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Tuesday, June 28, 2011

डायलॉग गोष्ठी में हुआ सजीव सारथी की पुस्तक 'एक पल की उम्र लेकर' का लोकार्पण

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 2 घंटा 19 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।

हर महीने के आखिरी शनिवार को अकादमी ऑफ फाईन आर्ट्स एंड लिटरेचर में होने वाली काव्यात्मक गोष्ठी “डायलॉग” इस बार 25 जून को संपन्न हुई। कार्यक्रम तीन चरणों में संपन्न हुआ। सबसे पहले भारत के पिकासो मकबूल फ़िदा हुसैन और कवि रंजीत वर्मा की माता को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। उसके बाद हिन्दयुग्म के आवाज़ मंच के संपादक एवं युवा कवि सजीव सारथी की पुस्तक “एक पल की उम्र लेकर” का विमोचन करते हुए ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि सजीव की कविताओं पर उनके मलयाली होने की छाप नहीं है वो पूरी तरह से हिंदी की कविताएँ हैं। सहज भाषा के साथ साथ सजीव सारथी की कविताएँ प्रतीकों के माध्यम से आज के हालत का अच्छा जायजा लेती हैं। इसके बाद डायलाग के संचालक एवं कवि मिथिलेश श्रीवास्तव नें सजीव सारथी की कविताओं पर विशेष टिप्पणी की। इन विशेष टिप्पणियों के बाद सजीव सारथी ने अपनी कविताओं का पाठ किया जो जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं को छू रही थीं। एक तरफ उनकी कविताओं में मुंबई में उत्तर भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों का दर्द था तो दूसरी तरफ ‘गरेबाँ’ जैसी कविता में आत्मविश्लेषण था। “नौ महीने” जैसी कविता में उन्होंनें एक माँ की भावनाओं को छूने की कोशिश की।

एक पल की उम्र का लोकार्पण ब्रजेन्द्र त्रिपाठी (दाहिने से क्रमशः दिनेश कुमार शुक्ल,ब्रजेन्द्र त्रिपाठी,मिथिलेश श्रीवास्तव,सजीव सारथी) द्वारा हुआ

खुशबुओं की एक पूरी दुनिया
कवियों की एक नयी जमात की खोज हुई है। उनकी महत्वाकांक्षाएं एक दम अलग हैं। वे दीवार पर कविता लिखते हैं, ब्लॉग पर कविता लिखते हैं। वे अलक्षित पाठक के लिए कविता लिखते हैं। उन्हें प्रचार नहीं चाहिए, अपने सामने बैठे श्रोता नहीं चाहिए, उन्हें समीक्षकों की राय नहीं चाहिए। उनकी कविता पर आलोचकीय निगाह रखने वाली आँखें नहीं चाहिए। वे इन आँखों से सहमे भी नहीं होते। ब्लॉग पर कविता लिख दिया, किसी ने पढ़ लिया, किसी ने कुछ लिख दिया। काफी दिन तक उनकी कविता अलक्षित भी रह गयी तो कोई बात नहीं। वे इस जल्दी में रहते भी नहीं हैं कि कोई अभी उनकी कविता पढ़ ले, कोई उनका संग्रह छपवा दे, कोई कुछ टिप्पणी कर दे।
शैलेश भारतवासी, हिन्दयुग्म जिनका अपना ब्लॉग हैं, ऐसे कवियों को यूनिकोडीय कवि कहते हैं। शायद इसलिए कि वे लोग इन्टरनेट पर हिंदी भाषा के यूनिकोडीय रूप में कविता लिखते हैं। शैलेश, ऐसे कवियों को जो देवदूतों की तरह छिपे रहते हैं, धरती पर उतारने की कोशिश करते हैं, इन्टरनेट के बाहर इन लोगों को दुनिया में पहचान देने की कोशिश करते हैं। ऐसे कवियों की एक पुस्तक “सम्भावना डॉट कॉम” शैलेश भारतवासी नें पिछले दिनों छापी थी। उन कविताओं को पढकर यह एहसास हुआ कि वे कविताएँ सहज, सीधी और साफ़ अभिव्यक्ति की बड़ी मिसाल हैं। इसी संग्रह के मार्फ़त कुछ यूनिकोडीय कवियों से परिचय हुआ था। अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के डायलॉग कार्यक्रम में ऐसे कुछ कवियों का कविता पाठ भी हुआ था। सजीव सारथी उन्हीं में से एक यूनिकोडीय कवि है। इन्टरनेट पर कविता लिखने वाले, स्वाभाव से संकोची, व्यव्हार में सरल। सरलता और संकोच के मिलने से एक अलग इंसान का निर्माण होता है। वह इंसान अच्छा इंसान होता है। सजीव अच्छे इंसान हैं। उनकी यह अच्छाई उनकी कविता में भी झलकती है, उनके व्यव्हार में झलकती है और उनकी पारदर्शी आँखों में झलकती है। वे मलयाली हैं, इसलिए हिंदी भाषा के उनके उच्चारण में एक अलग मिठास है।
“एक पल की उम्र लेकर” उनके नये संग्रह का नाम है। इसे केरल के हेवेन्ली बेबी बुक्स प्रकाशन नें छापा है। यह उनकी पहली किताब है। उनकी एक कविता है “सूरज” जो एक स्मृति-कोष की तरह है। अनेक नॉस्टैल्जिक स्मृतियों से परिपूर्ण। लेकिन यह सिर्फ नॉस्टैल्जिक होना नहीं है बल्कि मानुष की संवेदनाओं को अनेक स्तरों पर महसूस करने की कोशिश है। सूरज कविता में दो पंक्तियों के मुहावरे जैसी एक टिपण्णी है जो पिछले सात वर्षों की राजनीति का ऐतिहासिक दस्तावेज़ सी लगती है। “आज बरसों बाद / खुद को पाता हूँ / हाथ में लाल गेंद फिर लिए बैठा -एक बड़ी चट्टान के सहारे।“ इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे सी पी एम् और कांग्रेस के गलबहियों के दिन याद आते रहे। “किसी नदी की तरह” कविता में एक बोतल में दोनों के रहने का दृश्य है- एक देवता, एक शैतान। “साहिल की रेत” की पंक्तियाँ हैं “उन नन्ही / पगडंडियों से चलकर हम / चौड़ी सड़कों पर आ गए।“ इन पंक्तियों में प्राकृतिक जीवन की सरलता है, तो विस्थापन का दंश भी है। नन्ही पगडंडियाँ मासूमियत और तकलीफों की प्रतीक हैं। पगडंडियों से चौड़े रास्ते पर चले जाना विस्थापन है जो असंगत प्रकृति विरोधी विकास के अवधारणाओं का विरोध भी है।

सजीव मलयाली हैं, जाहिर है कि एक प्रकृति संपन्न, पानी से भी तरल जीवन को छोड़कर आने वाले लोगों में से हैं। उत्तर भारत के विस्थापन के दर्द से भी अधिक गहरा दर्द मलयालम प्रदेश से विस्थापन का है। इस विस्थापन के संघर्ष में प्यार और अपनापे की भी उपस्थिति है। “तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को / पहचानती है मेरी भूख अब भी।“ इन पंक्तियों में महक और भूख के रिश्ते को रेखांकित किया गया है। बचपन की स्मृतियों में कई खुशबुओं की भी स्मृति है। वे खुशबुएँ अब कहीं से नहीं आती हैं। खुशबुओं की एक पूरी दुनिया हुआ करती थी, वह दुनिया कहाँ गयी..! आधुनिक और विकासशील बनने की अंधी दौड़ में वे खुशबुएँ भी गायब हो गयी हैं। खैर, जब से सभ्यता है, विकास है हम बहुत कुछ खोते हुए आज यहाँ पहुँचे हैं। मान लें कि पाँच हज़ार ही पुराने सभ्य मनुष्य हैं, तो याद रखने की बहुत सारी चीज़ें हमने खो दी हैं। याद रखने की नयी चीजें हमनें बनायीं नहीं हैं। सिर्फ खोना है, पाना कुछ भी नहीं है, यह बात सजीव की किताब में फैली हुई है जो मेरे लिए महत्वपूर्ण है। कविता बहुत कुछ बताती है।
- मिथिलेश श्रीवास्तव

सजीव सारथी की पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" पर मिथिलेश श्रीवास्तव की टिप्पणी


सजीव सारथी की काव्यपाठ के बाद डायलॉग गोष्ठी में आमत्रित कवियों का काव्यपाठ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की अध्यक्षता और शिवमंगल सिद्धांतकर जैसे रचनाकारों की सानिध्य में शुरू हुआ। गजरौला से आये युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव नें सबसे पहले कविता पाठ किया और अपनी पहली कविता उन्होंनें सजीव सारथी के व्यक्तित्व को समर्पित कर दी। इसके बाद उन्होंनें अपनी क्षणिकाओं चीनी, गेहूँ, चावल, दाल से बढती हुई महंगे पर टिप्पणियां की तो दूसरी तरफ नारी, बेटी, माँ, पत्नी व बहन जैसी रचनाओं से रिश्तों के महत्व को रेखांकित किया। कर्ज में कोंपल नाम की कविता नें अखिलेश के काव्यात्मक विस्तार को स्पष्ट किया और किसानों द्वारा की जाने वाले आत्महत्या के कारणों की पड़ताल की। उसके बाद आये कवि स्वप्निल तिवारी नें कुछ ग़ज़लों का पाठ किया और माहौल का रुख मोड़ने की कोशिश की, एक “शामो-सहर” और “तुम आओ तो’ कविताओं में प्रेम के रोमान को छूने की कोशिश की और दूसरी तरफ “खिड़कियाँ” नामक कविता में खिड़की को नए ढंग से देखने और दिखाने की कोशिश की। उसके बाद आई कवियित्री सुनीता चोटिया नें “बुड्ढा है कि मरता नहीं” नाम की कविता का पाठ किया जिससे माहौल को हल्का हो गया तथा “धरती का गीत” नाम के गीत से लयात्मक माहौल के रचना हुई। सुनीता चोटिया के बाद एक और कवियित्री रजनी अनुरागी नें अपनी विभिन्न रंगों से सजी कविताओं का पाठ किया जिसमें एक तरफ “भूख” जैसी कविता थी तो दूसरी तरफ प्रेम के एहसासों से सराबोर “तुम्हारा कोट” जैसी कविता सुनाई। जनज्वार नाम की कविता ने तहरीर चौक का उदाहरण देकर क्रांति की संभावनाओं की तरफ ध्यान खींचा। इसके बाद आये उर्दू शायर अब्दुल क़ादिर नें अपनी ग़ज़लों से माहौल को ही बादल दिया और एक तरफ प्यार के रूहानी एहसास से भरे “हिचिकियां आ रही हैं रह रह कर/ यानि तुम आज भी सलामत हो” जैसे शेर सुनाये तो दूसरी तरफ “प्यार से बोलना भी मुश्किल है/ लोग तो घर बसाने लगते हैं जैसे हल्के फुल्के शेर भी सुनाये जिन्होनें माहौल को बादल दिया। आज कल के फैले भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए उन्होंनें शेर कहा “एक दिन तीरगी में रह कर देख/ कितने घर जगमगाने लगते हैं”।

काव्यपाठ करते अजय नावरिया
इसके बाद अजय नावरिया नें “नए पौधों के लिए सप्रेम” नाम की कविता से अपनी कविता यात्रा शुरू की। “संघम शरणम गच्छामि” नाम की कविता में उन्होंनें समूह की शक्ति को स्पष्ट किया, सड़क नाम की कविता से गाँव के कई सरोकार उन्होंनें जोड़े और दिखाए। “सफाई के बाद महानगर” में उन्होंनें झुग्गियों के हटाये जाने के दर्द को महसूस किया। तेजेन्द्र लूथरा की कविताओं जिस भी दिशा में गयीं बहुत ही गहरे भाव लिए हैं, उनकी “मुहब्बत” और “अंतराल” नाम की कविताओं में भरे अर्थों में “गागर में सागर” वाली कहावत को चरितार्थ किया वहीं “अस्सी घाट का बाँसुरी वाला” में एक आरती के क्रांति गीत पे परिवर्तित हो जाने का दृश्य था जो अंत में क्रांति का छद्म आवरण भी उतरता है। इसके अलावा उन्होंनें सर्वत्र का भला नाम की कविता का भी पाठ किया।


अपने विचार व्यक्त करते शिवमंगल सिद्धांतकर, साथ में हैं मिथिलेश श्रीवास्तव
तेजेन्द्र लूथरा के कविता पाठ के बाद दिनेश कुमार शुक्ल नें ब्लॉगस पर उपस्थित कविताओं की शुद्धता पर बात की और कहा कि वो बहुत निर्मल हैं जिनमें एक उदासी के बावजूद उम्मीद है। उन्होंनें यह भी कहा कि बदलते हुए समय के साथ हमारी अभिव्यक्ति बदली है लेकिन हमारी भाषा में उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं और दूसरी भाषा का प्रयोग करना पड़ता है। इस लिए अपनी भाषा के नए शब्दों की इजाद बहोत आवश्यक है। शिवमंगल सिद्धांतकार नें कविता और क्रांति के संबंध को स्पष्ट किया और बताया कि ये एक दूसरे को परस्पर किस तरह प्रभावित करते हैं। अपने अध्यक्षीय भाषण में केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी नें दिनेश कुमार शुक्ल द्वारा बताई गयी समस्या का निदान बतायाकि खुद को अभिव्यक्त करने के लिए जिन शब्दों की कमी पड़ रही हैं उन्हें हिंदी की विभिन्न बोलियों से आयातित करने चाहिए। उन्होंनें कविता के सम्प्रेषण के लिए विभिन्न फेसबुक और ट्विट्टर जैसे माध्यमों को समझने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

Tuesday, June 14, 2011

डायलॉग गोष्ठी का आमंत्रण


आमंत्रण पत्र को बड़ा करके देखने के लिए उस पर चटका लगाएं
मित्रों,
२५ जून को दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम के पास ललित कला और साहित्य की अकादेमी के डायलाग कार्यक्रम के समूह कविता पाठ में इस बार कई युवा कवि अपनी कविताओं का पाठ करेंगें। युवा कविओं की कविता की ताजगी और तेवर को सुनने जरुर आयें। यह दुर्लभ अवसर होगा। अपने जरुरी कम जल्दी निबटाकर पांच बजे तक अवश्य पहुंचें।
कविता ही ऐसी एक कला है जो हमारी भाषा में समाकर सालों हमारी संवेदना में रहती है और हमें मनुष्य बने रहने की सीख देती रहती है। आज इस भागदौड़ भरे जीवन में कविता के लिए समय और जगह दोनों ही निकाल पाना बहुत मुश्किल हो चुका है। हर महीने के आखिरी शनिवार को दक्षिणी दिल्ली में कविता के लिए इस जगह को विकसित किया जा रहा है। यह सोचें की दूसरों की कविता सुनना कितना जरुरी है। उनके लिए भी, अपने लिए भी। आइये, कविता को सिविल सोसाइटी का एक कारगर टूल बनाएं। जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच , प्रगतिशील लेखक संघ और अन्य संगठनों से जुड़े सभी दोस्तों से खास गुजारिश् और आगे की पीढ़ी के सुनाम लेखकों से भी विनम्र अनुरोध है कि युवा कवियों को सुनने सहजता से आयें।

Sunday, May 1, 2011

कविताओं के विविध रंग-डायलॉग गोष्ठी


काव्य पाठ करतीं अर्कमल कौर
पिछले एक साल से ‘लिखावट’ हर महीने के आखिरी शनिवार को “डायलॉग” नाम की काव्य गोष्ठी का आयोजन करा रहा है। 28-4-11 को अप्रैल माह की गोष्ठी संपन्न हुई। गोष्ठी में अमित कुमार, स्वप्निल तिवारी “आतिश”, मुश्ताक सदफ, रमेश वर्णवाल, अर्कमल कौर एवं कृष्ण कल्पित नें अपनी रचनाएँ पढीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कृष्ण कल्पित नें एवं संचालन मिथिलेश श्रीवास्तव नें किया। इस कार्यक्रम में हिंदी, उर्दू और पंजाबी रचनाएँ पढ़ी गयीं। कार्यक्रम में सबसे पहले अमित कुमार नें अपनी रचनाओं चवन्नी में चाँद, काली लड़की का हलफनामा, कश्मीर, नास्तिक और नियति का पाठ किया। चवन्नी में चाँद के माध्यम से एक तरफ उन्होंनें बदले हुए और बदलते हुए जमाने की तरफ संकेत किया तो नास्तिक जैसी छोटी सी रचना के माध्यम नास्तिकता के भ्रम से पर्दा उठाया। उसके बाद आये कवि स्वप्निल कुमार “आतिश” नें अपनी रचनाओं लोकतंत्र, अकेला होने पर, एक और नज़्म तथा दो ग़ज़लें सुनाई स्वप्निल की कविताओं में एक तरफ जहाँ लोकतंत्र को लेकर एक गुस्सा था तो दूसरी तरफ एक रुमानियत भी दिखी। मुश्ताक सदफ नें कुछ ग़ज़लें सुनाई और माहौल को पूरी तरह काव्यमय कर दिया। एक तरफ उन्होंनें “जिंदगी घर लौट आना शाम को, अब तू पहले की तरह बच्ची नहीं” जैसे शेर कहे तो दूसरी तरह “कुछ न उसको गमे सफर होगा, जिसका सामन मुख़्तसर होगा” जैसे बड़े शेर भी कहे। विविधताओं को समेटे मुश्ताक सदफ की ग़ज़लें गज़ल की उस परम्परा से हैं जहाँ बातें बहुत आसान जबान में की जाती हैं।

श्रोता

रमेश वर्णवाल नें भी विविधताओं से भारी रचनाओं की प्रस्तुति की जिसमें बातें, चप्पल, एक पुरातत्वविद की डायरी से, खामोशी और ब्रम्ह.कॉम थीं। रमेश जी की कवितायेँ इतिहास से निकलते हुए एक लंबी दूरी तय करती हैं और जल्दी ही ब्रम्ह.कॉम जैसी रचनाओं के जरिये वर्तमान का हाथ पकड़ लेती हैं। उनकी ख़मोशी जैसी कविता में रोमांस का पुट भी दिखता है। अर्कमल कौर नें समयाभाव के चलते एक पंजाबी कविता ओ मैं ही साँ और एक पंजाबी गज़ल सुनाई। ओ मैं ही साँ के जरिये गौतम बुद्ध की सफलता में उन्होंनें एक औरत की सफलता को बहुत बारीकी से दर्शाया।

काव्यपाठ करते कृष्ण कल्पित
कार्यक्रम के अंत में अध्यक्ष कृष्ण कल्पित नें कार्यक्रम की सफलता और उसके वैविध्य को देखकर प्रसन्नता जाहिर की तथा अपनी रचनाएँ गुमशुदगी के बारे में, उम्मीद, सायकिल की कहानी तथा कलकत्ता 2004 पढीं। गुमशुदगी के बारे में जैसी रचना के द्वारा उन्होंनें इंसान की याददाश्त के साथ साथ उन लोगों की विडंबना पर भी रौशनी डाली जो लोग गुमशुदा हैं और उनके गुमशुदा हो चुके लोगों में कहीं न कहीं सम्पूर्ण भारत की भी झलक मिलती है। सायकिल की कहानी एक अभूतपूर्व रचना है जिसके द्वारा तीनों लोकों की असमानता को सहजता के साथ दर्शा दिया कृष्ण कल्पित नें। सायकिल की कहानी सिर्फ सायकिल की कहानी न हो कर पूरी मनुष्यता की कहानी थी। मिथिलेश श्रीवास्तव नें सबका धन्यवादयापन किया। उसके बाद चाय-पान के साथ कार्यक्रम सफलता पूर्वक संपन्न हो गया।

Wednesday, August 26, 2009

फिर महफ़िल सजी फिर दीवानों का मज'मा लगा.......

गुजिश्‍ता की अगस्त 2009 माह की गोष्ठी की रिपोर्ट


लेकिन इस बार महफ़िल का रंग दूसरा था, बावजूद इस के कि जगह वही थी, लखनऊ में सूर्योदय कालोनी का सामुदायिक हाल, होस्ट वही थे यानी टंडन परिवार, आयोजक वही थे प्रदीप भाई और मुहम्मद अहसन लेकिन इस बार कवियों और श्रोताओं की संख्या में होड़ थी कि कौन अधिक हैं, और दोनों ही काफी त'अदाद में थे यानी कि हाल खचा-खच भरा हुआ था, और मेहमान कवियों के क्या कहने ... हिन्द-युग्म से जुड़े स्वप्निल कुमार आतिश और सिद्धार्थ नगर के युवा कवि और इलाहबाद विश्वविद्यालय के छात्र अनूप पांडे। अनूप पहले भी इस महफ़िल में काव्य पाठ कर के अपने झंडे गाड़ चुके हैं। गाव और मिट्टी और रिश्तों सी जुडी कवितायें कहते हैं, काफी जोश में हाथ हिला-हिला कर पढ़ते हैं।
महफ़िल की शुरूआत प्रदीप भाई की इब्तिदाई तक़रीर से हुई। लेकिन इस बार अहसन साहब ने मंच पर बैठने से साफ़ इनकार कर दिया। चालाक आदमी हैं, मंच पर बैठने से जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, बोले आम श्रोता की भांति नीचे बैठूंगा, सो मंच पर साबिरा जी के साथ बैठे टंडन जी। साबिरा जी ने इस बार रूसी में कविता न सुना कर एक ताज़ी ग़ज़ल सुनाई और तालियाँ बटोरी। इस बार अंग्रेजी में पता नहीं क्यूँ विनीतवाल साहब ने कविता नहीं सुनाई लेकिन हिंदी / उर्दू श्रोता निराश नहीं हुए, उन को अंग्रेजी में कविता सुनाई जावेद नकवी ( शनने भाई ) ने, एक नहीं दो, सोने में सुहागा ३५ साल पुरानी।

स्वप्निल का पहला मुशाएरा का तजुर्बा था और वह मंच पर डरा-डरा पहुँचा लेकिन एक रूमानी नज़्म सुनाने के बाद निडर हो गया और झोंक में एक और सुना डाली। चलते वक़्त उस की आंखें कह रही थीं फिर कब बुलाओगे।
जमील साहब ने एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह अपने पूरे बाडी लंगुएज के साथ दो गजलें सुनाईं और मुशाएरा करीब करीब लूट लिया था कि उन को इस काम से रोका गया कि यह काम तो आखिर में मनीष शुक्ला को करना है।

हमज़ुबां कोई नहीं तो आइना कोई तो हो
गुफ्तुगू किस से करूं दूसरा कोई तो हो
- जमील साहब



वंदना दीक्षित जी लखनऊ विश्व विद्यालय की भाषा विभाग में हैं, वह और उनके पति रमेश दीक्षित जो राजनीति पढ़ाते हैं, अक्सर ही हमारी महफिलों के हिट युगल रहते हैं। रमेश जी इस बार किसी कारण नहीं आ सके तो वंदना जी को अकेले ही अपनी दो संवेदनशील कविताओं के साथ हिट होना पड़ा।

यूं तो गजाला अनवर ने भी महफ़िल लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी अपनी गज़लों के साथ लेकिन आलोक श्रीवास्तव और राजीव राय के साथ गज़लों के म'आमले में सख्त मुकाबला होने के कारण निर्णय बड़ा मुश्किल था कि जनता किस के साथ है। आलोक और राजीव के महफ़िल में पहली बार शरीक होने से जनता का सहानुभूति वोट उन को अधिक मिलता दिखा।

देवकी नंदा 'शांत' जी ने डिप्लोमेसी से काम लेते हुए अपनी चिर परिचित शैली में गज़लें सुनाकर और गाकर प्रसिद्धि के शिखर को छूने का पूरा प्रयास किया लेकिन साबिरा जी ने ठान ली थी कि सब से आखीर में मनीष को ही बुला कर मनीष को हिट करवाना है। उन्होंने भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक श्री एम॰ सी॰ द्विवेदी के साथ भी कोई रियायत नहीं की जिन्होंने 'स्लम' पर एक अति संवेदनशील कविता सुना कर वाह-वाही बटोरी। उन का मुकाबला था बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ़ पलेओ बोटनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ नौटियाल से जो पहले भी इस महफ़िल में शरीक हुए थे।

ज़िक्र तो अभी कईयों का बाक़ी है लेकिन हाए रे टाइपिंग की दिक्क़त.. चलिए उन का ज़िक्र फिर कभी ...

अहसन साहब आयोजक होने के बाद भी सब से अंत में सुनाने के गर्व से वंचित रहे हालांकि उन्होंने इस गम को बहुत बहादुरी से सहा और मुस्कुराते रहे। दरअसल यह स्थान पहले से ही मनीष शुक्ल के नाम आरक्षित था।

अहसन साहब ने एक छोटी नज़्म 'बस यूं ही खड़ी रहो' सुनाने का आग्रह किया .

नज़र से रहमतें बिछाए बस यूं ही खड़ी रहो
काइनात ब सर उठाए बस यूं ही खड़ी रहो
पलक पे तुम्हारी वक़्त है ठहर गया
ज़ुल्फ़ पे तुम्हारी धूप है उतर गयी
खामोशियों के सिलसिले बनाए बस यूं ही खड़ी रहो
वो बात जो अभी कही नहीं
वो नज़्म जो अभी लिखी नहीं
उन्ही की ख़ातिर ए वजूद बस यूं ही खड़ी रहो
बस यूं ही खड़ी रहो

इस के बाद उन्होंने कुछ फुटकर शे'र सुनाए। दरअसल फुटकर शे'र सुनाना धीरे-धीरे उनकी आदत बनती जा रही है। वह भी क्या करें, ग़ज़ल कहनी उन्हें आती नहीं है तो इसी से काम चलाते है

तनहा फिरा हूँ उम्र भर इक दर्द की पोटली लिए
हैराँ हूँ किस दर पे रक्खूं, किस घाट पे बहाऊं

नदी ने धो दिए शहर के पाप सब
अब वह खुद जाए कहाँ मैला आँचल लिए !

कल इक परिंदा मर गया, इक निशानी मिट गयी
किताब ए कुदरत में लिखी इक कहानी मिट गयी

लेकिन इस महफ़िल ने मनीष शुक्ला की गज़लों के बिना ख़तम होने से इनकार कर दिया। मुझे याद नहीं मनीष ने कितनी गजलें सुनाई लेकिन महफ़िल उन्हीं के नाम गयी। उन का एक शे'र याद आ रहा है

कभी आंसू कभी मोती कभी शबनम समझती है
मता ए जिंदगी है जिस को दुनिया गम समझती है

महफ़िल चाय के साथ ख़तम हुई और उस के 15 दिनों बाद तक अहसन और मनीष शुक्ला में होड़ लगी रही कि कैसे रिपोर्ट लिखने से बचा जाए और कौन सालिड बहाना मार सकता है लेकिन आखिर अहसन साहब ही फंसे, और रिपोर्ट हाज़िर है। शैलेश भारतवासी जी इतनी जल्दी कहाँ छोड़ देते। लगातार शर्म दिलाते रहे और रिपोर्ट लिखवा कर माने।