करते हुए एक भारतीय द्वारा रूसी समाज पर लिखी गई एक और पुस्तक पर प्रसन्नता प्रकट की तथा यह भी कहा कि पुस्तक पठनीय है व उसमें रूसी पाठकों के लिये भी कई नई जानकारियाँ हैं.
महेश दर्पण ने संक्षिप्त भाषण अपनी पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि पुश्किन का देस केवल रूस ही नहीं है, वरन पुश्किन का देस भारत भी हो सकता है. उन्होंने रूसी साहित्यकारों की उन कई प्रदर्शनियों का ज़िक्र किया जो रूस में उन्हें देखने को मिली.
वरिष्ठ कवि कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने महेश दर्पण की कहानियों में पारिवारिक संवेदना के संरक्षण की बात की. उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के साथ रूस की तस्वीर बदली और महेश ने अपनी पुस्तक में बदलाव से पहले और बाद के रूस की अच्छी तुलना की है. उन्होंने भी महेश द्वारा वर्णित प्रदर्शनियों व रूसी समाज की झलकियों में चल्चित्रात्मकता का गुण होने की बात कही.
चित्रा मुद्गल ने कहा कि महेश दर्पण की यह पुस्तक एक उपन्यास सी लगती है और उन्होंने टूटते हुए रूसी समाज के जीवन में बहुत गहरे पैठ कर यह पुस्तक लिखी है. रूस के शहरों व गांवों का उन्हें बेहद प्रामाणिक विवरण इस पुस्तक में मिला तथा उन्होंने पुस्तक की पठनीयता की भी प्रशंसा की.



सभागार में एक सशक्त पुस्तक पर इतनी गंभीर चर्चा सुनते हुए हिंदी के कई जाने माने हस्ताक्षर यथा केवल गोस्वामी, हरिपाल त्यागी, सुरेश उनियाल, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, वीरेंद्र सक्सेना प्रेम जनमेजय आदि भी उपस्थित थे. रमेश उपाध्याय ने भी अपने भाषण में इस पुस्तक के औपन्यासिक प्रारूप होने की बात कही और कहा कि इस प्रकार मानो एक नई विधा का जन्म हुआ है. उन्होंने कहा कि ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक केवल उन्हें नहीं वरन उनके समस्त परिवार को बहुत अच्छी लगी.
अपने अध्यक्षीय भाषण में राजेंद्र यादव एक ‘नॉस्टाल्’ज्या सा महसूस करते हुए साठ वर्ष पहले के काल में पहुँच गए जब उन्होंने आगरा में चेखव को पढ़ना शुरू किया था. उन्होंने कलकत्ता की ‘नैशनल लाइब्रेरी’ में भी चेखव को खूब खंगाला. वैसे अपने समय में ही राजेंद्र यादव ने अपने किसी आत्याकथ्य में यह कहा था कि वे स्वयं को चेखव के अधिक निकट पाते हैं. उन्होंने काफी वर्ष पहले रूस पर लिखी हुई प्रभाकर द्विवेदी की पुस्तक ‘पार उतर कहं जइहोँ’ का सन्दर्भ दे कर कहा कि उस पुस्तक की तरह ‘पुश्किन के देस में’ भी एक लंबे अरसे तक उनकी स्मृति में रहेगी.
वैसे देखा जाए तो हिंदी साहित्य के कई कालजयी हस्ताक्षर रूसी साहित्य से प्रभावित रहे, यह बात स्वयं अपने आप में सर्वविदित है. जब भारत ब्रिटिश जैसी उपनिवेशवादी शक्ति के अधीन था तब भारत के स्वाधीनता संघर्ष से जुड़े कई नेताओं यथा नेहरु, सुभाषचंद्र बोस व भगत सिंह पर रूस के समाजवाद की बहुत गहरी छाप रही. भगत सिंह की जीवनी देखी जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि उन्हें मृत्युदंड न मिलता तो भारतीय समाज को एक और लेनिन मिल जाता. साहित्य में भी प्रेमचंद और मैक्सिम गोर्की के व्यक्र्तित्वो कृतित्वों की परस्पर समानता सर्वविदित है. प्रेमचंद ने स्वयं अपनी सोच व साहित्य पर गोर्की के प्रभाव की बात कही थी. नई कहानी के दौर में भी मोहन राकेश राजेन्द्र यादव जैसे सशक्त हस्ताक्षर चेखव से पूर्णतः प्रभावित थे. रूस अब भले ही पहले जैसा रूस नहीं रह गया है और न ही भारत ही पहले सा समाजवादी रहा है, बाज़ार के दबाव में भारत के रूप में भी आमूलचूल परिवर्वन लगातार आ रहे हैं. पर इस के बावजूद भारतीय और रूसी समाज में अब भी कुछ ऐसा बचा है जो उन्हें अपने प्रारंभिक समय से जोड़ता है. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी पुस्तकें उसी समाज के एक एक्स-रे सी लगती हैं जो बदला तो तेज़ी से है पर अपनी कोख को शायद भूल नहीं पाया है व जिसमें अभी भी उस समय के कई अच्छी बुरे अवशेष बचे हैं. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी अन्य कई रचनाओं की आवश्यकता है जो इस विषय को गंभीर शोध की तरह लें और भारत के अमरीका से नैकट्य व रूस से धीमी धीमी बढ़ती दूरी पर अपने चिंतन की प्रचुर रौशनी डालें.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Saturday, November 6, 2010

उर्दू अदब की बे-मिसाल संस्था ‘जवाब-ए-शिकवा’


अन्य शायरों के साथ प्रेमचंद सहजवाला

साहित्य से जुड़ी असंख्य संस्थाओं में से अधिकतर की एक प्रमुख सीमा यही रहती है कि वे सब किसी न किसी एक शहर के साहित्यकारों तक सीमित रहती हैं. उनके मासिक या वार्षिक कार्यक्रम अपने शहर से जुड़े रहते हैं और यहाँ तक कि उनके पुरस्कारों सम्मानों की सीमा भी उसी शहृ या उसके आसपास के भूगोल तक महदूद रहती है. ऐसे में यदि कोई संस्था अखिल भारतीय स्तर पर एक से बढ़ कर एक साहित्यकारों की खोज करती है तो यह अपने आप में एक बेमिसाल बात है. उर्दू अदब से जुडी संस्था ‘जवाब-ए-शिकवा’ एक ऐसी ही संस्था होने का गर्व रखने का अधिकार रखती है, यह इस पत्रकार के सामने तब प्रमाणित हुआ जब दि. 24 अक्टूबर 2010 को मध्यप्रदेश के धार शहर में ‘जवाब-ए-शिकवा’ द्वारा आयोजित एक शानदार मुशायरे में शरीक होने का सुअवसर मिला. उस मुशायरे में न केवल धार या आसपास के कुछ सुपरिचित हस्ताक्षर शायरी प्रस्तुत करने गए थे वरन् दिल्ली, जम्मू व गुवाहाटी जैसे दूरस्थ शहरों के मशहूर शायर भी शिरकत करने आए थे. मुशायरा धार शहर के होटल नटराज पैलेस के सभागार में रखा गया और इस में धार की प्रसिद्ध हस्तियों में से श्री मनोज गौतम मुख्य अतिथि थे. उर्दू के जाने माने हस्ताक्षर श्री माहताब आलम इसमें विशिष्ट अतिथि थे.

मुशायरा शुरू होने के इन्तज़ार में होटल नटराज पैलेस का सभागार उर्दू अदब के चाहने वालों से खचाखच भर गया था और मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि के स्वागत के बाद मुशायरे की शुरुआत नॉएडा सेपधारी युवा शायरा पूर्णिमा चतुर्वेदी ‘माह’ की शानदार गज़लों से हुआ जिस के कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत हैं:
पूर्णिमा चतुर्वेदी ‘माह’
मैं टूटे आईने को देख कर अक्सर यही सोचूँ
कि मेरे हाथ से कैसे वो पत्थर चल गया होगा
और
कब तक वो मेरी फ़िक्र में दरिया को दुआ दे
मैं डूब चुका हूँ कोई साहिल को बता दे.
दूसरे नंबर पर ही जो शायर आए, उन्होंने अपनी जानदार शायरी से श्रोताओं के दिलों की धडकनें तेज़ कर दी. जैसे:
जिसे किसी ने बनाया न हमसफ़र अपना
वो शख्स काफिलासालर होने वाला है.
(काफिलासालार = काफिले का नेता)
और
वो एक पल के लिये छोड़ कर गया था मुझे
तमाम उम्र मेरी इन्तेज़ार में गुज़री.


उद्‍घाटन

लियाकात जाफरी जम्मू से पधारे उर्दू व फारसी के विद्वान हैं जिन का शायरी का दीवान ‘बयाज़’ शीर्षक से उर्दू शायरों के बीच बहु-चर्चित है. इसके अलावा उनकी तीन पुस्तकें शोध व आलोचना पर हैं व एक पुस्तक फारसी से उर्दू में अनुवाद की है. वे अंजुमन-ए-तककी-ए-उर्दू की जम्मू कश्मीर शाखा की एक पुरस्कार समिति के अध्यक्ष भी हैं. जम्मू निवासी होने के कारण जम्मू कश्मीर की शुरू से चली आ रही दर्दनाक उथल पुथल के प्रति एक संवेदनशील कश्मीरी नज़रिया भी रखते हैं.
वैसे दिल की धडकनें तेज़ करने वालों की वहाँ कमी नहीं थी. उर्दू के एक से बढ़ कर एक मंजे हुए शायर वहाँ मौजूद थे और सभागार में भी एक से बढ़ कर एक कद्रदान दाद देने को ‘वाह वाह’ समेत तैयार. उस सभागार में एक नज़र डालने पर यही लगा कि अधिक से अधिक श्रोता उर्दू भाषा व शायरी की बारीकियों को समझने वालों में से हैं बल्कि उनमें से कई स्वयं शायर भी हैं.
वर्त्तमान परिस्थितियों पर तंज़ का एक नमूना देखिये, सतलज राहत का एक शेर:

ये ज़िन्दगी भी बीमारी की तरह होती है
ये मुंबई में बिहारी की तरह होती है

आज उर्दू शायरी सिर्फ शराब और शबाब तक ही महदूद नहीं है, यह साबित करने वालों की भी वहाँ कमी नहीं थी. सामयिकता को उजागर करती इस शायरी को चाहने वालों से भी सभागार भरा था:
ज़हीर राज़
किस कदर कल बह गया मेरा लहू
सुर्ख़ियों में आ गए अखबार सब
दो कदम घर से कभी निकले नहीं
रास्तों पे तब्सिरा तैयार सब
हर ज़बां पर अम्न का नारा मगर
जंग लड़ने के लिये तैयार सब
आज शायरी एक समुन्दर सी है, विषयों ज़मीनों की कोई सीमा नहीं. जिंदगी से जुडी शायरी हो या रिश्तों के खोखलेपन का ज़िक्र, शायर अपने वक्त की नब्ज़ को बड़ी नजाकत से पकड़े रहता है और दमदार से दमदार अलफ़ाज़ में उसे अभिव्यक्त करता है. जैसे:

माहताब आलम
हमसफ़र भी कभी मंज़िल से बिछड जाते हैं
उम्र भर तू भी मेरा साथ निभाने से रहा
रास्ता अपने लिये खुद ही तराशूं कोई
ये ज़माना तो कोई राह दिखाने से रहा
या

कमर धारवी
ऐ मेरे भाई तेरा दिल तो साफ़ है लेकिन
तेरी बातों में अहंकार बहुत बोलता है

गुवाहाटी से आई कवयित्री रागिनी गोयल ने पहले ही शेर में वाह वाह की धूम मचा दी:
सफर की ज़िन्दगी अब बेवजह की सैर लगती है
मुझे अपनी ही सूरत आईने में गैर लगती है

इसके अतिरिक्त उनकी यह गज़ल भी बहुत पसंद की गई (कुछ शेर):
हर दरीचा ताके हर एक अटारी देखे
शहर सारा ही शहंशाह की सवारी देखे
दर दरीचा तो कोई चारदीवारी देखे
जाते जाते किले को राजकुमारी देखे


अनुराधा शर्मा

अनुराधा शर्मा (फरीदाबाद से) एक उभरती हुई शायरा हैं जिनकी शायरी से उनमें काफी उमीदें बंधती हैं. कुछ शेर:
खामशी चल पड़ी हलचलों की तरफ
बाद-ए-मंज़िल बढ़ी रास्तों की तरफ
ये परिंदा ही शायद समझ पाएगा
क्या तकूं हूँ मैं यूं बादलों की तरफ

दिल्ली के शायर अनिल पराशर ‘मासूम शायर’ ने एक संवेदनशील रचना प्रस्तुत की. यह उनकी एक बहुचर्चित रचना है जो उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता के विषय में रची थी तथा विश्व पुस्तक मेले में ‘हिन्दयुग्म प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित संकलित कविता संग्रह ‘अनमोल संचयन’ के विमोचन कार्यक्रम में पढ़ कर भी उन्होंने बेहद प्रभावित किया था. वे पिता के बारे में लिखते हैं: (दो शेर)
हाथ काँधे पे बस एक रखता था वो
इन आँखों में सब देख सकता था वो
उसकी खफ्गी को कोई भी समझेगा क्या
मैं संवारता था जब भी बिगड़ता था वो
बुज़ुर्ग शायर नसीर अंसारी का एक शेर:

ये सिर्फ बनने सँवरने की शय नहीं है नादां
अगर शऊर-ए-नज़र है तो आईना पढ़ना

मुशायरे के सभी शायरों की पंक्तियाँ देना संभव नहीं, पर यहाँ प्रस्तुत हैं मुशायरे के अंतिम शायर पराग अग्रवाल की कुछ पंक्तियाँ:
इश्क में हाल क्या है क्या कहिये
जूनून है, करार है. क्या है?
वो जो दरिया में है मुसाफिर है
वो जो दरिया के पार है क्या है


श्रोता

इस पूरे मुशायरे के आयोजन में दो शख्सियतों का विशेष योगदान रहा: एक तो जर्मनी से आए जतीन दत्तव दूसरे धार निवासी पराग अग्रवाल. जतीन दत्त ने मुझ से हुई संक्षिप्त बातचीत के दौरान कहा कि जवाब-ए-शिकवा चाहता है कि अधिक से अधिक लोग इस से जुड़ें. जवाब-ए-शिकवा शायरों के आपसी मेल मिलाप व विचार विमर्श के लिये इस से पूर्व तीन बड़ी बड़ी सभाएं कर चुका है जिन्हें उसने राब्ता 1, 2 व 3 कहा और जो क्रमशः जयपुर नई दिल्ली व इंदौर में 2007, 2009 व 2010 में हुई. ‘जवाब-ए-शिकवा’ की प्रमुख गतिविधियों में मासिक गोष्ठियां, उर्दू अदब का मूल्यांकन, उर्दू कक्षाए व एक पुस्तकालय भी हैं. उनकी भावी योजनाओं में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पत्र, एक प्रकाशन संस्थान व शायरी में छुपे रुस्तमों की खोज भी है. संस्था इस बात का भी एक सुखद स्वाभिमान रखती है कि उसके पास प्रगति के लिये समुचित फंड भी उपलब्ध हैं तथा इस मामले में वह किसी पर निर्भर नहीं है.
मुशायरा शाम सात बजे शुरू हुआ लेकिन मुशायरे में आए शायरों की एक अनौपचारिक सभा दोपहर को हुई जिसमें कुछ शायरों ने पराग अग्रवाल के परिश्रमी स्वाभाव की बेहद प्रशंसा की व कुछ ने यहाँ तक कहा कि पराग इस कार्यक्रम की तैयारियां करते हुए एक किसान से कम नहीं लग रहे. जतीन ने इच्छा ज़ाहिर की कि हर शह्र में ‘जवाब-ए-शिकवा की एक मज़बूत टीम ज़रूर होनी चाहिए और हर शह्र में एक पराग अग्रवाल होना चाहिये. मुशायरे की अंतिम रचना तो पराग ने पढ़ी पर उस के बाद भी धार के सुपरिचित हिंदी कवि संदीप शर्मा ने सब को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी और उर्दू के बीच कोई दूरी है ही नहीं. दोनों भाषाओँ के साहित्यकार आपस में प्रेम और सद्भावना से जुड़े हैं. इस के साथ ही उन्होंने अपनी एक सशक्त व्यंग्य कविता भी प्रस्तुत की जिसमें आदिम मानव समाज की और आज के अति तकनीकी आधुनिक समाज की बहुत सशक्त व काफी कुछ व्यंग्यात्मक तुलना भी की. आदिम मानव के पास न तो ए.टी.एम था न ही क्रेडिट कार्ड, पर वह कम से कम मनुष्य तो थ! शायद आज के युग में आधुनिकता अधिक है, उस युग में मानव की निश्छलता अधिक थी.

मुशायरे के अंत में सभी शायरों व श्रोताओं के लिये होटल नटराज पैलेस में तैयार किया गया स्वादिष्ट भोजन था पर भोजन तक पहुँचते पहुँचते तारीख बदल चुकी थी, हालांकि एक दूसरे से बिछुड़ने का दिल किसी का नहीं हो रहा था.

दो वीडियो भी देखें-


आयोजक जतिन दत्त


काव्यपाठ करतीं शायरा रागिनी गोयल

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Friday, October 1, 2010

हिंदी दिवस ऐल्बम - भारत मौसम विज्ञान विभाग



दि. 14 सितम्बर 2010 को 'भारत मौसम विज्ञान विभाग' के सभागार में प्रतिवर्ष की तरह 'हिंदी दिवस' समारोह ज़ोर शोर से मनाया गया. इस अवसर पर विभाग के अधिकारीयों कर्मचारियों के बच्चों ने भी कई सांस्कृतिक नृत्य व गीत प्रस्तुत किये. विभाग की वार्षिक हिंदी पत्रिका 'मौसम मंजूषा' का विमोचन भी हुआ. यह मेरे लिये एक सुखद अनुभव था कि मैं विभाग के सेवा-निवृत अधिकारी के रूप में 'हिंदी दिवस' के इस कार्यक्रम में उपस्थित था तथा मैंने मंच पर जा कर विभाग के महानिदेशक डॉ. त्यागी को अपनी इस वर्ष प्रकाशित पुस्तकें 'भगत सिंह - इतिहास के कुछ और पन्ने' तथा अंग्रेज़ी पुस्तक 'Mumbai kiski and other articles' भेंट की. विभाग की ओर से महानिदेशक महोदय ने मुझे राधा कृष्ण की एक अति सुन्दर मूर्ति बतौर भेंट के प्रदान की तो मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था. विभाग में होते हुए भी तथा विभाग से सेवानिवृत्त हो कर भी 'हिंदी पखवाडा' व 'हिंदी दिवस' मेरे लिये किसी त्यौहार से कम नहीं होते. अपने बिछड़े साथियों से मिलने का मेरे लिये सब से सुखद अवसर 'हिंदी दिवस' ही होता है. इस ऐल्बम में मैंने कुछ बाल कलाकारों के वीडियो तथा विभिन्न प्रतिभाओं यथा hindi हिंदी निबंध, हिंदी टंकण, कविता, अभिनय, कार्टून व नारे लिखने के लिये पुरस्कार प्राप्त करते हुए तसवीरें प्रस्तुत की हैं. विभाग ने इस वर्ष हिंदी पखवाड़े में पहली बार दो नई प्रतियोगिताएं भी रखी : 1.हिंदी कार्टून प्रतियोगिता 2. हिंदी नारा प्रतियोगिता. इन प्रतियोगिताओं के परिणाम व कुछ पुरस्कृत कार्टून मैं शीघ्र ही हिन्दयुग्म के पाठकों को प्रस्तुत करूँगा. इस ऐल्बम पर आप सब की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी.

कुछ वीडियोः


बाल-कलाकार कनुप्रिया नृत्य प्रस्तुत करती हुई


दो बाल-कलाकार एक गीत प्रस्तुत करते हुए



मौसम भवन के कलाकार 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गीत प्रस्तुत करते हुए


कुछ और चित्रः













प्रस्तुतिकरण - प्रेमचंद सहजवाला

Sunday, September 26, 2010

कन्हैया लाल नंदन की अश्रुपूरित विदाई - कुछ चित्र, कुछ वीडियो

हिन्दी के मूर्धन्य कवि व पत्रकार कन्हैया लाल नंदन का शनिवार, 25 सितम्बर 2010 की सुबह नई दिल्ली में निधन हो गया। 26 सितम्बर 2010 की दोपहर करीब 12 बजे लोदी रोड शवदाहगृह में उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस अवसर पर ढेरों साहित्यप्रेमी, पत्रकार और राजनीतिज्ञ उपस्थित थे, सभी ने उनको नम आँखों से विदा किया। प्रस्तुत हैं कुछ चित्र और वीडियो-












(वीडियो-1)


(वीडियो-2)


(वीडियो-3)

प्रस्तुति- प्रेमचंद सहजवाला

Saturday, September 25, 2010

हिंदी पखवाड़ा संसद भवन के केंद्रीय सभागार में ‘राष्ट्रभाषा उत्सव – 2010’ का शानदार आयोजन





‘संसदीय हिंदी परिषद’, ‘परिचय साहित्य परिषद’ व ‘विधि भारती परिषद’ के तत्वावधान में दि. 21 सितम्बर 2010 को ‘राष्ट्रभाषा उत्सव – 2010’ का शानदार आयोजन किया गया. इस अवसर पर ‘वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग’ के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) विजय कुमार ने अध्यक्षता की. पूर्व सांसद श्री उदय प्रताप सिंह, ‘दैनिक जागरण’ के मुख्य महा-प्रबंधक श्री निशिकांत ठाकुर, व पूर्व सांसद सत्या बहन विशिष्ट अतिथि थे. कार्यक्रम का प्रारंभ ‘सर्वोदय बालिका विद्यालय, समालखा’ की छात्राओं द्वारा ‘वंदे मातरम’ गान से हुआ. इसके अतिरिक्त इन बालिकाओं ने अन्य मधुर गीत भी प्रस्तुत किये. बालिकाओं ने जब हिंदी का गुणगान करते हुए गाया:
हृदय के उद्गारों को / होंठों पर सजा ले आए जो वाणी /वह भाषा हमारी हिंदी है...

तब सभागार में उपस्थित जनसमूह पर हुई सुखद प्रतिक्रिया को सहज ही समझा जा सकता है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सरोजिनी महिषी ने सभी गणमान्य अतिथियों व श्रोतागण का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी भाषा विश्व की सभी भाषाओँ के समकक्ष हो कर निरंतर गतिशील रही है तथा मानव सभ्यता की प्रगति में उसका प्राचीन काल से ही सशक्त योगदान रहा है. डॉ. सरोजिनी महिषी राजनीतिक जीवन में लगभग 25 वर्ष लोकसभा व राज्यसभा की सदस्या रही तथा पर्यटन व नागरिक उड्डयन, परमाणु ऊर्जा व विधि मंत्रालयों के अतिरिक्त उन्होंने प्रधान मंत्री कार्यालय में ‘पब्लिक रिलेशंस’ का कार्यभार भी संभाला. मौसम विज्ञान विभाग जब उनके अधीन आया तब देश भर में ‘चक्रवात चेतावनी’ के 8 रडार उन्होंने स्थापित करवाए जो उस से पूर्व इस विभाग के पास नहीं थे. वे पिछले 48 वर्षों से संसद के इसी सभागार में हिंदी भाषा सेविका के रूप में ‘संसदीय हिंदी परिषद’ का संचालन कर रही हैं. अपने स्वागत भाषण में उन्होंने भारत व विश्व में हिंदी की मज़बूत स्थिति पर बेहद प्रसन्नता व्यक्त की.
समारोह में कुछ गणमान्य साहित्यकारों को ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया तथा इस वर्ष पहली बार मीडिया-कर्मियों को भी ‘राष्ट्रभाषा मीडिया सम्मान’ से सम्मानित किया गया. साहित्यकारगण श्रीमती शान्ति अग्रवाल, श्री अशोक खन्ना, श्रीमती सविता चड्ढा, डॉ. धर्मवीर, श्री अनिल वर्मा ‘मीत’ व सुश्री सूरज मणि स्टेला को ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया. मीडिया से जुड़े विश्षिट हस्ताक्षरों: श्रीमती रमा पाण्डेय व सुश्री कनुप्रिया को ‘राष्ट्रभाषा मीडिया सम्मान’ से सम्मानित किया गया. इसके अतिरिक्त कुछ पुस्तकों: ‘जीवन का सच’ (कविता संग्रह - डॉ. शारदा वर्मा), ‘जात्रूलैन’ (यात्रा संस्मरण - चमेली जुगरान), ‘कौन जाए गालिब दिल्ली की गलियां छोड़कर’ (कविता संग्रह - डॉ. रश्मि मल्होत्रा), ‘उस पार तो जाना है’ (कविता संग्रह - सविता चड्ढा), ‘सृजन समग्र खंड -1’ (कहानी संग्रह - उर्मिल सत्यभूषण) तथा श्रीमती संतोष खन्ना द्वारा सम्पादित ‘विधि भारती’ पत्रिका के 64वें अंक का लोकार्पण भी अध्यक्ष प्रो. विजय कुमार के करकमलों द्वारा हुआ.

साहित्य की प्रगति में पुरस्कारों सम्मानों की जो सकारात्मक भूमिका है, उसे नकारा नहीं जा सकता, यह बात दीगर है कि कतिपय लोग व संस्थाएं इन्हें आत्म-प्रसिद्धि का साधन भी बना लेते हैं. इस समारोह मैं सम्मानित झारखंड के आदिवासी क्षेत्र से आई सूरज मणि स्टेला से जब यह पूछा गया कि इस सम्मान से आप को कैसा महसूस हुआ तब वे हंस कर बोली – ‘मुझ से तो बच्चों ने भी यह पूछा था कि आप को यह सम्मान किस उपलब्धि के लिये मिल रहा है, तब मैंने उन से कहा कि तुम आजकल के विद्यार्थी लोग अंग्रेज़ी के लिये अपनी जान लड़ा देते हो, मरने मिटने पर उतारू हो जाते हो पर मैंने जीवन भर हिंदी में बात की, हिंदी माध्यम से ही शिक्षा प्राप्त की, हिंदी साहित्य में कार्यरत रही, बस यह उसी का सम्मान है’. ‘नदिया’(कविता संग्रह), ‘वंचित वाणी’ (कहानी संग्रह) तथा ‘आओ फूल खिल उठे’ (बाल कविता संग्रह) जैसी सशक्त रचनाओं की रचेता सूरज मणि स्टेला का सम्मान उस समस्त आदिवासी भारत का सम्मान है जो जीवन के संघर्षों में भी मुस्काता है और हिंदी साहित्य के माध्यम से अपने कठिन जीवन की झलकियाँ दिखाता है.

‘मीडिया सम्मान’ से सम्मानित मीडिया कर्मी रमा पाण्डेय हिंदी मीडिया में एक सर्वविदित नाम है जो ‘दिल्ली दूरदर्शन’ ‘बी.बी.सी लंदन’ व ‘सी.बी.सी कनाडा’ में सक्रिय रही तथा अपनी ही स्थापित ‘मोंटेज फिल्म्स’ द्वारा शिक्षा से जुडी हिंदी फिल्में निर्मित करती रही. ‘राजा राम मोहन राय कलाश्री पुरस्कार’ ‘अंबेडकर दलित साहित्य पुरस्कार’ व लंदन के ‘कथा’ विशिष्ट सम्मान पुरस्कार’ से सम्मानित रमा पाण्डेय का कथन है कि जिस सभागार में पंडित नेहरु व सरदार पटेल से लेकर देश के कई गणमान्य हिंदी प्रेमियों ने हिंदी का गुणगान किया, उसी सभागार में सम्मानित हो कर उन्हें बेहद प्रसन्नता हुई है. भारतीय संस्कृति, भाषा व कला से जुडी 300 हिंदी फिल्मों की शृंखला ‘जाने अपना देश’ की निर्माता रमा पाण्डेय ने ‘सुनो’ कहानी नाम से बाल साहित्य शृंखला भी लिखी. स्वतंत्र मीडिया कर्मी कनुप्रिया ने मुझे बताया कि हिंदी एक ऐसी सशक्त भाषा है जिस के माध्यम से हम शहर से गांव तक अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सकते हैं. वे मीडिया को केवल धारावाहिकों द्वारा मनोरंजन का साधन बनाने में विश्वास नहीं करती वरन उसे एक ऐसी शक्ति मानती हैं जो किसी भी समाज की सोच तक को बदल कर रख सकता है. दिन भर अति व्यक्त रहने वाली कनुप्रिया प्रतिबद्धता में आस्था रखती हैं तथा वे इस सम्मान को अपने दृष्टिकोण का ही सम्मान मानती हैं.

‘दैनिक जागरण’ के मुख्य महाप्रबंधक निशिकांत ठाकुर ने अपने भाषण में इस बात पर अपार प्रसन्नता व्यक्त की कि इस वर्ष ‘राष्ट्रभाषा मीडिया सम्मान’ भी दिए गए हैं. उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस प्रकार के सम्मानों का भविष्य में भी ज़ोरदार समर्थन करेंगे. सभागार हिंदी प्रेमियों से खचाखच भरा था और निशिकांत ठाकुर की इस बात पर सभागार में हर्षध्वनि फैल गई. सभी ने करतल ध्वनि द्वारा इस समर्थन का स्वागत किया.

पूर्व सांसद उदय प्रताप सिंह ने कहा कि एक राष्ट्र में एक ही भाषा का वर्चस्व होना चाहिए, भले ही उसमें अन्य कई क्षेत्रीय आदि भाषाओँ के शब्द भी सम्मिलित हो जाएँ. उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने भी इसीलिये प्रगति की कि वे एक ही भाषा को ले कर चले और उसे विश्व की अनेक भाषाओँ के शब्दों से निरंतर धनी बनाते रहे.

अध्यक्ष प्रो. विजय कुमार ने ‘वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग’ के अध्यक्ष रूप में सभी सम्मानित साहित्यकारों व मीडिया कर्मियों को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी भाषा गंगा की सशक्त धारा के रूप में निरंतर प्रवाहित होती रहनी चाहिए. गंगा की इस पवित्र धारा का यह निरंतर प्रवाह रुकना नहीं चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इस भाषा को भारी भरकम शब्दों से बोझिल करने की ज़रूरत नहीं है, वरन् इस में विश्व भर की भाषाओँ के शब्दों को समाहित किया जा सकता है.

कार्यक्रम की सम्पन्नता के रूप में पूर्व सांसद सत्या बहन ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए इस बात पर गर्व व्यक्त किया कि संसद के इसी सभागार में हिंदी को संवैधानिक दर्जा दिया गया था और पिछले कई वर्षों से ‘संसदीय हिंदी समिति’ यहाँ हिंदी से जुड़े अनेकों कार्यक्रम करती रही है. उन्होंने कहा कि हिंदी से जुड़े सभी साहित्यकार व हिंदी प्रेमी बधाई के पात्र हैं और जैसा अध्यक्ष महोदय ने कहा, हिंदी की सशक्त धारा गंगा की तरह निरंतर प्रवाहित होते रहनी चाहिए.

कार्यक्रम का संचालन ‘परिचय साहित्य परिषद’ अध्यक्ष उर्मिल सत्यभूषण, संतोष खन्ना व अर्चना त्रिपाठी ने किया. कार्यक्रम राष्ट्र गान ‘जन गण मन...’ से संपन्न हुआ.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Wednesday, August 25, 2010

आज़ादी को समर्पित 'परिचय' साहित्य परिषद’ गोष्ठी



हिंदी गज़ल सम्राट दुष्यंत कुमार का एक शेर है:

जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये

अपने वतन की छांव तले जीने और उसी वतन की शानो-शौकत के लिये जान दे देने वाले जांबाज़ जवानों व त्याग की प्रतिमूर्ति कई महापुरुषों ने आखिर समुद्र को मथ कर आज़ादी का अमृत देश को समर्पित कर ही दिया. किन्तु दुष्यंत की उसी गज़ल का मतला आज़ादी रुपी उस वरदान के एक दूसरे रूप को सामने लाता है:

कहाँ तो तय था चरागाँ हरेक घर के लिये
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये !

आज़ादी की विरासत के हक़दार होने की कसौटी पर शायद हम सब पूरी तरह खरे नहीं उतरे. लेकिन इन तमाम आत्माकलनों के बावजूद यह भी सत्य है कि आज़ादी-दिवस देश का हर व्यक्ति बहुत प्रसन्नता व उत्साह से मनाता है. केवल 15 अगस्त नहीं, वरन अगस्त का पूरा महीना देश में कई जगह आज़ादी से जुड़े समारोह होते रहते हैं जिन में लोग प्रफुल्लित से हिस्सा लेते हैं. उर्मिल सत्यभूषण की 'परिचय साहित्य परिषद' ने भी दि. 20 अगस्त 2010 को अपनी मासिक गोष्ठी देश की आज़ादी को समर्पित की और एकत्रित कवियों ने देश व समाज से जुडी कविताएं पढ़ कर आज़ादी के उन परवानों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनके लिये देश सर्वोपरि था और निजी जीवन कोई अहमियत नहीं रखता था. गोष्ठी हर माह की तरह नई दिल्ली के फिरोज़शाह रोड स्थित Russian Centre for Science and Culture के सभागार में हुई. इस गोष्ठी में Indian Council of UN Relations महासचिव श्री के. एल. मल्होत्रा मुख्य अतिथि थे. इस गोष्टी का एक मुख्य आकर्षण यह भी था कि उर्दू के जाने माने शायर ‘मासूम’ गाज़ियाबादी ने काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता की. 'मासूम' वतन की शायरी में अपना सानी नहीं रखते और अन्य विषयों पर भी वे शायरी में अग्रणी माने जाते हैं तथा दिल्ली के मुशायरों में अक्सर उनकी उपस्थिति गरिमामय मानी जाती है.

बरसात के मौसम के बावजूद गोष्ठी शुरू होते न होते कई शायर आ गए. इस गोष्ठी में लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने देश की तरफ आँख उठा कर देखने वालों को ललकारता एक मुक्तक प्रस्तुत किया:

वक्त आएगा तो काँटों से चुभन मांगेंगे
वक्त आएगा तो शोलों से तपन मांगेंगे

तुमको देखे तो कोई आँख उठा कर ऐ वतन
हम तो हँसते हुए मरघट से कफ़न मांगेंगे

वहीं लखीमचंद्र ‘सुमन ने भी चुनौती भरे स्वर में पढ़ा:

जिस्म भारत है मेरा दिल मेरा कश्मीर समझ
मेरे हर अंग को हर प्रान्त की तस्वीर समझ

किसी भी अंग को दुश्मन की नज़र छू ले अगर
वो ‘सुमन’ अंग है दुश्मन के लिये तीर समझ.

ममता किरण जो सटीक से सटीक शब्दावली व प्रभावशाली शैली के लिये जानी-मानी हैं, ने सियासतदानों पर अंगुली उठा कर उनका पर्दाफाश किया:

बशर के बीच पहले भेद करते हैं सियासतदां
ज़रूरत फिर जताते हैं किसी कौमी तराने की

शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने पढ़ा:

वतन की नींव पर मिट्टी जमा है जिन शहीदों की
कभी भी भूल मत करना उन्हें तुम भूल जाने की

दिल्ली की काव्य गोष्ठियों व मुशायरों की एक अन्य जानी मानी हस्ती हैं रविन्द्र शर्मा ‘रवि’ जिन का शब्द शब्द मर्म-स्पर्शी है. उनका ध्यान देश के सन्दर्भ में किसानों पर गया और उनकी गज़ल का एक शेर था:

किसी के वास्ते बरसात है बदला हुआ मौसम
किसी के वास्ते यह साल भर की आस होता है.

उन्होंने ज़िन्दगी की मीमांसा करते हुए एक बेहद दार्शनिक शेर भी कहा:

कभी खामोश लम्हों में मुझे एहसास होता है
कि जैसे ज़िन्दगी भी रूह का बनवास होता है.

सुमित्रा वरुण ‘काफिर’ ने अपनी कविता में सच्चे मन से एक प्रार्थना प्रस्तुत की:

कोई धर्म ऐसा मिले हमें, जिस में कोई बंधन न हो
कोई प्रार्थना ऐसी मिले, जिस में रुदन क्रंदन न हो

तो भूपेंद्र कुमार जो हिंदी भाषा में महारत रखते हैं, ने जीवन्तता का सन्देश दिया:

शिकस्ता हाल में कब तक रहेंगे हम बताओ तो
गिरेंगे हम अगर सौ बार फिर भी गिर के उठाना तय है.

शोभना मित्तल की कविता में भी वही चिंता व्याप्त थी जो देश की जनता के मन में व्याप्त है कि क्या हम आज़ादी को उस का असली रूप दे पाए:

स्वतंत्रता तो मिली / लेकिन मोल हम उस का आंक न पाए / हर साल मनाते हैं स्वाधीनता दिवस / आस्था के कैलेंडर पर छाप न पाए.

साक्षात् भसीन

नफरत कहिये या कहिये इसे आग
नफरत से बड़ी कोई भी नहीं आग

अर्चना त्रिपाठी ने कुछ दोहे तथा एक कविता प्रस्तुत की. जैसे:

पिंजरे से लड़ कर हुआ जो लोहू लुहान
वही समझता आज़ादी, आज़ादी की शान

डॉ. सत्यवती शर्मा ने सरहदों की बात की जो देशों और व्यक्तियों के बीच विकराल रूप धारण किये रहती हैं:

जब नहीं सरहद गगन में/ जब नहीं सरहद पवन में/ जब नहीं सरहद अगन में/ जब नहीं सरहद सागर की उठती गिरती तरंग में/ जब नहीं सरहद नयन के अश्रुओं की धार में/ फिर खड़ी क्यों सरहदें इंसान के व्यवहार में.

प्रेमचंद सहजवाला

अब कहाँ से आएँगे वो लोग जो नायाब थे,
रात की तारीकियों में टिमटिमाते ख्वाब थे

शहीदों के प्रति:

सुबह आए इसलिए वो रात भर जलते रहे
रौशनी से लिख रहे वो इक सुनहला बाब थे

कुछ अन्य कवि:

नागेश चन्द्र

कामनवेल्थ के बाद गेम एक और मालिक करवा दो / भागें लोग तमाम किन्तु दिल्ली को स्वर्ग बना दो/ झोंपड़-पट्टी हटे दिखे चहुँ दिस हरियाली/ गगनचुम्बी रेस्तरां से दिखे सूप की प्याली.

एस नंदा ‘नूर’

जो दाता ने बख्शी हमें ज़िन्दगानी
सदा हम कोई उसका मकसद बनाएं

अंतिम बाज़ी ‘मासूम’ गाजियाबादी की थी जिन की शायरी सुनने का सब को बेताबी से इंतज़ार था. ‘मासूम’ जी ने एक से बढ़ कर एक गज़लें प्रस्तुत की तो उपस्थित श्रोतागण में भी ‘वाह वाह’ करने की स्फूर्ति सी आ गई. कुछ शेर:

चमन लुटने का ही इक गम नहीं इस का भी सदमा है
कि इन हालात में कैसे निगहबानों को नींद आई
ज़माने में तो पसमंज़र भी इन आँखों ने देखे हैं
कि जब इंसानियत रोई तो हैवानों को नींद आई.

गोष्ठी के अंत में ‘परिचय साहित्य परिषद’ अध्यक्ष उर्मिल सत्यभूषण ने मुख्य अतिथि व ‘मासूम’ गाजियाबादी तथा सभी कवियों का धन्यवाद किया व देश के सन्दर्भ में कुछ दोहे प्रस्तुत कर के गोष्ठी संपन्न की:

जागो प्रहरी देश के, किस की देखें बाट
देश द्वार के काठ को रही दीमकें चाट

मैंने अपनी ज़िन्दगी कर दी तेरे नाम
भारत माँ जननी मेरी ऐ माँ तुझे प्रणाम

संचालन अनिल वर्मा ‘मीत’ का था.

रिपोर्ट– ‘परिचय रिपोर्ट विभाग’

Monday, June 21, 2010

आमंत्रणः प्रेमचंद सहजवाला की अंग्रेज़ी पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम का

प्रेमचंद सहजवाला को ‘परिचय साहित्य परिषद’ सम्मान व Diamond Pocket Books से हाल ही में प्रकाशित उनकी अंग्रेज़ी पुस्तक ‘Mumbai Kiski & Other Articles’ का लोकार्पण समारोह दि. 22 जून 2010 को सायं 5.30 से 8.00 बजे तक नई दिल्ली के 24 फेरोजशाह रोड स्थित Russian Cultural Centre में आयोजित होने जा रहा है. लोकार्पण जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के School of Languages के प्रो. चमन लाल के कर-कमलों द्वारा होगा. इस अवसर पर पूर्व राज्यसभा सांसद श्री उदय प्रताप सिंह व प्रसिद्ध डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता डॉ. लवलीन थदानी विशिष्ट अतिथि होंगे.

आप सभी सादर आमंत्रित हैं।

Wednesday, April 28, 2010

'कवितायन' द्वारा प्रसिद्ध कवियों का सम्मान



कविता के क्षेत्र में दिल्ली की असंख्य काव्य संस्थाएं अपनी गतिविधियों से कविता-संसार को निरंतर सक्रिय रखे हैं, यह अपने आप में एक सुखद बात है. सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं द्वारा स्थापित सांस्कृतिक व बौद्धिक मंच 'कवितायन' ने दिनांक 23 अप्रैल 2010 को अपने तीसरे वार्षिक समारोह में हिंदी के कई कवियों - अमरनाथ अमर, नमिता राकेश, अभिषेक अत्रे, ममता किरण, चंद्रशेखर आसरी, जितेन्द्र सिंह, विवेक मिश्र तथा एम. एन. कृष्णमणि को 'साहित्य सृजन सम्मान' से सम्मानित किया. कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट के सामने ही स्थित Indian Society of International Law के सभागार में हुआ. इस कार्यक्रम में हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार गोविन्द व्यास मुख्य अतिथि थे तथा न्यायमूर्ति वी. एस. सिरपुरकर विशिष्ट अतिथि थे जिन्हें कवितायन ने विशिष्ट रूप से 'कवितायन साहित्य-सेवी सम्मान' दिया.

कार्यक्रम का प्रारंभ ज्योति प्रज्वलन व 'वर दे वीणा वादिनी..' प्रार्थना से हुआ. दि. 22 अगस्त 1946 को जन्मे न्यायमूर्ति वी.एस.सिरपुरकर, जिन का पूरा परिवार अधिवक्ता रहा तथा जो उत्तराँचल व पश्चिम बंगाल के मुख्य न्यायाधीश के पदों पर कार्यरत रह चुके हैं और वर्त्तमान में सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश हैं, की गरिमामय उपस्थिति ने इस कार्यक्रम की गरिमा को और भी बढ़ाया तथा सभागार में वकील समुदाय व न्यायपालिका से जुड़े कई लोग और अन्य काव्य-प्रेमी बेहद तन्मयता से कार्यक्रम देख रहे थे. पर जब उन्होंने भाषण प्रारंभ किया तो उनके ह्यूमर (Humour) के आगे चित्त हो कर दर्शक-गण लगातार खिलखिलाते रहे. एक जज का कार्य अति-गंभीर व ज़िम्मेदारी भरा रहता है, पर उस धीर-गंभीर वातावरण से मुक्त हो कर जब वह ऐसे किसी कार्यक्रम में हंसी बिखेरता है तो बहुत सुखद अनुभूति होती है. उन्होंने अपने भाषण में कहा :

मैं तानसेन भले ही न हूँ/पर कानसेन ज़रूर हूँ ! (ज़ोरदार कहकहा).

उन्होंने अपनी एक कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन भर में उन्होंने केवल एक ही कविता लिखी. (कुछ पंक्तियाँ):

कविता क्या हो तुम/ कितने हैं रूप तुम्हारे/ शिशु हृदय के लिए ऊषणामय हो तुम/ लोरियों में नींद/ पलकें झपकाती/ ममतामय हो तुम...

सरिता शर्मा का काव्यपाठममता किरण का काव्यपाठ
मुख्य अतिथि गोविन्द व्यास ने भी अपने भाषण में न्यायमूर्ति सिरपुरकर के सन्दर्भ में यह कह कर सभागार में कहकहे बिखेर दिए कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि जिस व्यक्ति को कवि होना चाहिए, वह न्यायालय में आ गया है और शायद जिस व्यक्ति को न्यायालय में होना चाहिए, वह कविता कर रहा है. एक अन्य सन्दर्भ में भी सभागार हंसी से झूम गया जब उन्होंने कहा कि एक अच्छा कवि भी अच्छा आदमी हो सकता है. व्यंग्यकार के रूप में जग-प्रसिद्ध गोविन्द व्यास ने यह भी स्पष्ट कहा कि आज़ादी से पहले की तुलना में अब समय काफी बदल चुका है. पहले कई नामी-गिरामी वकील राजनीति में आए और देश के लिए काफी सकारात्मक काम किया जब कि अब राजनीति में वही लोग हैं जो राजनीति ही कर रहे हैं. अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहकहे बिखेरने में भी वे जग-प्रसिद्ध हैं ही. उन के द्वारा प्रस्तुत कुछ छोटी छोटी कविताओं के अंश यहाँ प्रस्तुत हैं:

कोई जागे कि न जागे ये मुकद्दर उस का
आपका काम है आवाज़ लगाते रहना

और

नदी अपने किनारे पर सर रख कर रो रही है
हाय, लहरों को इस देश में कितनी तकलीफ हो रही है

सम्मानित कवियों को सम्मान-स्वरुप एक एक शाल व प्रशस्ति-चिह्न प्रदान किया गया. इस के पश्चात सम्मानित कवियों व अन्य आमंत्रित कवियों द्वारा काव्य-पाठ हुआ. इन में से ममता किरण अपनी कुछ ताज़ा कविताओं के साथ प्रस्तुत थी. हिंदी गज़ल में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में प्रसिद्ध ममता किरण के कुछ शेर:

मेरी मंज़िल क्या है मुझ को क्या खबर
कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से

बंद घर उसने जो देखा खोल कर
एक टुकड़ा धूप आई खिड़कियों से

जो राहों में तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझ से
तो रुक कर खाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं.


नमिता राकेश हिंदी की एक अति-व्यस्त कवियत्री हैं जिन के लगभग पांच कविता संग्रह हैं व कई सम्मिलित संकलनों में उनकी कविताएँ संकलित हैं. उनकी कविताओं और शख्सियत - दोनों में ही एक आकर्षक इगो सा अक्सर झलकता है. यहाँ उनके द्वारा प्रस्तुत कविताओं की एक झलक:

मैं एक समुद्र हूँ/ शांत गंभीर गहरा/ न जाने अपने में क्या क्या छुपाए/ सीप/ मोती/ चट्टानें/ पत्थर...

... पत्थर फेंकने से/ शांत समुद्र में/ हलचल होती ही है/ लहरें विरोध करती ही हैं...

...यह तो प्रकृति का शाश्वत नियम है/ जो दोगे वही पाओगे/ अब यह तुम पर निर्भर है/कि तुम क्या पाने के योग्य हो/ मोती कि छींटें.

पेशे से वकील चंद्रशेखर आसरी ने दो कविताएँ पेश की जिन में से कुछ पंक्तियाँ उन के पेशे से ही संबंधित कुछ दिलचस्प सी पंक्तियाँ हैं:

'क्लाइंट' की भावनाओं में बह जाता हूँ मैं/ उस कर हर 'इमोशनल' अत्याचार भी सह जाता हूँ मैं/ इस व्यवस्था के ताबूत में एक छोटी सी कील हूँ मैं/ एक लो प्रोफाईल वकील हूँ मैं.

अन्य आमंत्रित कवियों को भी स्वागत में एक एक प्रतीक चिह्न दिया गया. उनमें जिस कवियत्री ने पूरे सभागार को अपनी मार्मिक आवाज़ व तरन्नुम भरे काव्य की गिरफ्त में ले लिया, वे थी डॉ. सरिता शर्मा. उनके द्वारा प्रस्तुत गीतों की कुछ पंक्तियाँ बेहद मार्मिक भी रही. जैसे:

हृदय की वेदना कहने न देंगे/ इन्हें हम आँख से बहने न देंगे/ बनेंगे जग हंसाई चार आंसू.

और

निडर बन कर उमड़ना चाहते हैं/ कभी मन में घुमड़ना चाहते हैं/स्वयं बन कर रुबाई चार आंसू.

इस से पहले उन्होंने समुद्र और नदियों पर कई पंक्तियाँ सुनाई. समुद्र और नदियों के बीच का समीकरण शायद हर कवि का प्रिय विषय रहा है. सरिता शर्मा की ये पंक्तियाँ:

लहर जैसी चपलता तो मुझ में भी है/ अनकही इक विकलता तो मुझ में भी है/ मैं नदी हूँ किनारों में सिमटी हुई/ इक समुन्दर मचलता तो मुझ में भी है...

लक्ष्मीशंकर वाजपेयी हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार व गज़लगो हैं. उनके कुछ सशक्त शेर:

फूल कागज के हो गए जब से
खुशबुएँ दरबदर हुई तब से

बेटियाँ फिक्रमंद रहती हैं
बेटे रखते हैं काम मतलब से

जब से पानी नदी में आया है
हम भि प्यासे खड़े हैं बस तब से.

ज़र्फ देहलवी उर्दू शायरी में महारत रखते हैं. उन के द्वरा गाई हुई दर्द भरी गज़ल ने समां बाँध दिया.

अहसास के सब पैकर, आज़ार के सामाँ हैं
अब प्यार वफ़ा शफकत, मिलते हैं दुकानों में
(पैकर = शरीर, शफकत = पवित्रता).

उर्दू गज़ल में एक अन्य सशक्त व स्व-नाम-धन्य शायर अनीस अहमद खान:

अंदर अंदर खुद को बेच
बाहर से खुद्दारी रख

मुफ्त में गुस्सा मत हो माँ
रोटी दे तरकारी रख

दलबदलीधर जल्दी आ
जाने की तैयारी रख

न्यायमूर्ति सिरपुरकर व गोविन्द व्यासके प्रस्थान के बाद भी कार्यक्रम चलता रहा व कई अन्य कवियों ने कविताएँ पढ़ी. इस सत्र की अध्यक्षता लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने की।

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला

Thursday, April 15, 2010

आमंत्रणः 'परिचय साहित्य परिषद' लोकार्पण समारोह

(15 Apr 2010 - Russian Cultural Centre, 24 Ferozeshah Road, New Delhi Time 5.30 PM. )

1. 'परिचय' द्वारा हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह 'परिचय राग - 2' का लोकार्पण समारोह दि. 15 Apr. 2010 शाम 5.30 बजे Russian Cultural Centre, 24 Ferozeshah Road New Delhi में आयोजित किया जा रहा है. परिचय राग - 2 में 17 कवियों की कवितायेँ संकलित हैं. लोकार्पण के बाद सभी संकलित कवि अपनी रचनाएँ पढेंगे.

2. Russian Cultural Centre की उप-निदेशिका (Deputy Director) मारिया पावलोवा, जो अपना कार्यकाल संपन्न कर के वापस रूस जा रही हैं, का विदाई समारोह (Farewell) भी होगा.

इस समारोह में Russian Cultiural Centre के निदेशक डॉ. फ्योदोर रोज़ोवसकी मुख्य अतिथि होंगे तथा सुविख्यात साहित्यकार श्री बाल्स्वरूप राही, श्री उदयप्रताप सिंह, व श्री रविन्द्र श्रीवास्तव विशिष्ट अतिथि रूप में उपस्थित होंगे.

आप सभी इस समारोह में सादर आमंत्रित हैं.

निवेदक - प्रेमचंद सहजवाला,
कृते उर्मिल सत्यभूषण, अध्यक्ष 'परिचय' साहित्य परिषद'.

Tuesday, February 23, 2010

हैबीटैट सेंटर में ममता किरण का काव्य पाठ



दिल्ली में ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ तथा ‘इंडिया हैबीटैट सेंटर’ बौद्धिक सांस्कृतिक गतिविधियों के महाकेंद्र माने जाते हैं। मुख्य फाटक से भीतर जाते ही एक विशाल हाल में एक से बढ़ कर एक चित्र-प्रदर्शनियाँ देखने को मिलती हैं तो किसी किसी सभागार में कविता के बहुत सुन्दर आयोजन हो रहे होते हैं। समीर कक्कड़ द्वारा स्थापित ‘यूनिवर्सल पोइट्री’ पिछले वर्ष स्थापित कविता से जुड़ी एक संस्था है जो प्रति माह काव्य गोष्ठियों में किसी एक विशिष्ट कवि की कविताओं के अतिरिक्त हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी के कई कवियों के कविता पाठ का आयोजन करती है। यह बहुत सुखद अनुभूति है कि लगभग डेढ़ घंटे में तीन चार भाषाओं में कविता के असंख्य रंग दिखने लगें। यहाँ अनुभवी कवि भी आते हैं तो युवा कवि अपनी नई वैचारिकता व उत्साह के साथ अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। कभी-कभी विदेशों के विशिष्ट कवि भी अपनी काव्य-प्रस्तुति करते हैं।

दि. 10 फरवरी 2010 को ‘गुलमोहर हाल’ की काव्य गोष्ठी में ममता किरण ने विशिष्ट कवि के रूप में अपनी कुछ ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत की तथा एक बार फिर यह प्रमाणित किया कि वे छंद-मुक्त कविता तथा गज़ल, दोनों में महारत-हासिल कवयित्री हैं। मानवीय संबंधों में किसी भी प्रकार की गिलगिली संवेदना से मुक्त, उनकी पंक्तियाँ स्वाभाविक रूप से एक निर्झरिणी सी प्रवाहित होती हैं. कई पंक्तियाँ बहुत प्यारापन सा लिए रहती हैं। जैसे:

तारों भरे आसमान के साथ/ चाँद का साथ साथ चलना/ सफर में अच्छा लगता है/ कितना अच्छा होता/ इस सफर में चाँद की जगह तुम साथ होते!

या-

एक दूजे में खोना है,
चाँद-गगन सा होना है।

जहां मिलन से जुडी ये प्यारी पंक्तियाँ हैं, वहीं विरह की वेदना, जो शायद विश्व भर की कवयित्रियों की चिरपरिचित काव्य-भूमि है, पर भी ममता की कलम निर्बाध चलती है-

कभी इक पेड़ सायादार था जो,
वही अब तनहा तनहा ढल रहा है।

पर अक्सर मुझे यह लगता है कि ममता कभी कभी दार्शनिक भी हो जाती हैं या भक्ति-भाव से जुड जाती हैं। नीचे जो पंक्तियाँ उद्धृत हैं, उन्हें भगवन से भी जोड़ा जा सकता है और सांसारिक प्रेम से भी, या फिर प्रेम स्वाभावतः अलौकिक होता है, चाहे वह मनुष्य से हो या रचेता से-

ये रख अहसास तू तनहा नहीं है,
कि तेरे साथ कोई चल रहा है.

प्रेम और भक्ति मिल कर एक ही तत्व बन जाते होंगे शायद।

विरह के भाव ममता की एक तरही गज़ल में भी आते हैं। (तरही गज़ल का मिसरा है: तुझे ए जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं) -

जो राहों में तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझ से
तो रुक कर ख़ाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं.



गज़ल की परिभाषा यह कि सभी शेर अलग-अलग विषयों पर और परस्पर स्वतंत्र रहते हैं। इसी स्वतंत्रता के तहत इस तरही गज़ल का यह सामाजिक शेर-

छुपा है दिल में क्या उनके ये सब हम जान लेते हैं,
मुखौटा ओढ़ने वालों को हम पहचान लेते हैं

ममता किरण का एक प्रिय विषय है ‘माँ’। मेरा व्यक्तिगत आकलन है कि जितनी मर्म-स्पर्शी पहचान वे माँ की रखती हैं, शायद किसी अन्य विषय की नहीं. नीचे दी हुई काव्य-पंक्तियाँ अपना वक्तव्य खुद प्रस्तुर करती हैं-

बीमार जर्जर बूढ़ी माँ/याद करती है अपने बेटे को/लिखवाती है चिट्ठी पड़ोस की लड़की से/ अब ज़रूरत नहीं है तुम्हारे भेजे पैसे और दवाओं की/ सिर्फ तुम आ जाओ/ बैठो मेरे पास/ तुम्हारे बचपन की स्मृतियों में तलाशूँ अपना अतीत/ अपने जीवन की संतुष्टि।

इस गोष्ठी में कई अन्य कवियों यथा लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सीमाब सुल्तानपुरी, ममता अग्रवाल आदि ने अपनी सशक्त कवितायें पढ़ी। इस के अतिरिक्त कजाखस्तान की कवयित्री अक्बोता महमूदिया ने कई सशक्त रूसी कवितायें पढ़ी। समीर कक्कड़ द्वारा सभी कवियां के धन्यवाद के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।

रिपोर्ट– प्रेमचंद सहजवाला।

Friday, February 5, 2010

हिन्दयुग्म के तत्वावधान में तीन पुस्तकों का विमोचन


(बाएं से दाएं)- सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़, रश्मि प्रभा

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 10 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वें विश्व पुस्तक मेले में हॉल नं. 12A का स्टाल नं. 285 यानी हिन्दयुग्म डॉट कॉम अब मेले में आने वाले पुस्तक प्रेमियों के सैलाब के लिए एक सुपरिचित स्टाल बन गया है। यहाँ आगंतुकों को कई अच्छी काव्य पुस्तकें व अन्य सामग्री तथा प्रेमचंद की कहानियां व निराला जयशंकर प्रसाद आदि कालजयी कवियों की कविताएँ CD रूप में उपलब्ध हो रही हैं।

दि. 31 जनवरी 2010 को हिन्दयुग्म के तत्वावधान में ही एक साथ तीन पुस्तकों का विमोचन प्रगति मैदान के हॉल नं. 7D के कांफ्रेंस रूम नं. 2 में संपन्न हुआ। हिन्दयुग्म की गतिविधियों में अब सोने पर सुहागे की तरह पुस्तक प्रकाशन की गतिविधि भी जुड गई है। ‘हिन्दयुग्म’ द्वारा प्रकाशित, सुपरिचित कवियत्री रश्मि प्रभा की 72 कविताओं का संकलन ‘शब्दों का रिश्ता’ इस कार्यक्रम में लोकार्पित तीन साहित्यिक कृतियों में से एक था। रश्मि प्रभा के संकलन ‘शब्दों का रिश्ता’ के अतिरिक्त उनके द्वारा ही सम्पादित 31 कवियों के सम्मिलित संकलन ‘अनमोल संचयन’ तथा सुपरिचित लेखिका सुमीता प्रवीण केशवा के प्रथम नाटक ‘सम-बंध’ का भी लोकार्पण हुआ। ‘सम-बंध’ का लोकार्पण प्रसिद्ध साहित्यकार उपेन्द्र कुमार ने, ‘अनमोल संचयन’ का पद्मश्री बाल स्वरुप राही ने तथा ‘शब्दों का रिश्ता’ का विख्यात चित्रकार इमरोज़ ने किया।


सम-बंध का लोकार्पण करते सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़ और रश्मि प्रभा

‘सम-बंध’ समलैंगिक संबंधों पर रचा गया एक नाटक है, जिस के बारे में श्री उपेन्द्र कुमार ने कहा कि ऐसे विषय पर लिखना सचमुच एक साहसिक कार्य है, जो कि निश्चय ही एक स्वागत योग्य बात है। उन्होंने कहा कि नाटक अपने चरम पर तब आता है जब उस का बाकायदा मंचन हो, जहाँ पात्रों के अभिनय के साथ-साथ पार्श्व-संगीत आदि तत्वों से मिल कर नाटक अपने समग्र प्रभाव में सामने आता है। इस के साथ उन्होंने नाटककार सुमीता केशवा को शुभकामना दी कि नाटक शीघ्र ही मंच पर अभिनीत रूप में सब के सामने आए। नाटक की प्रशंसा करते हुए उन्होंने यह माना कि लेखिका ने समलैंगिक संबंधों को बहुत गहराई से विश्लेषित कर के उसे मानवीय स्तर पर और समुचित सहानुभूति से देखा परखा है। समलैंगिक संबंधों पर काफी लंबे अरसे से बातचीत चल रही है और उन्होंने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि भारत के न्यायालयों ने भी अब इस ओर ध्यान दिया है और इस पर खुले तौर पर चर्चा चल पड़ी है। कई पुस्तकें भी आ रही हैं। लेकिन उन के अनुसार हम जब भी कोई पुस्तक पढ़ रहे होते हैं, तो हमारे बहुत-से पूर्वाग्रह होते हैं, जिनके कारण हम ऐसे विषयों पर लिखी पुस्तक को पढ़ने से पहले ही रिजेक्ट कर चुके होते हैं। पर उन्हें आशा है कि जब पाठक ‘सम-बंध’ को पढेंगे, या किसी मंच पर देखेंगे तो खुले मन से पढ़ेंगे या देखेंगे और उसकी बाद ही कोई धारणा बनाएँगे।


अनमोल-संचयन का विमोचन करते अतिथि

रश्मि प्रभा द्वारा सम्पादित कविता संकलन ‘अनमोल संचयन’ के विमोचन भाषण में श्री बाल स्वरुप राही ने सब से पहले कहा कि इस संकलन में 31 कवि हैं, जिन में से ज़्यादातर नए हैं। इसलिए इसे पढ़ना शुरू कर के उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई कि नई पीढ़ी के इन कवियों की अपनी राहें हैं और किसी बड़े साहित्यकार का प्रभाव इन पर नहीं हैं। स्वयं अपना उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने कविता लिखनी शुरू की तो कुछ कुछ इस अंदाज़ में शुरू की:

न मैं गा सकूंगा ज़माने के स्वर में
ज़माना मेरे साथ गाए तो गाए.

उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि कवि का नाम सुपरिचित न होना कोई नई बात नहीं है। यह बहुत पहले से चला आ रहा है कि कविता बहुत कम पढ़ी जाती है। पर जिन कवियों के नाम अपरिचित हैं, उनमें से कई कवि ऐसे हैं जो बहुत अच्छा लिख रहे हैं। राजशेखर ने प्राचीन काल में अपनी काव्य मीमांसा में लिखा था कि बहुत से कवि ऐसे हैं जो केवल घर तक सीमित रह जाते हैं। कुछ ऐसे हैं, जो केवल मित्र-मंडली तक पहुँच पाते हैं और ऐसे बहुत कम होते हैं जिनकी दुनिया भर में पहुँच होती हो। एक रोचक बात की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि इस संकलन में कवियों के परिचय में उनके जन्म-दिन तो दिए गए हैं, पर उनके (और अधिकतर कवयित्रियों के) जन्म वर्ष नहीं दिए गए हैं। सभागार में हँसी बिखेरते हुए उन्होंने कहा कि इस बात को ले कर अधिक सोचने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि परिचय में जो कवियों कवयित्रियों के चित्र दिए गए हैं, उन चित्रों से आप आसानी से उन की उम्र का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कविता और गद्य की परस्पर तुलना करते हुए उन्होंने किसी महान साहित्यकार का सन्दर्भ देते हुए कहा कि:

What is prose?

Ans: Words in thier best order.

What is poetry?

Anss: The best words in their best order.

संकलन के विषय में उन्होंने कहा कि उसे उन्होंने बहुत महत्वाकांक्षा से पढ़ना शुरू किया और अपनी पत्नी पुष्पा राही जो स्वयं एक सशक्त कवयित्री हैं (और इस कार्यक्रम में सभागार में उपस्थित भी थी) से भी कहा कि ये बहुत अच्छी कविताएँ हैं। संकलन की सबसे पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ पढकर सुनाते हुए वे अभिभूत से लगे:

मेरा मन एक पुस्तक है/जिस के प्रत्येक पृष्ठ पर तुम्हीं रेखांकित हो/अक्षर अक्षर में/ तुम्हारी ही छवि बोलती है...


'शब्दों का रिश्ता' का लोकार्पण करते सुमीता प्रवीण केशवा, उपेन्द्र कुमार, पद्मश्री बालस्वरूप राही, इमरोज़ और रश्मि प्रभा

चित्रकार इमरोज़ ने बेहद संक्षिप्त भाषण दिया और अपनी एक नज़्म की कुछ पंक्तियाँ भी कही:

मैं एक अनलिखी गज़ल को कई बार लिख चूका हूँ/ पर वह अनलिखी ही रही...

इस कार्यक्रम में सम्मिलित संकलन ‘अनमोल संचयन’ के दो कवि अनिल पराशर व संगीता स्वरुप भी भी उपस्थित थे और उन्हें मंच पर आमंत्रित कर के कविता पाठ करने को भी कहा गया। अनिल पराशर की कविता ‘पिता’ पर सभी अभिभूत थे। कुछ पंक्तियाँ:

हाथ कांधे पे बस एक रखता था वो
इन आँखों में सब देख सकता था वो
कोई सिहरन हुई जब भी सोचा इसे
उफ़! मेरे वास्ते मर भी सकता था वो.

संगीता स्वरुप की कविता कोयला भी सब को अच्छी लगी:

मेरा मन/सुलगता हुआ कोयला/...चाहती हूँ कि/कोई आए/ और ढक ले मुझे/ अपने पूरे वजूद से/ इस तरह कि/ दम तोड़ दें सारी चिंगारियां/ अंदर ही अंदर/ और शांत हो जाए मन/ एक राख विहीन/ ठंडे कोयले की तरह...

पूरे कार्यक्रम में उपस्थित होना एक सुखद सी अनुभूति सी लग रहा था जिस में मुंबई पुणे से आई दोनों कवयित्रियों व संकलन के सभी कवियों के प्रति सब के हृदय में सराहना सी उमड़ रही थी।

कार्यक्रम के अंत में नीलम मिश्र ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया और स्वादिष्ट जलपान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ.

चित्रों में कार्यक्रम-


कार्यक्रम की शुरूआत करने के लिए संचालक को आमंत्रित करते शैलेश भारतवासी


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


संचालक प्रमोद कुमार तिवारी


रश्मि प्रभा और संगीता स्वरूप


इमरोज


काव्यपाठ करतीं संगीता स्वरूप


काव्यपाठ करते अनिल मासूम शायर


श्रोताओं से मुखातिब इमरोज








सम-बंध पर अपने विचार व्यक्त करते कवि उपेन्द्र कुमार


हिन्द-युग्म के स्टॉल में इमरोज़


रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, February 2, 2010

कपिल सिब्बल की दो टूक बातें – 19 वें ‘विश्व पुस्तक मेला’ (30 Jan – 7 Feb) की उद्घाटन रिपोर्ट



‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ द्वारा प्रति दो वर्ष में ‘विश्व पुस्तक मेला’ का आयोजन पुस्तक प्रेमियों के लिए एक त्यौहार की तरह होता है. हजारों प्रकाशक, लाखों पुस्तकें और लाखों पुस्तक प्रेमी एक सैलाब की तरह दिल्ली के प्रगति मैदान में उमड़ते देखे जा सकते हैं.

19 वां पुस्तक मेला भी उसी त्यौहार शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में 30 जनवरी 2010 को मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा उद्घाटित हुआ. कपिल सिब्बल की एक विशेषता यह कि वे बहुत उत्साह से अपने मंत्रालय में एक स्फूर्ति सी भर देते हैं. केवल निपटाऊ तरीके से काम करके जनता को झूठे आश्वासनों द्वारा आश्वस्त रखना उनकी कार्य शैली में शामिल नहीं है. जिस तरीके से कपिल सिब्बल ने मानव संसाधन मंत्री की शपथ लेते ही भारतीय शिक्षा प्रणाली में अचानक कुछ क्रन्तिकारी परिवर्तन करने शुरू कर दिए उस से शिक्षा से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोगों की चेतनाओं का झकझोर दिया जाना निश्चित सा था. उन के विषय में कहने से पहले मेरी स्मृति अचानक कुछ पूर्व मानव संसाधन मंत्रियों की ओर सहज ही चली जाती है. वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी कुछ विचित्र सा चेहरा ले कर जनता के सामने प्रस्तुत हुए. अपनी तथा अपनी पार्टी की चिर-परिचित सांप्रदायिक छवि की प्रमाणिकता सी देते उन्होंने करोड़ों रूपए प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध के लिए बहाने शुरू कर दिए जिस में उनकी सनक यही थी कि प्राचीन भारत की अधिकाधिक गौरवशाली छवि जनता के सामने प्रस्तुत की जाए और क्यों कि प्राचीन भारत में अधिकाधिक हिंदू राजा थे सो हिंदू गौरव प्राचीन भारत के गौरव का पर्यायवाची बन कर लगे हाथों उनकी पार्टी के लिए हिंदू वोट भी बटोर देगा. उसी हिंदू गौरव की सनक में उन्होंने विश्वविद्यालयों में ज्योतिष पढाने का नया शगूफा छोड़ दिया था. इस के आलावा कभी सरस्वती वंदना कभी वंदे मातरम, हिंदू गौरव उन की दुखती रग बन गई और इस से देश की धर्म-निरपेक्ष छवि को कितनी क्षति पहुंचेगी यह उनकी फ़िक्र में शामिल था ही नहीं. बहरहाल, बहुत बे-आबरू हो कर ...के अंदाज़ में सन 2004 में NDA सरकार को जनता ने हटा दिया तो अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री बने जो इतने वृद्ध थे कि चाह कर भी शायद वो उत्साह न पद कर सके जिस की दरकार थी, हालांकि उन्होंने मंडल आयोग के आरक्षण को निजी स्कूलों कालेजों में भी लागू करने का अच्छा कदम उठाया जो फिलहाल अदालती युद्ध में खटाई में सा पड़ा हुआ है.






(कपिल सिब्बल का वक्तव्य)

कपिल सिब्बल ने कोई भी विवादस्पद या सांप्रदायिक काम न कर के सीधे ही शिक्षा प्रणाली में कुछ क्रन्तिकारी कदम उठाने शुरू कर दिए जिन के बारे में सोचते सब थे पर कार्यान्वित करने का साहस कम में था. दसवीं कक्षा के बोर्ड की परीक्षाएं समाप्त की तथा बारहवी में भी ग्रेडिंग सिस्टम लागू करनी के बात की. . संयोग कि पुस्तक मेले के उद्घाटन भाषण में उन्होंने सब से पहले इसी विषय को छुआ. उन्होंने मंच पर उपस्थित विद्वान इतिहासकार विपिनचंद्र समेत उन सभी लोगों को आड़े हाथों लिए जिन्होंने यह प्रश्न उछाला कि दसवीं के बोर्ड की परीक्षा समाप्त करने का आखिर उद्देश्य क्या था. उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि फिर तो मैं क्षमा चाहता हूँ क्यों कि मैं तो फेल हो गया हूँ. पर यह कौन कहता है कि हम चाहते हैं कि बच्चों की परीक्षाएं ही न हों और अध्यापक उन्हें पढाएं ही नहीं, और न ही विद्यार्थी पुस्तकें पढ़ें! स्वयं को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि हम तो बल्कि चाहते हैं कि विद्यार्थियों का लगातार परीक्षण होता रहे, न केवल उस एक परीक्षा में! विद्यार्थी केवल अपनी उन पाठ्य पुस्तकों और कक्षा की चारदीवारी में ही न फंसा रहे. बल्कि उस चारदीवारी के बाहर झांक कर वह दुनिया देखे और पाठ्य पुस्तकों के अलावा भी अन्य पुस्तकें पढ़े. उस के मूल्यांकन अध्यापक केवल उस एक अंतिम परीक्षा से न कर के निरंतर पूरा वर्ष उस से संपर्क में रह कर करते रहें! यही तो पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कहा था और हम तो जवाहरलाल नेहरु के पद-चिह्नों पर चल रहे हैं!
उन्होंने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि भारत में 37 भाषाओँ में लाखों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं और अकेले अंग्रेजी में ही भारत विश्व में अंग्रेजी पुस्तकें प्रकाशित करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर है.

एक महत्वपूर्ण अवलोकन

स्कूली शिक्षा के बाद अचानक उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि आज प्रौद्योगिकी तथा इलेक्ट्रोनिक्स में क्रांति आई हुई है पर उन्हें डर है कि विधार्थी तो अब e-books की ओर उन्मुख होंगे और पुस्तकें खरीदेंगे ही नहीं, जो कि एक चिंताजनक बात होगी. स्वयं अपना उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि वे प्रतिमाह पुस्तकों की दुकान पर जाते हैं तथा विश्व भर की नई पुरानी पुस्तकों के शीर्षक जांच कर घर लौटते हैं तो हाथों में कई नई और महत्वपूर्ण पुस्तकें होती हैं. एक प्रकार से उन्होंने पुस्तक की सत्ता को दूरदर्शन व कम्प्युटर के आगे झुकने न देने की ओर संकेत दिए.
उन्होंने यह भी कहा कि आज हर कोई शिक्षा लेते समय या पढते समय यही देखटा है कि उसे कितना पैसा मिलेगा. पर ज़रूरत इस बात की है कि आज हमें एक सेकूलर सहनशील वातावरण की ज़रूरत है. कपिल सिब्बल के समग्र भाषण को देखा जाए तो उपस्थित श्रोताओं के लिए ही नहीं वरन मंच पर उपस्थित विद्वानगण के लिए भी सोचने को काफी कुछ महत्वपूर्ण था और यदि समाज का चिंतन सही धारा में बढ़ा तो नई सोच के इस मसीहा का कार्यकाल एक सफल कार्यकाल माना जाएगा.


(टिकट खरीदने के लिए लाइन में खड़े आगंतुक)



(मेला में हिन्द-युग्म का स्टॉल और हिन्द-युग्म के कार्यकर्ता)

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला
फोटो- शमशेर अहमद खान

Saturday, January 9, 2010

‘आनंदम’ गतिविधियों में एक नया पृष्ठ – ‘विचार-गोष्ठी’



जगदीश रावतानी की साहित्यिक व संगीत संस्था ‘आनंदम’ की दिसंबर 2009 की गोष्ठी में एक निर्णय यह भी लिया गया था कि वर्ष 2010 से ‘आनंदम’ संस्था प्रतिमाह की काव्य-गोष्ठियों के अतिरिक्त किसी भी ज्वलंत विषय से जुडी एक ‘विचार-गोष्ठी’भी आयोजित करेगी. दि. 3 जनवरी 2010 की गोष्ठी में ‘आनंदम’ के उक्त निर्णय के कार्यान्वयन का शुभारंभ जगदीश रावतानी के पश्चिम विहार स्थित निवास पर किया गया.

इस गोष्ठी में प्रेमचंद सहजवाला ने अपनी अप्रकाशित अंग्रेज़ी पुस्तक ‘Hinduism- Through Modern Perception’ के प्रथम दो अध्याय पढ़े. गोष्ठी में सर्वश्री जगदीश रावतानी (अध्यक्ष), डॉ. विजय, मनमोहन तालिब, भूपेंद्र, मुनव्वर सरहदी, धरमदासानी तथा सैलेश सक्सेना ने भाग लिया.

पुस्तक के प्रथम अध्याय के प्रारंभ में ही प्रेमचंद सहजवाला ने प्रसिद्ध इतिहासकार बी.आर.नंदा की इतिहास पुस्तक ‘The Making of a Nation’ से एक बहुत रोचक प्रसंग पढ़ा. इस प्रसंग के अनुसार एक ब्रिटिश ICS अधिकारी एच.एक.किश्क ने उन्नीसवीं शताब्दी के अपने यात्रा वृतांतों में उन तीर्थ यात्रियों का वर्णन किया है जो बहुत हास्यास्पद तरीके से लखनऊ से उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिरों तक जा रहे थे. वे सब न तो रेलगाड़ी से जा रहे थे न बस से, न हवाई जहाज़ से न पैदल. वे सब अपनी जगह पर खड़े होने के बाद ज़मीन पर लेट जाते तथा अपने हाथ आगे को खोल कर कुल 8 फुट ज़मीन नाप लेते. फिर खड़े हो कर अगले 8 फुट पर लेट जाते और इस प्रकार लखनऊ से जगन्नाथ पुरी तक का फासला केवल लेट लेट कर पूरा करते. 8 फुट प्रति बार के हिसाब से वे 660 बार लेट कर दिन भर में 4 मील तय करते और इस प्रकार लगभग डेढ-दो वर्ष में जगन्नाथ पहुँच जाते. लेखक सहजवाला ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष ‘छठ पूजा’ के अवसर पर दिल्ली की यमुना नदी के किनारे कुछ नौजवानों को इसी प्रकार लेट लेट कर काफी फासले से नदी के किनारे तक आते देखा था.

इस अध्याय में उन्होंने पारंपरिक हिंदू समाज के पिछड़ेपन की और संकेत करते इतिहास के एक अन्य प्रसंग को भी पढ़ा. सन 1960 के ‘हिंदू अधिनियम’ के अनुसार कोई भी हिंदू बालिका यदि बचपन में ही विवाह कर लेती है तो उस का पति तब तक उस के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं रख सकता जब तक वह 10 वर्ष की न हो गई हो. परन्तु कुछ 10 वर्षीय बालिकाएं इस प्रकार सेक्स की प्रक्रिया को न सह कर मर गई तो देश के अनेक सुधारकों ने इस न्यूनतम आयु को बढ़ाने का अभियान चलाया जो दो दशक से अधिक समय तक चला. आखिर सन् 1891 में ब्रिटिश ने भारत के सुधारकों की मांग पर एक नया विधेयक पारित किया – ‘The Age of Consent Bill – 1891’. सहजवाला ने बताया कि इस विधेयक के पारित होते ही देश के पुरातनपंथी रूढ़िवादी लोग बौखला गए और इस के सब से बड़े विरोधी थे लोकमान्य तिलक. कलकत्ता में ऐसे, शास्त्रों की लकीर की फकीरी करने वाले पोंगा पंडितों ने दो लाख लोगों की एक रैली निकाली जिसमें नारे लगाए गए – ‘महारानी, हमारा धर्म बचाओ, महारानी हमारे शास्त्र बचाओ’. यह निर्णय भी लिया गया कि एक प्रतिनिधि मंडल इंग्लैंड जा कर महारानी से आग्रह करेगा कि ऐसा शास्त्र-विरोधी विधेयक वापस लिया जाए.

पूना में ऐसे दकियानूसी लोगों के कोप का भाजन बने प्रसिद्ध सुधारक गोपाल गणेश अगरकर जिनका पुतला बनाया गया. पुतले के एक हाथ में उबला हुआ अंडा और दूसरे में व्हिस्की की बोतल पकड़ा दी गई और उन्हें अंग्रेज़ियत का पिट्ठू घोषित किया गया. फिर पूरे पूना शहर में घुमाने के बाद पुतले का दाह-संस्कार किया गया.

इन अध्यायों में सहजवाला ने हिंदू समाज के सब से बड़े अभिशाप यानी जाति-प्रथा पर खूब प्रहार किये. उन्होंने केरल के उन बदनसीब दलितों के प्रसंग लिया जिन्हें देख कर स्वामी विवेकानंद ने केरल राज्य को ही एक ‘मानसिक हस्पताल’ घोषित कर दिया. लेख में बताया गया कि पिछली शताब्दी में केरल की दलित जातियों को कमर से ऊपर कपड़ा पहनने तक का अधिकार नहीं था. उनकी महिलाऐं भी केवल कमर के नीचे का कपड़ा यानी पेट्टीकोट आदि पहन सकती थी पर कमर से ऊपर का बदन निर्वस्त्र होने के कारण घर से निकल तक नहीं पाती थी. आखिर कुछ ईसाई मिशनरियों की मदद से वहाँ के दलितों ने अपनी महिलाओं के लिए ‘Upper Cloth Agitation’ यानी ‘ऊपरी-वस्त्र आन्दोलन’ किये और सफल हुए. ईसाई मिशनरियों के अलावा वामपंथी दलों की सहायता से अंततः एक समय ऐसा भी आया कि साक्षरता में केरल प्रदेश पूरे देश का अग्रणी प्रदेश बना.

दूसरे अध्याय में ‘मनु-स्मृति’ का ज़िक्र भी है जिस में सहजवाला ने बताया कि मनु ने अकेले हिंदू समाज का वह संविधान नहीं लिखा था, वरन तात्कालीन क्षत्रिय राजाओं की मनमानी व प्रजा के संचालन के तरीकों के अनुसार उन्होंने ने हिंदू समाज का संविधान बनाया. उस पर तुर्रा यह कि मनु ने उस संविधान पर ईश्वर की मोहर लगा दी कि यह सारा संविधान उन्हें परम पूजानीय परमात्मा ने लिखवाया है. परमात्मा का ठप्पा लगते ही संविधान स्वयमेव पवित्र ग्रंथों की श्रेणी में आ गया. इस संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जीवन भर में ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम व सन्यासाश्रम का पालन करेगा. परन्तु ब्रह्मचर्याश्रम में लड़कियों की शिक्षा का कोई ज़िक्र नहीं तथा वानप्रस्थाश्रम में कोई भी साठ वर्षीय व्यक्ति वनों में जा कर झोंपड़ी में रहेगा और शास्त्राध्ययन करता रहेगा, जब कि उस की पत्नी का कोई उल्लेख उस में नहीं है. क्या पत्नी अपनी संतान पर आश्रित रहेगी? साथ ही मनु-स्मृति के कई अमानवीय प्रावधानों के ज़िक्र करते हुए सहजवाला ने बताया कि यदि कोई ब्राह्मण किसी दलित महिला से शादी करता भी है तो वह उसे अपने घर, यानी ससुराल में नहीं लाएगा. वह मायके में ही रहेगी और जब कभी ब्राह्मण को उस के साथ रात बितानी होगी तो वह अपना खाना व पीने का पानी तक अपने घर से ले जाएगा. पत्नी के साथ सम्भोग से पहले वह पूरे शरीर को घी से मलेगा और इस पर भी तुर्रा यह कि उस दलित पत्नी से जो संतान होगी, उसे ब्राह्मण पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार न रहेगा!

यदि शूद्र ने ब्राह्मण को गाली दे दी तो दंड-स्वरुप उसे अपनी जिव्हा पर जलता हुआ लोहा रखना पड़ेगा तथा यदि शूद्र ने ब्राह्मण को लात मार दी तो उस का पांव काट दिया जाएगा और थप्पड़ मारा तो हाथ. यदि दलित किसी ब्रह्मिण महिला का बलात्कार करेगा तो सज़ाए-मौत और यदि इस से उलट ब्राह्मण किसी दलित महिला का बलात्कार करेगा तो केवल कुछ धन-राशि दंड-स्वरुप देने से ही न्याय हो गया समझो.

क्योंकि लेखक अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद हिंदू समाज की सर्वाधिक कुत्सित प्रथाओं पर प्रहार कर रहे थे, इसलिए गोष्ठी के अंत में खूब गर्मा-गर्म चर्चा चली. धरमदासानी ने सीधा सवाल पूछा कि कभी आप तीर्थ-यात्रियों की बात करते हैं, कभी जाति-प्रथा की तो कभी बाबा साहेब आम्बेडकर की, आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? सहजवाला ने बताया कि क्यों कि उन्होंने पुस्तक के आठ अध्यायों में से केवल दो ही पढ़े, अतः पूरी पुस्तक के पढ़े जाने पर यही पता चलेगा कि वे हिंदू समाज की असामान्यताओं का पर्दा-फाश कर रहे हैं तथा अमानवीय प्रथाओं यथा सती प्रथा आदि पर समाज के बुद्धिजीवियों को आड़े हाथों ले रहे हैं. डॉ. विजय ने पूछा कि आप Hinduism को कैसे परिभाषित करते हैं? सहजवाला ने बताया कि Hinduism को Way of Life कर के परिभाषित किया गया है, जिस में विवाह के अनेक प्रकारों में से ‘राक्षस विवाह’ भी था जिस के अनुसार कोई क्षत्रिय किसी भी लड़की का अपहरण कर सकता है और यदि किसी की हिम्मत हो तो युद्ध कर के अपहृत लड़की को बचा ले. क्षत्रिय युद्ध जीतने पर अपहृत लड़की से ज़बरदस्ती विवाह कर सकता है. उदहारण के तौर पर उन्होंने भीष्म पितामह का प्रसंग लिया जिन्होंने तीन राजकुमारियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण उनके राज-महल में हो रहे स्वयम्वर से ही कर लिया था. राक्षस विवाह का सन्दर्भ दे कर भीष्म पितामह ने कहा था कि इस प्रकार अपहरण करना ‘मनु-स्मृति’ के अनुसार जायज़ था. परन्तु सहजवाला ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरु जैसे विचारकों ने Live and Let Live को Hinduism परिभाषा कर के माना है. मनमोहन तालिब ने सहजवाला से सीधा प्रश्न किया कि क्या आप Hinduism में सचमुच विश्वास करते हैं? सहजवाला ने कहा कि वे पहचान से हिंदू हैं, पर हृदय से वे वास्तव में Buddhist हैं और गौतम बुद्ध की सरल शिक्षाओं में अधिक विश्वास करते हैं. बहस के अंत में ‘आनंदम’ अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने कहा कि धर्म रूपी पहचान ने व्यक्ति और देश को बहुत नुकसान पहुँचाया है. हमें चाहिए के हम अपनी पहचान एक इंसान के रूप में दें, न कि राष्ट्र या धर्म के रूप में . उनकी इस बात से सभी सहमत थे अंत में उन्होंने इसी सन्दर्भ में अपना एक ताज़ा शेर सुनाया:

ज़रूरत नहीं मंदिरों मस्जिदों की,
मैं इंसान में ही खुदा चाहता हूँ.

इस पर खूब तालियाँ बजी और धन्यवाद प्रस्ताव के साथ गोष्ठी संपन्न हुई.

रिपोर्ट- ‘आनंदम’ रिपोर्ट विभाग

Monday, December 14, 2009

भारत को अभी भगत सिंह वाली आज़ादी नहीं मिली है- प्रो॰ चमन लाल

भगत सिंह पर चर्चा और प्रेमचंद सहजवाला की पुस्तक का लोकार्पण सम्पन्न


पुस्तक का अनावरण करते भारत भारद्वाज, प्रो॰ चमन लाल, विभूति नारायण राय, हिंमाशु जोशी, साथ में खड़े हैं लेखक प्रेमचंद सहजवाला

नई दिल्ली । 12 नवम्बर
हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक 'भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने' का विमोचन-कार्यक्रम आयोजित किया। पुस्तक का विमोचन प्रसिद्ध साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायाण राय ने किया। इस कार्यक्रम में भगत सिंह विषय के घोषित विशेषज्ञ प्रो॰ चमन लाल, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज ने 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में अपने-अपने विचार रखे।

उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया से पहली ऐसी पुस्तक है जो किसी खास विषय पर केन्द्रित है और पहले ब्लॉग पर सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित है। इस पुस्तक के सभी 13 अध्याय पहले हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हैं, जिनमें भगत सिंह के जीवन, जीवन दर्शन और गाँधी के साथ इनके मतांतर को रेखाकिंत किया गया है। प्रेमचंद सहजवाला ने इसे पुस्तक रूप देने से पहले सभी अध्यायों को संशोधित और परिवर्धित भी किया है।

प्रेमचंद सहजवाला ने बताया कि उन्होंने किस तरह से भगत सिंह पर कलम चलाने का विचार बनाया। प्रेमचंद ने कहा कि 1990 में भारत में हुए कई राजनैतिक-धार्मिक और साम्प्रादायिक उथल-पुथल ने उन्हें कथा-कहानियों से अलग भारतीय इतिहास को परखने के लिए प्रेरित किया। प्राचीन भारतीय इतिहास से होते-होते ये आधुनिक भारतीय इतिहास तक पहुँचे और गाँधी-नेहरू-भगत सिंह की शौर्यगाथा में उलझ गये और यह खँगालने की कोशिश करने लगे कि भगत सिंह आखिर क्या हैं!

हिन्द-युग्म ने विमोचन कार्यक्रम के साथ 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर एक गोष्ठी भी आयोजित किया था, जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष और भगत सिंह से संबंधित कई पुस्तकों और दस्तावेज़ों के संपादक प्रो॰ चमन लाल, मशहूर कथाकर हिमांशु जोशी, पुस्तक-वार्ता के संपादक और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज और इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विभूति नारायण राय अपने-अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किये गये थे।

इस विषय पर सबसे पहले हिमांशु जोशी ने अपने विचार रखे। हिमांशु जी ने बताया कि आज़ादी हमें तीन तरह से मिल सकती थीं- गाँधी जी के तरीके से, दूसरा भगत सिंह-चंद्रशेखर आज़ाद का और तीसरा सैन्य विद्रोह यानी सुभाष चंद्र बोस से। ये तीनों शक्तियाँ मिली और भारत आज़ाद हो गया। इन्होंने आगे कहा कि भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे बल्कि एक क्रांतिदर्शी थे।

भारत भारद्वाज ने इस बात का खुलासा किया कि एक बलिदानी ने भगत सिंह के लिए अपनी कुर्बानी दी। भगत सिंह के खिलाफ इकबालिया गवाही देने वाले फणीन्द्रनाथ घोष को मारने वाले बैकुंठ शुक्ल को फाँसी दी गई थी।

मुख्य अतिथि विभूति नारायण ने कहा कि भगत सिंह होना एक खास तरह का सपना देखना है। भगत सिंह केवल उत्साही, भावुक या देशभक्त किस्म के युवा नहीं थे, बल्कि भगत सिंह एक दर्शन, एक विचार का नाम है। सहजवाला जी ने इस पुस्तक को लिखकर हिन्दी में एक कमी को पूरा किया है। सहजवाला जी ने बहुत से किताबों में बिखरे पड़े तथ्यों और बातों को एक जिल्द में समेटा है।

इसके बाद कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो॰ चमन लाल को संचालक प्रमोद कुमार तिवारी जी ने आवाज़ दी। प्रो॰ चमन लाल ने लगभग 55 मिनटों में अपनी बात रखी। चमन लाल ने कहा कि भगत सिंह के जीवन के अनेक पहलू हैं, जिनपर हम घंटों बात कर सकते हैं। इनके वक्तव्य की कुछ मुख्य बातें-

1)भगत सिंह ने 5 साल से लेकर साढ़े 23 साल की उम्र तक (लगभग 18 वर्ष तक) पूरी तरह से सजग और चैतन्य इंसान की तरह जिया।
2) भगतसिंह का ताल्लुक पूरी तरह से वहाँ से रहा है जो आज पाकिस्तान में है।
3) 1922 में जिस चंद्रशेखर आज़ाद ने 'महात्मा गाँधी की जय' कह-कह कर अपनी पीठ पर 30 बेंत खाये थे और ऊफ तक नहीं की थी, भगत सिंह के साथ सत्याग्रह आंदोलन से इसलिए नाता तोड़ लिया था क्योंकि गाँधी जी ने 22 पुलिस वालों की मौत से अचानक अपना आंदोलन वापिस ले लिया था।
4)भगत सिंह के लिए देश का मतलब देश की मिट्टी से, इसके शहर-गाँव से नहीं था, बल्कि देश की जनता से था। इसीलिए भगत सिंह मानते थे कि देश पर चाहे कालों का राज रहे या गोरों का, जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक भारत की हालत में सुधार नहीं होगा। भगत सिंह पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें सबसे पहले सामाजिक चेतना जागी थी। इनसे पहले के क्रांतिकारी 'भारत माता की जय' तक सीमित थी।
5) गाँधी जी का रास्ता अंग्रेजों को बहुत अच्छा लगता था, क्योंकि गाँधी जी अंग्रेजों के शोषण को खत्म करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहे थे। अंग्रेज़ों को मालूम था कि यदि भगत सिंह ज़िंदा रहा, या भगत सिंह का विचार ज़िंदा रहा तो यहाँ की जनता हमसे शोषण का हिसाब माँगेंगी। इसीलिए अंग्रेजों ने भारत को विभाजन का रास्ता का दिखाया। विभाजन का फायदा अंग्रेजों को हुआ, अमेरिका को हुआ। विभाजन का जिम्मेदार जिन्ना नहीं था। विभाजन का जिम्मेदार ब्रिटिश थी। यह अंग्रेज़ों की चाल थी। जिन्ना को अकेले दोष देना एक अंधराष्ट्रभक्त है। नेहरू, पटेल सभी जिम्मेदार थे। गाँधी कुछ हद जिम्मेदार इसलिए भी हैं क्योंकि इन्होंने उस समय कुछ नहीं बोला जब उन्हें बोलना चाहिए था। गाँधी यदि पटेल-नेहरू की सत्तालोलुपता को समझकर विभाजन को रोक लेते तो आज जितने महान हैं, उससे अधिक महान होते।
6) भगत सिंह ने एक महान काम यह भी किया कि सबकुछ अपनी डायरी में लिखकर रखा। जिससे आज भगत सिंह के वास्तविक दस्तावेज और असलियत हमारे सामने है। भगत ने फाँसी से मरने से पहले भी लिखा कि मेरे मरने के बाद क्या करना है। भगत सिंह पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जो कहता था कि देश को आज़ाद होने के लिए मेरा मरना ज़रूरी है। भगत सिंह ने अपनी फाँसी खुद चुनी थी।
7) भगत सिंह 'बम-बारूद' के खिलाफ थे। वे कहते थे कि यदि पुलिस जनता पर प्रहार नहीं करेगी, तो जनता पर भी उन पर पत्थर नहीं फेंकेगी, पुलिस-स्टेशन को बम से नहीं उड़ायेगी। वॉयलेंस की शुरूआत हमेशा पुलिस/स्टेट/ब्रिटिश करती थी।
8) गाँधी जी और भगत सिंह की आज़ादी का फर्क यह है कि 1861 में अंग्रेज़ों का बना क़ानून आज भी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में लागू है। भगत सिंह वाली आज़ादी हमें मिली होती तो कोई भी स्वाभिमानी देश कॉलोनियल क़ानून 1 दिन भी लागू नहीं रहने देता। 15 अगस्त 1947 से 1 दिन भी आगे भी ये कानून नहीं चलते।
9) हिन्दुस्तान में सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर लिखी गई हैं। 350 से अधिक किताबें जिनकी सूची मैं बना रहा हूँ, इनमें से पौने 200 से भी अधिक किताबें हिन्दी में है। भारत की लगभग हर भाषा में भगत सिंह के ऊपर किताबें हैं। हिन्दुस्तान में गाँधी और नेहरू को छोड़कर शायद ही कोई और नेशनल लीडर हो, जिनपर भारत की हर भाषा में किताबें हों।
10) सिंधी के मशहूर कवि शेख़ हयाज़ ने भगत सिंह पर सिंधी में काव्य-नाटक लिखा।
11) अंग्रेज़ों ने सबसे अधिक किताबें भगत सिंह पर बैन की।

इसके बाद आनंदम् संस्था के प्रमुख जगदीश रावतानी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद किया। मंच का संचालन युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी ने किया।

कार्यक्रम में अल्का सिंहा, युवा कवयित्री सुनीता चोटिया, हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी, वरिष्ठ कवि मुनव्वर सरहदी, वरिष्ठ शायर मनमोहन तालिब, परिचय-संस्था की प्रमुख उर्मिल सत्यभूषण, इस कार्यक्रम के संयोजक और युवा कवि रामजी यादव, कवि-लेखक रंजीत वर्मा, कामरेड पीके साही, सपर-प्रमख राकेश कुमार सिंह, कवयित्री ममता किरण इत्यादि उपस्थित थे।


जो लोग इस कार्यक्रम में किसी कारणवश उपस्थित नहीं हो पाये थे, वे नीचे के प्लेयर से पूरा कार्यक्रम सुन सकते हैं।

यदि आप उपर्युक्त प्लेयर से ठीक तरह से नहीं सुन पा रहे हैं या अपनी सुविधानुसार सुनना चाहते हैं तो यहाँ से डाउनलोड कर लें।


अन्य झलकियाँ-


सभागार के प्रवेश द्वार पर मुख्य अतिथि का स्वागत


दीप प्रज्ज्वलन के वक़्त प्रेमचंद सहजवाला के साथ हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी


उपस्थित श्रोतागण


अपने विचार रखते पुस्तक के लेखक प्रेमचंद सहजवाला


मुख्य अतिथि को स्मृति-चिह्न भेंट करते शैलेश भारतवासी


प्रो॰ चमन लाल को स्मृति-चिह्न भेंट करते कार्यक्रम के संयोजक रामजी यादव


हिमांशु जोशी को स्मृति-चिह्न भेंट करतीं अलका सिंहा


भारत भारद्वाज को स्मृति-चिह्न भेंट करतीं अनुराधा शर्मा


श्रोताओं से मुख़ातिब मुख्य अतिथि


अपना वक्तव्य पेश करते प्रो॰ चमन लाल


ईटीवी न्यूज से पुस्तक के बारे में बात करते प्रो॰ चमन लाल