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Tuesday, April 21, 2009

22 कवियों की उपस्थिति में आनंदम की नौवीं गोष्ठी सम्पन्न


हर महीने के दूसरे रविवार को दिल्ली का पश्चिम-विहार इलाका कवियों की शब्दताल पर थिरकता है। अवसर होता है आनंदम संस्था की मासिक काव्य-गोष्ठी का। यह गोष्ठी विगत् 9 महीनों से आयोजित हो रही है। दिल्ली के आसापास और कई बार काफी दूर के कवि भी इस कविता-पूजन के लिए जमा होते हैं। कुछ अपनी सुनाते हैं और कुछ औरों की सुनते हैं। नौवीं आनंदम काव्य गोष्ठी 12 अप्रैल 2009 को संस्था-प्रमुख जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे अनुराधा शर्मा, संजीव कुमार, साक्षात भसीन, मुनव्वर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ॰ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना, प्रेमचंद सहजवाला, शहादत अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी, रमेश सिद्धार्थ, अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दीक्षित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत, इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी जैसे नये-पुराने कवि शरीक हुए। गोष्ठी की अध्यक्षता दरवेश भरती ने की । संचालन जगदीश रावतानी ने किया।

एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा" जिसमें डॉ रमेश सिद्धार्थ, डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ॰ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।

काव्य गोष्ठी की शुरूआत से पहले ये दुखद सूचना दी गयी कि जाने-माने साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है। एक और दुखद समाचार यह था के बलदेव वंशी के जवान पुत्र का भी हाल ही में देहांत हो गया।
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सदस्यों को सदमा बर्दाशत करने की हिम्मत के लिए प्रार्थना की गयी।

काव्य गोष्ठी में पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शे'र/ पंक्तियाँ प्रस्तुत है-

डॉ अहमद अली बर्की:
वह मैं हूँ जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मनाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आँसू बहाने तक नही पहुँचा

अख्तर आज़मी:
ख़ुद गरज दुनिया है इसमें बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरों के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये

डॉ विजय कुमार:
प्यासी थी ये नज़रें तेरा दीदार हो गया
नज़रों में बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया

डॉ दरवेश भारती:
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तों की टूट जायेगी

जगदीश रावतानी:
जहाँ-जहाँ मैं गया इक जहाँ नज़र आया
हरेक शै में मुझे इक गुमां नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मेरे तब धुँआ नज़र आया

मुनव्वर सरहदी:
ज़िन्दगी गुज़री है यूँ तो अपनी फर्जानों के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ

गोष्ठी का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ। जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया।