Sunday, August 30, 2009

सशक्त काव्य का संगम : 'परिचय' गोष्ठी

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला
दिल्ली महानगर को साहित्यिक सरगर्मियों की भी राजधानी माना जाता रहा है. दिल्ली में साहित्य की अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं और प्रतिमाह यहाँ कई जगह काव्य गोष्ठियां भी आयोजित होती रहती है. 'परिचय' भी एक सशक्त साहित्यिक संस्था है जो दो दशक से भी अधिक समय से अपनी साहित्यिक गतिविधियों के लिए सुप्रसिद्ध है. 'परिचय' संस्था की गोष्ठियों में हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार यथा बालस्वरूप राही, गंगाप्रसाद विमल, पद्मा सचदेव, हिमांशु जोशी, रामदरस मिश्र, चित्रा मुद्गल आदि समय समय पर शिर्कत करते रहे हैं. प्रसिद्ध दूरदर्शन धारावाहिक 'रामायण' के निर्माता स्व. रामानानंद सागर ने भी अपने जीवन काल में यहाँ पदार्पण किया. इस के साथ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, सीमाब सुल्तानपुरी, ममता किरण, नमिता राकेश, अर्चना त्रिपाठी, रविन्द्र रवि, वीरेंद्र सक्सेना व कई अन्य काव्य हस्तियां प्रायः यहाँ की काव्य गोष्ठियों को गरिमा प्रदान करती रही हैं. दि. 19 अगस्त 2009 को भी दिल्ली के फेरोज़शाह रोड स्थित 'Russian Cultural Centre' की काव्य गोष्ठी एक सशक्त काव्य गोष्ठी थी जिस में बहुचर्चित पुरस्कृत कवि अभिरंजन कुमार को विशिष्ट कवि के रूप में आमंत्रित किया गया था. इस के अतिरिक्त श्री बृज अभिलाषी गोष्ठी के दूसरे विशिष्ट कवि थे. पिछले दशक में तेज़ी से चर्चा में आए हिंदी कविता के सुप्रसिद्ध हस्ताक्षर अभिरंजन कुमार ने अपने एक बहुचर्चित लेख 'हिंदी कविता: तलाश पांचवें पाठक की' की भूमिका के रूप में एक कविता लिखी थी:

...कविता क्यों कि सीधे दिल में उतरती है और/ देर तक उसमें रह सकती है/ कविता क्यों कि दुर्गम से दुर्गम भाव-भूमि पर /सीना ठोंक कर आगे बढ़ सकती है/ कविता क्यों कि पढ़े बे-पढ़े सब की ज़बान पर आसानी से चढ़ सकती है/ कविता क्योंकि गीत बन सकती है/नारा बन सकती है/ किसी आन्दोलन का झंडा बन सकती है/ कविता क्यों कि जड़ होती परम्पराओं/ हर तरह के अन्यायों और साज़िशों के खिलाफ/ पहरेदार का डंडा बन सकती है/ कविता क्यों कि लोगों को जगा सकती है/ ...


इसलिए आज भी यह उतनी ही ज़रूरी है, जितनी सौ या हज़ार साल पहले थी, आगे भी रहेगी...

एक समय ऐसा भी आया कि कविता को एक 'इंडस्ट्री' माना गया और शहर फिरोज़ाबाद में जैसे हर दस कदम पर चूड़ियाँ मिलती हैं, वैसे देश में भी हर दस कदम पर कोई न कोई कवि अपनी कविताओं का पुलिंदा लिए कहीं जाता नज़र आया. कुछ विद्वान इस का मूल कारण कविता को छंद से मुक्त करना मानते रहे. इसलिए अभिरंजन का उक्त लेख जब सन् 2000 में छपा तो देश भर में कविता को ले कर विचारोतेजक विवाद छिड़ गए. छंद कविता या छंद-स्वछन्द कविता के हिमायतियों के बीच वाक्-युद्ध होने लगे. पर अंततः स्थापित वही बात हुई जो ऊपर संदर्भित काव्य पंक्तियों में अभिरंजन ने कही है. अभिरंजन ने इस गोष्ठी में अपनी कविताओं द्वारा इस बात का ठोस प्रमाण दिया कि कविता को छंद-बद्धः या छंद-मुक्त के खानों में बांटना गलत है. उन के बहुचर्चित संग्रह 'उखड़े हुए पौधे का बयान' में कई सशक्त कविताएँ संकलित हैं जो छंद में भी हैं और छंद-मुक्त भी . इस गोष्ठी में जो कविताएँ उन्होंने एक विशिष्ट कवि के रूप में पढ़ी उन में से 'ये काले गोरे बादल' कविता कवि के भीतर व्याप्त प्रकृति-प्रेम व धरती की व्यवहारिक चिंताओं के अनूठे सम्मिश्रण से साक्षात्कार कराती है:

पानी से बनाते हैं पहाड़ ये/किरणों से हिरणों का आकर ये/ घोड़ों की, हाथियों की ड्राइंग करते हैं...
...इतना बड़ा कैनवस! इतनी बड़ी पेंटिंग!/ भूल गई अपने पंख तितली!...


और
आसमान के खेत को देखते ही देखते/ जाने किस तरह जोत डालते हैं/ कौन से ट्रैक्टर हैं, दिखते नहीं हैं/ Horse Power कितना है, लिखते नहीं हैं/ ऐसा किसान धरती पे होता/ बंजर पे होता, परती पे होता/ खुशहाली होती फिर हर ओर...

दूसरे विशिष्ट कवि बृज अभिलाषी ने बहुत सुन्दर गज़लें पढ़ी. कुछ आध्यात्मिक रंग में रंगी. कुछ ज़िन्दगी की सच्चाइयों को, मर्म-स्पर्शी अंदाज़ में कहती. जैसे (कुछ शेर):


मंदिर मस्जिद गिरजा देख सब में उस का जज़्बा देख
दैरो हरम से आगे जा फिर तू उस का रस्ता देख

किसी मज़लूम को सताना क्या
गिरती दीवार को गिराना क्या
अपने ही ग़म से किस को फुर्सत है जान पहचान का बढ़ाना क्या
जिस को देखो अना का कैदी है खुद्फ़रेबी का है ज़माना क्या

लज़्ज़ते इंतज़ार क्या कहिये इंतज़ार इंतज़ार होता है
राही तनहा कभी नहीं चलता साथ गर्दो-गुबार होता है.
(दैर = मंदिर, हरम = मस्जिद, मज़लूम = सताया हुआ, अना = अहम् खुदफरेबी = आत्म छलावा)


प्रायः हिंदी कवियों का एक सर्वप्रिय विषय रहा है 'रिश्ते'. इस पर एक के बाद एक कविताएं आने लगी. जैसे रविन्द्र रवि का यह शेर:

बिस्तर पे सिमट आए थे सहमे हुए बच्चेमाँ बाप में झगड़ा था असर और कहीं था.

'रिश्तों' के इस कसैलेपन को अपने तरीके से कहती शोभना मित्तल:

ढूँढें किधर/ खो आए कहाँ पर/ मिठास रिश्ते...
मन का कांच/ धुंधला कर देते/ चटके रिश्ते...

सुभाष नीरव
हमारे बीच/ भाषा की एक नदी/ बहा करती थी/जाने क्या हुआ/ एकाएक सूख गई/...भाषा की नदियाँ/ जब रिश्तों के बीच सूख जाती हैं/ तब आँखें ही तो /हमारे अधर होती हैं/ और हमारे कान भी/ आओ /दो दो कदम/ एक दूसरे की ओर हम बढ़ें/ आँखों की भाषा पढ़ें...

ममता किरण कविता लिखने व प्रस्तुत करने की मुखरता सुन्दरता के कारण काव्य गोष्ठियों में एक ख़ास पहचान बनाए हुए हैं, सो रिश्तों पर छोटी बह्र में उनके चंद शेर:
सफ़र में हैं दो ही मौसम
हँसना है या रोना है
क्यों ना उनको तोड़ ही दो जिन रिश्तों को ढोना है
उसको पाने की खातिर उस में खुद को खोना है


विज्ञान व्रत पूजता हूँ मैं उसे अब वो पत्थर है सो है

एकदम नई कवियत्री रानी ने प्रेम-भावना को अपने अबोध शब्दों में कह डाला. जैसे:


कल्पित वृक्ष की छाया बन, मैं तेरी ओट सजाऊं पिया बन अधिकरण तुझ में ही कहीं विलीन हो जाऊं पिया.

लक्ष्मी शंकर वाजपेयी आज भी अपने प्रभावशाली स्तर के होते बुलंदियों पर थे. उनसे बार बार एक और कविता सुनाने की फरमाइशें हो रही थी. उनकी एक कविता की चंद पंक्तियाँ:

ऊब जाता हूँ मैं जब शह्र के शोरो गुल से मुझे वो गाँव की अमराइयाँ बुलाती हैं कुछ नए फूल खिले हैं ज़िंदगी के आंगन मेंजवां दिलो तुम्हें शहनाइयां बुलाती हैं पहुँच गए हो बुलंदी के जिस मुकाम पे तुमउसी मुकाम पे तन्हाइयां बुलाती हैं

कवि सुभाष चंदर ने व्यवस्था के विरुद्ध मन में उभरते आक्रोश की बेबसी व्यक्त की या उस के खोखलेपन पर करारा व्यंग्य किया! शायद दोनों एक साथ:
कौन कहता है कि व्यवस्था के प्रश्न पर/ मेरा लहू उबलता नहीं/ मेरी रगें गुस्से से चटखती नहीं/ आपने कभी देखा है कि/ ऐसे प्रश्नों पर मैं/ अपने मुंह से जलती सिगरेट निकाल कर/ कितनी बेदर्दी से/ जूतों से मसल देता हूँ!..


गोष्ठी संचालक अनिल मीत छोटी छोटी बह्र में बड़ी बड़ी बात कह जाते हैं:
तनहा एक बशर होता हैदुनिया भर का डर होता है सदमों के हैं बोझ हज़ारों एक अकेला सर होता है.

'परिचय' की स्थायी अध्यक्षा उर्मिल सत्यभूषण ने वैसे तो कई सशक्त कविताएँ और गज़लें लिखी हैं, पर हिंदी की काव्य-धारा में उन्होंने स्वयं को एक कृष्ण-समर्पित कवि के रूप में भी स्थापित किया है. कृष्ण की शक्ति को वे अपने भीतर पूरी आस्था से महसूस करती हैं. कृष्ण का स्वरुप उन के मानस पटल पर क्षुधित -पीड़ित मानवता के संबल के रूप में स्थापित है. जैसे (चंद पंक्तियाँ):

हे कृष्ण ! द्रौपदी का दिव्य पात्र मुझे दे दो/ और दे दो अपनी एक दाने से तृप्त होने वाली संतुष्टि!/ मैं जग में बाँट दूँगी उसे! / क्षुधार्त मानवता को संतुष्टि का अन्न दूँगी/ उस के लहुलुहान पैरों को/ राहत की साँसें दूँगी...

उर्मिल द्वारा रचित कृष्ण चेतना से जुड़ी कई कविताएँ 'परिचय' द्वारा ही प्रकाशित कविता संग्रह 'परिचय राग' में भी संकलित हैं जिस में उर्मिल समेत 15 समकालीन कवियों की कविताएँ संकलित हैं.

गोष्ठी अध्यक्ष 'सीमाब' सुल्तानपुरी उर्दू शायरी में एक सिद्धहस्त हस्ताक्षर हैं. भाषा की विद्वता, बह्र की महारत, व शायरी के भाव-पक्ष में वे अपना सानी नहीं रखते. गोष्ठी संपन्न करते हुए उन्होंने अपनी कुछ सशक्त गज़लें पढ़ी, जिन का एक एक शेर मन में अमित छाप छोड़ता. (चंद शेर):


मुझे देने को उस ने घर दिया है मगर बेदख्ल भी तो कर दिया है
जगह मेरे लिए घर में कहाँ है तेरी यादों ने यह घर भर दिया है
हुआ है कुछ न कुछ 'सीमाब' तुझ को किसी ने या तुझे कुछ कर दिया है

आदमी के आईने में देख कर अपनी सूरत से खुदा शर्मा गया
मुस्कराहट का कफ़न दे कर कोईआरज़ू को दिल में ही दफना गया
दिल तो था 'सीमाब' का शीशा सिफतपत्थरों के शह्र में पथरा गया
(शीशा सिफत = शीशे जैसा).

'सीमाब' अपनी गज़लों के एक मजमुए 'खुला आकाश' के फ्लैप पर लिखते हैं:

दिल में धरती की कशिश रखता हूँ मैं ज़हन में मेरे खुला आकाश है.

उर्दू के इस मशहूर शायर का ज़ाती परिचय इन से बेहतर शब्दों में नहीं हो सकता.



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7 पाठकों का कहना है :

Shamikh Faraz का कहना है कि -

कमाल की गोष्ठी और सहजवाला जी की बढ़िया रिपोर्ट. कुछ शे'र तो दिल को छू गए.

पानी से बनाते हैं पहाड़ ये/किरणों से हिरणों का आकर ये/ घोड़ों की, हाथियों की ड्राइंग करते हैं...
...इतना बड़ा कैनवस! इतनी बड़ी पेंटिंग!/ भूल गई अपने पंख तितली!...

Shamikh Faraz का कहना है कि -

मंदिर मस्जिद गिरजा देख सब में उस का जज़्बा देख
दैरो हरम से आगे जा फिर तू उस का रस्ता देख

Shamikh Faraz का कहना है कि -

bahut achha laga.
सफ़र में हैं दो ही मौसम
हँसना है या रोना है
क्यों ना उनको तोड़ ही दो जिन रिश्तों को ढोना है
उसको पाने की खातिर उस में खुद को खोना है

Shamikh Faraz का कहना है कि -

ye b pasand aaya.

मुझे देने को उस ने घर दिया है मगर बेदख्ल भी तो कर दिया है
जगह मेरे लिए घर में कहाँ है तेरी यादों ने यह घर भर दिया है
हुआ है कुछ न कुछ 'सीमाब' तुझ को किसी ने या तुझे कुछ कर दिया है

Manju Gupta का कहना है कि -

सशक्त हस्ताक्षर की कविताए लाजवाब लगीं .

सफ़र में हैं दो ही मौसम
हँसना है या रोना है

बधाई .

manu का कहना है कि -

एक से बढ़कर एक शे'र कविता पढने को मिली इस समारोह में..
सब पढ़ कर मालूम हो रहा है के गोष्ठी कितनी सफल रही ....
छोटी-छोटी झलकियाँ पढ़ के लगा के जैसे हम भी वहीँ पर थे...
युग्म का धान्यवाद इसे प्रकाशित करने के लिए...

Anonymous का कहना है कि -

Kavi goshthi bemisal rahe.Pani se banate hai ye pahad....to badi pyari hai.khaber ke liye dhanyavad.

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