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Saturday, January 9, 2010

पिछड़ा वर्ग के पास कोई फिलास्फर नहीं है : राजेन्द्र यादव



आज दिनांक ०९/०१/२०१० को साहित्य अकादेमी सभागार में रमणिका फाउंडेशन एवं शिल्पायन प्रकाशन द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में संजीव खुदशाह द्वारा लिखित पुस्तक 'आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग` का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार एवं 'हंस` पत्रिका के संपादक श्री राजेन्द्र यादव ने किया। मुख्य अतिथि श्री राजेन्द्र यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि चार पांच ऐसी जातियां हैं जो कि न दलित हैं न पिछड़ी हैं। जिन्हें त्रिशंकु जातियां भी कह सकते हैं। इन जातियों के पास कोई फिलोस्फर नहीं है, जबकि दलितों के पास डॉ. अम्बेडकर तथा फूले हैं। उन्होंने आगे कहा कि जातिवाद की जड़ता परिवार में निहित है। भारतीय समाज का पारिवारिक ढांचा इतना मजबूत है कि टूटता ही नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर हम लोग जो भी क्रांतिकारी चर्चा कर लें, लेकिन परिवार को हम बदल नहीं सकते। इसलिए हम परिवार से कटे लोग हैं। समाज के परिवर्तन के लिए परिवार की सोच में परिवर्तन लाना होगा। उन्होंने विश्लेषणात्मक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी की सम्पादक सुश्री रमणिका गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कहा कि ये सुखद बात है कि आधुनिक भारत में पिछड़े वर्ग की जांच पड़ताल लेखक संजीव खुदशाह ने अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से की है। विडंबना ये है कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज भी आज तक अपनी जाति नहीं छोड़ पाया है, तो हम अनपढ़ समाज से इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो सदियों से जाति की गुलामी को ढोता आ रहा है। समाजशास्त्रा के इस विषय पर ये पुस्तक लिखकर श्री संजीव खुदशाह ने गंभीर बहस का एक अच्छा मौका दिया है।

कार्यक्रम के आरंभ में पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख का पाठ श्री रमेश प्रजापति ने किया। तदोपरांत वरिष्ठ आलोचक एवं समाज सेवी श्री मस्तराम कपूर ने अपने वक्तव्य में कहा पिछड़े वर्ग की समस्या पर चर्चा करने से पूर्व पिछड़ा वर्ग को परिभाषित करना आवश्यक है। जातीय आधार पर जनगणना कराने से इनकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो सकता है, लेकिन नेहरू ने इसे होने नहीं दिया। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ आलोचक श्री मैनेजर पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में कहा जातिवाद देश के अतीत से भी जुड़ा है और देश के भविष्य से भी। उन्होंने लेखक से तथा उपस्थित सभी साहित्यकारों से आह्न किया कि जाति-व्यवस्था का केवल विश्लेषण न कर वे जाति व्यवस्था के विरोध में हुए आंदोलनों का जिक्र करते हुए, जाति-व्यवस्था के विरोध में लिखें। पुस्तक के लेखक संजीव खुदशाह ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि ऐसा नहीं कि पिछड़े वर्ग के पास फिलोस्फर नहीं थे। फुले एवं पेरियार पिछड़ी जाति के लेखक थे लेकिन पिछड़ों ने उन्हें न मानकर दलितों ने माना। कार्यक्रम का संचालन रमणिका फाउंडेशन के मीडिया प्रभारी श्री सुधीर सागर द्वारा किया गया।


प्रस्तुति : सुधीर सागर
मीडिया प्रभारी, रमणिका फाउंडेशन
ए-२२१, ग्राउंड फ्लोर, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली-२४
011-46577704,011-24333356

Wednesday, December 16, 2009

भोजपुरी के प्रख्यात नाटककार भिखारी ठाकुर के जन्म-दिवस पर संगोष्ठी

भोजपुरी साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच, जे.एन.यू., नई दिल्ली

भोजपुरी के प्रख्यात नाटककार भिखारी ठाकुर के जन्म-दिवस पर संगोष्ठी

विषय:- "भिखारी ठाकुर और भोजपुरी समाज"


आमंत्रित वक्ता:-
प्रो० केदारनाथ सिंह (प्रख्यात कवि)
प्रो० मैनेजर पाण्डेय (प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक)
प्रो० गोपेश्वर सिंह ( दिल्ली विश्वविद्यालय )
श्री संजीव (कार्यकारी संपादक,हंस)
डा० चन्द्रदेव यादव (जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली)
डा० केदार चौधरी (र.सि.कृ.महाविद्दालय,मैइल,देवरिया ,उ०प्र०)


शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण:-
डा० धनंजय सिंह - भिखारी ठाकुर की रचना मे जन चेतना का स्वर
श्री प्रमोद कुमार तिवारी - भिखारी ठाकुर की कविता और भोजपुरी समाज
श्री मृत्युंजय प्रभाकर - भिखारी ठाकुर के नाटक और भोजपुरी लोक जीवन




स्थान:- समिति कक्ष , भाषा,साहित्य एवं संस्कृति संस्थान, जे.एन.यू., नई दिल्ली
दिनांक:- 18-12-2009
समय:- सुबह 10 बजे


आयोजक- भोजपुरी साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच,जे.एन.यू.
http://bhojpurimanchjnu.ning.com
e-mail: bhojpurimanchjnu@gmail.com
सम्पर्क- 9871387326, 9868366736