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Friday, December 25, 2009

मेरी पसंदीदा कविताएँ– ममता किरण की सशक्त प्रस्तुति

Indian Society of Authors हर महीने के तृतीय शुक्रवार को India International Centre के Dining hall में ‘मेरी पसंददीदा कविताएँ’ शीर्षक से एक गोष्ठी करती है, जिस में मंच से कोई प्रसिद्ध कवि अन्य कवियों द्वारा रचित अपनी मनपसंद कविताएँ प्रस्तुत करता है. दि. 18 दिसंबर 2009 की गोष्ठी Indian Society of Authors की एक यादगार गोष्ठी थी जिस में प्रसिद्ध कवियत्री ममता किरण ने अपने अध्ययन के आधार पर विश्व भर के कवियों की हिंदी में अनूदित रचनाओं में से अपनी पसंदीदा रचनाएँ प्रस्तुत की. इस गोष्ठी की अध्यक्षता पूर्व सांसद व कवि उदय प्रताप सिंह ने की तथा हिंदी के प्रकाशक कवि विश्वनाथ इस गोष्ठी के मुख्य अतिथि रहे. मंच पर अन्य विशिष्ट अतिथि के रूप में थे ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक कवि दिनेश मिश्र तथा प्रसिद्ध हिन्दीसेवी डॉ. कुसुम वीर.

ममता किरण ने विश्व भर के लगभग 36 सशक्त हस्ताक्षर प्रस्तुत किये जिनमें अमरीका के वाल्ट व्हिटमैन व ब्रायन टर्नर, पुर्तगाल के फर्नांडो पेसोवा, गुयाना के मार्टिन कार्टर व लीबिया के इदरीस मुहम्मद तैय्यब के अतिरिक्त पोलैंड के कई कवि व भारत से पंजाबी, डोगरी, बांग्ला, बोडो और हिंदी-उर्दू के सर्वप्रिय हस्ताक्षर यथा गोपालदास नीरज, गुलज़ार, निदा फाज़ली, बशीर बद्र, दुष्यंत कुमार, कुंवर नारायण, ज्ञानेंद्र पति, नरेश सक्सेना, लीलाधर मंडलोई, विष्णु नगर, सुनीता जैन, राजेंद्र नाथ रहबर, कन्हैयालाल वाजपेयी आदि सम्मिलित थे.



गुयाना के कवि मार्टिन कार्टर जो अपने देश के स्वाधीनता संघर्ष से जुड़े रहे, की कविता ‘जेल की कोठरी’ आज प्रस्तुत सशक्त-तम कविताओं में से एक रही. इस की कुछ पंक्तियाँ:

हाँ/ वह दिन आग की लपटों की तरह/ पूरी दुनिया को भर देगा/अपनी आगोश में/ लाएगा उजियारा/ आलोकित हो उठेगा धरती का कण कण/ऐसा होगा जब/तब एक बार फिर/उठ कर खड़ा हो जाऊँगा मैं/और अट्ठाहस करता निकल जाऊंगा/ बाहर इस कैदखाने से (अनुवाद अक्षय कुमार).

लीबिया के कवि इदरीस मुहम्मद तैय्यब की छंद-मुक्त कविता की कुछ सशक्त पंक्तियाँ:

कुछ महीने पहले/महसूस हुआ/कि जिंदगी मेरे साथ समझौता कर रही है/ मुझे नहीं मालूम था/ कि नियति गुप्त रूप से हंस रही थी मुझ पर/अपने अगले वार की तैयारी करते हुए (अनुवाद इन्दुकांत आंगरीस).

उक्त दोनों विदेशी कविताओं से एक अह्सास बहुत शिद्दत से होना स्वाभाविक था कि मानव-मन कदाचित दुनिया के हर कोने में एक सा है. जीवन-शैली में ज़मीन-आसमान का फर्क हो, देश-काल के अनुसार घटना-दुर्घटना के रूप बदलते रहें, लेकिन अहसास अपने शाश्वत, सार्वभौमिक रूप में वही का वही, जैसे समुद्र का पानी वही का वही, पहाड़ का ठोसत्व वही की वही, और मौसम के रंग भी वही के वही. उक्त दोनों कविताएँ भिन्न विषयों पर हैं, फिर भी एक सार्वभौमिक मानव-मन से साक्षात्कार कराती हैं, जिन में अगर पंजाबी कवियत्री अमृता प्रीतम की निम्न पंक्तियाँ जोड़ें तो लगे कि पूरी मानव जाति आपस में जुड कर बेहद अलौकिक रूप से एक ही पदार्थ में बदल गई है:

मैं तुझे फिर मिलूंगी/ कहाँ किस तरह, पता नहीं/शायद तेरे तखय्युल की चिंगारी बन/ तेरे कैनवास पर उतरूंगी/...मैं और कुछ नहीं जानती/ पर इतना जानती हूँ/ कि वक्त जो भी करेगा/ यह जनम मेरे साथ चलेगा/यह जिस्म खत्म होता है/ तो सब कुछ खत्म हो जाता है/पर चेतना के धागे/ कायनात के कण होते हैं/ मैं उन कणों को चुनूंगी/मैं तुझे फिर मिलूंगी.

ममता किरण अपनी रचनाओं की प्रभावशाली प्रस्तुति के लिए जानी-मानी कवियत्री हैं और अपनी उसी छवि को बनाए रख कर उन्होंने सभागार में उपस्थित कई विशिष्टजनों यथा उद्योगपति काशीनाथ मेमानी, फ़िल्मकार लवलीन थधानी, कमला सिंघवी, पद्मश्री सुनीता जैन, डॉ. गंगाप्रसाद विमल, अजित कुमार, वीरेंद्र सक्सेना तथा ‘देशबंधु’ पत्र के संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव आदि को मन्त्र-मुग्ध सा बांधे रखा.

ममता किरण का एक प्रिय विषय माँ और उस से जुडी संवेदनाएं भी है, सो न्यू यार्क की हुमेरा रहमान की निम्न पंक्तियाँ भी उनकी ही संवेदनशील चयन दृष्टि का परिणाम हो सकती हैं:

वो एक लम्हा जब मेरे बच्चे ने माँ कहा मुझ को/ मैं एक शाख से कितना घना दरख़्त हुई.

और मुनव्वर राणा का यह शेर:

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है


मानवीय संवेदनाओं से अस्तित्व तथा रोज़ी-रोटी भी शायद अभिन्न रूप से जुड़े हैं, यह मैराज़ फैज़ाबादी के निम्नलिखित शेर से स्पष्ट है:

जिंदा रखे है मुझे मेरी ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
.

कविता-प्रेमी जानते हैं कि कविता को उस के असंख्य विषयों को एक ही थाल में सजाने से ही सम्पूर्णता प्राप्त होती है, सो उक्त रंगों में आत्माभिव्यक्ति पर बशीर बद्र का यह दो टूक शेर जोड़ कर पढ़िए:

मुखालिफत से मेरी शख्सियत संवरती है
मैं दुश्मनों का बहुत एहतिराम करता हूँ


या कृष्ण बिहारी नूर का यह शेर:

हज़ार गम सही दिल में मगर खुशी तो है
हमारे होंठों पे मांगी हुई हंसी तो नहीं


देश के माहौल से भी कविता भला कैसे विलग हो सकती है. इस के केवल दो उदहारण काफी हैं:

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए


यह बताना तक ज़रूरी नहीं लगता कि ऐसी अमर पंक्तियाँ हिंदी गज़ल पढ़ने वालों के दिलों की धड़कन दुष्यंत कुमार ने रची हैं.

और रसूल अहमद सागर का यह शेर:

मंदिरों से मस्जिदों तक का सफर कुछ भी न था
बस हमारे ही दिलों में दूरियां रख दी गई


कुल मिला कर आज की शाम कविताओं, गज़लों, दोहों व नज़्मों के एक नायाब से गुलदस्ते सी लगी जिस में ममता किरण की चयन-दृष्टि की उत्कृष्टता का पूरा योगदान रहा.

रिपोर्ट – Indian Society of Authors रिपोर्ट विभाग

Friday, December 18, 2009

साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित साहित्य मंच से अनुभूति की कविताओं की बारिश

----अनुभूति की काव्य शृंखला से श्रोतागण मुग्ध-----

4 दिसंबर 2009 । नई दिल्ली
साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान २ दिसंबर को रविन्द्र भवन प्रांगण में कवियों ने कविताओं की बारिश की। इस काव्यपाठ में गगन गिल(हिन्दी), अनुभूति चतुर्वेदी (हिन्दी), शाहीना खान (अंग्रेजी), नुसरत जहीर(उर्दू) ने भाग लिया। गगनजी की "थोड़ी सी उम्मीद चाहिये" ,शाहीना खान की मानवाधिकार पर अंग्रेजी कविता तथा नुसरत जहीद की गजल और नज्म "शाखों पर दरख्तों को कुर्बान नहीं करते" , "ख्वाबों में ही कुछ शक्ल आए तो आ जाए", " "मोहब्बत अब नही होगी" को सराहना मिली।

सबसे अंत में हिन्दी कवयित्री अनुभूति चतुर्वेदी की कविताओं ने ऐसा समा बाँधा कि श्रोतागण भावविभोर हो गए। अनुभूति ने कहा कि मैं ऐसी कविता सुनाऊँगी जो गरमी पैदा कर दे। उनकी कविता "वर्तमान राजनीति के संदर्भ में"-

"बरगद उग आए हैं /पूरे शहर को ढक लिया है/बर्षों से जी रहे हैं /फिर भी जीना चहते हैं और /जडें पाताल तक पहुँच गई हैं /डालें लटक गई हैं झुककर /पत्ते झड गए हैं /पीली पडती टहनियाँ /उनकी बीमारियों का खुला दस्तावेज है /न जाने कितनों ने अभी तक ,गिद्ध और चीलें पाली हुई हैं / अपनी हवस से यह ताजे उगते हरे पेडों को भी /मुरझा देना चाहते हैं / इन्हें हरी नरम पत्तियाँ /बहुत पसंद हैं/ खास तौर पर एकदम मुलायम/अभी -अभी खिली कलियाँ /कलियाँ तो क्या / पूरे शहर को ही लील जाना चाहते हैं /भूखे भेडिए।

संबंध पर यथार्थ चित्रण "पिता और उनके मित्र" कविता में ----

घर फोन किया था -पिता के स्वास्थ्य के लिए / भाभी ने बताया /थीक तो हैं लेकिन अभी भी कुछ -कुछ भूल जाते हैं / माँ भी अस्वस्थ रहती हैं -मैने पूछा/ क्या फोन आते हैं? /भाभी ने कहा ,थोडे-बहुत/ यों भी हमने फ़ोन कमरे से हटा दिया है/अच्छा किया ? / और ये फोन कम कैसे हो गए- मैंने पूछा/ भाभी बोली..../सभी ने पापा से अपने काम निकाल लिए / सारे रहस्य जान लिए मित्र बनकर/ अब उनको क्या लेना देना उनके स्वास्थ्य से / बात कितनी सही कही भाभी ने / सच है कि स्वार्थ का ही दूसरा रूप / रह गए हैं संबंध।

नए युग का विद्रूप चेहरा कुछ इस तरह प्रस्तुत किया अनुभूति ने- दस्तक:इक्कीसवीं सदी

इक्कीसवी सदी की घोषणा /किसी बिगुल से नहीं /किसी नगाडे की थाप से नहीं /केवल जलती हुइ आग / बिषैला एटमी धुआँ /बिलखते भूखंड /स्वागत करते हुए उपस्थित हुए / एक कारवाँ इंटरनेट और/ परमाणुओं का / जाल की तरह बिछ गया / युद्ध के मौके का फायदा ले / किए दनादन वार/ खत्म हुए नगर के नगर / हरी -भरी बस्तियाँ ,जंगल/ कब्रिस्तान में बदल गए / किस्मत से एक बूढा बच गया / अचरज से देखने लगा / यह सभी दृश्य / और सहसा बोल उठा ../सचमुच मैं नरक में हूँ।

अनुभूति ने विदूषक को काव्य रूप में इस तरह प्रस्तुत किया--

तेवर क्यों बदल रहे हो ?/ क्यों अपने आप को मथ रहे हो?/मथ लो तब तक / जब तक कि जड ना हो जाओ/ एक बिदूषक से लग रहे हो / इन बदलती मुद्राओं में/ अब तो मैं सभी नाटकीय मुद्राओं का / आनंद लेती हूँ ।

अपनी कविता के माध्यम से सूर्य को आगाज किया अनुभूति ने-

यह भीगी हुई चादर हटाकर /अपनी प्रचंड उष्मा के साथ सामने आओ/ हे सूर्य! /और मुझे आलिंगनबद्ध कर लो /विश्व ने कब गर्भ दिया है / किसी वसुन्धरा को / सिर्फ छला है , बाँटा है ,रौंदा है/बीघा-बीघा मूल्य ,बीघा- बीघा स्वामित्व/ ये व्यापारी , ये ग्राहक क्या मुझे प्रेम देंगे? / हे सूर्य, बाहर निकलो इन श्रावणी परदों से / और अपने प्रचंड प्रकाश में / मुझे रोम - रोम नहला दो / छुओ मुझे अपनी प्रेम उष्मा से /और पूरे विश्व के सामने /अंकुरित करो मेरे स्वप्न शिशु।

अनुभूति की कविता "बेटे के लिए"

बेटा बोलने लगा है / बात करता है इस नए संसार की / जिसे वह धीरे -धीरे समझ रहा है/ पूछता है सवाल / फ़ुटबॉल, कुश्ती, समाज, कंप्यूटर/और आतंकवाद के संबंध में / इतनी कम उम्र में वयस्कों सी बुद्धि/ क्या वह उम्र से बहुत पहले ही , सब कुछ परखना चाहता है? / उसको जबाब न देने पर / और अपनी व्यस्तताओं में / मैं भूल जाती हूँ कि वह गुस्से में तोड फोड कर / फर्श को तोड- मरोड देगा/ फौलादी बन रहा है बेटा !

अनुभूति ने "सृजन" शक्ति को अनोखे रूप में प्रस्तुत कर वाहवाही बटोरी-

हजारों खून के कतरे गिरकर/ बनते हैं शब्द/और एक खूनी नदी में / मथकर / डूबकर / होता है सृजन।

संक्षेप में कहा जाय तो अनुभूति ने अपनी कव्य प्रतिभा से सबों को प्रभावित किया क्योंकि उन्होने समसामयिक विषयों को बखूबी रूप में प्रस्तुत किया । अनुभूति चतुर्वेदी का सीधा सरोकार साहित्य और संस्कृति से रहा है। वह हिन्दी के विख्यात कवि , लेखक पद्मश्री जगदीश चतुर्वेदी की सुपुत्री हैं। अनुभूति साहित्य जगत में विगत ३० बर्षों से लिख रही हैं। उनके चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह, एक उपन्यास हैं। उनकी कृतियों पर कई राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। अपनी संस्था पल्लवी आर्ट्स के द्वारा अनेक कवि, लेखक, पत्रकार, चित्रकार, नर्तक, गायक, मूर्तिकार के कई पीढ़ियों को जोडने का काम कर रही हैं। इसके अतिरिक्त ओडिसी में पिछले 22 बर्षों से वह साधनारत हैं। अपने नृत्य का उन्होने देश-विदेश में सफल प्रदर्शन किया है। इराक के बेबिलोन सम्मेलन में चित्रकार,कवियों को लेकर वह भरत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। लंदन में दो बार भारत के साहित्य, संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है।

--------गोपाल प्रसाद
संपादक, समय दर्पण
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