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Monday, August 16, 2010

रमणिका फाउंडेशन ने किया दो प्रतिनिधी कविता संग्रहों का लोकार्पण



रमणिका फाउण्डेशन द्वारा साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित डॉ. सुधीर सागर का कविता संग्रह 'बस! एक बार सोचो` तथा श्रीमती कुन्ती की 'अंधेरे में कंदील` का लोकार्पण रमणिका फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री रमणिका गुप्ता, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष श्री एस. एस.नूर एवं वरिष्ट कवयित्री सुश्री अनामिका के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ।
मुख्य अतिथी श्री एस.एस.नूर ने अपने वक्तव्य में कहा काव्य भाषा दोनों कवियों के पास है। काव्यशास्त्र की गहरी पहचान है। इस कविता-संग्रह में यथार्थ से उपजी नई काव्य-भाषा देखने को मिलती है। 'बस! एक बार सोचो` की कविताओं के लिए अनामिका जी ने 'मेरे अंदर एक और आदमी` शीर्षक कविता का जिक्र खासतौर पर किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक शरीर में अनेक व्यक्ति निवास करते हैं। कुन्ती की कविता 'उजाले की किरण` में सकारात्मक उर्जा को बदलने की शक्ति है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं सुश्री रमणिका गुप्ता ने कहा 'ठाकुर का कुआं` कविता छोटी जरूर है लेकिन ये गहरी तथा लम्बी बात कहती है। अंधेरे में कंदील कविता के आरंभ में खरपतवार` शब्द का प्रयोग सहज और सही है जो खेतिहर मजदूरों से जुड़ा है। प्रेम वही करता है जो क्रांतिकारी होता है। कविताओं में कुछ न कुछ करने की भूख है। इस कार्यक्रम में दोनों कवियों ने अपनी चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। तत्पश्चात श्री रमेश प्रजापति में कविता पर आलेख पाठ प्रस्तुत करते हुए कहा कि 'बस! एक बार सोचो` की कविता उत्पीड़ितों और शोषितों का प्रकाशपुन्ज है। अजय नावरिया ने कहा डॉ. सागर की कविताओं में चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। जबकि कुन्ती की कविताओं में स्त्री है। विशिष्ट अतिथि श्री योगेन्द्र कुमार शर्मा 'निधि मेल` के संपादक ने कहा दोनों ही बुन्देली भाषा के अच्छे साहित्यकार हैं। दोनों की कविताओं में स्त्री एवं दलित विमर्श दिखाई देता है। कवि विवेक मिश्र ने कहा कि दोनों की पुस्तकों में शोषितों एवं उत्पीड़ितों की पीड़ा को मार्मिक ढंग से रखा। कार्यक्रम का संचालन छत्तीसगढ के दलित साहित्यकार संजीव खुदशाह ने किया। अंत में साहित्यकार श्री रूपनारायण सोनकर ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। कार्यक्रम में मैत्रेयी पुष्पा, असगर वजाहत, सुधा अरोड़ा, अनिता भारती, मदन कश्यप सहित अनेक साहित्यकारों ने शिरकत की।

प्रस्तुति : रमणिका फाउंडेशन
डिफेंस कालोनी
नयी दिल्ली

Saturday, January 9, 2010

पिछड़ा वर्ग के पास कोई फिलास्फर नहीं है : राजेन्द्र यादव



आज दिनांक ०९/०१/२०१० को साहित्य अकादेमी सभागार में रमणिका फाउंडेशन एवं शिल्पायन प्रकाशन द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में संजीव खुदशाह द्वारा लिखित पुस्तक 'आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग` का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार एवं 'हंस` पत्रिका के संपादक श्री राजेन्द्र यादव ने किया। मुख्य अतिथि श्री राजेन्द्र यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि चार पांच ऐसी जातियां हैं जो कि न दलित हैं न पिछड़ी हैं। जिन्हें त्रिशंकु जातियां भी कह सकते हैं। इन जातियों के पास कोई फिलोस्फर नहीं है, जबकि दलितों के पास डॉ. अम्बेडकर तथा फूले हैं। उन्होंने आगे कहा कि जातिवाद की जड़ता परिवार में निहित है। भारतीय समाज का पारिवारिक ढांचा इतना मजबूत है कि टूटता ही नहीं है। व्यक्तिगत स्तर पर हम लोग जो भी क्रांतिकारी चर्चा कर लें, लेकिन परिवार को हम बदल नहीं सकते। इसलिए हम परिवार से कटे लोग हैं। समाज के परिवर्तन के लिए परिवार की सोच में परिवर्तन लाना होगा। उन्होंने विश्लेषणात्मक शोधात्मक एवं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री एवं युद्धरत आम आदमी की सम्पादक सुश्री रमणिका गुप्ता ने अपने विचार रखते हुए कहा कि ये सुखद बात है कि आधुनिक भारत में पिछड़े वर्ग की जांच पड़ताल लेखक संजीव खुदशाह ने अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से की है। विडंबना ये है कि हमारा पढ़ा-लिखा समाज भी आज तक अपनी जाति नहीं छोड़ पाया है, तो हम अनपढ़ समाज से इसकी उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो सदियों से जाति की गुलामी को ढोता आ रहा है। समाजशास्त्रा के इस विषय पर ये पुस्तक लिखकर श्री संजीव खुदशाह ने गंभीर बहस का एक अच्छा मौका दिया है।

कार्यक्रम के आरंभ में पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख का पाठ श्री रमेश प्रजापति ने किया। तदोपरांत वरिष्ठ आलोचक एवं समाज सेवी श्री मस्तराम कपूर ने अपने वक्तव्य में कहा पिछड़े वर्ग की समस्या पर चर्चा करने से पूर्व पिछड़ा वर्ग को परिभाषित करना आवश्यक है। जातीय आधार पर जनगणना कराने से इनकी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो सकता है, लेकिन नेहरू ने इसे होने नहीं दिया। विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ आलोचक श्री मैनेजर पाण्डेय ने अपने वक्तव्य में कहा जातिवाद देश के अतीत से भी जुड़ा है और देश के भविष्य से भी। उन्होंने लेखक से तथा उपस्थित सभी साहित्यकारों से आह्न किया कि जाति-व्यवस्था का केवल विश्लेषण न कर वे जाति व्यवस्था के विरोध में हुए आंदोलनों का जिक्र करते हुए, जाति-व्यवस्था के विरोध में लिखें। पुस्तक के लेखक संजीव खुदशाह ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि ऐसा नहीं कि पिछड़े वर्ग के पास फिलोस्फर नहीं थे। फुले एवं पेरियार पिछड़ी जाति के लेखक थे लेकिन पिछड़ों ने उन्हें न मानकर दलितों ने माना। कार्यक्रम का संचालन रमणिका फाउंडेशन के मीडिया प्रभारी श्री सुधीर सागर द्वारा किया गया।


प्रस्तुति : सुधीर सागर
मीडिया प्रभारी, रमणिका फाउंडेशन
ए-२२१, ग्राउंड फ्लोर, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली-२४
011-46577704,011-24333356