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Wednesday, July 29, 2009

'परिचय' की काव्य गोष्ठी में नमिता राकेश व ममता किरण की कविताओं की धूम

सन् 85 में स्थापित 'परिचय' संस्था पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा समय से साहित्यिक गतिविधियों के लिए बहुचर्चित रही है। संस्था की स्थापना अध्यक्षा 70 वर्षीय उर्मिल सत्यभूषण, जो स्वयं भी साहित्य में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं, अपनी सदाबहार तथा कर्मठ शख्सियत द्वारा संस्था की गतिविधियाँ बनाए हुए हैं। हिंदी-उर्दू साहित्यकारों की सर्वाधिक लोकप्रिय संस्थाओं में से एक 'परिचय' भी है।

'परिचय' प्रतिमाह नई दिल्ली के 'Russian Cultural Centre' में साहित्यिक गोष्ठियां आयोजित करती है, जिन में पुस्तक लोकार्पण से ले कर किसी महत्त्वपूर्ण विषय पर चर्चा तक अनेक गतिविधियाँ शामिल रहती हैं। कई काव्य गोष्ठियां भी इन गोष्ठियों का महत्वपूर्ण अंग हैं। संस्था की एक गतिविधि पुस्तक प्रकाशन भी है।

काव्य गोष्ठियों की शृंखला में दि. 23 जुलाई 2009 की काव्य गोष्ठी भी एक यादगार गोष्ठी रही जिस में मूलतः दो विशिष्ट कवयित्रियों - नमिता राकेश व ममता किरण - की कविताओं का पाठ हुआ व तदनंतर अन्य कई कवियों ने भी कविताएँ पढ़ी। गोष्ठी की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कवि बालस्वरूप 'राही' ने की तथा मंच पर अन्य उपस्थित कविगण में थे उर्मिल सत्यभूषण, राजकुमार सैनी, सीमाब सुलतानपूरी व दिनेश मिश्र। संचालन सुपरिचित कवि अनिल वर्मा 'मीत' ने किया।

काव्य पाठ का प्रारंभ नमिता राकेश की कविताओं से हुआ। नमिता एम.ए (अंग्रेजी), एम.ए (इतिहास), पत्रकारिता डिप्लोमा व अन्य कई शैक्षणिक उपलब्धियों के अतिरिक्त अभिनय व खेल कूद से जुडी होने के साथ आकाशवाणी दूरदर्शन में भी सक्रिय रही। वर्त्तमान में वे भारत के आयकर विभाग में सहायक निदेशक हैं। वे छंद-मुक्त कविता, गीत व ग़ज़ल पर बराबर की निपुणता रखती हैं। इस गोष्ठी में पढ़ी गई व्यक्ति-मन के प्रतिबिम्ब रूप उनकी एक कविता यहाँ प्रस्तुत है-


एक पूरा दिन मुझे जीने के लिए कम पड़ता है/अधूरे रह गए कामों को अगले दिन करने की लालसा में/जा लेटती हूँ बिस्तर पर/अधूरी इच्छाएं, लालसाएं, आकांक्षाएं,अभिलाषाएं समेट कर/तह लगा कर/रख देती हूँ तकिये के नीचे//अपने पैर समेटते हुए/बंधनों की चादर तान लेती हूँ अपने ऊपर//पलकें बंद कर के सोने की कोशिश में/जाग जाते हैं न जाने कितने सोए हुए ख़याल//बंद पलकों के भीतर देखती हूँ/ उन्हें पूरा होते हुए/और न जाने कब सो जाती हूँ अगली सुबह के इंतज़ार में.

भारतीय समाज में नारी प्रारंभ से ही समाज के दमन व शोषण का शिकार रही है। इसे ले कर कोई कवयित्री किसी न किसी रूप में अपने मन के भाव कागज़ पर न उकेरे, यह असंभव है. नमिता द्वारा गोष्ठी में प्रस्तुत यह दोहा इसी बात का सबूत हैं।

जननी जग पोषित करे शोषित है वो आज
जो सृष्टि-जननी बनी गिरी उसी पर गाज.




गांव की ओर उमुख युवा पीढ़ी की विडम्बना व देश में चल रही घातक सियासत पर नमिता की कलम:

चार पैसे क्या कमाने गाँव से बेटा गया
फिर कभी वो पास बूढ़े बाप के आया नहीं.


और

हर तरफ मज़हब सियासत नस्लो-फिरका क़ौमो-जात
है कहाँ हिन्दोस्ताँ हम को नज़र आया नहीं.


नमिता के बाद आई दूसरी विशिष्ट कवयित्री ममता किरण 'राष्ट्रीय सहारा', 'पंजाब केसरी', 'शाह टाईम्स', 'जे बी जी टाईम्स', व 'सिटी चैनल' आदि से सम्बद्ध रह कर अब स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। भारतीय नारी का एक संवेदनात्मक हृदय व गीत-गज़ल तथा छंद-मुक्त काव्य पर अपनी अनूठी पकड़ के कारण प्रायः काफी डिमांड में रही हैं।



उन्होंने 'SAARC Writers' Conference' 'Indian Society of Authors' व 'ग़ालिब अकादेमी' आदि अनेक गोष्ठियों में काव्य पाठ किये हैं. इन्टरनेट पर 'रेडियो' सबरंग पर भी तरन्नुम में उनके मधुर गीत सुने जा सकते हैं। नारी की समाज में स्थिति को वे किस संवेदनात्मक तरीके से व्यक्त करती हैं, इस का मर्मस्पर्शी उदहारण है उन की एक गज़ल का यह शेर:

हाथ में मेरे नहीं एक भी निर्णय बेटी,
कोख मेरी है मगर कैसे बचा लूं तुमको.


आज इस उदारीकरण और आधुनिकतम शिक्षा व प्रौद्योगिकी की बाढ़ में भी एक शर्मनाक सत्य यह है कि जन्म से पहले, कोख में ही बेटी की हत्या कर दी जाती है।

प्रायः साहित्य समीक्षक प्रेम-कविताओं को औरताना लेखन कह कर नकार देते हैं, पर नारी मन की शाश्वत समर्पण भावना के आगे ऐसे आलोचकों के तर्क धराशयी रह जाते हैं। जैसे:

सारी दुनिया चाहे जो कहती रहे
मैं जिसे पूजूँ वही भगवन है.


ममता किरण ने कई गोष्ठियों में एक ग़ज़ल तरन्नुम में गाई है, जिस का मतला है:

कोई आंसू बहाता है, कोई खुशियाँ मनाता है
ये सारा खेल उसका है, वही सब को नचाता है


इस शेर से मुझे यही शिकायत रही है कि ऐसे दार्शनिक/किस्मतवादी शेर व्यवहारिक व यथार्थ काव्य का हिस्सा नहीं होने चाहिए। पर इसी ग़ज़ल के दो अन्य शेर कवियत्री के चिंतन फलक में विस्तार के दर्शन भी कराते हैं:

बहुत से ख्वाब ले कर के वो आया इस शहर में था
मगर दो जून की रोटी बमुश्किल ही जुटाता है.

घड़ी संकट की हो या फिर कोई मुश्किल बला भी हो
ये मन भी खूब है रह रह के उम्मीदें बंधाता है.

ममता जी द्वारा प्रस्तुत एक छंद-मुक्त व कुछ कुछ लम्बी सी कविता की ये पंक्तियाँ ही कवियत्री की विस्तृत व वैयक्तिकता-मुक्त सोच से साक्षात्कार कराती हैं:

जन्म लूं यदि मैं फूल बन.
खुशबू बन महकूँ,
प्रार्थना बन कर-बद्ध हो जाऊं,
अर्चना बन अर्पित हो जाऊं,
शान्ति बन निवेदित हो जाऊं,बदल दूं गोलियों का रास्ता,
सीमा पर खिल खिल जाऊं.


जिन अन्य कवियों ने काविताएं पढ़ी, उनमें कुछ अच्छी काव्य पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत हैं:

देवेन्द्र 'मांझी'

किसी को कुछ किसी को कुछ किसी को कुछ बताते हैं/यहाँ कुछ लोग अपनी ही हकीक़त भूल जाते हैं.

चिराग़ जैन

एक पल सूरज छिपा और फिर उजाला हो गया/लेकिन इस में चाँद का किरदार काला हो गया/साज़िशें सूरज निगलने की रची थी चाँद ने/पर वो अपनी साज़िशों का खुद निवाला हो गया.

(इस गोष्ठी से एक दिन पूर्व ही शताब्दी का सब से बड़ा सूर्य ग्रहण था, इस लिए चराग़ की चंद्रमा पर यह चुटकी सब को बहुत भा गई)।

दिल्ली में मैं पिछले चंद वर्षों में कई काव्य गोष्ठियों में गया और इन में मैं ने बहुत सुखद अनुभूति के साथ हिंदी व उर्दू गज़लकारों का अनूठा सम्मेलन भी देखा।

हिंदी और उर्दू दोनों की प्रसिद्व हस्तियों के एक ही मंच पर आने से इस विवाद के कोई अर्थ नहीं रह जाते कि हिंदी ग़ज़ल बेहतर कि उर्दू। उदाहरण के तौर पर मंच पर उपस्थित उर्दू शायरी के एक जाने माने हस्ताक्षर सीमाब 'सुल्तानपुरी' ने जो ग़ज़ल पढ़ी उस के मतले से ही हॉल तालियों की गड़गडाहट से गूँज उठा :

उसको खबर नहीं थी कि वो दायरे में था
सदियों से चल रहा था मगर रास्ते में था.


उर्दू की ही दो और विभूतियाँ:

दर्द 'देहलवी'

अब मेरे दिल को छोड़ के जाना तो है नहीं
वैसे भी ग़म का कोई ठिकाना तो है नहीं.


अहमद मजाज़ 'अमरोहवी'

मुझे तुझ से कुछ शिकायत न हुई न है न होगी
तेरा वस्ल मेरी किस्मत न हुई न है न होगी
मेरे दिल ने तुझ को चाहा तुझे बार बार पूजा
कि कबूल ये इबादत न हुई न है न होगी.


कार्यक्रम संचालक अनिल वर्मा 'मीत' ने चार पंक्तियों में दिल की महिमा गाई-

आहों का पहरा होता है/दर्द जहाँ ठहरा होता है/दिल इक छोटी चीज़ सही पर/सागर से गहरा होता है.

अंत में अध्यक्ष बाल स्वरुप 'राही' ने दोनों विशिष्ट कवियत्रियों व अन्य कवियों को बधाई दी और एक ग़ज़ल भी प्रस्तुत की जिस का मतला है:

अपनी हस्ती के सबूतों को मिटाने के लिए
याद करता हूँ तुझे रोज़ भुलाने के लिए


साहित्यकार और शब्द-शिल्पी शायद पर्यायवाची शब्द हैं, और इसी सन्दर्भ में मुझे उर्मिल सत्यभूषण की एक ग़ज़ल का यह शेर अक्सर याद रहता है, जो ऐसी सशक्त गोष्ठियों पर अपनी निर्णायक बात को स्पष्ट रूप से कहता है:

मैं जहाँ में शब्द-फूलों को रहूँगी बाँटती,
एक खुशबू की तरह हर दिल को मैं महकाऊँगी.


गोष्ठी रिपोर्ट - प्रेमचंद सहजवाला

Thursday, July 16, 2009

आनंदम् का एक वर्ष पूरा - 12वीं काव्य गोष्ठी


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ क़ैसर अज़ीज़

हर महीने के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली आनंदम् की 12वीं काव्य गोष्ठी पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी आनंदम् के निवास स्थान पर 12 जुलाई, 2009 को जनाब ज़र्फ़ देहलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कहना न होगा कि इसके साथ ही आनंदम् की गोष्ठियों के सिलसिले को शुरू हुए एक साल भी पूरा हो गया। इस गोष्ठी की ख़ास बात ये रही कि कुछ शायर जो कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं आ पाए उन्होंने वीडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस गोष्ठी में शिरकत की जिसमें जनाब अहमद अली बर्क़ी आज़मी और पी के स्वामी जी भी शामिल थे।

हमेशा की तरह गोष्टी के पहले सत्र में “क्या कविता / ग़ज़ल हाशिए पर है?” विषय पर चर्चा की गई जिसमें ज़र्फ़ देहलवी, मुनव्वर सरहदी, शैलेश कुमार व जगदीश रावतानी ने अपने-अपने विचार रखे। निष्कर्ष रूप में ये बात सामने आई कि चूंकि पहले की बनिस्पत अब मलटीमीडिया की मौजूदगी से काव्य गोष्टियों, सम्मेलनो व मुशायरों में श्रोताओं की कमी दिखाई देती है पर कविता कहने व लिखने वालों व गम्भीर किस्म के श्रोताओं में इज़ाफ़ा ही हुआ है। इंटर नेट ने कवियों को अंतर-राष्ट्रीय ख्याति दिला दी है।

दूसरे सत्र के अंतर्गत गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –


अहमद अली बर्क़ी आज़मी-
कौम है, किसका पैग़ाम है, क्या अर्ज़ करूँ
ज़िन्दगी नामे गुमनाम है, क्या अर्ज़ करूँ
कल मुझे दूर से देख के करते थे जो सलाम
पूछते हैं तेरा क्या नाम है, क्या अर्ज़ करूँ


दर्द देहलवी-
कहते हैं नेकियों का ज़माना तो है नहीं
दामन भी नेकियों से बचना तो है नहीं।
हर कोई गुनगुनाए ग़ज़ल मेरी किसलिए
इक़बाल का ये तराना तो है नहीं।


शैलेश कुमार सक्सैना-
आज फिर वह उदास है, जिसका दिमाग़ दिल के पास है
जो मिला रहे हैं दूध में ज़हर, उन्हीं के हाथ में दारू का गिलास है।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ मनमोहन शर्मा तालिब

मनमोहन शर्मा तालिब-
गुरबत को हिकारत की निगाहों से न देखो
हर शख्स न अच्छा है न दुनिया में बुरा है।
सभी प्यार करते हैं एक दूसरे से
मुहब्बत माँ की ज़माने से जुदा है।


क़ैसर अज़ीज़-
जाने किस हिकमत से ऐसी कर बैठे तदबीरें लोग
ले आए मैदाने अमल में काग़ज़ की शमशीरें लोग।
रंज ख़ुशी में मिलना जुलना होता है जो मतलब से
अपनी दया की खो देंगे इक दिन सब तासीरें लोग।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ भूपेन्द्र कुमार

भूपेन्द्र कुमार –
बासी रोटी की क़ीमत तो तुम उससे पूछो यारो
जिसको ख़ाली जेबें लेकर साँझ ढले घर आना है।
तूफानों से क्रीड़ा करना है अपना शौक़ पुराना
भागे सारी दुनिया ग़म से अपना तो याराना है।

जगदीश रावतानी आनंदम्-
सुलझ जाएगी ये उलझन भी इक दिन
तेरी जुल्फों का पेचो ख़म नहीं है।
अमन है चैन है दुनिया में जगदीश
फटे गर बम तो भी मातम नहीं है।

पी.के. स्वामी-
दोस्तों को देख कर दुश्मन सदा देने लगे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।
कुछ सिला मुझको वफाओं का मेरी पाने तो दो
ज़हर के बदने मुझे तुम क्यों दवा देने लगे।


मुनव्वर सरहदी-
मुझे आदाबे मयख़ाना को ठुकराना नहीं आता
वो मयकश हूँ जिसे पी कर बहक जाना नहीं आता।
दिले पुर नूर से तारीकियाँ मिटती हैं आलम की
मुनव्वर हूँ मुझे ज़ुल्मत से घबराना नहीं आता।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ ज़र्फ़ देहलवी

ज़र्फ देहलवी-
गाँव की मिट्टी, शहर की ख़ुशबू, दोनों से मायूस हुए
वक़्त के बदले तेवर हमको, दोनों में महसूस हुए।

खेल खिलंदड़, मिलना-जुलना, अब न रहे वो मन के मीत
भूल गईं ढोलक की थापें, बिसर गए सावन के गीत
चिड़ियों की चहकन सब भूले, भूले झरनों का संगीत
तरकश ताने प्रचुर हुए सब, मृदुता में कंजूस हुए।

अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनाब ज़र्फ़ देहलवी ने आनंदम् के एक साल पूरा होने पर बधाई दी और नए कवियों को जोड़ने व कविता को आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक नए मुकाम तक पहुँचाने के लिए प्रशंसा की और सबके प्रति धन्यवाद प्रकट किया।

Tuesday, May 12, 2009

आनंदम की 10वीं गोष्ठी सम्पन्न


नई दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके में आनंदम ने रविवार 10 मई 2009 को अपनी 10वीं कवि गोष्ठी का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि मनमोहन तालिब ने की। कार्यक्रम में अमेरिका से पधारे मशहूर गीतकार राकेश खंडेलवाल की उपस्थिति ने इस गोष्ठी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बना दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत 'लेखक को अपने लेखन से पैसा कमाने के बारे में सोचना चाहिए या नहीं?' पर चर्चा से हुई जिसपर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रेमचंद सहजवाला ने कहा कि लेखक को अपनी लेखनी से कमाने के बार में अवश्य सोचना चाहिए और अब स्थितियाँ बेहतर हैं, वो चाहे तो कमा भी सकता है। अगले वक्ता के रूप में आमंत्रित वरिष्ठ कवि मुन्नवर सरहदी ने कहा कि पब्लिक के बीच रचनाकार यदि खुद मक़ाम बनाये तो वह व्यवसायिक रूप से सफल हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस दौर में शायरी के अलावा रोज़ी-रोटी का कोई और प्रबंध भी होना चाहिए।


अगले वक्ता में आमंत्रित हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी ने कहा कि गैर-व्यवसायिक और व्यवसायिक लेखन का वर्गीकरण आवश्यक है। व्यवसायिक लेखन के लिए लेखक को खुद को ज़रूरतों के हिसाब से, धन मुहैया कराने वाले माध्यमों के हिसाब से ढालना होता है, फिर आप यह शिकायत नहीं कर सकते कि यह साहित्य के साथ मज़ाक है। अंतिम वक्ता के रूप में अमेरिका से पधारे कवि राकेश खंडेलवाल ने बताया कि बाहर के मुल्कों में लेखन की बहुत इज्जत है। मुझे कई बार कवि सम्मेलनों/मुशायरों में जब बुलाया जाता है तो ज़रूर पूछा जाता है कि आप कितना लेना चाहेंगे। हाँ, वो बात अलग है कि जब मैं फॉर्मासिटीकल से संबंधित कोई आर्टिकल लिखता हूँ तो 4000 डॉलर मिलते हैं, लेकिन कवि सम्मेलन के लिए 1100 डॉलर।

गोष्ठी में कुल 23 युवा-वरिष्ठ कवियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मोहक संचलान राकेश खंडेलवाल ने किया। प्रस्तुत चुनिंदा शे'र/काव्यांश और चित्र-

राकेश खंडेलवाल-
तुमने कहा न तुम तक पहुँचे मेरे भेजे हुए संदेसे
इसीलिये अबकी भेजा है मैंने पंजीकरण करा कर
बरखा की बूँदों में अक्षर पिरो पिरो कर पत्र लिखा है
कहा जलद से तुम्हें सुनाये द्वार तुम्हारे जाकर गा कर।

दर्द देहलवी-
किसे फरयाद की हाजत, शिकायत कौन करता है
अगर इन्साफ मिल जाए बग़ावत कौन करता है।

मजाज़ अमरोहवी-
उसका अनदाज़े तकल्लुम बड़ा शीरीं है मजाज़
वह बुरी बात भी कह दे भली लगती है।

डॉ॰ दरवेश भारती-
हालात देख आज के उभरा है ये सवाल
तुलसी कबीर सूर की बानी किधर गयी।
पल-पल थे जिसकी तोतली बातों पे झूमते
'दरवेश' होते ही वो सयानी किधर गयी।

सुनीता शानू-
उसकी आँखों से हक़ीक़त बयान होती है,
हर घड़ी एक नया इम्तिहान होती है।
घूरने लगती हैं दुनिया की निगाहें उसको
जब किसी ग़रीब की बेटी जवान होती है।

साक्षात भसीन-
तू बता या न बताम तेरा पता ढूँढ़ लेगे
लाख हमसे छिपले तू, छिपा कहाँ ढूँढ़ लेंगे
फर्श से अर्श तक है अजब दास्ताँ तेरी
क्या समां तू कहाँ वही लम्हा ढूँढ़ लेंगे।


अजन्ता शर्मा-
बनकर नदी जब बहा करूँगी
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहाँ करूँगी
तब क्या मुझे रोक पाओगे?

ज़र्फ़ देहलवी-
जो डरते हैं ज़माने से उन्हीं को ये डराता है
नहीं डरते जो इससे खुद ज़माना उनसे डरता है।

‌क़ैसर अज़ीज़-
जिसकी मिसाल मिल न सके काइनात में
पेशानिय हयात पे वह इन्क़लाब लिख
आईना बन के जीना तो दुशवार है बहुत
काँटों को फूल और चमन को सुराब लिख

मुन्नवर सरहदी-
फ़नकार कभी फ़न का तमाशा नहीं करते
हीरे हों तो फुटपाथ पर बेचा नहीं करते।


मनमोहन तालिब-
क्या हो गया इस दौर में नायाब है इन्सां
हम देर से बाज़ार में ख़ामोश खड़े हैं।

शैलेश सक्सेना-
जाने कौन सा नया खेल दिखायेगी ज़िन्दगी
अब कौन सा नया खिलौना दिलायेगी ज़िन्दगी।

जगदीश रावतानी-
मेरे लबों पे भी ज़रूर आयेगी हँसी कभी
न जाने कब से मेरे आईने को इंतज़ार है।
कभी तो आयेगी मेरे हयात में उदासियाँ
बहुत दिनों से दोस्तों का इसका इंतज़ार है।

अनुराधा शर्मा भी इस गोष्ठी में मौज़ूद थीं, उन्होंने जो नज़्म सुनाई उसे पूरी यहाँ पढ़ें। इनके अतिरिक्त नूर, डॉ॰ विजय कुमार, डॉ॰ महेश चंद्र गुप्त 'खलिश' , ओ पी विश्नोई, जीतेन्द्र प्रीतम, विक्रम भारतीय इत्यादि ने भाग लिया। अंत में आनंदम-प्रमुख जगदीश रावतानी ने सबका आभार व्यक्त किया।

इस कार्यक्रम को सुनना चाहें तो कृपया नीचे का प्लेयर चलायें।


कार्यक्रम यहाँ से डाउनलोड कर लें।

Monday, March 9, 2009

होली के रंगों में रंगी आनंदम की आठवीं गोष्ठी

संवाददाता

आनन्दम् की 8वीं मासिक गोष्ठी शिवा एन्क्लेव पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी के निवास पर होली-मिलन के रूप में संपन्न हुई। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर मुनव्वर सरहदी ने की। इस बार गोष्ठी का आरंभ “हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल और उरूज़” पर एक सार्थक बहस से हुआ। इस दौर में मुनव्वर सरहदी, दरवेश भारती और दर्द देहलवी ने अपने-अपने विचार रखे और श्रोताओं की जिज्ञासाओं के जवाब दिए। जहाँ दरवेश भारती ने उरूज की नियमावली को लाज़मी बताया वहीं मुनव्वर साहब इस बात से इत्तफाक़ न रखते हुए ज़ोर दे रहे थे कि अहंग(तरन्नुम) में जो बात सहज रूप में आ जाए उसी को आधार मान कर ग़ज़ल कहनी चाहिए। भूपेन्द्र कुमार के एक प्रश्न के उत्तर में भारती जी का कहना था कि फारसी की स्वीकृत बहरों के अलावा रुक्न को ध्यान में रखते हुए नई बहर भी ईजाद की जा सकती है। मगर देहलवी जी का मानना यह था कि अदब इस बात की इजाज़त नहीं देता कि हम किसी नई बहर में ग़ज़ल कहें। बहरहाल चर्चा विरोधाभासी व रोचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी रही।

गोष्ठी के काव्य चक्र की शुरूआत क़ैसर अज़ीज़ ने अपनी ग़ज़लों से की –

मिटा दे जो नफरत की तारीकियाँ वो
चिराग़े मुहब्बत जलाने दो हमको
ये ज़ातों के पहरे ये धर्मों का बन्धन
ये दीवार सारी गिराने दो हमको



भूपेन्द्र कुमार ने होली के अवसर पर एक बृज लोक गीत प्रस्तुत किया–

होरी खेलत नेता भैया
पाँच बरस में एक बेर ही आवे होली संसद की
तरस गए नेता मोरे भैया, करें कब ताता थैया



साहिबे ख़ाना जगदीश रावतानी ने अपनी ताज़ा रचनाओं से ख़ूब वाहवाही बटोरी। होली पर उनकी नज़म कुछ यूँ थी–

भीगे तन मन और चोली, हिन्दू मुस्लिम सब की होली
तू भी रंग जा ऐसे जैसे, मीरा थी कान्हा की हो ली।



डॉ अहमद अली बर्क़ी ने होली के रंग को ऐसे बयाँ किया-

भर दे होली ज़िन्दगी में आपकी खुशियों के रंग
आपके इस रंग में पड़ने न पाए कोई भंग



आजकल के हालात पर तंज़ करते हुए प्रेमचंद सहजवाला ने अपने सधे हुए अंदाज़ में कहा-

चल पड़ा है इस मुल्क में भी तालिबानी सिलसिला
कर रहे हैं क़ैद साँसों को हया के नाम पर



दर्द देहलवी ने अपने दर्द को कुछ यूँ व्यक्त किया-

लब खोलकर भी कुछ नहीं कह पाई ज़िन्दगी
ख़ामोश रह कर मौत ने सब कुछ कह दिया



“ग़ज़ल के बहाने” नामक पुस्तक शृंखला के लेखक दरवेश भारती ने नए तेवर की ग़ज़ल कुछ यूँ कही-

ये बनाते हैं कभी रंक कभी राजा तुम्हें
ख्वाब तो ख़्वाब हैं ख़्वाबों पे भरोसा न करो
प्यार कर लो किसी लाचार से बेबस से फकत
चाहे पूजा किसी पत्थर की करो या न करो



इस गोष्ठी के अध्यक्ष मुनव्वर सरहदी ने होली और हास्य व्यंगय के रस से महफिल को सराबोर कर दिया-

बाप बनना भी कोई मुश्किल है, गोद ले लो किसी का जाया हो
हमको रखना है दाद से मतलब, शेर अपना हो या पराया हो



गोष्ठी का संचालन नमिता राकेश ने बेहद हसीन और रोचक अंदाज़ में किया।

अंत में सभी ने एक दूसरे को गुलाल लगा तथा गले मिलकर होली की शुभकामनाएँ दीं। होली के रंग में सराबोर होकर हँसी के ठहाकों और मिष्ठान्न तथा चायपान के साथ गोष्ठी संपन्न हुई। आनन्दम के सचिव जगदीश रावतानी ने सभी आगन्तुकों का तहेदिल से धन्यवाद किया।

कुछ और उल्लेखनीय शेर/काव्यांश भी देखें-

मुनव्वर सरहदी-
होनी रंगों का तमाशा ही नहीं, इसके दिल में प्यार भी भरपूर है
है कोई दुश्मन तो लग जाए गले, ये मेरे त्यौहार का दस्तूर है

यार ने तेरे आना है तू होली खेल, सब कुछ खोकर पाना है तू होली खेल
मल दे गहरा रंग तू उसके चेहरे पर, रूठा यार मनाना है तो होली खेल


डॉ. दीपांकर गुप्त-
महकें मेरे गाँव में, कई रंग के फूल
पर पथरीले शहर में, उगें सिर्फ बबूल

सोती ही रही हो तो भले लाचार रही हो
जाग जाए तो शक्ति का अवतार है नारी

जगदीश रावतानी-
परिन्दे तो बनाते हैं बहुत से घर
हमें लगती है उम्र इक घर बनाने में
संभल कर चल कि इज़्ज़त पल में लुटती है
जिसे सालों लगेंगे फिर बनाने में

भूपेन्द्र कुमार-
दासी जिसकी होने को कविता को अभिलाषा वह कबीर है
चलती हो जिसके आगे घुटवन-घुटवन भाषा वह कबीर है

नमिता राकेश-
आज क्या सोच के पलकों पे आँसू
घर की चौखट पे कोई मुसाफिर ठहरा तो नहीं

देखो मुझ पे रंग मत डालो
इन गालों पर तो पहले ही लाली है शर्मो हया की

वीरेन्द्र कमर-
जिस तरफ नज़रे इनायत आपकी हो जाएगी
तीरगी दम तोड़ देगी रोशनी हो जाएगी
आप लाएँ तो सही उर्दू ज़बाँ गुफ्तार में
सामने दुश्मन भी सही तो दोस्ती हो जाएगी

साक्षात भसीन-
कोई कवि तो कोई शायर है और है कोई कवि गवैया
रसीली महफिल है आनन्दम् की जमा यहाँ छोटे-बड़े सब रसैया

डॉ. मनमोहन तालिब-
तू है मेरी निगाह में खिला हुआ गुलाब
तेरा वजूद ख़ुशबू तेरा हुस्न लाजवाब

तबस्सुम आँसुओं में ढल गया है
ख़ुशी ग़म से कितना फ़ासला है
दो आँसू ग़ैर के दुख पर बहुत हैं
मदद इंसान की नज़रे ख़ुदा है।