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Monday, August 24, 2009

गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्बारा यादगार कार्यक्रम

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला


(भाषण देतीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित)
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महात्मा गाँधी मानव सभ्यता के लिए युग पुरुष थे. 'हिंदी अकादमी' द्वारा नव-प्रकाशित गाँधी की दो विश्वप्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' और 'सत्य के प्रयोग' पर एक यादगार कार्यक्रम दि. 18 अगस्त 2009 को दिल्ली के 'त्रिवेणी सभागार (मंडी हाउस)' में आयोजित हुआ जिसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा दोनों पुस्तकों के विमोचन के बाद अलग अलग सत्रों में इन पुस्तकों पर चर्चा हुई. गाँधी सन् 1892 में किसी मुवक्किल का मुकद्दमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए तो फिर पूरे दो दशक तक वहां के भारतवासियों की समस्याओं पर संघर्ष किया जिस ने उन्हें महात्मा बना दिया. महात्मा गाँधी की शख्सियत को यदि हम केवल स्वाधीनता संघर्ष तक सीमित रखेंगे, तो उनके व्यक्तित्व के कई अनमोल आयामों को जानने से हम वंचित रह जाएंगे. गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में ही 'हड़ताल' व 'सत्याग्रह' का आविष्कार किया. वहीं जीवन की पहली गिरफ्तारी भी हुई और सन् 1909 में जब सत्याग्रह के दौरान ही वे ब्रिटिश सरकार से बातचीत करने लन्दन गए तो लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में एक बेहद विवादस्पद पुस्तक भी लिखी, जिस का नाम था 'हिंद स्वराज'. इस पुस्तक ने विश्व के सभी विचारकों की चेतनाओं को झकझोर कर रख दिया. गाँधी इस पुस्तक में ब्रिटिश तथा पूरी पश्चिमी सभ्यता को नकार कर उसे चुनौती देते हैं कि ब्रिटिश की सभ्यता केवल मशीन पर टिकी हुई है, जो केवल शोषण की प्रतीक है. गाँधी ब्रिटिश के हर वैज्ञानिक चिह्न यथा रेलगाड़ी व उद्योग पर प्रश्न चिह्न लगा कर इस पवित्र देश की ऋषियों मुनियों की परंपरा को स्थापित करते हैं. गाँधी तो यहाँ तक कहते हैं कि यह रेलगाड़ी क्या है? इस से दुष्टता फैलती है. एक जगह के बुरे लोग दूसरी जगह जाते हैं. पूरी पुस्तक एक 'पाठक' और 'संपादक' के बीच हो रहे वार्तालाप के रूप में गुजराती में लिखी गई थी जिस का उनके सचिव महादेवन देसाई, जिसे वे अपना पांचवां पुत्र मानते थे, ने अनुवाद किया था. देश और विश्व के प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न पर अपनी जिज्ञासा 'पाठक' के रूप में प्रस्तुत करने वाले गाँधी के ही एक बर्मा स्थित मित्र प्राणजीवन मेहता हैं. जब 'पाठक' के रूप में प्राणजीवन मेहता पूछते हैं कि रेलगाड़ी से तो एक स्टेशन के साधू भी दूसरे स्टेशन जा सकते हैं, तब गाँधी कहते हैं कि अच्छा आदमी जानता है, कि अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है. बुरी बात तेज़ी से फ़ैल सकती है. जब 'हिंद स्वराज' छपी तो अधिकांश लोग बौखला भी गए. यहाँ तक कि गाँधी के राजनैतिक गुरु, गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधी से कहा कि यही पुस्तक आप कुछ वर्ष बाद पढ़ियेगा. तब आप को लगेगा कि यह पुस्तक किसी मूर्ख व्यक्ति ने लिखी है. इस पुस्तक को यदि हम सतही दृष्टि से देखेंगे तो सहज ही लगेगा कि पुस्तक सचमुच बहुत अव्यवहारिक है, क्यों कि गाँधी तो इस में डॉक्टर और वकील के पेशों तक को नकारते हैं. पर गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' को यदि हम मूर्त रूप से ही देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. पर पुस्तक अपनी आत्मा के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता के बेहद कड़वे सत्यों से साक्षात्कार करवाती है. आज हवाई जहाज़ है तो विश्व भर के आतंकवादी एक देश से दूसरे देश बेखौफ आते जाते हैं, जब कि अध्यात्मिक शक्तियों का तो अकाल ही है, वे एक देश से दूसरे देश जाएं तो क्योंकर!..

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आगमन पर उन का हार्दिक स्वागत हुआ व हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने स्वागत भाषण किया. मंच पर शीला दीक्षित के साथ प्रसिद्ध पत्रकार प्रभास जोशी भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व प्रभास जोशी की उपस्थिति में अकादमी सचिव रविन्द्र श्रीवास्तव ने 'हिंद स्वराज' के सभ्यता सम्बन्धी कई अंश पढ़ कर सुनाए. अशोक चक्रधर के भाषण के पश्चात 'हिंद स्वराज' व गाँधी द्वारा 1925 में रचित 'मेरे सत्य प्रयोग' पुस्तकों का विमोचन हुआ. गाँधी सत्य व अहिंसा के ईशदूत थे. 'सत्य के प्रयोग' उन की आत्मकथा है जिस में बचपन में स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान 'kettle' शब्द के स्पेलिंग न आने पर अध्यापक द्वारा इशारे से दिए गए दूसरे विद्यार्थी की नक़ल करने के आदेश की अवमानना व किशोरावस्था में सिगरेट पीने या वेश्यागमन से ले कर उस समय तक की सभी झलकियाँ हैं, जब गाँधी असहयोग आंदोलन पार कर के अपनी आयु के 55 वर्ष भी पार कर चुके थे.

शीला दीक्षित ने अकादमी को इन पुस्तकों के प्रकाशन पर बधाई देते हुए कहा कि 'हिंद स्वराज' पुस्तक की रचना को अब पूरे 100 साल हो जाएंगे. इस अवसर पर उन्होंने आशा व्यक्त की कि 'हिंद स्वराज' को कम से कम दिल्ली के सभी स्कूलों में पहुंचना चाहिए. इस पर सभागार में ख़ुशी के मारे तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. गाँधी के सादगी भरे जीवन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सादगी भरा जीवन एक प्रकार से बहुत मंहगा पड़ता है. उस में सब से ज्यादा ज़रुरत बहुत कड़े अनुशासन की होती है. गाँधी के आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि जब 'नमक सत्याग्रह' में उन्होंने एक मुट्ठी भर नमक अपने हाथ में ले कर ब्रिटिश की सत्ता को चुनौती दी तो पूरा विश्व दहल गया...

अनेक व्यस्तताओं व किसी अन्य सम्मलेन में उपस्थित होने की अनिवार्यता के कारण शीला दीक्षित अपने भाषण के तुंरत बाद प्रस्थान कर गई और इस विमोचन सत्र की बागडोर प्रभास जोशी ने संभाली. प्रभास जोशी ने अपने भाषण में कहा कि गाँधी बेहद परिश्रमी व्यक्ति थे. जब लिखते लिखते उन का दायाँ हाथ थक जाता था, तब वे बाएँ हाथ से लिखते थे. उन्होंने सभागार में उपस्थित 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' निदेशिका वर्षा दास की ओर संकेत कर के कहा कि उन्होंने वर्षा जी से कह कर गाँधी जी द्वारा उल्टे हाथ (बाएँ) से लिखते समय का एक चित्र बनवाया था. स्पष्ट है कि गाँधी किसी भी परिस्थिति में अपना काम रुकने नहीं देते थे. प्रभास जोशी ने बताया कि गाँधी ने 'हिंद स्वराज' दि. 13 नवम्बर 1909 से ले कर 22 नवम्बर 1909 तक (केवल 10 दिन में ही) 'किल्दोनन' जहाज़ में लिख डाली.

विमोचन सत्र के बाद 'हिंदी अकादमी' की तरफ से स्वादिष्ट भोजन का आयोजन जिस के बाद दूसरे सत्र में 'हिंद स्वराज' पर चर्चा हुई. इस सत्र की अध्यक्षता जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. मुशीरुल हसन ने की तथा इस में वर्षा दास, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, प्रो. अशुम गुप्ता व श्री राजीव वोहरा ने भाग लिया. प्रो. मुशीरुल हसन ने 'हिंद स्वराज' की आज के इस दौर में प्रासंगिकता पर अप्रत्यक्ष में सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक की पढ़ने की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त नहीं होती. जैसे मार्क्सवाद या साम्यवाद आज पूरी दुनिया से यदि समाप्त हो गया है तो भी 'Manifesto of Communism' या कार्ल मार्क्स खुद भी क्या अप्रासंगिक हो गए? इसलिए आज 'हिंद स्वराज' को एक manifesto की तरह पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश की गुलामी में ही गाँधी हुए, टैगोर हुए और ब्रिटिश की गुलामी के बावजूद देश में (जनता के लिए महापुरुषों के) 'उपदेश' की कमी नहीं थी. वर्षा दास ने कहा कि 'स्वराज' शब्द का उपयोग सब से पहले दादा भाई नौरोजी ने किया था. इसके बाद जब तिलक ने 'स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा दिया तो 'स्वराज' शब्द को व्यापक अर्थ मिला. गाँधी ने 'स्वराज' शब्द को एक गुणात्मक रूप दिया. वर्षा दास ने कहा कि 'हिंद स्वराज' हमारे लिए एक मूल्यवान धरोहर है. 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' प्रतिवर्ष गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को गाँधी सम्बंधित चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित करता रहा है. गुजरती में क्यों कि उन्होंने 'हिंद स्वराज' बार बार पढ़ी है, अतः उनके मन में यह कल्पना है कि इस पुस्तक में गाँधी द्वारा कही हुई बातों पर वे चित्र बनवाएं और गाँधी जन्मदिवस पर उन्हें प्रर्दशित करें. 'हिंद स्वराज' से गाँधी के ही किसी संवाद का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी यह मानते थे कि 'स्वराज' का अर्थ 'स्व' का राज नहीं है, वरन् 'स्व' पर राज है. (स्पष्ट है कि इस प्रकार के गूढ़तम अर्थों के कारण ही कई विद्वान गाँधी की शिक्षाओं की तुलना 'श्रीमद भगवद गीता' व वेदों की शिक्षाओं से करते हैं).

इस सत्र के बाद फिर चाय का अंतराल और तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्य समालोचक नामवर सिंह ने की. इस सत्र में अजित कुमार, प्रो. आनंद कुमार और रामचंद्र राही ने भाग लिया. प्रो. अजित कुमार ने अपनी एक सशक्त कविता प्रस्तुत की जिस की व्यंग्य पंक्तियों ने सब पर बेहद तीखा प्रभाव छोड़ा. कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं:

गठजोड़/ होते हैं जिस तरह/ खिचड़ी के चार यार/ दही पापड़ घी आचार/ कुछ कुछ उसी तरह/ गाँधी ने अपनी आँधी से अपनी छड़ी, लाठी, चप्पल/ और लंगोटी भी बांधी/ इस अनोखे गठजोड़ को कभी न कभी बिखरना तो था ही...
...हर साल/अक्तूबर के दूसरे दिन/ मीठी मधुर लोरी सुना कर/ उसकी नींद /हम गहरी बनाते हैं/ ताकि उठ कर कहीं अपनी ऐनक न मांग ले...


अजित कुमार ने 'सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा' की समानता वेदों पुराणों से की. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान का 'जन मन को प्रतिध्वनित करने वाला' एक बेहद प्यारा लोकगीत भी सुनाया:

'काहे पे आवें वीर जवाहर, काहे पे गाँधी महाराज?
काहे पे आवे भारत माता, काहे पे आवे सुराज?


इस का उत्तर था:

घोड़े पे आवें वीर जवाहर, पैदल गाँधी महाराज,
हाथी पे आवे भारत माता, डोली पे आवे सुराज.


नामवर सिंह ने अपने विस्तृत अध्यक्षीय भाषण में गाँधी द्वारा बताया गया धर्म और राजनीती का समीकरण स्पष्ट किया. आज धर्म टुच्ची राजनीति का साधन बन गया है, इसलिए अधिकांश विद्वान राजनीति और धर्म को विलग रखने की शिक्षा देते हैं. पर गाँधी धर्म के सही परिप्रेक्ष्य में कहते हैं -

'जो मनुष्य कहता है कि धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह धर्म को नहीं जानता.'

स्पष्ट है कि गाँधी द्वारा उपयुक्त 'धर्म' शब्द 'मानवीयता' शब्द का पर्यायवाची है.
अंत में अशोक चक्रधर ने अध्यक्ष नामवर सिंह व सभागार को विश्वास दिलाया कि हिंदी अकादमी आज के आधुनिक उपकरण इन्टरनेट का पूर्ण सदुपयोग कर के विद्यार्थियों के ई -मेल एकत्रित करेगी और उन से संपर्क स्थापित कर के गाँधी की पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा देगी.

त्रिवेणी सभागार में बिताया लगभग पूरा दिन उपस्थित विचारशील लोगों के लिए 'गाँधी दिवस' सा था. तीसरे सत्र के बाद फिर जलपान और फिर दिन भर के कार्यक्रम की संपन्नता बेहद मधुर तरीके से हुई. शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध हस्ती मीता पंडित की मधुर स्वरलहरियों से सभागार भर उठा. गाँधी के सर्वाधिक प्रिय भजन:

वैष्णव जन ते तेणे कहिये
जो पीर पराई जाने रे


और

पायो री मैं तो राम रतन धन पायो...

और

रघुपति राघव रजा राम,
पतित पावन सीता राम,
ईश्वर अल्ला तेरे नाम
सब को सन्मति दे भगवन ...