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Monday, February 8, 2010

नमिता राकेश को महादेवी सम्मान



प्रसिद्ध कवयित्री नमिता राकेश को श्री माखन लाल चतुर्वेदी जी की जन्मभूमि खंडवा (मध्य प्रदेश) की प्राचीन और प्रतिष्ठित संस्था सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी ने 'महादेवी वर्मा स्मृति सम्मान' से नवाज़ा है। यह सम्मान उन्हें उनकी बहुआयामी प्रतिभा और उनके लेखन के लिए प्रदान किया गया। समारोह में अन्य गणमान्य अतिथियों के अलावा नमिता राकेश को बतौर विशिष्ठ अतिथि आमंत्रित किया गया और उनके ही कर कमलों से अन्य साहित्यकारों को सम्मान प्रदान किये गए। बाद में एक विराट कवि सम्मलेन भी हुआ जिसकी अध्यक्षता नमिता राकेश ने की।

अन्य साहित्यकारों में माधुरी मिश्र अदिति, सुषमा भंडारी, अशोक कुमार के नाम उल्लेखनीय हैं। वहां इन साहित्यकारों ने प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार की समाधि और माखन लाल जी की जन्मभूमि के भी दर्शन किये। अनेक साहित्यकारों ने नमिता राकेश और साथी लेखकों को इस उपलब्धि पर हार्दिक बधाई दे कर अपनी प्रसंता व्यक्त की।

Tuesday, November 17, 2009

गोवा में दिल्ली के साहित्यकारों का सम्मान


काव्यपाठ करतीं नमिता राकेश

गोवा।
राष्ट्रीय शिक्षक विकास परिषद और कला एवम् सांस्कृतिक निदेशलाय,गोवा के संयुक्त तत्वाधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन शिरोडा,गोवा में हुआ। इस अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ, कलाकृतियों एवम् व्यंग चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई और शिक्षकों ओर बच्चों ने रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

शाम को अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। तीन घन्टे तक चले इस कवि सम्मेलन का चुटीला और कुशल मंच संचालन दिल्ली की नमिता राकेश ने किया जिसके लिए सभी ने ज़ोरदार शब्दों में उनकी प्रशंसा की। मंच से उतरते ही लोगों ने नमिता राकेश को घेर लिया। नमिता के साथ फोटो खिचाने के लिए होड़ लग गई। लोगों के इतने प्यार और सम्मान से नमिता कृत-कृत हो गईं। ये बात इसलिये भी रेखांकित करनी पड़ रही है क्योंकि ये वो यादगार पल थे जो भूलाए नहीं जा सकते। अपनी सीट तक आने में नमिता को एक घन्टा लग गया। लोगों की आँखों में चाहत ओर प्रशंसा देखने के काबिल थी।

अगले दिन सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर पधारे गोवा सरकार में समाज कल्याण मंत्री श्री रामकृष्ण धावलिकर ने देश भर से आए कला प्रेमियों को संबोधित और सम्मानित किया। कामाक्षी महिला भजनी मंडल, शिरोडा के कलाकारों ने स्वागत गीत और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करके श्रोताओं का दिल जीत लिया। सम्मेलन में दिल्ली के अनेक साहित्यकारों/कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया था और उन्हें साहित्य/कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया। इसमें श्रीमती नमिता राकेश, डा. हरीष अरोड़ा, सुषमा भंडारी,जसवंत सिंह जनमेजय, अशोक कुमार एवं किशोर श्रीवास्तव आदि को क्रमशः राष्ट्रीय साहित्य भूषण, शिक्षक भूषण एवं समाज भूषण सम्मान प्रदान किया गया।


सम्मान प्राप्त करते सर्वश्री किशोर श्रीवास्तव, अशोक कुमार, सुषमा भंडारी डा. हरीश अरोड़ा एवं नमिता राकेश

सम्मान ग्रहण करतीं नमिता राकेश

एक स्मारिका का विमोचन भी किया गया। देश भर से आये साहित्यकारों ने विभिन्न भाषाओं मे कविताएँ व सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।

इस अवसर पर किशोर श्रीवास्तव की 25 वें वर्ष में चल रही कार्टून एवं लघु रचनाओं की सामाजिक चेतना पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ का प्रदर्शन भी किया गया। समस्त कार्यक्रम का संयोजन शिक्षक विकास परिषद के अध्यक्ष श्री रमेश वी. कुलकर्णी ने किया।


कार्यक्रम एवं किशोर श्रीवास्तव की कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ का अवलोकन करते दर्शकगण

Thursday, September 24, 2009

कवि राजगोपाल सिंह, नमिता राकेश व ममता किरण 'परिचय' सम्मान से सम्मानित

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला


सत्यभूषण सम्मान से सम्मानित कवि राजगोपाल सिंह । स्वागत करती अलका सिन्हा

नई दिल्ली । 8 सितम्बर 2009

दि. 8 सितम्बर 2009 की शाम। नई दिल्ली के फिरोज़शाह रोड स्थित 'Russian Center of Cultural Sciences' में उर्मिल सत्यभूषण द्वारा संचालित 'परिचय' संस्था ने प्रसिद्ध कवि राजगोपाल सिंह को 'परिचय सम्मान' तथा सुपरिचित कवयित्रियों नमिता राकेश व ममता किरण को 'सत्य सृजन' सम्मान से सम्मानित किया। 'परिचय' ने ये 'सत्य सृजन सम्मान' इस वर्ष प्रारंभ किये हैं तथा 'सत्यभूषण सम्मान' प्रतिवर्ष देती है। इस सम्मान-गोष्ठी में हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार सैनी ने अध्यक्षता की तथा गोष्ठी का संचालन किया अलका सिन्हा व अनिल मीत ने।

'ज़र्द पत्तों का सफ़र', ' खुशबुओं की यात्रा', 'बरगद ने सब देखा है' तथा 'चौमास' जैसी सशक्त काव्य पुस्तकों के रचेता राजगोपाल सिंह की मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ ग़ज़ल व गीत के चिरपरिचित रास्तों से अलग हट कर एक अनोखे संवेदनात्मक प्रभाव का सृजन करती हैं। जहाँ एक तरफ असंख्य कवि शायर, शायरी की बनी बनाई लीक पर चल कर केवल रचनाओं में इज़ाफा मात्र कर रहे हैं, वहीं राजगोपाल सिंह उन कवियों में से हैं जो अपनी सशक्त व सार्थक रचनाधर्मिता के माध्यम से जाने जाते हैं। उनके स्वागत में कवयित्री अलका सिन्हा ने कहा कि जिस गहराई व मौलिकता से राजगोपाल सिंह ने काव्य रचना की है, उस के कारण उन को कई सम्मानों से सम्मानित भी किया गया है। यदि यह कहा जाए कि इन के काव्य ने हमारे समाज व संस्कृति को जीवित रखा है, तो ग़लत न होगा। अपनी चंद सर्वाधिक चर्चित कविताएँ, ग़ज़लें व दोहे प्रस्तुत करने से पूर्व राजगोपाल सिंह ने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि 'परिचय' संस्था प्रतिमाह यहाँ गोष्ठियां आयोजित करती है। उन्होंने इस बात पर भी बधाई दी कि अब 'परिचय' की पहचान केवल भारत भर में नहीं, बल्कि रूस तक भी पूर्णतः पहुँच चुकी है। इस के साथ उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह संस्था भविष्य में अन्य तमाम साहित्यकारों को भी सम्मानित पुरस्कृत करेगी, जो अच्छा लिख रहे हैं। अपनी काव्य प्रस्तुति उन्होंने एक गीत से शुरू की जो उन के अनुसार शायद उन का पहला या दूसरा गीत रहा होगा। इस गीत की रचना उन्होंने तिब्बत की सरहद पर 21,000 फुट की ऊँचाई पर स्थित एक गांव में की:

कौन जाने कब किस पगडण्डी से/ दीखे मोरा सिपहिया/ घुघती* टेर लगाती रहियो...

अब के बरस बड़ी बरफ पड़ी है/ जैसे सारी घाटी चांदी से मढ़ी है/ हिम से घिरी हैं ये शैल-शिखाएं/ जले हैं निगोड़ी और मुझे भी जलाएं/अंग अंग जैसे जंग छिड़ी है...

(*घुघती = बर्फीली पहाड़ियों पर पाया जाने वाला एक सुन्दर पंछी। इस गीत में 'घुघती' पंछी बिरही आत्मा का प्रतीक बन कर उभरी है।)


काव्यपाठ करते राजगोपाल सिंह। एक अन्य वीडियो यहाँ देखें

कवि राजगोपाल सिंह ने रिश्तों से जुड़ी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए पीपल, बरगद, नदी, बरफ आदि सभी प्राकृतिक चिह्नों का उपयोग बखूबी किया है। जैसे:

नाम था होंठों पे सागर, पर मरुस्थल की हुई
इस नदी की कुछ न कुछ, लाचारियाँ होंगी ज़रूर

एक मौसम आए है तो एक मौसम जाए है
आज है मातम तो कल, किलकारियां होंगी ज़रूर.


पर प्यार के इस रंग-बिरंगे 'पोज़िटिव' अंदाज़ के भी क्या कहने:

हम ने ऐसे रंग फूलों के कभी देखे न थे
तितलियों के पास भी पिचकारियाँ होंगी ज़रूर.


इसी ग़ज़ल के एक शेर में जहाँ 'बेटी' की सामाजिक स्थिति को कवि ने इस तरह व्यक्त किया है:

आज भी आदम की बेटी, हंटरों की ज़द में है,
हर गिलहिरी के बदन पर धारियां होंगी ज़रूर

(ज़द = निशाना),

वहीं नए रिश्तों की दहलीज पर, सर पटकते हुए, बाबुल से बिछुड़ने की वेदना कुछ दोहों में बेहद मार्मिक तरीके से आई:

जिस खूंटी से बाँध दो, उस से ही बंध जाए
बाबुल तेरी लाडली इक गूंगी सी गाय.

तेरे जैसी ही हुई, मैं शादी के बाद,
आती तो होगी तुझे 'मिट्ठू' मेरी याद.

बाबुल अब होगी नहीं, भैया के संग जंग,
डोर तोड़ अनजान पथ, उड़ कर चली पतंग.


आज दूरदर्शन पर बेटी को अभिशाप मानने वाले समाज या शक्तियों का पर्दाफाश करते असंख्य धारावाहिक आ रहे हैं, पर बेटी की अहमियत या अपरिहार्यता क्या है, यह कवि राजगोपाल सिंह से अधिक किसी को पता नहीं मानो:

खुशबू है ये बाग़ की, रंगों की पहचान,
जिस घर में बेटी नहीं, वह घर रेगिस्तान.


प्रकृति के बीच उपस्थित कवि प्रकृति से रोमांस न कर के, प्रकृति को ही काग़ज़ बना कर उस पर मानविय संवेदनाएं शब्दबद्ध करता है:

बाग़ के वातावरण से बेखबर सूरजमुखी
जिस तरफ सूरज चले देखे उधर सूरजमुखी
भोर की पहली किरण कुछ कह रही है कान में
लाज के मारे हुई है गुलमोहर सूरजमुखी
देह सारी आंसुओं से भीग कर तर हो गई
कितना रोई याद कर के रात भर सूरजमुखी


और

गांव में ज़िंदा है अब भी वो पुराना पीपल
कितने गुमनाम परिंदों का ठिकाना पीपल

आँधियों का कोई मुखबिर न छुपा हो इन में
हर मुसाफिर से न हर बात बताना पीपल


और

अपनी बूढ़ी आँखों से कल बरगद ने सब देखा है
कहाँ गिरा लाजो का आँचल बरगद ने सब देखा है.


गीतों गज़लों में निहित दर्द के साथ साथ प्रभावशाली तरन्नुम ने भी चार चंद लगा दिए।


सत्य सृजन सम्मान से सम्मानित ममता किरण । सत्य सृजन सम्मान से सम्मानित नमिता राकेश

''परिचय' ने नमिता राकेश व ममता किरण को 'सत्य-सृजन' सम्मान से सम्मानित किया। नमिता ने 'परिचय' का आभार प्रकट करते हुए अपनी कुछ नज़्में व ग़ज़लें सुनाई। कुछ पंक्तियाँ:

अगर यकीन नहीं है तुम्हें/ तो आज़माओ मुझे/...आईना हो अगर तुम/ तो आईना दिखाओ मुझे/...इक चिंगारी हूँ मैं/ रात दिन जलती हूँ/ हवाओं में दम है/ तो बुझाओ मुझे/...आँख का आंसू नहीं/ मैं मोती हूँ/ पलकों में बंद कर के/ दिखाओ मुझे...

और

वो भी उड़ना चाहती थी ऊपर/ बहुत ऊपर आकाश में लेकिन/ पतंग की तरह/ उस की डोर/ किसी दूसरे के हाथ में थी...

ममता किरण ने भी संस्था का आभार प्रकट करते हुए कुछ सशक्त रचनाएं प्रस्तुत की:

...स्त्री मांगती है नदी से/ सभ्यता के गुण/ वो सभ्यता/ जो उस के किनारे जन्मी/ पली, बढ़ी और जीवित रही/ स्त्री बसा लेना चाहती है/ समूचा का समूचा संसार/ नदी का/ अपने गहरे भीतर/... जलाती है दीप आस्था के/ नदी से गवाही कर/ करती है मंगल-कामना/ सब के लिए/ और अपने लिए मांगती है/ सिर्फ नदी होना...

एक वृद्ध व्यक्ति की तन्हाई, जो उन्होंने एक वृक्ष को प्रतीक बना कर व्यक्त की, (कुछ पंक्तियाँ):

...बहुएँ आशीष ले कर/ मगन हो जाती हैं/ अपनी अपनी गृहस्थी में/ मेरी सुध कोई भी नहीं लेता/ मैं बूढा हो गया हूँ/ कमज़ोर हो गया हूँ/ कब हरहरा कर टूट जाएं ये बूढी हड्डियाँ/ पता नहीं/ तुम सब से करता हूँ एक निवेदन/ एक बार उसी तरह/ इकट्ठा हो जाओ/ मेरे आंगन में/ जी भर तुम्हें देख तो लूं ...

इस अवसर पर सीमाब सुल्तानपुरी तथा स्टेला कुजूर ने भी अपनी रचनाएं पढ़ी।
अंत में अध्यक्ष राजकुमार सैनी ने तीनों सम्मानित कवियों को बधाई देते हुए इस प्रकार के सम्मान आयोजनों पर खुशी व्यक्त की तथा धन्यवाद प्रस्ताव के साथ गोष्ठी सम्पन्न हुई।

Monday, August 17, 2009

दीवानचंद ट्रस्ट सभागार में 'आनंदम' के वार्षिकोत्सव पर मधुर काव्य संध्या


जगदीश जैन, ममता किरण और जगदीश रावतानी 'आनंदम्'

'आनंदम' संगीत व साहित्य संस्था दिल्ली की एक सुप्रसिद्ध संस्था है जो अपनी सशक्त संगीत व साहित्यिक गतिविधियों के लिए सुपरिचित है। इस के संस्थापक जगदीश रावतानी 'आनंदम' संगीत कॉलेज के संस्थापक व प्रिंसिपल हैं, जहाँ कई विद्यार्थी संगीत की शिक्षा ले रहे हैं। इसके अतिरिक्त 'आनंदम' की मासिक काव्य गोष्ठियां भी सुपरिचित हैं, जिन में हिंदी-उर्दू के समकालीन कवि अपनी कविताओं गज़लों का पाठ करते हैं। 11 अगस्त 2009 (मंगलवार) को दिल्ली के शिवाजी स्टेडियम के निकट स्थित 'दीवानचंद ट्रस्ट' के सभागार में 'आनंदम' संस्था द्वारा एक वर्ष पूरा होने पर एक मधुर काव्य-संध्या का आयोजन किया गया, जिस की अध्यक्षता प्रसिद्ध शायर जगदीश जैन ने की। यह सभागार 'दीवानचंद ट्रस्ट' के निदेशक एम.के. गौड़ के सहयोग से इस काव्य संध्या के लिए उपलब्ध हुआ तथा अनेक व्यस्तताओं के बावजूद गौड़ काव्य संध्या में अंत तक उपस्थित रहे। गोष्ठी का संचालन हिंदी साहित्य की जानी-मानी शख्सियत ममता किरण ने किया। गोष्ठी में 'आनंदम' अध्यक्ष जगदीश रावतानी व ममता किरण के अतिरिक्त लक्ष्मीशंकर बाजपेयी, रविन्द्र 'रवि', मनमोहन 'तालिब', शहादत अली निज़ामी, कैसर अज़ीज़, दर्द देहलवी, ज़र्फ़ देहलवी, मजाज अमरोहवी, नमिता राकेश, नूर-उल-ऐन कैसर कासमी, सत्यवान, दीपंकर गुप्ता, आशा शैली, आनंद गोपाल सिंह बिष्ट, साक्षात भसीन, सतीश सागर, पुरुषोत्तम वज्र, व मुन्नवर सरहदी आदि ने अपनी सशक्त कविताएँ पढ़ कर समा बांध दिया। गोष्ठी, आज की कविताओं के प्रस्तुतीकरण को देखते हुए, एक विशिष्ट गोष्ठी लग रही थी। आकाशवाणी दिल्ली में निदेशक लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने इस गोष्ठी में जो ग़ज़ल पढ़ी उस का हर शेर, कवि मन को जिस मानवीय संवेदना ने बुना है, उस की एक झलक देता है, जैसे:

अपने कट जाने से बढ़ कर ये फिकर पेड़ को है
घर परिंदों का भला कैसे उजड़ता देखे


चाहे पारिवारिक संबंधों की विसंगतियों की बेबाक अभिव्यक्ति हो, चाहे शहर में चलते फिरते इंसानों के बीच व्याप्त एक चुभती सी अजनबियत, बाजपेयी एक अद्वितीय प्रभाव के साथ रचना लिखते व कहते हैं.

गांव के सम्मुख शहर की हीनता को अपने अंदाज़ में कह गया रविन्द्र 'रवि' का यह शेर:

हमारे गांव में जुगनू भी खुलकर जगमगाते हैं
तुम्हारे शहृ में तो चाँद भी मद्धम निकलता है


रविन्द्र 'रवि' ग़ज़ल के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं, जिन की अभिव्यक्ति मर्म को छूती है।

शहृ है तो शहृ के बाज़ार में बिकते आदमी का ज़िक्र भी होगा ही!... वयोवृद्ध शायर मनमोहन 'तालिब' ऐसी गोष्ठियों में अपनी वरिष्ठता व महारत की छाप हमेशा छोड़ कर रहते हैं. उन का यह शेर इस प्रगतिशील युग में आदमी की स्थिति को निर्ममता से पेश कर गया:

क्या हो गया इस दौर में नायाब है इन्साँ
हम देर से बाज़ार में खामोश खड़े हैं


शहृ और गांव के कंट्रास्ट पर ही ममता किरण ने पढ़ा:

जब से दादी रह गई है गांव, बच्चे शहृ में
तब से ही रातों में परियों का उतरना ना हुआ।

कुछ कवियों ने ईश्वर की इबादत या संतों दरवेशों के प्रति अपने उद्गार अशआर के ज़रिये प्रस्तुत किये। जैसे सूफी दरवेशों पर दर्द देहलवी का यह शेर:

फाकाकशी में जिस ने गुज़ारी थी ज़िन्दगी
भूखों के पेट भर दिए उस के मज़ार ने


और ईश्वर भक्ति का नमिता राकेश का अंदाज़:

गौहर-ए-अश्क़ को पलकों में पिरोना साईं
मुझ को आता नहीं दामन को भिगोना साईं



नमिता राकेश

'आनंदम' अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने एक कविता और एक 'तरही ग़ज़ल' सुनाई जिस का एक मिसरा 'उदासी बाल खोले सो रही है' प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र का है। 'तरही ग़ज़ल' किसी भी प्रसिद्ध शायर की किसी ग़ज़ल के एक मिसरे को आधार बना कर उसी काफिये रदीफ़ पर अपनी ग़ज़ल लिखने को कहते हैं। रावतानी जी की निम्न शेरों पर गौर करें:

ख़ुशी दुनिया से गायब हो रही है
उदासी बाल खोले सो रही है
किसी से भी परेशानी नहीं है
मेरी खुद से लड़ाई हो रही है.


डॉ. अहमद अली बर्की 'आज़मी' ने सादगी भरे अंदाज़ में पढ़ा;

हम अर्ज़े-तमन्ना करते रहे, उस पर न हुआ कोई भी असर,
था इतना ज़ियादा सदमा-ए-ग़म हम सहते सहते सह न सके


दिल्ली की गोष्ठियों मुशायरों में वातावरण गंभीर होते हुए भी सब को उस गंभीरता से मुक्ति दिलाने व कवियों शायरों को अपने हास्य से चित्त करने वाली एक लोकप्रिय शख्सियत हैं 82 वर्षीय शायर मुनव्वर सरहदी। कविता सुनाने के लिए उन के खड़े होते ही गोष्ठी-कक्ष मानो अग्रिम रूप से ही कहकहों से भर जाता है। यहाँ भी चंद मुक्तक जो उन्होंने पेश किये, उन में से एक नमूना यहाँ प्रस्तुत है:

मैं पढ़ा लिखा था,
इसलिए मरते ही मुझ को जन्नत मिली
हर फ़रिश्ता हूर को ख़त मुझ से लिखवाता रहा.



कुछ अन्य कवियों की कविताओं गज़लों के अंश भी प्रस्तुत हैं:

कैसर अज़ीज़ -
हमें अपनी पनाहों में रखे है यूं वतन अपना
हमारे जिस्म को जैसे छुपाए पैरहन अपना

शहादत अली निज़ामी
ज़िन्दगी तुझ से कोई शिकवा नहीं है अब मुझे
कम नहीं तूने दिए आंसू हंसी खुशबू चुभन

नूर-उल-ऐन कैसर
मिली हैं एक ही रस्ते पे जा कर
सभी राहें जुदा होते हुए भी

आशा शैली
उस हवा के सामने खुद्दार सर झुकते नहीं
जिसने रंगों के लिए तितली कोई बदनाम की

ज़र्फ़ 'देहलवी'
मुझे अपने खोने का गम नहीं
मिले तुम, है ये भी तो कम नहीं

मुज़फ्फर ज़मीर झाल्वी
उसे सिवाय तबाही के कुछ नहीं मिलता
किसी के हक़ में जो झूठा बयान देता है

पुरुषोत्तम वज्र
अगर वादा किया है ज़िन्दगी भर साथ चलने का
सफ़र के बीच आ कर हमसफ़र छोड़ा नहीं जाता

गोष्ठी अध्यक्ष जगदीश जैन ने अंत में अपनी एक सशक्त कविता व ग़ज़ल पेश की। एक शेर यहाँ प्रस्तुत है:

मैं न अन्दर से समुन्दर हूँ न बाहर आसमाँ
बस मुझे इतना समझ जितना नज़र आता हूँ मैं



प्रतिभागी कवि

रावतानी ने अंत में गौड़ का विशेष धन्यवाद करते हुए सभी कवियों का आभार प्रकट किया व इस बीच 'आनंदम' के एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में कवियों का मुंह भी मीठा कराया गया। 'आनंदम' गोष्ठियां अब तक पश्चिम विहार में 'आनंदम' संगीत विद्यालय में होती रही। पर शिवाजी स्टेडियम (राजीव चौक) दिल्ली का एक केंद्रीय सार्वजनिक स्थल है, जहाँ मेट्रो आदि के कारण पहुँचने में सुगमता होगी। रावतानी ने 'आनंदम' की भावी गोष्ठियां भी यहीं होने की आशा जतायी।

प्रस्तुति- प्रेमचंद सहजवाला

Wednesday, July 29, 2009

'परिचय' की काव्य गोष्ठी में नमिता राकेश व ममता किरण की कविताओं की धूम

सन् 85 में स्थापित 'परिचय' संस्था पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा समय से साहित्यिक गतिविधियों के लिए बहुचर्चित रही है। संस्था की स्थापना अध्यक्षा 70 वर्षीय उर्मिल सत्यभूषण, जो स्वयं भी साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं, अपनी सदाबहार तथा कर्मठ शख्सियत द्वारा संस्था की गतिविधियाँ बनाए हुए हैं। हिंदी-उर्दू साहित्यकारों की सर्वाधिक लोकप्रिय संस्थाओं में से एक 'परिचय' भी है।

'परिचय' प्रतिमाह नई दिल्ली के 'Russian Cultural Centre' में साहित्यिक गोष्ठियां आयोजित करती है, जिन में पुस्तक लोकार्पण से ले कर किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा तक अनेक गतिविधियाँ शामिल रहती हैं। कई काव्य गोष्ठियां भी इन गोष्ठियों का महत्वपूर्ण अंग हैं। संस्था की एक गतिविधि पुस्तक प्रकाशन भी है।

काव्य गोष्ठियों की शृंखला में दि. 23 जुलाई 2009 की काव्य गोष्ठी भी एक यादगार गोष्ठी रही जिस में मूलतः दो विशिष्ट कवयित्रियों - नमिता राकेश व ममता किरण - की कविताओं का पाठ हुआ व तदनंतर अन्य कई कवियों ने भी कविताएँ पढ़ी। गोष्ठी की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कवि बालस्वरूप 'राही' ने की तथा मंच पर अन्य उपस्थित कविगण में थे उर्मिल सत्यभूषण, राजकुमार सैनी, सीमाब सुलतानपूरी व दिनेश मिश्र। संचालन सुपरिचित कवि अनिल वर्मा 'मीत' ने किया।

काव्य पाठ का प्रारंभ नमिता राकेश की कविताओं से हुआ। नमिता एम.ए (अंग्रेजी), एम.ए (इतिहास), पत्रकारिता डिप्लोमा व अन्य कई शैक्षणिक उपलब्धियों के अतिरिक्त अभिनय व खेल कूद से जुडी होने के साथ आकाशवाणी दूरदर्शन में भी सक्रिय रही। वर्त्तमान में वे भारत के आयकर विभाग में सहायक निदेशक हैं। वे छंद-मुक्त कविता, गीत व ग़ज़ल पर बराबर की निपुणता रखती हैं। इस गोष्ठी में पढ़ी गई व्यक्ति-मन के प्रतिबिम्ब रूप उनकी एक कविता यहाँ प्रस्तुत है-


एक पूरा दिन मुझे जीने के लिए कम पड़ता है/अधूरे रह गए कामों को अगले दिन करने की लालसा में/जा लेटती हूँ बिस्तर पर/अधूरी इच्छाएं, लालसाएं, आकांक्षाएं,अभिलाषाएं समेट कर/तह लगा कर/रख देती हूँ तकिये के नीचे//अपने पैर समेटते हुए/बंधनों की चादर तान लेती हूँ अपने ऊपर//पलकें बंद कर के सोने की कोशिश में/जाग जाते हैं न जाने कितने सोए हुए ख़याल//बंद पलकों के भीतर देखती हूँ/ उन्हें पूरा होते हुए/और न जाने कब सो जाती हूँ अगली सुबह के इंतज़ार में.

भारतीय समाज में नारी प्रारंभ से ही समाज के दमन व शोषण का शिकार रही है। इसे ले कर कोई कवयित्री किसी न किसी रूप में अपने मन के भाव कागज़ पर न उकेरे, यह असंभव है. नमिता द्वारा गोष्ठी में प्रस्तुत यह दोहा इसी बात का सबूत हैं।

जननी जग पोषित करे शोषित है वो आज
जो सृष्टि-जननी बनी गिरी उसी पर गाज.




गांव की ओर उमुख युवा पीढ़ी की विडम्बना व देश में चल रही घातक सियासत पर नमिता की कलम:

चार पैसे क्या कमाने गाँव से बेटा गया
फिर कभी वो पास बूढ़े बाप के आया नहीं.


और

हर तरफ मज़हब सियासत नस्लो-फिरका क़ौमो-जात
है कहाँ हिन्दोस्ताँ हम को नज़र आया नहीं.


नमिता के बाद आई दूसरी विशिष्ट कवयित्री ममता किरण 'राष्ट्रीय सहारा', 'पंजाब केसरी', 'शाह टाईम्स', 'जे बी जी टाईम्स', व 'सिटी चैनल' आदि से सम्बद्ध रह कर अब स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। भारतीय नारी का एक संवेदनात्मक हृदय व गीत-गज़ल तथा छंद-मुक्त काव्य पर अपनी अनूठी पकड़ के कारण प्रायः काफी डिमांड में रही हैं।



उन्होंने 'SAARC Writers' Conference' 'Indian Society of Authors' व 'ग़ालिब अकादेमी' आदि अनेक गोष्ठियों में काव्य पाठ किये हैं. इन्टरनेट पर 'रेडियो' सबरंग पर भी तरन्नुम में उनके मधुर गीत सुने जा सकते हैं। नारी की समाज में स्थिति को वे किस संवेदनात्मक तरीके से व्यक्त करती हैं, इस का मर्मस्पर्शी उदहारण है उन की एक गज़ल का यह शेर:

हाथ में मेरे नहीं एक भी निर्णय बेटी,
कोख मेरी है मगर कैसे बचा लूं तुमको.


आज इस उदारीकरण और आधुनिकतम शिक्षा व प्रौद्योगिकी की बाढ़ में भी एक शर्मनाक सत्य यह है कि जन्म से पहले, कोख में ही बेटी की हत्या कर दी जाती है।

प्रायः साहित्य समीक्षक प्रेम-कविताओं को औरताना लेखन कह कर नकार देते हैं, पर नारी मन की शाश्वत समर्पण भावना के आगे ऐसे आलोचकों के तर्क धराशयी रह जाते हैं। जैसे:

सारी दुनिया चाहे जो कहती रहे
मैं जिसे पूजूँ वही भगवन है.


ममता किरण ने कई गोष्ठियों में एक ग़ज़ल तरन्नुम में गाई है, जिस का मतला है:

कोई आंसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है, वही सब को नचाता है


इस शेर से मुझे यही शिकायत रही है कि ऐसे दार्शनिक/किस्मतवादी शेर व्यवहारिक व यथार्थ काव्य का हिस्सा नहीं होने चाहिए। पर इसी ग़ज़ल के दो अन्य शेर कवियत्री के चिंतन फलक में विस्तार के दर्शन भी कराते हैं:

बहुत से ख्वाब ले कर के वो आया इस शहर में था
मगर दो जून की रोटी बमुश्किल ही जुटाता है.

घड़ी संकट की हो या फिर कोई मुश्किल बला भी हो
ये मन भी खूब है रह रह के उम्मीदें बंधाता है.

ममता जी द्वारा प्रस्तुत एक छंद-मुक्त व कुछ कुछ लम्बी सी कविता की ये पंक्तियाँ ही कवियत्री की विस्तृत व वैयक्तिकता-मुक्त सोच से साक्षात्कार कराती हैं:

जन्म लूं यदि मैं फूल बन.
खुशबू बन महकूँ,
प्रार्थना बन कर-बद्ध हो जाऊं,
अर्चना बन अर्पित हो जाऊं,
शान्ति बन निवेदित हो जाऊं,बदल दूं गोलियों का रास्ता,
सीमा पर खिल खिल जाऊं.


जिन अन्य कवियों ने काविताएं पढ़ी, उनमें कुछ अच्छी काव्य पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं:

देवेन्द्र 'मांझी'

किसी को कुछ किसी को कुछ किसी को कुछ बताते हैं/यहाँ कुछ लोग अपनी ही हकीक़त भूल जाते हैं.

चिराग़ जैन

एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया/लेकिन इस में चाँद का किरदार काला हो गया/साज़िशें सूरज निगलने की रची थी चाँद ने/पर वो अपनी साज़िशों का खुद निवाला हो गया.

(इस गोष्ठी से एक दिन पूर्व ही शताब्दी का सब से बड़ा सूर्य ग्रहण था, इस लिए चराग़ की चंद्रमा पर यह चुटकी सब को बहुत भा गई)।

दिल्ली में मैं पिछले चंद वर्षों में कई काव्य गोष्ठियों में गया और इन में मैं ने बहुत सुखद अनुभूति के साथ हिंदी व उर्दू गज़लकारों का अनूठा सम्मेलन भी देखा।

हिंदी और उर्दू दोनों की प्रसिद्व हस्तियों के एक ही मंच पर आने से इस विवाद के कोई अर्थ नहीं रह जाते कि हिंदी ग़ज़ल बेहतर कि उर्दू। उदाहरण के तौर पर मंच पर उपस्थित उर्दू शायरी के एक जाने माने हस्ताक्षर सीमाब 'सुल्तानपुरी' ने जो ग़ज़ल पढ़ी उस के मतले से ही हॉल तालियों की गड़गडाहट से गूँज उठा :

उसको खबर नहीं थी कि वो दायरे में था
सदियों से चल रहा था मगर रास्ते में था.


उर्दू की ही दो और विभूतियाँ:

दर्द 'देहलवी'

अब मेरे दिल को छोड़ के जाना तो है नहीं
वैसे भी ग़म का कोई ठिकाना तो है नहीं.


अहमद मजाज़ 'अमरोहवी'

मुझे तुझ से कुछ शिकायत न हुई न है न होगी
तेरा वस्ल मेरी किस्मत न हुई न है न होगी
मेरे दिल ने तुझ को चाहा तुझे बार बार पूजा
कि कबूल ये इबादत न हुई न है न होगी.


कार्यक्रम संचालक अनिल वर्मा 'मीत' ने चार पंक्तियों में दिल की महिमा गाई-

आहों का पहरा होता है/दर्द जहाँ ठहरा होता है/दिल इक छोटी चीज़ सही पर/सागर से गहरा होता है.

अंत में अध्यक्ष बाल स्वरुप 'राही' ने दोनों विशिष्ट कवियत्रियों व अन्य कवियों को बधाई दी और एक ग़ज़ल भी प्रस्तुत की जिस का मतला है:

अपनी हस्ती के सबूतों को मिटाने के लिए
याद करता हूँ तुझे रोज़ भुलाने के लिए


साहित्यकार और शब्द-शिल्पी शायद पर्यायवाची शब्द हैं, और इसी सन्दर्भ में मुझे उर्मिल सत्यभूषण की एक ग़ज़ल का यह शेर अक्सर याद रहता है, जो ऐसी सशक्त गोष्ठियों पर अपनी निर्णायक बात को स्पष्ट रूप से कहता है:

मैं जहाँ में शब्द-फूलों को रहूँगी बाँटती,
एक खुशबू की तरह हर दिल को मैं महकाऊँगी.


गोष्ठी रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला

Saturday, June 6, 2009

शिलांग हिन्दी सम्मेलन में सम्मानित हुए दिल्ली के साहित्यकार


नई दिल्ली। पिछले दिनों 22-24 मई, 2009 को पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी, मेघालय द्वारा शिलांग में तीन दिवसीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसके अंतर्गत विचार, काव्य संगोष्ठी, महाराज कृष्ण जैन सम्मान एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गरिमापूर्ण आयोजन किया गया। सम्मेलन में देश भर से आए विद्वान साहित्यकारों/हिन्दी सेवियों ने शिरकत की, जिसमें दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के अनेक साहित्यकार/कलाकार भी शामिल हुए।

सम्मेलन के पहले दिन अंबाला छावनी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका शुभ तारिका के महाराज श्री कृष्ण जैन पर केंद्रित अंक के साथ ही दिल्ली की पत्रिका हम सब साथ साथ के बचपन पर केंद्रित अंक का विमोचन संपन्न हुआ। इसके पश्चात विचार व काव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। काव्य संगोष्ठी का सफल संचालन जहाँ फरीदाबाद की सुप्रसिद्ध कवयित्री व कलाकार श्रीमती नमिता राकेश ने किया वहीं सम्मेलन के अंतिम दिन आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम का मनोरंजक संचालन दिल्ली के किशोर श्रीवास्तव ने किया। विभिन्न कार्यक्रमों में दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जिन अन्य प्रमुख लोगों ने सम्मेलन को विशेष गरिमा प्रदान की उनमें पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री पी. के. मिश्र (दिल्ली) सहित कवि/कलाकार सर्वश्री डा. हरीश अरोड़ा, सुषमा भंडारी, जसवन्त जनमेजय, शशि श्रीवास्तव व दिव्यांशु श्रीवास्तव (दिल्ली) एवं डा. धनंजय सिंह (गाजियाबाद) आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।



सम्मेलन के दौरान दिल्ली के श्री किशोर श्रीवास्तव की 24 वें वर्ष में चल रही कार्टून व लघु रचनाओं की पोस्टर प्रदर्शनी खरी-खरी का भी प्रदर्शन किया गया, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा।

सम्मेलन के दौरान देश के सुदूर क्षेत्रों से पधारे अनेक साहित्यकारों के साथ ही दिल्ली और एनसीआर के ऊपर उल्लिखित साहित्यकारों/कलाकारों आदि को भी महाराज श्री कृष्ण जैन साहित्य सम्मान प्रदान कर सम्मानित किया गया।

Monday, March 9, 2009

होली के रंगों में रंगी आनंदम की आठवीं गोष्ठी

संवाददाता

आनन्दम् की 8वीं मासिक गोष्ठी शिवा एन्क्लेव पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी के निवास पर होली-मिलन के रूप में संपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर मुनव्वर सरहदी ने की। इस बार गोष्ठी का आरंभ “हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल और उरूज़” पर एक सार्थक बहस से हुआ। इस दौर में मुनव्वर सरहदी, दरवेश भारती और दर्द देहलवी ने अपने-अपने विचार रखे और श्रोताओं की जिज्ञासाओं के जवाब दिए। जहाँ दरवेश भारती ने उरूज की नियमावली को लाज़मी बताया वहीं मुनव्वर साहब इस बात से इत्तफाक़ न रखते हुए ज़ोर दे रहे थे कि अहंग(तरन्नुम) में जो बात सहज रूप में आ जाए उसी को आधार मान कर ग़ज़ल कहनी चाहिए। भूपेन्द्र कुमार के एक प्रश्न के उत्तर में भारती जी का कहना था कि फारसी की स्वीकृत बहरों के अलावा रुक्न को ध्यान में रखते हुए नई बहर भी ईजाद की जा सकती है। मगर देहलवी जी का मानना यह था कि अदब इस बात की इजाज़त नहीं देता कि हम किसी नई बहर में ग़ज़ल कहें। बहरहाल चर्चा विरोधाभासी व रोचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी रही।

गोष्ठी के काव्य चक्र की शुरूआत क़ैसर अज़ीज़ ने अपनी ग़ज़लों से की –

मिटा दे जो नफरत की तारीकियाँ वो
चिराग़े मुहब्बत जलाने दो हमको
ये ज़ातों के पहरे ये धर्मों का बन्धन
ये दीवार सारी गिराने दो हमको



भूपेन्द्र कुमार ने होली के अवसर पर एक बृज लोक गीत प्रस्तुत किया–

होरी खेलत नेता भैया
पाँच बरस में एक बेर ही आवे होली संसद की
तरस गए नेता मोरे भैया, करें कब ताता थैया



साहिबे ख़ाना जगदीश रावतानी ने अपनी ताज़ा रचनाओं से ख़ूब वाहवाही बटोरी। होली पर उनकी नज़म कुछ यूँ थी–

भीगे तन मन और चोली, हिन्दू मुस्लिम सब की होली
तू भी रंग जा ऐसे जैसे, मीरा थी कान्हा की हो ली।



डॉ अहमद अली बर्क़ी ने होली के रंग को ऐसे बयाँ किया-

भर दे होली ज़िन्दगी में आपकी खुशियों के रंग
आपके इस रंग में पड़ने न पाए कोई भंग



आजकल के हालात पर तंज़ करते हुए प्रेमचंद सहजवाला ने अपने सधे हुए अंदाज़ में कहा-

चल पड़ा है इस मुल्क में भी तालिबानी सिलसिला
कर रहे हैं क़ैद साँसों को हया के नाम पर



दर्द देहलवी ने अपने दर्द को कुछ यूँ व्यक्त किया-

लब खोलकर भी कुछ नहीं कह पाई ज़िन्दगी
ख़ामोश रह कर मौत ने सब कुछ कह दिया



“ग़ज़ल के बहाने” नामक पुस्तक शृंखला के लेखक दरवेश भारती ने नए तेवर की ग़ज़ल कुछ यूँ कही-

ये बनाते हैं कभी रंक कभी राजा तुम्हें
ख्वाब तो ख़्वाब हैं ख़्वाबों पे भरोसा न करो
प्यार कर लो किसी लाचार से बेबस से फकत
चाहे पूजा किसी पत्थर की करो या न करो



इस गोष्ठी के अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने होली और हास्य व्यंगय के रस से महफिल को सराबोर कर दिया-

बाप बनना भी कोई मुश्किल है, गोद ले लो किसी का जाया हो
हमको रखना है दाद से मतलब, शेर अपना हो या पराया हो



गोष्ठी का संचालन नमिता राकेश ने बेहद हसीन और रोचक अंदाज़ में किया।

अंत में सभी ने एक दूसरे को गुलाल लगा तथा गले मिलकर होली की शुभकामनाएँ दीं। होली के रंग में सराबोर होकर हँसी के ठहाकों और मिष्ठान्न तथा चायपान के साथ गोष्ठी संपन्न हुई। आनन्दम के सचिव जगदीश रावतानी ने सभी आगन्तुकों का तहेदिल से धन्यवाद किया।

कुछ और उल्लेखनीय शेर/काव्यांश भी देखें-

मुनव्वर सरहदी-
होनी रंगों का तमाशा ही नहीं, इसके दिल में प्यार भी भरपूर है
है कोई दुश्मन तो लग जाए गले, ये मेरे त्यौहार का दस्तूर है

यार ने तेरे आना है तू होली खेल, सब कुछ खोकर पाना है तू होली खेल
मल दे गहरा रंग तू उसके चेहरे पर, रूठा यार मनाना है तो होली खेल


डॉ. दीपांकर गुप्त-
महकें मेरे गाँव में, कई रंग के फूल
पर पथरीले शहर में, उगें सिर्फ बबूल

सोती ही रही हो तो भले लाचार रही हो
जाग जाए तो शक्ति का अवतार है नारी

जगदीश रावतानी-
परिन्दे तो बनाते हैं बहुत से घर
हमें लगती है उम्र इक घर बनाने में
संभल कर चल कि इज़्ज़त पल में लुटती है
जिसे सालों लगेंगे फिर बनाने में

भूपेन्द्र कुमार-
दासी जिसकी होने को कविता को अभिलाषा वह कबीर है
चलती हो जिसके आगे घुटवन-घुटवन भाषा वह कबीर है

नमिता राकेश-
आज क्या सोच के पलकों पे आँसू
घर की चौखट पे कोई मुसाफिर ठहरा तो नहीं

देखो मुझ पे रंग मत डालो
इन गालों पर तो पहले ही लाली है शर्मो हया की

वीरेन्द्र कमर-
जिस तरफ नज़रे इनायत आपकी हो जाएगी
तीरगी दम तोड़ देगी रोशनी हो जाएगी
आप लाएँ तो सही उर्दू ज़बाँ गुफ्तार में
सामने दुश्मन भी सही तो दोस्ती हो जाएगी

साक्षात भसीन-
कोई कवि तो कोई शायर है और है कोई कवि गवैया
रसीली महफिल है आनन्दम् की जमा यहाँ छोटे-बड़े सब रसैया

डॉ. मनमोहन तालिब-
तू है मेरी निगाह में खिला हुआ गुलाब
तेरा वजूद ख़ुशबू तेरा हुस्न लाजवाब

तबस्सुम आँसुओं में ढल गया है
ख़ुशी ग़म से कितना फ़ासला है
दो आँसू ग़ैर के दुख पर बहुत हैं
मदद इंसान की नज़रे ख़ुदा है।

Thursday, December 18, 2008

आनंदम की दिसम्बर गोष्ठी संपन्न



'आनंदम' संस्था संगीत व साहित्य की एक सुपरिचित संस्था है जो प्रतिमाह दूसरे रविवार को एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करती है.  दिनांक 14 दिसम्बर को 'आनंदम' के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पर इस माह की गोष्ठी का आयोजन हुआ. गोष्ठी में रविन्द्र शर्मा रवि, जगदीश रावतानी, नमिता राकेश, अनुराधा शर्मा, पराग अगरवाल , मनमोहन शर्मा 'तालिब', प्रेमचंद सहजवाला, साक्षात् भसीन, नागेन्द्र पाठक, फखरुद्दीन अशरफ, जीतेन्द्र प्रीतम आदि कवियों ने हिस्सा लिया. गोष्ठी की पहली ग़ज़ल युवा कवयित्री अनुराधा शर्मा ने पढ़ी.  अनुराधा उर्दू शायरी  में एक नया परन्तु सशक्त नाम है, उनके दो शेर प्रस्तुत हैं:

सरेआम  शम्मा  से सवाल  मत  कर 
परवाने  का  जीना मुहाल  मत कर
आंखों  की मुंडेरों  से फिसलते  हुए कहे
माज़ी  का इतना  भी ख़याल  मत कर


पराग अगरवाल की इन पंक्तियों ने प्रभावित कर दिया:

आगाज़ हुआ हैं जबसे तामीर-ए-आशियाने का
तब से इन हवाओ को नाराज़ देख रहा हूँ
या देख रहे हो समंदर में गौर से 
मैं इसका मुसलसल रियाज़ देख रहा हूँ



सुपरिचित कवयित्री नमिता राकेश की कुछ पंक्तियों वातावरण को चटपटा बना दिया:

अपनी क्या तकदीर जनाब/ हवा में जैसे तीर जनाब/ कुछ गजलें कुछ गीत फकत/ है अपनी जागीर जनाब

पर इस पूरे माहौल पर प्रख्यात कवि  रविन्द्र शर्मा 'रवि' अपनी सशक्त गज़लों के साथ छा गए.  पिछले दशक में देश में एक ज़हरीला साम्प्रदायिक वातावरण पनपा. रविन्द्र शर्मा 'रवि' का यह शेर उन सभी सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक दो टूक सलाह है.

किसी भी कौम को बदनाम कर देना नहीं अच्छा,
यहाँ पर भी बुरे होंगे, वहां पर भी भले होंगे.


इसी ग़ज़ल के कुछ और नायाब शेर:

जो औरों के बनाए रास्तों पर ही चले होंगे
समंदर में नहीं वो लोग साहिल पर पले होंगे
ये माना रोशनी की है बहुत शोहरत ज़माने में 
मगर शातिर अंधेरे तो चरागों के तले होंगे.


'आनंदम' संस्थापक जगदीश रावतानी ने भी हिंदू-मुस्लिम विषय को अपने ढंग से उठाया:

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे 
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है.


प्रख्यात कवि बलदेव वंशी ने अंत में बेहद प्रेरणादायक कविताओं से वातावरण की गरिमा बढ़ा दी. अंत में जगदीश  रावतानी द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद् प्रस्ताव से गोष्ठी संपन्न हुई.