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Tuesday, August 9, 2011

दो वरिष्ठ कवियों तथा पाँच युवा कवियों को पहला कविताकोश सम्मान



प्रथम कविता कोश सम्मान समारोह 07 अगस्त 2011 को जयपुर में जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में संपन्न हुआ। इसमें दो वरिष्ठ कवियों (बल्ली सिंह चीमा और नरेश सक्सेना) एवं पाँच युवा कवियों (दुष्यन्त, अवनीश सिंह चौहान, श्रद्धा जैन, पूनम तुषामड़ और सिराज फ़ैसल ख़ान) को सम्मानित किया गया। इस आयोजन में वरिष्ठ कवि श्री विजेन्द्र, श्री ऋतुराज, श्री नंद भारद्वाज एवं वरिष्ठ आलोचक प्रो. मोहन श्रोत्रिय भी उपस्थित थे। समारोह में बल्ली सिंह चीमा एवं नरेश सक्सेना का कविता पाठ मुख्य आकर्षण रहे। कविता कोश के प्रमुख योगदानकर्ताओं को भी कविता कोश पदक एवं सम्मानपत्र देकर सम्मानित किया गया।

समारोह में कविता कोश की तरफ से कविता कोश के संस्थापक और प्रशासक ललित कुमार, कविता कोश की प्रशासक प्रतिष्ठा शर्मा, कविता कोश के संपादक अनिल जनविजय कविता कोश की कार्यकारिणी के सदस्य प्रेमचन्द गांधी, धर्मेन्द्र कुमार सिंह, कविता कोश टीम के भूतपूर्व सदस्य कुमार मुकुल एवं कविता कोश में शामिल कवियों में से आदिल रशीद, संकल्प शर्मा, रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', माया मृग, मीठेश निर्मोही, राघवेन्द्र, हरिराम मीणा, बनज कुमार ‘बनज’ आदि उपस्थित थे। समारोह में यह घोषणा की गई कि 07 अगस्त 2011 से कविता कोश के संपादक एक वर्ष के लिए कवि प्रेमचन्द गांधी होंगे। भूतपूर्व सम्पादक अनिल जनविजय कविता कोश टीम के सक्रिय सदस्य के रूप में संपादकीय संयोजन का काम देखेंगे।

कविता कोश टीम ने कविता कोश के पाँचवे जन्मदिवस के अवसर पर कविता कोश जयंती समारोह का आयोजन किया। विगत 07 अगस्त 2011 को जयपुर के प्रसिद्ध जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में यह भव्य समारोह संपन्न हुआ। समारोह के संयोजक और कविता कोश के संपादक श्री प्रेमचंद गाँधी ने उपस्थित कवियों, श्रोताओं और समारोह के सहभागियों का स्वागत करते हुए कहा यह दिन हिंदी कविता के इतिहास की एक बड़ी परिघटना है। पहली बार कविता कोश को इंटरनेट की दुनिया से निकाल कर सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है और हमारे इस समारोह में उपस्थित दो-ढाई सौ लोगों में मात्र वे कवि ही उपस्थित नहीं है जो कविता कोश में शामिल हैं बल्कि बहुत से पत्रकार, हिंदी प्रेमी, छात्र, साहित्यकार एवं जनता के अन्य वर्गों के लोग भी उपस्थित हैं।

इसके बाद कविता कोश के संस्थापक और प्रशासक श्री ललित कुमार ने उपस्थित जन समुदाय को कविता कोश के इतिहास और कविता कोश वेबसाइट के उद्देश्यों से परिचित कराया। अपने वक्तव्य में ललित जी ने कविता कोश के विकास में सामुदायिक भावना के महत्व पर बल दिया और बताया कि इस तरह की वेबसाइट का अस्तित्व सिर्फ सामुदायिक प्रयासों से ही संभव है। एक अकेला व्यक्ति इस तरह की वेबसाइट नहीं चला सकता। इसीलिए शुरू में उन्होंने अकेले इस परियोजना को शुरू करने के बावजूद धीरे धीरे अन्य लोगों को कविता कोश से जोड़ा और कविता कोश टीम की स्थापना की। अब यह टीम ही कविता कोश का संचालन करती है।

कविता कोश ने अपनी इस पंच वर्षीय जयंती के अवसर पर दो वरिष्ठ कवियों और पाँच एकदम नए युवा कवियों को सम्मानित करने का निर्णय लिया था। इसलिए ललित जी के वक्तव्य के बाद इन सातों कवियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित कवियों की सूची इस प्रकार है।

कविता कोश सम्मान 2011: सम्मानित रचनाकार

नरेश सक्सेना, लखनऊ (कवि)
बल्ली सिंह चीमा, ऊधमसिंह नगर (कवि)
दुष्यन्त, राजस्थान (कवि)
श्रद्धा जैन, सिंगापुर (शायर)
अवनीश सिंह चौहान, इटावा (नवगीतकार)
सिराज फ़ैसल ख़ान, शाहजहांपुर (शायर)
पूनम तुषामड़, नई दिल्ली (कवि)
कविता कोश सम्मान के अंतर्गत दोनों वरिष्ठ कवियों नरेश सक्सेना एवं बल्ली सिंह चीमा को 11000 रू. नकद, कविता कोश सम्मान पत्र और कविता कोश ट्रॉफ़ी प्रदान की गई। पाँचों युवा कवियों को पाँच हजार रु. नकद, सम्मान पत्र और कविता कोश ट्रॉफ़ी दी गई। शाल ओढ़ाकर इन कवियों का सम्मान करने के लिए मंच पर ये कवि उपस्थित थे।

कवि विजेन्द्र
कवि ऋतुराज
कवि नंद भारद्वाज
आलोचक मोहन श्रोत्रिय
सम्मान के बाद सभी सम्मानित कवियों ने अपनी कविता का पाठ किया और समारोह में उपस्थित लोगों को कविता कोश के विषय में अपनी भावना से अवगत कराया और यह सुझाव दिए कि कविता कोश का आगे विकास करने के लिए क्या क्या कदम उठाए जाने चाहिए। कवियों का यह सम्बोधन एक विचार गोष्ठी में बदल गया था। कवियों ने चिंता व्यक्त की कि हिंदी भाषा और हिंदी कविता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो रहा है। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण और भारत के हिंदी भाषी क्षेत्र के निवासियों द्वारा हिंदी पर अंग्रेजी को प्रमुखता देने के कारण हिंदी संस्कृति और साहित्य का ह्रास हो रहा है। हिंदी को बाजार की भाषा बना दिया गया है लेकिन उसे ज्ञान और विज्ञान की भाषा के रूप में विकसित करने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हिंदी कविता के नाम पर बेहूदा और मजाकिया कविताएँ लिखी, छपवाई और सुनाई जा रही हैं। हिंदी कविता के मंच पर तथाकथित हास्य कवियों का अधिकार हो गया है। कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की संपूर्ण शिक्षा का माध्यम हिंदी को बनाया जाना चाहिए और सभी तरह के विज्ञान और प्रौद्योगिकी को भी हिंदी में ही पढ़ाया जाना चाहिए अन्यथा आने वाले दस बीस सालों में हिंदी का अस्तित्व खत्म हो सकता है। नरेश सक्सेना जी के अनुसार आज हिंदी की हैसियत घट गई है इसको अब वापस पाना होगा। सिर्फ आग लिख देने से कागज जलते नहीं बल्कि उन्हें जलाना पड़ता है। उन्होंने अपनी कविताओं से भी माहौल को जीवंत बनाया। उन्होंने मुक्त छंद में अपनी कविता पढ़ी।

(१)
जिसके पास चली गई मेरी जमीन
उसके पास मेरी बारिश भी चली गई
(२)
शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

कवि बल्ली सिंह चीमा ने अपने वक्तव्य में कविता कोश के प्रति आभार प्रकट किया कि उन्हें जयपुर आने और नए श्रोताओं से रूबरू होने का अवसर प्रदान किया है। यह सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सम्मान किसी सरकारी संस्था या किसी राजनीतिक संगठन द्वारा नहीं दिया जा रहा है बल्कि कविता के प्रेमियों द्वारा कवियों को सम्मानित किया जा रहा है और यह बड़ी बात है। उन्होंने कामना की कि कविता कोश वेबसाइट पर अधिक से अधिक कवियों की ज्यादा से ज्यादा कविताएँ जुड़ें और यह हिंदी की सबसे बड़ी वेबसाइट बन जाए। चीमा जी ने अपनी जो कविता पढ़ी वह इस प्रकार है।

(१)
कुछ लोगों से आँख मिलाकर पछताती है नींद
खौफ़ज़दा सपनों से अक्सर डर जाती है नींद
हमने अच्छे कर्म किए थे शायद इसीलिए
बिन नींद की गोली खाए आ जाती है नींद
(२)
मैं किसान हूँ मेरा हाल क्या मैं तो आसमाँ की दया पे हूँ
कभी मौसमों ने हँसा दिया कभी मौसमों ने रुला दिया
(३)
वो ब्रश नहीं करते
मगर उनके दाँतो पर निर्दोषों का खून नहीं चमकता
वो नाखून नहीं काटते
लेकिन उनके नाखून नहीं नोचते दूसरों का माँस

कवि विजेन्द्र ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि कविताएँ दॄष्टिहीन (visionless) नहीं होनी चाहिए| देश को सही विकल्प की और बढ़ाने वाली कविता ही सर्वश्रेष्ठ हो सकती है। कविता कोश इस दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहा है। कविता कोश में रचनाओं का चयन बहुत अच्छा है और इसके लिए कविता कोश के संपादक अनिल जनविजय बधाई के पात्र हैं। इसके तुरंत बाद बोलते हुए अनिल जनविजय ने बताया कि अब से कविता कोश के संपादक कवि प्रेमचंद गाँधी होंगे। मैं अपना कार्यभार उन्हें सौंपता हूँ। अनिल जनविजय ने कविता कोश की पूरी टीम के योगदान को सराहा और टीम सदस्य प्रतिष्ठा शर्मा एवं ललित कुमार के समर्पण की प्रशंसा की। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि ऋतुराज, नंद भारद्वाज और मोहन श्रोत्रिय ने भी अपने अपने विचार प्रस्तुत किए।

Tuesday, August 31, 2010

यादें मुकेश की ....कार्यक्रम सम्पन्न


(फोटो विवरण) : कार्यक्रम में गयिका भव्या छाबडा, राजीव मलहोत्रा एव प्यानो एकॊर्डियन वादक अरुण चतुर्वेदी

जयपुर : प्रसिद्ध पार्श्व गायक स्व. मुकेश की पुण्य तिथि के अवसर पर जयपुर के प्रतिष्ठित 'जयपुर क्लब' द्वारा २८ अगस्त '१० को 'यादें मुकेश की...' कार्यक्रम का आयोजन क्लब परिसर में किया गया । कार्यक्रम में क्लब के सदस्यों के अतिरिक्त मुकेश के गीतों के जाने माने गायक कोटा के राजीव मलहोत्रा को विशेष तौर पर आमंत्रित किया गया था ।

राजीव ने अपने गायन की शुरूआत मुकेश द्वारा गाई गईं रामचरित मानस की चौपाई ' मंगल भवन अमंगल हारी.. से की और उसके बाद मुकेश के विभिन्न गीत जैसे 'होठों पे सचाई रहती है' दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ .. , कहीं दूर जब दिन ढ़ल जाए.., जाऊँ कहाँ बता ए दिल.., चल अकेला चल अकेला.., ये मेरा दीवानापन है.., कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है.., के साथ साथ उभरती हुई गायिका भव्या छाबडा के साथ कुछ युगल गीत 'सावन का महीना.., दिल की नज़र से नज़रों के दिल से.., क्या खूब लगती हो बडी सुन्दर दिखती हो.. ए मेरे सनम ए मेरे सनम.. गीत गाकर मुकेश की याद ताज़ा कर दी ।

कार्यक्रम में गायक एवं ग़ज़लकार शरद तैलंग ने भी 'सजन रे झूठ मत बोलो.. तथा दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई . तथा अजमेर से आए हुए गायक सुरेन्द्र विजयवर्गीय ने ' सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी.. और इक दिन मिट जायेगा माटी के मोल..गीतों को सुना कर मुकेश को अपनी श्रद्धांजली दी । राजीव और भव्या के साथ जब शरद तैलंग ने फ़िल्म संगम का प्रसिद्ध गीत 'हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा.. सुनाया तो लोग झूमने लगे । कार्यक्रम में जयपुर क्लब के सद्स्य आर.के.परनामी, रवि शर्मा, केप्ट्न अरोरा, मधुकर पुरोहित नें भी मुकेश के विभिन्न गीतों को सुनाकर सबकी प्रशंसा बटोरी ।

इस अवसर पर नर्तक गोविन्दा ने 'जाने कहाँ गए वो दिन .. पर भावाभिनय भी किया । कार्यक्रम में सुपरिचित प्यानो एकॊर्डियन वाद्क अरुण चतुर्वेदी, की-बोर्ड वादक ब्रजेश दाधीच, गिटार वादक सुमित, ऒक्टोपेड़ वादक चेतन शर्मा तथा ढोलक कोंगों पर बबलू ने संगत की । कार्यक्रम का संचालन शरद तैलंग ने किया

Sunday, August 8, 2010

आम आदमी तक पहुंची प्रेमचंद की कथा परंपरा

प्रेमचंद जयंती समारोह-2010



जयपुर
राजस्‍थान प्रगतिशील लेखक संघ और जवाहर कला केंद्र की पहल पर इस बार जयपुर में प्रेमचंद की कहानी परंपरा को ‘कथा दर्शन’ और ‘कथा सरिता’ कार्यक्रमों के माध्‍यम से आम लोगों तक ले जाने की कामयाब कोशिश हुई, जिसे व्‍यापक लोगों ने सराहा। 31 जुलाई और 01 अगस्‍त, 2010 को आयोजित दो दिवसीय प्रेमचंद जयंती समारोह में फिल्‍म प्रदर्शन और कहानी पाठ के सत्र रखे गए थे। समारोह की शुरुआत शनिवार 31 जुलाई, 2010 की शाम प्रेमचंद की कहानियों पर गुलजार के निर्देशन में दूरदर्शन द्वारा निर्मित फिल्‍मों के प्रदर्शन से हुई।
फिल्‍म प्रदर्शन से पूर्व प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने अतिथियों का स्‍वागत करते हुए कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में व्‍याप्‍त सामाजिक संदेशों को और उनकी कहानी परंपरा को आम जनता तक ले जाने की एक रचनात्‍मक कोशिश है यह दो दिवसीय समारोह। इसमें एक तरु जहां प्रेमचंद की कहानियों पर बनी फिल्‍मों के माध्‍यम से प्रेमचंद के सरोकारों को आमजन तक ले जाने का प्रयास है, वहीं प्रेमचंद की कथा परंपरा में राजस्‍थान के दस युवा कहानीकारों को एक साथ प्रस्‍तुत कर हम प्रदेश की युवतम रचनाशीलता को राजधानी के मंच पर ला रहे हैं। इसके बाद प्रेमचंद की ‘नमक का दारोगा’, ‘ज्‍योति’ और ‘हज्‍ज-ए-अकबर’ फिल्‍में दिखाई गईं। ‘नमक का दारोगा’ तो चर्चित कहानी है, लेकिन प्रेमचंद की आम छवि से हटकर है ‘ज्‍योति’ की कहानी। एक ग्रामीण विधवा किसान स्‍त्री के इकलौते बेटे और ग्रामीण युवती की मासूम प्रेमकथा में मानवीय और पारिवारिक रिश्‍तों का प्रेम कई स्‍तरों पर दर्शकों को विभोर कर देता है। इसी प्रकार ‘हज्‍ज-ए-अकबर’ में एक मुस्लिम बालक और उसकी आया के बीच अपार प्रेम को बहुत संवेदनशीलता के साथ रूपायित किया गया है। खचाखच भरे सभागार में दर्शकों ने तीनों फिल्‍मों का भरपूर आनंद लिया और तालियां बजाईं।
रविवार 01 अगस्‍त, 2010 की सुबह 10.30 बजे ‘कथा सरिता’ का आगाज हुआ। वरिष्‍ठ कथाकार जितेंद्र भाटिया, वरिष्‍ठ रंगकर्मी एस.एन. पुरोहित और वयोवृद्ध विज्ञान लेखक हरिश्‍चंद्र भारतीय द्वारा प्रेमचंद के चित्र पर माल्‍यार्पण से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस अवसर पर प्रलेस के महासचिव प्रेमचंद गांधी ने स्‍वागत करते हुए कहा कि प्रेमचंद की 130वीं जयंती के मौके पर प्रदेश के दस युवा कथाकारों को एक मंच पर लाने की यह कोशिश रचनाकार और आम आदमी के बीच संवाद की पहल है, जहां लेखक सीधे पाठक से रूबरू होगा और कथा के आस्‍वाद की पुरानी परंपरा पुनर्जीवित होगी। य‍ह प्रेमचंद की परंपरा में समकालीन रचनाशीलता को कई आयामों से देखने की रचनात्‍मक कोशिश है। उन्‍होंने कहा कि दोनों सत्रों में जितेंद्र भाटिया और नंद भारद्वाज अध्‍यक्षता के साथ संयोजन भी करेंगे। इसके पश्‍चात वरिष्‍ठ रंगकर्मी एस.एन. पुरोहित ने प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ का अत्‍यंत प्रभावशाली ढंग से पाठ किया तो उपस्थित श्रोताओं ने उनकी तालियां बजाकर प्रशंसा की।
इसके पश्‍चात पहले सत्र का आरंभ करते हुए जितेंद्र भाटिया ने कहा कि समूचे भारतीय साहित्‍य में प्रेमचंद की परंपरा में उनके समकालीन रचनाकारों में उनके जितना बड़ा कहानीकार कोई नहीं है, उपन्‍यासकार और कवि जरूर हो सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि प्रेमचंद के बाद कहानी में बहुत विकास हुआ है, लेकिन सरोकार आज भी प्रेमचंद के समय के ही हैं। यही कारण है कि कहानी आज भी हमारे समय और समाज की धड़कन है, जिसे आज के कथाकार सार्थक कर रहे हैं। इसके बाद कहानी पाठ में सबसे पहले राम कुमार सिंह ने ‘शराबी उर्फ तुझे हम वली समझते’ कहानी का पाठ किया। एक साधारण मनुष्‍य की जिजीविषा और सामाजिक ताने-बाने में उसकी व्‍यथा कथा में रामकुमार ने यह बताने की कोशिश की कि सच्‍चे और भले लोग जिंदगी के हर मोड़ पर ठगे जाते हैं और उनके अंतर्तम में ठुकी हुई कीलों का रहस्‍य बाकी लोग कभी नहीं जान पाते। कहानी पाठ की शृंखला में प्रदेश के युवतम कथाकार राजपाल सिंह शेखावत ने ‘नुगरे’ कहानी का पाठ किया तो आजादी के बाद विगत छह दशकों में कैसे सांप्रदायिक विचारों ने जगह बनाई है, इसका एक गांव की कहानी के माध्‍यम से पता चला। कहन में सामान्‍य और बड़ी बात को भी साधारण ढंग से कहने के कौशल से कहानी ने चमत्‍कारिक प्रभाव पैदा किया।



उर्दू अफसानानिगार आदिल रज़ा मंसूरी ने अपनी कहानी ‘गंदी औरत’ में फुटपाथ पर रहने वाली एक स्‍त्री के माध्‍यम से समाज के सफेदपोश लोगों की गंदगी को बेनकाब करने का प्रयास किया। सुप्रसिद्व युवा कहानीकार अरुण कुमार असफल ने अपनी कहानी ‘क ख ग’ का पाठ करते हुए बताया कि सामान्‍य अनपढ़ लोगों में शिक्षित लोगों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा व्‍यावहारिक ज्ञान होता है जो उन्‍हें बिना किसी नारे के सशक्‍त बनाता है और दूसरों को राह दिखाता है। मनीषा कुलश्रोष्‍ठ की अनुपस्थिति में सुपरिचित कलाकार सीमा विजय ने उनकी कहानी ‘स्‍वांग’ का प्रभावी पाठ किया। स्‍वांग रखने की प्राचीन लोक कला पर आधारित बुजुर्ग लोक कलाकार गफूरिया की इस मार्मिक कथा ने सबको द्रवित कर दिया। अध्‍यक्षता करते हुए जितेंद्र भाटिया ने पढ़ी गई कहानियों की चर्चा करते हुए समकालीन रचनाशीलता को रेखांकित करते हुए कहा कि इधर लिखी जा रही कहानियों ने हिंदी कहानी के भविष्‍य को लेकर बहुत आशाएं जगाईं हैं। सत्र के समापन में उन्‍होंने अपनी नई कहानी ‘ख्‍वाब एक दीवाने का’ का पाठ किया। भविष्‍य केंद्रित इस विज्ञान कथा में समूची प़थ्‍वी को लेकर व्‍याप्‍त चिंताओं से पाठकों को रूबरू कराया गया।

‘कथा सरिता’ के दूसरे सत्र का आरंभ वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंद भारद्वाज की अध्‍यक्षता में युवा कहानीकार दिनेश चारण के कहानी पाठ से हुआ। उन्‍होंने अपनी कहानी ‘पागी’ के मार्फत यह बताने का प्रयास किया कि नई पीढ़ी के रचनाकार अपनी जड़ों की कितनी गहराई से पड़ताल करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। ग्रामीण परिवेश में पांवों के निशान खोजने वाले व्‍यक्ति और उसकी खोई हुई प्रेमिका की अद्भुत प्रेमकथा ने सबको रोमांचित कर दिया। इसके बाद लक्ष्‍मी शर्मा ने ‘मोक्ष’ कहानी का पाठ किया। एक साधारण अनपढ़ ग्रामीण स्‍त्री की दारुण संघर्ष गाथा ने सबकी आंखें नम कर दीं। युवा कवि कथाकार दुष्‍यंत ने ‘उल्‍टी वाकी धार’ कहानी में दो शहरी प्रेमियों के बीच तनाव और अंतर्द्वंद्व को बहुत खूबसूरती से रचते हुए युवती के नैतिक साहस को रेखांकित किया। चर्चित कथाकार चरण सिंह पथिक ने डांग क्षेत्र में होने वाली पदयात्राओं की प्रतियोगिता के बहाने ग्रामीण समाज की कड़वी सच्‍चाइयों से ‘यात्रा’ कहानी के माध्‍यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। अध्‍यक्षता करते हुए नंद भारद्वाज ने कहा कि आज पढ़ी गई कहानियों से राजस्‍थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है कि वह कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। अपने परिवेश की गहरी समझ और प्रेमचंद के सरोकारों से लैस यह पीढ़ी निश्चित रूप से आगे जाएगी और प्रदेश की जनभावनाओं को अपनी रचनाओं में अभिव्‍यक्‍त करेगी। इसके बाद समापन में सीमा विजय ने प्रेमचंद की मार्मिक कहानी ‘बूढ़ी काकी’ का अत्‍यंत प्रभावशाली ढंग से पाठ किया तो श्रोताओं ने भरपूर तालियां बजाकर उनका स्‍वागत किया। अंत में प्रलेस के उपाध्‍यक्ष फारुक आफरीदी ने जवाहर कला केंद्र, दूरदर्शन, सहभागी रचनाकारों और समारोह में सहयोग करने वाले सभी साहित्‍य प्रेमी मित्रों और श्रोता-दर्शकों का आभार जताया।

प्रस्‍तुति : फारुक आफरीदी

Thursday, August 6, 2009

जयपुर में जबलपुर के प्रो॰ सी बी श्रीवास्तव 'विदग्ध' सम्मानित


राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के ७वें वार्षिक अधिवेशन में एस एफ एस सभागार जयपुर, राजस्थान में 'वतन को नमन' के रचियता वरिष्ठ कवि प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध", जबलपुर, मण्डला को शाल श्रीफल, पत्रम-पुष्पम, स्मृति चिन्ह से उनके श्रेष्ठ रचना कर्म के लिये भव्य कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि प्रो.सी.बी श्रीवास्तव विदग्ध ने महाकवि कालिदास कृत मेघदूत व रघुवंश का हिन्दी गेय छंद बद्ध श्लोकशः पद्यानुवाद किया है। उनके द्वारा रचित गीत संग्रह 'अनुगुंजन', 'ईशाराधन', 'आदर्श भाषण कला' व शिक्षण संबंधी पुस्तकें व्यापक लोकप्रिय रही हैं। हिन्द युग्म की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी उनकी पुस्तकें पुरस्कार स्वरूप वितरित की जा चुकी हैं।