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Saturday, November 6, 2010

उर्दू अदब की बे-मिसाल संस्था ‘जवाब-ए-शिकवा’


अन्य शायरों के साथ प्रेमचंद सहजवाला

साहित्य से जुड़ी असंख्य संस्थाओं में से अधिकतर की एक प्रमुख सीमा यही रहती है कि वे सब किसी न किसी एक शहर के साहित्यकारों तक सीमित रहती हैं. उनके मासिक या वार्षिक कार्यक्रम अपने शहर से जुड़े रहते हैं और यहाँ तक कि उनके पुरस्कारों सम्मानों की सीमा भी उसी शहृ या उसके आसपास के भूगोल तक महदूद रहती है. ऐसे में यदि कोई संस्था अखिल भारतीय स्तर पर एक से बढ़ कर एक साहित्यकारों की खोज करती है तो यह अपने आप में एक बेमिसाल बात है. उर्दू अदब से जुडी संस्था ‘जवाब-ए-शिकवा’ एक ऐसी ही संस्था होने का गर्व रखने का अधिकार रखती है, यह इस पत्रकार के सामने तब प्रमाणित हुआ जब दि. 24 अक्टूबर 2010 को मध्यप्रदेश के धार शहर में ‘जवाब-ए-शिकवा’ द्वारा आयोजित एक शानदार मुशायरे में शरीक होने का सुअवसर मिला. उस मुशायरे में न केवल धार या आसपास के कुछ सुपरिचित हस्ताक्षर शायरी प्रस्तुत करने गए थे वरन् दिल्ली, जम्मू व गुवाहाटी जैसे दूरस्थ शहरों के मशहूर शायर भी शिरकत करने आए थे. मुशायरा धार शहर के होटल नटराज पैलेस के सभागार में रखा गया और इस में धार की प्रसिद्ध हस्तियों में से श्री मनोज गौतम मुख्य अतिथि थे. उर्दू के जाने माने हस्ताक्षर श्री माहताब आलम इसमें विशिष्ट अतिथि थे.

मुशायरा शुरू होने के इन्तज़ार में होटल नटराज पैलेस का सभागार उर्दू अदब के चाहने वालों से खचाखच भर गया था और मुख्य अतिथि व विशिष्ट अतिथि के स्वागत के बाद मुशायरे की शुरुआत नॉएडा सेपधारी युवा शायरा पूर्णिमा चतुर्वेदी ‘माह’ की शानदार गज़लों से हुआ जिस के कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत हैं:
पूर्णिमा चतुर्वेदी ‘माह’
मैं टूटे आईने को देख कर अक्सर यही सोचूँ
कि मेरे हाथ से कैसे वो पत्थर चल गया होगा
और
कब तक वो मेरी फ़िक्र में दरिया को दुआ दे
मैं डूब चुका हूँ कोई साहिल को बता दे.
दूसरे नंबर पर ही जो शायर आए, उन्होंने अपनी जानदार शायरी से श्रोताओं के दिलों की धडकनें तेज़ कर दी. जैसे:
जिसे किसी ने बनाया न हमसफ़र अपना
वो शख्स काफिलासालर होने वाला है.
(काफिलासालार = काफिले का नेता)
और
वो एक पल के लिये छोड़ कर गया था मुझे
तमाम उम्र मेरी इन्तेज़ार में गुज़री.


उद्‍घाटन

लियाकात जाफरी जम्मू से पधारे उर्दू व फारसी के विद्वान हैं जिन का शायरी का दीवान ‘बयाज़’ शीर्षक से उर्दू शायरों के बीच बहु-चर्चित है. इसके अलावा उनकी तीन पुस्तकें शोध व आलोचना पर हैं व एक पुस्तक फारसी से उर्दू में अनुवाद की है. वे अंजुमन-ए-तककी-ए-उर्दू की जम्मू कश्मीर शाखा की एक पुरस्कार समिति के अध्यक्ष भी हैं. जम्मू निवासी होने के कारण जम्मू कश्मीर की शुरू से चली आ रही दर्दनाक उथल पुथल के प्रति एक संवेदनशील कश्मीरी नज़रिया भी रखते हैं.
वैसे दिल की धडकनें तेज़ करने वालों की वहाँ कमी नहीं थी. उर्दू के एक से बढ़ कर एक मंजे हुए शायर वहाँ मौजूद थे और सभागार में भी एक से बढ़ कर एक कद्रदान दाद देने को ‘वाह वाह’ समेत तैयार. उस सभागार में एक नज़र डालने पर यही लगा कि अधिक से अधिक श्रोता उर्दू भाषा व शायरी की बारीकियों को समझने वालों में से हैं बल्कि उनमें से कई स्वयं शायर भी हैं.
वर्त्तमान परिस्थितियों पर तंज़ का एक नमूना देखिये, सतलज राहत का एक शेर:

ये ज़िन्दगी भी बीमारी की तरह होती है
ये मुंबई में बिहारी की तरह होती है

आज उर्दू शायरी सिर्फ शराब और शबाब तक ही महदूद नहीं है, यह साबित करने वालों की भी वहाँ कमी नहीं थी. सामयिकता को उजागर करती इस शायरी को चाहने वालों से भी सभागार भरा था:
ज़हीर राज़
किस कदर कल बह गया मेरा लहू
सुर्ख़ियों में आ गए अखबार सब
दो कदम घर से कभी निकले नहीं
रास्तों पे तब्सिरा तैयार सब
हर ज़बां पर अम्न का नारा मगर
जंग लड़ने के लिये तैयार सब
आज शायरी एक समुन्दर सी है, विषयों ज़मीनों की कोई सीमा नहीं. जिंदगी से जुडी शायरी हो या रिश्तों के खोखलेपन का ज़िक्र, शायर अपने वक्त की नब्ज़ को बड़ी नजाकत से पकड़े रहता है और दमदार से दमदार अलफ़ाज़ में उसे अभिव्यक्त करता है. जैसे:

माहताब आलम
हमसफ़र भी कभी मंज़िल से बिछड जाते हैं
उम्र भर तू भी मेरा साथ निभाने से रहा
रास्ता अपने लिये खुद ही तराशूं कोई
ये ज़माना तो कोई राह दिखाने से रहा
या

कमर धारवी
ऐ मेरे भाई तेरा दिल तो साफ़ है लेकिन
तेरी बातों में अहंकार बहुत बोलता है

गुवाहाटी से आई कवयित्री रागिनी गोयल ने पहले ही शेर में वाह वाह की धूम मचा दी:
सफर की ज़िन्दगी अब बेवजह की सैर लगती है
मुझे अपनी ही सूरत आईने में गैर लगती है

इसके अतिरिक्त उनकी यह गज़ल भी बहुत पसंद की गई (कुछ शेर):
हर दरीचा ताके हर एक अटारी देखे
शहर सारा ही शहंशाह की सवारी देखे
दर दरीचा तो कोई चारदीवारी देखे
जाते जाते किले को राजकुमारी देखे


अनुराधा शर्मा

अनुराधा शर्मा (फरीदाबाद से) एक उभरती हुई शायरा हैं जिनकी शायरी से उनमें काफी उमीदें बंधती हैं. कुछ शेर:
खामशी चल पड़ी हलचलों की तरफ
बाद-ए-मंज़िल बढ़ी रास्तों की तरफ
ये परिंदा ही शायद समझ पाएगा
क्या तकूं हूँ मैं यूं बादलों की तरफ

दिल्ली के शायर अनिल पराशर ‘मासूम शायर’ ने एक संवेदनशील रचना प्रस्तुत की. यह उनकी एक बहुचर्चित रचना है जो उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता के विषय में रची थी तथा विश्व पुस्तक मेले में ‘हिन्दयुग्म प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित संकलित कविता संग्रह ‘अनमोल संचयन’ के विमोचन कार्यक्रम में पढ़ कर भी उन्होंने बेहद प्रभावित किया था. वे पिता के बारे में लिखते हैं: (दो शेर)
हाथ काँधे पे बस एक रखता था वो
इन आँखों में सब देख सकता था वो
उसकी खफ्गी को कोई भी समझेगा क्या
मैं संवारता था जब भी बिगड़ता था वो
बुज़ुर्ग शायर नसीर अंसारी का एक शेर:

ये सिर्फ बनने सँवरने की शय नहीं है नादां
अगर शऊर-ए-नज़र है तो आईना पढ़ना

मुशायरे के सभी शायरों की पंक्तियाँ देना संभव नहीं, पर यहाँ प्रस्तुत हैं मुशायरे के अंतिम शायर पराग अग्रवाल की कुछ पंक्तियाँ:
इश्क में हाल क्या है क्या कहिये
जूनून है, करार है. क्या है?
वो जो दरिया में है मुसाफिर है
वो जो दरिया के पार है क्या है


श्रोता

इस पूरे मुशायरे के आयोजन में दो शख्सियतों का विशेष योगदान रहा: एक तो जर्मनी से आए जतीन दत्तव दूसरे धार निवासी पराग अग्रवाल. जतीन दत्त ने मुझ से हुई संक्षिप्त बातचीत के दौरान कहा कि जवाब-ए-शिकवा चाहता है कि अधिक से अधिक लोग इस से जुड़ें. जवाब-ए-शिकवा शायरों के आपसी मेल मिलाप व विचार विमर्श के लिये इस से पूर्व तीन बड़ी बड़ी सभाएं कर चुका है जिन्हें उसने राब्ता 1, 2 व 3 कहा और जो क्रमशः जयपुर नई दिल्ली व इंदौर में 2007, 2009 व 2010 में हुई. ‘जवाब-ए-शिकवा’ की प्रमुख गतिविधियों में मासिक गोष्ठियां, उर्दू अदब का मूल्यांकन, उर्दू कक्षाए व एक पुस्तकालय भी हैं. उनकी भावी योजनाओं में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पत्र, एक प्रकाशन संस्थान व शायरी में छुपे रुस्तमों की खोज भी है. संस्था इस बात का भी एक सुखद स्वाभिमान रखती है कि उसके पास प्रगति के लिये समुचित फंड भी उपलब्ध हैं तथा इस मामले में वह किसी पर निर्भर नहीं है.
मुशायरा शाम सात बजे शुरू हुआ लेकिन मुशायरे में आए शायरों की एक अनौपचारिक सभा दोपहर को हुई जिसमें कुछ शायरों ने पराग अग्रवाल के परिश्रमी स्वाभाव की बेहद प्रशंसा की व कुछ ने यहाँ तक कहा कि पराग इस कार्यक्रम की तैयारियां करते हुए एक किसान से कम नहीं लग रहे. जतीन ने इच्छा ज़ाहिर की कि हर शह्र में ‘जवाब-ए-शिकवा की एक मज़बूत टीम ज़रूर होनी चाहिए और हर शह्र में एक पराग अग्रवाल होना चाहिये. मुशायरे की अंतिम रचना तो पराग ने पढ़ी पर उस के बाद भी धार के सुपरिचित हिंदी कवि संदीप शर्मा ने सब को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी और उर्दू के बीच कोई दूरी है ही नहीं. दोनों भाषाओँ के साहित्यकार आपस में प्रेम और सद्भावना से जुड़े हैं. इस के साथ ही उन्होंने अपनी एक सशक्त व्यंग्य कविता भी प्रस्तुत की जिसमें आदिम मानव समाज की और आज के अति तकनीकी आधुनिक समाज की बहुत सशक्त व काफी कुछ व्यंग्यात्मक तुलना भी की. आदिम मानव के पास न तो ए.टी.एम था न ही क्रेडिट कार्ड, पर वह कम से कम मनुष्य तो थ! शायद आज के युग में आधुनिकता अधिक है, उस युग में मानव की निश्छलता अधिक थी.

मुशायरे के अंत में सभी शायरों व श्रोताओं के लिये होटल नटराज पैलेस में तैयार किया गया स्वादिष्ट भोजन था पर भोजन तक पहुँचते पहुँचते तारीख बदल चुकी थी, हालांकि एक दूसरे से बिछुड़ने का दिल किसी का नहीं हो रहा था.

दो वीडियो भी देखें-


आयोजक जतिन दत्त


काव्यपाठ करतीं शायरा रागिनी गोयल

रिपोर्ट – प्रेमचंद सहजवाला

Thursday, December 18, 2008

आनंदम की दिसम्बर गोष्ठी संपन्न



'आनंदम' संस्था संगीत व साहित्य की एक सुपरिचित संस्था है जो प्रतिमाह दूसरे रविवार को एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करती है.  दिनांक 14 दिसम्बर को 'आनंदम' के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पर इस माह की गोष्ठी का आयोजन हुआ. गोष्ठी में रविन्द्र शर्मा रवि, जगदीश रावतानी, नमिता राकेश, अनुराधा शर्मा, पराग अगरवाल , मनमोहन शर्मा 'तालिब', प्रेमचंद सहजवाला, साक्षात् भसीन, नागेन्द्र पाठक, फखरुद्दीन अशरफ, जीतेन्द्र प्रीतम आदि कवियों ने हिस्सा लिया. गोष्ठी की पहली ग़ज़ल युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने पढ़ी.  अनुराधा उर्दू शायरी  में एक नया परन्तु सशक्त नाम है, उनके दो शेर प्रस्तुत हैं:

सरेआम  शम्मा  से सवाल  मत  कर 
परवाने  का  जीना मुहाल  मत कर
आंखों  की मुंडेरों  से फिसलते  हुए कहे
माज़ी  का इतना  भी ख़याल  मत कर


पराग अगरवाल की इन पंक्तियों ने प्रभावित कर दिया:

आगाज़ हुआ हैं जबसे तामीर-ए-आशियाने का
तब से इन हवाओ को नाराज़ देख रहा हूँ
या देख रहे हो समंदर में गौर से 
मैं इसका मुसलसल रियाज़ देख रहा हूँ



सुपरिचित कवयित्री नमिता राकेश की कुछ पंक्तियों वातावरण को चटपटा बना दिया:

अपनी क्या तकदीर जनाब/ हवा में जैसे तीर जनाब/ कुछ गजलें कुछ गीत फकत/ है अपनी जागीर जनाब

पर इस पूरे माहौल पर प्रख्यात कवि  रविन्द्र शर्मा 'रवि' अपनी सशक्त गज़लों के साथ छा गए.  पिछले दशक में देश में एक ज़हरीला साम्प्रदायिक वातावरण पनपा. रविन्द्र शर्मा 'रवि' का यह शेर उन सभी सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक दो टूक सलाह है.

किसी भी कौम को बदनाम कर देना नहीं अच्छा,
यहाँ पर भी बुरे होंगे, वहां पर भी भले होंगे.


इसी ग़ज़ल के कुछ और नायाब शेर:

जो औरों के बनाए रास्तों पर ही चले होंगे
समंदर में नहीं वो लोग साहिल पर पले होंगे
ये माना रोशनी की है बहुत शोहरत ज़माने में 
मगर शातिर अंधेरे तो चरागों के तले होंगे.


'आनंदम' संस्थापक जगदीश रावतानी ने भी हिंदू-मुस्लिम विषय को अपने ढंग से उठाया:

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे 
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है.


प्रख्यात कवि बलदेव वंशी ने अंत में बेहद प्रेरणादायक कविताओं से वातावरण की गरिमा बढ़ा दी. अंत में जगदीश  रावतानी द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद् प्रस्ताव से गोष्ठी संपन्न हुई.