Showing posts with label Lucknow. Show all posts
Showing posts with label Lucknow. Show all posts

Friday, October 1, 2010

मनोज भावुक को भोजपुरी के लिये प्रताप नारायण मिश्र स्मृति- युवा साहित्यकार सम्मान



1 अक्टूबर । लखनऊ
लखनऊ स्‍थित संस्‍था भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास ने भोजपुरी के लोकप्रिय कवि मनोज भावुक को भोजपुरी भाषा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति-युवा साहित्‍यकार सम्‍मान से नवाजा है। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्‍यकार को यह सम्‍मान मिला है।

लखनऊ, उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक ‘माधव सभागार' में आयोजित युवा साहित्‍यकार सम्‍मान समारोह के दौरान मनोज भावुक को ये सम्‍मान दिया गया। सेवानिवृत आई.ए.एस. विनोद शंकर चौबे, लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी जे.पी.सिंह और लखनऊ के महापौर डॉ. दिनेश शर्मा ने उन्‍हें सम्‍मान प्रदान किया।

इस समारोह में श्री मनोज भावुक को सम्‍मान स्‍वरूप पांच हजार रुपये, प्रशस्‍ति पत्र, प्रतीक चिन्‍ह, माँ सरस्‍वती की प्रतिमा, अंगवस्‍त्र एवं न्‍यास द्वारा प्रकाशित पुस्‍तकों का सेट भेंट किया गया।

भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास गत पंद्रह वर्षों से अखिल भारतीय स्‍तर पर भारतीय साहित्‍य के विविध विधाओं के सृजनात्‍मक एवं विचारात्‍मक रचना करने वाले सात युवा साहित्‍यकारों को पुरस्‍कृत व सम्‍मानित करता आ रहा है।

न्‍यास द्वारा आयोजित इस सोलहवें युवा-साहित्‍यकार सम्‍मान समारोह में वर्ष 2010 के लिए मनोज भावुक के अलावा जिन युवा साहित्‍यकारों को सम्‍मानित किया गया, वे हैं- काव्‍य के लिए अरविंद कुमार सोनकर, कथा साहित्‍य के लिए दिनेश कर्नाटक, बाल साहित्‍य के लिए सुश्री गीतिका सिंह, पत्रकारिता के लिए डॉ. मुकुल श्रीवास्‍तव और संस्‍कृत के लिए डॉ. धीरेन्‍द्र झा।

मनोज भावुक की रचनाओं के बारे में टिप्‍पणी करते हुए भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास के कार्यक्रम संयोजक डॉ. विजय कुमार कर्ण ने कहा ‘2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्‍मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश) में पले-बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी न्‍यूज चैनल ‘हमार टीवी' के क्रिएटिव हेड हैं और भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्‍यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्‍य और संस्‍कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्‍थाओं के संस्‍थापक, सलाहकार और सदस्‍य हैं। ‘‘तस्‍वीर जिंदगी के''(गजल-संग्रह) एवं ‘‘चलनी में पानी''(गीत-संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्‍तके हैं। ‘‘तस्‍वीर जिन्‍दगी के'' के लिए मनोज को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्‍मान से नवाजा जा चुका है। अभी हाल ही में मनोज भावुक को विश्‍व भोजपुरी सम्‍मेलन दिल्‍ली का अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया है। भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास मनोज भावुक को सम्‍मानित करते हुए गौरवान्‍वित है।'
सम्‍मान समारोह की अध्‍यक्षता करते हुये विनोद शंकर चौबे ने मनोज भावुक की रचनाओं की जम कर तारीफ की और कहा कि मनोज ने रघुबीर नारायण के बटोहिया गीत की याद ताजा कर दी।

इस मौके पर युवा कवि मनोज भावुक ने भोजपुरी में गजल पाठकर पूरा माहौल भोजपुरीमय कर दिया और कहा, ‘यह सम्‍मान किसी एक व्‍यक्ति का नही है बल्‍कि भोजपुरी भाषा एवं साहित्‍य और देश-विदेश में फैले करोड़ों भोजपुरी भाषियों एवं भोजपुरी प्रेमियों का सम्‍मान है।'

अन्य झलकियाँ-





Saturday, August 28, 2010

लखनऊ में ब्लॉग वर्कशॉप और जीवंत ब्लॉगिंग

मैं हिन्दी ब्लॉगिंग के गुर सिखाने-समझाने के लिए बहुत सी सेमिनारों और कार्यशालाओं में सम्मिलित हो चुका हूँ। लेकिन यह वर्कशॉप कई मामलों में खास है। पहली बात तो यह मेरे गृहप्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित हो रही है और दूसरी यह कि एक तरफ रवि रतलामी जी अपना प्रीजेंटेशन दे रहे हैं और मैं मंच से ही बैठे-बैठे इसकी रिपोर्टिंग कर रहा हूँ। यह बहुत ही खुशी की बात है कि इस माध्यम से मैं खुद भी जीवंत ब्लॉगिंग का माध्यम बन रहा हूँ और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कर पा रहा हूँ। यह सब इस कार्यक्रम के संयोजक अरविन्द मिश्र और ज़ाकिर अली 'रजनीश' के प्रयासों से हो पाया है, जिन्होंने यहाँ बीएसएनएल का वाई-फाई कनैक्शन उपलब्ध कराया है।

मेरा व्याख्यान और प्रजेंटेशन तो दोपहर के भोजन के बाद है। फिलहान रवि रतलामी जी उपस्थिति प्रशिक्षुओं को बता रहे हैं कि 'वर्डप्रेस पर ब्लॉग कैसे बनाया जा सकता है?"। आप भी देखिए कुछ चित्रों के माध्यम से आँखों देखा हाल-








शैलेश भारतवासी

Friday, April 2, 2010

अंग्रेजी परस्त हैं सरकार की नीतियाँ: इलना



डीएवीपी और आरएनआई समाचारपत्र और पत्रिकाओं के अस्तित्व में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जब डीएवीपी और आरएनआई जैसे संगठन सही तरह से अपना काम नहीं करते हैं, तो पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का कार्य प्रभावित होता है. जिस से प्रकाशकों के सामने बहुत सारी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं. इस की सब से बड़ी वजह प्रकाशकों का एकसाथ बैठ कर इन समस्याओं पर गंभीरता से विचार न करना होता है. इसी का परिणाम है कि केंद्रीय मंत्रालय, डीएवीपी, आरएनआई और दूसरे विभाग भी भाषाई समाचारपत्रों की घोर उपेक्षा करते हैं. केंद्र ही नहीं, राज्य सरकारों का भी यही हाल रहता है. समाचारपत्रों के प्रकाशकों को इधर से उधर भटकना पड़ता है.
भारतीय भाषाई समाचारपत्र संगठन (इलना) ने देशभर में प्रकाशकों को एकसाथ बैठा कर इन समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना शुरू किया है. इस कड़ी में नागपुर और आगरा के बाद 01 अप्रैल, 2010 को एक मीटिंग का आयोजन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के राज्य सूचना केंद्र, हजरतगंज में किया गया. इस में देश के अलगअलग हिस्सों से आकर 30 से अधिक प्रकाशकों ने भाग लिया.
इलना के राष्ट्रीय अध्यक्ष परेश नाथ की अगुआई में संपन्न हुई इस मीटिंग में डीएवीपी की एंपैनल प्रक्रिया में संशोधनों की आवश्यकता, डीएवीपी द्वारा गठित रेट स्ट्रक्चर कमेटी, विज्ञापन बिलों की प्रक्रिया और भुगतान, डीएवीपी और अन्य सरकारी विभागों के द्वारा विज्ञापनों का असामान्य वितरण, आरएनआई की भूमिका और पीआरबी एक्ट में बदलाव की कोशिशों पर विस्तार से चर्चा हुई.
इलना सदस्यों ने माना कि सरकार और डीएवीपी की विज्ञापन नीतियां अंगरेजी अखबारों को फायदा पहुंचाने वाली हैं. इलना सदस्यों ने किसी को विज्ञापन देने का विरोध नहीं किया, बल्कि उन का यह कहना था कि जनगणना, बालिका शिक्षा, पोलियो जैसे विज्ञापन उन भाषाई अखबारों को भी दिए जाएं, जो विज्ञापन के लिए पंजीकृत हैं. पेड न्यूज मसले पर सदस्यों की राय यह थी कि यह मसला एडीटर और रीडर के बीच छोड़ दिया जाना चाहिए.
भाषाई अखबारों के प्रकाशकों ने तय किया कि वह स्थानीय नेताओं और अफसरों पर दबाव बना कर विज्ञापन की सरकारी नीतियों में बदलाव करने के लिए मजूबर करें.
मीटिंग में इलना के महासचिव रवि कुमार विश्नोई सहित कार्यकारिणी के सदस्य दैनिक नारदवाणी से राजीव वशिष्ठ, मेरठ भूमि से गिरीश कुमार अग्रवाल, बच्चों के संग से विपिन मोहन शर्मा, दैनिक राजपथ से अशोक नवरत्न, संजय कुमार और सदभाव मिलन, देहरादून से जय प्रकाश पांडेय शामिल थे. इस के अलावा पूरे प्रदेश से आए प्रकाशकों, संपादकों में नामांतर से डाक्टर मनसा पांडेय, ऊर्जा टाइम्स से एसके शुक्ला, मधुर सौगात से शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी, इंडिया इनसाइड से अरुण सिंह, सिनैरियो से राजीव कुमार सिंह, इंडियन हेराल्ड से वीके पांडेय, रोजाआना से मो. हफीजउल्ला खान, सफीर टाइम्स से कफील खां, नवसंवाद से एके श्रीवास्तव, कीर्ति प्रकाश से देवेंद्र कुमार शर्मा, फिल्मको फोटो न्यूज से केसी विश्नोई, खरी कसौटी के सरोज चंद्रा, ऊर्जा टाइम्स से शंकर त्रिपाठी, अमर प्रकाश से रतन वाष्णेय, स्वतंत्र चेतना से उमेश मिश्रा, शहीदी दुनिया से डीके शर्मा, नामांतर से नमिता श्रीवास्तव, राम सिंह तोमर, मोहम्मद अतहर सलीम, शहूर अहमद, अब्दुल अतीक और शिव सिंह प्रमुख थे.

Sunday, December 13, 2009

व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं- के.पी. सक्सेना

हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

लखनऊ, 30 नवम्बर।
हिन्दी व्यंग्य साहित्यिक आलोचना की परिधि से बाहर है? इस विषय पर आज उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और माध्यम साहित्यिक संस्थान की ओर से अट्टहास समारोह के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय विचार गोष्ठी में यह निष्कर्ष निकला कि व्यंग्यकारों को आलोचना की चिन्ता न करते हुये विसंगतियों के विरूद्ध हस्तक्षेप की चिन्ता करनी चाहिये, क्योंकि वैसे भी अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं।

राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना की चर्चा से शुरू हुयी। श्री सक्सेना का कहना था कि हिन्दी आलोचना को अब व्यंग्य विधा को गंभीरता पूर्वक लेना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा कि अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं है। व्यंग्य लेखन अपने उस मुकाम पर पहुंच गया है जिसमें राजनीति, समाज एवं शिक्षा जैसे सभी पहलुओं को अपने दायरे में ले लिया है अब वह किसी आलोचना का मोहताज नहीं है।

यह गोष्ठी राय उमानाथ बली प्रेक्षागार के जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित की गयी थी जिसमें देश गिरीश पंकज, अरविन्द तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र, सुश्री विद्याबिन्दु सिंह, डा0 महेन्द्र ठाकुर, वाहिद अली वाहिद, अरविन्द झा, सौरभ भारद्वाज, आदित्य चतुर्वेदी, पंकज प्रसून, श्रीमती इन्द्रजीत कौर नरेश सक्सेना, महेश चन्द्र द्विवेदी, एवं अन्य प्रमुख लेखकों ने अपने विचार प्रकट किये। गोष्ठी का समापन माध्यम के महामंत्री श्री अनूप श्रीवास्तव के धन्यवाद प्रकाश से हुआ। इससे पूर्व संस्था के उपाध्यक्ष श्री आलोक शुक्ल ने आशा प्रकट की कि प्रस्तुत संगोष्ठी के माध्यम से व्यंग्य लेखन को उसका आपेक्षित सम्मान मिल सकेगा।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष और सुविख्यात व्यंग्यकार श्री गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि व्यंग्यकार लेखन करते रहें एक न एक दिन आलोचना उनकी ओर आकर्षित होगी। उन्होंने नये व्यंग्यकारों से आग्रह किया कि वे समाज की बेहतरी के लिये लिखते रहें और आलोचना की परवाह न करें।

अट्टहास शिखर सम्मान से कल नवाजे गये डा0 शेरजंग गर्ग का कहना था कि आज जितने भी व्यंग्यकार स्थापित हैं वे अपनी गंभीर लेखनी के कारण ही प्रतिष्ठित हैं। आलोचकों की कृपा पर नहीं हैं। कवि आलोचक नरेश सक्सेना ने नागार्जुन की व्यंग्य का जिक्र करते हुये व्यंग्य की शक्ति प्रतिपादित की।

हिन्दी संस्थान के निदेशक डा0 सुधाकर अदीब का कहना था अगर व्यंग्य लेखन में गुणवत्ता का ध्यान रखा जाय तो हमें आलोचना से घबराना नहीं चाहिये। श्री महेश चन्द्र द्विवेदी का कहना था कि हास्य और व्यंग्य अलग-अलग हैं इनको परिभाषित करने की आवश्यकता है। श्री सुभाष चन्दर जिन्होंने व्यंग्य का इतिहास लिखा है का कहना था कि व्यंग्य लेखन को दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता रहा है लेकिन हिन्दी के संस्थापक सम्पादक स्व0 बाल मुकुन्द गुप्त ने लिखा है कि मैंने व्यंग्य के माध्यम से लोहे के दस्ताने पहनकर अंग्रेज नाम के अजगर के मुंह में हाथ डालने का प्रयास किया था। आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यंग्य के सौन्दर्य शास्त्र को समझें और आलोचना की समग्र पक्षों के अनुरूप व्यंग्य लेखन का विकास हो। हरिशंकर परसाई पुरस्कार से विभूषित सुश्री अलका पाठक ने कहा- व्यंग्य की आलोचना अनुचित है हम असंभव लेखन को भी संभव करके अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। श्री अरविन्द तिवारी का कहना था कि व्यंग्य के माध्यम से हम आम जनता का ध्यान तमाम विषयों पर दिला पाते हैं। श्री बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा- व्यंग्य कोई नयी विधा नहीं है विदूषकों की परम्परा रही है। व्यंग्य को निंदारस मानना गलत होगा। वास्तव में यथार्थ की विदू्रपता पर आक्रोश व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। श्री गोपाल मिश्र का कहना था कि अच्छा व्यंग्य छोटा साहित्य होता है अतः इसे परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है।

डा॰ महेन्द्र कुमार ठाकुर का कहना था कि हम व्यंग्यकार हैं और हमें अपने साहित्यिक शिल्प को मजबूत करने की आवश्यकता है। श्री वाहिद अली वाहिद का कहना था कि व्यंग्य हमारी परम्परा में रहा है और नई पीढ़ी को इसे आगे बढ़ाना चाहिये। श्री रामेन्द्र त्रिपाठी का कहना था कि व्यंग्यकार मूलतः आलोचक ही है इसकी लोकप्रियता ही इसकी सफलता का मापदण्ड बनता है। श्री आदित्य चतुर्वेदी के विचार मे समाज के सुधार में व्यंग्य की प्रमुख भूमिका है। श्री भोलानाथ अधीर के विचार में लेखक का दायित्व है कि वह समाज की कमियों को उजागर करे और उन पर प्रहार करे इसके लिये व्यंग्य एक सशक्त माध्यम है।

अनूप श्रीवास्तव,लखनऊ
9335276946

Wednesday, October 7, 2009

गोविंदाचार्य ने किया 'क्रांतिकारी' का विमोचन



किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पत्रकार रोशन प्रेमयोगी के उपन्यास 'क्रांतिकारी' का विमोचन पिछले दिनों लखनऊ में आयोजित नेशनल बुक फेयर में विचारक के.एन. गोविंदाचार्य ने किया। वरिष्ठ कहानीकार और 'हंस' पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजीव समारोह के मुख्य अतिथि थे। दलित साहित्यकार रूपनारायण सोनकर मुख्य वक्ता थे। गोविंदाचार्य ने कहा कि 'क्रांतिकारी' को पढ़ते हुए लगा कि आजाद भारत में जिस क्रांति की जरूरत है, उस ओर यह उपन्यास इंगित करता है।

इसके पात्र चंद्रशेखर, रमाकरण और केवलानंद मुझे अपने जैसे लगे। संजीव ने कहा कि क्रांति नए विचारों को उजागर करता है। आजादी के बाद क्रांति की जो अवधारणा ट्यूब में बंद थी, उसे यह उपन्यास सामने लाता है। रुपनाराण सोनकर ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन के बाद कोई ऐसा सवर्ण लेखक सामने आया है जो दलितों पर दलितों की कसौटी पर लिख रहा है। उल्लेखनीय है कि 'क्रांतिकारी' तीन दोस्तों की कहानी है जो इलाहाबाद में पढ़ने के बाद अपने गांव में काम करने की सोचते हैं।

Wednesday, August 26, 2009

फिर महफ़िल सजी फिर दीवानों का मज'मा लगा.......

गुजिश्‍ता की अगस्त 2009 माह की गोष्ठी की रिपोर्ट


लेकिन इस बार महफ़िल का रंग दूसरा था, बावजूद इस के कि जगह वही थी, लखनऊ में सूर्योदय कालोनी का सामुदायिक हाल, होस्ट वही थे यानी टंडन परिवार, आयोजक वही थे प्रदीप भाई और मुहम्मद अहसन लेकिन इस बार कवियों और श्रोताओं की संख्या में होड़ थी कि कौन अधिक हैं, और दोनों ही काफी त'अदाद में थे यानी कि हाल खचा-खच भरा हुआ था, और मेहमान कवियों के क्या कहने ... हिन्द-युग्म से जुड़े स्वप्निल कुमार आतिश और सिद्धार्थ नगर के युवा कवि और इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्र अनूप पांडे। अनूप पहले भी इस महफ़िल में काव्य पाठ कर के अपने झंडे गाड़ चुके हैं। गाव और मिट्टी और रिश्तों सी जुडी कवितायें कहते हैं, काफी जोश में हाथ हिला-हिला कर पढ़ते हैं।
महफ़िल की शुरूआत प्रदीप भाई की इब्तिदाई तक़रीर से हुई। लेकिन इस बार अहसन साहब ने मंच पर बैठने से साफ़ इनकार कर दिया। चालाक आदमी हैं, मंच पर बैठने से जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, बोले आम श्रोता की भांति नीचे बैठूंगा, सो मंच पर साबिरा जी के साथ बैठे टंडन जी। साबिरा जी ने इस बार रूसी में कविता न सुना कर एक ताज़ी ग़ज़ल सुनाई और तालियाँ बटोरी। इस बार अंग्रेजी में पता नहीं क्यूँ विनीतवाल साहब ने कविता नहीं सुनाई लेकिन हिंदी / उर्दू श्रोता निराश नहीं हुए, उन को अंग्रेजी में कविता सुनाई जावेद नकवी ( शनने भाई ) ने, एक नहीं दो, सोने में सुहागा ३५ साल पुरानी।

स्वप्निल का पहला मुशाएरा का तजुर्बा था और वह मंच पर डरा-डरा पहुँचा लेकिन एक रूमानी नज़्म सुनाने के बाद निडर हो गया और झोंक में एक और सुना डाली। चलते वक़्त उस की आंखें कह रही थीं फिर कब बुलाओगे।
जमील साहब ने एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह अपने पूरे बाडी लंगुएज के साथ दो गजलें सुनाईं और मुशाएरा करीब करीब लूट लिया था कि उन को इस काम से रोका गया कि यह काम तो आखिर में मनीष शुक्ला को करना है।

हमज़ुबां कोई नहीं तो आइना कोई तो हो
गुफ्तुगू किस से करूं दूसरा कोई तो हो
- जमील साहब



वंदना दीक्षित जी लखनऊ विश्व विद्यालय की भाषा विभाग में हैं, वह और उनके पति रमेश दीक्षित जो राजनीति पढ़ाते हैं, अक्सर ही हमारी महफिलों के हिट युगल रहते हैं। रमेश जी इस बार किसी कारण नहीं आ सके तो वंदना जी को अकेले ही अपनी दो संवेदनशील कविताओं के साथ हिट होना पड़ा।

यूं तो गजाला अनवर ने भी महफ़िल लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी अपनी गज़लों के साथ लेकिन आलोक श्रीवास्तव और राजीव राय के साथ गज़लों के म'आमले में सख्त मुकाबला होने के कारण निर्णय बड़ा मुश्किल था कि जनता किस के साथ है। आलोक और राजीव के महफ़िल में पहली बार शरीक होने से जनता का सहानुभूति वोट उन को अधिक मिलता दिखा।

देवकी नंदा 'शांत' जी ने डिप्लोमेसी से काम लेते हुए अपनी चिर परिचित शैली में गज़लें सुनाकर और गाकर प्रसिद्धि के शिखर को छूने का पूरा प्रयास किया लेकिन साबिरा जी ने ठान ली थी कि सब से आखीर में मनीष को ही बुला कर मनीष को हिट करवाना है। उन्होंने भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एम॰ सी॰ द्विवेदी के साथ भी कोई रियायत नहीं की जिन्होंने 'स्लम' पर एक अति संवेदनशील कविता सुना कर वाह-वाही बटोरी। उन का मुकाबला था बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ़ पलेओ बोटनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नौटियाल से जो पहले भी इस महफ़िल में शरीक हुए थे।

ज़िक्र तो अभी कईयों का बाक़ी है लेकिन हाए रे टाइपिंग की दिक्क़त.. चलिए उन का ज़िक्र फिर कभी ...

अहसन साहब आयोजक होने के बाद भी सब से अंत में सुनाने के गर्व से वंचित रहे हालांकि उन्होंने इस गम को बहुत बहादुरी से सहा और मुस्कुराते रहे। दरअसल यह स्थान पहले से ही मनीष शुक्ल के नाम आरक्षित था।

अहसन साहब ने एक छोटी नज़्म 'बस यूं ही खड़ी रहो' सुनाने का आग्रह किया .

नज़र से रहमतें बिछाए बस यूं ही खड़ी रहो
काइनात ब सर उठाए बस यूं ही खड़ी रहो
पलक पे तुम्हारी वक़्त है ठहर गया
ज़ुल्फ़ पे तुम्हारी धूप है उतर गयी
खामोशियों के सिलसिले बनाए बस यूं ही खड़ी रहो
वो बात जो अभी कही नहीं
वो नज़्म जो अभी लिखी नहीं
उन्ही की ख़ातिर ए वजूद बस यूं ही खड़ी रहो
बस यूं ही खड़ी रहो

इस के बाद उन्होंने कुछ फुटकर शे'र सुनाए। दरअसल फुटकर शे'र सुनाना धीरे-धीरे उनकी आदत बनती जा रही है। वह भी क्या करें, ग़ज़ल कहनी उन्हें आती नहीं है तो इसी से काम चलाते है

तनहा फिरा हूँ उम्र भर इक दर्द की पोटली लिए
हैराँ हूँ किस दर पे रक्खूं, किस घाट पे बहाऊं

नदी ने धो दिए शहर के पाप सब
अब वह खुद जाए कहाँ मैला आँचल लिए !

कल इक परिंदा मर गया, इक निशानी मिट गयी
किताब ए कुदरत में लिखी इक कहानी मिट गयी

लेकिन इस महफ़िल ने मनीष शुक्ला की गज़लों के बिना ख़तम होने से इनकार कर दिया। मुझे याद नहीं मनीष ने कितनी गजलें सुनाई लेकिन महफ़िल उन्हीं के नाम गयी। उन का एक शे'र याद आ रहा है

कभी आंसू कभी मोती कभी शबनम समझती है
मता ए जिंदगी है जिस को दुनिया गम समझती है

महफ़िल चाय के साथ ख़तम हुई और उस के 15 दिनों बाद तक अहसन और मनीष शुक्ला में होड़ लगी रही कि कैसे रिपोर्ट लिखने से बचा जाए और कौन सालिड बहाना मार सकता है लेकिन आखिर अहसन साहब ही फंसे, और रिपोर्ट हाज़िर है। शैलेश भारतवासी जी इतनी जल्दी कहाँ छोड़ देते। लगातार शर्म दिलाते रहे और रिपोर्ट लिखवा कर माने।

Friday, July 24, 2009

लखनऊ में फिर सजी अदबी महफि़ल


काव्यपाठ करते मु॰ अहसन, साथ में प्रो. साबिरा हबीब

लखनऊ की हिन्‍दी-ऊर्दू साहित्यिक परम्‍परा के रूप में एक और कड़ी के रूप में गुजिश्‍ता 19 जुलाई, 09 को सूर्योदय हाउसिंग सोसाइटी के कम्‍युनिटी हाल में एक बार फिर अलग-अलग पेशों से जुड़ें हुए शायरों और कवियों की एक महफि़ल सजाई गई। इसमें सेवा निवृत्‍त पुलिस महानिदेशक श्री महेश चन्‍द्र द्विवेदी, भारतीय वन सेवा के अधिकारी श्री मु. अहसन, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की प्रो. डा. साबिरा हबीब, बीरबल साहनी पुरावानस्‍पतिक संस्‍थान के वैज्ञानिक डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल, शायर श्री जमीन अहमद जमील, श्री मनीष शुक्‍ल, शायरा श्रीमती गजाला अनवर व वन विभाग में कार्यरत श्रीमती रेनू सिंह ने शिरकत की।

यह महफिल श्री मु. अहसन व श्री प्रदीप कपूर के प्रयासों से शुरू किए गए कार्यक्रम की अगली कड़ी थी। इन लोगों द्वारा विगत तीन वर्षों से लखनऊ स्थित ग़ैर पेशेवर कवियों व शायरों को अपनी अभिव्‍यक्ति के लिए एक अनौपचारिक मंच उपलब्‍ध कराया जा रहा है। इसमें हिन्‍दी, उर्दू व अंग्रेजी के कवियों को आमंत्रित करके उनकी रचनाओं से रूबरू होने का लुत्‍फ़ उठाया जाता है। इस महफिल की निज़ामत लखनऊ विश्‍वविद्यालय की प्रोफेसर डा. शाबिरा हबीब द्वारा की गई। महफिल में सूर्योदय सोसाइटी के निवासी श्री अंशुमालि टंडन, श्रीमती निशा चतुर्वेदी, श्री प्रदीप कपूर, श्री सुरेन्‍द्र राजपूत व लखनऊ के अन्‍य साहित्‍य प्रेमी गणमान्‍य नागरिक उपस्थित थे।

डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल
सबसे पहले श्री महेश चन्‍द्र द्विवेदी द्वारा अपनी कविता 'एक अदना सा रेलवे स्‍टेशन' का पाठ किया गया:-

''याद रखो अगर तुम एक ,
अबल, अदना से स्‍टेशन बने रहे,
तुम्‍हें प्रतिदिन, प्रतिपल,
शक्तिशाली रेल गाडि़या जगायेंगी.........''


श्रीमती रेनू सिंह ने अपनी भावनाओं को गीत के माध्‍यम से कुछ ऐसे व्‍यक्‍त किया-

''आंखों में सिमटी नदिया की हर बूंद भी झर जाती है,
मन रोता है जब अपनों से दूरी बढ़ जाती है''


डा. चन्‍द्र मोहन नौटियाल ने एक वैज्ञानिक दिमाग के संवेदनशील दिल में उपजी भावनाओं को कविता के माध्‍यम से सम्‍प्रेषित करते हुए सबको मोह लिया-

''जिसमें मिलन की ऊष्‍णता हो, और टीस दूरी की,
जीवन के उतराव और चढ़ाव के उच्‍छवास हों,
कविता यह सब है, और बहुत कुछ है..........''


श्रीमती गजाला अनवर ने अपनी बात को गज़ल के माध्‍यम से प्रस्‍तुत किया। गज़ल का मतला यूं है-

''अच्‍छा है कि चलता रहे ये रिश्‍ता कोई दिन और,
दे सकते हो बातों से दिलासा कोई दिन और''


महफिल में शिरकत कर रहे लखनऊ के प्रसिद्ध शायर श्री जमील अहमद जमील ने दो खूबसूरत गज़लें पेश करके सबको वाह-वाह कहने पर मजबूर कर दिया। गज़ल के चन्‍द अशआर पेश हैं-

''मेरी सदा पे जो घर से निकल के आयें हैं,
ये लोग मेरे ही सांचे में ढल के आएं हैं।''


'' मैं अपने दिल के टुकड़े जोड़कर फिर दिल बनाता हूं,
मैं तन्‍हा हूं तो अब तन्‍हाई को महफिल बनाता हूं।''


श्री मनीष शुक्‍ल ने कुछ इस अंदाज में अपने दिल की बात कही-

''सूरत नहीं मिली कभी सीरत नहीं मिली,
अपनी किसी भी शै से तबीयत नहीं मिली।''


महफिल का समापन श्री मु. अहसन के अशआर के साथ हुआ। वैसे तो श्री मु. अहसन अपनी खूबसूरत और बामाना नज़मों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस बार उन्‍होंने मुतफर्रिक अशआर से सबको लुत्‍फअंदोज़ कर दिया। चन्‍द अशआर यूं हैं-

''तुम जो मुझ से पूछो हो क्‍यों गर्क-ए-उदासी बैठा हूं मैं,
यूं समझों कुछ गिरती दीवारें हैं, थाम के बैठा हूं मैं।''

''वो फलक बोस इमारत है जहां,
मेरे गांव का पोखरा था वहां।''

''आसमां से आग बरसे या लपट उठ्ठे जमीं से,
उसको तो पत्‍थर तोड़कर ही शाम का चूल्‍हा जलाना है।''



काव्यपाठ करते महेश चन्‍द्र द्विवेदी

इसके बाद प्रो. साबिरा हबीब ने मक्सिम गोर्की की रूसी कविता का उर्दू में तरजुमा पेश करके सबको खयालों की एक अलग दुनिया में पहुंचा दिया और इसके साथ प्रो. साबिरा हबीब की खूबसूरत निजामत में चल रहा अदबी सफर अपने इख्‍तदाम तक पहुंचा। श्री मु. अहसन ने सूर्योदय सोसाइटी के श्री अंशुमा‍लि टंडन व उनके पिता का आभार व्‍यक्‍त करते हुए आगामी 09 अगस्‍त, 2009 को दुबारा इसी जगह मिलने की सूचना के साथ सभी को धन्‍यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की।

Friday, May 29, 2009

लखनऊ में लगा गैरपेशेवर कवियों का जमावड़ा


पीसी शर्मा

श्री मोहम्मद अहसन, वरिष्ठ अधिकारी, उत्तर प्रदेश वन विभाग एवं श्री प्रदीप कपूर, वरिष्ठ पत्रकार लगभग ढाई वर्षो से नियमित रूप से लगभग तीन माह के अंतराल में लखनऊ में काव्य गोष्ठी आयोजित करते आ रहे है। इन गोष्ठियों में मुख्यतः गैर पेशेवर कवि/शायर आमंत्रित किये जाते है, जो विभिन्न सेवाओं/व्यवसाय में रहते हुए कविता लिखने का शौक/हाबी के रूप में अपनाये हुए है, और वे मुशायरो/गोष्ठियों में भाग नही लेते है। एक-आध बार अपवाद स्वरूप पेशेवर कवि/शायरों की शिरकत हुई है किन्तु पूर्णतः अव्यवसायिक तौर तरीके से। भाग लेने वाले कवि अधिकतर सरकारी अधिकारी, टेक्नोक्रेटर्स, डाक्टर्स, विद्यार्थी या अन्य किसी व्यवसाय से जुडे हुए होते है। इन कवि गोष्ठयों में श्रोताओं का भी लगभग यही प्रोफाइल होता है। कविता में हिन्दी व ऊर्दू को प्राथमिकता दी जाती है किन्तु कभी-कभी अपवाद स्वरूप अंग्रेजी को भी स्वीकार कर लिया जाता है।

दिनांक 24-05-2009 को आयोजित कवि गोष्ठी इसी क्रम में दसवीं थी और सामुदायिक हाल, सूर्योदय कालोनी, राणा प्रताप मार्ग में आयोजित की गयी थी। इससे पूर्व इसी स्थान पर माह अक्टूबर-2008 व मार्च-2009 में भी आयोजित की गयी थी। अन्य स्थलों पर जहां इस प्रकार के आयोजन हो चुके है वे है अवध जिमखाना क्लब, आर्यन रेस्टोरेंट का बेसमेंट हाल, संगीत नाटक एकेडमी, यूनिवर्सल बुक डिपो इत्यादि।

इस प्रकार के आयोजन पूर्णतया सहभागिता के आधार पर आयोजित किये जाते है। इन्हें कम से कम खर्चीला तथा अधिक से अधिक अनौपचारिक रखने के साथ ही साथ गरिमाशील बनाये जाने का प्रयास किया जाता है। इन गोष्ठियों में अनेक संभ्रांत भद्रजनों के अतिरिक्त पूर्व मेयर, हाई कोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश, अवकाश प्राप्त व कार्यरत वरिष्ठ नौकरशाहो ने भी भाग लिया है। आयोजन की सूचना मुख्यतः ई-मेल, एस0एम0एस0 के माध्यम से दी जाती है तथा लिखित निमंत्रण कभी भी नही दिया जाता है। मीडिया से जुडे पत्रकार बंधु भी इन गोष्ठियों में कवि एवं रिपोर्टर के रूप में भाग ले चुके है। गोष्ठियों को अखबारों में प्रमुखता से स्थान प्राप्त हुआ है।

वर्तमान गोष्ठी के होस्ट सूर्योदय कालोनी का सम्मानित टंडन परिवार थे।

गोष्ठी का संचालन लखनऊ विश्वविद्यालय की भाषाविद प्रो0 साबिरा हबीब द्वारा किया गया। गोष्ठी का आरम्भ करते हुए श्री प्रदीप कपूर ने गोष्ठी के उद्देश्यों से लोगों को परिचित कराया तथा लोगों से प्राप्त हुए सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।
कविता पाठ के क्रम को प्रारंभ करते हुए प्रो0 साबिरा हबीब ने मु0 अहसन को नज्में सुनाने की दावत दी। श्री अहसन ने श्री प्रदीप कपूर व अन्यों को धन्यवाद देते हुए आशा जताई कि भविष्य में भी इस प्रकार के आयोजन चलते रहेंगे। उन्होंने नज्म के स्थान पर अपनी हिन्दी की कुछ “प्रेम कविताएं“ सुनाने का अनुरोध किया। श्री अहसन द्वारा 4 “प्रेम कविताएं“ “उस वर्ष“, “जब कभी“, “कैसे प्रीत जुडे़“ तथा “क्या अन्तर“ सुनाई गयीं। कविताओं की भाषा व नई कल्पानाओं के कारण इन कविताओं का काफी सराहा गया। कविता “जब कभी“ निम्न प्रकार थी जो विशेष रूप से सराही गयी-

जब किसी आंगन में पल्लवित तुलसी दिखी,
जब किसी उपवन में धरा हरसिंगार के झरे पुष्पों से भर गई,
जब किसी रात के शांत आकाश से नक्षत्र टूट कर गिरता दिखा,
जब कभी थक कर वट वृक्ष की नीचे विश्राम करने को गयर,
न जाने क्यों बरबस तुम्हारी याद आ
ई

इसके पश्चात सुश्री गजाला अनवर को ग़ज़लें पढ़ने की दावत दी गयी। सुश्री गजाला अनवर ने दो ग़ज़लें सुनाई तथा समिचित प्रंशसा पाई। उनकी निम्न पंक्तिया विशेष रूप से सराही गयी-

कैसा अंदर से है यह हुस्न का पैकर देखें।
चांदनी रात में हम चांद में जाकर देखें।।


तत्पश्चात श्री सोम ठाकुर, जो कि संयोगवंश अतिथि के रूप मे उपस्थित थे, द्वारा 25 शेरों की गजल तरून्नुम से पढ़ी गयी। निम्न शे'रों पर उन्हें विशेष सराहना प्राप्त हुई-

सारे कौल करार बदल के
लोग चल दिये आंख मल के
इतना खून बहा शहरों में
होश फाख्ता हैं जंगल के
छोटे-छोटे खेत न लहरे
कितने वादे थे बादल के


श्री सोम ठाकुर के पश्चात श्री आलोक शुक्ला जो कि पेशे से पत्रकार है को कविता पाठ करने का निमंत्रण दिया गया। श्री शुक्ला द्वारा वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक परिदृश्य पर 2 कविताएं पढ़ी गयी। निम्न पंक्तियां विशेष उल्लेखनीय हैं-

बलई मिसिर का नन्हा बेटा सोच रहा था
बहुत से अनुत्तरितन प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था
ये कैसा धर्म है जो दुःख में तो नही जाएगा
लेकिन सुख के समय खोपड़ी पर चढ़ जाएगा


इन्हीं तेवरों में श्री विनीत वाल जो कि एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे कार्यरत है द्वारा अंग्रेजी की दो कविताओं के माध्यम से वर्तमान सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य का जायजा लिया गया।

इसी क्रम में श्री जमील अहमद जमील द्वारा 2 ग़ज़लों का पाठ किया गया। उल्लेखनीय पक्तियां निम्न प्रकार रही-

बना ही लूंगा उसे आईना कभी न कभी
कि रंग लाएगी मेरी वफा कभी न कभी


श्री साबिरा हबीब द्वारा इस क्रम को आगे बढाते हुए श्री पी0सी0शर्मा, अवकाश प्राप्त वरिष्ठ आई0ए0एस0 अधिकारी से अपनी रचनाये सुनाने का आग्रह किया गया। श्री शर्मा द्वारा अपने कविता संकलन से 2 कविताएं सुनाई गयी जिनको उनकी सवेदनशीलता के कारण काफी सराहा गया। निम्न पंक्तियां विशेष उल्लेखनीय है-

तुम्हारे पूर्वसंचित संस्कार, तुम्हारे संकल्प,
तुम्हारी निष्ठाएं, तुम्हारे विश्वास, तुम्हारी मान्यताएं,
तुम्हारी आस्थाएं, तुम्हारे सम्बन्ध, तुम्हारी प्रार्थनाएं,
तुम्हे यही तक ला सकती थी,
जहां जब कुछ ठहरा हुआ है
सभी मार्ग यहीं तक आते है


इसके पश्चात बारी आयी श्री देवकी नन्दन शांत, अवकाश प्राप्त अभियंता जिन्होंने तरन्नुम में 2 गजले सुनाई। निम्न पंक्तियों ने खूब ताली बजवाई-

यादो की इक हाट सी लगती है शाम से
बिकते है मेरे गम जहां गीतों के नाम से


दो युवा कवि श्री अनूप पाठक, छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा ध्रुव सिंह द्वारा संवेदनशीलता से भरी 2-2 कविताएं सुनाई गयी तथा विशेष रूप से सराही गयी-

मेरी इन प्यारी बहनों ने मेरी इन बूढ़ी माओं ने
मुझे तो जिंदा रखा है बुर्जगो की दुआओं ने।

( श्री अनूप पाठक)
हाल सभी को मालूम है कश्मीर के अत्याचारों का
बम फटता है हर रोज वहां जिन्दा इंसान ................
.
(श्री ध्रुव सिंह)

अंत में युवा शायर श्री मनीष शुक्ला (उत्तर प्रदेश वित्त एवं लेखा सेवाओं में अधिकारी) को ग़ज़लें सुनाने की दावत दी गयी। श्री शुक्ला ने 2 ग़ज़लें सुनाई और भूरि-भूरि प्रंशसा पायी। गजल का एक शे'र कई श्रोताओं के मस्तिष्क में चिपक गया-
रफ्ता रफ्ता रंग बिखरते जाते हैं
तस्वीरों के दाग उभरते जाते है।

समयाभाव के कारण कविता पाठ का दूसरा चक्र नहीं हो सका। प्रो0 साबिरा हबीब की वाकपटुता, हाजिर जवाबी तथा उच्च कोटि के शेर पाठन ने डेढ़ घन्टे से भी लम्बे कार्यक्रम की जीवन्तता बनाये रखी। अंत में श्री प्रदीप कपूर द्वारा कवियो व श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की औपचारिक घोषणा की गयी।
तत्पश्चात टंण्डन परिवार के आतिथ्य सत्कार के तहत सूक्ष्म जलपान ग्रहण किया गया।

श्रोता तथा कवियों की कुल संख्या लगभग 50 रही।

कुछ अन्य झलकियाँ-


मुहम्मद अहसन

आलोक शुक्ला

गज़ाला अनवर

सोम ठाकुर

देवकी नंदन शांत

जमेल अहमद

ध्रुव सिंह

मनीष शुक्ला

अनूप पाठक