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Tuesday, June 28, 2011

डायलॉग गोष्ठी में हुआ सजीव सारथी की पुस्तक 'एक पल की उम्र लेकर' का लोकार्पण

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 2 घंटा 19 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।

हर महीने के आखिरी शनिवार को अकादमी ऑफ फाईन आर्ट्स एंड लिटरेचर में होने वाली काव्यात्मक गोष्ठी “डायलॉग” इस बार 25 जून को संपन्न हुई। कार्यक्रम तीन चरणों में संपन्न हुआ। सबसे पहले भारत के पिकासो मकबूल फ़िदा हुसैन और कवि रंजीत वर्मा की माता को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। उसके बाद हिन्दयुग्म के आवाज़ मंच के संपादक एवं युवा कवि सजीव सारथी की पुस्तक “एक पल की उम्र लेकर” का विमोचन करते हुए ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि सजीव की कविताओं पर उनके मलयाली होने की छाप नहीं है वो पूरी तरह से हिंदी की कविताएँ हैं। सहज भाषा के साथ साथ सजीव सारथी की कविताएँ प्रतीकों के माध्यम से आज के हालत का अच्छा जायजा लेती हैं। इसके बाद डायलाग के संचालक एवं कवि मिथिलेश श्रीवास्तव नें सजीव सारथी की कविताओं पर विशेष टिप्पणी की। इन विशेष टिप्पणियों के बाद सजीव सारथी ने अपनी कविताओं का पाठ किया जो जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं को छू रही थीं। एक तरफ उनकी कविताओं में मुंबई में उत्तर भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों का दर्द था तो दूसरी तरफ ‘गरेबाँ’ जैसी कविता में आत्मविश्लेषण था। “नौ महीने” जैसी कविता में उन्होंनें एक माँ की भावनाओं को छूने की कोशिश की।

एक पल की उम्र का लोकार्पण ब्रजेन्द्र त्रिपाठी (दाहिने से क्रमशः दिनेश कुमार शुक्ल,ब्रजेन्द्र त्रिपाठी,मिथिलेश श्रीवास्तव,सजीव सारथी) द्वारा हुआ

खुशबुओं की एक पूरी दुनिया
कवियों की एक नयी जमात की खोज हुई है। उनकी महत्वाकांक्षाएं एक दम अलग हैं। वे दीवार पर कविता लिखते हैं, ब्लॉग पर कविता लिखते हैं। वे अलक्षित पाठक के लिए कविता लिखते हैं। उन्हें प्रचार नहीं चाहिए, अपने सामने बैठे श्रोता नहीं चाहिए, उन्हें समीक्षकों की राय नहीं चाहिए। उनकी कविता पर आलोचकीय निगाह रखने वाली आँखें नहीं चाहिए। वे इन आँखों से सहमे भी नहीं होते। ब्लॉग पर कविता लिख दिया, किसी ने पढ़ लिया, किसी ने कुछ लिख दिया। काफी दिन तक उनकी कविता अलक्षित भी रह गयी तो कोई बात नहीं। वे इस जल्दी में रहते भी नहीं हैं कि कोई अभी उनकी कविता पढ़ ले, कोई उनका संग्रह छपवा दे, कोई कुछ टिप्पणी कर दे।
शैलेश भारतवासी, हिन्दयुग्म जिनका अपना ब्लॉग हैं, ऐसे कवियों को यूनिकोडीय कवि कहते हैं। शायद इसलिए कि वे लोग इन्टरनेट पर हिंदी भाषा के यूनिकोडीय रूप में कविता लिखते हैं। शैलेश, ऐसे कवियों को जो देवदूतों की तरह छिपे रहते हैं, धरती पर उतारने की कोशिश करते हैं, इन्टरनेट के बाहर इन लोगों को दुनिया में पहचान देने की कोशिश करते हैं। ऐसे कवियों की एक पुस्तक “सम्भावना डॉट कॉम” शैलेश भारतवासी नें पिछले दिनों छापी थी। उन कविताओं को पढकर यह एहसास हुआ कि वे कविताएँ सहज, सीधी और साफ़ अभिव्यक्ति की बड़ी मिसाल हैं। इसी संग्रह के मार्फ़त कुछ यूनिकोडीय कवियों से परिचय हुआ था। अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के डायलॉग कार्यक्रम में ऐसे कुछ कवियों का कविता पाठ भी हुआ था। सजीव सारथी उन्हीं में से एक यूनिकोडीय कवि है। इन्टरनेट पर कविता लिखने वाले, स्वाभाव से संकोची, व्यव्हार में सरल। सरलता और संकोच के मिलने से एक अलग इंसान का निर्माण होता है। वह इंसान अच्छा इंसान होता है। सजीव अच्छे इंसान हैं। उनकी यह अच्छाई उनकी कविता में भी झलकती है, उनके व्यव्हार में झलकती है और उनकी पारदर्शी आँखों में झलकती है। वे मलयाली हैं, इसलिए हिंदी भाषा के उनके उच्चारण में एक अलग मिठास है।
“एक पल की उम्र लेकर” उनके नये संग्रह का नाम है। इसे केरल के हेवेन्ली बेबी बुक्स प्रकाशन नें छापा है। यह उनकी पहली किताब है। उनकी एक कविता है “सूरज” जो एक स्मृति-कोष की तरह है। अनेक नॉस्टैल्जिक स्मृतियों से परिपूर्ण। लेकिन यह सिर्फ नॉस्टैल्जिक होना नहीं है बल्कि मानुष की संवेदनाओं को अनेक स्तरों पर महसूस करने की कोशिश है। सूरज कविता में दो पंक्तियों के मुहावरे जैसी एक टिपण्णी है जो पिछले सात वर्षों की राजनीति का ऐतिहासिक दस्तावेज़ सी लगती है। “आज बरसों बाद / खुद को पाता हूँ / हाथ में लाल गेंद फिर लिए बैठा -एक बड़ी चट्टान के सहारे।“ इन पंक्तियों को पढ़ते हुए मुझे सी पी एम् और कांग्रेस के गलबहियों के दिन याद आते रहे। “किसी नदी की तरह” कविता में एक बोतल में दोनों के रहने का दृश्य है- एक देवता, एक शैतान। “साहिल की रेत” की पंक्तियाँ हैं “उन नन्ही / पगडंडियों से चलकर हम / चौड़ी सड़कों पर आ गए।“ इन पंक्तियों में प्राकृतिक जीवन की सरलता है, तो विस्थापन का दंश भी है। नन्ही पगडंडियाँ मासूमियत और तकलीफों की प्रतीक हैं। पगडंडियों से चौड़े रास्ते पर चले जाना विस्थापन है जो असंगत प्रकृति विरोधी विकास के अवधारणाओं का विरोध भी है।

सजीव मलयाली हैं, जाहिर है कि एक प्रकृति संपन्न, पानी से भी तरल जीवन को छोड़कर आने वाले लोगों में से हैं। उत्तर भारत के विस्थापन के दर्द से भी अधिक गहरा दर्द मलयालम प्रदेश से विस्थापन का है। इस विस्थापन के संघर्ष में प्यार और अपनापे की भी उपस्थिति है। “तुम्हारी रसोई से उठती उस महक को / पहचानती है मेरी भूख अब भी।“ इन पंक्तियों में महक और भूख के रिश्ते को रेखांकित किया गया है। बचपन की स्मृतियों में कई खुशबुओं की भी स्मृति है। वे खुशबुएँ अब कहीं से नहीं आती हैं। खुशबुओं की एक पूरी दुनिया हुआ करती थी, वह दुनिया कहाँ गयी..! आधुनिक और विकासशील बनने की अंधी दौड़ में वे खुशबुएँ भी गायब हो गयी हैं। खैर, जब से सभ्यता है, विकास है हम बहुत कुछ खोते हुए आज यहाँ पहुँचे हैं। मान लें कि पाँच हज़ार ही पुराने सभ्य मनुष्य हैं, तो याद रखने की बहुत सारी चीज़ें हमने खो दी हैं। याद रखने की नयी चीजें हमनें बनायीं नहीं हैं। सिर्फ खोना है, पाना कुछ भी नहीं है, यह बात सजीव की किताब में फैली हुई है जो मेरे लिए महत्वपूर्ण है। कविता बहुत कुछ बताती है।
- मिथिलेश श्रीवास्तव

सजीव सारथी की पुस्तक "एक पल की उम्र लेकर" पर मिथिलेश श्रीवास्तव की टिप्पणी


सजीव सारथी की काव्यपाठ के बाद डायलॉग गोष्ठी में आमत्रित कवियों का काव्यपाठ ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की अध्यक्षता और शिवमंगल सिद्धांतकर जैसे रचनाकारों की सानिध्य में शुरू हुआ। गजरौला से आये युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव नें सबसे पहले कविता पाठ किया और अपनी पहली कविता उन्होंनें सजीव सारथी के व्यक्तित्व को समर्पित कर दी। इसके बाद उन्होंनें अपनी क्षणिकाओं चीनी, गेहूँ, चावल, दाल से बढती हुई महंगे पर टिप्पणियां की तो दूसरी तरफ नारी, बेटी, माँ, पत्नी व बहन जैसी रचनाओं से रिश्तों के महत्व को रेखांकित किया। कर्ज में कोंपल नाम की कविता नें अखिलेश के काव्यात्मक विस्तार को स्पष्ट किया और किसानों द्वारा की जाने वाले आत्महत्या के कारणों की पड़ताल की। उसके बाद आये कवि स्वप्निल तिवारी नें कुछ ग़ज़लों का पाठ किया और माहौल का रुख मोड़ने की कोशिश की, एक “शामो-सहर” और “तुम आओ तो’ कविताओं में प्रेम के रोमान को छूने की कोशिश की और दूसरी तरफ “खिड़कियाँ” नामक कविता में खिड़की को नए ढंग से देखने और दिखाने की कोशिश की। उसके बाद आई कवियित्री सुनीता चोटिया नें “बुड्ढा है कि मरता नहीं” नाम की कविता का पाठ किया जिससे माहौल को हल्का हो गया तथा “धरती का गीत” नाम के गीत से लयात्मक माहौल के रचना हुई। सुनीता चोटिया के बाद एक और कवियित्री रजनी अनुरागी नें अपनी विभिन्न रंगों से सजी कविताओं का पाठ किया जिसमें एक तरफ “भूख” जैसी कविता थी तो दूसरी तरफ प्रेम के एहसासों से सराबोर “तुम्हारा कोट” जैसी कविता सुनाई। जनज्वार नाम की कविता ने तहरीर चौक का उदाहरण देकर क्रांति की संभावनाओं की तरफ ध्यान खींचा। इसके बाद आये उर्दू शायर अब्दुल क़ादिर नें अपनी ग़ज़लों से माहौल को ही बादल दिया और एक तरफ प्यार के रूहानी एहसास से भरे “हिचिकियां आ रही हैं रह रह कर/ यानि तुम आज भी सलामत हो” जैसे शेर सुनाये तो दूसरी तरफ “प्यार से बोलना भी मुश्किल है/ लोग तो घर बसाने लगते हैं जैसे हल्के फुल्के शेर भी सुनाये जिन्होनें माहौल को बादल दिया। आज कल के फैले भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए उन्होंनें शेर कहा “एक दिन तीरगी में रह कर देख/ कितने घर जगमगाने लगते हैं”।

काव्यपाठ करते अजय नावरिया
इसके बाद अजय नावरिया नें “नए पौधों के लिए सप्रेम” नाम की कविता से अपनी कविता यात्रा शुरू की। “संघम शरणम गच्छामि” नाम की कविता में उन्होंनें समूह की शक्ति को स्पष्ट किया, सड़क नाम की कविता से गाँव के कई सरोकार उन्होंनें जोड़े और दिखाए। “सफाई के बाद महानगर” में उन्होंनें झुग्गियों के हटाये जाने के दर्द को महसूस किया। तेजेन्द्र लूथरा की कविताओं जिस भी दिशा में गयीं बहुत ही गहरे भाव लिए हैं, उनकी “मुहब्बत” और “अंतराल” नाम की कविताओं में भरे अर्थों में “गागर में सागर” वाली कहावत को चरितार्थ किया वहीं “अस्सी घाट का बाँसुरी वाला” में एक आरती के क्रांति गीत पे परिवर्तित हो जाने का दृश्य था जो अंत में क्रांति का छद्म आवरण भी उतरता है। इसके अलावा उन्होंनें सर्वत्र का भला नाम की कविता का भी पाठ किया।


अपने विचार व्यक्त करते शिवमंगल सिद्धांतकर, साथ में हैं मिथिलेश श्रीवास्तव
तेजेन्द्र लूथरा के कविता पाठ के बाद दिनेश कुमार शुक्ल नें ब्लॉगस पर उपस्थित कविताओं की शुद्धता पर बात की और कहा कि वो बहुत निर्मल हैं जिनमें एक उदासी के बावजूद उम्मीद है। उन्होंनें यह भी कहा कि बदलते हुए समय के साथ हमारी अभिव्यक्ति बदली है लेकिन हमारी भाषा में उसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं और दूसरी भाषा का प्रयोग करना पड़ता है। इस लिए अपनी भाषा के नए शब्दों की इजाद बहोत आवश्यक है। शिवमंगल सिद्धांतकार नें कविता और क्रांति के संबंध को स्पष्ट किया और बताया कि ये एक दूसरे को परस्पर किस तरह प्रभावित करते हैं। अपने अध्यक्षीय भाषण में केन्द्रीय साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी नें दिनेश कुमार शुक्ल द्वारा बताई गयी समस्या का निदान बतायाकि खुद को अभिव्यक्त करने के लिए जिन शब्दों की कमी पड़ रही हैं उन्हें हिंदी की विभिन्न बोलियों से आयातित करने चाहिए। उन्होंनें कविता के सम्प्रेषण के लिए विभिन्न फेसबुक और ट्विट्टर जैसे माध्यमों को समझने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

Tuesday, June 14, 2011

डायलॉग गोष्ठी का आमंत्रण


आमंत्रण पत्र को बड़ा करके देखने के लिए उस पर चटका लगाएं
मित्रों,
२५ जून को दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम के पास ललित कला और साहित्य की अकादेमी के डायलाग कार्यक्रम के समूह कविता पाठ में इस बार कई युवा कवि अपनी कविताओं का पाठ करेंगें। युवा कविओं की कविता की ताजगी और तेवर को सुनने जरुर आयें। यह दुर्लभ अवसर होगा। अपने जरुरी कम जल्दी निबटाकर पांच बजे तक अवश्य पहुंचें।
कविता ही ऐसी एक कला है जो हमारी भाषा में समाकर सालों हमारी संवेदना में रहती है और हमें मनुष्य बने रहने की सीख देती रहती है। आज इस भागदौड़ भरे जीवन में कविता के लिए समय और जगह दोनों ही निकाल पाना बहुत मुश्किल हो चुका है। हर महीने के आखिरी शनिवार को दक्षिणी दिल्ली में कविता के लिए इस जगह को विकसित किया जा रहा है। यह सोचें की दूसरों की कविता सुनना कितना जरुरी है। उनके लिए भी, अपने लिए भी। आइये, कविता को सिविल सोसाइटी का एक कारगर टूल बनाएं। जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच , प्रगतिशील लेखक संघ और अन्य संगठनों से जुड़े सभी दोस्तों से खास गुजारिश् और आगे की पीढ़ी के सुनाम लेखकों से भी विनम्र अनुरोध है कि युवा कवियों को सुनने सहजता से आयें।

Saturday, May 15, 2010

राष्ट्रीय अनुवाद मिशन और राष्ट्र को चुनौतियाँ विषयक संगोष्ठी



राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के गठन से अनुवाद के क्षेत्र का विस्तार किसा प्रकार किया जाए जिससे अंतरराष्ट्रीय साहित्य भारतीय जन-जन तक पहुँच सके, इस बात को ध्यान में रखते हुए नई दिल्ली सांध्यकालीन हिन्दी संस्थान द्वारा भारतीय विद्या भवन, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली में डॉ. नगेन्द्र स्मृति साहित्यिक संगोष्ठी तथा संस्थान द्वार संचालित अनुवाद पाठ्यक्रम में उत्तीर्ण विद्यार्थियों के लिए प्रमाणपत्र वितरण समारोह का आयोजन किया गया।

प्रारंभ में सुविख्यात भाषाविज्ञानी, संस्थान के निदेशक और हिन्दी भाषा के प्रकांड विद्वान प्रो. कृष्ण कुमार गोस्वामी ने बीज भाषण दिया। प्रो. गोस्वामी ने अपने वक्तव्य में बताया कि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन की स्थापना प्रधानमंत्री की प्ररेणा से और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के प्रयास से सन् 2006 में हुई थी। इस मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान आधारित साहित्य को अनुवाद द्वारा जन-जन तक पहुँचाना है। उच्च स्तरीय कोश, थिसारिस आदि अनुवाद उपकरणों और कंप्यूटर साफ़्टवेयरों का उत्पादन करना है। अनुवाद की गुणवत्ता की वृद्धि के लिए लघु अवधीय नवीकरण पाठ्यक्रम तथा शोध परियोजनाओं से अनुवाद संबंधी शिक्षा प्रदान करनी है। इसी संदर्भ में प्रो. गोस्वामी ने ये प्रश्न उठाए कि क्या उच्च शिक्षा के सत्तर मुख्य कार्यक्षेत्रों के साहित्य का उच्च स्तरीय अनुवाद समय पर हो पाएगा। यदि है तो क्या-क्या मानदंड अपनाए गए हैं? भारतीय और विश्व की क्लासिकल कृत्तियों के अनुवाद का चयन किन आधारों पर किया जाएगा? इसमें पुनरावृत्ति की आशंका तो नहीं होगी। अनुवाद मिशन द्वारा निर्धारित 73 करोड़ 90 लाख रुपए का बजट समय पर खर्च हो पाएगा और हुआ भी तो, कितना कार्य होगा और वह कितना लाभकारी, उपयोगी तथा शीघ्र हो पाएगा? क्या इसके लिए कोई रोडमैप बनाया गया है? अनुसृजन की दृष्टि से क्या यह अनुवाद मूल पाठ लग पाएगा। मशीनी अनुवाद कब तक विकसित हो पाएँगे और उनके कार्य में कितनी गुणवत्ता होगी। प्रो. गोस्वामी ने इस प्रकार के प्रश्न उठा कर अनुवाद मिशन की कार्य प्रणाली पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रगत संगणन विकास केन्द्र (सी-डैक) नोएडा के निदेशक और कंप्यूटर वैज्ञानिक श्री वी.एन. शुक्ल ने बताया कि अंग्रेज़ी-हिन्दी मशीनी अनुवाद का विकास पूरा हो चुका है और अंग्रेज़ी-पंजाबी, अंग्रेज़ी-बंगाली, अंग्रेज़ी-उर्दू, अंग्रेज़ी-मलयालम मशीनी अनुवाद का विकास अब चल रहा है। इसके साथ भारतीय भाषाओं के परस्पर अनुवाद और मुख्यतः हिन्दी से भारतीय भाषाओं के मशीनी अनुवाद विकसित किए जा रहे हैं। इनमें अधिकतर पर्यटन, स्वास्थ्य, प्रशासन संबंधी अनुवाद हो रहे है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मशीन आधारित अनुवाद के विकास के लिए प्रयासरत है। इस अनुवाद के मानव अनुवाद की अपेक्षा अत्यंत शीघ्र होने की संभावना है।

साहित्य अकादमी के उपसचिव और ‘समकालीन साहित्य’ पत्रिका के संपादक श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं के अतिरिक्त कई ऐसी गैर-अनुसूचित भाषाएँ और बोलियाँ हैं, जिनका साहित्य काफ़ी स्तरीय है। इस पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि इन भाषाओं में रचित साहित्य और लोक साहित्य की उपेक्षा क्यों की जा रही है।

संगोष्ठी की अध्यक्ष सुश्री सुरेंद्र सैनी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अनुवाद की उपयोगिता और सार्थकता पर अपने विचार प्रकट करते हुए यह आशा व्यक्त प्रकट की कि अनुवाद मिशन से अनुवाद के क्षेत्र में काफ़ी वृद्धि होगी। इसके बाद संस्थान द्वारा संचालित स्नातकोत्तर अनुवाद पाठ्यक्रम के छात्रों को अध्यक्ष महोदया द्वारा प्रमाणपत्र और पुरस्कार वितरित किए गए। संस्थान के सचिव डॉ. जय नारायण कौशिक ने संस्थान का परिचय देते हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया। अनुवाद पाठ्यक्रम के संयोजक डॉ. पूरनचंद टंड़न ने संगोष्ठी और वितरण समारोह का संचालन करते हुए सभी अतिथियों का धन्यवाद किया। डॉ. धर्मपाल आर्य (पूर्व कुलपति, गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार) श्री ओम प्रकाश अरोड़ा (वरिष्ठ पत्रकार), प्रो. ठाकुर दास (वरिष्ठ भाषाविद्), डॉ. हरीश कुमार सेठी (इग्नु), डॉ. शिव कुमार शर्मा (दिल्ली वि.वि.) आदि विद्वानों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी।


डॉ. रमा द्विवेदी