Showing posts with label Zameel Ahmad. Show all posts
Showing posts with label Zameel Ahmad. Show all posts

Friday, July 24, 2009

लखनऊ में फिर सजी अदबी महफि़ल


काव्यपाठ करते मु॰ अहसन, साथ में प्रो. साबिरा हबीब

लखनऊ की हिन्‍दी-ऊर्दू साहित्यिक परम्‍परा के रूप में एक और कड़ी के रूप में गुजिश्‍ता 19 जुलाई, 09 को सूर्योदय हाउसिंग सोसाइटी के कम्‍युनिटी हाल में एक बार फिर अलग-अलग पेशों से जुड़ें हुए शायरों और कवियों की एक महफि़ल सजाई गई। इसमें सेवा निवृत्‍त पुलिस महानिदेशक श्री महेश चन्‍द्र द्विवेदी, भारतीय वन सेवा के अधिकारी श्री मु. अहसन, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की प्रो. डा. साबिरा हबीब, बीरबल साहनी पुरावानस्‍पतिक संस्‍थान के वैज्ञानिक डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल, शायर श्री जमीन अहमद जमील, श्री मनीष शुक्‍ल, शायरा श्रीमती गजाला अनवर व वन विभाग में कार्यरत श्रीमती रेनू सिंह ने शिरकत की।

यह महफिल श्री मु. अहसन व श्री प्रदीप कपूर के प्रयासों से शुरू किए गए कार्यक्रम की अगली कड़ी थी। इन लोगों द्वारा विगत तीन वर्षों से लखनऊ स्थित ग़ैर पेशेवर कवियों व शायरों को अपनी अभिव्‍यक्ति के लिए एक अनौपचारिक मंच उपलब्‍ध कराया जा रहा है। इसमें हिन्‍दी, उर्दू व अंग्रेजी के कवियों को आमंत्रित करके उनकी रचनाओं से रूबरू होने का लुत्‍फ़ उठाया जाता है। इस महफिल की निज़ामत लखनऊ विश्‍वविद्यालय की प्रोफेसर डा. शाबिरा हबीब द्वारा की गई। महफिल में सूर्योदय सोसाइटी के निवासी श्री अंशुमालि टंडन, श्रीमती निशा चतुर्वेदी, श्री प्रदीप कपूर, श्री सुरेन्‍द्र राजपूत व लखनऊ के अन्‍य साहित्‍य प्रेमी गणमान्‍य नागरिक उपस्थित थे।

डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल
सबसे पहले श्री महेश चन्‍द्र द्विवेदी द्वारा अपनी कविता 'एक अदना सा रेलवे स्‍टेशन' का पाठ किया गया:-

''याद रखो अगर तुम एक ,
अबल, अदना से स्‍टेशन बने रहे,
तुम्‍हें प्रतिदिन, प्रतिपल,
शक्तिशाली रेल गाडि़या जगायेंगी.........''


श्रीमती रेनू सिंह ने अपनी भावनाओं को गीत के माध्‍यम से कुछ ऐसे व्‍यक्‍त किया-

''आंखों में सिमटी नदिया की हर बूंद भी झर जाती है,
मन रोता है जब अपनों से दूरी बढ़ जाती है''


डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल ने एक वैज्ञानिक दिमाग के संवेदनशील दिल में उपजी भावनाओं को कविता के माध्‍यम से सम्‍प्रेषित करते हुए सबको मोह लिया-

''जिसमें मिलन की ऊष्‍णता हो, और टीस दूरी की,
जीवन के उतराव और चढ़ाव के उच्‍छवास हों,
कविता यह सब है, और बहुत कुछ है..........''


श्रीमती गजाला अनवर ने अपनी बात को गज़ल के माध्‍यम से प्रस्‍तुत किया। गज़ल का मतला यूं है-

''अच्‍छा है कि चलता रहे ये रिश्‍ता कोई दिन और,
दे सकते हो बातों से दिलासा कोई दिन और''


महफिल में शिरकत कर रहे लखनऊ के प्रसिद्ध शायर श्री जमील अहमद जमील ने दो खूबसूरत गज़लें पेश करके सबको वाह-वाह कहने पर मजबूर कर दिया। गज़ल के चन्‍द अशआर पेश हैं-

''मेरी सदा पे जो घर से निकल के आयें हैं,
ये लोग मेरे ही सांचे में ढल के आएं हैं।''


'' मैं अपने दिल के टुकड़े जोड़कर फिर दिल बनाता हूं,
मैं तन्‍हा हूं तो अब तन्‍हाई को महफिल बनाता हूं।''


श्री मनीष शुक्‍ल ने कुछ इस अंदाज में अपने दिल की बात कही-

''सूरत नहीं मिली कभी सीरत नहीं मिली,
अपनी किसी भी शै से तबीयत नहीं मिली।''


महफिल का समापन श्री मु. अहसन के अशआर के साथ हुआ। वैसे तो श्री मु. अहसन अपनी खूबसूरत और बामाना नज़मों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार उन्‍होंने मुतफर्रिक अशआर से सबको लुत्‍फअंदोज़ कर दिया। चन्‍द अशआर यूं हैं-

''तुम जो मुझ से पूछो हो क्‍यों गर्क-ए-उदासी बैठा हूं मैं,
यूं समझों कुछ गिरती दीवारें हैं, थाम के बैठा हूं मैं।''

''वो फलक बोस इमारत है जहां,
मेरे गांव का पोखरा था वहां।''

''आसमां से आग बरसे या लपट उठ्ठे जमीं से,
उसको तो पत्‍थर तोड़कर ही शाम का चूल्‍हा जलाना है।''



काव्यपाठ करते महेश चन्‍द्र द्विवेदी

इसके बाद प्रो. साबिरा हबीब ने मक्सिम गोर्की की रूसी कविता का उर्दू में तरजुमा पेश करके सबको खयालों की एक अलग दुनिया में पहुंचा दिया और इसके साथ प्रो. साबिरा हबीब की खूबसूरत निजामत में चल रहा अदबी सफर अपने इख्‍तदाम तक पहुंचा। श्री मु. अहसन ने सूर्योदय सोसाइटी के श्री अंशुमा‍लि टंडन व उनके पिता का आभार व्‍यक्‍त करते हुए आगामी 09 अगस्‍त, 2009 को दुबारा इसी जगह मिलने की सूचना के साथ सभी को धन्‍यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की।

Friday, May 29, 2009

लखनऊ में लगा गैरपेशेवर कवियों का जमावड़ा


पीसी शर्मा

श्री मोहम्मद अहसन, वरिष्ठ अधिकारी, उत्तर प्रदेश वन विभाग एवं श्री प्रदीप कपूर, वरिष्ठ पत्रकार लगभग ढाई वर्षो से नियमित रूप से लगभग तीन माह के अंतराल में लखनऊ में काव्य गोष्ठी आयोजित करते आ रहे है। इन गोष्ठियों में मुख्यतः गैर पेशेवर कवि/शायर आमंत्रित किये जाते है, जो विभिन्न सेवाओं/व्यवसाय में रहते हुए कविता लिखने का शौक/हाबी के रूप में अपनाये हुए है, और वे मुशायरो/गोष्ठियों में भाग नही लेते है। एक-आध बार अपवाद स्वरूप पेशेवर कवि/शायरों की शिरकत हुई है किन्तु पूर्णतः अव्यवसायिक तौर तरीके से। भाग लेने वाले कवि अधिकतर सरकारी अधिकारी, टेक्नोक्रेटर्स, डाक्टर्स, विद्यार्थी या अन्य किसी व्यवसाय से जुडे हुए होते है। इन कवि गोष्ठयों में श्रोताओं का भी लगभग यही प्रोफाइल होता है। कविता में हिन्दी व ऊर्दू को प्राथमिकता दी जाती है किन्तु कभी-कभी अपवाद स्वरूप अंग्रेजी को भी स्वीकार कर लिया जाता है।

दिनांक 24-05-2009 को आयोजित कवि गोष्ठी इसी क्रम में दसवीं थी और सामुदायिक हाल, सूर्योदय कालोनी, राणा प्रताप मार्ग में आयोजित की गयी थी। इससे पूर्व इसी स्थान पर माह अक्टूबर-2008 व मार्च-2009 में भी आयोजित की गयी थी। अन्य स्थलों पर जहां इस प्रकार के आयोजन हो चुके है वे है अवध जिमखाना क्लब, आर्यन रेस्टोरेंट का बेसमेंट हाल, संगीत नाटक एकेडमी, यूनिवर्सल बुक डिपो इत्यादि।

इस प्रकार के आयोजन पूर्णतया सहभागिता के आधार पर आयोजित किये जाते है। इन्हें कम से कम खर्चीला तथा अधिक से अधिक अनौपचारिक रखने के साथ ही साथ गरिमाशील बनाये जाने का प्रयास किया जाता है। इन गोष्ठियों में अनेक संभ्रांत भद्रजनों के अतिरिक्त पूर्व मेयर, हाई कोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश, अवकाश प्राप्त व कार्यरत वरिष्ठ नौकरशाहो ने भी भाग लिया है। आयोजन की सूचना मुख्यतः ई-मेल, एस0एम0एस0 के माध्यम से दी जाती है तथा लिखित निमंत्रण कभी भी नही दिया जाता है। मीडिया से जुडे पत्रकार बंधु भी इन गोष्ठियों में कवि एवं रिपोर्टर के रूप में भाग ले चुके है। गोष्ठियों को अखबारों में प्रमुखता से स्थान प्राप्त हुआ है।

वर्तमान गोष्ठी के होस्ट सूर्योदय कालोनी का सम्मानित टंडन परिवार थे।

गोष्ठी का संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय की भाषाविद प्रो0 साबिरा हबीब द्वारा किया गया। गोष्ठी का आरम्भ करते हुए श्री प्रदीप कपूर ने गोष्ठी के उद्देश्यों से लोगों को परिचित कराया तथा लोगों से प्राप्त हुए सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।
कविता पाठ के क्रम को प्रारंभ करते हुए प्रो0 साबिरा हबीब ने मु0 अहसन को नज्में सुनाने की दावत दी। श्री अहसन ने श्री प्रदीप कपूर व अन्यों को धन्यवाद देते हुए आशा जताई कि भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन चलते रहेंगे। उन्होंने नज्म के स्थान पर अपनी हिन्दी की कुछ “प्रेम कविताएं“ सुनाने का अनुरोध किया। श्री अहसन द्वारा 4 “प्रेम कविताएं“ “उस वर्ष“, “जब कभी“, “कैसे प्रीत जुडे़“ तथा “क्या अन्तर“ सुनाई गयीं। कविताओं की भाषा व नई कल्पानाओं के कारण इन कविताओं का काफी सराहा गया। कविता “जब कभी“ निम्न प्रकार थी जो विशेष रूप से सराही गयी-

जब किसी आंगन में पल्लवित तुलसी दिखी,
जब किसी उपवन में धरा हरसिंगार के झरे पुष्पों से भर गई,
जब किसी रात के शांत आकाश से नक्षत्र टूट कर गिरता दिखा,
जब कभी थक कर वट वृक्ष की नीचे विश्राम करने को गयर,
न जाने क्यों बरबस तुम्हारी याद आ


इसके पश्चात सुश्री गजाला अनवर को ग़ज़लें पढ़ने की दावत दी गयी। सुश्री गजाला अनवर ने दो ग़ज़लें सुनाई तथा समिचित प्रंशसा पाई। उनकी निम्न पंक्तिया विशेष रूप से सराही गयी-

कैसा अंदर से है यह हुस्न का पैकर देखें।
चांदनी रात में हम चांद में जाकर देखें।।


तत्पश्चात श्री सोम ठाकुर, जो कि संयोगवंश अतिथि के रूप मे उपस्थित थे, द्वारा 25 शेरों की गजल तरून्नुम से पढ़ी गयी। निम्न शे'रों पर उन्हें विशेष सराहना प्राप्त हुई-

सारे कौल करार बदल के
लोग चल दिये आंख मल के
इतना खून बहा शहरों में
होश फाख्ता हैं जंगल के
छोटे-छोटे खेत न लहरे
कितने वादे थे बादल के


श्री सोम ठाकुर के पश्चात श्री आलोक शुक्ला जो कि पेशे से पत्रकार है को कविता पाठ करने का निमंत्रण दिया गया। श्री शुक्ला द्वारा वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य पर 2 कविताएं पढ़ी गयी। निम्न पंक्तियां विशेष उल्लेखनीय हैं-

बलई मिसिर का नन्हा बेटा सोच रहा था
बहुत से अनुत्तरितन प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था
ये कैसा धर्म है जो दुःख में तो नही जाएगा
लेकिन सुख के समय खोपड़ी पर चढ़ जाएगा


इन्हीं तेवरों में श्री विनीत वाल जो कि एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे कार्यरत है द्वारा अंग्रेजी की दो कविताओं के माध्यम से वर्तमान सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य का जायजा लिया गया।

इसी क्रम में श्री जमील अहमद जमील द्वारा 2 ग़ज़लों का पाठ किया गया। उल्लेखनीय पक्तियां निम्न प्रकार रही-

बना ही लूंगा उसे आईना कभी न कभी
कि रंग लाएगी मेरी वफा कभी न कभी


श्री साबिरा हबीब द्वारा इस क्रम को आगे बढाते हुए श्री पी0सी0शर्मा, अवकाश प्राप्त वरिष्ठ आई0ए0एस0 अधिकारी से अपनी रचनाये सुनाने का आग्रह किया गया। श्री शर्मा द्वारा अपने कविता संकलन से 2 कविताएं सुनाई गयी जिनको उनकी सवेदनशीलता के कारण काफी सराहा गया। निम्न पंक्तियां विशेष उल्लेखनीय है-

तुम्हारे पूर्वसंचित संस्कार, तुम्हारे संकल्प,
तुम्हारी निष्ठाएं, तुम्हारे विश्वास, तुम्हारी मान्यताएं,
तुम्हारी आस्थाएं, तुम्हारे सम्बन्ध, तुम्हारी प्रार्थनाएं,
तुम्हे यही तक ला सकती थी,
जहां जब कुछ ठहरा हुआ है
सभी मार्ग यहीं तक आते है


इसके पश्चात बारी आयी श्री देवकी नन्दन शांत, अवकाश प्राप्त अभियंता जिन्होंने तरन्नुम में 2 गजले सुनाई। निम्न पंक्तियों ने खूब ताली बजवाई-

यादो की इक हाट सी लगती है शाम से
बिकते है मेरे गम जहां गीतों के नाम से


दो युवा कवि श्री अनूप पाठक, छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा ध्रुव सिंह द्वारा संवेदनशीलता से भरी 2-2 कविताएं सुनाई गयी तथा विशेष रूप से सराही गयी-

मेरी इन प्यारी बहनों ने मेरी इन बूढ़ी माओं ने
मुझे तो जिंदा रखा है बुर्जगो की दुआओं ने।

( श्री अनूप पाठक)
हाल सभी को मालूम है कश्मीर के अत्याचारों का
बम फटता है हर रोज वहां जिन्दा इंसान ................
.
(श्री ध्रुव सिंह)

अंत में युवा शायर श्री मनीष शुक्ला (उत्तर प्रदेश वित्त एवं लेखा सेवाओं में अधिकारी) को ग़ज़लें सुनाने की दावत दी गयी। श्री शुक्ला ने 2 ग़ज़लें सुनाई और भूरि-भूरि प्रंशसा पायी। गजल का एक शे'र कई श्रोताओं के मस्तिष्क में चिपक गया-
रफ्ता रफ्ता रंग बिखरते जाते हैं
तस्वीरों के दाग उभरते जाते है।

समयाभाव के कारण कविता पाठ का दूसरा चक्र नहीं हो सका। प्रो0 साबिरा हबीब की वाकपटुता, हाजिर जवाबी तथा उच्च कोटि के शेर पाठन ने डेढ़ घन्टे से भी लम्बे कार्यक्रम की जीवन्तता बनाये रखी। अंत में श्री प्रदीप कपूर द्वारा कवियो व श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की औपचारिक घोषणा की गयी।
तत्पश्चात टंण्डन परिवार के आतिथ्य सत्कार के तहत सूक्ष्म जलपान ग्रहण किया गया।

श्रोता तथा कवियों की कुल संख्या लगभग 50 रही।

कुछ अन्य झलकियाँ-


मुहम्मद अहसन

आलोक शुक्ला

गज़ाला अनवर

सोम ठाकुर

देवकी नंदन शांत

जमेल अहमद

ध्रुव सिंह

मनीष शुक्ला

अनूप पाठक