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Friday, December 31, 2010

महेश दर्पण ‘पुश्किन के देस में’



‘रूस के बारे में अभी तक जो संस्मरण या यात्रा वृत्तान्त हिंदी में प्रकाशित हुए थे, वे सभी उन लेखकों ने लिखे थे जो आज से बीस-पच्चीस साल पहले यानी सोवियत काल में रूस गए थे. सोवियत संघ के बिखराव के बाद रूस काफी बदल गया है. रूस का जीवन भी अब पहले जैसा नहीं रहा. महेश दर्पण ने हाल ही में रूस की यात्रा करने के बाद इसी बदले हुए ज़माने का बेहद आत्मीय, सच्चा और सहज चित्र प्रस्तुत किया है’ यह परिचय है ‘सामयिक प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित महेश दर्पण की सद्यप्रकाशित यात्रा वृत्तान्त पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ का जो रूसी साहित्यकार ल्युद्मीला ख्खलोवा द्वारा इसी पुस्तक के फ्लैप पर दिया हुआ है.
महेश दर्पण हिंदी साहित्य जगत व पत्रकारिता के एक जाने माने हस्ताक्षर हैं जिन्होंने ‘अपने हाथ’ ‘चेहरे’ ‘मिट्टी की औलाद’ ‘वर्त्तमान में भविष्य’ ‘जाल’ ‘इक्कीस कहानियां’ ‘एक चिड़िया की उड़ान’ आदि जैसे सशक्त कहानी संग्रह हिंदी साहित्य को दिये हैं तथा अनेक सम्मानों यथा ‘पुश्किन सम्मान’, ‘साहित्यकार सम्मान’, हिंदी अकादमी का ‘कृति सम्मान’ व ‘पीपुल्स विक्ट्री अवार्ड’ आदि से सम्मानित हुए हैं.
दि. 15 दिसंबर 2010 को उर्मिल सत्यभूषण द्वारा संचालित ‘परिचय साहित्य परिषद’ के तत्वावधान में नई दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित ‘राशियन कल्चरल सेंटर’ में महेश दर्पण की पुस्तक ‘पुश्किन के देस में’ पर एक बेहद सारगर्भित व विचारोत्तेजक गोष्ठी हुई जिस की अध्यक्षता राजेंद्र यादव ने की तथा प्रसिद्ध कवि विष्णु चन्द्र शर्मा, चित्रा मुद्गल व रमेश उपाध्याय इस संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता रहे.
प्रारंभ में ‘राशियन कल्चलर सेंटर’ की येलेना शटापकिना ने पुष्प भेंट किये तथा ‘परिचय साहित्य परिषद’ की ओर से प्रसिद्ध कवि लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने मंच पर उपस्थित विशिष्ट गण को पुस्तकों के रूप में शब्द-पुष्प भेंट किये.
गोष्ठी में विषय प्रवर्तन स्वयं ‘परिचय साहित्य परिषद’ की अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने किया और कहा कि इस पुस्तक में रूसी समाज का ऐसा जीवंत चित्रण है कि एक एक दृश्य आँखों के सामने घूमता सा नज़र आता है. ‘परिचय साहित्य परिषद’ की हर संगोष्ठी में ‘राशियन सेंटर’ की ओर से किसी न किसी प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार का जीवन वृत्त स्क्रीन पर प्रस्तुत किया जाता है. उर्मिल सत्यभूषण ने कहा कि आज ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक की चर्चा उसी शृंखला की एक कड़ी जैसी है.
येलेना ने अंग्रेज़ी में भाषण करते हुए एक भारतीय द्वारा रूसी समाज पर लिखी गई एक और पुस्तक पर प्रसन्नता प्रकट की तथा यह भी कहा कि पुस्तक पठनीय है व उसमें रूसी पाठकों के लिये भी कई नई जानकारियाँ हैं.
महेश दर्पण ने संक्षिप्त भाषण अपनी पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि पुश्किन का देस केवल रूस ही नहीं है, वरन पुश्किन का देस भारत भी हो सकता है. उन्होंने रूसी साहित्यकारों की उन कई प्रदर्शनियों का ज़िक्र किया जो रूस में उन्हें देखने को मिली.
वरिष्ठ कवि कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने महेश दर्पण की कहानियों में पारिवारिक संवेदना के संरक्षण की बात की. उन्होंने कहा कि परिस्थितियों के साथ रूस की तस्वीर बदली और महेश ने अपनी पुस्तक में बदलाव से पहले और बाद के रूस की अच्छी तुलना की है. उन्होंने भी महेश द्वारा वर्णित प्रदर्शनियों व रूसी समाज की झलकियों में चल्चित्रात्मकता का गुण होने की बात कही.
चित्रा मुद्गल ने कहा कि महेश दर्पण की यह पुस्तक एक उपन्यास सी लगती है और उन्होंने टूटते हुए रूसी समाज के जीवन में बहुत गहरे पैठ कर यह पुस्तक लिखी है. रूस के शहरों व गांवों का उन्हें बेहद प्रामाणिक विवरण इस पुस्तक में मिला तथा उन्होंने पुस्तक की पठनीयता की भी प्रशंसा की.



सभागार में एक सशक्त पुस्तक पर इतनी गंभीर चर्चा सुनते हुए हिंदी के कई जाने माने हस्ताक्षर यथा केवल गोस्वामी, हरिपाल त्यागी, सुरेश उनियाल, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, वीरेंद्र सक्सेना प्रेम जनमेजय आदि भी उपस्थित थे. रमेश उपाध्याय ने भी अपने भाषण में इस पुस्तक के औपन्यासिक प्रारूप होने की बात कही और कहा कि इस प्रकार मानो एक नई विधा का जन्म हुआ है. उन्होंने कहा कि ‘पुश्किन के देस में’ पुस्तक केवल उन्हें नहीं वरन उनके समस्त परिवार को बहुत अच्छी लगी.
अपने अध्यक्षीय भाषण में राजेंद्र यादव एक ‘नॉस्टाल्’ज्या सा महसूस करते हुए साठ वर्ष पहले के काल में पहुँच गए जब उन्होंने आगरा में चेखव को पढ़ना शुरू किया था. उन्होंने कलकत्ता की ‘नैशनल लाइब्रेरी’ में भी चेखव को खूब खंगाला. वैसे अपने समय में ही राजेंद्र यादव ने अपने किसी आत्याकथ्य में यह कहा था कि वे स्वयं को चेखव के अधिक निकट पाते हैं. उन्होंने काफी वर्ष पहले रूस पर लिखी हुई प्रभाकर द्विवेदी की पुस्तक ‘पार उतर कहं जइहोँ’ का सन्दर्भ दे कर कहा कि उस पुस्तक की तरह ‘पुश्किन के देस में’ भी एक लंबे अरसे तक उनकी स्मृति में रहेगी.
वैसे देखा जाए तो हिंदी साहित्य के कई कालजयी हस्ताक्षर रूसी साहित्य से प्रभावित रहे, यह बात स्वयं अपने आप में सर्वविदित है. जब भारत ब्रिटिश जैसी उपनिवेशवादी शक्ति के अधीन था तब भारत के स्वाधीनता संघर्ष से जुड़े कई नेताओं यथा नेहरु, सुभाषचंद्र बोस व भगत सिंह पर रूस के समाजवाद की बहुत गहरी छाप रही. भगत सिंह की जीवनी देखी जाए तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि उन्हें मृत्युदंड न मिलता तो भारतीय समाज को एक और लेनिन मिल जाता. साहित्य में भी प्रेमचंद और मैक्सिम गोर्की के व्यक्र्तित्वो कृतित्वों की परस्पर समानता सर्वविदित है. प्रेमचंद ने स्वयं अपनी सोच व साहित्य पर गोर्की के प्रभाव की बात कही थी. नई कहानी के दौर में भी मोहन राकेश राजेन्द्र यादव जैसे सशक्त हस्ताक्षर चेखव से पूर्णतः प्रभावित थे. रूस अब भले ही पहले जैसा रूस नहीं रह गया है और न ही भारत ही पहले सा समाजवादी रहा है, बाज़ार के दबाव में भारत के रूप में भी आमूलचूल परिवर्वन लगातार आ रहे हैं. पर इस के बावजूद भारतीय और रूसी समाज में अब भी कुछ ऐसा बचा है जो उन्हें अपने प्रारंभिक समय से जोड़ता है. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी पुस्तकें उसी समाज के एक एक्स-रे सी लगती हैं जो बदला तो तेज़ी से है पर अपनी कोख को शायद भूल नहीं पाया है व जिसमें अभी भी उस समय के कई अच्छी बुरे अवशेष बचे हैं. ‘पुश्किन के देस में’ जैसी अन्य कई रचनाओं की आवश्यकता है जो इस विषय को गंभीर शोध की तरह लें और भारत के अमरीका से नैकट्य व रूस से धीमी धीमी बढ़ती दूरी पर अपने चिंतन की प्रचुर रौशनी डालें.

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Tuesday, October 26, 2010

अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन

अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन



नई दिल्ली। यहॉं नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका हम सब साथ साथ द्वारा देश भर से चयनित दो दर्जन से अधिक युवा एवं 80 वर्ष से भी अधिक आयु तक के लघुकथाकारों को एक ही मंच पर इकट्ठा कर उनकी श्रेष्ठ लघुकथाओं के पाठ व उनको सम्मानित किए जाने का एक अनूठा कार्यक्रम आयोजित किया गया और यह सब हुआ प्रख्यात साहित्यकार श्रीमती चित्रा मुद्गल के
मुख्य आतिथ्य, कैपिटल रिपोर्टर के संपादक श्री सुरजीत सिंह जोबन की अध्यक्षता एवं लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार श्री बलराम व व्यवसायी श्री ए. पी. सक्सेना के विशिष्ट आतिथ्य में।



इस अवसर पर श्रीमती चित्रा मुद्गल ने हम सब साथ साथ पत्रिका के इस कदम की सराहना करते हुए लघुकथा के विकास पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि इसकी दशा व दिशा दोनों ही ठीक है। अब भावी पीढ़ी का दायित्व है कि वे इसे कहाँ तक ले जाते हैं। श्री जोबन ने कहा कि लघुकथा अपने आप में संपूर्ण कहानी समाहित किए हुए रहती है।



इसके पूर्व सम्मेलन की शुरूआत रेडियो सिंगर श्रीमती सुधा उपाध्याय की सरस्वती वंदना से हुई तत्पश्चात् कथाकार श्री बलराम ने लघुकथा के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लघुकथा आज विकासोन्मुख है।

सम्मेलन हेतु उ.प्र., म.प्र., राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, प. बंगाल एवं दिल्ली आदि से दो दर्जन से भी अधिक लघुकथाकारों को चयनित किया गया था। जिसमें से सम्मेलन में उपस्थित लघुकथाकारों ने अपनी श्रेष्ठ लघुकथाओं का पाठ किया और उसके पश्चात् उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रमाणपत्र, पुस्तकें प्रदान कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। लघुकथा पाठ एवं सम्मान हेतु चयनित वरिष्ठ लघुकथाकारों में सर्वश्री मो. मुइनुद्दीन अतहर, सनातन वाजपेयी, के. एल. दिवान, मनोहर शर्मा, देवेन्द्र नाथ शाह, सत्यपाल
निश्चिंत, गणेश प्रसाद महतो, राम बहादुर व्यथित, प्रदीप शशांक, तेजिन्द्र, माला वर्मा, अकेला भाइ, शरदनारायण खरे, दिनेश कुमार छाजेड़, आरती वर्मा, गीता गीत, देवांशु पाल, ज्योति जैन, नंदलाल भारती, एम. अशफाक कादरी एवं युवा लघुकथाकारों में सर्वश्री महावीर रवांल्टा, संतोष सुपेकर, शोभा रस्तोगी, समद राही, नरेन्द्र कुमार गौड़, कैलाशचंद्र जोशी, पंकज शर्मा एवं लाल बिहारी लाल के नाम उल्लेखनीय रहे।

समारोह का सफल संचालन सर्वश्री विनोद बब्बर एवं विवेक मिश्र ने किया एवं आभार पत्रिका के कार्यकारी संपादक श्री किशोर श्रीवास्तव ने व्यक्त किया।

-प्रस्तुतिः इरफान राही, (मीडिया प्रभारी) मो. 9971070545

Tuesday, December 15, 2009

कथाकार पत्रकार हरीश पाठक की पुस्तक त्रिकोण के तीनों कोण का लोकार्पण



पटना । 10 दिसम्बर

पटना पुस्तक मेला में वरिष्ठ पत्रकार, कथाकार हरीश पाठक की पुस्तक ‘त्रिकोण के तीनों कोण’ का लोकार्पण करते हुए ख्यातिलब्ध साहित्यकार चित्रा मुद्‍गल ने रचनाकारों से कहा कि ‘कम लिखो पर वह लिखो जो लिखना चाहिए’। एक लेखक के लिए यह जरूरी है कि वह उन समस्याओं को उठाए और समाज के सामने लाए जो उसके आसपास व्याप्त है। समाज में छिपी खामियों को उजागर करना रचनाकार के साहस का प्रतीक है। हरीश पाठक की रचना में वह आग है। उन्होंने कहा कि मेरे सीने में न हो/ तेरे सीने में सही/ हो कहीं भी आग पर वह आग लेकिन आग होनी चाहिए। त्रिकोण के तीनों कोण में वह आग दिखाई देती है। आम जनता के भीतर आज न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका से न्याय की उम्मीद कहीं खो गई है। यह किताब जनता की उस व्यथा के कुरूप और वीभत्स रूप को उजागर करती है जिसमें आज की संवेदनहीन समाज एक जलती हुई महिला को देखकर भी मूक तमाशबीन बना रहता है। उन्होंने कहा कि त्रिकोण का चौथा कोण लेखक स्वयं है। लेखक पत्रकारिता में भी गुंडों और दलालों के बढ़ते वर्चस्व पर बेबाकी से टिप्पणी करता हैं। यह लेखक के असीम साहस का परिचायक है जो सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् की झलक प्रदान करती है। पुस्तक का विमोचन करते हुए उन्होंने कहा कि उम्मीद करती हूँ कि इस किताब का असर समाज के तीनों स्तंभों पर जरूर पड़ेगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार तथा श्रम विभाग के प्रधान सचिव श्री व्यास जी ने किया। अपने अध्यक्षीय उद्‍बोधन में उन्होंने कहा कि पुस्तक समाज व देष की चर्चा करती है। लेखक जो कहना चाहता है वह सारा कुछ सामने आ जाता हैं। इस अवसर पर विशिष्ट वक्ता के रूप में अपना उद्‍गार व्यक्त करते हुए कथाकार, आलोचक डॉ॰ कलानाथ मिश्र ने कहा कि त्रिकोण के तीनों कोण समाज को आईना दिखाता है तथा उसकी त्रिआयामी तस्वीर उकेरता है। लेखक पत्रकारिता कर्म और साहित्य के बीच की दूरी को कम कर दोनों के बीच एक संतुलन बनाकर चलता है जो आज की आवश्कता है। इस अवसर पर कथाकार जियालाल आर्य, लेखक शैलेष्वर सती प्रसाद, डॉ ध्रुव कुमार ने भी पुस्तक के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन नईधारा के संपादक डॉ शिवनारायण ने किया तथा अतिथियों का स्वागत प्रभात प्रकाशन के निदेषक श्री पीयूष कुमार ने किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय सहारा के यूनिट मैनेजर मृदुल बाली, श्रीमती कमलेश पाठक, पटना पुस्तक मेला के सचिव श्री ए.के.झा, साहित्यकार श्री रिपुदमन सिंह, पूर्व कुलपति श्री अभिमन्यु सिंह, ए.एन. नन्द, मीरा मिश्र समेत बिहार के प्रमुख बुद्धिजीवी, साहित्यकार, पत्रकार उपस्थित थे।

प्रेषक-
शिवनारायण
सम्पादक, नईधारा

Friday, April 24, 2009

औपनिवेशिक साहित्य भारतीय मनीषा का साहित्य नहीं है- चित्रा मुद्गल

कोच्चि विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में राष्ट्रीय संगोष्ठी

तमाम भौगोलिक विविधता के बावजूद भारतीयता का भाव प्रकृति से मिलता है, जो बच्चों के मन में गहरे पैठता है। ये कहना है प्रख्यात कथा लेखिका चित्रा मुद्गल का। वह कोच्चि विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में यू.जी.सी. के डी.आर.सी. प्रोजेक्ट के तहत द्विदिवसीय (24-25 मार्च, 2009) राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्‍घाटन कर रही थीं, जिसका विषय था ‘भारतीयता और समकालीन हिन्दी कथा साहित्य।’ हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ एन. मोहनन की अध्यक्षता में आरंभ हुई संगोष्ठी का उद्घाटन करती हुई चित्रा मुद्गल ने कहा कि औपनिवेशिक साहित्य भारतीय मनीषा का साहित्य नहीं है, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता ने ही मिट्टी-पानी डालकर उसे सींचा है। लगभग दो घंटे तक दिए अपने धाराप्रवाह बीज भाषण के बीच श्रीमती मुद्गल ने कहा कि समाज जितना कठिन होगा, उसका जीवन और साहित्य भी उतना ही जटिल होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस देश का बौद्धत्व, महावीरत्व, शंकराचार्यत्व, इस्लामत्व, ईसाइत्व आदि सब का सब केवल इस देश की मिट्टी-पानी में सना-पगा है और हमारी भारतीयता का हिस्सा है।

उद्‍घाटन सत्र में अतिथियों का स्वागत संगोष्ठी की संयोजक डॉ के. वनजा ने किया, जबकि डॉ पी.ए.शमीम अलियार एवं डॉ एन.मोहनन द्वारा चित्रा मुद्गल को शॉल एवं स्मृतिचिह्न प्रदान कर उनका सम्मान किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि-समालोचक एवं ‘नई धरा’ के संपादक डॉ शिवनारायण ने विभाग द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘अनुशीलन’ के ‘दिनकर विशेषांक’ का लोकार्पण किया, जबकि ‘अनुशीलन’ के ‘महादेवी वर्मा विशेषांक’ का लोकार्पण कथाकार डॉ॰ कलानाथ मिश्र को समर्पित करते हुए चित्रा मुद्गल ने किया।

दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता के रुप में ‘नई धरा’ के संपादक डॉ॰ शिवनारायण ने ‘समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में भारतीयता’ विषयक भाषण करते हुए कहा कि समकालीन कथा साहित्य में भारत का भौगोलिक रुप उसका मृण्मयी रुप है, जबकि उसका आध्यात्मिक-सामाजिक रुप ही उसका चिण्मयी रुप है। आत्मवादी रुप बहुत महत्वपूर्ण होता है, जिस कारण मनुष्य के इस जनसंघर्षी रुप की अभिव्यक्ति हिन्दी कहानियों में हुई है। डॉ शिवनारायण ने चित्रा मुद्गल सहित नासिरा शर्मा, कमल कुमार, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, उदय प्रकाश, शरद सिंह, वीरेन्द्र जैन, दूध्नाथ सिंह, मधुकर सिंह, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह आदि की कहानियों की विशद चर्चा करते हुए कहा कि पीड़ा की तपस्या की तरह जीने से ही दृष्टि को विस्तार मिलता है या कि अंदर का नर्क जितना बड़ा होगा, उतना ही बड़ा स्वर्ग बाहर रचा जाएगा।

चित्रा मुद्गल की अध्यक्षता में सम्पन्न इसी सत्र में डॉ॰ शशिधर (बंगलूरू) और डॉ वेलायुध्न (कालड़ी) ने भी अपने-अपने पत्र प्रस्तुत करते हुए कथा साहित्य में भारतीयता की चेतना को पुष्ट किया। अंत में चित्रा मुद्गल ने डॉ शिवनाराण के विद्वतापूर्ण व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय पारिवारिक सम्बन्धें एवं परिकल्पनाओं में भारतीयता का महान रुप निहित है। उन्होंने आत्मचिंतन पर बल देते हुए सेवा, त्याग, भाईचारा, विश्वास जैसे मूल्यों को बरकरार रखने की बात कही।

25 मार्च को संगोष्ठी का तीसरा सत्रा डॉ शिवनारायण की अध्यक्षता में आरंभ हुआ, जिसमें मुख्य वक्ता के रुप में चर्चित कथाकार डॉ॰ कलानाथ मिश्र ने कहा कि आधुनिकता के भीतर भी अपने संस्कारों को जीवित रखना चाहिए, जिससे भारतीयता अपने चैतन्य रुप में परिपुष्ट रहेगा। उन्होंने कहा कि आज अधिकतर सम्बन्ध जिये नहीं जा रहे ढोये जाते हैं, लेकिन हमारे ढोने और पश्चिम के ढोने में जो अंतर है, उसे उघारने का प्रयास समकालीन कहानियों में चित्रित हुआ है। अपनी सांस्कृतिक मूल्यों में हुए परिवर्तन को चित्रित करते हुए भी उसके प्रति एक आग्रह का भाव भी समकालीन कथा साहित्य में है। इस क्रम में डॉं॰ मिश्र ने कई महत्वपूर्ण समकालीन कहानियों की चर्चा की। इस अवसर पर पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ॰ बैजनाथ प्रसाद ने शिवप्रसाद सिंह के उपन्यास ‘वैश्वानर’ के विशेष संदर्भ में भारतीयता को उद्‍घाटित किया, जबकि डॉ॰ सुमा ने महिला कथा लेखिकाओं के उपन्यासों में भारतीयता को प्रस्तुत किया। डॉ॰ अनीता ने समकालीन आंचलिक उपन्यासों में भारतीयता पर प्रकाश डालते हुए अंचलों में भारतीयता के जीवंत होने का
मिशाल पेश किया।

इस सत्र के अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ॰ शिवनारायण ने कहा कि भारतीयता को समय सापेक्ष मूल्यों के संदर्भ में विश्लेषित करते हुए उसके उदान्त सौन्दर्य की परख होनी चाहिए, तभी उसकी चेतना का विकास दिखाई पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने साधुमत की अभिव्यक्ति के संरक्षण को ही साहित्य का मूल धर्म बताया और साहित्य को उसके चैतन्य रुप में समझने की हिदायत दी, न कि उसके स्थूल रुप में।
अंतिम सत्र डॉ॰ कलानाथ मिश्र की अध्यक्षता में आरंभ हुआ, जिसमें डॉ॰ रामप्रकाश, डॉ॰ जयकृष्णन्, सुश्री शीना, सुश्री टेरेसा आदि ने अपने शोध प्रपत्र प्रस्तुत किए।
कोच्चि विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पहली बार प्रो॰ एन. मोहनन एवं डॉ॰ के. वनजा के प्रयास से सम्पन्न इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को सपफल बनाने में सभी विभागीय शिक्षकों एवं छात्रा-छात्राओं के साथ-साथ स्थानीय कॉलेजों के हिन्दी शिक्षकों ने भी भारी संख्या में अपनी सक्रिय उपस्थिति से सहयोग किया।

प्रस्तुतिः
डा0 शशिधरण
(रीडर हिन्दी विभाग)
कोच्चि विश्वविद्यालय, कोच्चि (केरल)