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Thursday, July 16, 2009

आनंदम् का एक वर्ष पूरा - 12वीं काव्य गोष्ठी


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ क़ैसर अज़ीज़

हर महीने के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली आनंदम् की 12वीं काव्य गोष्ठी पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी आनंदम् के निवास स्थान पर 12 जुलाई, 2009 को जनाब ज़र्फ़ देहलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कहना न होगा कि इसके साथ ही आनंदम् की गोष्ठियों के सिलसिले को शुरू हुए एक साल भी पूरा हो गया। इस गोष्ठी की ख़ास बात ये रही कि कुछ शायर जो कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं आ पाए उन्होंने वीडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस गोष्ठी में शिरकत की जिसमें जनाब अहमद अली बर्क़ी आज़मी और पी के स्वामी जी भी शामिल थे।

हमेशा की तरह गोष्टी के पहले सत्र में “क्या कविता / ग़ज़ल हाशिए पर है?” विषय पर चर्चा की गई जिसमें ज़र्फ़ देहलवी, मुनव्वर सरहदी, शैलेश कुमार व जगदीश रावतानी ने अपने-अपने विचार रखे। निष्कर्ष रूप में ये बात सामने आई कि चूंकि पहले की बनिस्पत अब मलटीमीडिया की मौजूदगी से काव्य गोष्टियों, सम्मेलनो व मुशायरों में श्रोताओं की कमी दिखाई देती है पर कविता कहने व लिखने वालों व गम्भीर किस्म के श्रोताओं में इज़ाफ़ा ही हुआ है। इंटर नेट ने कवियों को अंतर-राष्ट्रीय ख्याति दिला दी है।

दूसरे सत्र के अंतर्गत गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –


अहमद अली बर्क़ी आज़मी-
कौम है, किसका पैग़ाम है, क्या अर्ज़ करूँ
ज़िन्दगी नामे गुमनाम है, क्या अर्ज़ करूँ
कल मुझे दूर से देख के करते थे जो सलाम
पूछते हैं तेरा क्या नाम है, क्या अर्ज़ करूँ


दर्द देहलवी-
कहते हैं नेकियों का ज़माना तो है नहीं
दामन भी नेकियों से बचना तो है नहीं।
हर कोई गुनगुनाए ग़ज़ल मेरी किसलिए
इक़बाल का ये तराना तो है नहीं।


शैलेश कुमार सक्सैना-
आज फिर वह उदास है, जिसका दिमाग़ दिल के पास है
जो मिला रहे हैं दूध में ज़हर, उन्हीं के हाथ में दारू का गिलास है।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ मनमोहन शर्मा तालिब

मनमोहन शर्मा तालिब-
गुरबत को हिकारत की निगाहों से न देखो
हर शख्स न अच्छा है न दुनिया में बुरा है।
सभी प्यार करते हैं एक दूसरे से
मुहब्बत माँ की ज़माने से जुदा है।


क़ैसर अज़ीज़-
जाने किस हिकमत से ऐसी कर बैठे तदबीरें लोग
ले आए मैदाने अमल में काग़ज़ की शमशीरें लोग।
रंज ख़ुशी में मिलना जुलना होता है जो मतलब से
अपनी दया की खो देंगे इक दिन सब तासीरें लोग।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ भूपेन्द्र कुमार

भूपेन्द्र कुमार –
बासी रोटी की क़ीमत तो तुम उससे पूछो यारो
जिसको ख़ाली जेबें लेकर साँझ ढले घर आना है।
तूफानों से क्रीड़ा करना है अपना शौक़ पुराना
भागे सारी दुनिया ग़म से अपना तो याराना है।

जगदीश रावतानी आनंदम्-
सुलझ जाएगी ये उलझन भी इक दिन
तेरी जुल्फों का पेचो ख़म नहीं है।
अमन है चैन है दुनिया में जगदीश
फटे गर बम तो भी मातम नहीं है।

पी.के. स्वामी-
दोस्तों को देख कर दुश्मन सदा देने लगे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।
कुछ सिला मुझको वफाओं का मेरी पाने तो दो
ज़हर के बदने मुझे तुम क्यों दवा देने लगे।


मुनव्वर सरहदी-
मुझे आदाबे मयख़ाना को ठुकराना नहीं आता
वो मयकश हूँ जिसे पी कर बहक जाना नहीं आता।
दिले पुर नूर से तारीकियाँ मिटती हैं आलम की
मुनव्वर हूँ मुझे ज़ुल्मत से घबराना नहीं आता।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ ज़र्फ़ देहलवी

ज़र्फ देहलवी-
गाँव की मिट्टी, शहर की ख़ुशबू, दोनों से मायूस हुए
वक़्त के बदले तेवर हमको, दोनों में महसूस हुए।

खेल खिलंदड़, मिलना-जुलना, अब न रहे वो मन के मीत
भूल गईं ढोलक की थापें, बिसर गए सावन के गीत
चिड़ियों की चहकन सब भूले, भूले झरनों का संगीत
तरकश ताने प्रचुर हुए सब, मृदुता में कंजूस हुए।

अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनाब ज़र्फ़ देहलवी ने आनंदम् के एक साल पूरा होने पर बधाई दी और नए कवियों को जोड़ने व कविता को आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक नए मुकाम तक पहुँचाने के लिए प्रशंसा की और सबके प्रति धन्यवाद प्रकट किया।

Friday, January 16, 2009

नये साल की पहली आनंदम गोष्ठी

इस गोष्ठी को यहाँ सुना भी जा सकता है।


भूपेन्द्र कुमार और प्रेमचंद सहजवाला

'आनंदम' संस्था की नव वर्ष गोष्ठी 11 जनवरी 2009 को संस्था के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पश्चिम विहार में आयोजित की गई। गोष्ठी में मुनव्वर सरहदी, ज़फर देहलवी, जगदीश रावतानी, पी के स्वामी, मनमोहन तालिब, डॉ रेखा व्यास, रमेश सिद्धार्थ, साक्षात भसीन, प्रेमचंद सहजवाला, राम निवास इंडिया, पंडित प्रेम बरेलवी, आशीष सिन्हा 'कासिद', जितेंदर प्रीतम, रविन्द्र शर्मा रवि, भूपेन्द्र कुमार, डॉ. सत्यपाल चबर, कैसर अजिग, सुरेंदर पम्मी व सपना संजीव दत्त ने हिस्सा लिया। गोष्ठी का संचालन भूपेंद्र ने किया तथा प्रारम्भ में प्रेमचंद सहजवाला ने आगंतुक कवियों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि कविता 'अभिव्यक्ति की उत्कट इच्छा' से ही पनपती है। अपने कॉलेज के दिनों का एक रोचक उदहारण देते हुए उन्होंने बताया कि तब तो अक्सर कुल्फी वाले के बक्से पर भी एक शेर लिखा रहता:

बन जाते हैं सब रिश्तेदार जब ज़र पास होता है,
टूट जाता है गरीबी में जो रिश्ता ख़ास होता है.


गोष्ठी में जर्फ़ देहलवी ने अपनी गज़लों से वाह-वाह की धूम मचा दी। उनके दो दिलचस्प शेर थे:

कुछ के जैसा मैं हूँ और कुछ मेरे जैसे हैं यहाँ,
किस को अपना मैं कहूं और किस को बेगाना कहूं।

कुछ मुझे वो और कुछ मैं उस को देता हूँ फरेब,
उसको दीवाना कहूं या ख़ुद को दीवाना कहूं।


रविन्द्र शर्मा 'रवि' हमेशा की तरह सशक्त गज़लों के साथ उपस्थित थे। बिछडे हुए साथियों की प्रतीक्षा में रत लोगों की स्थिति का एक अंदाजे-बयान:

हवा चुपचाप अपना काम करके जा चुकी होगी
सभी इल्ज़ाम चिंगारी के जिम्मे हो गए होंगे
शजर की मौत का इस शहर में मतलब नहीं कोई
बहुत होगा तो आकर कुछ परिंदे रो गए होंगे


जगदीश रावतानी की कविता राजनीती पर एक करारा प्रहार थी:

राजनीति और कूटनीति ने अपदस्थ कर सबको / विचारों से बना दिया भिखारी / दुर्भाग्य, इन्सान से बदल कर आदमी हुआ मराठी या बिहारी

सहजवाला ने अपनी ग़ज़ल के एक शेर में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के मद्दे-नज़र पूरे सिस्टम पर प्रहार किया:

साज़िश से बेखबर थे, सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएं बनाने।


मुनव्वर सरहदी हमेशा की तरह सदाबहार रहे और अपने हास्य शेरों से सब के बेतहाशा हंसा कर माहौल को तनाव-मुक्त कर दिया।

ग़ज़ल, ग़ज़ल है मुहब्बत की आरती के लिए
ये शेर फूल है पूजा की तश्तरी के लिए।
क़रीब आती हैं कालेज की जब हसीनाएँ
मैं अपने इश्क़ का सिक्का उछाल लेता हूँ।
ख़ुदा का शुक्र है सब हिन्दी पढ़ने वाली हैं
मै उर्दू बोल कर हसरत निकाल लेता हूँ।


अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का हार्दिक धन्यवाद किया व गोष्ठी सम्पन्न हुई।


जगदीश रावतानी

गोष्ठी में पढ़े गये कुछ और ग़ज़लों/कविताओं के अंश-

सर्वश्री ज़र्फ़ -

एक शीरीं आलमे एहसासे मयख़ाना कहूँ
ज़िंदगी को मैं हक़ीक़त या कि अफ़साना कहूँ
है जहाँ में दरमियाँ ख़ुशियों के ग़म का मसविदा
मैं इसे बज़्मे मसर्रत या कि ग़मख़ाना कहूँ


जितेन्द्र प्रीतम -

तुम्हारी गली में मैं आता रहूँगा
में गाता रहा हूँ मैं गाता रहूँगा


प्रेमचन्द सहजवाला -

दुनिया में आए थे जो तारीख़ को बनाने
अब गुमशुदा हैं लोगों उनके पते ठिकाने
साजिश से बेख़बर थे सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएँ बनाने


पी.के. स्वामी -

क़रीब होती है उनकी मंज़िल, जो तेरे ग़म में समा रहे हैं
जो दूर होते हैं ख़ुद से अपने, क़रीब तेरे ही आ रहे हैं
रूह को जो ख़ुशी न पहुँचे तो क्या किया ज़िन्दगी में हमने
जो बाँटते हैं सुरूर पै हम वो लुत्फ़े मय वो ही पा रहे हैं


रमेश सिद्धार्थ (रेवाड़ी से)-

रात भर आँखें तरसीं सपन के लिए
जैसे तरसे है बेवा सपन के लिए


क़ैसर -

दिलों में हमको निहाँ मिलेगा
यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा
सजदे में जा कर तो देखो
सुकून वहाँ कितना मिलेगा


डॉ. रेखा व्यास -

शाम ढलने लगी, घर को चलने लगी
रात बाघिन सी हमको छलने लगी
खेत खलिहान मैदान ताल तलैया
भोर सूरज के संग में मचलने लगी
गीत ग़ज़लों का व्यास बढ़ा जब से ही
रेखा तू भी आग उगलने लगी


भूपेन्द्र कुमार -

सोना है जिसे आज भी सड़कों के किनारे
कैसे कहेगा वो नया साल मुबारक।