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Tuesday, October 5, 2010

ऑस्ट्रेलिया में हिंदी गौरव के पहले मुद्रित संस्करण का लोकार्पण



2 अक्टूबर । सिडनी
2 अक्टूबर को गाँधी जयंती एवं लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर सिडनी में हिंदी के क्षेत्र में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया| हिंदी गौरव ऑनलाइन समाचार-पत्र की सफलता के पश्चात सिडनी गुजरात भवन, सिडनी में करीब 250 लोगों की उपस्थिति में हिंदी गौरव के प्रथम प्रिंट संस्करण का विमोचन भारत के कौंसुल जनरल सिडनी माननीय अमित दास गुप्ता के कर कमलों से हुआ| इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों में पेरामेटा से सांसद माननीया तान्या गेडियल डिप्टी स्पीकर एन एस डब्लू संसद, माननीय सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व मंत्री), माननीय सांसद लौरी फर्गुसन आदि थे|

कार्यक्रम का शुभारम्भ सिडनी की प्रतिष्ठित रंगमच अभिनेत्री ऐश्वर्या निधि ने सभी उपस्थित गणमान्य अतिथियों का स्वागत करते हुए किया| 2 अक्टूबर को गाँधी जी एवं लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिवस पर दोनों को याद करते हुए उनके जीवन एवं उनके द्वारा किये गए योगदान पर प्रकाश डाला| ऐश्वर्या निधि इस कार्यक्रम की संचालिका थी जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कराया|

सबसे पहले हिंदी गौरव की सरंक्षक डॉ शैलजा चतुर्वेदी ने बोलते हुए हिंदी गौरव की ओर से सभी उपस्थितजनों को स्वागत किया एवं इस शुभ अवसर पर सभी के द्वारा अपना अमूल्य सहयोग देने के लिए सभी का कोटि-कोटि धन्यवाद दिया| आपने सिडनी में किये जा रहे विभिन्न संस्थाओं एवं व्यक्तियों का उल्लेख करते हुए सिडनी में हिंदी की यात्रा पर प्रकाश डाला| आपने हिंदी समाज के द्वारा हिंदी के क्षेत्र में किये गए कार्यों का उल्लेख किया| डॉ शैलजा चतुर्वेदी जी ने हिंदी गौरव ऑनलाइन समाचार-पत्र की सफलता का उल्लेख करते हुए इसको प्रिंट मीडिया में लाने के लिए सभी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया| आपने हिंदी गौरव को हर आदमी तक पहुँचने के लक्ष्य को बताते हुए सिडनी में भारतीय समुदाय में हिंदी के महत्व को भी उजागार किया| आपने कुछ बेहद उम्दा कवितायें लोगों को सुनाई|

विशिष्ट अतिथि तान्या गेडियल ने वक्ता के रूप में महात्मा गाँधी जी के द्वारा किये गए कार्यों की सराहना की एवं उनके अहिंसा के सिद्धांत के आज के परिवेश में उल्लेख किया| आपने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का भी उल्लेख किया| आपने हिंदी गौरव की बढ़ती लोकप्रियता को सराहा, एवं हिंदी गौरव की टीम को विमोचन के अवसर पर हार्दिक बधाई दी|

सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व मंत्री) एवं सांसद लौरी फर्गुसन ने इस कार्यक्रम में दो अक्तूबर के महत्व पर प्रकाश डालते हुए गाँधी एवं लाल बहादुर शास्त्री के जीवन का उल्लेख किया| हिंदी गौरव के शुभारम्भ पर बधाई दी|

मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए भारत के कौंसुल जनरल सिडनी माननीय अमित दास गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि बापू सारी दुनिया में शांति चाहते थे। उन्होंने महात्माजी के संदेशों को विस्तार से समझाया और कहा कि उनकी मृत्यु के इतने लंबे समय बाद भी उनके विचार सारी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं। आपने लाल बहादुर शास्त्री के जीवन पर भी प्रकाश डाला| आपने हिंदी गौरव की टीम को हिंदी को ऑस्ट्रेलिया में लोकप्रिय बनाने के लिए प्रेरित किया एवं समाज में समाचार पत्र के महत्व को बताया की समाचार-पत्र समाज का आईना होता है| आपने हिंदी गौरव की टीम को सहयोग देने का आश्वासन दिया|

माननीय अमित दास गुप्ता ने अपने संबोधन के बाद हिंदी गौरव के प्रथम प्रिंट संस्करण का विमोचन किया जिसमें सांसद माननीया तान्या गेडियल डिप्टी स्पीकर एन एस डब्लू संसद, माननीय सांसद फिलिप रुड़क(पूर्व मंत्री), माननीय सांसद लौरी फर्गुसन एवं डॉ शैलजा चतुर्वेदी ने सहयोग किया|

हिंदी गौरव के विमोचन के बाद कई रंगारंग कार्यक्रम अभिनय स्कूल ऑफ़ फरफोर्मिंग आर्ट्स के सौजन्य से प्रस्तुत किये गए| इन रंगारंग कार्यक्रमों में मनमोहक नृत्य, भांगड़ा एवं देशभक्ति एवं उम्दा गायन सम्मिलित थे| इस अवसर पर दो बच्चियों तान्या एवं पेरिस द्वारा जय हो पर किया गया नृत्य ने सभी का मन मोह लिया, इसके बाद निष्ठा कुलश्रेष्ठ ने एक मिश्रित गाने पर नृत्य किया| जैसा की अधिकतर भांगड़ा के बिना कार्यक्रम अधूरा होता हैं इसमें भी एक बेहद आर्कषक भांगड़ा जसदेव भाटिया द्वारा प्रस्तुत किया| लता, राजेंद्र बालस्कर एवं भैरव वर्मा द्वारा मनमोहक गायन प्रस्तुत किये गए| नेहा दबे ने बहुत खूबसूरत नृत्य पेश किया आप सिडनी की एक होनहार डांसर है|

सिडनी में हिंदी के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कवि एवं लेखक अब्बास रज़ा अल्वी ने हिंदी गौरव के ओर से सभी अतिथियों एवं गणमान्य व्यक्तियों का आभार व्यक्त किया|

कार्यक्रम के समापन पर हिंदी गौरव के मुख्य संपादक अनुज कुलश्रेष्ठ ने हिंदी गौरव को सफल बनाने के लिए सभी का धन्यबाद दिया ओर इस अवसर पर हिंदी गौरव से जुड़े हुए सभी सदस्यों का उपस्थितजनों से परिचय कराया| हिंदी गौरव के तकनीकी प्रमुख हेमेन्द्र नेगी हैं| यह कार्यक्रम सिडनी गुजरात भवन में प्रथम कार्यक्रम था, इस भवन का शुभारम्भ भी हिंदी गौरव के विमोचन के साथ हुआ| यह भवन ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय का पहला भवन हैं|

चित्र माला
हिंदी गौरव के प्रथम प्रिंट संस्करण का विमोचन भाग 1
हिंदी गौरव के प्रथम प्रिंट संस्करण का विमोचन भाग 2
हिंदी गौरव के प्रथम प्रिंट संस्करण का विमोचन भाग 3

Sunday, October 3, 2010

भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध कविता की प्राथमिक शर्तें हैं - प्रो. नित्यानंद तिवारी

सत्रः 3 । दिन- प्रथम । केदारनाथ अग्रवाल पर समग्र


खगेन्द्र ठाकुर

1 अक्टूबर । वर्धा
2-3 अक्तूबर 2010 को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि., वर्धा में आयोजित संगोष्ठी “बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ” के पहले दिन तीसरे सत्र के रूप में कवि केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित परिचर्चा का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने एवं संचालन अरुणेश शुक्ला द्वारा किया गया।

प्रथम वक्ता के रूप में प्रो. खगेन्द्र ठाकुर ने केदार की कविताओं की आलोचना के सन्दर्भ की चर्चा में कलावादी आलोचना की मीमांसा करते हुए कालिदास, भारवि, माघ व दण्डी के साहित्य के टीकाकारों का उल्लेख किया। पिछड़े, वंचित व उपेक्षित वर्ग के प्रति केदार की कविता की पक्षधरता, सामाजिकता व उनकी राजनीतिपरक कविताओं के अनेकानेक उदाहरणों से उन्होंने अपनी बात पुष्ट की।

प्रो. अजय तिवारी ने प्रगतिशील आलोचना पर पक्षपात के आरोपों का खण्डन करते हुए अज्ञेय व केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित मौलिक पुस्तकों का प्रश्न उठाया। साथ ही रामविलास शर्मा द्वारा दी गई प्रगतिशीलता की ‘जनता की तरफ़दारी’ की परिभाषा को रेखांकित किया। स्त्री की अस्मिता का प्रश्न, परम्परा, परंपरा के पलायनवादी पक्ष आदि को अज्ञेय, नागार्जुन, केदार आदि के सन्दर्भ में उन्होंने व्याख्यायित किया और कहा कि इतिहास में जिसकी जो भूमिका व स्थान है, उसे वही दिया जाना चाहिए। उस से कम देना भी अन्याय होगा व उस से अधिक देना भी अन्याय। साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में इस यथार्थ का बोध बहुत आवश्यक है। प्रगतिशील आलोचना पर लगाए जाते आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि जिनमें यथोचित बल नहीं वे पंजा लड़ाने क्यों चले। अजय तिवारी ने जोड़ा कि नागार्जुन, केदार व शमशेर प्रतिबद्धता व संघर्ष के कवि हैं। जिस कवि में परम्परा अमरता का रूप पाती है, वही कवि अमर होता है। केदार इस अर्थ में अद्वितीय हैं।


श्रोता

“तद्‍भव” के सम्पादक अखिलेश का वक्तव्य केदार की कविताओं के स्त्री पक्ष, स्वकीय प्रेम, स्त्रीचेतना को आज इक्कीसवीं सदी के स्त्री विमर्श के समक्ष तुलनात्मक दृष्टि से मूल्यांकित करने से प्रारम्भ हुआ। विवाह और परिवार, संयुक्त परिवार का परिवेश, सौभाग्य के चिह्न आदि सन्दर्भों व उनके द्वन्द्व पर केन्द्रित उनके आलेख में केदार जी की कई बहुत सुन्दर कविताओं को आज के परिप्रेक्ष्य में पुनर्मूल्यांकित किया गया। केवल देह के शोषण के विरुद्ध या उसी की मुक्ति के अर्थ-मात्र में नहीं अपितु समग्र स्त्रीचेतना और स्त्री मुक्ति के रचनाकार के रूप में केदार के काव्य के उक्त पक्ष को उन्होंने सुचिन्तित ढंग से उद्‍घाटित किया।


प्रो. नित्यानंद तिवारी

अध्यक्षीय उद्‍बोधन में प्रो. नित्यानन्द तिवारी ने अज्ञेय से सम्बन्धित कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्मरण सुनाते हुए कई ऐतिहासिक तथ्यों का उद्‍घाटन किया। केदार व नागार्जुन के जनकवि होने व जनकवि होने की पक्षधरता के लिए उठाए खतरों का उल्लेख भी उन्होंने किया। उन्होंने कहा कि कविता यदि कवि की कार्यशाला में जाकर रची जाती है व एक रचनात्मक उत्पाद बनती है तो आप जनकवि नहीं हो सकते। भावबोध की अपेक्षा मनुष्यबोध व जनबोध इसकी प्राथमिक शर्तें हैं। जिसमें जितना लोकपक्ष अधिक होगा, वह उतने अर्थों में जनकवि होने की ओर होता है, इन अर्थों में अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल व नागार्जुन की कविताओं को देखा जाए तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र को संक्षेप में समेट देना पड़ा। रात्रि में नागार्जुन की कविताओं की नाट्यप्रस्तुति के अत्यन्त्त रोचक व भावन कार्यक्रम के उत्साह व तैयारी को ध्यान में रखते हुए सत्र में होते विलम्ब को टालने की दॄष्टि से केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित सत्र के कुछ अन्य वक्ताओं को आगामी दिन के सत्रों में सम्मिलित करने का निर्णय लेना पड़ा।

2 अक्तूबर के अन्तिम कार्यक्रम के रूप में नागार्जुन की कविताओं के रोमांचक नाट्यमंचन को खचाखच भरे सभागार ने खूब सराहा। देर रात तक चले 2 अक्तूबर के समस्त कार्यक्रमों में दर्शकों, श्रोताओं व अध्येताओं का उत्साह देखते ही बनता था। वैचारिक सत्रों में श्रोताओं की भारी उपस्थिति ने विश्वविद्यालय की गरिमा बढ़ाई। मध्य रात्रि तक खुले प्रांगण में लेखकों की आत्मीय बैठक ने इस द्विदिवसीय संगोष्ठी को पारिवारिकता का-सा संस्पर्श प्रदान किया।

रिपोर्ट- डॉ. कविता वाचक्नवी

Saturday, October 2, 2010

अज्ञेय स्वयं चुप क्यों रहे


द्वितीय सत्र में मंचासीन- (दाएँ से) राजकिशोर, कृपाशंकर चौबे, सुरेंद्र वर्मा, गंगा प्रसाद विमल, बलराम प्रसाद त्रिपाठी, शम्भू गुप्त

1 अक्टूबर । वर्धा
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. में 2 व 3 अक्टूबर 2010 को आयोजित संगोष्ठी (बीसवीं सदी का अर्थ और जन्मशती का सन्दर्भ) के उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्रथम सत्र दोपहर 3 बजे से "अज्ञेय पर एकाग्र" के रूप में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगा प्रसाद विमल ने व संचालन डॉ शम्भु गुप्त ने किया।

पटना से आए प्रो. बलराम तिवारी ने अज्ञेय पर केन्द्रित अपने संबोधन में जिन तथ्यों को रेखांकित किया, वे हैं- "अज्ञेय जिस रोमांटिक प्रवृत्ति के लिए बदनाम हैं, वह वस्तुतः उन में है ही नहीं उलटे वे तो एंटी रोमांटिक प्रवृत्ति से ग्रस्त हैं। अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने कुछ उद्धरण भी दिए
- "यथास्थिति के प्रति विद्रोह ही अज्ञेय को अमर बनाता है।"
- "हमारे समाज में भाई बहन सम्बन्ध को लेकर जो टैबूज़ हैं शेखर भी उन टैबूज़ को तोड़ नहीं पाते..यह नैतिकतामूलक ग्रंथि का ही अवबोध है"
- "अगर शिल्प व शास्त्र पर मार्क्सवादी विचारक ध्यान देते हैं तो यह अज्ञेय की देन है"

आगामी वक्ता के रूप में युवा कथाकार शशिभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि लेखक अपने कृतित्व द्वारा समाज को कितना आगे ले जाने का साहस रखता है यह उस लेखक की प्रतिबद्धता से ही प्रकट होता है। प्रश्न यह उठता है कि अज्ञेय अपनी प्रतिबद्धता पर अंतिम समय तक स्थिर क्यों नहीं रह पाए। ओम थानवी को उद्‍धृत करते हुए शशि ने अज्ञेय पर हर समय लगाए जाते आरोपों का उल्लेख किया व एक पुत्र के पिता होने के आरोप को भी उद्‍धृत करते हुए समाज व आलोचना की विसंगतियों पर प्रहार किए। वक्तव्य के अंत में शशि ने खरे शब्दों में कहा कि सीमाएँ अज्ञेय में हैं, उस मार्क्सवादी आलोचना में भी हैं, जो अज्ञेय को देखती हैं।

आगामी वक्तव्य मनोज कुमार पाण्डेय ने दिया। जमशेदपुर से पधारीं विजय शर्मा ने प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट किया कि मैं अज्ञेय को सबसे महान रचनाकार के रूप में स्थापित करने के लिए नहीं खडी हूँ- "अज्ञेय कान्तिकारी थे, जो बहुत प्रभावित करने वाला तथ्य था किन्तु स्वयं अज्ञेय ने इस पर बहुत चुप्पी बनाए रखी है। एक समकालीन लेखक के सद्य : प्रकाशित लेख में उनकी क्रांतिकारिता के अनेक विस्तार जानकर अज्ञेय पर बहुत गुस्सा आया कि वे स्वयं चुप क्यों रहे।"

गाँधीवादी चिन्तक राजकिशोर ने अज्ञेय की पत्रकारिता वाले पक्ष पर अब तक हिन्दी में किसी महत्वपूर्ण कार्य के न होने पर अत्यंत खेद प्रकट किया। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से चुटकी लेते हुए कहा कि हमारे साहित्य समाज में पत्रकारिता एक ओबीसी विधा है। दूसरी ओर इस पर क्षोभ जताया कि हमारे पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से स्वयं जाकर पूछ लीजिए उनमें से बहुमत अज्ञेय को जानता तक न होगा। स्थिति इतनी सोचनीय है कि कोई अज्ञेय के पत्रकारितावंश को आगे बढ़ाने वाला तक नहीं है।
-"अज्ञेय जी की विचारधारा में अन्तर्विरोध सदा बने रहे किन्तु ये अन्तर्विरोध विचारधारा के अभाव में नहीं थे".

अज्ञेय की पत्रकारिता की भाषा पर केन्द्रित अपने सम्बोधन में कृपाशंकर चौबे ने राजकिशोर के वक्तव्य के कई तथ्यों का विरोध करते हुए पत्रकारिता के कुछ स्तम्भों के उल्लेख के साथ अज्ञेय की परम्परा के जीवित रहने के प्रमाण दिए। भाषा व लिपि सम्बन्धी कई नियमों को उन्होंने क्रमवार दोहराया।

अन्तिम वक्ता के रूप में प्रो. सुरेन्द्र वर्मा की उपस्थिति ने सभा को गरिमा प्रदान की।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में गंगाप्रसाद विमल ने कहा कि अज्ञेय के समक्ष हिन्दी आलोचना बौनी रही,आलोचना के पास वे औजार नहीं थे जो अज्ञेय की रचनाधर्मिता को माप सकती। अज्ञेय अपने समय के सबसे विरल व प्रतिभाशाली रचनाकार थे. हिन्दी आलोचना उनके बिना आगे बढ़ ही नहीं सकती। अज्ञेय ने पश्चिम के समक्ष भारतीय मनीषा व भाषा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिलाया।

धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र समाप्त हुआ।

रिपोर्ट- डॉ॰ कविता वाचक्नवी

फादर कामिल बुल्के की प्रतिमा का अनावरण

2 अक्टूबर । वर्धा

विश्व प्रसिद्ध हिंदीसेवी व रामकथा के विशेषज्ञ और शब्दकोश-निर्माता फादर कामिल बुल्के के जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी प्रतिमा का आज यहाँ अनावरण किया गया तथा उनके नाम पर एक अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्‍घाटन भी किया गया। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी वि. वि. के कुलाधिपति एवं प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह ने वि.वि. परिसर में निर्मित फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास का उद्‍घाटन किया और उनकी आवक्ष प्रतिमा का भी अनावरण किया।

1 सितम्बर 1909 को बेल्जियम के रामस्कापले गाँव में जन्मे कामिल बुल्के ने इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद कोलकाता से संस्कृत में एम ए किया तथा इलाहाबाद से हिन्दी में एम ए किया और रामकथा उत्पत्ति एवं विकास पर इलाहाबाद वि. वि .से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की और राँची में रहकर अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी की सेवा में लगा दिया। 1974 में पद्मभूषण से अलंकृत श्री बुल्के भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में रामकथा के विषय-विशेषज्ञ के रूप में जाने गए और कामिल बुल्के हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश निर्माता के रूप में वे अमर हो गए।

प्रो. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि यीशु के महान उपासक होने के बावजूद कामिल बुल्के ने रामकथा की सारी परम्पराओं के ज़रिए भारत की आत्मा को पहचाना था, उनके लिए राम का अर्थ किसी मंदिर-मस्जिद का विध्वंस या निर्माण नहीं, अपितु ज्ञान की सृजनात्मकता को रेखांकित करना था। पूरे भारत में पहली बार कामिल बुल्के की स्मृति में किसी भवन का उद्‍घाटन किया गया।

कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय वि. वि. में विदेशों से आने वाले छात्रों के लिए छात्रावास का नामकरण कामिलबुल्के के नाम पर होना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

वि. वि. में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा का अनावरण पिछले दिनों सिक्किम के राज्यपाल महामहिम बीपी सिंह के द्वारा किया गया था। इसी क्रम में समाजसेविका सावित्रीबाई फुले व प्रसिद्ध कवि गोरख पांडे की प्रतिमा का भी अनावरण होना है। इसके अतिरिक्त मुशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर सड़कों का नामकरण भी किया गया और वि.वि. की पाँच पहाड़ियों में से दो का नामकरण गाँधी हिल तथा कबीर हिल के नाम से रखा गया।

फादर कामिल बुल्के के स्मृति समारोह में वि. वि. के कुलपति विभूति नारायण राय, प्रतिकुलपति प्रो. ए अरविन्दाक्षन, कुलसचिव कैलाश खामारे, प्रो. निर्मला जैन, प्रो. नित्यानंद तिवारी, प्रो. खगेन्द्र ठाकुर, प्रो. विजेंद्र नारायण सिंह, प्रो. सुरेन्द्र वर्मा, कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, प्रो.गंगाप्रसाद विमल, उषाकिरण खान, राजकिशोर, प्रो. सूरज पालीवाल, प्रो. आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, डॉ. शम्भू गुप्त व डॉ.अनिल पांडे सहित अन्य अनेकानेक गण्यमान्य लेखक विचारक व साहित्यकार उपस्थित थे।

रिपोर्ट- डॉ. कविता वाचक्नवी (अपराह्न 12‍ः45 बजे)

बीसवीं सदी हाशिए के लोगों की शताब्दी हैं- वी एन राय

2 अक्टूबर । वर्धा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी के चार महान कवियों की जन्मशती वर्ष के अवसर पर उनकी रचनाओं पर चर्चा के बहाने बीसवीं शताब्दी के अर्थ को समझने के लिए देश भर से बड़े साहित्यकारों को आमंत्रित कर सेमिनार का आयोजन किया है। गांधी जयन्ती के दिन प्रारम्भ हुए इस कार्यक्रम का उद्‌घाटन प्रसिद्ध समालोचक नामवर सिंह द्वारा किया गया। यह रिपोर्ट लिखते समय नामवर जी का उद्‍घाटन भाषण चल रहा था। वे नागार्जुन की चर्चा करते हुए उनका दोहा सुना रहे थे।

खड़ी हो गयी चाँपकर कंकालों की हूक।
नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक॥

जली ठूँठ पर बैठ कर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक
-----------------------------(नागार्जुन)

इससे पहले कुलपति वी.एन.राय ने अपने विषय प्रवर्तन भाषण में बीसवीं सदी को हाशिए के लोगों की शताब्दी बताया। स्त्रियों, दलितों और गुलाम देश के नागरिकों को मनुष्य के रूप में जीने का हक मिला। जन्मशती के चार कवि हैं- 1-सच्चिदानन्द हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ 2-शमशेर, 3- केदारनाथ अग्रवाल, 4-नागार्जुन ।

निर्मला जैन-
(12:05 अपराह्न)

प्रख्यात आलोचक निर्मला जैन ने अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया। समय की छाप हर एक रचना पर पड़ती है। इन चारों कवियों में बहुत मूल्य चिंता दिखती है।

शमशेर को कवियों का कवि क्यों कहा जाता है? इसकी व्याख्या जरूर होनी चाहिए।

“बात बोलेगी हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही” लेकिन शमशेर ने कविता के अलावा भी बहुत कुछ कहा है।

रिपोर्ट- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी (दोपहर 12‍ः10 बजे तक की कवरिंग)

Friday, October 1, 2010

अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर व फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍मशती पर 2 दिवसीय विमर्श कार्यक्रम कल से वर्धा में



1 अक्टूबर। वर्धा

म‍हात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में हिंदी के ऐतिहासिक महत्‍व के बड़े कवियों- अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर तथा उर्दू के विश्‍व विख्‍यात रचनाकार फैज़ अहमद फैज़ की जन्‍म शताब्‍दी तथा कवि रवीन्‍द्रनाथ टैगोर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर उनके साहित्‍य पर चिंतन मनन करने तथा उनके शताब्‍दीपरक मूल्‍यांकन के सन्दर्भ में गंभीर व दूरगामी विमर्श हेतु आयोजित शताब्‍दीसमारोह-शृंखला का उद्ट‍घाटन 2 अक्टूबर 2010 को हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार व विश्‍वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिं‍ह करेंगे।

कल पूर्वाह्न 11 बजे प्रारंभ होने वाले उद्ट‍घाटन सत्र की अध्‍यक्षता प्रो. निर्मला जैन करेंगी। कुलपति विभूति नारायण राय स्‍वागत वक्‍तव्‍य देंगे तथा प्रतिकुलपति प्रो.ए. अरविंदाक्षन धन्‍यवाद ज्ञापित करेंगे। साहित्‍य विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. सूरज पालीवाल समारोह का संचालन करेंगे। इस अवसर पर विश्‍वविद्यालय के संग्रहालय की वेबसाइट http://archive.hindivishwa.org, जिसकी संकल्‍पना स्‍वयं कुलपति विभूति नारायण राय ने तैयार की है, का लोकार्पण प्रो. नामवर सिंह द्वारा किया जाएगा।

कल 2 अक्टूबर सायं अज्ञेय एवं केदारनाथ अग्रवाल के साहि‍त्यिक अवदान पर दो संगोष्ठियाँ आयोजित होंगी, जिनकी अध्‍यक्षता क्रमश: प्रो.गंगा प्रसाद विमल एवं प्रो. नित्‍यानन्‍द तिवारी करेंगे तथा प्रो. शंभुनाथ एवं प्रो. खगेन्‍द्र ठाकुर मुख्‍य वक्‍ता होंगे। इन संगोष्ठियों में वक्‍ताओं के रूप में अखिलेश, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रो. बलराम तिवारी, राजकिशोर, प्रो. अजय तिवारी, बोधिसत्‍व, विमल कुमार, डॉ. कृपाशंकर चौबे, डॉ. रति सक्‍सेना, डॉ. कविता वाचक्नवी, डॉ. मीता शर्मा, विजय शर्मा, डॉ. कृपाशंकर चौबे, वसंत त्रिपाठी, नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक, डॉ. वीणा दाढे, मनोज कुमार पाण्‍डेय तथा शशिभूषण भागीदारी करेंगे। इन सत्रों का संचालन डॉ. शंभु गुप्‍त तथा प्रो. संतोष भदौरिया करेंगे।

03 अक्‍टूबर को आयोजित तीन सत्रों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह तथा फैज़ अहमद फैज़ के कृतित्‍व एवं शताब्‍दीपरक महत्‍व पर अलग-अलग चर्चा होगी।

प्रात: 10 बजे नागार्जुन पर एकाग्र संगोष्‍ठी की अध्‍यक्षता प्रो. खगेन्द्र ठाकुर करेंगे तथा प्रो. विजेन्‍द्र नारायण सिंह मुख्‍य वक्‍ता होंगे। प्रो. गोपेश्‍वर सिंह, डॉ. नीरज सिंह, डॉ. राम आह्लाद चौधरी, प्रो.के.के. सिंह तथा अवधेश मिश्र वक्‍ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। इस सत्र का संचालन प्रो. कृष्‍ण कुमार सिंह करेंगे। अपराह्न 12 बजे प्रारंभ होने वाले सत्र में शमशेर की रचना पर विमर्श होगा जिसकी अध्‍यक्षता अरूण कमल करेंगे। प्रो. रंजना अरगडे मुख्‍य वक्‍ता होंगी। उषा किरण खान, प्रो. माधव सोनटक्‍के, दिनेश कुमार शुक्‍ल, डॉ.विनोद तिवारी व डॉ. मीनाक्षी जोशी, वक्‍ता के रूप में उपस्थित रहेंगे। इस सत्र का संचालन राकेश मिश्र करेंगे।

अपराह्न 3 बजे फैज़ अहमद फैज़ पर केंद्रित सत्र का आगाज़ होगा जिसकी अध्‍यक्षता कवि आलोक धन्‍वा करेंगे। मुख्‍य वक्‍ता अली जावेद होंगे। दिनेश कुशवाह तथा कुछ अन्‍य साहित्‍यकार वक्‍ता होंगे। विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍या‍धिकारी राकेश सत्र का संचालन करेंगे।

2 अक्टूबर सायं गांधी जयंती के अवसर पर आयोजित शताब्‍दी श्रृंखला के दौरान सांस्‍कृतिक संध्‍या कार्यक्रम में आमं‍त्रित कवियों का कविता पाठ तथा नागार्जुन की कविताओं पर बसंत त्रिपाठी के निर्देशन में नागपुर के कलाकार अपनी नाट्य प्रस्‍तुति देंगे।

प्रस्तुति- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

Wednesday, March 24, 2010

मुझे केवल गालियाँ ही ज्यादा दी गयीं- राजेन्द्र यादव



मैंने डेढ़ सौ से अधिक कहानियाँ लिखी लेकिन पिछले पचीस सालों से उनपर कोई बात नहीं की जाती। मेरे ऊपर चार हज़ार से ज्यादा पन्ने लिखे गए लेकिन उनमे मुझे केवल गालियाँ ही ज्यादा दी गयीं। मेरी कहानियों पर कोई बात नहीं हुई। अधिक से अधिक मुझे स्त्री पुरूष संबंधों वाला एकांगी कहानीकार साबित किया गया। आज महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने मुझे फिर से कहानी की दुनिया में लौटने का मौका दिया है, जिसके लिए मैं उसका आभारी हूँ। आज मैं अपनी जानी-पहचानी दुनिया में लौट रहा हूँ।
यह बात राजेंद्र यादव ने विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अनहद कार्यक्रम में कही। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी चार छोटी कहानियों का पाठ किया। अभिनेत्री पायल नागपाल ने यादव जी की प्रसिद्ध कहानी टूटना के चुने हुए अंशों का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जानी-मानी गांधीवादी राधा भट्ट ने किया। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने भी राजेंद्र यादव कि रचनाशीलता से जुड़े अनेक सवाल पूछे। कार्यक्रम की शुरूआत में दिवंगत कथाकार मार्कंडेय को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी तथा शोक प्रस्ताव पढ़ा गया। संचालन आनन्द प्रकाश ने किया।

Monday, August 24, 2009

गाँधी की पुस्तकों पर 'हिंदी अकादमी' द्बारा यादगार कार्यक्रम

रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला


(भाषण देतीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित)
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महात्मा गाँधी मानव सभ्यता के लिए युग पुरुष थे. 'हिंदी अकादमी' द्वारा नव-प्रकाशित गाँधी की दो विश्वप्रसिद्ध पुस्तकों 'हिंद स्वराज' और 'सत्य के प्रयोग' पर एक यादगार कार्यक्रम दि. 18 अगस्त 2009 को दिल्ली के 'त्रिवेणी सभागार (मंडी हाउस)' में आयोजित हुआ जिसमें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित द्वारा दोनों पुस्तकों के विमोचन के बाद अलग अलग सत्रों में इन पुस्तकों पर चर्चा हुई. गाँधी सन् 1892 में किसी मुवक्किल का मुकद्दमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका गए तो फिर पूरे दो दशक तक वहां के भारतवासियों की समस्याओं पर संघर्ष किया जिस ने उन्हें महात्मा बना दिया. महात्मा गाँधी की शख्सियत को यदि हम केवल स्वाधीनता संघर्ष तक सीमित रखेंगे, तो उनके व्यक्तित्व के कई अनमोल आयामों को जानने से हम वंचित रह जाएंगे. गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में ही 'हड़ताल' व 'सत्याग्रह' का आविष्कार किया. वहीं जीवन की पहली गिरफ्तारी भी हुई और सन् 1909 में जब सत्याग्रह के दौरान ही वे ब्रिटिश सरकार से बातचीत करने लन्दन गए तो लौटते समय 'किल्दोनन' नामक जहाज़ में एक बेहद विवादस्पद पुस्तक भी लिखी, जिस का नाम था 'हिंद स्वराज'. इस पुस्तक ने विश्व के सभी विचारकों की चेतनाओं को झकझोर कर रख दिया. गाँधी इस पुस्तक में ब्रिटिश तथा पूरी पश्चिमी सभ्यता को नकार कर उसे चुनौती देते हैं कि ब्रिटिश की सभ्यता केवल मशीन पर टिकी हुई है, जो केवल शोषण की प्रतीक है. गाँधी ब्रिटिश के हर वैज्ञानिक चिह्न यथा रेलगाड़ी व उद्योग पर प्रश्न चिह्न लगा कर इस पवित्र देश की ऋषियों मुनियों की परंपरा को स्थापित करते हैं. गाँधी तो यहाँ तक कहते हैं कि यह रेलगाड़ी क्या है? इस से दुष्टता फैलती है. एक जगह के बुरे लोग दूसरी जगह जाते हैं. पूरी पुस्तक एक 'पाठक' और 'संपादक' के बीच हो रहे वार्तालाप के रूप में गुजराती में लिखी गई थी जिस का उनके सचिव महादेवन देसाई, जिसे वे अपना पांचवां पुत्र मानते थे, ने अनुवाद किया था. देश और विश्व के प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न पर अपनी जिज्ञासा 'पाठक' के रूप में प्रस्तुत करने वाले गाँधी के ही एक बर्मा स्थित मित्र प्राणजीवन मेहता हैं. जब 'पाठक' के रूप में प्राणजीवन मेहता पूछते हैं कि रेलगाड़ी से तो एक स्टेशन के साधू भी दूसरे स्टेशन जा सकते हैं, तब गाँधी कहते हैं कि अच्छा आदमी जानता है, कि अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है. बुरी बात तेज़ी से फ़ैल सकती है. जब 'हिंद स्वराज' छपी तो अधिकांश लोग बौखला भी गए. यहाँ तक कि गाँधी के राजनैतिक गुरु, गोपालकृष्ण गोखले ने गाँधी से कहा कि यही पुस्तक आप कुछ वर्ष बाद पढ़ियेगा. तब आप को लगेगा कि यह पुस्तक किसी मूर्ख व्यक्ति ने लिखी है. इस पुस्तक को यदि हम सतही दृष्टि से देखेंगे तो सहज ही लगेगा कि पुस्तक सचमुच बहुत अव्यवहारिक है, क्यों कि गाँधी तो इस में डॉक्टर और वकील के पेशों तक को नकारते हैं. पर गाँधी की पुस्तक 'हिंद स्वराज' को यदि हम मूर्त रूप से ही देखेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. पर पुस्तक अपनी आत्मा के माध्यम से पश्चिमी सभ्यता के बेहद कड़वे सत्यों से साक्षात्कार करवाती है. आज हवाई जहाज़ है तो विश्व भर के आतंकवादी एक देश से दूसरे देश बेखौफ आते जाते हैं, जब कि अध्यात्मिक शक्तियों का तो अकाल ही है, वे एक देश से दूसरे देश जाएं तो क्योंकर!..

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आगमन पर उन का हार्दिक स्वागत हुआ व हिंदी अकादमी उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने स्वागत भाषण किया. मंच पर शीला दीक्षित के साथ प्रसिद्ध पत्रकार प्रभास जोशी भी उपस्थित थे. मुख्यमंत्री के आगमन से पूर्व प्रभास जोशी की उपस्थिति में अकादमी सचिव रविन्द्र श्रीवास्तव ने 'हिंद स्वराज' के सभ्यता सम्बन्धी कई अंश पढ़ कर सुनाए. अशोक चक्रधर के भाषण के पश्चात 'हिंद स्वराज' व गाँधी द्वारा 1925 में रचित 'मेरे सत्य प्रयोग' पुस्तकों का विमोचन हुआ. गाँधी सत्य व अहिंसा के ईशदूत थे. 'सत्य के प्रयोग' उन की आत्मकथा है जिस में बचपन में स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान 'kettle' शब्द के स्पेलिंग न आने पर अध्यापक द्वारा इशारे से दिए गए दूसरे विद्यार्थी की नक़ल करने के आदेश की अवमानना व किशोरावस्था में सिगरेट पीने या वेश्यागमन से ले कर उस समय तक की सभी झलकियाँ हैं, जब गाँधी असहयोग आंदोलन पार कर के अपनी आयु के 55 वर्ष भी पार कर चुके थे.

शीला दीक्षित ने अकादमी को इन पुस्तकों के प्रकाशन पर बधाई देते हुए कहा कि 'हिंद स्वराज' पुस्तक की रचना को अब पूरे 100 साल हो जाएंगे. इस अवसर पर उन्होंने आशा व्यक्त की कि 'हिंद स्वराज' को कम से कम दिल्ली के सभी स्कूलों में पहुंचना चाहिए. इस पर सभागार में ख़ुशी के मारे तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी. गाँधी के सादगी भरे जीवन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सादगी भरा जीवन एक प्रकार से बहुत मंहगा पड़ता है. उस में सब से ज्यादा ज़रुरत बहुत कड़े अनुशासन की होती है. गाँधी के आंदोलनों पर उन्होंने कहा कि जब 'नमक सत्याग्रह' में उन्होंने एक मुट्ठी भर नमक अपने हाथ में ले कर ब्रिटिश की सत्ता को चुनौती दी तो पूरा विश्व दहल गया...

अनेक व्यस्तताओं व किसी अन्य सम्मलेन में उपस्थित होने की अनिवार्यता के कारण शीला दीक्षित अपने भाषण के तुंरत बाद प्रस्थान कर गई और इस विमोचन सत्र की बागडोर प्रभास जोशी ने संभाली. प्रभास जोशी ने अपने भाषण में कहा कि गाँधी बेहद परिश्रमी व्यक्ति थे. जब लिखते लिखते उन का दायाँ हाथ थक जाता था, तब वे बाएँ हाथ से लिखते थे. उन्होंने सभागार में उपस्थित 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' निदेशिका वर्षा दास की ओर संकेत कर के कहा कि उन्होंने वर्षा जी से कह कर गाँधी जी द्वारा उल्टे हाथ (बाएँ) से लिखते समय का एक चित्र बनवाया था. स्पष्ट है कि गाँधी किसी भी परिस्थिति में अपना काम रुकने नहीं देते थे. प्रभास जोशी ने बताया कि गाँधी ने 'हिंद स्वराज' दि. 13 नवम्बर 1909 से ले कर 22 नवम्बर 1909 तक (केवल 10 दिन में ही) 'किल्दोनन' जहाज़ में लिख डाली.

विमोचन सत्र के बाद 'हिंदी अकादमी' की तरफ से स्वादिष्ट भोजन का आयोजन जिस के बाद दूसरे सत्र में 'हिंद स्वराज' पर चर्चा हुई. इस सत्र की अध्यक्षता जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. मुशीरुल हसन ने की तथा इस में वर्षा दास, प्रो. इंद्रनाथ चौधरी, प्रो. अशुम गुप्ता व श्री राजीव वोहरा ने भाग लिया. प्रो. मुशीरुल हसन ने 'हिंद स्वराज' की आज के इस दौर में प्रासंगिकता पर अप्रत्यक्ष में सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि किसी भी पुस्तक की पढ़ने की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त नहीं होती. जैसे मार्क्सवाद या साम्यवाद आज पूरी दुनिया से यदि समाप्त हो गया है तो भी 'Manifesto of Communism' या कार्ल मार्क्स खुद भी क्या अप्रासंगिक हो गए? इसलिए आज 'हिंद स्वराज' को एक manifesto की तरह पढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्रिटिश की गुलामी में ही गाँधी हुए, टैगोर हुए और ब्रिटिश की गुलामी के बावजूद देश में (जनता के लिए महापुरुषों के) 'उपदेश' की कमी नहीं थी. वर्षा दास ने कहा कि 'स्वराज' शब्द का उपयोग सब से पहले दादा भाई नौरोजी ने किया था. इसके बाद जब तिलक ने 'स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है' का नारा दिया तो 'स्वराज' शब्द को व्यापक अर्थ मिला. गाँधी ने 'स्वराज' शब्द को एक गुणात्मक रूप दिया. वर्षा दास ने कहा कि 'हिंद स्वराज' हमारे लिए एक मूल्यवान धरोहर है. 'राष्ट्रीय गाँधी संग्रहालय' प्रतिवर्ष गाँधी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को गाँधी सम्बंधित चित्रों की प्रदर्शनी आयोजित करता रहा है. गुजरती में क्यों कि उन्होंने 'हिंद स्वराज' बार बार पढ़ी है, अतः उनके मन में यह कल्पना है कि इस पुस्तक में गाँधी द्वारा कही हुई बातों पर वे चित्र बनवाएं और गाँधी जन्मदिवस पर उन्हें प्रर्दशित करें. 'हिंद स्वराज' से गाँधी के ही किसी संवाद का सन्दर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी यह मानते थे कि 'स्वराज' का अर्थ 'स्व' का राज नहीं है, वरन् 'स्व' पर राज है. (स्पष्ट है कि इस प्रकार के गूढ़तम अर्थों के कारण ही कई विद्वान गाँधी की शिक्षाओं की तुलना 'श्रीमद भगवद गीता' व वेदों की शिक्षाओं से करते हैं).

इस सत्र के बाद फिर चाय का अंतराल और तीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्य समालोचक नामवर सिंह ने की. इस सत्र में अजित कुमार, प्रो. आनंद कुमार और रामचंद्र राही ने भाग लिया. प्रो. अजित कुमार ने अपनी एक सशक्त कविता प्रस्तुत की जिस की व्यंग्य पंक्तियों ने सब पर बेहद तीखा प्रभाव छोड़ा. कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं:

गठजोड़/ होते हैं जिस तरह/ खिचड़ी के चार यार/ दही पापड़ घी आचार/ कुछ कुछ उसी तरह/ गाँधी ने अपनी आँधी से अपनी छड़ी, लाठी, चप्पल/ और लंगोटी भी बांधी/ इस अनोखे गठजोड़ को कभी न कभी बिखरना तो था ही...
...हर साल/अक्तूबर के दूसरे दिन/ मीठी मधुर लोरी सुना कर/ उसकी नींद /हम गहरी बनाते हैं/ ताकि उठ कर कहीं अपनी ऐनक न मांग ले...


अजित कुमार ने 'सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा' की समानता वेदों पुराणों से की. स्वाधीनता संघर्ष के दौरान का 'जन मन को प्रतिध्वनित करने वाला' एक बेहद प्यारा लोकगीत भी सुनाया:

'काहे पे आवें वीर जवाहर, काहे पे गाँधी महाराज?
काहे पे आवे भारत माता, काहे पे आवे सुराज?


इस का उत्तर था:

घोड़े पे आवें वीर जवाहर, पैदल गाँधी महाराज,
हाथी पे आवे भारत माता, डोली पे आवे सुराज.


नामवर सिंह ने अपने विस्तृत अध्यक्षीय भाषण में गाँधी द्वारा बताया गया धर्म और राजनीती का समीकरण स्पष्ट किया. आज धर्म टुच्ची राजनीति का साधन बन गया है, इसलिए अधिकांश विद्वान राजनीति और धर्म को विलग रखने की शिक्षा देते हैं. पर गाँधी धर्म के सही परिप्रेक्ष्य में कहते हैं -

'जो मनुष्य कहता है कि धर्म का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह धर्म को नहीं जानता.'

स्पष्ट है कि गाँधी द्वारा उपयुक्त 'धर्म' शब्द 'मानवीयता' शब्द का पर्यायवाची है.
अंत में अशोक चक्रधर ने अध्यक्ष नामवर सिंह व सभागार को विश्वास दिलाया कि हिंदी अकादमी आज के आधुनिक उपकरण इन्टरनेट का पूर्ण सदुपयोग कर के विद्यार्थियों के ई -मेल एकत्रित करेगी और उन से संपर्क स्थापित कर के गाँधी की पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा देगी.

त्रिवेणी सभागार में बिताया लगभग पूरा दिन उपस्थित विचारशील लोगों के लिए 'गाँधी दिवस' सा था. तीसरे सत्र के बाद फिर जलपान और फिर दिन भर के कार्यक्रम की संपन्नता बेहद मधुर तरीके से हुई. शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध हस्ती मीता पंडित की मधुर स्वरलहरियों से सभागार भर उठा. गाँधी के सर्वाधिक प्रिय भजन:

वैष्णव जन ते तेणे कहिये
जो पीर पराई जाने रे


और

पायो री मैं तो राम रतन धन पायो...

और

रघुपति राघव रजा राम,
पतित पावन सीता राम,
ईश्वर अल्ला तेरे नाम
सब को सन्मति दे भगवन ...