Monday, October 4, 2010

त्रिपुरा में हिंदी की गतिविधियाँ

वैसे तो पूर्वोत्तर में भी हिंदी की स्थिति भारत के अन्य गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसी ही है, पर सरकारी एवं गैर-सरकारी स्तरों पर यहाँ काफ़ी काम किया जा रहा है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा एवं इसके क्षेत्रीय केन्द्र, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा एवं पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों में स्थित विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग हिंदी के प्रचार-प्रसार में खासा योग दे रहे हैं। त्रिपुरा में भी उक्‍त संस्थाओं के प्रयासों का अच्छा असर दिखाई दे रहा है। स्वयं हमने पिछले दो वर्षों में हिंदी को लेकर त्रिपुरा विश्वविद्यालय में कई राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशालाओं का आयोजन किया है। वस्तुत: त्रिपुरा विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 में हिंदी विभाग की स्थापना की गई थी। तब से विभाग द्वारा लगातार यहाँ हिंदी प्रचार और कामकाज को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं। अप्रैल, 2009 में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली के सहयोग से ’मानविकी विषयों में तकनीकी शब्द-प्रयोग’ विषय पर तीन-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी, दिसंबर, 2009 में केंद्रीय हिंदी संस्थान के शिलाँग केन्द्र के साथ ‘पूर्वोत्तर में हिंदी शिक्षण’ विषय पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और अगस्त, 2010 में केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली, के सहयोग से आठ दिवसीय हिंदी नवलेखक शिविर का आयोजन त्रिपुरा विश्वविद्यालय में किया जा चुका है। उपरोक्‍त सभी कार्यक्रमों के अलावा त्रिपुरा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा भी समय-समय पर हिंदी कार्यक्रम किए जाते रहे हैं। पहले राज्य के स्कूल एवं कॉलेजों में हिंदी विषय की पढ़ाई नहीं होती थी, पर इधर के प्रयासों से न केवल हिंदी विषय शुरू हुआ, बल्कि कई महाविद्यालयों में ऑनर्स भी खुल गया है। इसी वर्ष त्रिपुरा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में भी स्नातक स्तर पर हिंदी की पढ़ाई शुरू हो गई है। यहाँ के बाज़ारों में भी बांगला के साथ-साथ हिंदी प्रयोग चलने लगा है। हम भी समय-समय पर छात्रों के बीच हिंदी में निबंध लेखन, भाषण, कविता-लेखन आदि प्रतियोगिताएँ कराते रहते हैं। इस बार हिंदी दिवस पर होने वाली प्रतियोगिताओं में पुरस्कार पाने वाले ज्यादातर छात्र हिंदीतर संकायों से थे। हालांकि त्रिपुरा में हिंदी के प्रति नकारात्मक रवैया कभी नहीं था पर अब राज्य में हिंदी को लेकर अच्छा माहौल बन चुका है।

जय कौशल
हिंदी विभाग
त्रिपुरा विश्वविद्यालय
अगरतला-799130

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3 पाठकों का कहना है :

AVADH LAL का कहना है कि -

प्रिय जय कौशल जी,
पढ़ कर बहुत अच्छा लगा कि आपके और अन्य हिंदी प्रेमियों के प्रयासों से आप त्रिपुरा में हिंदी के प्रचार और प्रसार को फैला रहे हैं.
मैं वर्ष १९९४ से १९९७ तक अगरतला में ही था. इसलिए इस समाचार से मुझे व्यक्तिगत रूप से अत्यंत प्रसन्नता हो रही है.
आपको बहुत बहुत शुभ कामनाएं

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

..शुभ जानकारी देने के लिये धन्यवाद कौशल जी!....हिंदी भाषा का अच्छा प्रचार और प्रसार होना हमारे देश के लिए बहुत अच्छा संकेत है!....जब एक जुट हो कर हिंदी के प्रचार के लिए कार्य किया जाएगा ( जैसे कि आप कर रहे है) तभी वह सफलतम होगा!

डॉ. प्रमोद कुमार तिवारी का कहना है कि -

प्रिय जयकौशलजी,
बहुत अच्‍छा लगा आपकी खबर पढ़कर। हार्दिक धन्‍यवाद। दरअसल पिछले 50-60 वर्षों में ज्‍यादातर हमने पूर्वोंतर इलाकों की उपेक्षा की है, हम इतिहास, साहित्‍य और भाषा की किताबों में उस इलाके की बहुत कम जानकारी पाते हैं। आप जैसे लोगों को हिंदी और हिंदीतर क्षेत्रों के बीच एक सेतु बनने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ है और हम सभी का यह सौभाग्‍य है कि आपकी बदौलत हमें वहां की सूचनाएं मिल रही हैं। उम्‍मीद है भविष्‍य में त्रिपुरा के इतिहास, साहित्‍य और संस्‍कृति से जुड़ी और भी खबरें आपसे हमें मिलती रहेंगी।
एक बार फिर से धन्‍यवाद
प्रमोद कुमार तिवारी

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