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Sunday, October 24, 2010

समाचार पत्रों की बिक्री संख्या पर भी स्टिंग ऑपरेशन होना चाहिये– आलोक मेहता



“समाचार पत्रों की इन्फ़लेटिड बिक्री संख्या की जांच होनी चाहिये। सरकारी विज्ञापन पाने के लिये समाच्रार पत्र बिक्री संख्या कहीं बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली जैसे शहर में टेम्पो प्रिटिंग प्रेस से अख़बार ले कर चलता है और शाहदरा के किसी गोदाम में डम्प कर देता है।” यह कहना था वरिष्ठ पत्रकार एवं नई दुनियां के सम्पादक पद्मश्री आलोक मेहता का। आलोक मेहता इन दिनों लंदन यात्रा पर हैं और कल शाम वे लंदन के नेहरू केन्द्र में पत्रकारों और साहित्यकारों को सम्बोधित कर रहे थे। इस गोष्ठी का आयोजन कथा यूके एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने मिल कर किया था।

कथा यूके के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने आलोक मेहता का परिचय करवाते हुए उनकी महत्वपूर्ण कृति पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा के हवाले से भारत में हाल ही में हुई घटनाओं पर भारतीय मीडिया की भूमिका पर आलोक मेहता से टिप्पणी करने को कहा – जिनमें रामजन्म बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्च न्यायालय का फ़ैसला; कॉमनवेल्थ खेल; आतंकवाद आदि शामिल हैं।

आलोक मेहता का मानना है कि यदि हम बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के समय की पत्रकारिता की आज की पत्रकारिता से तुलना करें तो हम पाएंगे कि मीडिया ने ख़ासे सयंम का परिचय दिया है। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों को भी हमने अपने साथ जोड़ा है और तय किया गया है कि सेसेनलिज़म से बचा जाए। सरकार को खासा डर था कि इस निर्णय के बाद दंगों की आग से फैल सकती है। मीडिया ने पुराने मस्जिद टूटने के चित्रों का इस्तेमाल नहीं किया। और कुल मिला कर समाचार कवरेज परिपक्व रहा।


लंदन के नेहरू केन्द्र में गोष्ठी के बाद बैठे हुए बाएं से दाएं – डा. अचला शर्मा (उपाध्यक्ष कथा यू.के.), कैलाश बुधवार, डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, पद्मश्री आलोक मेहता, मोनका मोहता, तेजेन्द्र शर्मा (महासचिव कथा यू.के.)। खड़े हुए बाएं से दाएं – डा. हिलाल फ़रीद, दिव्या माथुर, परवेज़ आलम, डा. मधुप मोहता, शिखा वार्षणेय़। - चित्रः विजय राणा।

आलोक मेहता ने स्वीकार किया कि कॉमनवेल्थ खेलों के कवरेज में कुछ अति अवश्य हुई, मगर यह ज़रूरी भी थी। यह ठीक है कि खेलों और भारत की छवि विश्व में कुछ हद तक धूमिल हुई, मगर इसी वजह से सरकारी मशीनरी हरक़त में आई और अंततः खेल सही ढंग से संपन्न हो पाए। उन्होंने बताया कि जब वे नई दुनियां में खेलों की तैयारी के बारे में समाचार प्रकाशित करते थे तो राजनीतिज्ञ सवाल भी करते थे कि उनके विरुद्ध क्यों समाचार प्रकाशित किए जा रहे हैं। दरअसल सरकार की हालत ऐसी है जैसे इन्सान एंटिबॉयटिक से इम्यून हो जाता है ठीक वैसे ही सरकार भी आलोचना से इम्यून हो चुकी है।

वरिष्ठ पत्रकार विजय राणा का मत था कि डी.ए.वी.पी. के माध्यम से सरकार सरकार समाचार पत्रों को विज्ञापन दे कर अपने विरुद्ध लिखने से रोकने में सफल हो जाती है। हिन्दुस्तान टाइम्स एवं टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे दैत्यों को तो करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं। क्या ये विज्ञापन भी भ्रष्टाचार नहीं फैलाते।

मधुप मोहता का सवाल था कि सत्तर हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर कॉमनवेल्थ खेल करवाए जा सकते हैं तो केवल सौ करोड़ का ख़र्चा कर के हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा क्यों नहीं बनवाया जा रहा। इस पर आलोक मेहता का कहना था कि इसमे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यदि सरकार 10 बड़े व्यापारी घरानों से पैसा इकट्ठा करने को कहे तो सौ करोड़ रुपये महीने भर में इकट्ठे हो सकते हैं। शिवकांत को समस्या इस बात में दिखाई देती है कि प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को कैसे मनाया जाए कि वे व्यापारी घरानों को इस विषय में संपर्क करें।

कथा यूके की उपाध्यक्ष डा. अचला शर्मा की चिन्ता थी कि मह्तवाकांक्षा की भाषा अंग्रेज़ी बन गई है। जब तक हिन्दी तरक्की और बेहतरी से नहीं जुड़ेगी उसे उसका सही दर्जा नहीं मिल पाएगा।

डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव का कहना था कि भाषा में दिनमान के ज़माने से आजतक ख़ासा परिवर्तन आ गया है। अब प्रिन्ट मीडिया की भाषा आम इन्सान की भाषा हो गई है। आलोक मेहता ने कहा कि हमें सतर्कता बरतनी होगी। हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्द आने से हिन्दी अधिक समृद्ध होगी मगर यह हमें सावधानी से करना होगा। जो नये शब्द हैं उन्हें हिन्दी में ज़रूर शामिल किया जाए, जैसे कि मेट्रो के लिये नया शब्द गढ़ने की ज़रूरत नहीं। मगर हिन्दी के प्रचलित शब्दों को हटा कर उनके स्थान पर अंग्रेज़ी के शब्द न थोपे जाएं।

नेहरू सेन्टर की निदेशक मोनिका मोहता ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। एक सार्थक शाम पूरी होने का अहसास सबके मन में था।

Friday, August 20, 2010

महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को बाल साहित्य की प्रथम प्रति समर्पित



63वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को एट होम समारोह में वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्री शमशेर अहमद खान द्वारा रचित और मीरा पब्लिकेशंस, 49-बी/37, न्याय मार्ग, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित संतोष का फल मीठा तथा चांद पर पलाट ले लो की प्रतियां भेंट की गईं. इस अवसर पर पद्मश्री डॉ. श्याम सिंह शशि के अलावा सांसद, वरिष्ठ अधिकारी, गणमान्य अतिथि उपस्थित थे.



प्रस्तुति- मुनिश परवेज़ राणा
बी-1/44, डी.एल.एफ.
दिलशाद एक्टेंशन-2, साहिबाबाद, गाजियाबाद (उ.प्र.)

Friday, April 10, 2009

राष्ट्रपति से बालसाहित्यकारों एवं बालकल्याण से जुड़े प्रतिनिधियों की भेंट और बालसाहित्य संरक्षण के प्रस्ताव


08 अप्रैल 2009,सायं 6.00 बजे दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में ८० से अधिक लोगों के एक समूह ने, जिसमें २० से अधिक बाल साहित्यकार भी शामिल थे, महामहिम प्रतिभा देवी पाटिल से मुलाक़ात की और बाल-साहित्यारों के प्रोत्साहन हेतु तथा बालसाहित्य के संरक्षण हेतु कुछ प्रस्ताव रखे। प्रस्ताव द हिंदु, यंग वर्ल्ड के संपादक ज़ियाउस्सलाम, डॉ. हरिभाओ खांडेकर एवं डॉ.शकुंतला कालरा की ओर से रखे गये।

कार्यक्रम की शुरूआत में श्री प्रकाश जायसवाल,गृह राज्यमंत्री,भारत सरकार, डॉ. श्याम सिंह शशि, डॉ. राष्ट्रबंधु, शमशेर अहमद खान और रामनाथ महेंद्र की ओर से महामहिम को पुष्पगुच्छ भेंट किया गया। इसके पश्चात डॉ. कृष्णशलभ ने अभ्यागतों का सामान्य परिचय करवाया। श्री जयजगन्नाथ, श्री अनिल कुमार मिश्र, बीरेंद्र महंती, विनोद अग्रवाल, जियाउस्सलाम, शमशेर अहमद खान, नागेश पांडेय संजय, श्रीमती शालिनी गुप्त, श्रीमती मिनती पटनायक, श्रीमती शकुंतला कालरा इत्यादि ने राष्ट्रपति को पुस्तकें भेंट की। गौरतलब है कि हिन्द-युग्म के बाल-मंच 'बाल-उद्यान' के सलाहकार-संपादक ज़ाकिर अली "रजनीश" भी बालसाहित्यकारों की इस मंडली में शामिल थे। उन्होंने भी महामहिम से भेंट की।

इसके बाद राष्ट्रपति ने समक्ष निम्लनिखित प्रस्ताव रखे गये-

1. भारतीय बालसाहित्य की गौरवमयी परंपरा रही है, उसे अक्षुण्ण रखने एवं इसमें सतत विकास हेतु बालविश्वविद्यालय अथवा बालसाहित्य अकादमी की स्थापना पर विचार किया जाय।

2. बालसाहित्यकारों को भी अधिकृत पत्रकारों की भांति सरकारी सुविधाएं दी जाएं। यथा- कुछ राज्यों ने बालसाहित्य संगोष्ठी के दौरान राज्य परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क यात्रा की छूट दी है, ऐसी छूट सभी राज्यों से दिलवाई जाए। यही सुविधा रेल में भी दिलवाई जाए।

3. राज्यसभा व लोक सभा में बालसाहित्यकारों के लिए सीट आरक्षित की जाए।

4. पद्मपुरस्कारों में बालसाहित्यकारों को भी शामिल किया जाए।

5. बालसाहित्यकारों को सरकारी चिकित्सा निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए।

6. बालसाहित्य के अनुरक्षण के लिए केंद्रीय पुस्तकालय की व्यस्था की जाए।


इन प्रस्तावों के अनुमोदन के बाद महामहिम राष्ट्रपति का उद्‍बोधन हुआ।