Monday, April 12, 2010

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का उदयपुर में ‘सृजन साक्षात्कार’



मनुष्य ताड़ पत्र से छापाखाने तक आया है। सब कुछ वैसा ही नहीं है जैसा हजार या पांच हजार बरस पहले था फिर मुद्रित शब्द से आगे डिजिटाइजेशन में क्यों हो? ‘संचार के नये माध्यम और हिन्दी’ विषय पर व्याख्यान में सुपरिचित समालोचक/ब्लॉगर डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि सूचना क्रांति के विस्फोट के बावजूद हमें मानना होगा कि कोई भी तकनीक मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकती। तकनीक को मनुष्य और अपनी भाषा व साहित्य के पक्ष में इस्तेमाल करना होगा। माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के मीडिया अध्ययन केन्द्र और जनपद विभाग के साझे में हुए ‘सृजन साक्षात्कार’ के इस आयोजन में डॉ. अग्रवाल ने इंटरनेट पर मौजूद हिन्दी पत्र पत्रिकाओं, पुस्तकों और ब्लॉग्स की विस्तार से चर्चा में कहा कि नये माध्यमों को किताब का विकल्प या शत्रु मानने के स्थान पर विस्तार मानना समीचीन होगा। इस सत्र में आकाशवाणी के सहायक केन्द्र निदेशक डॉ. इन्द्रप्रकाश श्रीमाली ने ब्लॉग्स को निजी मौलिक कृतियों की संज्ञा देते हुए कहा कि मीडिया के नये स्वरूप ने हिन्दी की संभावनाओं को बढ़ाया ही है। डॉ. श्रीमाली ने सूचना तकनीक के व्यापक होते जाने को लोकतंत्र के लिए उपयोगी बताते हुए कहा कि अनुवाद के माध्यम से हिन्दी लेखन को दुनियाभर के पाठकों के लिए उपलब्ध करवाया जा रहा है। सुपरिचित कवि डॉ. कैलाश जोशी ने ब्लॉग को अभिव्यक्ति का सबसे सरल और सहज माध्यम बताते हुए कहा कि ग्रंथ प्रविधियॉ अपने समय के अनुरूप योगदान कर रही है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने ज्ञान और सूचना आधारित समाजों के भेद बताते हुए कहा कि प्रतिरोध की जगह बचाए रखना नये दौर में सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नये दौर में उन शक्तियों की पहचान बार बार करनी होगी जो मनुष्यता को बचाए रखने में जुटी हैं। सत्र में हुए खुले संवाद में रंगकर्मी महेश नायक, डॉ. मंजु चतुर्वेदी, लक्ष्मण व्यास ने भागीदारी की।
प्रथम सत्र में ‘लिखने का कारण विषय’ पर अपने वक्तव्य में डॉ. अग्रवाल ने अपने आलोचना कर्म के प्रारंभ के लिए बिन्दु, मधुमती, सम्बोधन जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को श्रेय दिया। उन्होंने आलोचना कर्म के सक्षम उपस्थित संकट में लिहाजदारी और मित्रता की प्रवृत्तियों को कारण बताया। उन्होंने कहा कि स्वस्थ समाज में सही आलोचना को स्वीकार करने का साहस होता है और सही आलोचना ही साहित्य को दिशा देने का काम करती है। डॉ. अग्रवाल ने अमरीका यात्रा पर अपनी पुस्तक ‘आंखन देखी’ तथा वेब लेखन की चर्चा भी की। इस सत्र में कॉलेज शिक्षा के क्षेत्रीय सहायक निदेशक डॉ. माधव हाड़ा ने कहा कि डॉ. अग्रवाल का लेखन बताता है कि नये परिवर्तनों को आत्मसात कर कैसे राह बनायी जा सकती है। उन्होंने राजस्थान के साहित्य के सम्बंध में किए गए आलोचना कर्म में डॉ. अग्रवाल के योगदान को रेखांकित भी किया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने अपने को ही तलाश करते रहने की बैचेनी को सृजनात्मकता का दूसरा नाम दिया। उन्होंने कहा कि ईमानदार होना इस जटिल समय में अनुपम और अद्वितीय है। इस ईमानदारी को उन्होंने लेखन के लिए सबसे बड़ा दायित्व बताया। राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से हुए इस आयोजन के प्रारंभ में श्रमजीवी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एन.के. पाण्ड्या ने स्वागत किया। लेखक परिचय डॉ. मलय पानेरी ने दिया और सत्रों का संयोजन डॉ. पल्लव ने किया। अंत में जनपद के कार्यक्रम निदेशक पुरूषोतम शर्मा ने आभार प्रदर्शित किया।

आयोजन में डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना, डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. प्रमोद भट्ट, डॉ. ए.एल. दमामी, डॉ. सर्वतुन्निसा खान, डॉ. चन्द्रकांता बंसल, रामदयाल मेहर, डॉ. प्रभारानी गुप्ता सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित थे।

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पाठक का कहना है :

अविनाश वाचस्पति का कहना है कि -

समाचार में अग्रवाल जी के विचार जानकर मन प्रसन्‍न हो गया।

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