मिथिलेश श्रीवास्तव, विष्णुचंद्र शर्मा, डॉ आनंद प्रकाश एवं राम कुमार कृषक (मंच पर बैठे हुए क्रमश: बाएं से दायें)
कविता और विचार के मंच लिखावट, साहित्यिक पत्रिका अलाव और स’आदतपुर साहित्य समाज के संयुक्त तत्वावधान में “नागार्जुन-संवाद” नामक चार सत्रीय कार्यक्रम दिनांक 24 - 4 -11 को संपन्न हुआ। कार्यक्रम के पहले दूसरे और तीसरे सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु चंद्र शर्मा ने तथा संचालन राम कुमार कृषक ने किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. आनंद प्रकाश थे। कार्यक्रम के पहले सत्र में कृष्ण कल्पित, डॉ. बली सिंह, मणिकांत ठाकुर, महेश दर्पण, उमेश चतुर्वेदी, डॉ. आनंद प्रकाश, मिथिलेश श्रीवास्तव और विष्णु चन्द्र शर्मा जी नें बाबा नागार्जुन की रचनाओं पर अपने अपने वक्तव्य दिए साथ ही साथ कई रोचक संस्मरण भी सुनाये। महेश दर्पण नें कहा कि हमारे देश में विकास की दर इतनी धीमी है कि बाबा की प्रासंगिकता बहुत अधिक समय तक बनी रहेगी साथ साथ उन्होंनें यह भी कहा कि बाबा अपने समय के निर्देशक थे। मिथिलेश श्रीवास्तव कुछ लोगों द्वारा नागार्जुन के साहित्य का लगातार अवमूल्यन करने से काफी आहात दिखे, उन्होंनें कहा कि नागार्जुन और शमशेर पर लगातार बात चीत होनी चाहिए क्यूंकि कुछ लोग उन्हें दूसरे सन्दर्भों में चुराने की कोशिश कर रहे हैं। उमेश चतुर्वेदी नें बाबा से जुड़ी कुछ बातों की चर्चा तथा पत्रकारिता में बाबा के योगदान पर चर्चा की। मुख्य अतिथि डॉ. आनंद प्रकाश नें नागार्जुन की कविता “हरिजन गाथा” के शीर्षक के पीछे की कहानी बताई और कहा कि नागार्जुन की कविता जनता की तरफ से संवाद करती है इसलिए इस गोष्ठी का नाम “नागार्जुन-संवाद” भी सार्थक है। इस सत्र का समापन अध्यक्ष विष्णुचंद्र शर्मा के वक्तव्य के साथ हुआ। उन्होंनंन कहा कि जहाँ भी क्रांति कि सम्भावना है वहाँ नागार्जुन हैं, आज नागार्जुन होते तो उस व्यक्ति के लिए कविता लिखते जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध हम सबके लिए भूखा बैठा था।
अपनी कहानी का पाठ करते हुए हीरालाल नागर
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में नागार्जुन की एक कविता का पाठ राम कुमार कृषक जी ने किया तथा उसके बाद नागार्जुन की एक कविता मन्त्र का संगीतबद्ध प्रसारण किया गया जिसे दस मिनट तक सभी श्रोतागण ध्यान लगाकर सुनते रहे। कार्यक्रम के तीसरे सत्र में हीरालाल नागर नें एकल कहानी पाठ किया। खिड़की नाम की उनकी कहानी नें श्रोताओं को बांधे रखा। इसके बाद इस कहानी पर महेश दर्पण जी ने अपनी विशेष टिपण्णी दी और कहानी को सराहा।
काव्यपाठ करते हुए सुरेन्द्र श्लेष कार्यक्रम के चौथे और अंतिम सत्र में विभिन्न कवियों नें कविता पाठ किया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. आनंद प्रकाश नें तथा संचालन मुकेश मानस नें किया। गोष्ठी में सुरेन्द्र श्लेष, अभिषेक, प्रताप अनम, रमेश प्रजापति, रजनी अनुरागी, बागी चाचा, राधेश्याम बंधु, राधेश्याम तिवारी, स्वप्निल तिवारी “आतिश”, अशोक तिवारी, प्रदीप गुप्ता, मणिकांत ठाकुर, मुकेश मानस, मिथिलेश श्रीवास्तव एवं राम कुमार कृषक नें अपनी अपनी कविताओं का पाठ किया। उसके बाद डॉ. आनंद प्रकाश नें अपना वक्तव्य दिया और कविता की संभावनाओं को देखकर हर्षित हुए। डॉ. बली सिंह नें अपनी अपनी कविता के साथ धन्यवादयापन करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।
विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस के तृतीय आधिकारिक कार्यारंभ दिवस पर भारत के सुविख्यात भाषाविज्ञानी और आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी को मुख्य अतिथि के रूप में मॉरिशस में आने का निमंत्रण दिया गया। प्रो. गोस्वामी 06 फ़रवरी, 2011 को मॉरिशस पहुँचे और उनका स्वागत विश्व हिन्दी सचिवालय के महासचिव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और उप महासचिव गंगाधर सिंह गुलशन सुखलाल ने किया।
11 फ़रवरी, 2011 को सचिवालय का आधिकारिक कार्यारंभ दिवस पर महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट के सभाकक्ष में सचिवालय की कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य और मॉरिशस के सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री माता बदल अजामिल की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। इसमें प्रो. गोस्वामी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने वक्तव्य में ‘अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि विदेशों में रह रहे हिन्दी भाषी भारतीयों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है - एक वर्ग में वे देश आते हैं जिनमें भारतीय मूल के लोग वर्षों पहले गए थे और वहीं बस गए हैं। इनमें मॉरिशस, फीजी, गुयाना, सूरिनाम, टोबेगो एवं त्रिनिदाद देश आते हैें। इन देशों में हिन्दी का व्यापक प्रयोग होता है। इनमें हिन्दी का सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ है, साहित्यिक सृजन का संदर्भ है और प्रयोजनमूलक संदर्भ है। इन देशों में साहित्य रचना तो होती है, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अस्मिता का भी प्रश्न ज्वलंत रहता है। दूसरे वर्ग में वे देश आते हैं जो आधुनिक युग में नौकरी के लिए भारत से बाहर गए और वही अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में प्रयोजनमूलक कार्य के लिए वहीं बस गए। इनमें अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, इंग्लैंड, हालैंड, मलेशिया, सिंगापुर आदि देश हैं जिनके प्रवासी भारतीय अर्थात् ‘डायस्पोरा’ अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक अस्मिता बनाए रखने के लिए अपनी भाषा हिन्दी को आवश्यक मानते हैं। तीसरे वर्ग में पाकिस्तान, नेपाल, अफ़गानिस्तान, श्रीलंका आदि पड़ोसी देश एक ही भाषा-परिवार की भाषाएं बोलते हैं और इसी कारण उनका हिन्दी से परिचय होना स्वाभाविक है। चौथे वर्ग में रूस, जापान, कोरिया, मंगोलिया, चीन आदि देशों तथा एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका महाद्वीपों के लगभग 150 देशों में हिन्दी शिक्षण की व्यवस्था है। इन देशों में हिन्दी बोली-सुनी नहीं जाती, किंतु भारतीय दर्शन, संस्कृति और साहित्य के अध्ययन के लिए हिन्दी की आवश्यकता महसूस की जाती है। इसीलिए यहाँ हिन्दी के शैक्षिक संदर्भ का विशेष महत्व है। इसके बाद काव्यगोष्ठी का कार्यक्रम आयोजित किया गया। अंत में अजामिल जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में मॉरिशस में हिन्दी में रचे जा रहे साहित्य का परिचय दिया। भारतीय उच्चायुक्त के द्वितीय सचिव श्री मीमांसक ने अपने धन्यवाद प्रस्ताव में हिन्दी की गरिमा को बढ़ाने में मॉरिशस के योगदान की प्रशंसा की। इसका संचालन सचिवालय के उप महासचिव श्री गुलशन सुखलाल ने किया। इसमें मॉरिशस के हिन्दी साहित्यकार रामदेव धुरंधर, श्रीमती भानुमति नागदान, हिन्दी संगठन के अध्यक्ष श्री राजनारायण गति, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर डॉ. सुंदर, डॉ. राजरानी गोबिन और श्री कुमारदत्त गुदारी विनय ने सक्रिय भाग लिया।
प्रो. गोस्वामी ने 10 फरवरी, 2011 को सचिवालय के महासचिव और उपमहासचिव सहित मॉरिशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री अनिरुद्ध जगनाथ से राष्ट्रपति निवास में भेंट की। उनके साथ भारत-मॉरिशस के संबंधों तथा हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार पर बातचीत हुई। भारत के उच्चायुक्त माननीय श्री मधुसूदन गणपति से भी भेंट हुई और उनके साथ हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर चर्चा हुई। प्रो. गोस्वामी ने महामहिम राष्ट्रपति को ‘हिंदी का भाषिक और सामाजिक परिदृश्य’ पुस्तक भेंट की। माननीय उच्चायुक्त को ‘आधुनिक हिंदीः विविध आयाम’ पुस्तक भेंट की। इसके अतिरिक्त उपउच्चायुक्त श्री प्रशांत पिसे से भी औपचारिक भेंट हुईै।
प्रो. गोस्वामी ने मॉरिशस ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन में दो रेडियो कार्यक्रम तथा टेलीविज़न कार्यक्रम प्रस्तुत किए। इनमें भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर गंभीर चर्चा हुईं दो दिन मॉरिशस भ्रमण करते हुए प्रो. गोस्वामी ने मॉरिशस के सौंदर्य के दर्शन किए। इस समूची यात्रा में सचिवालय के महासचिव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और उप महासचिव श्री गंगाधर सिंह गुलशन सुखलाल का आतिथ्य-सत्कार स्तुत्य था।
आजशाम गांधीशांतिप्रतिष्ठानमेंपीपुल्स विजन, दिल्ली औरहिंद-युग्मडॉटकॉमकेसौजन्यसेलेखक-प्रकाशकसंबंधऔरप्रकाशनमेंआनेवालीसमस्याएंविषयपरएकसंगोष्ठीकाआयोजनकियागयाजिसमेंप्रतिनिधिलेखकऔरप्रकाशकउपस्थितहुए। गौरतलब है कि इस दिन ‘एक शाम एक कथाकार’ के अंतर्गत वरिष्ठ कथाकार ‘अब्दुल बिस्मिल्लाह’ का कहानीपाठ और उस पर नीलाभ और जयप्रकाश कर्दम की परिचर्चा निश्चित थे। लेकिन अब्दुल बिस्मिल्लाह के अचानक अत्यधिक बीमार हो जाने के कारण कार्यक्रम की रूपरेखा को बदलना पड़ा।
हिंदयुग्मडॉटकॉमकेनियंत्रकऔरनिदेशकशैलेशभारतवासीनेइससंबंधमेंअपनेअनुभवबांटतेहुएबतायाकिइसवर्षउन्होंनेकोई12पुस्तकेंप्रकाशितकीहैं।इनपुस्तकोंकेप्रकाशनमेंउन्हेंकोईअतिरिक्तदबावमहसूसनहींहुआबल्किइसतकनीकीयुगमेंकागजसेलेकरहरचीजकीआउटसोर्सिंगकरतेहुएबड़ीआसानीसेउन्होंनेपुस्तकेंप्रकाशितकरदीं।उन्होंनेस्वीकारकियाकिदेशमेंअनेकनवोदितलेखकहैंजोअपनीपांडुलिपिकोप्रकाशितकरानेहेतुधनकाजुगाड़खुदकरतेहैंऔरउन्हींकेसहयोगसेवेपुस्तकोंकाप्रकाशनकरतेहैं। शैलेश भारतवासी ने माना कि नये प्रकाशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे गंभीर और जनोपयोगी सामग्रियाँ कहाँ से लायें।
कोटा। 26 सितम्बर। जनवादी लेखक संघ की मासिक काव्य गोष्ठी माह के अंतिम रविवार को हिंदी दिवस को समर्पित रही। जलेस कार्यकारिणी ने सर्वप्रथम तलवंडी स्थित अपने कार्यालय में प्रख्यात साहित्यकार कन्हैया लाल नंदन के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। जलेस की प्रगतिशील परम्परा की उदारता के चलते सर्वप्रथम जलेस और शहर के प्रिय क्रांतिकारी रचनाकार ब्रजेश सिंह झाला ‘पुखराज’ के महावीर नगर प्रथम पर स्थित निवास पर दोपहर ढाई बजे गोष्ठी का शुभारंभ ‘पुखराज’ की सरस्वती वंदना से हुआ।
आरंभ में लाखेरी से पधारे शायर सुनील एस- उर्मिल मुख्य अतिथि और शहर के जाने माने साहित्यकार सूरजमल जैन ने अध्यक्ष के रूप में आसन ग्रहण किया। जलेस अध्यक्ष श्री रघुनाथ मिश्र ने पधारे अतिथियों का स्वागत करते हुए गोष्ठी को हिंदी दिवस (14 सितम्बर) को समर्पित कर सभी पधारे साहित्यकारों रचनाकारों को हिंदी पर अपनी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए आह्वान किया। उन्होंने राष्ट्रभाषा के संवर्द्धन, प्रोत्साहन, और संरक्षण पर जोर देते हुए हिंदी की अथक यात्रा के बारे में अपना सारगर्भित वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रिका ‘दृष्टिकोण’ के प्रबंध सम्पादक और कवि नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’ को सौंपा गया। काव्यपाठ का आरंभ कवि महेंद्र शर्मा की कविता ‘गलत चुना तो पछताएगी, बोल जिंदगी किधर जाएगी’ से हुआ। इसी बीच जयपुर के जाने माने ग़ज़लकार अखिलेश तिवारी के आने से माहौल में ताजगी आ गयी। कविता के बाद श्री तिवारी को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। ‘पानी को तो पानी लिख’ काव्य संग्रह के रचनाकार श्री आर सी शर्मा आरसी ने अपनी प्रख्यात रचना ‘एक अरसे की अनबुझी प्यास हूँ, पार्थ का दिग्भ्रमित आत्मविश्वास हूँ, जो महल मेरे सपनों का हो न सका, मैं उसीका अधूरा शिलान्यास हूँ’ सुना कर धीरे-धीरे गोष्ठी को ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। सतीश मीणा ने ‘हरियाली के बीच रंग गया, नंदकिशोर अनमोल ने ‘हम हिंदी हैं गर्व हमें कि हिंदुस्तान हमारा’ गीत से हिंदी और हिंदुस्तानी होने पर गर्व जताया, बीच-बीच में नवराचनाकारों को जोश दिलाते हुए संचालक नरेंद्रचक्रवती ‘मोती’ ने अपनी ग़ज़ल सुनाई ‘गाहे बगाहे क़लम चलाया करो, ‘गीतांकुर’ से फिर चर्चा में आये छोटी बहर के रचनाकार शायर डॉ0 नलिन ने ग़ज़ल सुनाई ‘यह सदा है चाक सीने की, तमन्ना है और जीने की’, शहर की उभरती कवयित्री प्रमिला आर्य ने अपना गीत ‘गर तू पाना चाहे मंजिल, आशाओं के दीप जला’ गाकर दाद बटोरी, शरद तैलंग की ग़ज़ल ‘बात दलदल की करे जो कंवल क्या समझे, दर्द जिसने न सहा हो वो ग़ज़ल क्या समझे’ सुन कर तालियों से गोष्ठी गूँज उठी, महेंद्र नेह ने जनवादी कविता ‘उन्होंने हमारे हाथों से छीने औजार खाली हाथ रह गये, उन्होंने हमें जलालत दी हम उसे भी सह गये ‘ सुना कर सफ़दर हाशमी की याद ताजा कर दी। डॉ0 गयास फ़ाईज़ ने शृंगार रस की ग़जल से माहौल को नई ऊँचाई प्रदान की ‘तेरी यादों तेरे खयालों में, खो गया हूँ मैं उजालों में, बन सँवरने की क्या ज़रूरत है, अच्छे लगते हो बिखरे बालों में’, राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान में क्रांतिकारी कवि पुखराज ने जहाँ सरस्वती वंदना हिंदी की सशक्त कविता से की, वहीं अपने काव्य पाठ में राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम को ‘रक्त के कतरों से सींचा है जहॉं सारा चमन, अश्रुपूरित नयन करते उन शहीदों को नमन’ सुना कर जलेस की गरिमा को बढ़ाया। शायर इमरोज ने हिंदी दिवस को समर्पित ग़ज़ल सुनाई ‘तुम्हारे सामने हिंदी ग़ज़ल एलान कर देगी, तेरी भाषा विवादों का सफ़ा मैदान कर देगी’ सुनाई। वयोवृद्ध और वरिष्ठ कवि निर्मल पाण्डेय ने अपनी कविता से संकल्प की बात की ‘हो कठिन पर्वत मगर संकल्प हो, दृढ़ चरण धर कर किसी अंजाम को देंगे। पार्थ ने फिर रख दिया गांडीव धरती पर, यह खबर हम खासकर घनश्याम को देंगे’, प्रख्यात शायर पुरुषोत्तम यक़ीन ने आज की ग़रीबी और महंगाई पर व्यंगय सुनाया ‘जिंदगी की व्यथायें क्यों लिख दीं, इतनी महंगी दवायें क्यों लिखदीं’। अन्य रचनाकारों रघुनंदन हठीला, शकूर अनवर, अखिलेश तिवारी, सुनील उर्मिल, अखिलेश अंजुम, गोरस प्रचंड, आर सी गुप्ता, सुरेंद्र गौड़, हलीम आईना, चाँद शेरी, ओम नागर, वेद प्रकाश परकाश, इमरोज, शून्याकांक्षी, वैभव सौमानी, आनंद हजारी ने भी अपनी अपनी रचनायें पढ़ीं। कार्यक्रम के अंत में श्री मिश्र ने जयपुर से पधारे साहित्यकार श्री अखिलेश तिवारी को ‘आकुल’ की पुस्तक ‘जीवन की गूँज’ और स्वयं की पुस्तक ‘सोच ले तू किधर जा रहा है’ भेंट कर उन्हें सम्मानित किया। तीन घंटे चली गोष्ठी में शामिल शहर के साहित्य संस्थानों विकल्प, आर्यावर्त आदि के प्रतिनिधियों और लगभग 35 रचनाकारों साहित्यकारों ने उपस्थित हो कर जलेस गोष्ठी को समारोह का रूप दे दिया और समारोह को साहित्य रस से सराबोर कर अविस्मरणीय बना दिया।
गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’
नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’
दो वर्षों तक अपनी निरंतरता कायम रखते हुए आनंदम् की काव्य गोष्ठी एक बार पुनः कनॉट प्लेस स्थित मैक्स इंश्योरेंस के सभागार में दो माह के ग्रीष्म कालीन अंतराल के बाद बुधवार 21 जुलाई की शाम 6 बजे पूरे जोशो ख़रोश के साथ संपन्न हुई। गोष्ठी में सर्व श्री सतीश सागर, दर्द देहलवी, ज़र्फ़ देहलवी, वीरेंद्र क़मर, पुरुषोत्तम वज्र, शैलेश सक्सैना, जगदीश रावतानी, भूपेन्द्र कुमार, मनमोहन शर्मा तालिब, लाल बिहारी लाल, नागेश चंद्रा, शिव कुमार मिश्र मोहन, डॉ. विजय कुमार, डॉ. ए. कीर्ति वर्धन, श्रीमती दिनेश आहूजा व विजय कुमार ग्रोवर इत्यादि कविगणों ने भाग लिया। समसामयिक विषयों पर कही गई मार्मिक रचनाओं पर शायरों व कवियों ने ख़ूब दाद पाई। गोष्ठी का संचालन भूपेन्द्र कुमार ने किया। गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओँ की बानगी देखें–
दर्द देहलवी-
पूछते हो हम से तुम, किस लिए उदासी है
ख़्वाहिशें ज़्यादा हैं, ज़िंदगी ज़रा सी है
वीरेंद्र क़मर-
तिरी नाक़िश-ख़याली है गुमाँ है
तिरे क़दमों के नीचे कहकशाँ है
ज़माना आज भी आशिक़ है जिसका
हमारे पास वो उर्दू ज़ुबाँ है
पुरुषोत्तम वज्र-
शहरीपन रिश्ते नातों की ख़ुशबू लूट गया
हमसे ही अब गाँव हमारा पीछे छूट गया
ज़र्फ़ देहलवी-
ज़िंदगी में प्यार होना चाहिए
प्यार का इज़हार होना चाहिए
प्यार में दुश्वारियाँ होती हैं मगर
प्यार में इक़रार होना चाहिए
सतीश सागर-
मन को स्वर नहीं बना पाए
चाह थी, फिर भी नहीं बना पाए
द्वार, आँगन, छतें बना लीं पर
आज तक घर नहीं बना पाए
जगदीश रावतानी आनंदम्-
ज़िदगी को सजा नहीं पाया
बोझ इसका उठा नहीं पाया
नाम जगदीश है कहा उसने
और कुछ बता नहीं पया
लाल बिहारी लाल के हाइकू-
राम का नाम बहुत
बहुत ही आसान
मुक्ति का मार्ग
पड़े फुहार
भीजे बदन पर
जले गतरी
डॉ. ए. कीर्तिवर्धन-
जिस दिन मकाँ घर में बदल जाएगा
सारे शहर का मिज़ाज बदल जाएगा
आने दो रोशनी तालीम की मेरी बस्ती में
देखना बस्ती का भी अंदाज़ बदल जाएगा
भूपेन्द्र कुमार-
करो कितना ही हमको क़ैद लोहे की सलाखों में
हैं पंछी हम खुले आकाश के परवाज़ करना तय है
शैलेश सक्सैना-
ख़ुद से बेहतर सच्चाई को जानता है कौन
शायर ज़िंदा है या मरा मानता है कौन
शिव कुमार मिश्र मोहन-
किसको सुनाएँ अपने दर्दो का सिलसिला
मेरे लिए तो लगता बेदर्द है ज़माना
मेरे उदास मन में एक बार तुम भी आना
शायद सिमट कर आए गुज़रा हुआ ज़माना
नागेश चंद्रा-
आज मुझे कुछ और भी दो
एक नई सोच की भोर भी दो
कहाँ छिपे आँखों के तारे
सहम गए हैं बच्चे सारे
किलकारी कुछ शोर भी दो
डॉ. विजय कुमार-
ग़ज़ल, नज़्म, नग्मा, रुबाई में ढालूँ
मुहब्बत को मेरी यूँ अलफाज़ देना
अंत में आनंदम् के अध्यक्ष श्री जगदीश रावतानी ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। इस गोष्ठी के साथ ही आनंदम् की स्थापना के दो वर्ष पूरे होने पर अनेक मित्रों व कविगणों ने आनंदम् के संस्थापक जगदीश रावतानी जी को तहे दिल से बधाई दी।
(सृजन समग्र – उर्मिल सत्यभूषण कथा संसार – नमन प्रकाशन)
दि. 23 जुलाई 2010 को नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘रशियन कल्चर सेण्टर’ में ‘परिचय साहित्य परिषद’ की स्थाई अध्यक्ष व सुपरिचित साहित्यकार उर्मिल सत्यभूषण के सद्य:प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सृजन समग्र – खंड 1’ पर एक समीक्षा गोष्ठी का आयोजन किया गया. गोष्ठी के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध साहित्यकार बालस्वरूप राही थे व श्री राजेंद्र गौतम, श्री महेश दर्पण, श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेई व श्री प्रेमचंद सहजवाला गोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे. श्री सहजवाला ने उर्मिल सत्यभूषण के कहानी संग्रह पर एक समीक्षा पत्र पढ़ते हुए कहा कि उर्मिल सत्यभूषण के पास बेहद विस्तृत अनुभव संसार है तथा उन के इस संग्रह की 27 में से अधिकाँश कहानियों में नारी जीवन की बेहद यथार्थ झलकियाँ हैं. उर्मिल सत्यभूषण के पास एक सिद्धहस्त कलम है जिस के माध्यम से वे नारी के सामाजिक जीवन की सशक्त तस्वीर प्रस्तुत करती हैं. नारी किन किन परिवेशगत दबावों में जीती है तथा किन किन मोर्चों पर वह इस पुरुष प्रधान समाज में हारती है, इस का बेहद सशक्त लेखा-जोखा उर्मिल जी के कथा संसार में मिलता है. कुछ कहानियों की विशेष प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इन कहानियों की विशिष्टता यह है कि इन में अन्याय अनाचार के विरुद्ध नारी की विद्रोही तेवरों से साक्षात्कार होते हैं, जैसे कहानी ‘अब और नहीं’, ‘आखिर कब तक’ वगैरह. श्री राजेंद्र गौतम ने कहा कि उर्मिल सत्यभूषण की कहानियों में नारी-पुरुष प्रेम को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया गया है. पर कहानी ‘रौशनी की जीत’ जो कि सन् 84 की निर्मम सिख हत्याओं पर आधारित है, की उन्होंने विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि जैसे ‘द्वितीय विश्व युद्ध’ मानव सभ्यता की एक अविस्मरणीय त्रासदी है जिस पर निरंतर आज भी बहुत से उपन्यास लिखे जा रहे हैं, वैसे ही हमारे देश में सन् 84 का कलंक कभी नहीं मिटेगा और उस पर लगातार साहित्य लिखा जाता रहेगा. श्री लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने कहा कि ‘शाबास कुडिये’ जैसी व इस संग्रह की अन्य कई कहानियों जैसी नारी पात्र हमारे पूरे समाज में लगभग घर घर में हैं, जो अपनी स्वतंत्रता के लिए छटपटाती न जाने किन किन पारिवारिक सामजिक दबावों में जीती हैं. इस सब को रेखांकित करने में पूर्ण सफलता पर उन्होंने उर्मिल सत्यभूषण को हार्दिक बधाई दी. श्री महेश दर्पण ने कहा कि लेखिका के सरोकार बेहद ‘जेनुइन’ रहे और इस संग्रह को पढ़ कर किसी शिल्पगत गठन या अन्य तत्वों की ओर ध्यान न जा कर सीधे उन नारी पात्रों के जीवन पर जाता है, जिन्हें लेखिका ने अपने करीब पाया है. श्रोतागण में से लेखिकाओं तूलिका व शोभना समर्थ आदि ने भी संग्रह की कुछ कहानियों की विशेष प्रशंसा की. अंत में मुख्य अतिथि बाल स्वरुप राही ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जो लेखन अपने अनुभव को पाठक की अनुभूति में बदल सकता है, वही लेखन सही लेखन है और उर्मिल सत्यभूषण इस कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरी हैं. उन्होंने संग्रह में नारी के विस्तृत रूपों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि भारत में पहली नारी शतरूपा थी और उर्मिल के कथा संसार में भी नारी के अनेकों रूपों से साक्षात्कार होता है. गोष्ठी का संचालन भी प्रेमचंद सहजवाला ने किया.
मनुष्य ताड़ पत्र से छापाखाने तक आया है। सब कुछ वैसा ही नहीं है जैसा हजार या पांच हजार बरस पहले था फिर मुद्रित शब्द से आगे डिजिटाइजेशन में क्यों हो? ‘संचार के नये माध्यम और हिन्दी’ विषय पर व्याख्यान में सुपरिचित समालोचक/ब्लॉगर डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि सूचना क्रांति के विस्फोट के बावजूद हमें मानना होगा कि कोई भी तकनीक मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकती। तकनीक को मनुष्य और अपनी भाषा व साहित्य के पक्ष में इस्तेमाल करना होगा। माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के मीडिया अध्ययन केन्द्र और जनपद विभाग के साझे में हुए ‘सृजन साक्षात्कार’ के इस आयोजन में डॉ. अग्रवाल ने इंटरनेट पर मौजूद हिन्दी पत्र पत्रिकाओं, पुस्तकों और ब्लॉग्स की विस्तार से चर्चा में कहा कि नये माध्यमों को किताब का विकल्प या शत्रु मानने के स्थान पर विस्तार मानना समीचीन होगा। इस सत्र में आकाशवाणी के सहायक केन्द्र निदेशक डॉ. इन्द्रप्रकाश श्रीमाली ने ब्लॉग्स को निजी मौलिक कृतियों की संज्ञा देते हुए कहा कि मीडिया के नये स्वरूप ने हिन्दी की संभावनाओं को बढ़ाया ही है। डॉ. श्रीमाली ने सूचना तकनीक के व्यापक होते जाने को लोकतंत्र के लिए उपयोगी बताते हुए कहा कि अनुवाद के माध्यम से हिन्दी लेखन को दुनियाभर के पाठकों के लिए उपलब्ध करवाया जा रहा है। सुपरिचित कवि डॉ. कैलाश जोशी ने ब्लॉग को अभिव्यक्ति का सबसे सरल और सहज माध्यम बताते हुए कहा कि ग्रंथ प्रविधियॉ अपने समय के अनुरूप योगदान कर रही है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने ज्ञान और सूचना आधारित समाजों के भेद बताते हुए कहा कि प्रतिरोध की जगह बचाए रखना नये दौर में सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नये दौर में उन शक्तियों की पहचान बार बार करनी होगी जो मनुष्यता को बचाए रखने में जुटी हैं। सत्र में हुए खुले संवाद में रंगकर्मी महेश नायक, डॉ. मंजु चतुर्वेदी, लक्ष्मण व्यास ने भागीदारी की। प्रथम सत्र में ‘लिखने का कारण विषय’ पर अपने वक्तव्य में डॉ. अग्रवाल ने अपने आलोचना कर्म के प्रारंभ के लिए बिन्दु, मधुमती, सम्बोधन जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को श्रेय दिया। उन्होंने आलोचना कर्म के सक्षम उपस्थित संकट में लिहाजदारी और मित्रता की प्रवृत्तियों को कारण बताया। उन्होंने कहा कि स्वस्थ समाज में सही आलोचना को स्वीकार करने का साहस होता है और सही आलोचना ही साहित्य को दिशा देने का काम करती है। डॉ. अग्रवाल ने अमरीका यात्रा पर अपनी पुस्तक ‘आंखन देखी’ तथा वेब लेखन की चर्चा भी की। इस सत्र में कॉलेज शिक्षा के क्षेत्रीय सहायक निदेशक डॉ. माधव हाड़ा ने कहा कि डॉ. अग्रवाल का लेखन बताता है कि नये परिवर्तनों को आत्मसात कर कैसे राह बनायी जा सकती है। उन्होंने राजस्थान के साहित्य के सम्बंध में किए गए आलोचना कर्म में डॉ. अग्रवाल के योगदान को रेखांकित भी किया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने अपने को ही तलाश करते रहने की बैचेनी को सृजनात्मकता का दूसरा नाम दिया। उन्होंने कहा कि ईमानदार होना इस जटिल समय में अनुपम और अद्वितीय है। इस ईमानदारी को उन्होंने लेखन के लिए सबसे बड़ा दायित्व बताया। राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से हुए इस आयोजन के प्रारंभ में श्रमजीवी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एन.के. पाण्ड्या ने स्वागत किया। लेखक परिचय डॉ. मलय पानेरी ने दिया और सत्रों का संयोजन डॉ. पल्लव ने किया। अंत में जनपद के कार्यक्रम निदेशक पुरूषोतम शर्मा ने आभार प्रदर्शित किया।
आयोजन में डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना, डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. प्रमोद भट्ट, डॉ. ए.एल. दमामी, डॉ. सर्वतुन्निसा खान, डॉ. चन्द्रकांता बंसल, रामदयाल मेहर, डॉ. प्रभारानी गुप्ता सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित थे।
मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् की साहित्य अकादमी के द्वारा संचालित पाठक मंच सतना की मासिक गोष्ठी पिछले दिनों वरिष्ठ कवि चंद्रसेन विराट के कविता संग्रह 'चुटकी चुटकी चांदनी' को केंद्र में रखकर आयोजित की गयी. इस अवसर पर मुंबई से पधारे युवा कवि विजयशंकर चतुर्वेदी का विशेष काव्य पाठ भी आयोजित किया गया. बता दें कि विजयशंकर का पहला कविता संग्रह 'पृथ्वी के लिए तो रुको' राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली से पिछले दिनों छपा है. कार्यक्रम की अध्यक्षता शिक्षाविद डॉक्टर एआर तिवारी ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी उपस्थित थे. गोष्ठी का संयोजन सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं एडवोकेट संतोष खरे ने किया.
चंद्रसेन विराट के उक्त कविता संग्रह पर राय व्यक्त करने के लिए नगर के कई प्रमुख साहित्यकार एवं प्रबुद्धजन उपस्थित थे. युवा समीक्षक अनिल अयान ने विराट के कविता संग्रह पर एक आलेख प्रस्तुत किया जिसे काफी सराहा गया. चर्चा को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर अजय तिवारी ने कहा कि चंद्रसेन विराट अपने दोहों के माध्यम से आधुनिक विचार, बाज़ारवाद तथा कई सामाजिक चित्र उपस्थित करते हैं. आर के श्रीवास्तव का कहना था कि विराट ने कविवर बिहारी से शिष्यत्व तो लिया है लेकिन उस ऊंचाई तक अभी नहीं पहुँच सके हैं. चिंतामणि मिश्र ने राय दी कि कवि ने परम्परा से हट कर दोहे लिखे हैं लेकिन ये अनायास नहीं बल्कि सायास लिखे गए दोहे लगते हैं. इस गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुदामा शरद, निरंजन शर्मा, मुकुल दुबे तथा वरिष्ठ लेखक रामदास गर्ग, विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव, मोहनलाल वर्मा 'मुकुट', डॉक्टर राजन चौरसिया, भरत कुमार जैन, एमएल रैकवार, रामशैल गर्ग एवं ठाकुर खिलवानी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही.
इस अवसर पर विनोद पयासी ने नोट किया कि प्राचीन कवियों के दोहे सामान्य जनता को मौखिक याद रहते थे जबकि विराट के दोहों में वह शक्ति नज़र नहीं आती. डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी का आक्षेप था कि विराट के दोहे लिखने के लिए लिखे गए प्रतीत होते हैं. डॉक्टर त्रिपाठी ने जोड़ा कि यद्यपि कवि के लिए कोई भी विषय वर्जित नहीं होता तथापि समाज को देखने और उसे पकड़ने की क्षमता का अपना महत्त्व होता है और ऐसा ही काव्य स्थायी प्रभाव डालता है. गोष्ठी के अध्यक्ष डॉक्टर आर के तिवारी ने दोहा का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत करते हुए विराट के संग्रह की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसमें जहां तुलसी की भक्ति भावना देखने को मिलती है वहीं ऋषि अगस्त के पात्र के सामान समस्त को समेट लेने की क्षमता और ललक दिखाई देती है.
गोष्ठी के दूसरे चरण में कविता पाठ से पूर्व डॉक्टर सेवाराम त्रिपाठी ने जनसत्ता, मुंबई के पूर्व उप-सम्पादक विजयशंकर चतुर्वेदी का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि युवा कवि विजयशंकर अपने समय का सच लिखते हैं और उनकी कविताओं का फलक सृष्टि के आरम्भ से लेकर मनुष्य की यात्रा के विभिन्न पड़ावों तक फैला हुआ है. उनकी कवितायें समाज की चिंता, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में आस्था और मानवीय मूल्यों में उनके विश्वास का घोषणापत्र हैं. इस अवसर पर विजयशंकर ने संबंधीजन, भरम, पृथ्वी के लिए तो रुको, क्यों जाऊं, चौपाल, साहचर्य और खरीद-फरोख्त जैसी करीब दर्ज़न भर कवितायें सुनाईं, जिन्हें उपस्थित लोगों ने बड़ी गंभीरता और ध्यान देकर सुना.
अंत में संयोजक संतोष खरे ने सभी उपस्थितों का तहे दिल से आभार माना।
शहीद भगत सिह, राजगुरू व सुखदेव के शहीदी दिवस पर आज शहीद चौक पर साहित्य व कला सदन व भारत विकास परिषद के सयुक्त तत्वाधान में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया कायक्रर्म के अन्त में शहीदों की प्रतिमाओं पर उपस्थित नागरिकों ने श्रदांजलि अर्पीत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता विधि स्पोर्टस कल्ब के अघ्यक्ष प्रसिद समाजसेवी चिकित्सक डा0 शिव सचदेवा ने की। कुशल मंच संचालन विरेन्द्र विशिष्ठ ने किया। इस मौके पर कला व साहित्य सदन के सदस्यों ने शहीदों पर कविताओं को सुना कर महौल को जोश से भर दिया। डा0 विकास आनन्द ने सुनाया कि:- ‘‘आजादी के दीवानों का फुलो से सत्कार करे ’’ वतन के अमर शहीदों की मिलकर जय-जयकार करें।
जगदीश कुमार ने आजादी में ढोगी बाबो के प्रति सचेत करते हुए अपनी कविता को पढा:- ‘‘ आज फिर एक ढोगी बाबा ने मर्यादा को कर दिया पार बना कर एक कन्या को अपनी हवस का शिकार ’’
वही मास्टर मैहन्द्र कुमार ने कविता में देश को सभी देशों से महान बताया:- ‘‘ इस दुनिया वाले बाग में इक फुल है हिन्दुस्तान । ये खुश्बु बाटे प्यार की तो महके कुल जहान ।’’
बनवन्त सिह ने सुनाया कि ‘‘ मुझे नही इच्छादारी को मुक्ति दे दो।
सदन सचिव नवल सिह ने शहीदों की जरीए कुर्सी का रास्ता बनाने वालों को चेताते हुए कहा कि इतिहास को तोड़ना मरोड़ना बन्द करों देश भक्ती के मसाले से , तुम कुर्सी तक का सफर बनाना चाहते हो इतिहास को अपने ढ़ग से प्रतिद्वन्दीयों के खिलाफ इश्तेमाल करना चाहते हो । ‘‘दोस्त‘‘-इतिहास तुम्हारें बाप की जागीर नहीं ।।
विरेन्द्र वरिष्ठ ने आज की पीढी के द्वारा शहीदों की प्रतिमाओं के प्रति अनादर पर सुनातें हुए कहा कि ‘‘उनके प्रति सम्मान जताने की औपचारिकता निभाते है और फिर से दो और दो पॉच बनाने में जुट जाते हैं क्योकि हमारी नजरों में वो सिर्फ बुत है। और बुत शिकायत नहीं करते सभी कवियों की रचनाओं पर उपस्थ्ति लोग देशभक्ति के रस में सराबोर हो गए।
इस मौके पर भाविप के कुश भार्गव ने इस तरह के समारोहों परीवारीक तौर पर मनाने का आहव्न करते हुए कहा कि शहीदों के विचार आज भी जिन्दा है उन्ही को अपनाने की जरूरत है। इस मौके पर भाविप से अनुप कुमार ,प्रधान राजेश खुराना,सुशील भाटिया कर्मवीर सिह शाखा कन्हडी , पंतजलि योग समिति से रविन्द्र कुमार, यंग इण्डिया फाउंडेशन से जिम्मी पाहवा, संरक्षक अंगद भाटिया, विनय वर्मा, मानव सेवा संगम अशोक मैहता, सुभाष बंसल, ईसर सिह समाजसेवी मजदुर नेता कामरेड प्रताप आदि लोगों के अलावा दर्जनों संस्थाओं के नुमाईदों ने कार्यक्रम में शामिल होकर शहीदों के प्रति अपने श्रदासुमन अर्पित किए।
राष्ट्रीय प्रकाशक संघ, दिल्ली के तत्वाधान में 19वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले के अवसर पर प्रगति मैदान के सभागार में साहित्य और मीडिया: रिश्तों का संकट पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया.इसकी अध्यक्षता देवेंद्र इस्सर ने की और इसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महीप सिंह थे.अन्य वक्ताओं मॅं नरेंद्र मोहन,एन.के.सिंह (ब्यूरो चीफ ई. टी. वी.), ओम गुप्ता(मीडिया),प्रेम जन्मेजय(व्यंग्यकार),राजीव शर्मा(प्रकाशक),योगेंद्र पाल त्यागी,प्रवीण खुराना और प्रताप सहगल थे. एक प्रबुद्ध वक्ता ने संगोष्ठी के विषय पर सवालिया निशान लगाते हुए क्षमा याचना सहित अपनी आपत्ति दर्ज कराई कि आज साहित्य और मीडिया के रिश्तों के बीच कोई संकट नजर नहीं आता क्योंकि दोनों के माध्यम अलग-अलग हैं, हां मानाकि दोनों के उद्देश्य एक हैं.साहित्य भी वही बात समाज तक पहुंचाने का काम करता है जो मीडिया कहना चाहता है. जब दोनों के लक्ष्य समाज को एक सोद्देश्य प्रेरणा देनी की हो तो फिर दोनों के बीच संकट का प्रश्न ही कहां उठता है?एक वक्ता का यह मानना था कि मीडिया और साहित्य अलग-अलग नहीं हैं. दोनों के तरीके अलग हो सकते हैं लेकिन साहित्य को इतना सशक्त होना चाहिए कि उसे वैशाखी की जरूरत न पड़े. इसके प्रतिक्रिया स्वरूप एक वक्ता का यह कहना था कि आज साहित्य अपने पैरों पर स्वयं खडा है, उसने कभी मीडिया की वैशाखी का सहारा नहीं लिया.मुख्य अतिथि ने समाज में साहित्य की भूमिका पर अपनी बेबाक टिप्पणी से इसकी महत्ता पर विस्तृत प्रकाश डाला.
इस संगोष्ठी से यह बात उभरकर आई कि आज मीडिया या साहित्य कहीं न कहीं समाज से कटता जा रहा है.अगर स्वस्थ समाज की संकल्पना साकार करनी है तो दोनों को अपनी उपस्थिति समाज में दर्ज करानी होगी. समाज की दृष्टि सूक्ष्मता से बातों का आंकलन कर लेती है. मीडिया और साहित्य को कुच ऐसे फैक्टर हैं जो उनको समाज से काटकर अलग किए हुए हैं.अगर मीडिया और साहित्य को समाज का पथ प्रदर्शक बनना है तो उन्हें अपने भीतर आत्म मंथन करना होगा और अग्नि परीक्षा देकर पुरानी भूमिका में वापस लौटना होगा.जिस प्रकार स्वस्थ मनुष्य का मस्तिष्क स्वस्थ सोचने के योग्य होता है,वैसे ही स्वस्थ लक्ष्य साहित्य और मीडिया के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी और गुणकारी होंगे.
अंत में प्रकाशक संघ के अध्यक्ष श्री योगेंद्र पाल त्यागी ने उपस्थित वक्ताओं और सुधी श्रोताओं को धन्यवाद दिया.
रिपोर्ट और फोटो- शमशेर अहमद खान 2-सी,प्रैस ब्लॉक, पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली---110054
जगदीश रावतानी की साहित्यिक व संगीत संस्था ‘आनंदम’ की दिसंबर 2009 की गोष्ठी में एक निर्णय यह भी लिया गया था कि वर्ष 2010 से ‘आनंदम’ संस्था प्रतिमाह की काव्य-गोष्ठियों के अतिरिक्त किसी भी ज्वलंत विषय से जुडी एक ‘विचार-गोष्ठी’भी आयोजित करेगी. दि. 3 जनवरी 2010 की गोष्ठी में ‘आनंदम’ के उक्त निर्णय के कार्यान्वयन का शुभारंभ जगदीश रावतानी के पश्चिम विहार स्थित निवास पर किया गया.
इस गोष्ठी में प्रेमचंद सहजवाला ने अपनी अप्रकाशित अंग्रेज़ी पुस्तक ‘Hinduism- Through Modern Perception’ के प्रथम दो अध्याय पढ़े. गोष्ठी में सर्वश्री जगदीश रावतानी (अध्यक्ष), डॉ. विजय, मनमोहन तालिब, भूपेंद्र, मुनव्वर सरहदी, धरमदासानी तथा सैलेश सक्सेना ने भाग लिया.
पुस्तक के प्रथम अध्याय के प्रारंभ में ही प्रेमचंद सहजवाला ने प्रसिद्ध इतिहासकार बी.आर.नंदा की इतिहास पुस्तक ‘The Making of a Nation’ से एक बहुत रोचक प्रसंग पढ़ा. इस प्रसंग के अनुसार एक ब्रिटिश ICS अधिकारी एच.एक.किश्क ने उन्नीसवीं शताब्दी के अपने यात्रा वृतांतों में उन तीर्थ यात्रियों का वर्णन किया है जो बहुत हास्यास्पद तरीके से लखनऊ से उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिरों तक जा रहे थे. वे सब न तो रेलगाड़ी से जा रहे थे न बस से, न हवाई जहाज़ से न पैदल. वे सब अपनी जगह पर खड़े होने के बाद ज़मीन पर लेट जाते तथा अपने हाथ आगे को खोल कर कुल 8 फुट ज़मीन नाप लेते. फिर खड़े हो कर अगले 8 फुट पर लेट जाते और इस प्रकार लखनऊ से जगन्नाथ पुरी तक का फासला केवल लेट लेट कर पूरा करते. 8 फुट प्रति बार के हिसाब से वे 660 बार लेट कर दिन भर में 4 मील तय करते और इस प्रकार लगभग डेढ-दो वर्ष में जगन्नाथ पहुँच जाते. लेखक सहजवाला ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष ‘छठ पूजा’ के अवसर पर दिल्ली की यमुना नदी के किनारे कुछ नौजवानों को इसी प्रकार लेट लेट कर काफी फासले से नदी के किनारे तक आते देखा था.
इस अध्याय में उन्होंने पारंपरिक हिंदू समाज के पिछड़ेपन की और संकेत करते इतिहास के एक अन्य प्रसंग को भी पढ़ा. सन 1960 के ‘हिंदू अधिनियम’ के अनुसार कोई भी हिंदू बालिका यदि बचपन में ही विवाह कर लेती है तो उस का पति तब तक उस के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं रख सकता जब तक वह 10 वर्ष की न हो गई हो. परन्तु कुछ 10 वर्षीय बालिकाएं इस प्रकार सेक्स की प्रक्रिया को न सह कर मर गई तो देश के अनेक सुधारकों ने इस न्यूनतम आयु को बढ़ाने का अभियान चलाया जो दो दशक से अधिक समय तक चला. आखिर सन् 1891 में ब्रिटिश ने भारत के सुधारकों की मांग पर एक नया विधेयक पारित किया – ‘The Age of Consent Bill – 1891’. सहजवाला ने बताया कि इस विधेयक के पारित होते ही देश के पुरातनपंथी रूढ़िवादी लोग बौखला गए और इस के सब से बड़े विरोधी थे लोकमान्य तिलक. कलकत्ता में ऐसे, शास्त्रों की लकीर की फकीरी करने वाले पोंगा पंडितों ने दो लाख लोगों की एक रैली निकाली जिसमें नारे लगाए गए – ‘महारानी, हमारा धर्म बचाओ, महारानी हमारे शास्त्र बचाओ’. यह निर्णय भी लिया गया कि एक प्रतिनिधि मंडल इंग्लैंड जा कर महारानी से आग्रह करेगा कि ऐसा शास्त्र-विरोधी विधेयक वापस लिया जाए.
पूना में ऐसे दकियानूसी लोगों के कोप का भाजन बने प्रसिद्ध सुधारक गोपाल गणेश अगरकर जिनका पुतला बनाया गया. पुतले के एक हाथ में उबला हुआ अंडा और दूसरे में व्हिस्की की बोतल पकड़ा दी गई और उन्हें अंग्रेज़ियत का पिट्ठू घोषित किया गया. फिर पूरे पूना शहर में घुमाने के बाद पुतले का दाह-संस्कार किया गया.
इन अध्यायों में सहजवाला ने हिंदू समाज के सब से बड़े अभिशाप यानी जाति-प्रथा पर खूब प्रहार किये. उन्होंने केरल के उन बदनसीब दलितों के प्रसंग लिया जिन्हें देख कर स्वामी विवेकानंद ने केरल राज्य को ही एक ‘मानसिक हस्पताल’ घोषित कर दिया. लेख में बताया गया कि पिछली शताब्दी में केरल की दलित जातियों को कमर से ऊपर कपड़ा पहनने तक का अधिकार नहीं था. उनकी महिलाऐं भी केवल कमर के नीचे का कपड़ा यानी पेट्टीकोट आदि पहन सकती थी पर कमर से ऊपर का बदन निर्वस्त्र होने के कारण घर से निकल तक नहीं पाती थी. आखिर कुछ ईसाई मिशनरियों की मदद से वहाँ के दलितों ने अपनी महिलाओं के लिए ‘Upper Cloth Agitation’ यानी ‘ऊपरी-वस्त्र आन्दोलन’ किये और सफल हुए. ईसाई मिशनरियों के अलावा वामपंथी दलों की सहायता से अंततः एक समय ऐसा भी आया कि साक्षरता में केरल प्रदेश पूरे देश का अग्रणी प्रदेश बना.
दूसरे अध्याय में ‘मनु-स्मृति’ का ज़िक्र भी है जिस में सहजवाला ने बताया कि मनु ने अकेले हिंदू समाज का वह संविधान नहीं लिखा था, वरन तात्कालीन क्षत्रिय राजाओं की मनमानी व प्रजा के संचालन के तरीकों के अनुसार उन्होंने ने हिंदू समाज का संविधान बनाया. उस पर तुर्रा यह कि मनु ने उस संविधान पर ईश्वर की मोहर लगा दी कि यह सारा संविधान उन्हें परम पूजानीय परमात्मा ने लिखवाया है. परमात्मा का ठप्पा लगते ही संविधान स्वयमेव पवित्र ग्रंथों की श्रेणी में आ गया. इस संविधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जीवन भर में ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम व सन्यासाश्रम का पालन करेगा. परन्तु ब्रह्मचर्याश्रम में लड़कियों की शिक्षा का कोई ज़िक्र नहीं तथा वानप्रस्थाश्रम में कोई भी साठ वर्षीय व्यक्ति वनों में जा कर झोंपड़ी में रहेगा और शास्त्राध्ययन करता रहेगा, जब कि उस की पत्नी का कोई उल्लेख उस में नहीं है. क्या पत्नी अपनी संतान पर आश्रित रहेगी? साथ ही मनु-स्मृति के कई अमानवीय प्रावधानों के ज़िक्र करते हुए सहजवाला ने बताया कि यदि कोई ब्राह्मण किसी दलित महिला से शादी करता भी है तो वह उसे अपने घर, यानी ससुराल में नहीं लाएगा. वह मायके में ही रहेगी और जब कभी ब्राह्मण को उस के साथ रात बितानी होगी तो वह अपना खाना व पीने का पानी तक अपने घर से ले जाएगा. पत्नी के साथ सम्भोग से पहले वह पूरे शरीर को घी से मलेगा और इस पर भी तुर्रा यह कि उस दलित पत्नी से जो संतान होगी, उसे ब्राह्मण पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार न रहेगा!
यदि शूद्र ने ब्राह्मण को गाली दे दी तो दंड-स्वरुप उसे अपनी जिव्हा पर जलता हुआ लोहा रखना पड़ेगा तथा यदि शूद्र ने ब्राह्मण को लात मार दी तो उस का पांव काट दिया जाएगा और थप्पड़ मारा तो हाथ. यदि दलित किसी ब्रह्मिण महिला का बलात्कार करेगा तो सज़ाए-मौत और यदि इस से उलट ब्राह्मण किसी दलित महिला का बलात्कार करेगा तो केवल कुछ धन-राशि दंड-स्वरुप देने से ही न्याय हो गया समझो.
क्योंकि लेखक अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद हिंदू समाज की सर्वाधिक कुत्सित प्रथाओं पर प्रहार कर रहे थे, इसलिए गोष्ठी के अंत में खूब गर्मा-गर्म चर्चा चली. धरमदासानी ने सीधा सवाल पूछा कि कभी आप तीर्थ-यात्रियों की बात करते हैं, कभी जाति-प्रथा की तो कभी बाबा साहेब आम्बेडकर की, आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? सहजवाला ने बताया कि क्यों कि उन्होंने पुस्तक के आठ अध्यायों में से केवल दो ही पढ़े, अतः पूरी पुस्तक के पढ़े जाने पर यही पता चलेगा कि वे हिंदू समाज की असामान्यताओं का पर्दा-फाश कर रहे हैं तथा अमानवीय प्रथाओं यथा सती प्रथा आदि पर समाज के बुद्धिजीवियों को आड़े हाथों ले रहे हैं. डॉ. विजय ने पूछा कि आप Hinduism को कैसे परिभाषित करते हैं? सहजवाला ने बताया कि Hinduism को Way of Life कर के परिभाषित किया गया है, जिस में विवाह के अनेक प्रकारों में से ‘राक्षस विवाह’ भी था जिस के अनुसार कोई क्षत्रिय किसी भी लड़की का अपहरण कर सकता है और यदि किसी की हिम्मत हो तो युद्ध कर के अपहृत लड़की को बचा ले. क्षत्रिय युद्ध जीतने पर अपहृत लड़की से ज़बरदस्ती विवाह कर सकता है. उदहारण के तौर पर उन्होंने भीष्म पितामह का प्रसंग लिया जिन्होंने तीन राजकुमारियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण उनके राज-महल में हो रहे स्वयम्वर से ही कर लिया था. राक्षस विवाह का सन्दर्भ दे कर भीष्म पितामह ने कहा था कि इस प्रकार अपहरण करना ‘मनु-स्मृति’ के अनुसार जायज़ था. परन्तु सहजवाला ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरु जैसे विचारकों ने Live and Let Live को Hinduism परिभाषा कर के माना है. मनमोहन तालिब ने सहजवाला से सीधा प्रश्न किया कि क्या आप Hinduism में सचमुच विश्वास करते हैं? सहजवाला ने कहा कि वे पहचान से हिंदू हैं, पर हृदय से वे वास्तव में Buddhist हैं और गौतम बुद्ध की सरल शिक्षाओं में अधिक विश्वास करते हैं. बहस के अंत में ‘आनंदम’ अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने कहा कि धर्म रूपी पहचान ने व्यक्ति और देश को बहुत नुकसान पहुँचाया है. हमें चाहिए के हम अपनी पहचान एक इंसान के रूप में दें, न कि राष्ट्र या धर्म के रूप में . उनकी इस बात से सभी सहमत थे अंत में उन्होंने इसी सन्दर्भ में अपना एक ताज़ा शेर सुनाया:
ज़रूरत नहीं मंदिरों मस्जिदों की, मैं इंसान में ही खुदा चाहता हूँ.
इस पर खूब तालियाँ बजी और धन्यवाद प्रस्ताव के साथ गोष्ठी संपन्न हुई.
एनसीईआरटी के भाषा विभाग ने ‘समझ का माध्यम’ परिसंवाद शृंखला की शुरुआत की है। इस परिसंवाद शृंखला की शुरुआत पटना में (27-28 अगस्त 2008) हुई थी। दूसरा कार्यक्रम वाराणसी में (19-20 नवंबर 2008) और तीसरा कार्यक्रम उदयपुर में 5-6 फरवरी, 2009 हुआ था। इन तीनों कार्यक्रमों में देश के जाने-माने शिक्षाविद, विषय-विशेषज्ञ, राज्य शैक्षिक संस्थान और बोर्ड के सदस्य के साथ-साथ देश के कोने-कोने से आए अध्यापक शामिल हुए और विचार रखे।
इन परिसंवादों से यह बात निकलकर आई कि बच्चों की समझ बनाने के लिए माध्यम के रूप मे उनकी अपनी भाषा, बहुभाषिक शिक्षा और भाषाओं में संवाद का होना जरूरी है।
आज़ादी के बाद के पिछले सारे शिक्षा संबंधी दस्तावेजों में भी मातृभाषा को समझ के माध्यम (खासतौर से प्राथमिक शिक्षा) के रूप में लागू किए जाने की बात कही गई और बच्चों की समझ में सहायक उनकी अपनी भाषा, उनकी स्वतंत्रा अभिव्यक्ति को महत्व दिया गया। लेकिन आज लगभग 60 वर्षों बाद भी ऐसा पूरी तरह न हो सका। एक ओर घर की भाषा और स्कूल की भाषा में अंतर बढ़ता चला गया तो दूसरी ओर अंग्रेज़ी सहित भारतीय भाषाओं के बीच संवाद भी टूटा। मानसिक बोझ इस कदर बढ़ा कि बच्चों की अपनी समझ, अपनी अभिव्यक्ति कहीं दब कर रह गई। इसीलिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (2005) में इस बात को पुरजोर तरीके से पिफर से कहने की जरूरत पड़ी कि बच्चों की घर की भाषा स्कूल में भी उनकी समझ का माध्यम बने ताकि बच्चे रटने की बजाय समझकर पढ़ने की दिशा में आगे बढ़ें। शिक्षा उनके लिए बोझ न बनकर एक आनंददायी अनुभव बने।
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए एन सी ई आर टी के भाषा विभाग ने एक पहल की और शिक्षाविदों और अध्यापकों के साथ मिलकर देश भर में एक बहस चलाई। यह बहस पटना, वाराणसी और उदयपुर में दो दिवसीय परिसंवाद के रूप के आयोजित हुई। बच्चों की अपनी भाषा ही उनकी समझ का माध्यम हो सकती है - इस बात पर सबकी सहमति भी बनी। पर इसमें सबसे बड़ी समस्या क्रियान्वयन की है। इन गोष्ठियों से उभरकर यह बात भी आई कि इस दिशा में एक व्यापक तैयारी की ज़रूरत होगी, न केवल अकादमिक बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक भूमिका को लेकर एक तैयारी करनी होगी।
इस कार्यक्रम में प्रो. कृष्ण कुमार, प्रो. अनिता रामपाल, प्रो. अरूण कमल, श्री रोहित ध्नकर, डॉ. एच. के दिवान, प्रो. राजेश सचदेवा, प्रो. रामजन्म शर्मा, प्रो. ए. के . मिश्रा, डॉ. संध्या सिंह, डॉ. कीर्ति कपूर, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, विभिन्न बोर्ड के सदस्य तथा शिक्षक और शिक्षक प्रशिक्षक शामिल होगें।
(विवरण देखने के लिए नीचे के चित्र पर भी क्लिक कर सकते हैं)
हिन्दी की बहुचर्चित वेबपत्रिका हिन्द-युग्म प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक ‘भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने’ के विमोचन कार्यक्रम और विचार गोष्ठी में आपको आमंत्रित करता है। हिन्दी ब्लॉगिंग में यह पहली बार है कि किसी खास विषय पर क्रमवार प्रकाशित लेखों को पुस्तक की शक्ल दी गई है। इससे भी पहले भी 1-2 बार हिन्दी ब्लॉगों ने अपनी स्मारिका या काव्य-संग्रह, कहानी-संग्रह जैसी पुस्तकें प्रकाशित किये हैं, लेकिन किसी व्यक्तित्व को समर्पित लेखों की शृंखला प्रकाशित करने का यह पहला मौका है। कार्यक्रम में पधारकर हमारा प्रोत्साहन करें। कार्यक्रम का विवरण निम्नवत् है-
‘भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने’ पुस्तक का विमोचन और विचार गोष्ठी
विचार गोष्ठी के विषय- 1॰ बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा 2॰ हिन्दी में इंटरनेटीय रचनाकर्म- कितना गंभीर, कितना असरदार
मुख्य अतिथि- विभूति नारायण राय (वरिष्ठ साहित्यकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति) अन्य विशिष्ट अतिथि व वक्ता- प्रो॰ चमन लाल (चर्चित लेखक, भगत सिंह के दुलर्भ दस्तावेजों और चिट्ठियों के संकलनकर्त्ता तथा संपादक, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय शिक्षा संघ के अध्यक्ष) हिमांशु जोशी (प्रसिद्ध कथाकार) पंकज बिष्ट (प्रसिद्ध कथाकार और 'समयांतर' के संपादक) संचालन- प्रमोद कुमार तिवारी, युवा कवि
स्थानः गाँधी शांति फाउँडेशन (प्रतिष्ठान) सभागार (221/223, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, आई टी ओ के पास), नई दिल्ली दिन व समयः शनिवार, 12 दिसम्बर 2009, शाम 5 से 8 बजे तक चाय का समयः शाम 5 से 6 बजे तक
धन्यवाद।
निवेदक- शैलेश भारतवासी (नियंत्रक व प्रधान सम्पादक) रामजी यादव (संयोजक) हिन्द-युग्म (www.hindyugm.com)
बच्चों की त्रैमासिक पत्रिका 'बाल-प्रहरी', अलमोड़ा द्वारा दिनांक 8/11/2009 को गढ़वाल भवन,पंचकुईया रोड, नई दिल्ली में बाल साहित्य की दशा एवं दिशा पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें नई दिल्ली एवं एन.सी.आर.के बाल साहित्यकारों ने भाग लिया। जिसमें डा. हरिसिंह पाल, डा. मोहन तिवारी, चन्द्र जींदयाल, पूरनचंद कांडपाल,विनीता मथ्थ, देवन्द्र उपाध्याय, बाल भारती के पूर्व संपादक डा. द्रोणवीर कोहली, विज्ञान प्रगति के संपादक डा. दीक्षा विष्ट, हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक श्री सूर्यकांत बाली, बाल साहित्यकार डा. सरस्वती बाली, रणजीत राणा, सुखदेव मलहोत्रा मुख्य अतिथि के रुप में बाल भवन के पूर्व निदेशक डा. मधु पंत, के अलावा दाता राम चमोली, लाल बिहारी लाल, नेहा रावत, राम निवास इंडिया आदी ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किये।
सभी वक्ताओं ने बाल साहित्य के वर्त्तमान दशा पर संतोष व्यक्त किया परन्तु इसके दिशा पर असंतोष व्यक्त किया। इस गोष्ठी की अध्यक्षता डा. द्रोणवीर कोहली तथा संचालन बाल प्रहरी के संपादक उदय किरौला ने किया।
विगत दिनों सिद्धार्थ नगर जनपद स्थित रतन सेन डिग्री कालेज, बांसी द्वारा दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन बौद्ध अध्ययन केंद्र के तत्वाधान में आयोजित किया गया. इस अवसर पर विधि मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री एस.आर. ढलेटा स्वच्छ लोकतंत्र हेतु सूचना के अधिकार का महत्व विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लोकहित में सरकार के क्रिया कलापों में पारदर्शिता, भ्रष्टाचार मुक्ति, प्रशासनिक अधिकारियों का उत्तरदायित्व, पूर्ण व्यवहार जनसूचना के अधिकार का मूल उद्देश्य है. उन्होंने कहाकि इस अधिकार के अंतर्गत नागरिकों को केंद्रीय सरकार के सभी मंत्रालयों/विभागों, राज्य सरकारों, उच्च न्यायालयों, निकायों, सरकार द्वारा पोषित वित्तीय संस्थानों/स्वैछिक संस्थानों आदि से भी सूचना 30 से 60 दिनों के भीतर प्राप्त की जा सकती है. श्री ढलेटा ने कहाकि इसके लिए प्रत्येक विभाग में सूचना अधिकारी नियुक्त है जो किसी भी सूचना मांगने वाले भारतीय नागरिक से यह नहीं पूछ सकते कि सूचना किसलिए और क्यों मांगी जा रही है, मांगे जाने पर उन्हें सरकार की मंशा के अनुरूप हर हाल में अपेक्षित सूचनाएं देनी ही होंगी.
संगोष्ठी के विशिष्ठ अतिथि श्री शमशेर अहमद खान ने कहाकि कपिलवस्तु गणतंत्र की जन्मदाता है, यहीं से लोकतंत्र पूरी दुनिया में गया है.उन्होंने जनता के सरकार की भागीदारी पर चर्चा की एक आदर्श तथा जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए लोगों को प्रेरित किया.
पुलिस अधीक्षक श्री उपेन्द्र कुमार अग्रवाल ने कहाकि सूचना का अधिकार अधिनियम दिनोंदिन प्रासंगिक होता जा रहा है. शिक्षा के केंद्र इस दिशा में जागरूक हो रहे हैं जो देश के लिए शुभ संकेत है. उन्होंने भ्रष्टाचार को नासूर बताते हुए कहाकि इसे जागरूकता से ही मिटाया जा सकता है.मुख्य विकास अधिकारी श्री ताहिर इकबाल ने कहाकि परिवर्तन विकास की एक प्रक्रिया है. सूचना का अधिकार नागरिक अधिकार के क्षेत्र में मील का पत्थर है.
इस अवसर पर महाविद्यालय के प्रबंधक और पूर्व विधायक श्री जय प्रताप सिंह ने चर्चा करते हुए कहाकि जनसूचना का यह अधिकार लोकरुचि का विषय है और नागरिक अधिकारों में एक क्रांतिकारी क़दम है जिसे ऐतिहासिक उपलब्धि समझना चाहिए.
उक्त अवसर पर ए डी एम सिद्धार्थ नगर श्री एम के त्रिवेदी ने कहाकि सूचना का अधिकार आज भी प्रासंगिक है, हर नागरिक को सूचना अधिनियम 2005 से सूचना पाने के अधिकार के लिए यह एक हथियार है.
अंत में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. हरेश प्रताप सिंह ने गोष्ठी में उपस्थित सभी अतिथियों, प्राध्यापकों,छात्र-छात्राओं,गणमान्य अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया.कार्यक्रम का संचालन डॉ. जय नारायण मिश्र ने किया.
अगले दिन की संगोष्ठी का संबोधन भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग के केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान, दिल्ली में कार्यरत सहायक निदेशक श्री शमशेर अहमद खान ने किया. उन्होंने कहा कि भारत बहुभाषी देश है. अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा का उल्लेख है. अंग्रेजी सहराजभाषा है. यही नहीं,राज्यों की अपनी राजभाषा है और उन्हें भी अपनी सह राजभाषाएं बनाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है. भाषा देश को जोड़्ती है. दुनिया में लोकतंत्र की जननी भी भारत भूमि है. केंद्र की भाषा नीति और उसका क्रियान्वयन, देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने में अहम भूमिका का निर्वहन करता है.हिंदी देश की प्रतिनिधि भाषा है और राष्ट्र भाषा के रूप में राष्ट्रीय एकता की कड़ी है. उन्होंने कहाकि देश की भाषायी जटिलता राष्ट्रीय एकता में बाधा नहीं है. विविध भाषी देश होने के बावजूद भारत की सांस्कृतिक एकता का आधार परस्पर समन्वय ही है, जो भाषाओं के बीच विद्यमान सौम्यता का कारण है. संस्कृत अधिकांश भारतीय भाषाओं की जननी है. आज पूरी दुनिया को एकता के सुत्र में बांधने में बौद्ध धर्म का योगदान ऐतिहासिक है.
रिपोर्ट- शमशेर अहमद खान 2-सी,प्रैस ब्लॉक,पुराना सचिवालय, सिविल लाइंस, दिल्ली-110054
कोलॉज (दक्षिणावर्त)- 1॰ कार्यक्रम-सूचक-पट, 2॰ प्रभास जोशी के साथ प्रेमचंद सहजवाला, 3॰ गाँधी जी का पोस्टर, 4॰ वर्षा दास, 5॰ कन्हैयालाल नंदन और अन्य प्रबुद्ध दर्शक, 6॰ विमल प्रसाद, प्रभास जोशी, 7॰ वर्षा दास, विमल प्रसाद
महात्मा गाँधी पूरी मानव-सभ्यता के लिए अहिंसा-दूत बन कर अवतरित हुए थे। विश्व के महापुरुष महात्मा गाँधी की तुलना ईसा मसीह और गौतम बुद्ध से करते हैं। इस सन्दर्भ में विश्व-प्रसिद्व नोबेल-पुरस्कार विजेता लेखक रोमेन रोलैंड व गाँधी की प्रसिद्व शिष्य मीरा बहन, जिसे वे अपनी बेटी मानते थे, के बीच हुए वार्तालाप का सन्दर्भ देना अप्रासंगिक न होगा। मीरा बहन का मूल नाम मैडलीन स्लेड था तथा उस के पिता भारतीय सेना में तैनात, ब्रिटिश के सेनाधिकारी थे। मैडलीन स्लेड अपनी युवावस्था में किसी आध्यात्मिक गुरु की तलाश में बेचैन सी थी। इसी सिलसिले में वह फ्रांस गई, जहाँ उस की भेंट रोमेन रोलैंड से हुई और उस ने उन्हें अपनी समस्या बताई। रोमेन रोलैंड ने मैडलीन स्लेड से पूछा- 'क्या तुम ने महात्मा गाँधी का नाम सुना है?' मैडलीन ने कहा- 'नहीं तो!' रोमेन रोलैंड ने फ़ौरन कहा- 'वह इस पृथ्वी पर एक और यीशु हैं।' मीरा बहन एक वर्ष की तैयारी के बाद भारत आई तो गाँधी जी की बेटी बन कर उन के साथ आश्रम में रहने लगी। वह सन् 55 तक भारत में रही थी।
गाँधी जब बैरिस्टर बनने के उद्देश्य से पहली बार घर से बाहर निकले और लंदन गए तो वहां की शाकाहारी संस्था के सदस्य भी बने, पर उनकी प्रारंभिक शख्सियत पर ईसाई धर्म का प्रभाव स्पष्ट था और समय के साथ ईसा की तरह वे भी अहिंसा के पुजारी बन गए। ईसा ने ही कहा था कि यदि कोई आप को एक गाल पर तमाचा मारे तो फ़ौरन अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो। गाँधी जी ने ईसा की इस शिक्षा को अक्षरशः आत्मसात् कर लिया और अपने अनुयायियों को भी यही शिक्षा दी। समाज में इस शिक्षा की खिल्ली उड़ाने वाले भी कम नहीं, तो सावरकर की तरह उल्टी शिक्षा देने वाले भी कमी नहीं कि अहिंसा किसी भी देश की अवनति का कारण होती है। इस के प्रमाण स्वरुप सावरकर मौर्य वंश के महानतम सम्राट अशोक का उदहारण देते हैं कि जब तक वे बुद्ध धर्म की शरण में नहीं गए थे, तब तक उन्होंने दिग्विजय हासिल कर ली। कलिंग युद्ध भी जीत लिया, पर बुद्ध की शरण में जा कर अहिंसा का पुजारी बनते ही अशोक महान के साम्राज्य का पतन हो गया और सन् 184 ई. पू में उन के ही एक वंशज राजा वृहदरथ को उस के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मार कर मौर्य वंश को समाप्त कर के अपना शुंग वंश स्थापित किया! बहरहाल, आज के इस विध्वंसकारी आतंकी युग में भी गाँधी की अहिंसा किस सीमा तक ज़रूरी है, इस का प्रमाण यही है कि सन् 2007 में संयुक्त राष्ट्र ने गाँधी जन्म-दिवस (2 अक्टूबर) को 'अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' घोषित कर दिया। पर सन् 2009 की एक विशिष्टता यह भी है कि इस वर्ष से पूरे 100 वर्ष पहले, यानी 1909 में गाँधी ने एक बेहद विवादस्पद पुस्तक 'हिंद स्वराज' भी लिखी थी, जिस के विषय में मैं अपनी पिछली रिपोर्ट 'गाँधी की पुस्तकों पर हिंदी अकादमी द्वारा यादगार कार्यक्रम' ('हिन्दयुग्म' 24 अगस्त 2009 ) में भी लिख चुका हूँ। इस पुस्तक के लेखन की शताब्दी पर देश भर में गोष्ठियों और पुस्तक-विमोचनों का एक सिलसिला सा चल पड़ा है, जो जाने माने पत्रकार प्रभास जोशी के अनुसार 22 नवम्बर तक चलता रहेगा। गाँधी जी ने यह पुस्तक 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका (जहाँ उन्होंने 1893 से 1914 तक भारतवासियों के साथ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष किया), लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में केवल दस दिन में (13 नवम्बर से 22 नवम्बर) लिख डाली थी। पुस्तक की तुलना विश्व के कई महापुरुष 'श्रीमद भगवद गीता' और 'बाइबल' तक से करते हैं, हालांकि कई विद्वान इस प्रकार की भावना से इत्तेफाक नहीं रखते। उन का मानना है कि पुस्तक बेहद अव्यवहारिक है, और आज के युग की इस तेज़ रफ्तार ज़िन्दगी में इस पुस्तक की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। परन्तु पत्रकार प्रभास जोशी व देश के अनेक बुद्धिजीवी ऐसा नहीं मानते। गाँधी जन्म दिवस 2 अक्टूबर 2009 की पूर्व संध्या यानी 1 अक्टूबर 2009 को 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' में गाँधी सम्बंधित फोटो-प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद प्रभास जोशी ने अपने भाषण में 'हिंद स्वराज' को आज भी पूर्णतः प्रासंगिक माना। इस अवसर पर 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' द्वारा संकलित व प्रकाशित, अंग्रेज़ी पुस्तक 'Gandhiji on Hind Swaraj and Select Views of Others' का विमोचन भी प्रभास जोशी के कर कमलों से हुआ। मंच पर प्रभास जोशी के साथ उपस्थित थे 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' के चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद व कार्यक्रम का संचालन कर रही थी संग्रहालय की निदेशिका डॉ. वर्षा दास। सभागार में कन्हैयालाल नंदन व अन्य कई विद्वान भी उपस्थित थे। गाँधी के सत्य व अहिंसा से तो आज भी विश्व के विचारकों का एक बहुत बड़ा वर्ग सहमत है, लेकिन गाँधी ने 'हिंद स्वराज' में विज्ञान तक का विरोध किया है, इस लिए कतिपय लोग उन के विचारों को या तो पुरातनपंथी मानते हैं, या फिर दकियानूसी। परन्तु प्रभास जोशी ने स्पष्ट किया कि गाँधी यह मानते थे की मशीन और विज्ञान इंसान को गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकते। वैसे मशीन के विरुद्ध रह कर भी एक सत्य यह है कि गाँधी स्वयं मानते थे कि मशीन का हम कितना भी विरोध करें, मशीन रहेगी. यह बात एक विरोधाभास जैसी भी लग सकती है। इस अवसर पर लोकार्पित पुस्तक के एक लेख में भी गाँधी के सचिव महादेवन देसाई, दो विदेशी विचारकों, मिडलटाऊन मुर्रे व प्रो. डेलिसले बर्न्स के उदहारण दे कर उनके और गाँधी के बीच मशीन पर हुए वार्तालाप को संदर्भित करते हैं। मिडलटाऊन कहते हैं कि गाँधी यह भूल जाते हैं कि जिस चरखे को वे बहुत प्यार करते हैं, वह चरखा भी तो आखिर एक मशीन है, जबकि डेलिसले कहते हैं कि नाक पर सवार चश्मा भी तो आखिर नज़र के लिए एक मशीनीकृत उपकरण ही है न! किसान का हल भी एक मशीन है और कुँए से पानी खींचने की चरखी भी हज़ारों साल से इंसान की ज़िन्दगी की बेहतरी के लिए किये गए मशीननुमा प्रयासों में से एक रही है। गाँधी मशीन द्वारा दुरुपयोग की बात करते हैं, पर यदि दुरुपयोग बुराई है तो दुरुपयोग को ही बुराई कहा जाए, मशीन को क्यों! गाँधी कहते हैं कि यूं तो इंसान का शरीर भी एक मशीन ही है न! मैं जिस बात पर आपत्ति करता हूँ, वह मशीन नहीं है, वरन मशीन के प्रति एक जूनून सा है। इन्हें मेहनत बचाने का जूनून है, और मेहनत बचाने का उपकरण ये मशीन को मानते हैं। लोग मेहनत बचाते जाते हैं, जब तक कि हज़ारों लोग बेरोज़गार नहीं हो जाते और भुखमरी में जीने के लिए गलियों में झोंक नहीं दिए जाते। मैं चाहता हूँ कि मेहनत की बचत हो, परन्तु सारी मानव जाति के लिए, न कि मुट्ठी भर लोगों (पूंजीपतियों) के लिए। गाँधी आगे स्पष्ट करते हैं कि अपनी बात में मैं चंद प्रबुद्ध अपवाद (Intelliegent exceptions) ज़रूर लूँगा, जैसे कि 'सिंगर सिलाई मशीन' ही लीजिये। यह कुछ चुनिन्दा उपयोगी वतुओं में से है और इस मशीन में कितना तो रोमांस है!
इस पर प्रश्नकर्ता चुटकी ले कर पूछते हैं कि फिर तो इस 'सिंगर सिलाई मशीन' को बनाने के लिए भी एक बड़ा कारखाना होगा। गाँधी का उत्तर था- 'हाँ, पर में प्रचुर मात्रा में समाजवादी हूँ और कहूँगा कि ऐसे कारखाने राष्ट्रीयकृत हों और राज्य द्वारा नियंत्रिंत हों'...(लोकार्पित पुस्तक पृष्ठ 235 -36 )।
प्रभास जोशी ने मशीन के प्रति मानव की गुलामी का ज़िक्र करते हुए कहा कि गाँधी जी के अर्थों में 'स्वराज' का अर्थ न तो 'आर्थिक स्वराज' था, न 'सामाजिक' और न 'राजनैतिक'. 'स्वराज' से उन का तात्पर्य शुद्ध 'आध्यात्मिक स्वराज' से था। पर गाँधी यह स्पष्ट करते थे कि 'आध्यात्मिक स्वराज' का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हिमालय की गुफाओं में जा कर रहना शुरू कर दे, वरन यदि इसी समाज में रह कर वह हर ऐसा कार्य करे, जो उसे उक्त सब स्वराजों से स्वतंत्र कर के 'आध्यात्मिक स्वराज' की तरफ ले जाए तो वह सही अर्थों में 'स्वराज' है।
अपने विस्तृत भाषण में प्रभास जोशी ने यह भी कहा कि गाँधी का सब से अधिक ज़ोर व्यक्ति के आचरण पर रहता था। वे 'स्वराज' की तलाश में निकले हुए आदमी थे और यह मानते थे कि जो कुछ उन्होंने कहा है, लिखा है, बोला है, वही उन का सन्देश भी है (वैसे गाँधी का यह वाक्य भी विश्व-प्रसिद्ध है - My Life is My Message)। जहाँ एक तरफ 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' चेयरमैन प्रो. बिमल प्रसाद ने 'हिंद स्वराज' को भारत के लिए एक manifesto कहा, जिस का सन्देश गाँधी के अनुसार यही कि 'हिंसा और पश्चिमी सभ्यता साथ-साथ चलते हैं तथा सत्याग्रह व भारतीय सभ्यता साथ-साथ चलते हैं', वहीं प्रभास जोशी ने कहा कि 'हिंद स्वराज' विश्व की तीन शीर्षस्थ पुस्तकों में से एक है जिन में कार्ल मार्क्स का विश्व प्रसिद्ध manifesto (Das Capital) भी है।
जिस सादगी से गाँधी ने जीवन जिया, व अपने आदर्शों को प्रतिपादित किया, वह सर्वविदित है। अतः गाँधी पर इस सभा में व्यक्त विचार भी सादगी से उतने ही परिपूर्ण, परन्तु सारगर्भित रहे। सभा समापन के बाद भी, जलपान के दौरान प्रभास जोशी कई आंदोलित-हृदय जिज्ञासुओं से घिरे रहे व गाँधी तथा 'हिंद स्वराज' को ले कर सब के मन के संशयों का निवारण करते रहे। यह स्वाभाविक भी था। जिस पुस्तक ने लियो तोल्स्तोय, हर्मन कालेनबैच (जिन्होंने ने दक्षिण अफ्रीका में जान्स्बर्ग के निकट 'तोल्स्तोय फार्म' के लिए गाँधी को ज़मीन दी थी) जैसे, विश्व के असंख्य दार्शनिकों विचारकों की नींद हराम कर के रख दी, और ब्रिटिश जिस पश्चिमी सभ्यता का भोंपू यहाँ बजाने आई थी, उसी को कटघरे में खड़ा कर दिया, उस पुस्तक की शाश्वतता का ही प्रमाण है कि आज भी वह मस्तिष्क को उद्वेलित कर के रख देती है और विचारों में एक आंदोलनकारी टकराहट पैदा करती है। वैसे इस पुस्तक को ले कर एक रोचक बात यह भी कि जब इसे गाँधी के राजनैतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले ने पहली बार पढ़ा तो कहा था कि यह पुस्तक किसी मूर्ख की कृति थी (सन्दर्भ The Good Boatman - A Portrait of Gandhi by Rajmohan Gandhi p 162)। परन्तु जब 1938 में भी इस पुस्तक का नया संस्करण गाँधी ने छपवाया तब उन्होंने भूमिका में लिखा कि पहले संस्करण से मुझे आज भी कोई भी परिवर्तन करने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई। इस पुस्तक में मैंने केवल एक शब्द बदला है, जो किसी महिला ने मुझे पत्र लिख कर कहा था कि कुछ असभ्य सा लगता है. उस एक शब्द के अतिरिक्त कहीं भी किसी भी प्रकार के परिवर्तन की ज़रुरत या द्वंद्व मैं अपने भीतर नहीं महसूस कर पाया हूँ! इस मात्र 30,000 शब्दों वाली अमर पुस्तक में आखिर ऐसा क्या है, कि वह हर दशक, हर सदी में चर्चा का एक संग्राम छेड़ देती है, यह जानने के लिए क्या बेहतर नहीं है किसी भी उचित स्रोत से इसे प्राप्त कर के तन्मयता से पढ़ा जाए!
देखिए- गाँधी की 140वीं जयंती की पूर्व संध्या पर गाँधी की पुस्तक 'हिन्द-स्वराज्य' पर अपने विचार व्यक्त करते वरिष्ठ पत्रकार प्रभास जोशी
पुनश्च- मेरे सीमित ज्ञान के अर्न्तगत इस पुस्तक को एक तो 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय', (दिल्ली) ने छपवाया है और एक 'हिंदी अकादमी' (दिल्ली) ने।
सूरीनाम स्थित भारत के राजदूतावास में 1-09-09 से 14-09-09 तक बड़े हर्षोल्लास के साथ हिंदी पखवाड़ा मनाया गया। इस दौरान सूरीनाम के चार जिलों निकेरी, कौमवेना, सरमक्का व पारामारीबो में हिंदी सुलेख और भाषण प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं। 1-09-09 को राजदूतावास व भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में एक परिपत्र जारी किया गया जिसमें सभी भारतीय अधिकारियों व कर्मचारियों को हिंदी में काम करने का अनुदेश दिया गया।
वीज़ा, पासपोर्ट लेने आने वाले व्यक्तियों के लिए भी नोटिस बोर्ड पर सूचना लगाई गई- यदि आप हिंदी में बात करेंगे तो हमें प्रसन्नता होगी। इसका काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा और अधिकांश आगंतुको ने हिंदी में बात की।
14 सितंबर 2009 को सायंकाल 7.30 बजे भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के सभागार में समापन समारोह में एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया और प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार वितरित किए गए। गोष्ठी में चर्चा के विषय थे-
साहित्य मानव जीवन का दर्पण सूरीनाम में रचित साहित्य हिंदी और सरनामी- परिचय व संबंध हिंदी और सरनामी- वर्तमान स्थिति (स्थानीय संदर्भ) साहित्यकारों के समक्ष कठिनाइयाँ- स्थानीय संदर्भ
इन विषयों पर सूरीनाम के जाने-माने विद्वान नारायणदत्त गंगाराम पांडेय, पं. हरिदेव सहतू, हिंदी छात्रा कृष्णा भिखारी और दो युवा हिंदी कर्मियों धीरज कंधई व निशा झाखरी ने अपने विचार व्यक्त किए।
भारत के राजदूतावास की अताशे (हिंदी व संस्कृति) भावना सक्सैना ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि भारत से 16,000 कि.मी दूर हिंदी का यह उत्सव हिंदी कर्मियों को नमन करने और हिंदी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए है। उन्होंने सूरीनामवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी भाषा के साथ-साथ देवनागरी लिपि को भी अपनाएँ क्योंकि लिपि में भाषा के प्राण हैं।
सूरीनाम में भारत के राजदूत, कँवलजीत सिंह सोढी ने भारत की सर्वशिक्षा प्रणाली का उल्लेख करते हुए हर हिंदी जानने वाले से एक और व्यक्ति को हिंदी सिखाने का आग्रह किया।
इस कार्यक्रम में लगभग 200 हिंदी कार्यकर्ताओं व हिंदी प्रेमियों ने उपस्थित होकर आयोजन को सफल बनाया।
रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला दिल्ली महानगर को साहित्यिक सरगर्मियों की भी राजधानी माना जाता रहा है. दिल्ली में साहित्य की अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं और प्रतिमाह यहाँ कई जगह काव्य गोष्ठियां भी आयोजित होती रहती है. 'परिचय' भी एक सशक्त साहित्यिक संस्था है जो दो दशक से भी अधिक समय से अपनी साहित्यिक गतिविधियों के लिए सुप्रसिद्ध है. 'परिचय' संस्था की गोष्ठियों में हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार यथा बालस्वरूप राही, गंगाप्रसाद विमल, पद्मा सचदेव, हिमांशु जोशी, रामदरस मिश्र, चित्रा मुद्गल आदि समय समय पर शिर्कत करते रहे हैं. प्रसिद्ध दूरदर्शन धारावाहिक 'रामायण' के निर्माता स्व. रामानानंद सागर ने भी अपने जीवन काल में यहाँ पदार्पण किया. इस के साथ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, सीमाब सुल्तानपुरी, ममता किरण, नमिता राकेश, अर्चना त्रिपाठी, रविन्द्र रवि, वीरेंद्र सक्सेना व कई अन्य काव्य हस्तियां प्रायः यहाँ की काव्य गोष्ठियों को गरिमा प्रदान करती रही हैं. दि. 19 अगस्त 2009 को भी दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित 'Russian Cultural Centre' की काव्य गोष्ठी एक सशक्त काव्य गोष्ठी थी जिस में बहुचर्चित पुरस्कृत कवि अभिरंजन कुमार को विशिष्ट कवि के रूप में आमंत्रित किया गया था. इस के अतिरिक्त श्री बृज अभिलाषी गोष्ठी के दूसरे विशिष्ट कवि थे. पिछले दशक में तेज़ी से चर्चा में आए हिंदी कविता के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर अभिरंजन कुमार ने अपने एक बहुचर्चित लेख 'हिंदी कविता: तलाश पांचवें पाठक की' की भूमिका के रूप में एक कविता लिखी थी:
...कविता क्यों कि सीधे दिल में उतरती है और/ देर तक उसमें रह सकती है/ कविता क्यों कि दुर्गम से दुर्गम भाव-भूमि पर /सीना ठोंक कर आगे बढ़ सकती है/ कविता क्यों कि पढ़े बे-पढ़े सब की ज़बान पर आसानी से चढ़ सकती है/ कविता क्योंकि गीत बन सकती है/नारा बन सकती है/ किसी आन्दोलन का झंडा बन सकती है/ कविता क्यों कि जड़ होती परम्पराओं/ हर तरह के अन्यायों और साज़िशों के खिलाफ/ पहरेदार का डंडा बन सकती है/ कविता क्यों कि लोगों को जगा सकती है/ ...
इसलिए आज भी यह उतनी ही ज़रूरी है, जितनी सौ या हज़ार साल पहले थी, आगे भी रहेगी...
एक समय ऐसा भी आया कि कविता को एक 'इंडस्ट्री' माना गया और शहर फिरोज़ाबाद में जैसे हर दस कदम पर चूड़ियाँ मिलती हैं, वैसे देश में भी हर दस कदम पर कोई न कोई कवि अपनी कविताओं का पुलिंदा लिए कहीं जाता नज़र आया. कुछ विद्वान इस का मूल कारण कविता को छंद से मुक्त करना मानते रहे. इसलिए अभिरंजन का उक्त लेख जब सन् 2000 में छपा तो देश भर में कविता को ले कर विचारोतेजक विवाद छिड़ गए. छंद कविता या छंद-स्वछन्द कविता के हिमायतियों के बीच वाक्-युद्ध होने लगे. पर अंततः स्थापित वही बात हुई जो ऊपर संदर्भित काव्य पंक्तियों में अभिरंजन ने कही है. अभिरंजन ने इस गोष्ठी में अपनी कविताओं द्वारा इस बात का ठोस प्रमाण दिया कि कविता को छंद-बद्धः या छंद-मुक्त के खानों में बांटना गलत है. उन के बहुचर्चित संग्रह 'उखड़े हुए पौधे का बयान' में कई सशक्त कविताएँ संकलित हैं जो छंद में भी हैं और छंद-मुक्त भी . इस गोष्ठी में जो कविताएँ उन्होंने एक विशिष्ट कवि के रूप में पढ़ी उन में से 'ये काले गोरे बादल' कविता कवि के भीतर व्याप्त प्रकृति-प्रेम व धरती की व्यवहारिक चिंताओं के अनूठे सम्मिश्रण से साक्षात्कार कराती है:
पानी से बनाते हैं पहाड़ ये/किरणों से हिरणों का आकर ये/ घोड़ों की, हाथियों की ड्राइंग करते हैं... ...इतना बड़ा कैनवस! इतनी बड़ी पेंटिंग!/ भूल गई अपने पंख तितली!...
और आसमान के खेत को देखते ही देखते/ जाने किस तरह जोत डालते हैं/ कौन से ट्रैक्टर हैं, दिखते नहीं हैं/ Horse Power कितना है, लिखते नहीं हैं/ ऐसा किसान धरती पे होता/ बंजर पे होता, परती पे होता/ खुशहाली होती फिर हर ओर...
दूसरे विशिष्ट कवि बृज अभिलाषी ने बहुत सुन्दर गज़लें पढ़ी. कुछ आध्यात्मिक रंग में रंगी. कुछ ज़िन्दगी की सच्चाइयों को, मर्म-स्पर्शी अंदाज़ में कहती. जैसे (कुछ शेर):
मंदिर मस्जिद गिरजा देख सब में उस का जज़्बा देख दैरो हरम से आगे जा फिर तू उस का रस्ता देख
किसी मज़लूम को सताना क्या गिरती दीवार को गिराना क्या अपने ही ग़म से किस को फुर्सत है जान पहचान का बढ़ाना क्या जिस को देखो अना का कैदी है खुद्फ़रेबी का है ज़माना क्या
लज़्ज़ते इंतज़ार क्या कहिये इंतज़ार इंतज़ार होता है राही तनहा कभी नहीं चलता साथ गर्दो-गुबार होता है. (दैर = मंदिर, हरम = मस्जिद, मज़लूम = सताया हुआ, अना = अहम् खुदफरेबी = आत्म छलावा)
प्रायः हिंदी कवियों का एक सर्वप्रिय विषय रहा है 'रिश्ते'. इस पर एक के बाद एक कविताएं आने लगी. जैसे रविन्द्र रवि का यह शेर:
बिस्तर पे सिमट आए थे सहमे हुए बच्चेमाँ बाप में झगड़ा था असर और कहीं था.
'रिश्तों' के इस कसैलेपन को अपने तरीके से कहती शोभना मित्तल:
ढूँढें किधर/ खो आए कहाँ पर/ मिठास रिश्ते... मन का कांच/ धुंधला कर देते/ चटके रिश्ते...
सुभाष नीरव हमारे बीच/ भाषा की एक नदी/ बहा करती थी/जाने क्या हुआ/ एकाएक सूख गई/...भाषा की नदियाँ/ जब रिश्तों के बीच सूख जाती हैं/ तब आँखें ही तो /हमारे अधर होती हैं/ और हमारे कान भी/ आओ /दो दो कदम/ एक दूसरे की ओर हम बढ़ें/ आँखों की भाषा पढ़ें...
ममता किरण कविता लिखने व प्रस्तुत करने की मुखरता सुन्दरता के कारण काव्य गोष्ठियों में एक ख़ास पहचान बनाए हुए हैं, सो रिश्तों पर छोटी बह्र में उनके चंद शेर: सफ़र में हैं दो ही मौसम हँसना है या रोना है क्यों ना उनको तोड़ ही दो जिन रिश्तों को ढोना है उसको पाने की खातिर उस में खुद को खोना है
विज्ञान व्रत पूजता हूँ मैं उसे अब वो पत्थर है सो है
एकदम नई कवियत्री रानी ने प्रेम-भावना को अपने अबोध शब्दों में कह डाला. जैसे:
कल्पित वृक्ष की छाया बन, मैं तेरी ओट सजाऊं पिया बन अधिकरण तुझ में ही कहीं विलीन हो जाऊं पिया.
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी आज भी अपने प्रभावशाली स्तर के होते बुलंदियों पर थे. उनसे बार बार एक और कविता सुनाने की फरमाइशें हो रही थी. उनकी एक कविता की चंद पंक्तियाँ:
ऊब जाता हूँ मैं जब शह्र के शोरो गुल से मुझे वो गाँव की अमराइयाँ बुलाती हैं कुछ नए फूल खिले हैं ज़िंदगी के आंगन मेंजवां दिलो तुम्हें शहनाइयां बुलाती हैं पहुँच गए हो बुलंदी के जिस मुकाम पे तुमउसी मुकाम पे तन्हाइयां बुलाती हैं
कवि सुभाष चंदर ने व्यवस्था के विरुद्ध मन में उभरते आक्रोश की बेबसी व्यक्त की या उस के खोखलेपन पर करारा व्यंग्य किया! शायद दोनों एक साथ: कौन कहता है कि व्यवस्था के प्रश्न पर/ मेरा लहू उबलता नहीं/ मेरी रगें गुस्से से चटखती नहीं/ आपने कभी देखा है कि/ ऐसे प्रश्नों पर मैं/ अपने मुंह से जलती सिगरेट निकाल कर/ कितनी बेदर्दी से/ जूतों से मसल देता हूँ!..
गोष्ठी संचालक अनिल मीत छोटी छोटी बह्र में बड़ी बड़ी बात कह जाते हैं: तनहा एक बशर होता हैदुनिया भर का डर होता है सदमों के हैं बोझ हज़ारों एक अकेला सर होता है.
'परिचय' की स्थायी अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने वैसे तो कई सशक्त कविताएँ और गज़लें लिखी हैं, पर हिंदी की काव्य-धारा में उन्होंने स्वयं को एक कृष्ण-समर्पित कवि के रूप में भी स्थापित किया है. कृष्ण की शक्ति को वे अपने भीतर पूरी आस्था से महसूस करती हैं. कृष्ण का स्वरुप उन के मानस पटल पर क्षुधित -पीड़ित मानवता के संबल के रूप में स्थापित है. जैसे (चंद पंक्तियाँ): हे कृष्ण ! द्रौपदी का दिव्य पात्र मुझे दे दो/ और दे दो अपनी एक दाने से तृप्त होने वाली संतुष्टि!/ मैं जग में बाँट दूँगी उसे! / क्षुधार्त मानवता को संतुष्टि का अन्न दूँगी/ उस के लहुलुहान पैरों को/ राहत की साँसें दूँगी... उर्मिल द्वारा रचित कृष्ण चेतना से जुड़ी कई कविताएँ 'परिचय' द्वारा ही प्रकाशित कविता संग्रह 'परिचय राग' में भी संकलित हैं जिस में उर्मिल समेत 15 समकालीन कवियों की कविताएँ संकलित हैं.
गोष्ठी अध्यक्ष 'सीमाब' सुल्तानपुरी उर्दू शायरी में एक सिद्धहस्त हस्ताक्षर हैं. भाषा की विद्वता, बह्र की महारत, व शायरी के भाव-पक्ष में वे अपना सानी नहीं रखते. गोष्ठी संपन्न करते हुए उन्होंने अपनी कुछ सशक्त गज़लें पढ़ी, जिन का एक एक शेर मन में अमित छाप छोड़ता. (चंद शेर):
मुझे देने को उस ने घर दिया है मगर बेदख्ल भी तो कर दिया है जगह मेरे लिए घर में कहाँ है तेरी यादों ने यह घर भर दिया है हुआ है कुछ न कुछ 'सीमाब' तुझ को किसी ने या तुझे कुछ कर दिया है
आदमी के आईने में देख कर अपनी सूरत से खुदा शर्मा गया मुस्कराहट का कफ़न दे कर कोईआरज़ू को दिल में ही दफना गया दिल तो था 'सीमाब' का शीशा सिफतपत्थरों के शह्र में पथरा गया (शीशा सिफत = शीशे जैसा).
'सीमाब' अपनी गज़लों के एक मजमुए 'खुला आकाश' के फ्लैप पर लिखते हैं:
दिल में धरती की कशिश रखता हूँ मैं ज़हन में मेरे खुला आकाश है.
उर्दू के इस मशहूर शायर का ज़ाती परिचय इन से बेहतर शब्दों में नहीं हो सकता.
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