Friday, April 24, 2009

औपनिवेशिक साहित्य भारतीय मनीषा का साहित्य नहीं है- चित्रा मुद्गल

कोच्चि विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में राष्ट्रीय संगोष्ठी

तमाम भौगोलिक विविधता के बावजूद भारतीयता का भाव प्रकृति से मिलता है, जो बच्चों के मन में गहरे पैठता है। ये कहना है प्रख्यात कथा लेखिका चित्रा मुद्गल का। वह कोच्चि विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में यू.जी.सी. के डी.आर.सी. प्रोजेक्ट के तहत द्विदिवसीय (24-25 मार्च, 2009) राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्‍घाटन कर रही थीं, जिसका विषय था ‘भारतीयता और समकालीन हिन्दी कथा साहित्य।’ हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ एन. मोहनन की अध्यक्षता में आरंभ हुई संगोष्ठी का उद्घाटन करती हुई चित्रा मुद्गल ने कहा कि औपनिवेशिक साहित्य भारतीय मनीषा का साहित्य नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता ने ही मिट्टी-पानी डालकर उसे सींचा है। लगभग दो घंटे तक दिए अपने धाराप्रवाह बीज भाषण के बीच श्रीमती मुद्गल ने कहा कि समाज जितना कठिन होगा, उसका जीवन और साहित्य भी उतना ही जटिल होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस देश का बौद्धत्व, महावीरत्व, शंकराचार्यत्व, इस्लामत्व, ईसाइत्व आदि सब का सब केवल इस देश की मिट्टी-पानी में सना-पगा है और हमारी भारतीयता का हिस्सा है।

उद्‍घाटन सत्र में अतिथियों का स्वागत संगोष्ठी की संयोजक डॉ के. वनजा ने किया, जबकि डॉ पी.ए.शमीम अलियार एवं डॉ एन.मोहनन द्वारा चित्रा मुद्गल को शॉल एवं स्मृतिचिह्न प्रदान कर उनका सम्मान किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि-समालोचक एवं ‘नई धरा’ के संपादक डॉ शिवनारायण ने विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘अनुशीलन’ के ‘दिनकर विशेषांक’ का लोकार्पण किया, जबकि ‘अनुशीलन’ के ‘महादेवी वर्मा विशेषांक’ का लोकार्पण कथाकार डॉ॰ कलानाथ मिश्र को समर्पित करते हुए चित्रा मुद्गल ने किया।

दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता के रुप में ‘नई धरा’ के संपादक डॉ॰ शिवनारायण ने ‘समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में भारतीयता’ विषयक भाषण करते हुए कहा कि समकालीन कथा साहित्य में भारत का भौगोलिक रुप उसका मृण्मयी रुप है, जबकि उसका आध्यात्मिक-सामाजिक रुप ही उसका चिण्मयी रुप है। आत्मवादी रुप बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिस कारण मनुष्य के इस जनसंघर्षी रुप की अभिव्यक्ति हिन्दी कहानियों में हुई है। डॉ शिवनारायण ने चित्रा मुद्गल सहित नासिरा शर्मा, कमल कुमार, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, उदय प्रकाश, शरद सिंह, वीरेन्द्र जैन, दूध्नाथ सिंह, मधुकर सिंह, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह आदि की कहानियों की विशद चर्चा करते हुए कहा कि पीड़ा की तपस्या की तरह जीने से ही दृष्टि को विस्तार मिलता है या कि अंदर का नर्क जितना बड़ा होगा, उतना ही बड़ा स्वर्ग बाहर रचा जाएगा।

चित्रा मुद्गल की अध्यक्षता में सम्पन्न इसी सत्र में डॉ॰ शशिधर (बंगलूरू) और डॉ वेलायुध्न (कालड़ी) ने भी अपने-अपने पत्र प्रस्तुत करते हुए कथा साहित्य में भारतीयता की चेतना को पुष्ट किया। अंत में चित्रा मुद्गल ने डॉ शिवनाराण के विद्वतापूर्ण व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय पारिवारिक सम्बन्धें एवं परिकल्पनाओं में भारतीयता का महान रुप निहित है। उन्होंने आत्मचिंतन पर बल देते हुए सेवा, त्याग, भाईचारा, विश्वास जैसे मूल्यों को बरकरार रखने की बात कही।

25 मार्च को संगोष्ठी का तीसरा सत्रा डॉ शिवनारायण की अध्यक्षता में आरंभ हुआ, जिसमें मुख्य वक्ता के रुप में चर्चित कथाकार डॉ॰ कलानाथ मिश्र ने कहा कि आधुनिकता के भीतर भी अपने संस्कारों को जीवित रखना चाहिए, जिससे भारतीयता अपने चैतन्य रुप में परिपुष्ट रहेगा। उन्होंने कहा कि आज अधिकतर सम्बन्ध जिये नहीं जा रहे ढोये जाते हैं, लेकिन हमारे ढोने और पश्चिम के ढोने में जो अंतर है, उसे उघारने का प्रयास समकालीन कहानियों में चित्रित हुआ है। अपनी सांस्कृतिक मूल्यों में हुए परिवर्तन को चित्रित करते हुए भी उसके प्रति एक आग्रह का भाव भी समकालीन कथा साहित्य में है। इस क्रम में डॉं॰ मिश्र ने कई महत्वपूर्ण समकालीन कहानियों की चर्चा की। इस अवसर पर पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ॰ बैजनाथ प्रसाद ने शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘वैश्वानर’ के विशेष संदर्भ में भारतीयता को उद्‍घाटित किया, जबकि डॉ॰ सुमा ने महिला कथा लेखिकाओं के उपन्यासों में भारतीयता को प्रस्तुत किया। डॉ॰ अनीता ने समकालीन आंचलिक उपन्यासों में भारतीयता पर प्रकाश डालते हुए अंचलों में भारतीयता के जीवंत होने का
मिशाल पेश किया।

इस सत्र के अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ॰ शिवनारायण ने कहा कि भारतीयता को समय सापेक्ष मूल्यों के संदर्भ में विश्लेषित करते हुए उसके उदान्त सौन्दर्य की परख होनी चाहिए, तभी उसकी चेतना का विकास दिखाई पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने साधुमत की अभिव्यक्ति के संरक्षण को ही साहित्य का मूल धर्म बताया और साहित्य को उसके चैतन्य रुप में समझने की हिदायत दी, न कि उसके स्थूल रुप में।
अंतिम सत्र डॉ॰ कलानाथ मिश्र की अध्यक्षता में आरंभ हुआ, जिसमें डॉ॰ रामप्रकाश, डॉ॰ जयकृष्णन्, सुश्री शीना, सुश्री टेरेसा आदि ने अपने शोध प्रपत्र प्रस्तुत किए।
कोच्चि विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पहली बार प्रो॰ एन. मोहनन एवं डॉ॰ के. वनजा के प्रयास से सम्पन्न इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को सपफल बनाने में सभी विभागीय शिक्षकों एवं छात्रा-छात्राओं के साथ-साथ स्थानीय कॉलेजों के हिन्दी शिक्षकों ने भी भारी संख्या में अपनी सक्रिय उपस्थिति से सहयोग किया।

प्रस्तुतिः
डा0 शशिधरण
(रीडर हिन्दी विभाग)
कोच्चि विश्वविद्यालय, कोच्चि (केरल)

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2 पाठकों का कहना है :

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

सारगर्भित रपट... कार्यक्रम वाकई स्तरीय रहा होगा. सभी वक्ताओं के वक्तव्य-सार उनके गहन ज्ञान के परिचायक हैं.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

चित्रा मुद्गल से शत-प्रतिशत सहमत हुआ जा सकता है। समकालीन साहित्य पर औपनिवेशिक साहित्य की शैली की झलकी ज़रूर मिल जाये, लेकिन कथ्य में हर जगह भारतीयता की व्याप्त है।

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