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Tuesday, February 16, 2010

आनंदम की दूसरी विचार गोष्ठी


आनंदम ने नए वर्ष से अपनी गतिविधियों में एक और अध्याय की जो शुरूआत की थी उसी कड़ी में 5 फरवरी 2010 को कस्तूरबा गाँधी मार्ग स्थित मैक्स इंश्योरेंस के सभागार में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें मेडिकल एथिक्स पर चर्चा की गयी। इस गोष्ठी में शिरकत करने वालों के नाम इस प्रकार है: सर्व श्री मुनव्वर सरहदी, रमेश भम्भानी, गुलाबराय, रमेश धर्मदासानी, भूपेंद्र कुमार, जगदीश रावतानी, मनमोहन तालिब, शैलेश सक्सेना, रविंदर शर्मा रवि, श्रीमती दिनेश आहूजा, तरुण रावतानी, साक्षात भसीन, पीसीएस कन्नौजिया , रामनिवास "इंडिया" एवं सत्यवान।



सबसे पहले आनंदम के अध्यक्ष जगदीश रावतानी ने उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत किया एवं विषय प्रवेश करते हुए कार्यक्रम के स्वरुप से सभी को अवगत कराया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डॉ विजय कुमार ने मेडिकल एथिक्स पर अपना आलेख प्रस्तुत किया एवं डॉक्टरों के कर्तव्यों व मरीजों के हकों से अवगत कराते हुए डॉक्टरों की प्राथमिकताओं, न्याय, निदान में चूक और लापरवाही, धर्म व जाति आधारित भेदभाव की मनाही एवं मर्सी किलिंग आदि विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके बाद कई बातों पर गर्मागर्म चर्चा भी हुई जैसे मेडिक्लेम होने पर बिल बढ़ाने के चक्कर में अस्पतालों द्वारा ज्यादा दिनों के लिए मरीज की भर्ती, अनावश्यक रूप से वेंटिलेटर पर रखे रखना, व्यस्तता के रहते मरीज को उचित समय न देना इत्यादि। प्रतिभागियों ने कई सवाल भी पूछे और ससामूहिक चर्चा में भाग ले कर गोष्ठी को जीवंत बना दिया। गोष्ठी के अंत में श्री जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया।

Thursday, July 16, 2009

आनंदम् का एक वर्ष पूरा - 12वीं काव्य गोष्ठी


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ क़ैसर अज़ीज़

हर महीने के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली आनंदम् की 12वीं काव्य गोष्ठी पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी आनंदम् के निवास स्थान पर 12 जुलाई, 2009 को जनाब ज़र्फ़ देहलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कहना न होगा कि इसके साथ ही आनंदम् की गोष्ठियों के सिलसिले को शुरू हुए एक साल भी पूरा हो गया। इस गोष्ठी की ख़ास बात ये रही कि कुछ शायर जो कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं आ पाए उन्होंने वीडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस गोष्ठी में शिरकत की जिसमें जनाब अहमद अली बर्क़ी आज़मी और पी के स्वामी जी भी शामिल थे।

हमेशा की तरह गोष्टी के पहले सत्र में “क्या कविता / ग़ज़ल हाशिए पर है?” विषय पर चर्चा की गई जिसमें ज़र्फ़ देहलवी, मुनव्वर सरहदी, शैलेश कुमार व जगदीश रावतानी ने अपने-अपने विचार रखे। निष्कर्ष रूप में ये बात सामने आई कि चूंकि पहले की बनिस्पत अब मलटीमीडिया की मौजूदगी से काव्य गोष्टियों, सम्मेलनो व मुशायरों में श्रोताओं की कमी दिखाई देती है पर कविता कहने व लिखने वालों व गम्भीर किस्म के श्रोताओं में इज़ाफ़ा ही हुआ है। इंटर नेट ने कवियों को अंतर-राष्ट्रीय ख्याति दिला दी है।

दूसरे सत्र के अंतर्गत गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –


अहमद अली बर्क़ी आज़मी-
कौम है, किसका पैग़ाम है, क्या अर्ज़ करूँ
ज़िन्दगी नामे गुमनाम है, क्या अर्ज़ करूँ
कल मुझे दूर से देख के करते थे जो सलाम
पूछते हैं तेरा क्या नाम है, क्या अर्ज़ करूँ


दर्द देहलवी-
कहते हैं नेकियों का ज़माना तो है नहीं
दामन भी नेकियों से बचना तो है नहीं।
हर कोई गुनगुनाए ग़ज़ल मेरी किसलिए
इक़बाल का ये तराना तो है नहीं।


शैलेश कुमार सक्सैना-
आज फिर वह उदास है, जिसका दिमाग़ दिल के पास है
जो मिला रहे हैं दूध में ज़हर, उन्हीं के हाथ में दारू का गिलास है।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ मनमोहन शर्मा तालिब

मनमोहन शर्मा तालिब-
गुरबत को हिकारत की निगाहों से न देखो
हर शख्स न अच्छा है न दुनिया में बुरा है।
सभी प्यार करते हैं एक दूसरे से
मुहब्बत माँ की ज़माने से जुदा है।


क़ैसर अज़ीज़-
जाने किस हिकमत से ऐसी कर बैठे तदबीरें लोग
ले आए मैदाने अमल में काग़ज़ की शमशीरें लोग।
रंज ख़ुशी में मिलना जुलना होता है जो मतलब से
अपनी दया की खो देंगे इक दिन सब तासीरें लोग।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ भूपेन्द्र कुमार

भूपेन्द्र कुमार –
बासी रोटी की क़ीमत तो तुम उससे पूछो यारो
जिसको ख़ाली जेबें लेकर साँझ ढले घर आना है।
तूफानों से क्रीड़ा करना है अपना शौक़ पुराना
भागे सारी दुनिया ग़म से अपना तो याराना है।

जगदीश रावतानी आनंदम्-
सुलझ जाएगी ये उलझन भी इक दिन
तेरी जुल्फों का पेचो ख़म नहीं है।
अमन है चैन है दुनिया में जगदीश
फटे गर बम तो भी मातम नहीं है।

पी.के. स्वामी-
दोस्तों को देख कर दुश्मन सदा देने लगे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।
कुछ सिला मुझको वफाओं का मेरी पाने तो दो
ज़हर के बदने मुझे तुम क्यों दवा देने लगे।


मुनव्वर सरहदी-
मुझे आदाबे मयख़ाना को ठुकराना नहीं आता
वो मयकश हूँ जिसे पी कर बहक जाना नहीं आता।
दिले पुर नूर से तारीकियाँ मिटती हैं आलम की
मुनव्वर हूँ मुझे ज़ुल्मत से घबराना नहीं आता।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ ज़र्फ़ देहलवी

ज़र्फ देहलवी-
गाँव की मिट्टी, शहर की ख़ुशबू, दोनों से मायूस हुए
वक़्त के बदले तेवर हमको, दोनों में महसूस हुए।

खेल खिलंदड़, मिलना-जुलना, अब न रहे वो मन के मीत
भूल गईं ढोलक की थापें, बिसर गए सावन के गीत
चिड़ियों की चहकन सब भूले, भूले झरनों का संगीत
तरकश ताने प्रचुर हुए सब, मृदुता में कंजूस हुए।

अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनाब ज़र्फ़ देहलवी ने आनंदम् के एक साल पूरा होने पर बधाई दी और नए कवियों को जोड़ने व कविता को आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक नए मुकाम तक पहुँचाने के लिए प्रशंसा की और सबके प्रति धन्यवाद प्रकट किया।

Monday, March 9, 2009

होली के रंगों में रंगी आनंदम की आठवीं गोष्ठी

संवाददाता

आनन्दम् की 8वीं मासिक गोष्ठी शिवा एन्क्लेव पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी के निवास पर होली-मिलन के रूप में संपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर मुनव्वर सरहदी ने की। इस बार गोष्ठी का आरंभ “हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल और उरूज़” पर एक सार्थक बहस से हुआ। इस दौर में मुनव्वर सरहदी, दरवेश भारती और दर्द देहलवी ने अपने-अपने विचार रखे और श्रोताओं की जिज्ञासाओं के जवाब दिए। जहाँ दरवेश भारती ने उरूज की नियमावली को लाज़मी बताया वहीं मुनव्वर साहब इस बात से इत्तफाक़ न रखते हुए ज़ोर दे रहे थे कि अहंग(तरन्नुम) में जो बात सहज रूप में आ जाए उसी को आधार मान कर ग़ज़ल कहनी चाहिए। भूपेन्द्र कुमार के एक प्रश्न के उत्तर में भारती जी का कहना था कि फारसी की स्वीकृत बहरों के अलावा रुक्न को ध्यान में रखते हुए नई बहर भी ईजाद की जा सकती है। मगर देहलवी जी का मानना यह था कि अदब इस बात की इजाज़त नहीं देता कि हम किसी नई बहर में ग़ज़ल कहें। बहरहाल चर्चा विरोधाभासी व रोचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी रही।

गोष्ठी के काव्य चक्र की शुरूआत क़ैसर अज़ीज़ ने अपनी ग़ज़लों से की –

मिटा दे जो नफरत की तारीकियाँ वो
चिराग़े मुहब्बत जलाने दो हमको
ये ज़ातों के पहरे ये धर्मों का बन्धन
ये दीवार सारी गिराने दो हमको



भूपेन्द्र कुमार ने होली के अवसर पर एक बृज लोक गीत प्रस्तुत किया–

होरी खेलत नेता भैया
पाँच बरस में एक बेर ही आवे होली संसद की
तरस गए नेता मोरे भैया, करें कब ताता थैया



साहिबे ख़ाना जगदीश रावतानी ने अपनी ताज़ा रचनाओं से ख़ूब वाहवाही बटोरी। होली पर उनकी नज़म कुछ यूँ थी–

भीगे तन मन और चोली, हिन्दू मुस्लिम सब की होली
तू भी रंग जा ऐसे जैसे, मीरा थी कान्हा की हो ली।



डॉ अहमद अली बर्क़ी ने होली के रंग को ऐसे बयाँ किया-

भर दे होली ज़िन्दगी में आपकी खुशियों के रंग
आपके इस रंग में पड़ने न पाए कोई भंग



आजकल के हालात पर तंज़ करते हुए प्रेमचंद सहजवाला ने अपने सधे हुए अंदाज़ में कहा-

चल पड़ा है इस मुल्क में भी तालिबानी सिलसिला
कर रहे हैं क़ैद साँसों को हया के नाम पर



दर्द देहलवी ने अपने दर्द को कुछ यूँ व्यक्त किया-

लब खोलकर भी कुछ नहीं कह पाई ज़िन्दगी
ख़ामोश रह कर मौत ने सब कुछ कह दिया



“ग़ज़ल के बहाने” नामक पुस्तक शृंखला के लेखक दरवेश भारती ने नए तेवर की ग़ज़ल कुछ यूँ कही-

ये बनाते हैं कभी रंक कभी राजा तुम्हें
ख्वाब तो ख़्वाब हैं ख़्वाबों पे भरोसा न करो
प्यार कर लो किसी लाचार से बेबस से फकत
चाहे पूजा किसी पत्थर की करो या न करो



इस गोष्ठी के अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने होली और हास्य व्यंगय के रस से महफिल को सराबोर कर दिया-

बाप बनना भी कोई मुश्किल है, गोद ले लो किसी का जाया हो
हमको रखना है दाद से मतलब, शेर अपना हो या पराया हो



गोष्ठी का संचालन नमिता राकेश ने बेहद हसीन और रोचक अंदाज़ में किया।

अंत में सभी ने एक दूसरे को गुलाल लगा तथा गले मिलकर होली की शुभकामनाएँ दीं। होली के रंग में सराबोर होकर हँसी के ठहाकों और मिष्ठान्न तथा चायपान के साथ गोष्ठी संपन्न हुई। आनन्दम के सचिव जगदीश रावतानी ने सभी आगन्तुकों का तहेदिल से धन्यवाद किया।

कुछ और उल्लेखनीय शेर/काव्यांश भी देखें-

मुनव्वर सरहदी-
होनी रंगों का तमाशा ही नहीं, इसके दिल में प्यार भी भरपूर है
है कोई दुश्मन तो लग जाए गले, ये मेरे त्यौहार का दस्तूर है

यार ने तेरे आना है तू होली खेल, सब कुछ खोकर पाना है तू होली खेल
मल दे गहरा रंग तू उसके चेहरे पर, रूठा यार मनाना है तो होली खेल


डॉ. दीपांकर गुप्त-
महकें मेरे गाँव में, कई रंग के फूल
पर पथरीले शहर में, उगें सिर्फ बबूल

सोती ही रही हो तो भले लाचार रही हो
जाग जाए तो शक्ति का अवतार है नारी

जगदीश रावतानी-
परिन्दे तो बनाते हैं बहुत से घर
हमें लगती है उम्र इक घर बनाने में
संभल कर चल कि इज़्ज़त पल में लुटती है
जिसे सालों लगेंगे फिर बनाने में

भूपेन्द्र कुमार-
दासी जिसकी होने को कविता को अभिलाषा वह कबीर है
चलती हो जिसके आगे घुटवन-घुटवन भाषा वह कबीर है

नमिता राकेश-
आज क्या सोच के पलकों पे आँसू
घर की चौखट पे कोई मुसाफिर ठहरा तो नहीं

देखो मुझ पे रंग मत डालो
इन गालों पर तो पहले ही लाली है शर्मो हया की

वीरेन्द्र कमर-
जिस तरफ नज़रे इनायत आपकी हो जाएगी
तीरगी दम तोड़ देगी रोशनी हो जाएगी
आप लाएँ तो सही उर्दू ज़बाँ गुफ्तार में
सामने दुश्मन भी सही तो दोस्ती हो जाएगी

साक्षात भसीन-
कोई कवि तो कोई शायर है और है कोई कवि गवैया
रसीली महफिल है आनन्दम् की जमा यहाँ छोटे-बड़े सब रसैया

डॉ. मनमोहन तालिब-
तू है मेरी निगाह में खिला हुआ गुलाब
तेरा वजूद ख़ुशबू तेरा हुस्न लाजवाब

तबस्सुम आँसुओं में ढल गया है
ख़ुशी ग़म से कितना फ़ासला है
दो आँसू ग़ैर के दुख पर बहुत हैं
मदद इंसान की नज़रे ख़ुदा है।

Friday, January 16, 2009

नये साल की पहली आनंदम गोष्ठी

इस गोष्ठी को यहाँ सुना भी जा सकता है।


भूपेन्द्र कुमार और प्रेमचंद सहजवाला

'आनंदम' संस्था की नव वर्ष गोष्ठी 11 जनवरी 2009 को संस्था के संस्थापक जगदीश रावतानी के निवास पश्चिम विहार में आयोजित की गई। गोष्ठी में मुनव्वर सरहदी, ज़फर देहलवी, जगदीश रावतानी, पी के स्वामी, मनमोहन तालिब, डॉ रेखा व्यास, रमेश सिद्धार्थ, साक्षात भसीन, प्रेमचंद सहजवाला, राम निवास इंडिया, पंडित प्रेम बरेलवी, आशीष सिन्हा 'कासिद', जितेंदर प्रीतम, रविन्द्र शर्मा रवि, भूपेन्द्र कुमार, डॉ. सत्यपाल चबर, कैसर अजिग, सुरेंदर पम्मी व सपना संजीव दत्त ने हिस्सा लिया। गोष्ठी का संचालन भूपेंद्र ने किया तथा प्रारम्भ में प्रेमचंद सहजवाला ने आगंतुक कवियों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि कविता 'अभिव्यक्ति की उत्कट इच्छा' से ही पनपती है। अपने कॉलेज के दिनों का एक रोचक उदहारण देते हुए उन्होंने बताया कि तब तो अक्सर कुल्फी वाले के बक्से पर भी एक शेर लिखा रहता:

बन जाते हैं सब रिश्तेदार जब ज़र पास होता है,
टूट जाता है गरीबी में जो रिश्ता ख़ास होता है.


गोष्ठी में जर्फ़ देहलवी ने अपनी गज़लों से वाह-वाह की धूम मचा दी। उनके दो दिलचस्प शेर थे:

कुछ के जैसा मैं हूँ और कुछ मेरे जैसे हैं यहाँ,
किस को अपना मैं कहूं और किस को बेगाना कहूं।

कुछ मुझे वो और कुछ मैं उस को देता हूँ फरेब,
उसको दीवाना कहूं या ख़ुद को दीवाना कहूं।


रविन्द्र शर्मा 'रवि' हमेशा की तरह सशक्त गज़लों के साथ उपस्थित थे। बिछडे हुए साथियों की प्रतीक्षा में रत लोगों की स्थिति का एक अंदाजे-बयान:

हवा चुपचाप अपना काम करके जा चुकी होगी
सभी इल्ज़ाम चिंगारी के जिम्मे हो गए होंगे
शजर की मौत का इस शहर में मतलब नहीं कोई
बहुत होगा तो आकर कुछ परिंदे रो गए होंगे


जगदीश रावतानी की कविता राजनीती पर एक करारा प्रहार थी:

राजनीति और कूटनीति ने अपदस्थ कर सबको / विचारों से बना दिया भिखारी / दुर्भाग्य, इन्सान से बदल कर आदमी हुआ मराठी या बिहारी

सहजवाला ने अपनी ग़ज़ल के एक शेर में मुंबई पर हुए आतंकी हमले के मद्दे-नज़र पूरे सिस्टम पर प्रहार किया:

साज़िश से बेखबर थे, सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएं बनाने।


मुनव्वर सरहदी हमेशा की तरह सदाबहार रहे और अपने हास्य शेरों से सब के बेतहाशा हंसा कर माहौल को तनाव-मुक्त कर दिया।

ग़ज़ल, ग़ज़ल है मुहब्बत की आरती के लिए
ये शेर फूल है पूजा की तश्तरी के लिए।
क़रीब आती हैं कालेज की जब हसीनाएँ
मैं अपने इश्क़ का सिक्का उछाल लेता हूँ।
ख़ुदा का शुक्र है सब हिन्दी पढ़ने वाली हैं
मै उर्दू बोल कर हसरत निकाल लेता हूँ।


अंत में जगदीश रावतानी ने सभी कवियों का हार्दिक धन्यवाद किया व गोष्ठी सम्पन्न हुई।


जगदीश रावतानी

गोष्ठी में पढ़े गये कुछ और ग़ज़लों/कविताओं के अंश-

सर्वश्री ज़र्फ़ -

एक शीरीं आलमे एहसासे मयख़ाना कहूँ
ज़िंदगी को मैं हक़ीक़त या कि अफ़साना कहूँ
है जहाँ में दरमियाँ ख़ुशियों के ग़म का मसविदा
मैं इसे बज़्मे मसर्रत या कि ग़मख़ाना कहूँ


जितेन्द्र प्रीतम -

तुम्हारी गली में मैं आता रहूँगा
में गाता रहा हूँ मैं गाता रहूँगा


प्रेमचन्द सहजवाला -

दुनिया में आए थे जो तारीख़ को बनाने
अब गुमशुदा हैं लोगों उनके पते ठिकाने
साजिश से बेख़बर थे सब शहर के मसीहा
घर जल गया तो सारे निकले कुएँ बनाने


पी.के. स्वामी -

क़रीब होती है उनकी मंज़िल, जो तेरे ग़म में समा रहे हैं
जो दूर होते हैं ख़ुद से अपने, क़रीब तेरे ही आ रहे हैं
रूह को जो ख़ुशी न पहुँचे तो क्या किया ज़िन्दगी में हमने
जो बाँटते हैं सुरूर पै हम वो लुत्फ़े मय वो ही पा रहे हैं


रमेश सिद्धार्थ (रेवाड़ी से)-

रात भर आँखें तरसीं सपन के लिए
जैसे तरसे है बेवा सपन के लिए


क़ैसर -

दिलों में हमको निहाँ मिलेगा
यहाँ नहीं तो वहाँ मिलेगा
सजदे में जा कर तो देखो
सुकून वहाँ कितना मिलेगा


डॉ. रेखा व्यास -

शाम ढलने लगी, घर को चलने लगी
रात बाघिन सी हमको छलने लगी
खेत खलिहान मैदान ताल तलैया
भोर सूरज के संग में मचलने लगी
गीत ग़ज़लों का व्यास बढ़ा जब से ही
रेखा तू भी आग उगलने लगी


भूपेन्द्र कुमार -

सोना है जिसे आज भी सड़कों के किनारे
कैसे कहेगा वो नया साल मुबारक।