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Thursday, April 1, 2010

विराट का कविता संग्रह और विजयशंकर चतुर्वेदी का एकल काव्य-पाठ



मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् की साहित्य अकादमी के द्वारा संचालित पाठक मंच सतना की मासिक गोष्ठी पिछले दिनों वरिष्ठ कवि चंद्रसेन विराट के कविता संग्रह 'चुटकी चुटकी चांदनी' को केंद्र में रखकर आयोजित की गयी. इस अवसर पर मुंबई से पधारे युवा कवि विजयशंकर चतुर्वेदी का विशेष काव्य पाठ भी आयोजित किया गया. बता दें कि विजयशंकर का पहला कविता संग्रह 'पृथ्वी के लिए तो रुको' राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से पिछले दिनों छपा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद डॉक्टर एआर तिवारी ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी उपस्थित थे. गोष्ठी का संयोजन सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं एडवोकेट संतोष खरे ने किया.

चंद्रसेन विराट के उक्त कविता संग्रह पर राय व्यक्त करने के लिए नगर के कई प्रमुख साहित्यकार एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे. युवा समीक्षक अनिल अयान ने विराट के कविता संग्रह पर एक आलेख प्रस्तुत किया जिसे काफी सराहा गया. चर्चा को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर अजय तिवारी ने कहा कि चंद्रसेन विराट अपने दोहों के माध्यम से आधुनिक विचार, बाज़ारवाद तथा कई सामाजिक चित्र उपस्थित करते हैं. आर के श्रीवास्तव का कहना था कि विराट ने कविवर बिहारी से शिष्यत्व तो लिया है लेकिन उस ऊंचाई तक अभी नहीं पहुँच सके हैं. चिंतामणि मिश्र ने राय दी कि कवि ने परम्परा से हट कर दोहे लिखे हैं लेकिन ये अनायास नहीं बल्कि सायास लिखे गए दोहे लगते हैं. इस गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुदामा शरद, निरंजन शर्मा, मुकुल दुबे तथा वरिष्ठ लेखक रामदास गर्ग, विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव, मोहनलाल वर्मा 'मुकुट', डॉक्टर राजन चौरसिया, भरत कुमार जैन, एमएल रैकवार, रामशैल गर्ग एवं ठाकुर खिलवानी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही.

इस अवसर पर विनोद पयासी ने नोट किया कि प्राचीन कवियों के दोहे सामान्य जनता को मौखिक याद रहते थे जबकि विराट के दोहों में वह शक्ति नज़र नहीं आती. डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी का आक्षेप था कि विराट के दोहे लिखने के लिए लिखे गए प्रतीत होते हैं. डॉक्टर त्रिपाठी ने जोड़ा कि यद्यपि कवि के लिए कोई भी विषय वर्जित नहीं होता तथापि समाज को देखने और उसे पकड़ने की क्षमता का अपना महत्त्व होता है और ऐसा ही काव्य स्थायी प्रभाव डालता है. गोष्ठी के अध्यक्ष डॉक्टर आर के तिवारी ने दोहा का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत करते हुए विराट के संग्रह की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें जहां तुलसी की भक्ति भावना देखने को मिलती है वहीं ऋषि अगस्त के पात्र के सामान समस्त को समेट लेने की क्षमता और ललक दिखाई देती है.

गोष्ठी के दूसरे चरण में कविता पाठ से पूर्व डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी ने जनसत्ता, मुंबई के पूर्व उप-सम्पादक विजयशंकर चतुर्वेदी का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि युवा कवि विजयशंकर अपने समय का सच लिखते हैं और उनकी कविताओं का फलक सृष्टि के आरम्भ से लेकर मनुष्य की यात्रा के विभिन्न पड़ावों तक फैला हुआ है. उनकी कवितायें समाज की चिंता, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में आस्था और मानवीय मूल्यों में उनके विश्वास का घोषणापत्र हैं. इस अवसर पर विजयशंकर ने संबंधीजन, भरम, पृथ्वी के लिए तो रुको, क्यों जाऊं, चौपाल, साहचर्य और खरीद-फरोख्त जैसी करीब दर्ज़न भर कवितायें सुनाईं, जिन्हें उपस्थित लोगों ने बड़ी गंभीरता और ध्यान देकर सुना.

अंत में संयोजक संतोष खरे ने सभी उपस्थितों का तहे दिल से आभार माना।

Wednesday, September 16, 2009

हिन्दी दिवस पर महाराष्ट्र की हिन्दी अकादमी ने किया दो पुस्तकों का विमोचन

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा 14 सितंबर को हिंदी दिवस भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाया गया, जिसकी अध्यक्षता अकादमी के कार्याध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल ने की। समारोह के मुख्य अतिथि टोकियो विश्वविद्यालय वैदेशिक अध्ययन विभाग (जापान) के प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण एवं विशेष अतिथि हिंदुस्तानी प्रचार सभा के मानद सचिव श्री सुभाष संपत थे। समारोह का संचालन अकादमी की सदस्य डॉ. सुशीला गुप्ता ने किया। इस अवसर पर श्री विजयशंकर चतुर्वेदी की पुस्तक पृथ्वी के लिए तो रुको एवं श्रीमती लीना मेहेंदले की पुस्तक मेरी प्रांतसाहबी का लोकार्पण भी किया गया।


(बाएं से)-महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यवाहक सदस्य सचिव जयप्रकाश सिंह, पृथ्वी के लिए तो रुको पुस्तक के रचनाकार विजयशंकर चतुर्वेदी , मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण , मेरी प्रांतसाहबी पुस्तक की लेखिका लीना मेहेंदले, अकादमी के कार्याध्यक्ष एवं समारोह के अध्यक्ष नंदकिशोर नौटियाल एवं विशेष अतिथि सुभाष संपत


समारोह में उपस्थित हिंदीसेवी


अपनी पुस्तक के बारे में विचार रखतीं लीना मेहेंदले


अपनी पुस्तक के बारे में बोलते हुए विजयशंकर चतुर्वेदी


समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रोफेसर सुरेश ऋतुपर्ण एवं उनके साथ समारोह की संचालक डॉ. सुशीला गुप्ता


समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए अकादमी के कार्याध्यक्ष नंदकिशोर नौटियाल