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Friday, October 1, 2010

जलेस, कोटा मासिक काव्‍यगोष्‍ठी हिंदी दिवस को समर्पित

कोटा। 26 सितम्‍बर। जनवादी लेखक संघ की मासिक काव्‍य गोष्‍ठी माह के अंतिम रविवार को हिंदी दिवस को समर्पित रही। जलेस कार्यकारिणी ने सर्वप्रथम तलवंडी स्थित अपने कार्यालय में प्रख्‍यात साहित्‍यकार कन्‍हैया लाल नंदन के निधन पर उन्‍हें श्रद्धांजलि दी। जलेस की प्रगतिशील परम्‍परा की उदारता के चलते सर्वप्रथम जलेस और शहर के प्रिय क्रांतिकारी रचनाकार ब्रजेश सिंह झाला ‘पुखराज’ के महावीर नगर प्रथम पर स्थित निवास पर दोपहर ढाई बजे गोष्‍ठी का शुभारंभ ‘पुखराज’ की सरस्‍वती वंदना से हुआ।

आरंभ में लाखेरी से पधारे शायर सुनील एस- उर्मिल मुख्‍य अतिथि और शहर के जाने माने साहित्‍यकार सूरजमल जैन ने अध्‍यक्ष के रूप में आसन ग्रहण किया। जलेस अध्‍यक्ष श्री रघुनाथ मिश्र ने पधारे अतिथियों का स्‍वागत करते हुए गोष्‍ठी को हिंदी दिवस (14 सितम्‍बर) को समर्पित कर सभी पधारे साहित्‍यकारों रचनाकारों को हिंदी पर अपनी रचनाओं की प्रस्‍तुति के लिए आह्वान किया। उन्‍होंने राष्‍ट्रभाषा के संवर्द्धन, प्रोत्‍साहन, और संरक्षण पर जोर देते हुए हिंदी की अथक यात्रा के बारे में अपना सारगर्भित वक्‍तव्‍य दिया। कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रिका ‘दृष्टिकोण’ के प्रबंध सम्‍पादक और कवि नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’ को सौंपा गया। काव्‍यपाठ का आरंभ कवि महेंद्र शर्मा की कविता ‘गलत चुना तो पछताएगी, बोल जिंदगी किधर जाएगी’ से हुआ। इसी बीच जयपुर के जाने माने ग़ज़लकार अखिलेश तिवारी के आने से माहौल में ताजगी आ गयी। कविता के बाद श्री तिवारी को विशिष्‍ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। ‘पानी को तो पानी लिख’ काव्‍य संग्रह के रचनाकार श्री आर सी शर्मा आरसी ने अपनी प्रख्‍यात रचना ‘एक अरसे की अनबुझी प्‍यास हूँ, पार्थ का दिग्‍भ्रमित आत्‍मविश्‍वास हूँ, जो महल मेरे सपनों का हो न सका, मैं उसीका अधूरा शिलान्‍यास हूँ’ सुना कर धीरे-धीरे गोष्‍ठी को ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। सतीश मीणा ने ‘हरियाली के बीच रंग गया, नंदकिशोर अनमोल ने ‘हम हिंदी हैं गर्व हमें कि हिंदुस्‍तान हमारा’ गीत से हिंदी और हिंदुस्‍तानी होने पर गर्व जताया, बीच-बीच में नवराचनाकारों को जोश दिलाते हुए संचालक नरेंद्रचक्रवती ‘मोती’ ने अपनी ग़ज़ल सुनाई ‘गाहे बगाहे क़लम चलाया करो, ‘गीतांकुर’ से फि‍र चर्चा में आये छोटी बहर के रचनाकार शायर डॉ0 नलिन ने ग़ज़ल सुनाई ‘यह सदा है चाक सीने की, तमन्‍ना है और जीने की’, शहर की उभरती कवयित्री प्रमिला आर्य ने अपना गीत ‘गर तू पाना चाहे मंजिल, आशाओं के दीप जला’ गाकर दाद बटोरी, शरद तैलंग की ग़ज़ल ‘बात दलदल की करे जो कंवल क्‍या समझे, दर्द जिसने न सहा हो वो ग़ज़ल क्‍या समझे’ सुन कर तालियों से गोष्‍ठी गूँज उठी, महेंद्र नेह ने जनवादी कविता ‘उन्‍होंने हमारे हाथों से छीने औजार खाली हाथ रह गये, उन्‍होंने हमें जलालत दी हम उसे भी सह गये ‘ सुना कर सफ़दर हाशमी की याद ताजा कर दी। डॉ0 गयास फ़ाईज़ ने शृंगार रस की ग़जल से माहौल को नई ऊँचाई प्रदान की ‘तेरी यादों तेरे खयालों में, खो गया हूँ मैं उजालों में, बन सँवरने की क्‍या ज़रूरत है, अच्‍छे लगते हो बिखरे बालों में’, राष्‍ट्रभाषा के प्रति सम्‍मान में क्रांतिकारी कवि पुखराज ने जहाँ सरस्‍वती वंदना हिंदी की सशक्‍त कविता से की, वहीं अपने काव्‍य पाठ में राष्‍ट्र के प्रति अपने प्रेम को ‘रक्‍त के कतरों से सींचा है जहॉं सारा चमन, अश्रुपूरित नयन करते उन शहीदों को नमन’ सुना कर जलेस की गरिमा को बढ़ाया। शायर इमरोज ने हिंदी दिवस को समर्पित ग़ज़ल सुनाई ‘तुम्‍हारे सामने हिंदी ग़ज़ल एलान कर देगी, तेरी भाषा विवादों का सफ़ा मैदान कर देगी’ सुनाई। वयोवृद्ध और वरिष्‍ठ कवि निर्मल पाण्‍डेय ने अपनी कविता से संकल्‍प की बात की ‘हो कठिन पर्वत मगर संकल्‍प हो, दृढ़ चरण धर कर किसी अंजाम को देंगे। पार्थ ने फि‍र रख दिया गांडीव धरती पर, यह खबर हम खासकर घनश्‍याम को देंगे’, प्रख्‍यात शायर पुरुषोत्‍तम यक़ीन ने आज की ग़रीबी और महंगाई पर व्‍यंगय सुनाया ‘जिंदगी की व्‍यथायें क्‍यों लिख दीं, इतनी महंगी दवायें क्‍यों लिखदीं’। अन्‍य रचनाकारों रघुनंदन हठीला, शकूर अनवर, अखिलेश तिवारी, सुनील उर्मिल, अखिलेश अंजुम, गोरस प्रचंड, आर सी गुप्‍ता, सुरेंद्र गौड़, हलीम आईना, चाँद शेरी, ओम नागर, वेद प्रकाश परकाश, इमरोज, शून्‍याकांक्षी, वैभव सौमानी, आनंद हजारी ने भी अपनी अपनी रचनायें पढ़ीं। कार्यक्रम के अंत में श्री मिश्र ने जयपुर से पधारे साहित्‍यकार श्री अखिलेश तिवारी को ‘आकुल’ की पुस्‍तक ‘जीवन की गूँज’ और स्‍वयं की पुस्‍तक ‘सोच ले तू किधर जा रहा है’ भेंट कर उन्‍हें सम्‍मानित किया। तीन घंटे चली गोष्‍ठी में शामिल शहर के साहित्‍य संस्‍थानों विकल्‍प, आर्यावर्त आदि के प्रतिनिधियों और लगभग 35 रचनाकारों साहित्‍यकारों ने उपस्थित हो कर जलेस गोष्‍ठी को समारोह का रूप दे दिया और समारोह को साहित्‍य रस से सराबोर कर अविस्‍मरणीय बना दिया।


गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’
नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’

Tuesday, August 31, 2010

जनकवि गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’ की पुस्‍तक का लोकार्पण

“जीवन की गूँज” जीवन से आप्‍लावित क़ृति-डॉ0 कंचना सक्‍सैना


बायें से दायें- डॉ0 अशोक मेहता, डॉ0 कंचना सक्‍सैना, श्री रघुराज सिंह हाड़ा, डॉ0 औंकारनाथ चतुर्वेदी, आचार्य ब्रजमोहन मधुर, कृतिकार गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’ और श्री रघुनाथ मिश्र पुस्‍तक ‘जीवन की गूँज’ का लोकार्पण करते हुए।

कोटा। 22 अगस्‍त। जनकवि गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’ का काव्‍य संग्रह ‘जीवन की गूँज’ का लोकार्पण जनवादी लेखक संघ, कोटा द्वारा आयोजित किया गया।

श्री मिश्र ने कृतिकार परिचय देने से पूर्व ‘आकुल’ के बारे में कहा-‘नहीं जाना था तो कुछ भी नहीं जाना था। जाना तो कुछ जाना। अब जाना तो यह जाना कि अभी तक तो कुछ भी नहीं जाना।‘ उन्‍होंने कहा कि आज आप जो कुछ जानेंगे उसके बाद भी बहुत कुछ जानने को रह जाता है। आज कई पर्दे खुलेंगे। ऐसे और भी मनीषी साहित्‍यकार हैं जिन्‍हें यह शहर बहुत समय तक नहीं जान पाया, उनमें से आकुल भी एक हैं। 1996 में उनकी पहली नाट्य कृति ‘प्रतिज्ञा’ कोटा के भारतेंदु समिति में विमोचित हुई थी उसके बाद से कोटा के साहित्‍य समाज से कोटा में रहते हुए भी श्री भट्ट गुमनामी की तरह अपनी साहित्‍य जीवन यात्रा करते रहे। श्री मिश्र ने भट्ट की दूसरी पुस्‍तक ‘पत्‍थरों का शहर’ की उनका प्रख्‍यात संवाद ‘दोस्‍त फ़रिश्‍ते होते हैं, बाक़ी सब रिश्‍ते होते हैं’ से आरंभ की और कहा कि यह एक ऐसा जुमला किया है, जिससे सारा देश जो ‘आकुल’ को जानता है या नहीं जानता चर्चाएँ करता है। इस पर 6-8 घंटे की संगोष्‍ठी की जा सकती है। हमारे मुख्‍य अतिथि महोदय ने स्‍वयं ने इसे सूक्ति कहा है। ‘आकुल’ का जीवन संगीत और साहित्‍य से ओतप्रोत रहा है। यह उनकी विशेषता रही है कि अपने साहित्‍य प्रकाशनों में उन्‍होंने कभी संगीत यात्रा का परिचय नहीं दिया। अनेकों वाद्य बजाने में सिद्धहस्‍त आकुल ने प्रमुख की बोर्ड प्‍लेयर (सिन्‍थेसाइज़र) के रूप में देश के प्रमुख आर्केस्‍ट्राओं में अपनी विशेष पहचान बनाई। 1980 से 1988 के मध्‍य लगभग 10 विदेशों में उनके स्‍टेज प्रोग्राम्‍स को वे अपने जीवन का स्‍वर्णिम समय मानते हैं। उन्‍होंने मथुरा वृन्‍दावन की कई रासलीला व रामलीला मंडली के साथ पार्श्‍व संगीत दिया।

पुस्‍तक के लोकार्पण के पश्‍चात् सर्वप्रथम डॉ0 फ़रीद अहमद ‘फ़रीदी,’ जो “आकुल” की पुस्‍तक ‘पत्‍थरों का शहर’ के सम्‍पादक भी रहे हैं, ने उनके सम्‍मान में पाँच छंदों वाली एक कविता “साहित्‍य का फ़रिश्‍ता” गा कर सुनाई और श्रीभट्ट को आशीर्वाद और बधाई स्‍वरूप लेखनी भेंट दी।

कृति परिचय के लिए अपने उद्बोधन के लिए संचालक ने डॉ0 कंचना सक्‍सैना को आमंत्रित किया। डॉ0 कंचना सक्‍सैना ने अपने आलेख को नाम दिया ‘जीवन की गूँज’ जीवन से आप्‍लावित कृति। वे कृति के लिए हाशिया बाँधते हुए लिखती हैं कि लगता है आज सारे विशेषण नुच गये हैं, छिन गये हैं और रह गये हैं मात्र सर्वनाम, जो संज्ञा के क़रीबी दोस्‍त हैं। जब सर्वनाम ही रह गये हैं, तो मन की दौड़ तेज हो जाती है। उस ज़िन्‍दगी की तरह, जो नामहीन हो गयी है। ऐसी ही ऊबड़-खाबड़, मधुर एवं तिक्‍त सम्‍बंधों की पहचान की है श्री भट्ट ने। इनको समझने के लिए एक ओर भीषण तपती आग की आवश्‍यकता है, तो दूसरी ओर शीतल मन्‍द फुहार की। युगबोध की अभिव्‍यंजना के साथ विरोधी भावों को उद्वेलित करना कवि के लिए इ‍सलिये भी सम्‍भव रहा है कि ज़िन्‍दगी की हर धड़कन अथवा नब्‍ज़ को उन्‍होंने पूरी तरह टटोला है। श्री भट्ट ने अपनी सूक्ष्‍मदर्शी दृष्टि से सभी विषयों को भावोर्मियों की लड़ियों में शब्‍दों के माध्‍यम से ऐसे पिरोया है कि पाठक मात्र आंदोलित हुए बिना नहीं रहता। ‘वसुधैव कुटुम्‍बकम्’ की भावना से आड़ोलित एवं आप्‍लावित आपकी चिन्‍तना निश्‍चय ही काल और समय की माँग के अनुकूल है। बाजारवाद एवं वैश्‍वीकरण के प्रभावस्‍वरूप उत्‍पन्‍न स्थिति में आम आदमी का संघर्ष, पीड़ा, घुटन, संत्रास के साथ रिसते हुए रिश्‍तों के प्रति कवि का सम्‍वेदनशील मन करुणाश्रु प्रवाहित करता है। 9 कालखंडों में रचित कविताओं को 240 पृष्‍ठीय पुस्‍तक में प्रश्रय मिला है। भावोद्गारों को ब्रज एवं राजस्‍थानी के रंग कलशों में न केवल उँडेला है, अपितु दर्शन और अध्‍यात्‍म को भी संस्‍पर्श किया है। जहाँ भाषा की दृष्टि से ‘आकुल’ प्रोढ़, परिष्‍कृत एवं परिमार्जित एवं परिनिष्ठित भाषा के धनी हैं वहीं भाव की दृष्टि से भी कविता प्राणवान् और ऊर्जावान् बन पड़ी हैं। ब्रजभाषा पर तो आपका अपूर्व अधिकार है। उपमान जीवन से ग्रहीत हैं। कविता के साथ गद्य में कवि के विचार उसे समझने में सहायक तो हैं ही साथ ही कवि का ये नवीन प्रयोग प्रशंसनीय है। लेखक की विद्वत्‍ता का भी कहीं अंत नहीं है। जापानी विधा हाइकू में निबद्ध त्रिपदीय रचनाओं की परत दर परत सींवन उधेड़ी है। स्‍वध्‍येय में वे अनवरत सृजन की ओर संकेत भी करते हैं।

प्रमुख वक्‍ता आचार्य ब्रजमोहन मधुर ने ‘सहितस्‍य भाव: साहित्‍य’ की अवधारणा को पूरा करने वाले साहित्‍यकार के रूप में आकुल को साधुवाद दिया। लोक साहितय, लोक संस्‍कृति को बचाये जाने के उनके आग्रही को भी उन्‍होंने साधुवाद दिया और कृति को अध्‍यात्‍म और दर्शन की एक उत्‍कृष्‍ट कृति के य्‍प में बताया।

डॉ0 अशोक मेहता ने पुस्‍तक को आस्‍था के कवि की अनुगूँज के रूप में सार्थक प्रयत्‍न बताया। उनकी दृष्टि में पुस्‍तक की शृंगार और होली विषयक रचनाओं को वे सुंदरतम बताते हैं।

मुख्‍य अतथि श्री रघुराज सिंह हाड़ा ने अपने वक्‍तव्‍य में ‘आकुल’ को आशीर्वाद देते हुए कहा जिस पुस्‍तक का आरंभ श्रीकृष्‍णार्पणम् से हुआ हो और समाप्ति श्रीकृष्‍णार्पणमस्‍तु करके बात पूरी हुई हो, तो भई कृष्‍णार्पण के बाद तो लोकार्पण प्रसाद वितरण का ही होता है और वो भी हो गया। मेरे यह सुखद बात मानता हूँ, जिस समय प्रिय आकुल का जन्‍म हुआ 18 जून 1955, उसके कुछ दिन बाद ही मैं शिक्षक बन गया था। दो तीन महीने पहले जन्‍मा बालक आज इतनी प्रोढ़ता के साथ एक कृति प्रस्‍तुत करे और वह भी ऐसी जो सारे जीवन को गूँजता हुए क्रमश: क्रमश: चरेवेति चरेवेति भाषा में कह जाता है। अपनी प्रज्ञा से मुझे सबसे अच्‍छी बात इस कृति की यह लगी वो यह कि सामान्‍यतया होता यह है कि मन किया और लिख दिया, पर प्रिय आकुल का संजीदगी भरा, धैर्य और उनकी प्रज्ञा का आग्रह रहा होगा कि उन्‍होंने कृति लिखने से पूर्व ‘क्‍या लिखूँ, क्‍यों लिखूँ’ के उत्‍तर तलाश किये, इसलिए हर रचना के पूर्व उन्‍होंने अपने उद्रगार प्रकट किये हैं।

अपने अध्‍यक्षीय भाषण में डॉ0 औंकार नाथ चतुर्वेदी ने कहा कि 19 वीं शताब्‍दी में झालावाड़ ने शीर्ष स्‍थान प्राप्‍त किया था हिन्‍दी सेवा में। हरिवंश राय बच्‍चन जहाँ गिरधर शर्मा कविरत्‍न से मधुशाला के छंद सीखने आये थे। जिस कविरत्‍न गिरधर शर्मा, शकुंतला रेणु, भट्ट गिरधारी शर्मा तैलंग कवि किंकर की कर्मभूमि झालवाड़ रही हो, पं0 गदाधर भट्ट का परिवार हो, ऐसे परिवार से संस्‍कारित हैं रत्‍नशिरोमणि “आकुल”। जीवन की जो गूँज है, एक सार्थक कवि की सार्थक प्रतिध्‍वनि है, जो दशकों तक लोगों द्वारा याद की जायेगी। आज जन्‍माष्‍टमी है, चौंकिये मत, भले जन्‍माष्‍टमी आठ दिन बाद है। पर आज जन्‍माष्‍टमी है। रचनाकार की कृति का लोकार्पण जन्‍माष्‍टमी का त्‍योहार ही तो होता है। जो रचना हैं, साहित्‍यकार हैं, जिसने अपने जीवन में पुस्‍तक लिखी हो, तन मन की सुध बिसरा जाता है। एक संगीतकार का जीवन जीते जीते कवि बन जाना, अपने जीवन का इतना बड़ा मोड़ ले आना फिर अपनी अंतर्भावानाओं से गुँथ जाना, फि‍र अपने आराध्‍य को ढूँढ़ना , फि‍र आराध्‍य के साथ अनुरंजित हो जाना, बहुत बड़ी साधना है।
भारी संख्‍या में वरिष्‍ठ वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों सहित अनेक रचनाकारों ने समारोह में भाग लिया। वल्‍लभ महाजन, सुरेश चंद्र सर्वहारा, डॉ0 योगेन्‍द्र मणि कौशिक, महेंद्र नेह, डॉ0 इंद्र बिहारी सक्‍सैना, सावित्री व्‍यास, हरिश्‍चंद्र व्‍यास, डॉ0 नलिन, डॉ0 फ़रीदी, डॉ0 राधेश्‍याम मेहर, शरद तैलंग, समाचार सफ़र के सम्‍पादक जीनगर दुर्गाशंकर गहलोत, अखिलेश अंजुम, आलोचक प्रोफेसर हितेश व्‍यास, भगवती प्रसाद गौतम, बृजेंद्र सिंह झाला पुखराज, रामदयाल मेहरा, हलीम आईना, आदि अनेकों साहित्‍यप्रेमियों ने समारोह में उपस्थिति दी।

प्रस्‍तुतकर्ता- गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’, कोटा।

Saturday, August 21, 2010

आर.सी. शर्मा ’आरसी’ के ग़ज़ल संग्रह ’पानी को तो पानी लिख’ का लोकार्पण



कोटा १४ अगस्त : सुपरिचित गीतकार एव ग़ज़लकार आर.सी.शर्मा ’आरसी’ के सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह ’पानी को तो पानी लिख’ का लोकार्पण ’विकल्प’ जन सांस्कृतिक मंच कोटा द्वारा १४ अगस्त १० को स्वतंन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर कोटा में उमरावमल पुरोहित सभागार में सम्पन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार, रंगकर्मी एवं नाट्य लेखक शिवराम ने की । मुख्य अतिथि बिजनौर से पधारे ग़ज़लकार अनमोल शुक्ल ’अनमोल’ तथा विशिष्ट अतिथि बाल साहित्य के ख्यातनाम लेखक डॉ. अजय जन्मेजय तथा अविचल प्रकाशन के संस्थापक डॉ. गजेन्द्र बटोही थे ।
कार्यक्रम का प्रारम्भ अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं द्वीप प्रज्वलित करने के साथ हुआ । सर्व प्रथम ग़ज़लकार एवं गायक शरद तैलंग ने आर.सी.शर्मा’ आरसी’ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंनें कहा आरसी की एक गज़ल के कुछ शे’रों द्वारा ही उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की सम्पूर्ण जानकारी मिल जाती है। वो कुछ शे’र इस प्रकार थे ’बुज़ुर्गों का हमारे साथ यह एह्सान है प्यारे, शहर भर में हमारी अब अलग पहचान है प्यारे" - "मेरे गीतों में इक नन्हा-सा बालक मुस्कराता है, मगर ग़ज़लों मे शामिल दर्द-ए-हिन्दुस्तान है प्यारे"। शायर शकूर अनवर ने कहा कि आरसी की ग़ज़लें मौज़ूदा हालात की तल्खी और खुशबू दोनों को सादगी और शिद्दत से बयान करतीं हैं, भाईचारे का पैगाम देतीं हैं तथा मेलमिलाप और यकजहेती बढ़ातीं हैं। साहित्यकार भगवती प्रसाद गौतम ने आरसी के गज़ल संग्रह पर पत्रवाचन करते हुए कहा कि ये ग़ज़लें सच को सच कहने का आह्वान हैं और यही एक समर्थ रचनाकार का सबसे बडा गुण है।
इसके पश्चात ग़ज़ल संग्रह ’पानी को तो पानी लिख’ का अतिथियों द्वारा लोकार्पण हुआ। गायक शरद तैलंग ने जब इस संकलन की दो ग़ज़लों ’खुशी के पल तो जीवन में महज़ दो चार होते हैं, दुखी इन हादसों से हम हज़ारों बार होते हैं’ तथा "हम खुद ही उड़ सके न परों की थकान से, शिकवा नहीं है कोई हमें आसमान से" की संगीतमय प्रस्तुति दी तब पूरे हॉल में लोग गज़लों का आनन्द उठाते रहे। डॉ. अजय जन्मेजय ने अपने उदबोधन में आरसी की गज़लों के चुनिन्दा शे’रों का हवाला दे कर उन्हें ज़िन्दगी का शायर बताया और कहा कि गज़लों में सौन्दर्य के विविध रंग-रूपों की उपस्थिति और सच्चाई का पक्ष उनकी विशिष्टता है। उन्होंने आरसी के इस क्षैत्र में निरन्तर प्रगति करते रहने की कामना की। संग्रह के प्रकाशक डॉ. गजेन्द्र बटोही ने भी इस पुस्तक की रचना यात्रा की जानकारी श्रोताओं को देते हुए ’आरसी’ को मानवीय मूल्यों का साधक शायर बताया। समारोह में ग़ज़लकार आरसी ने अपनी कुछ गज़लों का सस्वर पाठ भी किया।
समारोह के मुख्य अतिथि ग़ज़लकार अनमोल शुक्ल ’अनमोल’ ने अपने वक्तव्य में आरसी जी के कथ्य और शिल्प की चर्चा की तथा उनके पहले संकलन ’अहल्याकरण’ की प्रशस्ति में प्राप्त अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया का हवाला देकर आरसी जी की क़लम की जादूगरी पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा कि आरसी ने ग़ज़ल लेखन परम्परा में अपनी प्रभावी दस्तक दी है सधी छंदबद्धता, मनोहरी लय और सामाजिक विद्रूपताओं को दर्पण दिखातीं ये गज़लें सामाजिक सत्य और प्रेम के विविध रूपों की छटाएं हैं। इनकी ग़ज़लों के कथ्य का कैनवास बहुत व्यापक है तथा कुछ खास अनुभूतियों तक ही सीमित नहीं है।
अन्त में समारोह के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकर शिवराम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में आरसी जी की ग़ज़लों के अनेक शेरों पर अपने बहुत ही सारगर्भित उदबोधन द्वारा इस संग्रह की विवेचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि राहबोध, संकल्प सजगता और संवाद उत्सुकता आरसी की विशिष्टता है जो इस संकलन की ग़ज़लों में मुखर हुई है। सच को सच कह, ज़िन्दगी की कहानी बयान करना उनकी शायरी का आधार है।
समारोह में ’विकल्प’ संस्था की ओर से सभी अतिथियों का नगर के प्रतिनिधि साहित्यकरों - अखिलेश ’अंजुम’, एन.के.शर्मा, हितेश व्यास, अरुण सेदवाल, रामकरण स्नेही, डॉ. इन्द्र बिहारी सक्सेना, जी.के. भट्ट, नरेन्द्र चक्रवर्ती, नितेश शर्मा ने माल्यार्पण तथा ’विकल्प सृजन सम्मान’ के स्मृति चिन्ह प्रदान कर स्वागत एवं समानित किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध शायर के.के. सिंह ’मयंक’ की उपस्थिति भी विशिष्ठ रही। कार्यक्रम का सफल संचालन साहित्यकार महेन्द्र नेह ने किया तथा आभार ’आरसी’ ने व्यक्त किया। समारोह में बडी तादाद में नगर के साहित्यकार तथा गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे ।
प्रस्तुति: शरद तैलंग