Tuesday, September 29, 2009

शायरी के शिखर पर 'आनंदम'

रिपोर्ट- प्रेमचंद सहजवाला


(बाएं से)-आनंदम् प्रमुख जगदीश रावतानी आनंदम्, संचालिका ममता किरणा, अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी

'आनंदम' संस्था ने एक वर्ष पूरा होने के बाद अपने दूसरे वर्ष की दूसरी गोष्ठी कनॉट प्लेस में मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ के सभा कक्ष में दि. 22 सितम्बर 2009 को आयोजित की गई. इस गोष्ठी की अध्यक्षता वयोवृद्ध शायर मुनव्वर 'सरहदी' ने की तथा संचालन सुपरिचित कवियत्री ममता किरण ने किया. मंच पर उन के अतिरिक्त लक्ष्मीशंकर वाजपेयी व 'आनंदम' के अध्यक्ष जगदीश रावतानी उपस्थित थे. इस गोष्ठी में श्रीमती दिनेश, वीरेंद्र क़मर, ज़र्फ़ देहलवी, मजाज अमरोहवी, दर्द देहलवी, क़ैसर 'अज़ीज़', भूपेन्द्र कुमार, मासूम 'गाज़ियाबादी', नीता अरोड़ा, नमिता राकेश, शोभना मित्तल, रवीन्द्र शर्मा 'रवि', शैलेश सक्सेना, सतीश सागर, शिव कुमार मिश्र, मनमोहन 'तालिब', दिनेश चौधरी आहूजा, विशनलाल, आदि ने अपनी रचनाएं पढ़ीं. इस गोष्ठी में प्रस्तुत गीत व ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक रहे. कुछ शायर 'आनंदम' से पहली बार जुड़े थे. इन में से मासूम 'गाज़ियाबादी' ने अपनी दो सशक्त ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. (कुछ शेर):

जब गुबारे-दिल न निकला ये किया दम दे दिया
काश क़ातिल रुकता थोड़ी देर बिस्मिल के करीब
इक तरफ़ जश्ने बहारां इक तरफ रोते हुए
मर गया इक शख्स तनहा तनहा महफिल के करीब

और

कहानी से नहीं आई अगर उन्वान की खुशबू
कहीं रह जाएगी दब कर तेरी पहचान की खुशबू.

शायरी के एक और सिद्धहस्त नाम मजाज 'अमरोहवी':

बड़े ही प्यार से लिखी हैं तुमने चिट्ठियां मुझको
नज़र आती हैं कागज़ पर तुम्हारी अंगुलियाँ मुझको.

ज़िंदगी ऐसे जियो कि ज़िंदगी प्यारी लगे
जिस तरह तारीकियों में रौशनी प्यारी लगे


दर्द 'देहलवी' इख़लाक के शायर माने जाते हैं. पर इख़लाक को कभी कभी वे इस अप्रत्यक्ष तरीके से भी प्रस्तुत करते हैं:

दरगुज़र करता है दुश्मन की खताएँ हंस कर
तू किसी दूसरी दुनिया का बशर लगता है.


कुछ ही दिन पहले देश भर में हिंदी दिवस मनाया गया. शायर कैसर 'अज़ीज़' ने हिंदी पर भी एक शेर कहा:

बात अपनी यदि हिंदी की ज़बानी होगी
सारी दुनिया इसे सुनने को दीवानी होगी


कैसर 'अज़ीज़' ने एक और अच्छी ग़ज़ल पेश की जिस का एक शेर है:

जो किसी टूटे हुए दिल से निकल आती है
वह दुआ अर्श पे जाती है असर से पहले.


शायर रविन्द्र 'रवि' ग़ज़ल में एक अहम् स्थान रखते हैं. अक्सर शहरी जीवन में गुम और बदहवास इंसान पर लिखते हैं.

गुज़र जाते हैं बाकी दिन हमारे बदहवासी में
ज़रा सा ठहर कर कुछ बात बस इतवार करता है.


रविन्द्र शर्मा 'रवि' सियासत पर:

तुम्हारे आंसुओं को देखना मोती कहेगा वो,
सियासतदान है वो दर्द का व्यापार करता है


कवियत्री शोभना मित्तल छंद मुक्त कविताओं व क्षणिकाओं में महारत रखती हैं. एक कविता की दो टूक पंक्तियाँ:

पत्थरों ने बहते पानी को मोड़ दिया
गिरते पानी ने पत्थरों को तोड़ दिया.



मैक्स के शाखा प्रबंधक

नमिता राकेश ने अपनी एक ग़ज़ल में पुरुष की पहचान रखती सतर्क नारी का भाव इस तरह प्रकट किया:

अगर होती मुहब्बत उस के दिल में
यकीनन मैं उसे पहचान जाती.


इस के कंट्रास्ट में 'आनंदम' से पहली बार जुड़ी नीता अरोड़ा ने नारी के परंपरागत शास्त्र्गत रूप को प्रस्तुत किया:

..सृष्टिकर्ता की मैं एक अद्भुत रचना हूँ/ इतिहास के पन्नों की हूँ मैं परछाईं/ भविष्य की सुन्दर कल्पना.../ हर युग में मैंने बदले रूप/ओढी सदा मैं ने नई काया/धरती से नीले अम्बर तक.../नदियों के पानी जैसा चंचल मन है मेरा/गगन के उस पार जैसा विशाल ह्रदय है मेरा...

शायरी रंगबिरंगे फूलों से भरा एक गुलदस्ता होती है. हर शेर या काव्य-पंक्ति के अपने रंग-ओ-खुशबू होते हैं. प्रस्तुत सुंदर पंक्तियाँ उसी विविधता का परिचय देती हैं:

वयोवृद्ध शायर मनमोहन 'तालिब' अपनी आदर्शवादी पहचान के साथ:

रख के सूरज जो सर पे चलते हैं
पाँव धरती पे उन के जलते हैं
मंज़िलें मिलती हैं अमल ही से
बे अमल लोग हाथ मलते हैं.


दिल और दिमाग के बीच चयन करते ज़र्फ़ 'देहलवी'

इल्म की बात हम से मत पूछो
हम तो बस दिल की बात करते हैं.


अब तो अपने वफ़ा नहीं करते
आप गैरों की बात करते हैं.


समाज की सच्चाई का पर्दाफाश करते वीरेंद्र 'क़मर':

साया भी बाप का उठते ही ये सवाल आया
आएँगे मालो-मकीं हिस्से में कितने कितने


सतीश सागर

ज़िन्दगानी का अंत होता है
हर निशानी का अंत होता है
क्या हुआ हम जो हो गए खामोश
हर कहानी का अंत होता है


सैलेश सक्सेना

नाचते चेहरों में अपनी शकल ढूंढता हूँ
शायद मैं अपना खोया हुआ कल ढूंढता हूँ.

शिव कुमार मिश्र

कितनी हसीन लगती है यह रात की शमा
जलता है जिगर ऐसे कि निकले नहीं धुआं.



गोष्ठी के सहभागी

भूपेंद्र कुमार

कबीरा तू संग अपने ले चल हमें
कि अपना ही घर हम जला कर चले


गोष्ठी से एक दिन पहले ईद का ख़ुशी भरा त्यौहार रहा. इस ख़ुशी को फिर से जीते हुए 'आनंदम' अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र को व्यक्त करता एक शेर अपनी एक ग़ज़ल से कहा तो हॉल 'वाह वाह' से गूँज उठा:

दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे
होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है.


सुप्रसिद्ध कवि गीतकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने वर्त्तमान में चौतरफ फैली दहशत और असुरक्षा के बीच जीते इंसान की एक तस्वीर खींच दी:

कदम कदम दहशत के साए/ जीते हैं भगवान भरोसे...
हद तो यह है दवा न जाने/ जीवन दे या मौत परोसे/ जीते हैं भगवन भरोसे...

अंतिम साँसें लेती एक माँ की अपने घर के प्रति भावनाओं का अनूठा स्वरूप ममता किरण ने कुछ यूँ प्रस्तुत किया:

...मैं सोच रही थी/ कि शायद डॉक्टर के साथ उसे भी पता था/ कि उस का अंत निकट है/ इसीलिए वो घर लौटना चाहती थी/ कि जिस घर में वो विदा हो कर आई थी/ उसी घर में अपनी अंतिम सांस ले/.. अपनी अंतिम सांस में वो महसूस लेना चाहती थी/ अपना समूचा संसार...

अंत में अध्यक्ष मुन्नवर सरहदी की बारी आई तो उन्होंने कहा कि इस मुशायरे में एक से एक बढ़ कर एक इतनी सुन्दर रचनाएं आई कि एक दूसरे से तुलना कर के बताना मुश्किल है कि सब से अच्छी किस की थी. उनसे अपनी रचना सुनाने की गुज़ारिश की गई तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में खूब कहकहे बिखेरे:

वो अपनी लैला के लिए हमेशा बेदार है,
मैं जिसे दीवाना समझता था, बहुत होशियार है...

कार्यक्रम के अंत में जगदीश रावतानी ने सभी मौजूद कवियों का धन्यवाद किया और शाखा प्रबंधक द्वारा आगामी काव्य गोष्ठियाँ मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ के सभा कक्ष में करने का आमंत्रण देने के लिए उनका विशेष रूप से धन्यवाद किया.

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5 पाठकों का कहना है :

manu का कहना है कि -

kitne hi khoobsoorat she'r padhne ko mil gaye ...

is mhfil kaa aabhaar..

Anonymous का कहना है कि -

नज़र आती हैं कागज पर तुम्हारी अंगुलियां मुझको...बहुत खूब ! सभी शेर लाजबाब! खबर के लिए धन्यवाद।

Manju Gupta का कहना है कि -

Ek se ek lajvaab shayri lagi
Jagdish ji ko samrpit -
Diwali par prem ka diya jala ,
Jag mein SHANTI ka prkash faila .

irfan का कहना है कि -

Lajawab aayojan ke liye badhaaee.

Shamikh Faraz का कहना है कि -

बहुत ही खुबसूरत शे'र.

कहानी से नहीं आई अगर उन्वान की खुशबू
कहीं रह जाएगी दब कर तेरी पहचान की खुशबू

नज़र आती हैं कागज पर तुम्हारी अंगुलियां मुझको.

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