जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये
अपने वतन की छांव तले जीने और उसी वतन की शानो-शौकत के लिये जान दे देने वाले जांबाज़ जवानों व त्याग की प्रतिमूर्ति कई महापुरुषों ने आखिर समुद्र को मथ कर आज़ादी का अमृत देश को समर्पित कर ही दिया. किन्तु दुष्यंत की उसी गज़ल का मतला आज़ादी रुपी उस वरदान के एक दूसरे रूप को सामने लाता है:
कहाँ तो तय था चरागाँ हरेक घर के लिये
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिये !
आज़ादी की विरासत के हक़दार होने की कसौटी पर शायद हम सब पूरी तरह खरे नहीं उतरे. लेकिन इन तमाम आत्माकलनों के बावजूद यह भी सत्य है कि आज़ादी-दिवस देश का हर व्यक्ति बहुत प्रसन्नता व उत्साह से मनाता है. केवल 15 अगस्त नहीं, वरन अगस्त का पूरा महीना देश में कई जगह आज़ादी से जुड़े समारोह होते रहते हैं जिन में लोग प्रफुल्लित से हिस्सा लेते हैं. उर्मिल सत्यभूषण की 'परिचय साहित्य परिषद' ने भी दि. 20 अगस्त 2010 को अपनी मासिक गोष्ठी देश की आज़ादी को समर्पित की और एकत्रित कवियों ने देश व समाज से जुडी कविताएं पढ़ कर आज़ादी के उन परवानों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनके लिये देश सर्वोपरि था और निजी जीवन कोई अहमियत नहीं रखता था. गोष्ठी हर माह की तरह नई दिल्ली के फिरोज़शाह रोड स्थित Russian Centre for Science and Culture के सभागार में हुई. इस गोष्ठी में Indian Council of UN Relations महासचिव श्री के. एल. मल्होत्रा मुख्य अतिथि थे. इस गोष्टी का एक मुख्य आकर्षण यह भी था कि उर्दू के जाने माने शायर ‘मासूम’ गाज़ियाबादी ने काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता की. 'मासूम' वतन की शायरी में अपना सानी नहीं रखते और अन्य विषयों पर भी वे शायरी में अग्रणी माने जाते हैं तथा दिल्ली के मुशायरों में अक्सर उनकी उपस्थिति गरिमामय मानी जाती है.
बरसात के मौसम के बावजूद गोष्ठी शुरू होते न होते कई शायर आ गए. इस गोष्ठी में लक्ष्मीशंकर बाजपेयी ने देश की तरफ आँख उठा कर देखने वालों को ललकारता एक मुक्तक प्रस्तुत किया:
वक्त आएगा तो काँटों से चुभन मांगेंगे
वक्त आएगा तो शोलों से तपन मांगेंगे
तुमको देखे तो कोई आँख उठा कर ऐ वतन
हम तो हँसते हुए मरघट से कफ़न मांगेंगे
वहीं लखीमचंद्र ‘सुमन ने भी चुनौती भरे स्वर में पढ़ा:
जिस्म भारत है मेरा दिल मेरा कश्मीर समझ
मेरे हर अंग को हर प्रान्त की तस्वीर समझ
किसी भी अंग को दुश्मन की नज़र छू ले अगर
वो ‘सुमन’ अंग है दुश्मन के लिये तीर समझ.
ममता किरण जो सटीक से सटीक शब्दावली व प्रभावशाली शैली के लिये जानी-मानी हैं, ने सियासतदानों पर अंगुली उठा कर उनका पर्दाफाश किया:
बशर के बीच पहले भेद करते हैं सियासतदां
ज़रूरत फिर जताते हैं किसी कौमी तराने की
शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने पढ़ा:
वतन की नींव पर मिट्टी जमा है जिन शहीदों की
कभी भी भूल मत करना उन्हें तुम भूल जाने की
दिल्ली की काव्य गोष्ठियों व मुशायरों की एक अन्य जानी मानी हस्ती हैं रविन्द्र शर्मा ‘रवि’ जिन का शब्द शब्द मर्म-स्पर्शी है. उनका ध्यान देश के सन्दर्भ में किसानों पर गया और उनकी गज़ल का एक शेर था:
किसी के वास्ते बरसात है बदला हुआ मौसम
किसी के वास्ते यह साल भर की आस होता है.
उन्होंने ज़िन्दगी की मीमांसा करते हुए एक बेहद दार्शनिक शेर भी कहा:
कभी खामोश लम्हों में मुझे एहसास होता है
कि जैसे ज़िन्दगी भी रूह का बनवास होता है.
सुमित्रा वरुण ‘काफिर’ ने अपनी कविता में सच्चे मन से एक प्रार्थना प्रस्तुत की:
कोई धर्म ऐसा मिले हमें, जिस में कोई बंधन न हो
कोई प्रार्थना ऐसी मिले, जिस में रुदन क्रंदन न हो
तो भूपेंद्र कुमार जो हिंदी भाषा में महारत रखते हैं, ने जीवन्तता का सन्देश दिया:
शिकस्ता हाल में कब तक रहेंगे हम बताओ तो
गिरेंगे हम अगर सौ बार फिर भी गिर के उठाना तय है.
शोभना मित्तल की कविता में भी वही चिंता व्याप्त थी जो देश की जनता के मन में व्याप्त है कि क्या हम आज़ादी को उस का असली रूप दे पाए:
स्वतंत्रता तो मिली / लेकिन मोल हम उस का आंक न पाए / हर साल मनाते हैं स्वाधीनता दिवस / आस्था के कैलेंडर पर छाप न पाए.
साक्षात् भसीन
नफरत कहिये या कहिये इसे आग
नफरत से बड़ी कोई भी नहीं आग
अर्चना त्रिपाठी ने कुछ दोहे तथा एक कविता प्रस्तुत की. जैसे:
पिंजरे से लड़ कर हुआ जो लोहू लुहान
वही समझता आज़ादी, आज़ादी की शान
डॉ. सत्यवती शर्मा ने सरहदों की बात की जो देशों और व्यक्तियों के बीच विकराल रूप धारण किये रहती हैं:
जब नहीं सरहद गगन में/ जब नहीं सरहद पवन में/ जब नहीं सरहद अगन में/ जब नहीं सरहद सागर की उठती गिरती तरंग में/ जब नहीं सरहद नयन के अश्रुओं की धार में/ फिर खड़ी क्यों सरहदें इंसान के व्यवहार में.
प्रेमचंद सहजवाला
अब कहाँ से आएँगे वो लोग जो नायाब थे,
रात की तारीकियों में टिमटिमाते ख्वाब थे
शहीदों के प्रति:
सुबह आए इसलिए वो रात भर जलते रहे
रौशनी से लिख रहे वो इक सुनहला बाब थे
कुछ अन्य कवि:
नागेश चन्द्र
कामनवेल्थ के बाद गेम एक और मालिक करवा दो / भागें लोग तमाम किन्तु दिल्ली को स्वर्ग बना दो/ झोंपड़-पट्टी हटे दिखे चहुँ दिस हरियाली/ गगनचुम्बी रेस्तरां से दिखे सूप की प्याली.
एस नंदा ‘नूर’
जो दाता ने बख्शी हमें ज़िन्दगानी
सदा हम कोई उसका मकसद बनाएं
अंतिम बाज़ी ‘मासूम’ गाजियाबादी की थी जिन की शायरी सुनने का सब को बेताबी से इंतज़ार था. ‘मासूम’ जी ने एक से बढ़ कर एक गज़लें प्रस्तुत की तो उपस्थित श्रोतागण में भी ‘वाह वाह’ करने की स्फूर्ति सी आ गई. कुछ शेर:
चमन लुटने का ही इक गम नहीं इस का भी सदमा है
कि इन हालात में कैसे निगहबानों को नींद आई
ज़माने में तो पसमंज़र भी इन आँखों ने देखे हैं
कि जब इंसानियत रोई तो हैवानों को नींद आई.
गोष्ठी के अंत में ‘परिचय साहित्य परिषद’ अध्यक्ष उर्मिल सत्यभूषण ने मुख्य अतिथि व ‘मासूम’ गाजियाबादी तथा सभी कवियों का धन्यवाद किया व देश के सन्दर्भ में कुछ दोहे प्रस्तुत कर के गोष्ठी संपन्न की:
जागो प्रहरी देश के, किस की देखें बाट
देश द्वार के काठ को रही दीमकें चाट
मैंने अपनी ज़िन्दगी कर दी तेरे नाम
भारत माँ जननी मेरी ऐ माँ तुझे प्रणाम
कविता के क्षेत्र में दिल्ली की असंख्य काव्य संस्थाएं अपनी गतिविधियों से कविता-संसार को निरंतर सक्रिय रखे हैं, यह अपने आप में एक सुखद बात है. सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं द्वारा स्थापित सांस्कृतिक व बौद्धिक मंच 'कवितायन' ने दिनांक 23 अप्रैल 2010 को अपने तीसरे वार्षिक समारोह में हिंदी के कई कवियों - अमरनाथ अमर, नमिता राकेश, अभिषेक अत्रे, ममता किरण, चंद्रशेखर आसरी, जितेन्द्र सिंह, विवेक मिश्र तथा एम. एन. कृष्णमणि को 'साहित्य सृजन सम्मान' से सम्मानित किया. कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट के सामने ही स्थित Indian Society of International Law के सभागार में हुआ. इस कार्यक्रम में हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार गोविन्द व्यास मुख्य अतिथि थे तथा न्यायमूर्ति वी. एस. सिरपुरकर विशिष्ट अतिथि थे जिन्हें कवितायन ने विशिष्ट रूप से 'कवितायन साहित्य-सेवी सम्मान' दिया.
कार्यक्रम का प्रारंभ ज्योति प्रज्वलन व 'वर दे वीणा वादिनी..' प्रार्थना से हुआ. दि. 22 अगस्त 1946 को जन्मे न्यायमूर्ति वी.एस.सिरपुरकर, जिन का पूरा परिवार अधिवक्ता रहा तथा जो उत्तराँचल व पश्चिम बंगाल के मुख्य न्यायाधीश के पदों पर कार्यरत रह चुके हैं और वर्त्तमान में सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश हैं, की गरिमामय उपस्थिति ने इस कार्यक्रम की गरिमा को और भी बढ़ाया तथा सभागार में वकील समुदाय व न्यायपालिका से जुड़े कई लोग और अन्य काव्य-प्रेमी बेहद तन्मयता से कार्यक्रम देख रहे थे. पर जब उन्होंने भाषण प्रारंभ किया तो उनके ह्यूमर (Humour) के आगे चित्त हो कर दर्शक-गण लगातार खिलखिलाते रहे. एक जज का कार्य अति-गंभीर व ज़िम्मेदारी भरा रहता है, पर उस धीर-गंभीर वातावरण से मुक्त हो कर जब वह ऐसे किसी कार्यक्रम में हंसी बिखेरता है तो बहुत सुखद अनुभूति होती है. उन्होंने अपने भाषण में कहा :
मैं तानसेन भले ही न हूँ/पर कानसेन ज़रूर हूँ ! (ज़ोरदार कहकहा).
उन्होंने अपनी एक कविता प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन भर में उन्होंने केवल एक ही कविता लिखी. (कुछ पंक्तियाँ):
कविता क्या हो तुम/ कितने हैं रूप तुम्हारे/ शिशु हृदय के लिए ऊषणामय हो तुम/ लोरियों में नींद/ पलकें झपकाती/ ममतामय हो तुम...
सरिता शर्मा का काव्यपाठ
ममता किरण का काव्यपाठ
मुख्य अतिथि गोविन्द व्यास ने भी अपने भाषण में न्यायमूर्ति सिरपुरकर के सन्दर्भ में यह कह कर सभागार में कहकहे बिखेर दिए कि कभी-कभी उन्हें लगता है कि जिस व्यक्ति को कवि होना चाहिए, वह न्यायालय में आ गया है और शायद जिस व्यक्ति को न्यायालय में होना चाहिए, वह कविता कर रहा है. एक अन्य सन्दर्भ में भी सभागार हंसी से झूम गया जब उन्होंने कहा कि एक अच्छा कवि भी अच्छा आदमी हो सकता है. व्यंग्यकार के रूप में जग-प्रसिद्ध गोविन्द व्यास ने यह भी स्पष्ट कहा कि आज़ादी से पहले की तुलना में अब समय काफी बदल चुका है. पहले कई नामी-गिरामी वकील राजनीति में आए और देश के लिए काफी सकारात्मक काम किया जब कि अब राजनीति में वही लोग हैं जो राजनीति ही कर रहे हैं. अपने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहकहे बिखेरने में भी वे जग-प्रसिद्ध हैं ही. उन के द्वारा प्रस्तुत कुछ छोटी छोटी कविताओं के अंश यहाँ प्रस्तुत हैं:
कोई जागे कि न जागे ये मुकद्दर उस का
आपका काम है आवाज़ लगाते रहना
और
नदी अपने किनारे पर सर रख कर रो रही है
हाय, लहरों को इस देश में कितनी तकलीफ हो रही है
सम्मानित कवियों को सम्मान-स्वरुप एक एक शाल व प्रशस्ति-चिह्न प्रदान किया गया. इस के पश्चात सम्मानित कवियों व अन्य आमंत्रित कवियों द्वारा काव्य-पाठ हुआ. इन में से ममता किरण अपनी कुछ ताज़ा कविताओं के साथ प्रस्तुत थी. हिंदी गज़ल में एक सशक्त हस्ताक्षर के रूप में प्रसिद्ध ममता किरण के कुछ शेर:
मेरी मंज़िल क्या है मुझ को क्या खबर
कह रहा था फूल इक दिन पत्तियों से
बंद घर उसने जो देखा खोल कर
एक टुकड़ा धूप आई खिड़कियों से
जो राहों में तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझ से
तो रुक कर खाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं.
नमिता राकेश हिंदी की एक अति-व्यस्त कवियत्री हैं जिन के लगभग पांच कविता संग्रह हैं व कई सम्मिलित संकलनों में उनकी कविताएँ संकलित हैं. उनकी कविताओं और शख्सियत - दोनों में ही एक आकर्षक इगो सा अक्सर झलकता है. यहाँ उनके द्वारा प्रस्तुत कविताओं की एक झलक:
मैं एक समुद्र हूँ/ शांत गंभीर गहरा/ न जाने अपने में क्या क्या छुपाए/ सीप/ मोती/ चट्टानें/ पत्थर...
... पत्थर फेंकने से/ शांत समुद्र में/ हलचल होती ही है/ लहरें विरोध करती ही हैं...
...यह तो प्रकृति का शाश्वत नियम है/ जो दोगे वही पाओगे/ अब यह तुम पर निर्भर है/कि तुम क्या पाने के योग्य हो/ मोती कि छींटें.
पेशे से वकील चंद्रशेखर आसरी ने दो कविताएँ पेश की जिन में से कुछ पंक्तियाँ उन के पेशे से ही संबंधित कुछ दिलचस्प सी पंक्तियाँ हैं:
'क्लाइंट' की भावनाओं में बह जाता हूँ मैं/ उस कर हर 'इमोशनल' अत्याचार भी सह जाता हूँ मैं/ इस व्यवस्था के ताबूत में एक छोटी सी कील हूँ मैं/ एक लो प्रोफाईल वकील हूँ मैं.
अन्य आमंत्रित कवियों को भी स्वागत में एक एक प्रतीक चिह्न दिया गया. उनमें जिस कवियत्री ने पूरे सभागार को अपनी मार्मिक आवाज़ व तरन्नुम भरे काव्य की गिरफ्त में ले लिया, वे थी डॉ. सरिता शर्मा. उनके द्वारा प्रस्तुत गीतों की कुछ पंक्तियाँ बेहद मार्मिक भी रही. जैसे:
हृदय की वेदना कहने न देंगे/ इन्हें हम आँख से बहने न देंगे/ बनेंगे जग हंसाई चार आंसू.
और
निडर बन कर उमड़ना चाहते हैं/ कभी मन में घुमड़ना चाहते हैं/स्वयं बन कर रुबाई चार आंसू.
इस से पहले उन्होंने समुद्र और नदियों पर कई पंक्तियाँ सुनाई. समुद्र और नदियों के बीच का समीकरण शायद हर कवि का प्रिय विषय रहा है. सरिता शर्मा की ये पंक्तियाँ:
लहर जैसी चपलता तो मुझ में भी है/ अनकही इक विकलता तो मुझ में भी है/ मैं नदी हूँ किनारों में सिमटी हुई/ इक समुन्दर मचलता तो मुझ में भी है...
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार व गज़लगो हैं. उनके कुछ सशक्त शेर:
फूल कागज के हो गए जब से
खुशबुएँ दरबदर हुई तब से
बेटियाँ फिक्रमंद रहती हैं
बेटे रखते हैं काम मतलब से
जब से पानी नदी में आया है
हम भि प्यासे खड़े हैं बस तब से.
ज़र्फ देहलवी उर्दू शायरी में महारत रखते हैं. उन के द्वरा गाई हुई दर्द भरी गज़ल ने समां बाँध दिया.
अहसास के सब पैकर, आज़ार के सामाँ हैं
अब प्यार वफ़ा शफकत, मिलते हैं दुकानों में
(पैकर = शरीर, शफकत = पवित्रता).
उर्दू गज़ल में एक अन्य सशक्त व स्व-नाम-धन्य शायर अनीस अहमद खान:
अंदर अंदर खुद को बेच
बाहर से खुद्दारी रख
मुफ्त में गुस्सा मत हो माँ
रोटी दे तरकारी रख
दलबदलीधर जल्दी आ
जाने की तैयारी रख
न्यायमूर्ति सिरपुरकर व गोविन्द व्यासके प्रस्थान के बाद भी कार्यक्रम चलता रहा व कई अन्य कवियों ने कविताएँ पढ़ी. इस सत्र की अध्यक्षता लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने की।
दिल्ली में ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ तथा ‘इंडिया हैबीटैट सेंटर’ बौद्धिक सांस्कृतिक गतिविधियों के महाकेंद्र माने जाते हैं। मुख्य फाटक से भीतर जाते ही एक विशाल हाल में एक से बढ़ कर एक चित्र-प्रदर्शनियाँ देखने को मिलती हैं तो किसी किसी सभागार में कविता के बहुत सुन्दर आयोजन हो रहे होते हैं। समीर कक्कड़ द्वारा स्थापित ‘यूनिवर्सल पोइट्री’ पिछले वर्ष स्थापित कविता से जुड़ी एक संस्था है जो प्रति माह काव्य गोष्ठियों में किसी एक विशिष्ट कवि की कविताओं के अतिरिक्त हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी के कई कवियों के कविता पाठ का आयोजन करती है। यह बहुत सुखद अनुभूति है कि लगभग डेढ़ घंटे में तीन चार भाषाओं में कविता के असंख्य रंग दिखने लगें। यहाँ अनुभवी कवि भी आते हैं तो युवा कवि अपनी नई वैचारिकता व उत्साह के साथ अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं। कभी-कभी विदेशों के विशिष्ट कवि भी अपनी काव्य-प्रस्तुति करते हैं।
दि. 10 फरवरी 2010 को ‘गुलमोहर हाल’ की काव्य गोष्ठी में ममता किरण ने विशिष्ट कवि के रूप में अपनी कुछ ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत की तथा एक बार फिर यह प्रमाणित किया कि वे छंद-मुक्त कविता तथा गज़ल, दोनों में महारत-हासिल कवयित्री हैं। मानवीय संबंधों में किसी भी प्रकार की गिलगिली संवेदना से मुक्त, उनकी पंक्तियाँ स्वाभाविक रूप से एक निर्झरिणी सी प्रवाहित होती हैं. कई पंक्तियाँ बहुत प्यारापन सा लिए रहती हैं। जैसे:
तारों भरे आसमान के साथ/ चाँद का साथ साथ चलना/ सफर में अच्छा लगता है/ कितना अच्छा होता/ इस सफर में चाँद की जगह तुम साथ होते!
या-
एक दूजे में खोना है, चाँद-गगन सा होना है।
जहां मिलन से जुडी ये प्यारी पंक्तियाँ हैं, वहीं विरह की वेदना, जो शायद विश्व भर की कवयित्रियों की चिरपरिचित काव्य-भूमि है, पर भी ममता की कलम निर्बाध चलती है-
कभी इक पेड़ सायादार था जो, वही अब तनहा तनहा ढल रहा है।
पर अक्सर मुझे यह लगता है कि ममता कभी कभी दार्शनिक भी हो जाती हैं या भक्ति-भाव से जुड जाती हैं। नीचे जो पंक्तियाँ उद्धृत हैं, उन्हें भगवन से भी जोड़ा जा सकता है और सांसारिक प्रेम से भी, या फिर प्रेम स्वाभावतः अलौकिक होता है, चाहे वह मनुष्य से हो या रचेता से-
ये रख अहसास तू तनहा नहीं है, कि तेरे साथ कोई चल रहा है.
प्रेम और भक्ति मिल कर एक ही तत्व बन जाते होंगे शायद।
विरह के भाव ममता की एक तरही गज़ल में भी आते हैं। (तरही गज़ल का मिसरा है: तुझे ए जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं) -
जो राहों में तेरी यादें बहुत टकराती हैं मुझ से तो रुक कर ख़ाक तेरे कूचे की हम छान लेते हैं.
गज़ल की परिभाषा यह कि सभी शेर अलग-अलग विषयों पर और परस्पर स्वतंत्र रहते हैं। इसी स्वतंत्रता के तहत इस तरही गज़ल का यह सामाजिक शेर-
छुपा है दिल में क्या उनके ये सब हम जान लेते हैं, मुखौटा ओढ़ने वालों को हम पहचान लेते हैं
ममता किरण का एक प्रिय विषय है ‘माँ’। मेरा व्यक्तिगत आकलन है कि जितनी मर्म-स्पर्शी पहचान वे माँ की रखती हैं, शायद किसी अन्य विषय की नहीं. नीचे दी हुई काव्य-पंक्तियाँ अपना वक्तव्य खुद प्रस्तुर करती हैं-
बीमार जर्जर बूढ़ी माँ/याद करती है अपने बेटे को/लिखवाती है चिट्ठी पड़ोस की लड़की से/ अब ज़रूरत नहीं है तुम्हारे भेजे पैसे और दवाओं की/ सिर्फ तुम आ जाओ/ बैठो मेरे पास/ तुम्हारे बचपन की स्मृतियों में तलाशूँ अपना अतीत/ अपने जीवन की संतुष्टि।
इस गोष्ठी में कई अन्य कवियों यथा लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, सीमाब सुल्तानपुरी, ममता अग्रवाल आदि ने अपनी सशक्त कवितायें पढ़ी। इस के अतिरिक्त कजाखस्तान की कवयित्री अक्बोता महमूदिया ने कई सशक्त रूसी कवितायें पढ़ी। समीर कक्कड़ द्वारा सभी कवियां के धन्यवाद के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।
15 दिसंबर की शाम को कस्तूरबा गांधी मार्ग, कनॉट प्लेस स्थित मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के सभागार में आनंदम् की इस वर्ष की अंतिम काव्य गोष्ठी हिन्दी, उर्दू और पंजाबी की रचनाओं की रंगबिरंगी छटा के साथ अत्यंत उल्लास पूर्ण माहौल में संपन्न हुई। गोष्ठी में दिल्ली के अलावा अलीगढ़, ग़ाज़ीयाबाद व रेवाड़ी इत्यादि अन्य नगरों से पधारे नए, पुराने, युवा एवं अनुभवी सभी रचनाकारों ने छन्दबद्ध एवं छन्दमुक्त दोनों तरह की उत्कृष्ट रचनाएँ पेश कीं और श्रोताओं की ख़ूब वाहवाही लूटी।
निम्न लिखित रचनाकारों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से गोष्ठी की शोभा बढ़ाई- सर्वश्री मुनव्वर सरहदी, नाशाद देहलवी, जगदीश जैन, नागेश चन्द्र, मासूम ग़ाज़ियाबादी, रमेश सिद्धार्थ, डॉ. रज़ी अमरोहवी, नश्तर अमरोहवी, दरवेश भारती, सोढी प्रीतपाल सिंह पाल, डॉ. मनमोहन तालिब, पंडित प्रेम बरेलवी, मजाज़ मरोहवी, भूपेन्द्र कुमार, जगदीश रावतानी, क़ैसर अज़ीज़, प्रेमचंद सहजवाला, शिव कुमर मिश्र मोहन, शैलेश सक्सैना, पुरुषोत्तम वज्र, सतीश सागर, जितेन्द्र प्रीतम, रमेश भम्भानी, श्रीमती दिनेश आहूजा एवं श्रीमती ममता किरण।
अपने ख़ूबसूरत अंदाज़ में गोष्ठी का संचालन श्रीमती ममता किरण ने किया जिसकी अध्यक्षता जनाब जगदीश जैन ने की। गोष्ठी में प्रस्तुत की गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –
दरवेश भारती- एक ख़ुदा को छोड़ कर सजदा करे है दर-ब-दर आज हर शख़्स ने कितने ख़ुदा बना लिए
मासूम ग़ाज़ियाबादी- हमेशा तंगदिल दानिश्वरों से फ़ासला रखना मणि मिल जाए तो क्या साँप डसना छोड़ देता है
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी- बाज़ार में मिले हैं चीज़ें ही नहीं नक़ली नक़ली का ही रोना है रिश्तों की दुकानों में
रमेश सिद्धार्थ- यूँ उजालों का इंतज़ार करोगे कब तक ग़म के सायों से बार-बार डरोगे कब तक
ममता किरण- चाहे जितना वो रूठ लें मुझ से, मान ही जाएँगे मनाने से घर में आएगा जब नया बच्चा, घर हँसेगा इसी बहाने से
सतीश सागर- कुआँ उन्होंने भी खोदा था, कुआँ इन्होंने भी खोदा है असली बात ये है कि पानी न तब था न पानी अब है
नश्तर अमरोहवी- अभी पे नहीं मिली, तू आजकल क्रीम पाउडर को भूल जा शलवार को कमीज़ को जम्पर को भूल जा घर के हर एक ख़ाली कनस्तर को भूल जा बिस्तर हो तुझको याद तो बिस्तर को भूल जा बस रख यही ख़याल, अभी पे नहीं मिली
पंडित प्रेम बरेलवी- जाने वालों से रोता है दिल कितना नाज़ुक होता है
जितेन्द्र प्रीतम- देश तो महान ये, धरती की शान ये देखिए तो कैसे बदनाम हो गया है जी जाति धर्म प्रांत और भाषाओं के झगड़े में स्वाभिमान इसका नीलाम हो गया है जी
रज़ी अमरोहवी- मेरी ग़ज़ल का तुम्हें इंतज़ार बाक़ी है सुनार पढ़ चुके सारे, लुहार बाक़ी है
गोष्ठी के अंत में आनंदम् के संस्थापक जगदीश रावतानी जी ने सभी को सूचित किया कि जिस प्रकार आनंदम् के अंतर्गत संगीत के कार्यक्रम निरंतर आयोजित हो रहे हैं उसी प्रकार आनंदम् की योजना है कि नव वर्ष के आरंभ से ही हर माह में तीन चार अन्य गोष्ठियाँ आयोजित की जाएँ जिसके लिए उन्होंने उपस्थित विद्वजनों से इस संबन्ध में सुझाव मांगे। कुछ लोग इस पक्ष में थे कि लघुकथा गोष्ठी आयोजित की जाए तो कुछ का सुझाव था कि सामयिक विषयों पर चर्चा गोष्ठी आयोजित की जाए तथा कभी-कभी पुस्तक चर्चा के साथ-साथ किसी कवि का एकल काव्य पाठ भी आयोजित किया जाए। उन्होंने आश्वासन दिया कि इन सुझावों पर यथासंभव अमल किया जाएगा। अंत में सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी संपन्न हुई।
(बाएं से)-आनंदम् प्रमुख जगदीश रावतानी आनंदम्, संचालिका ममता किरणा, अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी
'आनंदम' संस्था ने एक वर्ष पूरा होने के बाद अपने दूसरे वर्ष की दूसरी गोष्ठी कनॉट प्लेस में मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ के सभा कक्ष में दि. 22 सितम्बर 2009 को आयोजित की गई. इस गोष्ठी की अध्यक्षता वयोवृद्ध शायर मुनव्वर 'सरहदी' ने की तथा संचालन सुपरिचित कवियत्री ममता किरण ने किया. मंच पर उन के अतिरिक्त लक्ष्मीशंकर वाजपेयी व 'आनंदम' के अध्यक्ष जगदीश रावतानी उपस्थित थे. इस गोष्ठी में श्रीमती दिनेश, वीरेंद्र क़मर, ज़र्फ़ देहलवी, मजाज अमरोहवी, दर्द देहलवी, क़ैसर 'अज़ीज़', भूपेन्द्र कुमार, मासूम 'गाज़ियाबादी', नीता अरोड़ा, नमिता राकेश, शोभना मित्तल, रवीन्द्र शर्मा 'रवि', शैलेश सक्सेना, सतीश सागर, शिव कुमार मिश्र, मनमोहन 'तालिब', दिनेश चौधरी आहूजा, विशनलाल, आदि ने अपनी रचनाएं पढ़ीं. इस गोष्ठी में प्रस्तुत गीत व ग़ज़लें एक से बढ़ कर एक रहे. कुछ शायर 'आनंदम' से पहली बार जुड़े थे. इन में से मासूम 'गाज़ियाबादी' ने अपनी दो सशक्त ग़ज़लें प्रस्तुत कीं. (कुछ शेर):
जब गुबारे-दिल न निकला ये किया दम दे दिया काश क़ातिल रुकता थोड़ी देर बिस्मिल के करीब इक तरफ़ जश्ने बहारां इक तरफ रोते हुए मर गया इक शख्स तनहा तनहा महफिल के करीब
और
कहानी से नहीं आई अगर उन्वान की खुशबू कहीं रह जाएगी दब कर तेरी पहचान की खुशबू.
शायरी के एक और सिद्धहस्त नाम मजाज 'अमरोहवी':
बड़े ही प्यार से लिखी हैं तुमने चिट्ठियां मुझको नज़र आती हैं कागज़ पर तुम्हारी अंगुलियाँ मुझको.
ज़िंदगी ऐसे जियो कि ज़िंदगी प्यारी लगे जिस तरह तारीकियों में रौशनी प्यारी लगे
दर्द 'देहलवी' इख़लाक के शायर माने जाते हैं. पर इख़लाक को कभी कभी वे इस अप्रत्यक्ष तरीके से भी प्रस्तुत करते हैं:
दरगुज़र करता है दुश्मन की खताएँ हंस कर तू किसी दूसरी दुनिया का बशर लगता है.
कुछ ही दिन पहले देश भर में हिंदी दिवस मनाया गया. शायर कैसर 'अज़ीज़' ने हिंदी पर भी एक शेर कहा:
बात अपनी यदि हिंदी की ज़बानी होगी सारी दुनिया इसे सुनने को दीवानी होगी
कैसर 'अज़ीज़' ने एक और अच्छी ग़ज़ल पेश की जिस का एक शेर है:
जो किसी टूटे हुए दिल से निकल आती है वह दुआ अर्श पे जाती है असर से पहले.
शायर रविन्द्र 'रवि' ग़ज़ल में एक अहम् स्थान रखते हैं. अक्सर शहरी जीवन में गुम और बदहवास इंसान पर लिखते हैं.
गुज़र जाते हैं बाकी दिन हमारे बदहवासी में ज़रा सा ठहर कर कुछ बात बस इतवार करता है.
रविन्द्र शर्मा 'रवि' सियासत पर:
तुम्हारे आंसुओं को देखना मोती कहेगा वो, सियासतदान है वो दर्द का व्यापार करता है
कवियत्री शोभना मित्तल छंद मुक्त कविताओं व क्षणिकाओं में महारत रखती हैं. एक कविता की दो टूक पंक्तियाँ:
पत्थरों ने बहते पानी को मोड़ दिया गिरते पानी ने पत्थरों को तोड़ दिया.
मैक्स के शाखा प्रबंधक
नमिता राकेश ने अपनी एक ग़ज़ल में पुरुष की पहचान रखती सतर्क नारी का भाव इस तरह प्रकट किया:
अगर होती मुहब्बत उस के दिल में यकीनन मैं उसे पहचान जाती.
इस के कंट्रास्ट में 'आनंदम' से पहली बार जुड़ी नीता अरोड़ा ने नारी के परंपरागत शास्त्र्गत रूप को प्रस्तुत किया:
..सृष्टिकर्ता की मैं एक अद्भुत रचना हूँ/ इतिहास के पन्नों की हूँ मैं परछाईं/ भविष्य की सुन्दर कल्पना.../ हर युग में मैंने बदले रूप/ओढी सदा मैं ने नई काया/धरती से नीले अम्बर तक.../नदियों के पानी जैसा चंचल मन है मेरा/गगन के उस पार जैसा विशाल ह्रदय है मेरा...
शायरी रंगबिरंगे फूलों से भरा एक गुलदस्ता होती है. हर शेर या काव्य-पंक्ति के अपने रंग-ओ-खुशबू होते हैं. प्रस्तुत सुंदर पंक्तियाँ उसी विविधता का परिचय देती हैं:
वयोवृद्ध शायर मनमोहन 'तालिब' अपनी आदर्शवादी पहचान के साथ:
रख के सूरज जो सर पे चलते हैं पाँव धरती पे उन के जलते हैं मंज़िलें मिलती हैं अमल ही से बे अमल लोग हाथ मलते हैं.
दिल और दिमाग के बीच चयन करते ज़र्फ़ 'देहलवी'
इल्म की बात हम से मत पूछो हम तो बस दिल की बात करते हैं.
अब तो अपने वफ़ा नहीं करते आप गैरों की बात करते हैं.
समाज की सच्चाई का पर्दाफाश करते वीरेंद्र 'क़मर':
साया भी बाप का उठते ही ये सवाल आया आएँगे मालो-मकीं हिस्से में कितने कितने
सतीश सागर
ज़िन्दगानी का अंत होता है हर निशानी का अंत होता है क्या हुआ हम जो हो गए खामोश हर कहानी का अंत होता है
सैलेश सक्सेना
नाचते चेहरों में अपनी शकल ढूंढता हूँ शायद मैं अपना खोया हुआ कल ढूंढता हूँ.
शिव कुमार मिश्र
कितनी हसीन लगती है यह रात की शमा जलता है जिगर ऐसे कि निकले नहीं धुआं.
गोष्ठी के सहभागी
भूपेंद्र कुमार
कबीरा तू संग अपने ले चल हमें कि अपना ही घर हम जला कर चले
गोष्ठी से एक दिन पहले ईद का ख़ुशी भरा त्यौहार रहा. इस ख़ुशी को फिर से जीते हुए 'आनंदम' अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द्र को व्यक्त करता एक शेर अपनी एक ग़ज़ल से कहा तो हॉल 'वाह वाह' से गूँज उठा:
दिन ईद का है आ के गले से लगा मुझे होली पे जैसे तू मुझे मलता गुलाल है.
सुप्रसिद्ध कवि गीतकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने वर्त्तमान में चौतरफ फैली दहशत और असुरक्षा के बीच जीते इंसान की एक तस्वीर खींच दी:
कदम कदम दहशत के साए/ जीते हैं भगवान भरोसे... हद तो यह है दवा न जाने/ जीवन दे या मौत परोसे/ जीते हैं भगवन भरोसे...
अंतिम साँसें लेती एक माँ की अपने घर के प्रति भावनाओं का अनूठा स्वरूप ममता किरण ने कुछ यूँ प्रस्तुत किया:
...मैं सोच रही थी/ कि शायद डॉक्टर के साथ उसे भी पता था/ कि उस का अंत निकट है/ इसीलिए वो घर लौटना चाहती थी/ कि जिस घर में वो विदा हो कर आई थी/ उसी घर में अपनी अंतिम सांस ले/.. अपनी अंतिम सांस में वो महसूस लेना चाहती थी/ अपना समूचा संसार...
अंत में अध्यक्ष मुन्नवर सरहदी की बारी आई तो उन्होंने कहा कि इस मुशायरे में एक से एक बढ़ कर एक इतनी सुन्दर रचनाएं आई कि एक दूसरे से तुलना कर के बताना मुश्किल है कि सब से अच्छी किस की थी. उनसे अपनी रचना सुनाने की गुज़ारिश की गई तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में खूब कहकहे बिखेरे:
वो अपनी लैला के लिए हमेशा बेदार है, मैं जिसे दीवाना समझता था, बहुत होशियार है...
कार्यक्रम के अंत में जगदीश रावतानी ने सभी मौजूद कवियों का धन्यवाद किया और शाखा प्रबंधक द्वारा आगामी काव्य गोष्ठियाँ मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ के सभा कक्ष में करने का आमंत्रण देने के लिए उनका विशेष रूप से धन्यवाद किया.
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