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Tuesday, February 16, 2010

आनंदम की दूसरी विचार गोष्ठी


आनंदम ने नए वर्ष से अपनी गतिविधियों में एक और अध्याय की जो शुरूआत की थी उसी कड़ी में 5 फरवरी 2010 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित मैक्स इंश्योरेंस के सभागार में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें मेडिकल एथिक्स पर चर्चा की गयी। इस गोष्ठी में शिरकत करने वालों के नाम इस प्रकार है: सर्व श्री मुनव्वर सरहदी, रमेश भम्भानी, गुलाबराय, रमेश धर्मदासानी, भूपेंद्र कुमार, जगदीश रावतानी, मनमोहन तालिब, शैलेश सक्सेना, रविंदर शर्मा रवि, श्रीमती दिनेश आहूजा, तरुण रावतानी, साक्षात भसीन, पीसीएस कन्नौजिया , रामनिवास "इंडिया" एवं सत्यवान।



सबसे पहले आनंदम के अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत किया एवं विषय प्रवेश करते हुए कार्यक्रम के स्वरुप से सभी को अवगत कराया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डॉ विजय कुमार ने मेडिकल एथिक्स पर अपना आलेख प्रस्तुत किया एवं डॉक्टरों के कर्तव्यों व मरीजों के हकों से अवगत कराते हुए डॉक्टरों की प्राथमिकताओं, न्याय, निदान में चूक और लापरवाही, धर्म व जाति आधारित भेदभाव की मनाही एवं मर्सी किलिंग आदि विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके बाद कई बातों पर गर्मागर्म चर्चा भी हुई जैसे मेडिक्लेम होने पर बिल बढ़ाने के चक्कर में अस्पतालों द्वारा ज्यादा दिनों के लिए मरीज की भर्ती, अनावश्यक रूप से वेंटिलेटर पर रखे रखना, व्यस्तता के रहते मरीज को उचित समय न देना इत्यादि। प्रतिभागियों ने कई सवाल भी पूछे और ससामूहिक चर्चा में भाग ले कर गोष्ठी को जीवंत बना दिया। गोष्ठी के अंत में श्री जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया।

Friday, November 20, 2009

सर्दी की शुरुआत में 'आनंदम' की गर्म कविताएँ

रिपोर्ट: तरुण रावतानी


दि.17 नवम्बर 2009 को नई दिल्ली में कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित 'हिमालय हाउस' में 'Max New York' जीवन बीमा कंपनी के सौहार्द्र से 'आनंदम' की नवम्बर माह की काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई जो इस शरद ऋतु की पहली काव्य गोष्ठी थी. गोष्ठी की अध्यक्षता मुन्नवर सरहदी ने की तथा संचालन ममता किरण ने किया. मंच पर 'आनंदम' संस्थापक जगदीश रावतानी व लक्ष्मी शंकर वाजपेयी भी उपस्थित रहे. गोष्ठी में रविन्द्र शर्मा 'रवि' , शिव कुमार मिश्र 'मोहन' , नईम बदायूनी, वीरेंद्र 'कमर', मजाज अमरोहवी, नश्तर अमरोहवी, मासूम गाज़ियाबादी, रज़ी अमरोहवी, विजय कुमार, जय प्रकाश शर्मा 'विविध', सुनील जैन राही, मनमोहन तालिब, जगदीश जैन, विशन लाल, सैलेश कुमार, सतीश सागर, उपेन्द्र दत्त, पुरुषोत्तम वज्र, शोभना मित्तल, रणविजय राव, नागेश चन्द्र, भूपेन्द्र कुमार, सुरेन्द्र कुमार ने भाग लिया. गोष्ठी की पहली कविता शिव कुमार मिश्र 'मोहन' ने पढ़ी जो पिछली चंद गोष्ठियों से 'आनंदम' से जुड़े हैं. कविता की कुछ पंक्तियाँ:

कौन सा बम चिथड़ों में बदल दे/ कब बहा ले जाएं उफनती नदियाँ/ कहीं किसी हादसे के चटखारे लेते चैनलों में/ मेरा नाम उछल न जाए/ सोचता हूँ/ समझता हूँ/ फिर भी भूल जाता हूँ/ शायद इसलिए/ मैं कोई कविता सुनाता हूँ...

कुछ अन्य कवि जो 'आनंदम' में पहली बार आए थे ने भी अच्छी कविताएँ पढ़ी. जैसे:

चमार का गधा गाय के साथ/ चौपाल पर/ चौपाल में हंगामा सुबह से शाम तक/ शाम को सरपंच का फैसला चमार के घर/ सुबह चमार की जवान लड़की अस्त व्यस्त कपड़ों में/ चौपाल में कोई हंगामा नहीं/ हंगामा नहीं/ हंगामा नहीं' (सुनील जैन 'राही').

गोल गोल हाथों से रोटियां बनाती थी/ गर्म गर्म रोटियों पे माखन लगती थी/ हटी माँ की नज़र तो छीन रोटी कागा भागा... (नागेश चन्द्र).

दिल्ली की गोष्ठियों में सक्रिय शोभना मित्तल अक्सर अच्छी कविताओं के लिए जानी जाती हैं. उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ:

(बैल कुत्ते से) - 'हल हो या कोल्हू/ मैं तो सिर्फ जुता हूँ/ और तू सदा से ठाली है / हाँ, मेरा नाम बेचारगी का मुहावरा है/ पर तेरा नाम गाली है...



कविता के साथ-साथ शायरी और ग़ज़ल की गर्माहट भी खूब थी जिस में मासूम 'गाज़ियाबदी', लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, रविन्द्र शर्मा 'रवि', जगदीश जैन, मनमोहन 'तालिब', वीरेंद्र 'क़मर' आदि छाए रहे. कुछ सशक्त शेर:

सभी सपने नहीं टूटे अभी दो चार बाक़ी हैं,
कहो अश्कों से आँखों में अभी अंगार बाक़ी हैं
(रविन्द्र शर्मा 'रवि').


उस को शायद इस लिए ही देर से मंज़िल मिली
वो हमेशा ऐसे रस्ते पर चला जो था सही
(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी).

हमेशा तंगदिल दानिश्वरों से फासला रखना
मणि मिल जाए तो क्या सांप डसना छोड़ देता है
(मासूम गाज़ियाबदी).

हम से ज़िक्रे बहार मत कीजे
हम ने देखा नहीं बहारों को
(नईम बदायूनी).

अख़बारों में खुनी मंज़र मत छापो,
बच्चे इन तस्वीरों से डर जाते हैं
(जतिंदर परवाज़).

रूठ जाएं तो उन को मनाया करो
मान जाएं तो खुद रूठ जाया करो
(मजाज अमरोहवी).

गम मुहब्बत का पाल रखा है,
ख़ाक दिल का ख्याल रखा है
(वीरेंद्र क़मर)

बहुत खुश हो रहे हो मगरिबी तहज़ीब अपना कर
खड़े हो कर मगर फिर भी 'डिनर' अच्छा नहीं लगता
(नश्तर अमरोहवी)

न हिन्दू की न मुस्लिम की किसी ग़लती से होता है
यहाँ दंगा सियासतदान की मर्ज़ी से होता है
(प्रेमचंद सहजवाला).

अंत में गोष्ठी अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने हमेशा की तरह अपनी शायरी से हाल में कहकहे बिखेर दिए. उन का एक शेर:

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
रहे वो बज़्म में जब तक न वो निकले न हम निकले
.

आनंदम की इस गोष्ठी में कवियों व श्रोताओं की संख्या पिछली गोष्ठियों से अधिक थी जो 'आनंदम' की लोकप्रियता की ओर संकेत करती है. 'आनंदम' अध्यक्ष जगदीश रावतानी द्वारा धन्यवाद दिए जाने के बाद गोष्ठी सम्पन्न हुई.

Thursday, October 29, 2009

बेकल 'उत्साही' द्वारा क़ैसर अज़ीज़ के पहले दीवान 'तक़्मील-ए-आरज़ू' का लोकार्पण

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला

क़ैसर अज़ीज़ दिल्ली का मुशायरों कवि गोष्ठियों में एक सुपरिचित नाम है तथा उर्दू में कई अच्छी ग़ज़लें उन्होंने मुशायरों में प्रस्तुत की हैं, हालांकि यह बात भी उतनी ही सत्य है कि अभी कैसर अज़ीज़ नाम के शायर को काफी दूर तक जाना है और उनमें काफी दूर तक जाने की पूरी क्षमता है. दि. 18 अक्टूबर 2009 को दिल्ली के 'ग़ालिब अकैडमी' सभागार में कैसर अज़ीज़ की ग़ज़लों के पहले मजमुए 'तक़्मील-ए-आरज़ू' (अभिलाषा-पूर्ति) का लोकार्पण सुविख्यात शायर बेकल 'उत्साही' ने किया. पर बेकल 'उत्साही' ने लोकार्पण के बाद अपने भाषण में बहुत रोचक तरीक़े से हास्य की एक लहर बिखेर दी और पुस्तक के शीर्षक को ले कर कैसर 'अज़ीज़' को संबोधित करते हुए चुटकी काटी कि अभी से आप की 'तक़्मील-ए-आरज़ू' (अभिलाषा पूर्ति) कैसे हो गई! पहले 'तामीर-ए-आरज़ू' (अभिलाषा निर्माण ) लिखते, फिर 'तफ़सील-ए-आरज़ू' (अभिलाषा का विस्तार) लिखते और फिर 'तक़्मील-ए-आरज़ू' (अभिलाषा पूर्ति) लिखते! दरअसल आज ज़माना वो है जब हर कोई तालियाँ बजवाना चाहता है या दाद सुनना. इसलिए प्रायः लोकार्पण करने वाली हस्ती यदि लोकार्पित पुस्तक की सीमाओं की ओर संकेत कर दे तो मुमकिन है कि सम्बंधित रचनाकार को ऐसा संकेत कटु लगे, पर बेकल साहब के बात कहने का अंदाज़ इतना खूबसूरत कि सब तरफ वाह वाह की धूम मच गई।


(बेकल 'उत्साही' का वक्तव्य)

इस अवसर पर वयोवृद्ध शायर मुनव्वर सरहदी की सदारत में एक मुशायरा भी हुआ जिस में ज़ुबैर अहमद 'क़मर', दर्द 'देहलवी', लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, मयकश अमरोहवी, सज्जाद 'झंझट', आबिद 'वफ़ा' सहारनपुरी, जितेन्द्र परवेज़, शफ़क़ 'बिजनौरी', ममता 'किरण', नमिता राकेश, निक्हत अमरोहवी, साजिद खैराबादी, क़री हुसैन, क़लीम जावेद, वीरेन्द्र 'क़मर', जगदीश रावतानी 'आनंदम', उस्मान मांडवी, शहादत अली निज़ामी, मास्टर निसार, क़ैसर 'अज़ीज़' आदि शायरों ने हिस्सा लिया। वैसे बेकल 'उत्साही' साहब ने अपने भाषण में यह भी कहा कि मुशायरे अब वो मुशायरे नहीं रहे, जो किसी ज़माने होते थे. वो तहज़ीब वो एहतराम (आदर) वो ऐतमाम (बंदोबस्त) धीरे धीरे मौसम की तरह बदलते जा रहे हैं. आज मुशायरा एक ताजिराना (व्यापारिक) फन हो गया है. पर आज के होने वाले मुशायरे के बारे में उन्होंने भरोसा किया कि मुशायरा प्रभावित करेगा और हम कुछ अदब (साहित्य) सुनेंगे. मुशायरे की कमान संभाली युवा शायर फ़ाक़िर अदीब ने और मुशायरे में आए शायरों का स्वागत करते हुए जब उन्होंने एक नज़र मंच पर विराजमान उर्दू -हिंदी के संगम पर डाली तो कहा:

जो कुछ भी हिंदी में लिखा, उर्दू में महसूस किया,
हम ने हिंदुस्तान ग़ज़ल की खुशबू में महसूस किया.


दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह व मिर्ज़ा ग़ालिब और अमीर खुसरो के मकबरों की शरण में बने इस सभागार में जहाँ शराब और शबाब से जुड़ी शायरी भी थी, वहीं खुदा-परस्ती या वतन परस्ती भी अपनी जगह कायम थी. कभी कभी बहुत कठिन या फारसी मिश्रित उर्दू मंच व श्रोताओं के बीच एक दीवार भी खड़ी कर देती है, लेकिन यहाँ सभागार में उपस्थित अधिकांश श्रोतागण उर्दू के खासे जानकार लगे. हिंदी व उर्दू की सशक्त गज़लों नज़्मों ने समा बाँध लिया. मुशायरे की शम्मा जलाने वालों में से वरिष्ठ शायर जुबैर अहमद 'क़मर' की ग़ज़ल का एक शेर:

उन की मर्ज़ी खुदा की रज़ा बन गई,
रुख हवा का इधर से उधर हो गया.


शफ़क़ साहब ने संवेदना से ओत प्रोत एक ग़ज़ल पढ़ी:

कफस में हंसते थे गुलशन में आ के रोने लगे,
परिंदे अपनी कहानी सुना के रोने लगे.
बिछुड़ने वाले अचानक जो बरसों बाद मिले,
वो मुस्कराने लगे मुस्करा के रोने लगे.
(कफस = पिंजर).


किसी किसी की शायरी से हास्य भी फूटा, जैसे सज्जाद 'झंझट':

मैं 'झंझट' हूँ विरासत में मिली है शायरी मुझको,
मेरे अब्बा के दादा जान के दादा भी शायर थे.


लेकिन हास्य के नाम कहीं कहीं फ़िल्मी फूहड़ता भी परोसी गई:

हज़ारों दिल तेरे वादे पे ऐसे टूट जाते हैं,
कि जैसे हाथ से गिरते ही अंडे फूट जाते हैं ('झंझट').


लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की बहु-आयामी शायरी ने सभागार को खूब प्रभावित किया. जैसे समाज की एक कटु सच्चाई को अभिव्यक्त करता यह शेर :

उन्हीं के हिस्से में पतझड़ के सिलसिले आए,
जो सब से आगे थे आए बहार लाने में


और लक्ष्मीशंकर वाजपेयी का महानगरीय व्यस्तता से मोक्ष पाने का अंदाज़:

खुदा से बोलूँगा, अब मुझको अपने पास ही रख,
फिज़ूल जाता है सब वक़्त आने जाने में.


नमिता राकेश की चुस्त-दुरुस्त शायरी:

चलने से पहले रास्ते लगते हैं पुर-ख़तर,
जब चल पड़े तो पैरों को कांटे क़बूल थे.

(पुर-ख़तर = खतरे से भरे )

नमिता अक्सर पुरुष को नारी के चुनौती भरे दो टूक स्वर ज़रूर सुनाती हैं. जैसे:

माना कि तुम बादल हो, बरसना चाहते हो,
मगर यह मत भूलो, मैं भी नदी हूँ, बहाना जानती हूँ.


पर जहाँ नमिता राकेश नारी पुरुष का समीकरण ठीक करने में लगी थी, वहीं भारतीय समाज के शाश्वत अवयव यानी 'घर-परिवार' से जुड़ी संवेदनाओं को क़लम-बद्ध करने में में ममता 'किरण' अपनी जगह लाजवाब रही:

बाग़ जैसे गूंजता है पंछियों से,
घर मेरा वैसे चहकता बेटियों से


और

आया खिलौना घर में नया जब से ऐ 'किरण'
दादी को दिन गुजारना मुश्किल नहीं रहा.


कैसर 'अज़ीज़' ने अपने दीवान के शीर्षक 'तक़्मील-ए-आरज़ू' का उपयोग किताब की तीन चार ग़ज़लों में किया है. यहाँ जो ग़ज़ल उन्होंने पढी, उस का एक शेर:

'तक़्मील-ए-आरज़ू' का नया एक बाब लिख,
तू लिख सके तो जागती आँखों का ख्वाब लिख
.
( बाब = अध्याय).

जगदीश रावतानी अपने 'सेकुलर' अंदाज़ में सदा-बहार लगे. होली और ईद के दिन गले मिलने की खुशियों की बराबरी अभिव्यक्त करता उनके यह शेर बहु-प्रशंसित है ही:

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे,
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है...


और यहाँ भी उन्होंने ईद की ख़ुशी के बहाने भारत के सर्व-धर्म-समभाव रुपी अनमोल मूल्य को व्यक्त किया:

गले लगा के मिला ईद सब से जब भी मैं
कोई भी फ़र्क़ किसी में कहाँ नज़र आया.


जहाँ एक तरफ उर्दू-हिंदी का संगम बेहद खुश-मिज़ाजी का माहौल पैदा कर रहा था, वहीं सभागार में उपस्थित अलग अलग मज़हबों के लोगों का संगम भी एक खुश-मिज़ाजी भरा माहौल ही पैदा कर रहा था. यह बात दीगर है कि कोई कोई शायर बहुत संकीर्ण तरीक़े से शायरी को एक सांप्रदायिक शक्ल भी दे रहा था, जो नहीं होना चाहिए. जहाँ एक तरफ हिंदी में आज भी कृष्ण-प्रेम या राम-भक्ति पर उत्कृष्ट कविताओं को समुचित स्थान मिला हुआ है, वहीं पैगम्बर के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करने वाली शायरी भी हर जगह पसंद की जाती है, जैसे ज़ुबैर अहमद 'कमर' साहब द्वारा पढ़ा हुआ यह शेर:

नूर से जगमगाने लगे बामो-दर,
मुस्तफा का जिधर से गुज़र हो गया
(बामो-दर = छत और दरवाज़े, मुस्तफा = पैग़म्बर),

पर भक्ति काव्य अलग है, साम्प्रदायिकता या सियासतबाज़ी अलग. मुशायरे के शुरू में संचालक फ़ाक़िर 'अदीब' ने 'मुहब्बत' पर जो लाजवाब पंक्तियाँ कही, वही 'मुहब्बत' अगर मज़हब की दीवारें तोड़ कर एक मुशायरा बन कर जगमगाए तो बेहतर:

'मुहब्बत' जो खुदा का पैगाम है,
'मुहब्बत' जो आसमान से ज़मीन पर एक लाख चौबीस हज़ार* बार उतारी गई,
'मुहब्बत' जो राधा की पलकों पर मोहन का इंतज़ार बन जगमगाई,
'मुहब्बत' जो सुलगते हुए सहराओं में लैला-मजनू का ग़म बन कर भटकी...

(एक लाख चौबीस हज़ार* बार से तात्पर्य कि ईश्वर ने इतनी बार पृथ्वी पर अवतार-पैग़म्बर भेजे, जो इंसानी प्रेम का पैगाम ज़मीन पर लाए).

शायरी दिल की सादगी से जन्म लेती है, और सादगी और निश्छलता ही उस का त-आरुफ़ है, इस लिए अंत में बेकल 'उत्साही' द्वारा पढ़े गए शेरों में से एक को उद्धृत न करुँ तो यह रिपोर्ट अधूरी रह जाएगी:

सादगी सिंगार हो गई
आइनों की हार हो गई.


(मुशायरे के आखिर में बतौर तोहफे के कैसर 'अज़ीज़' के दीवान 'तक़्मील-ए-आरज़ू' की एक एक प्रति सब को मिली और चाय तथा मिष्ठान का पैकेट भी)।

Saturday, October 24, 2009

आनंदम् की गोष्ठी का 15वाँ सोपान



22 अक्टूबर 2009। नई दिल्ली

आनंदम् की 15वीं मासिक गोष्ठी कनॉट प्लेस के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के सभागार में 20 अक्तूबर, 2009 को शाम 5.30 बजे वरिष्ठ शायर जनाब जगदीश जैन की अध्यक्षता में आयोजित की गई। गोष्ठी में मासूम ग़ाज़ियाबादी, मुनव्वर सरहदी, उमर बचरायूनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी व बाग़ी चाचा जैसे लब्ध प्रतिष्ठित शायर भी मौजूद थे। गोष्ठी का सरस संचालन ममता किरण ने अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ में किया।
गोष्ठी में इनके अलावा इन रचनाकारों ने भी अपनी कविताओं व ग़ज़लों से ख़ूब वाहवाही बटोरी-

वीरेन्द्र कमर, क़ैसर अज़ीज़, शिव कुमार मिश्र मोहन, डॉ. विजय कुमार, जगदीश रावतानी, भूपेन्द्र कुमार, प्रेम चंद सहजवाला, वीरेन्द्र कुमार मन्सोत्रा, मनमोहन तालिब, शैलेश सक्सैना, विशन लाल, दिनेश आहूजा एवं प्रभा मल्होत्रा। पढ़ी गई रचनाओं की कुछ बानगी देखें-

जगदीश जैन-
एक छन्दमुक्त रचना के माध्यम से आपने आधुनिक रावण का चरित्र चित्रित करते हुए कुछ यूँ कहा-

सीता तो फिर सीता है
आज का रावण तो लक्षमण को भी हर लेता है
आपकी ग़ज़ल का एक शेर भी काबिले ग़ौर है-
था बकौले मीर दिल्ली, एक शहरे इंन्तख़ाब
क्या ख़बर थी वो भी, ख्वाबों का नगर हो जाएगा


मुनव्वर सरहदी-

ज़िन्दगी गुज़री है यूँ तो अपनी फ़रज़ानों के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ


लक्ष्मीशंकर वाजपेयी-

रास्ते जब नज़र न आएँगे
लोग पगडंडियाँ बनाएँगे
ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ
आदमी बस्तियाँ बसाएँगे



मासूम ग़ाज़ियाबादी-

कोई महफिल तबीयत से अगर रंगीन होती है
वहाँ सादा लिबासों की बड़ी तौहीन होती है
ग़रीबी देख कर घर की वो फ़रमाइश नहीं करते
नहीं तो उम्र बच्चों की बड़ी शौकीन होती है


उमर बचरायूनी-

इश्क़ जो दार पर नहीं पहुँचा
अपने मीयार तक नहीं पहुँचा
ग़ैर तो ग़ैर हैं अयादत को
यार भी यार तक नहीं पहुँचा


बाग़ी चाचा-

तोड़ दे ब जाति और धर् की मचान को
भूल जा चाहे भी तू गीता और क़ुरान को
बँट चुकी है ये धरती आज टुकड़ों में बहुत
धर्म तू बना ले अपना पूरे आसमान को


वीरेन्द्र क़मर-

मुसीबत पसीने में जो तरबतर है
यक़ीनन ये माँ की दुआ का असर है
उसे ये ज़माना कहाँ रास आया
मियाँ शेर कहने का जिस पे हुनर है


जगदीश रावतानी आनंदम्-
आपने आस्तिकता और नास्तिकता के प्रश्न को दो कैंसर ग्रस्त व्यक्तियों के माध्यम से उठाते हुए अपने भावपूर्ण अंदाज़ में एक आज़ाद नज़्म पेश की जिसकी अन्तिम पंक्तियाँ हैं-

हैरान हूँ विपरीत भाव देख कर
नास्तिक दीपक सुबह-शाम भगवान को याद करता है
और आस्तिक सूरज ने अपने घर में बने मंदिर तक को तोड़ दिया है


ममता किरण-

देखा चिड़िया को नया नीड़ बनाते जिस पल
मन में जीने की ललक जाग उठी फिर से


क़ैसर अज़ीज़-

पामाल कर रहे हैं जो इंसाँ की ज़िन्दगी
या रब सरों से टाल दे उन हादसात को
उसकी नज़र में वक्त का अक्से जमील था
अल्लाह ने बनाया था जब कायनात को


भूपेन्द्र कुमार-

अक्स सच्चा दिखा न पाता तो
आइना, आइना नहीं होता
सनसनीख़ेज़ हो ख़बर तो भी
जाने क्यूँ चौंकना नहीं होता


डॉ॰ विजय कुमार-

उसने जब मुझ पे तेग उठा ही ली
मैं ही सर को बचा के क्या करता



शिव कुमार मिश्र मोहन-

बुझते हुए दिये को तुम यूँ जलाए रखना
कुछ यादें ज़िन्दगी की दिल में छुपाए रखना


शैलेश सक्सैना-

रिश्तों को कैसे अब निभाया जाए
सबक ये नया अब सिखाया जाए


प्रेमचंद सहजवाला-

देवता सच के न मोहताज थे फूलों के कभी
यूँ बहुत लोग यहाँ रस्म निभाने आए


मनमोहन तालिब-

आप तो रोज़ घर बुलाते हैं
हम नई बस्तियाँ बसाते हैं


वीरेन्द्र कुमार मन्सोत्रा-

दिल के ज़ख़्म दिल में छुपा लीजिए
मत बैठो इस तरह यारो
दूसरों के सामने तो मुस्कुरा दीजिए


प्रभा मल्होत्रा-

वाल्मीकि नहीं मिले मुझे, देवी नहीं बनी मैं
मैंने गर्भस्थ शिशु का रक्षण किया है
क्योंकि मैं भी सीता हूँ


दिनेश आहूजा-
अपनी अतुकांत कविता के माध्यम से आपने नारी की विवशताओं का एक सजीव चित्र प्रस्तुत किया।



गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ शायर जनाब जगदीश जैन ने सभी रचनाकारों को अच्छी रचनाएँ प्रस्तुत करने के लिए बधाई दी और आनंदम् के अध्यक्ष जगदीश रावतानी का इस बात के लिए विशेष रूप से धन्यवाद किया कि उन्होंने आनंदम् को उत्कृष्टता के इस मुकाम तक पहुँचाया।

कार्यक्रम के अंत में आनंदम् के अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने सभी रचनाकारों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया और मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के प्रबन्धन का गोष्ठी के लिए स्थान उपलब्ध कराने के लिए विशेष रूप से धन्यवाद किया।

Thursday, July 16, 2009

आनंदम् का एक वर्ष पूरा - 12वीं काव्य गोष्ठी


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ क़ैसर अज़ीज़

हर महीने के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली आनंदम् की 12वीं काव्य गोष्ठी पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी आनंदम् के निवास स्थान पर 12 जुलाई, 2009 को जनाब ज़र्फ़ देहलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कहना न होगा कि इसके साथ ही आनंदम् की गोष्ठियों के सिलसिले को शुरू हुए एक साल भी पूरा हो गया। इस गोष्ठी की ख़ास बात ये रही कि कुछ शायर जो कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं आ पाए उन्होंने वीडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस गोष्ठी में शिरकत की जिसमें जनाब अहमद अली बर्क़ी आज़मी और पी के स्वामी जी भी शामिल थे।

हमेशा की तरह गोष्टी के पहले सत्र में “क्या कविता / ग़ज़ल हाशिए पर है?” विषय पर चर्चा की गई जिसमें ज़र्फ़ देहलवी, मुनव्वर सरहदी, शैलेश कुमार व जगदीश रावतानी ने अपने-अपने विचार रखे। निष्कर्ष रूप में ये बात सामने आई कि चूंकि पहले की बनिस्पत अब मलटीमीडिया की मौजूदगी से काव्य गोष्टियों, सम्मेलनो व मुशायरों में श्रोताओं की कमी दिखाई देती है पर कविता कहने व लिखने वालों व गम्भीर किस्म के श्रोताओं में इज़ाफ़ा ही हुआ है। इंटर नेट ने कवियों को अंतर-राष्ट्रीय ख्याति दिला दी है।

दूसरे सत्र के अंतर्गत गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –


अहमद अली बर्क़ी आज़मी-
कौम है, किसका पैग़ाम है, क्या अर्ज़ करूँ
ज़िन्दगी नामे गुमनाम है, क्या अर्ज़ करूँ
कल मुझे दूर से देख के करते थे जो सलाम
पूछते हैं तेरा क्या नाम है, क्या अर्ज़ करूँ


दर्द देहलवी-
कहते हैं नेकियों का ज़माना तो है नहीं
दामन भी नेकियों से बचना तो है नहीं।
हर कोई गुनगुनाए ग़ज़ल मेरी किसलिए
इक़बाल का ये तराना तो है नहीं।


शैलेश कुमार सक्सैना-
आज फिर वह उदास है, जिसका दिमाग़ दिल के पास है
जो मिला रहे हैं दूध में ज़हर, उन्हीं के हाथ में दारू का गिलास है।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ मनमोहन शर्मा तालिब

मनमोहन शर्मा तालिब-
गुरबत को हिकारत की निगाहों से न देखो
हर शख्स न अच्छा है न दुनिया में बुरा है।
सभी प्यार करते हैं एक दूसरे से
मुहब्बत माँ की ज़माने से जुदा है।


क़ैसर अज़ीज़-
जाने किस हिकमत से ऐसी कर बैठे तदबीरें लोग
ले आए मैदाने अमल में काग़ज़ की शमशीरें लोग।
रंज ख़ुशी में मिलना जुलना होता है जो मतलब से
अपनी दया की खो देंगे इक दिन सब तासीरें लोग।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ भूपेन्द्र कुमार

भूपेन्द्र कुमार –
बासी रोटी की क़ीमत तो तुम उससे पूछो यारो
जिसको ख़ाली जेबें लेकर साँझ ढले घर आना है।
तूफानों से क्रीड़ा करना है अपना शौक़ पुराना
भागे सारी दुनिया ग़म से अपना तो याराना है।

जगदीश रावतानी आनंदम्-
सुलझ जाएगी ये उलझन भी इक दिन
तेरी जुल्फों का पेचो ख़म नहीं है।
अमन है चैन है दुनिया में जगदीश
फटे गर बम तो भी मातम नहीं है।

पी.के. स्वामी-
दोस्तों को देख कर दुश्मन सदा देने लगे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।
कुछ सिला मुझको वफाओं का मेरी पाने तो दो
ज़हर के बदने मुझे तुम क्यों दवा देने लगे।


मुनव्वर सरहदी-
मुझे आदाबे मयख़ाना को ठुकराना नहीं आता
वो मयकश हूँ जिसे पी कर बहक जाना नहीं आता।
दिले पुर नूर से तारीकियाँ मिटती हैं आलम की
मुनव्वर हूँ मुझे ज़ुल्मत से घबराना नहीं आता।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ ज़र्फ़ देहलवी

ज़र्फ देहलवी-
गाँव की मिट्टी, शहर की ख़ुशबू, दोनों से मायूस हुए
वक़्त के बदले तेवर हमको, दोनों में महसूस हुए।

खेल खिलंदड़, मिलना-जुलना, अब न रहे वो मन के मीत
भूल गईं ढोलक की थापें, बिसर गए सावन के गीत
चिड़ियों की चहकन सब भूले, भूले झरनों का संगीत
तरकश ताने प्रचुर हुए सब, मृदुता में कंजूस हुए।

अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनाब ज़र्फ़ देहलवी ने आनंदम् के एक साल पूरा होने पर बधाई दी और नए कवियों को जोड़ने व कविता को आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक नए मुकाम तक पहुँचाने के लिए प्रशंसा की और सबके प्रति धन्यवाद प्रकट किया।

Tuesday, April 21, 2009

22 कवियों की उपस्थिति में आनंदम की नौवीं गोष्ठी सम्पन्न


हर महीने के दूसरे रविवार को दिल्ली का पश्चिम-विहार इलाका कवियों की शब्दताल पर थिरकता है। अवसर होता है आनंदम संस्था की मासिक काव्य-गोष्ठी का। यह गोष्ठी विगत् 9 महीनों से आयोजित हो रही है। दिल्ली के आसापास और कई बार काफी दूर के कवि भी इस कविता-पूजन के लिए जमा होते हैं। कुछ अपनी सुनाते हैं और कुछ औरों की सुनते हैं। नौवीं आनंदम काव्य गोष्ठी 12 अप्रैल 2009 को संस्था-प्रमुख जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे अनुराधा शर्मा, संजीव कुमार, साक्षात भसीन, मुनव्वर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ॰ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना, प्रेमचंद सहजवाला, शहादत अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी, रमेश सिद्धार्थ, अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दीक्षित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत, इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी जैसे नये-पुराने कवि शरीक हुए। गोष्ठी की अध्यक्षता दरवेश भरती ने की । संचालन जगदीश रावतानी ने किया।

एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा" जिसमें डॉ रमेश सिद्धार्थ, डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ॰ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।

काव्य गोष्ठी की शुरूआत से पहले ये दुखद सूचना दी गयी कि जाने-माने साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है। एक और दुखद समाचार यह था के बलदेव वंशी के जवान पुत्र का भी हाल ही में देहांत हो गया।
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सदस्यों को सदमा बर्दाशत करने की हिम्मत के लिए प्रार्थना की गयी।

काव्य गोष्ठी में पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शे'र/ पंक्तियाँ प्रस्तुत है-

डॉ अहमद अली बर्की:
वह मैं हूँ जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मनाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आँसू बहाने तक नही पहुँचा

अख्तर आज़मी:
ख़ुद गरज दुनिया है इसमें बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरों के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये

डॉ विजय कुमार:
प्यासी थी ये नज़रें तेरा दीदार हो गया
नज़रों में बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया

डॉ दरवेश भारती:
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तों की टूट जायेगी

जगदीश रावतानी:
जहाँ-जहाँ मैं गया इक जहाँ नज़र आया
हरेक शै में मुझे इक गुमां नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मेरे तब धुँआ नज़र आया

मुनव्वर सरहदी:
ज़िन्दगी गुज़री है यूँ तो अपनी फर्जानों के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ

गोष्ठी का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ। जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया।

Friday, January 16, 2009

नये साल की पहली आनंदम गोष्ठी

इस गोष्ठी को यहाँ सुना भी जा सकता है।


भूपेन्द्र कुमार और प्रेमचंद सहजवाला

'आनंदम' संस्था की नव वर्ष गोष्ठी 11 जनवरी 2009 को संस्था के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पश्चिम विहार में आयोजित की गई। गोष्ठी में मुनव्वर सरहदी, ज़फर देहलवी, जगदीश रावतानी, पी के स्वामी, मनमोहन तालिब, डॉ रेखा व्यास, रमेश सिद्धार्थ, साक्षात भसीन, प्रेमचंद सहजवाला, राम निवास इंडिया, पंडित प्रेम बरेलवी, आशीष सिन्हा 'कासिद', जितेंदर प्रीतम, रविन्द्र शर्मा रवि, भूपेन्द्र कुमार, डॉ. सत्यपाल चबर, कैसर अजिग, सुरेंदर पम्मी व सपना संजीव दत्त ने हिस्सा लिया। गोष्ठी का संचालन भूपेंद्र ने किया तथा प्रारम्भ में प्रेमचंद सहजवाला ने आगंतुक कवियों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि कविता 'अभिव्यक्ति की उत्कट इच्छा' से ही पनपती है। अपने कॉलेज के दिनों का एक रोचक उदहारण देते हुए उन्होंने बताया कि तब तो अक्सर कुल्फी वाले के बक्से पर भी एक शेर लिखा रहता:

बन जाते हैं सब रिश्तेदार जब ज़र पास होता है,
टूट जाता है गरीबी में जो रिश्ता ख़ास होता है.


गोष्ठी में जर्फ़ देहलवी ने अपनी गज़लों से वाह-वाह की धूम मचा दी। उनके दो दिलचस्प शेर थे:

कुछ के जैसा मैं हूँ और कुछ मेरे जैसे हैं यहाँ,
किस को अपना मैं कहूं और किस को बेगाना कहूं।

कुछ मुझे वो और कुछ मैं उस को देता हूँ फरेब,
उसको दीवाना कहूं या ख़ुद को दीवाना कहूं।


रविन्द्र शर्मा 'रवि' हमेशा की तरह सशक्त गज़लों के साथ उपस्थित थे। बिछडे हुए साथियों की प्रतीक्षा में रत लोगों की स्थिति का एक अंदाजे-बयान:

हवा चुपचाप अपना काम करके जा चुकी होगी
सभी इल्ज़ाम चिंगारी के जिम्मे हो गए होंगे
शजर की मौत का इस शहर में मतलब नहीं कोई
बहुत होगा तो आकर कुछ परिंदे रो गए होंगे


जगदीश रावतानी की कविता राजनीती पर एक करारा प्रहार थी:

राजनीति और कूटनीति ने अपदस्थ कर सबको / विचारों से बना दिया भिखारी / दुर्भाग्य, इन्सान से बदल कर आदमी हुआ मराठी या बिहारी

सहजवाला ने अपनी ग़ज़ल के एक शेर में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के मद्दे-नज़र पूरे सिस्टम पर प्रहार किया:

साज़िश से बेखबर थे, सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएं बनाने।


मुनव्वर सरहदी हमेशा की तरह सदाबहार रहे और अपने हास्य शेरों से सब के बेतहाशा हंसा कर माहौल को तनाव-मुक्त कर दिया।

ग़ज़ल, ग़ज़ल है मुहब्बत की आरती के लिए
ये शेर फूल है पूजा की तश्तरी के लिए।
क़रीब आती हैं कालेज की जब हसीनाएँ
मैं अपने इश्क़ का सिक्का उछाल लेता हूँ।
ख़ुदा का शुक्र है सब हिन्दी पढ़ने वाली हैं
मै उर्दू बोल कर हसरत निकाल लेता हूँ।


अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का हार्दिक धन्यवाद किया व गोष्ठी सम्पन्न हुई।


जगदीश रावतानी

गोष्ठी में पढ़े गये कुछ और ग़ज़लों/कविताओं के अंश-

सर्वश्री ज़र्फ़ -

एक शीरीं आलमे एहसासे मयख़ाना कहूँ
ज़िंदगी को मैं हक़ीक़त या कि अफ़साना कहूँ
है जहाँ में दरमियाँ ख़ुशियों के ग़म का मसविदा
मैं इसे बज़्मे मसर्रत या कि ग़मख़ाना कहूँ


जितेन्द्र प्रीतम -

तुम्हारी गली में मैं आता रहूँगा
में गाता रहा हूँ मैं गाता रहूँगा


प्रेमचन्द सहजवाला -

दुनिया में आए थे जो तारीख़ को बनाने
अब गुमशुदा हैं लोगों उनके पते ठिकाने
साजिश से बेख़बर थे सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएँ बनाने


पी.के. स्वामी -

क़रीब होती है उनकी मंज़िल, जो तेरे ग़म में समा रहे हैं
जो दूर होते हैं ख़ुद से अपने, क़रीब तेरे ही आ रहे हैं
रूह को जो ख़ुशी न पहुँचे तो क्या किया ज़िन्दगी में हमने
जो बाँटते हैं सुरूर पै हम वो लुत्फ़े मय वो ही पा रहे हैं


रमेश सिद्धार्थ (रेवाड़ी से)-

रात भर आँखें तरसीं सपन के लिए
जैसे तरसे है बेवा सपन के लिए


क़ैसर -

दिलों में हमको निहाँ मिलेगा
यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा
सजदे में जा कर तो देखो
सुकून वहाँ कितना मिलेगा


डॉ. रेखा व्यास -

शाम ढलने लगी, घर को चलने लगी
रात बाघिन सी हमको छलने लगी
खेत खलिहान मैदान ताल तलैया
भोर सूरज के संग में मचलने लगी
गीत ग़ज़लों का व्यास बढ़ा जब से ही
रेखा तू भी आग उगलने लगी


भूपेन्द्र कुमार -

सोना है जिसे आज भी सड़कों के किनारे
कैसे कहेगा वो नया साल मुबारक।